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ट्रिपल झटका: पेट्रोल-डीजल के बाद अब CNG ने भी बढ़ाई लोगों की टेंशन

नई दिल्ली एलपीजी सिलेंडर के दामों में इजाफा होने के बाद अब तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दामों में भी इजाफा किया गया है. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, देश भर में ईंधन (पेट्रोल, डीजल और सीएनजी) की कीमतें बढ़ गई हैं. एक ओर जहां पेट्रोल की कीमतें 94.77 रुपये से बढ़कर 97.77 रुपये प्रति लीटर हो गई हैं, जबकि डीज़ल की कीमतें 87.67 रुपये से बढ़कर 90.67 रुपये प्रति लीटर हो गई हैं. पेट्रोल के साथ ही सीएनजी से चलने वाली गाड़ियों में चलना भी महंगा होने जा रहा है।  जानकारों का कहना है कि म‍िड‍िल ईस्‍ट में जारी संकट के बीच पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेल विपणन कंपनियों ने 3-3 रुपये लीटर का इजाफा कर द‍िया. तेल की कीमत में यह बढ़ोतरी 15 मई यानी शुक्रवार सुबह 6 बजे से देशभर में लागू हो गई है.  देश की राजधानी द‍िल्‍ली की बात करें तो पेट्रोल 94.77 रुपये से बढ़कर 97.77 रुपये प्रत‍ि लीटर हो गया. वहीं, डीजल 87.67 रुपये लीटर से बढ़कर 90.67 रुपये लीटर पर पहुंच गया।  किराए में हो सकती है बढ़ोतरी  मुंबई में जब दो रुपये प्रति किलो सीएनजी के दाम में बढ़ने के साथ यूनियनों ने किराए में बढ़ोतरी की मांग की है. ऑटो रिक्शा संगठनों ने न्यूनतम किराए में कम से कम 1 रुपये की बढ़ोतरी की डिमांड रखी है. यूनियन नेताओं के अनुसार, मौजूदा किराए में वाहन चलाना आर्थिक रूप से कठिन हो गया है. अब दिल्ली में भी सीएनजी के दाम बढ़ाए गए हैं. इसका सीधा असर कैब ड्राइवरों पर पड़ेगा. ऑटो-टैक्सी के किराए में बढ़ोतरी संभव है. डिलीवरी और ट्रांसपोर्ट लागत में बढ़ोतरी हो सकती है. इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला है।  CNG Price Hike कितनी महंगी गई सीएनजी पेट्रोल और डीजल के साथ ही दिल्ली-एनसीआर में इंद्रप्रस्‍थ गैस ल‍िम‍िटेड (IGL) ने सीएनजी की कीमत में 2 रुपये क‍िलो का इजाफा कर द‍िया है. इससे कुछ देर पहले ही तेल कंपन‍ियों ने पेट्रोल-डीजल दो रुपये महंगा कर द‍िया. नई दरों को शुक्रवार सुबह 6 बजे से लागू कर द‍िया गया है. ऐसे में पिछले एक पखवाड़े के दौरान महंगाई का ट्रिपल अटैक हुआ है।  पेट्रोल, डीजल और CNG महंगा करने पर सरकार का घेराव कांग्रेस ने पेट्रोल, डीजल और सीएनजी के दाम बढ़ने को लेकर सरकार का घेराव किया है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कांग्रेस ने लिखा-  'महंगाई मैन मोदी ने आज फिर जनता पर हंटर चलाया. पेट्रोल और डीजल 3-3 रुपए महंगा कर दिया गया. वहीं, CNG के दाम भी 2 रुपए बढ़ा दिए गए. चुनाव खत्म, मोदी की वसूली शुरू।  कांग्रेस नेता कुमारी सेलजा ने आरोप लगाते हुए कहा, 'चुनाव खत्म होते ही बीजेपी सरकार ने जनता को महंगाई का तोहफा दे दिया. अब पेट्रोल और डीजल पर 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर आम आदमी की जेब पर सीधा हमला किया गया है. चुनाव तक राहत का दिखावा. चुनाव के बाद जनता पर बोझ डालना बीजेपी सरकार की पहचान बन चुका है।  TMC नेता डेरेक ओ'ब्रायन ने भी बीजेपी सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा, 'पहले वो आपका वोट लूटते हैं, फिर आपको वहां लात मारते हैं जहां दर्द होता है. इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़ गए हैं. क्या बंगाल सरकार पेट्रोल और डीजल पर VAT कम करेगी, अब जब दिल्ली के कंट्रोल वाली सरकार है जिसे केंद्र के फंड रोके जाने की चिंता नहीं करनी पड़ती?' वहीं, पेट्रोल-डीजल महंगा होने पर बंगाल सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने प्रतिक्रया दी. उन्होंने कहा, 'पिछले 3 साल से दुनिया में जंग चल रही है. इसकी वजह से दूसरे देशों में कई तरह के संकट पैदा हुए हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने हमारा कुछ नहीं बिगड़ने दिया. सिर्फ गैस के दाम बढ़े हैं. कम से कम दाम तो कम से कम बढ़ाए हैं। 

नई सरकार का पहला तोहफा: कर्मचारियों और शिक्षकों को मिला बढ़ा हुआ DA

चेन्नई तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय ने  सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के महंगाई भत्ते (DA) में दो फीसदी बढ़ोतरी का ऐलान किया। उन्होंने यह तोहफा मुख्यमंत्री बनने के चंद दिनों में ही दे दिया। आधिकारिक बयान के अनुसार, इस संशोधन के साथ महंगाई भत्ता (डीए) 58 प्रतिशत से बढ़कर 60 फीसदी हो जाएगा। यह वृद्धि एक जनवरी 2026 से प्रभावी होगी। महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी से राज्य सरकार पर सालाना 1,230 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आएगा। बयान में कहा गया है कि सरकार आवश्यक अतिरिक्त धनराशि आवंटित करेगी और सरकारी अधिकारियों, शिक्षकों, पेंशनभोगियों और पारिवारिक पेंशनभोगियों के कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करेगी। यह भी कहा गया है कि विजय ने लोगों के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं तैयार करने और उन्हें लागू करने के लिए कदम उठाने का संकल्प लिया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय ने यह भी कहा कि महिलाओं को 'कलैग्नार मगलीर उरिमाई थोगई' योजना की मई माह की किस्त जल्द ही दी जाएगी। इस योजना के तहत महिलाओं को 1,000 रुपये दिए जाते हैं। इसकी शुरुआत पूर्ववर्ती द्रविड मुनेत्र कषगम सरकार ने की थी और इसका नाम पार्टी के दिग्गज नेता एम. करुणानिधि के नाम पर रखा गया। महिलाओं को जल्द मिलेंगे हजार रुपये विजय के हवाले से जारी एक सरकारी बयान में कहा गया कि राशि लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा की जाएगी। इसमें कहा गया, '' सरकार को 'कलैग्नार मगलीर उरिमाई थोगई' योजना के पुनर्गठन के लिए समय चाहिए, जिसके तहत महिलाओं को 1,000 रुपये दिए जाते हैं। मुख्यमंत्री जोसफ विजय ने निर्देश दिया है कि इस योजना के तहत मई महीने की 1000 रुपये की किस्त जल्द ही लाभार्थियों के बैंक खातों में सीधे जमा कर दी जाएगी।'' राज्य विधानसभा चुनाव से पहले विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) ने 60 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं को 2,500 रुपये प्रति माह की सहायता देने का वादा किया था।

48 घंटे में 3 बड़े फैसले, क्या अब महंगा होने वाला है पेट्रोल? RBI ने दिए संकेत

नई दिल्ली भारत में पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों की आशंकाओं को लेकर चिंता का दौर जारी है। हालांकि, सरकार ने अब तक ऐसा ऐलान नहीं किया है। इसी बीच महज दो दिनों के अंदर ही तीन बड़े फैसले सामने आ चुके हैं। इनमें गोल्ड इम्पोर्ड ड्यूटी से लेकर शक्कर एक्सपोर्ट बैन तक शामिल है। इधर, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर ने भी दाम बढ़ने की आशंका जताई है। खास बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही दफ्तरों से WFH यानी वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन क्लासेज की अपील कर चुके हैं।  पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि एक स्तर पर इस बात का आकलन करना होगा कि पेट्रोलियम कंपनियां लागत से कम कीमत पर पेट्रोल, डीजल और LPG कब तक बेच सकती हैं। हालांकि, उन्होंने कीमतों में बढ़ोतरी की किसी भी संभावना पर कुछ कहने से इनकार कर दिया। उन्होंने बताया कि भारत के पास इस वक्त लगभग 60 दिन का कच्चे तेल का भंडार, 60 दिन का LNG भंडार और 45 दिन का LPG भंडार है। RBI गवर्नर क्या बोले गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने  स्विट्जरलैंड में कहा है कि अगर पश्चिम एशिया संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो सरकार को पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं। उन्होंने कहा कि भारत ऊर्जा और उर्वरकों के इम्पोर्ट पर खासा निर्भर है और मौजूदा रुकावटों का असर भारत पर पड़ना शुरू हो गया है। उन्होंने कहा कि अगर यह लंबे समय तक जारी रहता है तो 'सरकार वास्तव में इन मूल्य वृद्धि का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल सकती है। यह सिर्फ समय की बात है।' सरकार ने 28 फरवरी को शुरू हुए पश्चिम एशिया संघर्ष के बावजूद पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में वृद्धि नहीं की है। दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध में सबसे ज्यादा प्रभावित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज हुआ है, जिसके चलते जहाजों की आवाजाही धीमी या ठप हो गई है। गोल्ड महंगा हुआ विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ रहे दबाव को रोकने और गैर-जरूरी आयात पर रोक लगाने के लिए सोने तथा चांदी पर आयात शुल्क  बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया। खास बात है कि भारत महंगी धातुओं का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। कच्चे तेल के बाद सोने का भारत के आयात में दूसरा बड़ा हिस्सा है और बढ़ती खरीद से विदेशी मुद्रा का इस्तेमाल बढ़ा है, जिससे रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया है। सोने और चांदी पर आयात शुल्क छह प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया है जबकि प्लैटिनम पर इसे 6.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 15.4 प्रतिशत किया गया है। यह 13 मई से प्रभावी माना जाएगा। सोने/चांदी के डोरे, सिक्के, अन्य वस्तुएं आदि पर भी टैक्स में बदलाव किए गए हैं। अमूल दूध के दाम बढ़े अमूल ने बढ़ती लागत के कारण पूरे भारत में दूध की कीमतें दो रुपये प्रति लीटर बढ़ाने की घोषणा की। नई दरें आज यानी 14 मई, गुरुवार से लागू हो गईं हैं। इससे पहले अमूल दूध के दाम बीते साल 1 मई को बढ़ाए गए थे। GCMMF यानी गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन का कहना है कि दूध की कीमतें इसलिए बढ़ाई जा रही हैं क्योंकि दूध तैयार करने और उसे बाजार तक पहुंचाने का खर्चा बढ़ गया है। साथ ही कहा, 'इस साल पशु आहार, दूध की पैकेजिंग सामग्री और ईंधन की लागत में काफी बढ़ोतरी हुई है।' चीनी का निर्यात बंद देश ने चीनी के निर्यात पर 30 सितंबर तक तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। घरेलू उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाया गया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने 13 मई को जारी अधिसूचना में कहा, 'चीनी की निर्यात नीति को तत्काल प्रभाव से 30 सितंबर, 2026 तक या अगले आदेश तक (जो भी पहले हो) 'प्रतिबंधित' से 'निषिद्ध' कर दिया गया है।'

वैश्विक आर्थिक संकट की आहट! जानिए मंदी की चेतावनी के बीच भारत की स्थिति कैसी

नई दिल्ली  दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय संस्थाओं और जाने-माने अर्थशास्त्रियों ने पिछले एक हफ्ते में वैश्विक आर्थिक मंदी को लेकर गंभीर चेतावनियां जारी की हैं. इसके पीछे मुख्य वजहें हैं अमेरिका की आक्रामक टैरिफ पॉलिसी, ट्रेड वॉर का बढ़ता असर, कमजोर होता उपभोक्ता खर्च और AI निवेश में बने बुलबुले के फटने का डर. मुख्य तौर पर अमेरिका में इसका सबसे ज्यादा रिस्क है, मगर भारत समेत दुनिया के बाकी देश भी इससे अधूते नहीं रहने वाले।  सबसे बड़ी चेतावनी मेरिल लिंच (Merrill Lynch) के दिग्गज फोरकास्टर गैरी शिलिंग (Gary Shilling) की तरफ से आई है. ये वही शख्स हैं, जिन्होंने 1969-70 के दौर की आर्थिक मंदी की सटीक भविष्यवाणी की थी और इनका नाम हर किसी को याद हो गया था. हाल ही में बिजनेस इनसाइड को दिए इंटरव्यू में शिलिंग ने कहा कि 2026 के अंत तक अमेरिकी मंदी ‘लगभग तय’ है. उनके मुताबिक तीन बड़े खतरे हैं. पहला एक फ्रीज हो चुका हाउसिंग मार्केट, जहां खरीदार और विक्रेता दोनों सुस्त पड़े हैं, दूसरा कॉर्पोरेट कैपेक्स में तेज गिरावट, और कमजोर होता उपभोक्ता वर्ग. शिलिंग ने कहा, “शेयर बाजार बहुत महंगा है और जल्द ही बड़ा करेक्शन आने की पूरी आशंका है।  उनके अलावा, बिलेनियर निवेशक लियोन कूपरमैन (Leon Cooperman) भी शिलिंग के सुर में सुर मिला चुके हैं. फॉक्स बिजनेस पर उन्होंने कहा, “बाजार बहुत ऊंचे मूल्यांकन पर है और कई समस्याएं एक साथ मुंह बाए खड़ी हैं।  जेपी मॉर्गन (JP Morgan) ने पहले वैश्विक मंदी की 60 फीसदी संभावना जताई थी, जिसे अब घटाकर 40 फीसदी किया है. लेकिन साथ ही यह भी कहा कि “काफी डाउनसाइड रिस्क अभी भी बना हुआ है।  मैकिंजी (McKinsey) के ताजा ग्लोबल सर्वे का नतीजा और भी चौंकाने वाला है. करीब 70% बिजनेस एग्जीक्युटिव्स ने मंदी के किसी न किसी सीन को सबसे संभावित माना. इनमें से 61 प्रतिशत ने डिमांड से पैदा होने वाली मंदी की बात कही. यानी बढ़ती अनिश्चितता से उपभोक्ताओं का भरोसा टूट सकता है, जो मंदी तक ले जाने के लिए काफी होगा।  मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) के चीफ ग्लोबल इकॉनमिस्ट सेथ कारपेंटर (Seth Carpenter) ने कहा, “आर्थिक नुकसान शुरू हो चुका है. अगर टैरिफ अप्रैल के पीक पर वापस जाते हैं तो अमेरिका और पूरी दुनिया मंदी में चली जाएगी.” IMF ने भी ग्लोबल ग्रोथ 2024 के 3.3% से घटकर 2026 में 3.1% रहने का अनुमान जताया है और कहा है कि जोखिम नीचे की तरफ झुके हुए हैं।  भारत पर क्या होगा असर? भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः घरेलू मांग पर टिकी है, इसीलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि देश वैश्विक मंदी की सीधी चपेट में नहीं आएगा. डेलॉयट इंडिया (Deloitte India) के अनुसार भारत 2026 में 6.5 से 7 फीसदी की दर से बढ़ता रह सकता है और वह दुनिया की सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा. लेकिन बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) के चीफ इकॉनमिस्ट मदन सबनवीस (Madan Sabnavis) की चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उनके मुताबिक भारत रुपये की तेज अस्थिरता से जरूर प्रभावित होगा. जब अमेरिका और यूरोप जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में मंदी आती है, तो निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी खींच लेते हैं, परिमाणस्वरूप रुपया कमजोर पड़ता है, शेयर बाजार में उठापटक होती है और आयात होने वाले कच्चे माल महंगे हो जाते हैं. भारत कच्चे तेल का बड़ा इम्पोर्टर है, इसलिए वैश्विक ऊर्जा बाजार में कोई भी उथलपुथल सीधे महंगाई को हवा दे सकती है।  IT सेक्टर पर बड़ा खतरा एक बड़ा सेक्टोरल खतरा आईटी इंडस्ट्री के सामने है. नैस्कॉम (NASSCOM) की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय आईटी सेक्टर की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप जैसे पश्चिमी बाजारों पर टिकी हुई है. यदि इन देशों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है और वहां सेवाओं की मांग घटती है, तो इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा. नए प्रोजेकट्स मिलना कम हो जाएंगे, कंपनियां अपने बजट में कटौती करेंगी और युवाओं के लिए नई नौकरियों के अवसर भी सिमट सकते हैं।  आईटी के अलावा कपड़ा, टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग जैसे वे तमाम उद्योग भी दबाव महसूस करेंगे, जो अपना माल विदेशों में बेचते हैं. हालांकि, भारत के पास इस संभावित संकट से लड़ने के मजबूत साधन भी मौजूद हैं. सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) पर किया जा रहा भारी निवेश और भारतीय रिजर्व बैंक की संभली हुई नीतियां एक सुरक्षा कवच का काम करेंगी. इसके बावजूद, यदि वैश्विक आर्थिक हालात और अधिक बिगड़ते हैं, तो भारत की कुल विकास दर (GDP) में 0.3% से 0.5% तक की गिरावट देखने को मिल सकती है। 

ऊर्जा सुरक्षा पर भारत एक्टिव: रूस से भरोसा मिला तो अमेरिका से की खास अपील

 नई दिल्ली मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और पर्शियन गल्फ में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अमेरिका से रूस से तेल खरीद पर दी गई छूट को आगे बढ़ाने की अपील की है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई दिल्ली ने वॉशिंगटन से कहा है कि मौजूदा हालात में ऊर्जा सप्लाई बनाए रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि तेल बाजार में जारी अस्थिरता का असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर पड़ सकता है।  अमेरिका ने पहली बार मार्च में भारत और अन्य मुल्कों को रूसी तेल खरीदने के लिए विशेष छूट दी थी. इसके बाद इसे बढ़ाकर 16 मई 2026 तक कर दिया गया. इस छूट की वजह से भारत रियायती दरों पर रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद पा रहा है।  हालांकि, यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बनाता रहा है कि वह रूस से तेल खरीद कम करे ताकि मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा सके. लेकिन अब ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है, जिससे भारत की चिंता बढ़ गई है।  इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अधिकारियों ने अमेरिकी पक्ष से कहा है कि अगर तेल बाजार में उथल-पुथल जारी रहती है तो इसके गंभीर सामाजिक और आर्थिक असर हो सकते हैं. खासतौर पर भारत जैसे देश में, जहां 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतें काफी बड़ी हैं और पहले से ही कुकिंग गैस की कमी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं. भारत के तेल मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने फिलहाल इस मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है. वहीं अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की तरफ से भी कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया है।  रूस का एनर्जी सप्लाई पूरा करने का वादा नई दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने से पहले ब्रॉडकास्टर आरटी इंडिया से बातचीत में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि रूस यह सुनिश्चित करेगा कि भारत के ऊर्जा हित पूरी तरह सुरक्षित रहें. उन्होंने कहा, "मैं गारंटी दे सकता हूं कि रूसी ऊर्जा सप्लाई से जुड़े भारत के हित प्रभावित नहीं होंगे. हम हरसंभव कोशिश करेंगे कि यह अनुचित कंपटीशन हमारे समझौतों को नुकसान न पहुंचाए।  रूसी विदेश मंत्री लावरोव ने जोर देकर कहा कि रूस ने ऊर्जा क्षेत्र में कभी भी भारत या किसी अन्य साझेदार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में विफलता नहीं दिखाई है. उन्होंने तमिलनाडु स्थित कुडनकुलम न्यूक्लियर एनर्जी प्लांट को भारत-रूस सहयोग का प्रमुख उदाहरण बताया और कहा कि नए पावर यूनिट्स पर काम जारी है. उन्होंने कहा, "भारत को और ऊर्जा की जरूरत है. हम गैस, तेल और कोयले जैसे हाइड्रोकार्बन की सप्लाई लगातार जारी रखे हुए हैं।  इस बीच भारत ने मई महीने में रिकॉर्ड स्तर पर रूसी तेल आयात किया है. इकोनॉमिक टाइम्स ने डेटा फर्म क्लेपेर के हवाले से बताया कि, मई में भारत रोजाना करीब 23 लाख बैरल रूसी तेल आयात कर रहा है. अनुमान है कि पूरे महीने का औसत करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता है, जो अब भी बेहद बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है।  विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में संघर्ष लंबा खिंचने की स्थिति में भारत रूस से सस्ते तेल पर अपनी निर्भरता और बढ़ा सकता है, क्योंकि इससे घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। 

महंगाई ने तोड़ी 42 महीनों की सीमा, जानिए किन चीजों के दाम सबसे ज्यादा बढ़े

नई दिल्ली महंगाई को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है. अप्रैल 2026 में थोक महंगाई दर यानी WPI (Wholesale Price Index) बढ़कर 8.30 फीसदी पर पहुंच गई, जो पिछले करीब 42 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है. मार्च 2026 में यह आंकड़ा 3.88 फीसदी था. बाजार को उम्मीद थी कि महंगाई करीब 5.50 फीसदी रह सकती है, लेकिन असली आंकड़े ने सभी अनुमान पीछे छोड़ दिए. इससे साफ है कि देश में लागत और ईंधन से जुड़ा दबाव तेजी से बढ़ रहा है।  वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाले DPIIT द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक इस बार महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र रहा. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का सीधा असर भारत के थोक बाजार पर दिखाई दिया है।  ईंधन और तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता अप्रैल महीने में फ्यूल एंड पावर कैटेगरी की महंगाई मार्च के 1.05 फीसदी से बढ़कर सीधे 24.71 फीसदी पर पहुंच गई. यह उछाल बेहद बड़ा माना जा रहा है। कच्चे तेल की थोक महंगाई 88 फीसदी से ऊपर पहुंच चुकी है. वहीं, पेट्रोल की कीमतों में 32.40 फीसदी और डीजल में 25.19 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. घरेलू LPG गैस भी महंगी हुई है और इसकी महंगाई दर 10.92 फीसदी रही।  विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान संकट और खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है. इससे कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़े और इसका असर सीधे भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर पड़ा. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, इसलिए ग्लोबल मार्केट में बदलाव का असर घरेलू कीमतों पर जल्दी दिखता है।  खाने-पीने की चीजों से राहत हालांकि राहत की बात यह रही कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई अभी ज्यादा नहीं बढ़ी है. अप्रैल में फूड इन्फ्लेशन बढ़कर 2.31 फीसदी रही, जबकि मार्च में यह 1.85 फीसदी थी. प्याज और आलू जैसी जरूरी सब्जियों के दाम अभी भी पिछले साल के मुकाबले कम बने हुए हैं. इससे आम लोगों को थोड़ी राहत मिली है।  लेकिन दूसरी ओर प्राइमरी आर्टिकल्स यानी कच्चे सामान की महंगाई 6.36 फीसदी से बढ़कर 9.17 फीसदी हो गई. वहीं, मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई भी 3.39 फीसदी से बढ़कर 4.62 फीसदी पहुंच गई है. इसका मतलब है कि फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान की लागत भी बढ़ रही है।  अन्य सेक्टर्स पर दबाव Core WPI यानी खाने-पीने की चीजों और ईंधन को छोड़कर बाकी वस्तुओं की महंगाई भी बढ़कर 5 फीसदी पर पहुंच गई है, जो 43 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है. मार्च में यह 3.7 फीसदी थी. इससे यह संकेत मिल रहा है कि महंगाई का दबाव अब सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है बल्कि बाकी सेक्टरों में भी फैलने लगा है।  अब बाजार और आम लोगों की नजरें मई महीने के आंकड़ों पर टिकी हैं. DPIIT के अनुसार मई 2026 के WPI आंकड़े 15 जून को जारी किए जाएंगे. अगर तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है। 

इंडियन शिप पर हमले से बढ़ा तनाव, भारत बोला- ऐसी हरकत बिल्कुल बर्दाश्त नहीं

बेंगलुरु  ओमान तट के पास एक भारतीय ध्वज वाले जहाज पर हुए मिसाइल हमले को लेकर भारत ने कड़ी नाराजगी जताई है. विदेश मंत्रालय ने इस घटना को अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और सिविलियन नाविकों को निशाना बनाना किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता. यह हमला ऐसे समय हुआ है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और आसपास के अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ा हुआ है. अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम भले ही फिलहाल लागू हो, लेकिन दोनों देशों के बीच समझौते को लेकर स्थिति अभी भी बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है।  विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार को जारी बयान में कहा कि ओमान तट के पास भारतीय ध्वज वाले जहाज पर हुआ हमला अस्वीकार्य है. हम इस बात की निंदा करते हैं कि लगातार कमर्शियल शिपिंग और नागरिक नाविकों को निशाना बनाया जा रहा है. मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि जहाज पर मौजूद सभी भारतीय चालक दल के सदस्य सुरक्षित हैं. भारत ने बचाव अभियान चलाने के लिए ओमान प्रशासन का धन्यवाद भी किया. बयान में कहा गया कि भारत दोहराता है कि कमर्शियल जहाजों को निशाना बनाना, निर्दोष नागरिक क्रू मेंबर्स की जान खतरे में डालना और समुद्री व्यापार व नेविगेशन की स्वतंत्रता में बाधा डालने जैसी घटनाओं से बचा जाना चाहिए. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में इससे पहले भी भारतीय हजार पर हमले हुए हैं।  किसने किया हमला? अभी साफ नहीं हालांकि भारत सरकार ने अपने बयान में यह स्पष्ट नहीं किया कि जहाज पर हमला किसने किया. लेकिन यह घटना ऐसे समय हुई है जब होर्मुज स्ट्रेट के आसपास हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं. पश्चिम एशिया में जारी तनाव, ईरान-अमेरिका टकराव और समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे के कारण इस इलाके में वैश्विक चिंता लगातार बढ़ रही है।  क्यों अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज? स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है. दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है. भारत समेत कई एशियाई देशों की ऊर्जा जरूरतें इस समुद्री मार्ग पर काफी हद तक निर्भर हैं. ऐसे में यहां किसी भी तरह का हमला या अस्थिरता सीधे वैश्विक व्यापार और तेल बाजार को प्रभावित कर सकती है. जानकारों का कहना है कि हाल के महीनों में इस क्षेत्र में कमर्शियल जहाजों पर खतरा तेजी से बढ़ा है. यही वजह है कि भारत ने इस हमले को केवल एक सुरक्षा घटना नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है।  भारत की बढ़ी चिंता भारत लंबे समय से समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और फ्रीडम ऑफ नेविगेशन की वकालत करता रहा है. भारतीय जहाज पर हुए इस हमले के बाद यह साफ हो गया है कि पश्चिम एशिया का तनाव अब सीधे भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों को भी प्रभावित करने लगा है. हालांकि सभी भारतीय नाविक सुरक्षित बताए गए हैं, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर होर्मुज क्षेत्र में तनाव और बढ़ा, तो उसका असर वैश्विक सप्लाई चेन और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर कितना गंभीर हो सकता है।   

वोटर लिस्ट को लेकर चुनाव आयोग एक्शन में, 16 राज्यों समेत 3 UT में चलेगा SIR अभियान

नई दिल्ली चुनाव आयोग ने देशभर में मतदाता सूचियों को और ज्यादा पारदर्शी व सटीक बनाने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) के तीसरे चरण की घोषणा कर दी है। आयोग ने 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में चरणबद्ध तरीके से यह अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं। इस प्रक्रिया के तहत करीब 36.73 करोड़ मतदाताओं के घर-घर जाकर सत्यापन किया जाएगा। चुनाव आयोग के मुताबिक, इस चरण में उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़, तेलंगाना और पंजाब जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया है।  किन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में होगा SIR? आयोग ने बताया कि यह कार्यक्रम जनगणना के तहत चल रहे हाउस लिस्टिंग अभियान को ध्यान में रखते हुए तय किया गया है, ताकि दोनों कार्यों में तालमेल बना रहे। SIR फेज-III में निम्नलिखित राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं: राज्य     ओडिशा     मिजोरम     सिक्किम     मणिपुर     उत्तराखंड     आंध्र प्रदेश     अरुणाचल प्रदेश     हरियाणा     तेलंगाना     पंजाब     कर्नाटक     मेघालय     महाराष्ट्र     झारखंड     नागालैंड     त्रिपुरा केंद्र शासित प्रदेश     दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव (DNH & DD)     चंडीगढ़     दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) आयोग ने स्पष्ट किया कि इस तीसरे चरण के बाद हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को छोड़कर पूरे देश में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इन तीनों क्षेत्रों में जनगणना के दूसरे चरण और बर्फबारी वाले इलाकों की परिस्थितियों को देखते हुए बाद में अलग कार्यक्रम घोषित किया जाएगा। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 9.86 करोड़ मतदाता आंकड़ों के अनुसार, इस फेज में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 9.86 करोड़ मतदाता हैं, जहां 97,924 BLO और 96,949 BLA तैनात किए जाएंगे। कर्नाटक में 5.55 करोड़, आंध्र प्रदेश में 4.16 करोड़ और तेलंगाना में 3.39 करोड़ मतदाता इस अभियान के दायरे में आएंगे। दिल्ली में करीब 1.48 करोड़ मतदाताओं के लिए 13,026 BLO और 28,881 BLA नियुक्त किए गए हैं। चुनाव आयोग ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना, फर्जी या दोहराए गए नाम हटाना और सभी पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करना है, ताकि चुनाव प्रक्रिया और अधिक निष्पक्ष और विश्वसनीय बन सके। पहले दो चरणों में 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 59 करोड़ मतदाताओं का पुनरीक्षण पूरा किया जा चुका है। अब तीसरे चरण के बाद हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को छोड़कर देशभर में यह विशेष पुनरीक्षण अभियान लगभग पूरा हो जाएगा। इन क्षेत्रों में बाद में कार्यक्रम जारी किया जाएगा, क्योंकि वहां जनगणना प्रक्रिया और मौसम संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखा जा रहा है। तीसरे चरण के तहत अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तारीखों पर प्रक्रिया पूरी की जाएगी और अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन निर्धारित समयानुसार किया जाएगा। इस चरण में शामिल प्रमुख राज्यों में Haryana, Karnataka, Maharashtra, Punjab, Odisha और Jharkhand सहित कई राज्य शामिल हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि इस पूरे अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को और अधिक सटीक बनाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करना है। चुनाव आयोग ने जारी किया पूरा कार्यक्रम जारी कार्यक्रम के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया मई से सितंबर 2026 के बीच चलेगी। इसमें घर-घर सत्यापन, मतदान केंद्रों का पुनर्गठन, ड्राफ्ट मतदाता सूची का प्रकाशन, दावे और आपत्तियां लेने की प्रक्रिया तथा अंतिम मतदाता सूची जारी करना शामिल है। सबसे पहले ओडिशा, मिजोरम, सिक्किम और मणिपुर में 30 मई से 28 जून तक घर-घर सत्यापन अभियान चलेगा और 6 सितंबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। वहीं महाराष्ट्र, कर्नाटक, झारखंड, मेघालय और दिल्ली में यह प्रक्रिया जून के अंत से शुरू होकर 7 अक्टूबर 2026 तक पूरी होगी।  आयोग ने बताया कितने BLO और BLA होंगे शामिल आयोग ने बताया कि SIR के तहत करीब 3.94 लाख बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) मतदाताओं के घर-घर जाकर जानकारी जुटाएंगे। उनके साथ राजनीतिक दलों की ओर से नियुक्त 3.42 लाख बूथ लेवल एजेंट (BLA) भी सहयोग करेंगे। चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे हर मतदान केंद्र पर अपने BLA नियुक्त करें, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और सभी की भागीदारी वाली बन सके। आयोग के मुताबिक, इससे पहले पहले और दूसरे चरण में 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 59 करोड़ मतदाताओं के लिए SIR हुआ था। उस दौरान 6.3 लाख से ज्यादा BLO और 9.2 लाख से अधिक BLA इस प्रक्रिया में शामिल हुए थे।

भारत को बिना भरोसे में लिए बांग्लादेश ने गंगा पर शुरू किया नया प्रोजेक्ट

ढाका  बांग्लादेश ने  पद्मा नदी पर एक बड़ी बांध निर्माण परियोजना को मंजूरी दी। बांग्लादेश का कहना है कि इससे भारत के फरक्का बांध के 'नकारात्मक प्रभाव' को कम करने में मदद मिलेगी। यह घटनाक्रम 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल बंटवारा संधि की अवधि दिसंबर में समाप्त होने से कुछ महीने पहले सामने आया है। भारत में पद्मा नदी को गंगा कहा जाता है। अधिकारियों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट में पूरी तरह से बांग्लादेश सरकार का धन लगा है। साथ ही संभावनाएं जताई हैं कि प्रोजेक्ट 2033 तक पूरा हो सकता है। इसके जरिए राजशाही, ढाका और बरीसाल डिवीजन के जिले कवर किए जाएंगे। कितना आएगा खर्च अधिकारियों ने बताया कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की अध्यक्षता वाली ECNEC यानी राष्ट्रीय आर्थिक परिषद कार्यकारी समिति ने परियोजना के पहले चरण को मंजूरी दी। इसकी अनुमानित लागत 34,497.25 करोड़ टका है। 'भारत से बात करने की जरूरत नहीं' जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने पत्रकारों को बताया कि इस परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य बांग्लादेश की ओर पानी का भंडारण कर गंगा पर फरक्का बैराज के प्रभाव को कम करना है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और बांग्लादेश के बीच साझा 54 नदियों से जुड़े मुद्दों का इस परियोजना से संबंध नहीं है। बांग्लादेश के मंत्री ने कहा, 'पद्मा बांध बांग्लादेश के अपने हित का मामला है और इस मुद्दे पर भारत से किसी भी प्रकार की चर्चा की आवश्यकता नहीं है।' हालांकि, अनी ने कहा कि गंगा के जल को लेकर भारत के साथ बातचीत जारी है। उन्होंने कहा, 'गंगा के संबंध में चर्चा आवश्यक है और वह जारी है।' भारत के लिए क्यों अहम है यह बैराज भारत ने 1975 में पश्चिम बंगाल में फरक्का बैराज बनाया था। इसका मुख्य उद्देश्य गंगा नदी के पानी को हुगली नदी की तरफ मोड़ना था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि हुगली नदी में जमी मिट्टी और गंदगी साफ हो सके और कोलकाता बंदरगाह तक जहाजों का आना-जाना आसान बना रहे। भारत का हमेशा से यही कहना है कि इस बैराज को केवल कोलकाता बंदरगाह को बचाने के लिए बनाया गया था। वहीं पानी के बंटवारे को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच इसे सुलझाने के लिए कई समझौते हुए हैं। इसमें 1996 की गंगा जल संधि सबसे अहम है, जिसके जरिए दोनों देश मिल-जुलकर पानी की समस्या का हल निकालते हैं। क्यों पेचीदा हुआ मुद्दा बांग्लादेश के लिए फरक्का का मुद्दा हमेशा से ही बहुत संवेदनशील रहा है। वहां की सरकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि सूखे के मौसम में पानी कम मिलने की वजह से उन्हें काफी नुकसान होता है। उनका कहना है कि कम पानी मिलने से नदियों का जलस्तर गिर जाता है और खेती पर असर होता है। इसके अलावा, बांग्लादेश की एक बड़ी चिंता यह भी है कि पानी का बहाव कम होने से समुद्र का खारा पानी नदियों के मीठे पानी में मिल रहा है। इससे जमीन की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है।

स्कूलों में गूंजेगा वंदे मातरम: बंगाल सरकार का बड़ा फैसला, पालन नहीं करने पर होगी कार्रवाई

कलकत्ता पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सभी सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान वंदे मातरम् गीत गाना अनिवार्य करने का फैसला लिया है। स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से जारी आधिकारिक निर्देश के मुताबिक यह व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू होगी और राज्य के सभी छात्रों को स्कूल शुरू होने से पहले प्रार्थना सभा में राष्ट्रीय गीत गाना होगा। विभाग ने सभी स्कूल प्रमुखों को निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा है।  क्या दिए गए निर्देश? 13 मई को जारी आदेश में शिक्षा निदेशक ने स्पष्ट किया कि कक्षाएं शुरू होने से पहले सुबह की प्रार्थना सभा में वंदे मातरम् गीत का गायन अनिवार्य बनाया जाए ताकि राज्य के सभी स्कूलों में सभी छात्र राष्ट्रीय गीत गाएं। अधिकारियों के मुताबिक स्कूलों को इसके पालन का वीडियो रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखने के लिए कहा गया है, ताकि इसे लागू किए जाने का प्रमाण उपलब्ध रहे। सीएम शुभेंदु ने क्या बताया? पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बातचीत में कहा, अगले सोमवार से राज्य के सभी स्कूलों में वंदे मातरम् को प्रार्थना गीत के रूप में शुरू किया जाएगा। मैं आज नबन्ना जाकर इसकी जानकारी दूंगा। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब केंद्र सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़े कानूनों को और मजबूत करने की दिशा में कदम उठा रही है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में संशोधन की तैयारी कर रही है, जिसके तहत वंदे मातरम् के गायन में बाधा डालना दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है। ऐसे में पश्चिम बंगाल सरकार का यह कदम राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर अहम माना जा रहा है। अब तक राज्य के स्कूलों में गाए जाता था राष्ट्रगान अब तक राज्य के स्कूलों में मुख्य रूप से राष्ट्रगान जन-गण-मन गाया जाता था, जिसे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों में राज्य की पूर्व तृणमूल कांग्रेस सरकार ने 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान टैगोर द्वारा लिखे गए ‘बांग्लार माटी बांग्लार जल’ को राज्य गीत के रूप में शामिल किया था। अब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् भी प्रार्थना सभा का स्थायी हिस्सा बनेगा। फैसले पर उठ रहे सवाल इस फैसले के बाद कुछ शिक्षक संगठनों और स्कूल प्रशासन की ओर से व्यावहारिक सवाल भी उठाए गए हैं। उनका कहना है कि सीमित समय वाली स्कूल असेंबली में राष्ट्रगान, राज्य गीत और राष्ट्रीय गीत तीनों को किस क्रम में और कितनी अवधि में गाया जाएगा, इस पर अभी और स्पष्टता की जरूरत है। हिंदू स्कूल के प्रधानाध्यापक शुभ्रजीत दत्ता ने कहा कि गर्मी की छुट्टियों के बाद जब छात्र स्कूल लौटेंगे, तब वे जन-गण-मन के साथ वंदे मातरम् भी गाएंगे। उन्होंने बताया कि छात्रों को पहले ही वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर इसके ऐतिहासिक महत्व के बारे में जानकारी दी जा चुकी है और उन्हें इसकी पंक्तियां याद करने के लिए कहा गया था। वहीं वामपंथी शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि सरकार की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या सभी गीत रोज गाए जाएंगे और उन्हें मौजूदा प्रार्थना सभा के ढांचे में किस तरह शामिल किया जाएगा। हालांकि सरकार ने फिलहाल आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू करने के निर्देश दिए हैं।