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केंद्रीय कर्मचारियों के लिए खुशखबरी? 64% हो सकता है DA, नवरात्रि-दुर्गा पूजा से पहले बढ़ेगी सैलरी!

नई दिल्ली त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही 1 करोड़ से ज्यादा केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की नजरें महंगाई भत्ते (Dearness Allowance)पर टिक गई हैं. देश के करीब 50 लाख कर्मचारियों और 65 लाख से अधिक पेंशनर्श जुलाई 2026 से लागू होने वाले इस भत्ते में बढ़तरी(DA Hike july 2026) का बेसब्री से इंतजार कर रहे है. इस साल 11 अक्टूबर से नवरात्रि और 20 अक्टूबर को दशहरा है. ऐसे में हर कोई जानना चाहता है कि क्या सरकार दुर्गा पूजा या नवरात्रि के आसपास इस तोहफे का ऐलान करेगी।  आइए आपको बताते हैं कि ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI) के अनुमानित आंकड़े और सरकार के पिछले पैटर्न के हिसाब से कब सरकारी कर्मचारियों के डीए पर गुड न्यूज मिल सकती है और इस बार कितनी बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है… कब तक हो सकती है महंगाई भत्ते की घोषणा? आमतौर पर सरकार जुलाई से लागू होने वाले डीए की घोषणा सितंबर या अक्टूबर में करती है. अगर नवरात्रि पर ऐलान नहीं होता है, तो सरकार दिवाली तक पर कर्मचारियों को ये तोहफा दे सकती है. अच्छी बात यह है कि महंगाई भत्ते की घोषणा जब भी होगी, भत्ते की दरें 1 जुलाई 2026 से ही लागू मानी जाएंगी. इसका मतलब है कि कर्मचारियों को पिछले महीनों का बकाया एरियर भी साथ में मिलेगा।  कितना बढ़ सकता है आपका DA? फिलहाल कर्मचारियों को बेसिक सैलरी का 60% डीए मिल रहा है. ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI-IW) के जुलाई आंकड़ों के मुताबिक इंडेक्स 153.2 पर पहुंच गया है. इस आधार पर अनुमानित डीए 64% बैठता है. यानी इस बार डीए में सीधा 4% का इजाफा होने की पूरी उम्मीद है. जब तक 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें पूरी तरह लागू नहीं होतीं, तब तक यह बढ़ोतरी 7वें वेतन आयोग के तहत ही दी जाएगी।  कितनी बढ़ेगी इन-हैंड सैलरी? हालांकि आपको ये समझना होगा कि 4% डीए बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि आपकी कुल टेक-होम सैलरी 4% बढ़ जाएगी. डीए का कैलकुलेशन आपकी बेसिक सैलरी पर होता है…. यहां समझिए डीए बढ़ने से अलग-अलग लेवल के कर्मचारियों की बेसिक सैलरी बढ़कर कितनी हो जाएगी.. डीए का कैलकुलेशन आपकी बेसिक सैलरी पर होता है. 4% डीए बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि आपकी कुल टेक-होम सैलरी 4% बढ़ जाएगी सिर्फ सैलरी नहीं पेंशन भी बढ़ेगा महंगाई भत्ता सिर्फ इन-हैंड सैलरी ही नहीं बढ़ाता, बल्कि इसका असर पीएफ (PF), ग्रेच्युटी और पेंशनर्श की मासिक पेंशन पर भी पड़ता है. जैसे ही सरकार कैबिनेट बैठक में इसे मंजूरी देगी, त्योहारी सीजन में कर्मचारियों के बैंक खातों में बढ़ी हुई सैलरी और एरियर की रकम जमा हो जाएगी. फिलहाल आपको त्योहारों से पहसे सरकार की तरफ से आने वाले एक बड़े फैसले के लिए इंतजार करना होगा।   

दिल्ली से गुरुग्राम का सफर होगा और तेज, द्वारका-महिपालपुर से हरियाणा बॉर्डर तक हाईस्पीड कनेक्टिविटी

गुरुग्राम गुरुग्राम में बढ़ते ट्रैफिक जाम से निजात दिलाने के लिए सरकार जल्द ही एक तीन लेन वाला एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने की योजना बना रही है. नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने इसके लिए प्लान तैयार कर लिया है.  इसके बनने से दिल्ली-गुड़गांव एक्सप्रेसवे पर लगने वाला जाम काफी हद तक कम हो जाएगा. इसके लिए दिल्ली की शिव मूर्ति महिपालपुर और एम्बिएंस मॉल के पास हरियाणा बॉर्डर के बीच तीन-लेन वाला एलिवेटेड कॉरिडोर बनाया जाएगा।  यह एलिवेटेड कॉरिडोर करीब 2 कलोमीटर लंबा बनाया जा सकता है. दरअसल एक्सप्रेसवे के इसी हिस्से में सबसे ज्यादा जाम लगता है. सुबह-शाम दिल्ली-गुरुग्राम के बीच सफर करने वालों को इससे काफी परेशानी झेलनी पड़ती है. खासकर ऑफिस आने-जाने वाले लोग घंटों जाम में फंसे रहते हैं.. हर दिन वे इस जाम से जूझते हैं. लेकिन नया एलिवेटेड रोड बनने से उनको सबसे ज्यादा राहत मिलेगी।  181 करोड़ रुपये की लागत से बनेगा एलिवेटेड रोड जानकारी के मुताबिक, एलिवेटेड रोड करीब 181 करोड़ रुपये की लागत से बनाया जाएगा. यह रोड तीन लेन को होगा.इसके दोनों तरफ दो-दो लेन की सर्विस रोड बनाई जाएगी.सालों से इस योजना पर विचार चल रहा है. पहले सड़क चौड़ी करने और फ्लाईओवर का प्रस्ताव रखा गया. लेकिन अब एलिवेटेड रोड बनाए जाने को ट्रैफिक जाम से मुक्ति का ज्यादा बढ़िया समाधान माना गया है।  द्वारका अंडरपास के ट्रैफिक को मिलेगा नया रोड NHAI योजना बना रहा है कि तीन-लेन वाले एलिवेटेड कॉरिडोर रंगपुरी के पास द्वारका एक्सप्रेसवे इंटरचेंज की राइट-टर्न टनल से बनाया जाए. इसे सेक्टर 10 तक बनाए जाने की प्लानिंग है. जिससे इसे द्वारका एक्सप्रेसवे और दिल्ली-जयपुर हाईवे के बीच कनेक्ट हो सके. वहीं अंडरपास से निकलने वाले ट्रैफिक को शहर की तरफ जाने वाले एलिवेटेड सेक्शन पर भेजने का प्रस्ताव है।  राजोकरी फ्लाईओवर के समानांतर चलेगा नया रोड नए एलिवेटेड रोड के बनने के बाद NH8 से गुजरने वाले वाहनों को अंडरपास से निकलते ही शानदार कॉरिडोर मिलेगा, जिससे उनको जाम में नहीं फंसना पड़ेगा. द्वारका एक्सप्रेसवे से आने वाले ट्रैफिक को मौजूदा सड़क के ही ऊपर से ले जाने की योजना है, ताकि लोग जाम में न फंसे. बता दें कि नया एलिवेटेड रोड मौजूदा राजोकरी फ्लाईओवर के समानांतर चलेगा।  शिव मूर्ति और हरियाणा बॉर्डर के बीच होगा है भारी जाम इसका प्रस्ताव इस रूट पर ट्रैफिक की पूरी स्थिति देखने के बाद तैयार किया गया है. जिससे पता चला कि शिव मूर्ति और हरियाणा बॉर्डर के बीच NH8 के पूरे हिस्से पर पीक आवर्स में खचाखच जाम रहता है. सर्विस रोड पर भी बिल्कुल जगह नहीं होती. वाहन रेंग-रेंगकर चलते हैं. महिपाल फ्लाईओवर तक गाड़ियों की लंबी लाइनें लगी रहती हैं. जब से द्वारका एक्सप्रेसवे खुला है, तब से ये परेशानी और भी बढ़ गई है।  वर्तमान में मिलेनियम सिटी में घुसते ही शिव मूर्ति पर जाम लग जाता है. सोनीपत, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद से आने वाले वाहनों को जाम से ज्यादा जूझना पड़ता है. जिसकी वजह से एम्बिएंस मॉल की ओर जाना मुश्किल हो जाता है।  हर दिन ट्रैफिक में नहीं फंसना पड़ेगा एक सर्वे से पता चला है कि NH8 के मुख्य कैरिजवे पर हर दिन एक तरफ 1.2 लाख और दूसरी तरफ 1.6 लाख गाड़ियां होकर गुजरती हैं. सर्विस रोड और अलग-अलग इंटरचेंज रास्तों से भी हजारों गाड़ियां होकर गुजरती हैं.हालांकि दिल्ली से NH-8 पर आने वाले वाहनों को प्रस्तावित एलिवेटेड रोड पर जाने की परमिशन नहीं होगी. ये वाहन  मौजूदा चार-लेन वाले कैरिजवे पर ही चलेंगे. नया एलिवेटेड कॉरिडोर मुख्य रूप से द्वारका एक्सप्रेसवे अंडरपास से निकलने वाले वाहनों के लिए बनाया जा रहा है. उम्मीद जताई जा रही है कि इससे ट्रैफिक का दबाव कम होगा।   

PF से पैसे निकालने वालों के लिए जरूरी खबर, इमरजेंसी में कितना मिलेगा फंड? समझें नए नियम

नई दिल्ली कर्मचारी भविष्‍य निधि संगठन ने अपने करोड़ों स्‍टेकहोल्‍डर्स के लिए PF अकाउंट में आंशिक विड्रॉल के नियमों को बेहद आसान और ट्रांसपैरेंट बना दिया है. नए नियम के तहत अब बीमारी,बच्‍चों की पढ़ाई, शादी और घर खरीदने या बनवाने जैसे कामों के लिए पैसा निकालने का नियम बदल चुका है।  पीएफ निकासी के तीन कैटेगरी ईपीएफओ की नई गाइडलाइन के अनुसार, अब एडवांस क्‍लेम को तीन कैटेगरी में बांट दिया गया है, जिसमें आवश्यक जरूरतें, आवास जरूरतें और विशेष परिस्थितियां शामिल हैं. अब आइए जानते हैं कि नए नियम में क्‍या-क्‍या बदल चुका है और आप पीएफ अकाउंट से एक बार में कितना पैसा निकाल सकते हैं।          बीमारी के लिए कितनी बार PF का पैसा निकाल सकते हैं  अगर मेडिकल इमरजेंसी या इलाज के लिए पीएफ से एडवांस निकालना चाहते हैं तो आप जितनी बार चाहें, उतनी बार PF से पैसा निकाल सकते हैं।        बच्‍चों के पढ़ाई के लिए कितनी बार पीएफ निकाल सकते हैं  उच्‍च शिक्षा या पढ़ाई के खर्च के लिए पूरी सर्विस के दौरान ज्‍यादा से ज्‍यादा 10 बार ही PF से एडवांस लिया जा सकता है।         शादी के लिए कितना निकाल सकते हैं पीएफ  अगर आप अपनी शादी, बच्‍चों की शादी या भाई-बहन की शादी कराना चाहते हैं और उसके लिए पीएफ का पैसा निकालना चाहते हैं तो आप पूरी सर्विस के दौरान 5 बार पीएफ का पैसा निकाल सकते हैं।         घर के लिए कितना पीएफ निकाल सकते हैं  घर/प्लॉट खरीदना, मकान बनवाना, होम लोन की किस्त चुकाना या घर की मरम्मत/रिनोवेशन के लिए आप पीएफ से 5 बार एडवांस पैसा निकाल सकते हैं. वहीं इमरजेंसी के लिए आप सर्विस के दौरान सिर्फ 2 बाद पीएफ से एडवांस निकाल सकते हैं।  कितना निकाल सकते हैं पीएफ एडवांस?  EPFO के नए सर्कुलर के अनुसार, पात्र सदस्य संबंधित कैटेगरी की शर्तों के तहत अपने कुल EPF बैलेंस का 75% तक एडवांस के रूप में निकाल सकते हैं. हालांकि, इसके लिए सदस्‍य का 12 महीने तक ईपीएफ का मेंबर होना जरूरी है। 

MP में फिर दौड़ेंगी सरकारी बसें, 15 हजार नई बसों का मेगा प्लान; 2030 तक पूरा होगा लक्ष्य

इंदौर  इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में दो दिवसीय 'यात्री परिवहन विजन समिट-2026' का औपचारिक शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि करीब दो दशकों के अंतराल के बाद राज्य सरकार सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में एक नया और आधुनिक मॉडल लागू करने जा रही है। इस पहल के तहत उन्नत तकनीक का उपयोग कर यात्रियों को अधिक सुगम, त्वरित और सुरक्षित आवागमन की सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। सार्वजनिक परिवहन की मांग बढ़ी प्रदेश में लगातार बढ़ रही यात्रियों की संख्या का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य के पास वर्तमान में 5 लाख किलोमीटर से अधिक का मजबूत सड़क नेटवर्क है। धार्मिक पर्यटन में आई अभूतपूर्व तेजी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जहां पूर्व में उज्जैन में वार्षिक आधार पर 60 से 70 लाख श्रद्धालु आते थे, वहीं हाल के दिनों में यह आंकड़ा बढ़कर 8 करोड़ के पार पहुंच गया है। इस बढ़ती आवाजाही को देखते हुए सुदृढ़ सार्वजनिक परिवहन ढांचा तैयार करना बेहद अनिवार्य हो गया है। निजी ऑपरेटरों के सहयोग से 15 हजार बसों का लक्ष्य 'मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा' के अंतर्गत वर्ष 2030 तक राज्य भर में लगभग 15 हजार नई बसों का परिचालन शुरू करने की कार्य योजना है। सरकार इस पूरी व्यवस्था में निजी बस ऑपरेटरों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करेगी और उन्हें नवीनतम तकनीकों से लैस करेगी। 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले सेवा संकल्प माह के तहत 25 सितंबर को प्रदेशवासियों को इस नए परिवहन मॉडल की पहली आधिकारिक सौगात मिलेगी। इलेक्ट्रिक वाहनों और ग्रीन मोबिलिटी को विशेष प्रोत्साहन राज्य में बड़े पैमाने पर हो रहे इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) निर्माण का लाभ सबसे पहले प्रदेश के नागरिकों तक पहुंचाने की रणनीति तैयार की गई है। इंदौर मेट्रो के बाद अब इलेक्ट्रिक, हाइड्रोजन और फ्लेक्स-फ्यूल बसों के संचालन पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में शुरू हो रही यह सेवा नागरिकों के लिए एक नई शुरुआत होगी, जिसके तहत पारंपरिक भगवा रंग की बसें एक बार फिर आधुनिक सुविधाओं के साथ सड़कों पर सेवा देती नजर आएंगी।  

MP के डिंडोरी में साल के जंगलों पर बोरर बीटल का हमला, 1.46 लाख पेड़ काटने को मंजूरी

 डिंडोरी  मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में साल के जंगलों पर बोरर बीटल का संक्रमण गंभीर रूप ले चुका है। हजारों हेक्टेयर जंगल में फैल चुके इस संक्रमण को रोकने के लिए अब बड़े पैमाने पर संक्रमित पेड़ों की कटाई की जाएगी। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ) ने बुधवार को राज्य सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। 30 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जंगल प्रभावित बोरर बीटल नामक कीट साल के पेड़ों को अंदर से खोखला कर देता है। अधिकारियों के मुताबिक इसका संक्रमण अब 30,344 हेक्टेयर वन क्षेत्र में फैल चुका है। जांच के दौरान कुल 1,46,784 संक्रमित साल के पेड़ों की पहचान की गई है। इन्हें संक्रमण को आगे फैलने से रोकने के लिए हटाया जाएगा। केंद्र की मंजूरी मिलने के बाद राज्य वन विभाग को बड़े स्तर पर सफाई और कटाई अभियान चलाने की अनुमति मिल गई है। विभाग के अनुसार पेड़ों की कटाई अक्टूबर तक शुरू की जाएगी। 19 लाख बीटल के सिर भी नहीं रोक सके संक्रमण संक्रमण पर काबू पाने के लिए सरकारी इनाम की व्यवस्था भी की गई थी। इसके तहत आदिवासी ग्रामीणों ने करीब 19 लाख साल बोरर बीटल के सिर एकत्र किए। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में कीटों को खत्म करने के प्रयास के बावजूद संक्रमण को रोका नहीं जा सका। वैज्ञानिक रिपोर्ट के बाद मिली मंजूरी कृषि मंत्रालय के प्रमुख बीएस एनीगेरी ने बताया कि विभाग को पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय से अनुमति मिल गई है और अक्टूबर तक पेड़ों की कटाई शुरू होगी। प्रस्तावित कटाई और इसके बाद किए जाने वाले वृक्षारोपण को लेकर राज्य सरकार से विस्तृत वैज्ञानिक, तकनीकी और पारिस्थितिक औचित्य मांगा गया था। इसके बाद केंद्र की ओर से कटाई की मंजूरी दी गई है।

कचरे से कमाई का कमाल! पन्ना में ग्रामीण महिलाएं प्लास्टिक से बना रहीं खूबसूरत स्मृति चिन्ह

पन्ना   पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के वन गांवों में कभी झाड़ियों और जंगल के किनारे दिखाई देने वाला प्लास्टिक अब ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया बन रहा है। जिस कचरे से वन्यजीवों को खतरा पैदा होता था, उसे महिलाएं साफ करने के बाद प्रोसेस कर बैग, फोल्डर, स्टेशनरी और स्मृति चिन्ह जैसे उपयोगी उत्पाद तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों को पर्यटक अपने साथ यादगार के तौर पर ले जा रहे हैं। 2022 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट क्लीन डेस्टिनेशंस मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड ने वर्ष 2022 में पन्ना पार्क में 'प्रोजेक्ट क्लीन डेस्टिनेशंस' शुरू किया था। इसका उद्देश्य बढ़ते प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए केवल समय-समय पर सफाई अभियान चलाना नहीं, बल्कि एक स्थायी और सामुदायिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था तैयार करना था। यह पहल 14 ग्राम पंचायतों के 30 गांवों में लागू की गई। अब तक इन क्षेत्रों से 45 टन से अधिक कचरा एकत्र कर उसकी छंटाई और वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेसिंग की जा चुकी है। प्लास्टिक से तैयार हो रहे उपयोगी प्रोडक्ट कचरे की छंटाई के बाद करीब 42 प्रतिशत गैर-पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिक इकोकारी को भेजा जाता है। यह एक सामाजिक उद्यम है, जो प्लास्टिक को उपयोगी सामग्री में बदलने का काम करता है। इसके बाद गांवों की वर्कशॉप में महिलाएं प्रोसेस किए गए प्लास्टिक से अलग-अलग उत्पाद तैयार करती हैं। इसके लिए पारंपरिक चरखे और हथकरघे का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह प्लास्टिक कचरे को उत्पाद में बदलने के साथ पारंपरिक कारीगरी को भी नए पर्यावरणीय उद्देश्य से जोड़ा गया है। महिलाओं के लिए रोजगार से आगे की पहल इस प्रोजेक्ट का मकसद केवल महिलाओं को काम या वेतन उपलब्ध कराना नहीं है। इसके जरिए ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण, आय और आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए अवसर मिल रहे हैं। वहीं पर्यटकों के लिए तैयार किए गए स्मृति चिन्ह पन्ना के जंगलों और उन समुदायों से जुड़ी याद बन रहे हैं, जो इनके संरक्षण में योगदान दे रहे हैं। इस मॉडल में पर्यटन से पैदा होने वाला कचरा उसी गंतव्य के आसपास एकत्र होता है। फिर उसे स्थानीय स्तर पर अलग कर प्रोसेस किया जाता है और पारंपरिक शिल्प के जरिए नए उत्पाद में बदला जाता है। इसके बाद वही उत्पाद पर्यटन अर्थव्यवस्था में वापस पहुंचता है। 2025 में बांधवगढ़ तक पहुंचा मॉडल पन्ना में शुरू हुआ यह प्रयोग अब आगे बढ़ चुका है। 2025 में मध्य प्रदेश ने इस मॉडल को बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों तक विस्तार दिया। राज्य का ग्रामीण पर्यटन मिशन अब 100 से अधिक गांवों को कवर करता है और 300 से अधिक महिलाओं के स्वामित्व वाले होमस्टे और नेचर भ्रमण स्थलों को समर्थन दे रहा है। इसमें प्राणपुर भी शामिल है, जिसे भारत के पहले हथकरघा शिल्प गांव के रूप में प्रमोट किया जा रहा है। यहां महिलाएं हथकरघा कैफे भी संचालित करती हैं। स्वच्छ वातावरण के लिए मिला SKOCH Silver Award इस प्रोजेक्ट को 2025 में स्वच्छ वातावरण के लिए SKOCH Silver Award से सम्मानित किया गया। राज्य सरकार ने उद्योग मानकों के अनुरूप पर्यावरणीय, सामाजिक और शासन यानी ESG फ्रेमवर्क अपनाने का भी उल्लेख किया है। मध्य प्रदेश की जिम्मेदार पर्यटन रणनीति में प्लास्टिक-मुक्त वन्यजीव क्षेत्र, इलेक्ट्रिक-व्हीकल मोबिलिटी, कम-कार्बन आर्किटेक्चर और सामुदायिक आजीविका को एक साथ जोड़ा जा रहा है। ऐसे में पन्ना का मॉडल सिर्फ सफाई अभियान नहीं, बल्कि संरक्षण के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को जोड़ने वाली पहल के रूप में सामने आ रहा है।

चीता प्रोजेक्ट में बड़ा कदम, कूनो से गांधीसागर जाएगी एक और मादा चीता; निर्वा या वीरा में से होगा चयन

श्योपुर  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन और भारत में चीता पुनर्वास परियोजना के चार वर्ष पूरे होने के मौके पर मध्य प्रदेश में चीतों को लेकर एक और बड़ा कदम उठाने की तैयारी है। 17 सितंबर को कूनो नेशनल पार्क से एक मादा चीता को गांधीसागर राष्ट्रीय अभयारण्य में शिफ्ट किए जाने की योजना पर विचार चल रहा है। हालांकि, शिफ्टिंग का अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अनुमति के बाद ही लिया जाएगा। अभी यह भी तय नहीं हुआ है कि कूनो से किस मादा चीता को गांधीसागर भेजा जाएगा। सूत्रों के अनुसार, निर्वा और वीरा में से किसी एक को गांधीसागर भेजने पर विचार किया जा रहा है। चीता परियोजना से जुड़े अधिकारी चाहते हैं कि कूनो की तर्ज पर गांधीसागर में भी चीतों की संख्या बढ़े और वहां सफलतापूर्वक वंशवृद्धि का सिलसिला आगे बढ़े। चार साल पहले कूनो में हुई थी चीता प्रोजेक्ट की शुरुआत 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने जन्मदिन के अवसर पर नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा था। इसके बाद चीता पुनर्वास परियोजना के दूसरे चरण में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत लाए गए। कूनो में चीतों की संख्या बढ़ने के साथ उनके लिए दूसरे सुरक्षित रहवास की जरूरत महसूस हुई, जिसके बाद गांधीसागर राष्ट्रीय अभयारण्य को दूसरे घर के रूप में विकसित किया गया। पहले दो नर, फिर धीरा को भेजा गया गांधीसागर गांधीसागर में चीतों की आबादी बसाने की दिशा में 20 अप्रैल 2025 को कूनो से दो नर चीतों को यहां शिफ्ट किया गया था। इसके बाद वंशवृद्धि की संभावनाओं को मजबूत करने के लिए 17 सितंबर 2025 को मादा चीता धीरा को गांधीसागर लाया गया। अब परियोजना के तहत एक और मादा चीता को गांधीसागर भेजने की तैयारी है। इससे यहां नर और मादा चीतों का संतुलित समूह तैयार करने तथा भविष्य में वंशवृद्धि को बढ़ावा देने की उम्मीद है। अनुमति का इंतजार वन्यजीव विभाग की पीसीसीएफ डॉ. समीता राजौरा ने बताया कि मादा चीता की शिफ्टिंग को लेकर योजना है। मुख्यमंत्री की अनुमति मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई और किस मादा चीता को गांधीसागर भेजा जाना है, इसका अंतिम निर्णय लिया जाएगा।  

मध्य प्रदेश में 50 लाख ग्रामीणों की संपत्ति होगी मुफ्त रजिस्टर्ड, 17 सितंबर से शुरू होगा विशेष अभियान

 भोपाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से मध्य प्रदेश में जनभागीदारी और जनसेवा को केंद्र में रखकर दो बड़े अभियान शुरू होने जा रहे हैं। स्वामित्व अभियान के तहत प्रदेश के 50 लाख से अधिक ग्रामीणों की संपत्तियों की निश्शुल्क रजिस्ट्री कराकर उन्हें अधिकार अभिलेख सौंपे जाएंगे। वहीं, ‘सेवा से संकल्प’ अभियान के तहत 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक जनसेवा से जुड़े 13 अलग-अलग प्रकल्प संचालित किए जाएंगे। अभियान की शुरुआत 17 सितंबर की शाम सात बजे प्रदेशभर में एक साथ 58 लाख से अधिक दीप प्रज्ज्वलित कर होगी। इसका सबसे बड़ा आयोजन उज्जैन के श्रीमहाकाल महालोक में प्रस्तावित है, जहां 25 लाख से अधिक दीप जलाने की तैयारी की जा रही है। 41,568 गांवों में 68.47 लाख भूखंडों का सर्वे पूरा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुरुवार को मंत्रालय से वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए सभी संभागायुक्तों और कलेक्टरों को दोनों अभियानों को उत्सव के रूप में आयोजित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इनमें जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, युवाओं और आमजन की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की जाए। स्वामित्व अभियान के तहत प्रदेश के 41,568 गांवों में 68 लाख 47 हजार भूखंडों का सर्वे पूरा हो चुका है। अब इनमें से 50 लाख से अधिक हितग्राहियों के नाम संपत्तियों की निश्शुल्क रजिस्ट्री कराई जाएगी। इसके लिए पंचायत उपकर और अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी से छूट का प्रावधान पहले ही किया जा चुका है। यह अभियान तीन चरणों में 17 सितंबर से 3 अक्टूबर तक चलेगा। हर गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार लगेंगे शिविर मुख्यमंत्री ने कलेक्टरों को अभियान का नेतृत्व स्वयं करने के निर्देश दिए हैं। जिला, जोन और सेक्टर स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय की जाएंगी। सरकार का जोर इस बात पर है कि पात्र हितग्राहियों को बिना किसी भेदभाव के निर्धारित समय में लाभ मिले और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे। मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच, सचिव, पटवारी और रोजगार सहायक को मिलकर शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। प्रत्येक गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार को लगने वाले इन शिविरों में प्रतिदिन कम से कम 30 से 40 रजिस्ट्रियां कराने का लक्ष्य रखा गया है। ‘आशीर्वाद का दीपक’ से शुरू होगा सेवा से संकल्प अभियान 17 सितंबर से शुरू होने वाले ‘सेवा से संकल्प’ अभियान का पहला प्रमुख कार्यक्रम ‘आशीर्वाद का दीपक’ होगा। शाम सात बजे प्रदेशभर में लाभार्थी परिवारों के घरों के साथ चयनित ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों पर एक साथ दीप प्रज्ज्वलित किए जाएंगे। उज्जैन के श्रीमहाकाल महालोक में अकेले 25 लाख से अधिक दीप जलाने की तैयारी है। कार्यक्रम में सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के साथ समाज के सभी वर्गों को जोड़ने की योजना है। इसके बाद 17 अक्टूबर तक जनसेवा से जुड़े 13 अलग-अलग प्रकल्पों के माध्यम से अभियान को आगे बढ़ाया जाएगा।

भारत-रूस की डिफेंस पार्टनरशिप को मिलेगी नई धार? S-400, ब्रह्मोस-एनजी और Su-57E पर मंथन संभव

 नई दिल्ली रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर पहुंचे हैं. वे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय मुलाकात भी करेंगे. इस मुलाकात में रक्षा सहयोग सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बनने जा रहा है. भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे सैन्य संबंधों में नई ऊंचाई छूने की संभावनाएं हैं।  S-400 मिसाइल सिस्टम, ब्रह्मोस-एनजी मिसाइल अपग्रेड, Su-30एमकेआई फाइटर जेट का अपग्रेड और पांचवीं पीढ़ी का Su-57E लड़ाकू विमान- ये चार प्रमुख मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं. आइए समझते हैं कि इन हथियारों पर क्या डील हो सकती है और भारत के लिए इनका क्या महत्व है।  S-400 मिसाइल सिस्टम: बची हुई डिलीवरी और अतिरिक्त बैटरियों की बात भारत ने 2018 में रूस से पांच S-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने का 5.43 अरब डॉलर का समझौता किया था. इनमें से चार सिस्टम पहले ही आ चुके हैं और तैनात हैं. पांचवां सिस्टम नवंबर 2026 तक आने की उम्मीद है. पुतिन-मोदी मुलाकात में इस अंतिम खेप की समयबद्ध डिलीवरी और रखरखाव पर चर्चा होगी. रूस ने भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सुविधा लगाने का भी प्रस्ताव रखा है।  इसके अलावा भारत अतिरिक्त पांच S-400 मिसाइल सिस्टम स्क्वाड्रन खरीदने पर भी विचार कर रहा है. रूस ने इसके लिए करीब 50 हजार करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया है. ये अतिरिक्त सिस्टम पश्चिमी और पूर्वी दोनों मोर्चों पर भारत की एयर डिफेंस क्षमता को दोगुना कर सकते हैं।  S-400 मिसाइल सिस्टम लंबी दूरी तक विमान, मिसाइल और ड्रोन को मार गिराने में सक्षम है. ऑपरेशन सिंदूर में इसकी प्रभावशीलता साबित हो चुकी है. इसलिए अतिरिक्त खरीद भारत की बहुस्तरीय रक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगी।  ब्रह्मोस-एनजी: हल्की और ज्यादा घातक मिसाइल का अपग्रेड ब्रह्मोस भारत-रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है और दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है. अब दोनों देश इसकी नेक्स्ट जनरेशन यानी ब्रह्मोस-एनजी पर काम कर रहे हैं. यह मौजूदा ब्रह्मोस से काफी हल्की है- लगभग 1.3 टन वजन की।  इसकी रेंज 400 किलोमीटर से ज्यादा है. स्पीड 4322 km/hr तक है. छोटी साइज की वजह से तेजस और मिग-29 जैसे विमानों पर कई मिसाइलें लगाई जा सकती हैं. पुतिन के दौरे में ब्रह्मोस-एनजी के विकास, संयुक्त उत्पादन और अपग्रेड पर चर्चा होने की पूरी संभावना है।  रूस ने साफ कहा है कि अब मिसाइल को और बेहतर और ज्यादा बनाने का समय आ गया है. भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एयर, लैंड और सी-बेस्ड प्लेटफॉर्म पर स्ट्राइक क्षमता बढ़ेगी. निर्यात बाजार में भी ब्रह्मोस-एनजी की अच्छी मांग हो सकती है।  Su-30MKI अपग्रेड: सुपर सुखोई बनने की राह भारतीय वायुसेना के पास करीब 260 Su-30MKI लड़ाकू विमान हैं. ये वायुसेना की रीढ़ माने जाते हैं. अब इन्हें सुपर सुखोई कॉन्फिगरेशन में अपग्रेड करने की बड़ी योजना पर चर्चा चल रही है. इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 11 अरब डॉलर से ज्यादा है. अपग्रेड में नए रडार, बेहतर एवियोनिक्स, आधुनिक हथियार सिस्टम और लंबी रेंज की मिसाइलें शामिल होंगी।  यह अपग्रेड चरणबद्ध तरीके से होगा. इससे पुराने विमानों की उम्र बढ़ेगी और वे अगले कई साल तक आधुनिक खतरों से निपटने में सक्षम रहेंगे. भारत अपनी स्वदेशी क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है, इसलिए इस अपग्रेड में भारतीय कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ाने की कोशिश होगी. पुतिन-मोदी मुलाकात में इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर सहमति बन सकती है।  Su-57E: पांचवीं पीढ़ी के विमान का टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सु-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है. भारत लंबे समय से अपनी पांचवीं पीढ़ी के विमान एंडवास्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट पर काम कर रहा है, लेकिन वह अभी कई साल दूर है. इस बीच चीन और पाकिस्तान की बढ़ती स्टील्थ क्षमता को देखते हुए भारत के पास अंतरिम समाधान की जरूरत है।  रूस ने भारत को Su-57E (एक्सपोर्ट वर्जन) बेचने के साथ-साथ भारत में संयुक्त उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण का प्रस्ताव दिया है. यहां तक कि पूर्ण तकनीक एक्सेस की बात भी कही गई है।  सीमित संख्या में विमान खरीदकर और बाद में लोकल प्रोडक्शन शुरू करके भारत अपना स्टील्थ गैप भर सकता है. रडार, इंजन और वेपन इंटीग्रेशन जैसी संवेदनशील तकनीकों पर बातचीत चल रही है. यह डील अगर हुई तो भारत-रूस रक्षा संबंधों में नया अध्याय खुलेगा।  भारत के लिए क्या मायने रखती हैं ये डीलें? इन सभी सौदों का उद्देश्य भारत की सैन्य क्षमता को आधुनिक खतरों के अनुरूप बनाना है. S-400 मिसाइल सिस्टम एयर डिफेंस को मजबूत करेगा, ब्रह्मोस-एनजी स्ट्राइक पावर बढ़ाएगा, Su-30MKI अपग्रेड मौजूदा बेड़े को लंबे समय तक उपयोगी बनाएगा. Su-57E भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा।  साथ ही भारत मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है, इसलिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और संयुक्त उत्पादन वाले प्रस्ताव ज्यादा आकर्षक हैं. रूस भी अपने रक्षा निर्यात को बढ़ाना चाहता है और भारत जैसे विश्वसनीय साझेदार के साथ गहरी साझेदारी चाहता है. ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान यह मुलाकात सिर्फ द्विपक्षीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है।  हालांकि फाइनल डील तुरंत नहीं हो सकती, लेकिन दिशा तय हो जाएगी. आने वाले महीनों में इन प्रोजेक्ट्स पर प्रगति देखने को मिलेगी. भारत की सुरक्षा जरूरतों और रणनीतिक स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए ये चर्चाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। 

भारत का न्यूक्लियर शील्ड हुआ मजबूत, 30 नए परमाणु हथियार जोड़ने का दावा; FAS ने बताया पूरा आंकड़ा

 नई दिल्ली अमेरिका की फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स यानी FAS ने हाल ही में भारत के परमाणु हथियारों को लेकर अपना ताजा अनुमान जारी किया है. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास करीब 190 असेंबल किए गए परमाणु हथियार हैं. इनमें से 160 से ज्यादा हथियार ऐसे डिलीवरी सिस्टम से जुड़े हैं जो अभी एक्टिव हैं।  FAS जैसे संगठनों के अनुमान अक्सर वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बनते हैं क्योंकि परमाणु शक्ति वाले देश अपने भंडार की सटीक संख्या सार्वजनिक रूप से नहीं बताते. भारत भी इसी परंपरा का पालन करता है. आधिकारिक तौर पर अपनी संख्या की पुष्टि नहीं करता।  रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत ने जितने लॉन्चर अभी तैयार रखे हैं, उससे ज्यादा हथियार बना लिए हैं. कुल भंडार करीब 190 हथियारों का है जबकि लॉन्चरों से जुड़े हथियार करीब 160 हैं. बाकी अतिरिक्त हथियार उन मिसाइलों के लिए बनाए गए हैं जो अभी उत्पादन या विकास के चरण में हैं।  इनमें अग्नि-प्राइम और लंबी दूरी वाली के-4 जैसी मिसाइलें शामिल हैं. विशेषज्ञों के अनुसार यह कोई अव्यवस्था का संकेत नहीं बल्कि परमाणु रणनीति का सामान्य तरीका है. हथियारों का उत्पादन अक्सर डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आने से पहले ही आगे चलता रहता है ताकि जब नए सिस्टम तैयार हों तो हथियार तुरंत उपलब्ध रहें।  अतिरिक्त हथियारों का रणनीतिक मतलब FAS के अनुमान के अनुसार अतिरिक्त हथियार भविष्य की मिसाइलों के लिए रखे गए हैं. जब नए डिलीवरी सिस्टम सर्विस में आते हैं तो उनके लिए पहले से तैयार हथियार उपलब्ध रहने से प्रतिरोधक क्षमता तेजी से मजबूत होती है. यह प्रथा कई परमाणु शक्ति वाले देशों में देखी जाती है।  युद्ध के समय या तनाव की स्थिति में लॉन्चर और हथियार का मेल बैठाना आसान हो जाता है. भारत की परमाणु नीति में विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता पर जोर दिया जाता है. अतिरिक्त हथियार इस क्षमता को समय के साथ बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर विस्तार करने में मदद करते हैं।    ये अनुमान बाहरी संगठन के हैं. भारत सरकार आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं करती. इसलिए वास्तविक संख्या इससे कम या ज्यादा हो सकती है. फिर भी FAS जैसी संस्थाओं के आकलन अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि वे खुले स्रोतों, सैटेलाइट चित्रों और अन्य सार्वजनिक जानकारियों पर आधारित होते हैं।  नो-फर्स्ट-यूज नीति और परीक्षण रोक कायम रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह भी उजागर होती है कि भंडार बढ़ने के बावजूद भारत अपनी नो-फर्स्ट-यूज यानी पहले इस्तेमाल न करने की नीति पर कायम है. भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल तभी करेगा जब उस पर परमाणु हमला हो।  यह नीति भारत की परमाणु रणनीति का मूल आधार रही है. इसके अलावा भारत ने स्वयं घोषित परमाणु परीक्षण रोक भी जारी रखी हुई है. 1998 के परीक्षणों के बाद से भारत ने कोई नया परीक्षण नहीं किया है और इस रोक को बनाए रखा है।   भंडार के धीरे-धीरे बढ़ने के बावजूद इन दो नीतियों का जारी रहना भारत के संयमित और जिम्मेदार रुख को दर्शाता है. कई देशों में भंडार बढ़ने के साथ आक्रामक नीतियां भी बदलती देखी गई हैं, लेकिन भारत ने अपनी घोषित स्थिति में बदलाव नहीं किया है. यह वैश्विक परमाणु व्यवस्था में भारत की छवि को स्थिर रखने में मदद करता है।  परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का विकास भारत की परमाणु शक्ति का विकास कई दशकों से चल रहा है. शुरूआती चरण में सीमित क्षमता से लेकर अब ज्यादा एडवांस डिलीवरी सिस्टम तक का सफर तय किया गया है. लैंड बेस्ड मिसाइलें, समुद्र आधारित क्षमता और हवाई प्लेटफॉर्म तीनों पर काम चलता रहा है।  अतिरिक्त हथियारों का निर्माण इसी व्यापक विकास का हिस्सा माना जा सकता है. जब नए सिस्टम जैसे अग्नि-प्राइम या समुद्र आधारित के-4 जैसी मिसाइलें सेवा में आती हैं तो उनके लिए हथियार पहले से तैयार रखना तार्किक कदम है।  यह विकास क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को भी प्रभावित करता है. दक्षिण एशिया में परमाणु शक्ति का संतुलन लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है. भारत अपनी क्षमता को मजबूत करते हुए भी आधिकारिक तौर पर न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता की बात करता रहा है. यानी जरूरत से ज्यादा हथियार जमा करने की बजाय विश्वसनीय और पर्याप्त क्षमता बनाए रखना. FAS के आंकड़े इसी दिशा में धीमी लेकिन निरंतर प्रगति का संकेत देते हैं।  कुछ विश्लेषक अतिरिक्त हथियारों को भविष्य की तैयारियों से जोड़ते हैं. जब उत्पादन लाइन चल रही हो तो हथियारों को पहले तैयार कर लेना व्यावहारिक होता है. लॉन्चर तैयार होने में समय लगता है जबकि हथियार उत्पादन अपेक्षाकृत तेजी से हो सकता है. यह अंतर सामान्य माना जाता है और इसे अव्यवस्थित विस्तार की बजाय योजनाबद्ध तैयारी के रूप में देखा जाता है।  आने वाले वर्षों में भारत की परमाणु क्षमता का स्वरूप नए डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आने के साथ और स्पष्ट होगा. अग्नि-प्राइम जैसी मिसाइलें मोबाइल और आधुनिक मानी जाती हैं जबकि के-4 समुद्र आधारित क्षमता को मजबूत करने वाली है. अतिरिक्त हथियार इन सिस्टम के लिए उपलब्ध रहने से समग्र प्रतिरोधक ताकत बढ़ेगी।