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जुबीन गर्ग केस में आया फैसला: कोर्ट ने कहा—यह दुर्घटना थी, नहीं मिली साजिश के सबूत

सिंगापुर सिंगापुर की अदालत ने सिंगर जुबीन गर्ग की मौत को दुर्घटनावश डूबने का मामला करार दिया है। कोर्ट ने किसी भी साजिश से इनकार किया है। बुधवार को एक स्टेट कोरोनर ने सिंगापुर पुलिस कोस्ट गार्ड (पीसीजी) की इस जांच को सही ठहराया कि सिंगर ज़ुबीन गर्ग की मौत में कोई साजिश नहीं थी। उन्होंने फैसला सुनाया कि पिछले साल सितंबर में इस शहर-राज्य के एक द्वीप के पास हुई उनकी मौत एक 'हादसे में डूबने' का मामला था। पीसीजी की इस जांच पर गर्ग की पत्नी द्वारा जताई गई चिंता का सीधा जवाब देते हुए, स्टेट कोरोनर एडम नखोदा ने कहा कि पीसीजी ने इस मामले में एक व्यापक और पूरी तरह से जांच की थी। नखोदा ने पाया कि गर्ग की मौत महज एक दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद हादसे में डूबने के कारण हुई थी और किसी ने भी उन्हें जबरदस्ती, दबाव डालकर या धक्का देकर पानी में नहीं डाला था। चैनल न्यूज एशिया ने नखोदा के हवाले से बताया कि इस बात का भी कोई सबूत नहीं मिला कि उन्हें बचाने वाले तैराकों ने जान-बूझकर उनका चेहरा पानी के नीचे दबाए रखा था। नखोदा ने बताया कि 52 वर्षीय गर्ग नशे में थे, और संभवतः इसी वजह से उनके फैसले लेने की क्षमता प्रभावित हुई। इसमें पहली बार तैरते समय उनका अपनी लाइफ जैकेट उतार देना, और दूसरी बार तैरते समय यॉट के कैप्टन और अन्य यात्रियों के बार-बार कहने के बावजूद उसे पहनने से पूरी तरह इनकार कर देना शामिल है। जुबीन गर्ग 19 सितंबर, 2025 को लाजरस आइलैंड के पास पानी में डूब गए थे। यह उस दिन से ठीक एक दिन पहले की बात है, जब उन्हें 'नॉर्थ ईस्ट इंडिया फेस्टिवल' में प्रस्तुति देनी थी। जुबीन सिंगापुर और भारत के बीच राजनयिक संबंधों के 60 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित एक उत्सव में शामिल होने के लिए सिंगापुर आए थे। गायक की मृत्यु की खबर मिलते ही इस उत्सव को रद्द कर दिया गया। जुबीन ने पी हुई थी शराब कोरोनर ने पाया कि गर्ग ने यॉट ट्रिप के लिए सहमति दी थी और इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि उन्हें इसके लिए मजबूर किया गया था। लगभग 20 लोगों के एक ग्रुप ने, जिस यॉट पर वे सवार थे, उसे लाजरस आइलैंड और सेंट जॉन आइलैंड के बीच रोका और शराब पीने, तैरने और कयाकिंग जैसी गतिविधियों में हिस्सा लिया। चैनल की रिपोर्ट के अनुसार, गवाहों ने गर्ग को शराब पीते हुए देखा, उनमें से एक ने बताया कि उन्होंने कुछ कप लिकर, जिन और व्हिस्की के साथ-साथ गिनीज स्टाउट (बीयर) के भी कुछ घूंट पिए थे। गर्ग पहली बार लाइफ जैकेट पहनकर तैरने गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने उसे उतार दिया और जब वे दूसरी बार लाजरस आइलैंड की ओर तैरने गए, तो उन्होंने दूसरी जैकेट लेने से मना कर दिया। सिंगापुर की अदालत ने सिंगर जुबीन गर्ग की मौत को दुर्घटनावश डूबने का मामला करार दिया है। कोर्ट ने किसी भी साजिश से इनकार किया है। बुधवार को एक स्टेट कोरोनर ने सिंगापुर पुलिस कोस्ट गार्ड (पीसीजी) की इस जांच को सही ठहराया कि सिंगर ज़ुबीन गर्ग की मौत में कोई साजिश नहीं थी। उन्होंने फैसला सुनाया कि पिछले साल सितंबर में इस शहर-राज्य के एक द्वीप के पास हुई उनकी मौत एक 'हादसे में डूबने' का मामला था। पीसीजी की इस जांच पर गर्ग की पत्नी द्वारा जताई गई चिंता का सीधा जवाब देते हुए, स्टेट कोरोनर एडम नखोदा ने कहा कि पीसीजी ने इस मामले में एक व्यापक और पूरी तरह से जांच की थी। नखोदा ने पाया कि गर्ग की मौत महज एक दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद हादसे में डूबने के कारण हुई थी और किसी ने भी उन्हें जबरदस्ती, दबाव डालकर या धक्का देकर पानी में नहीं डाला था। चैनल न्यूज एशिया ने नखोदा के हवाले से बताया कि इस बात का भी कोई सबूत नहीं मिला कि उन्हें बचाने वाले तैराकों ने जान-बूझकर उनका चेहरा पानी के नीचे दबाए रखा था। नखोदा ने बताया कि 52 वर्षीय गर्ग नशे में थे, और संभवतः इसी वजह से उनके फैसले लेने की क्षमता प्रभावित हुई। इसमें पहली बार तैरते समय उनका अपनी लाइफ जैकेट उतार देना, और दूसरी बार तैरते समय यॉट के कैप्टन और अन्य यात्रियों के बार-बार कहने के बावजूद उसे पहनने से पूरी तरह इनकार कर देना शामिल है। जुबीन गर्ग 19 सितंबर, 2025 को लाजरस आइलैंड के पास पानी में डूब गए थे। यह उस दिन से ठीक एक दिन पहले की बात है, जब उन्हें 'नॉर्थ ईस्ट इंडिया फेस्टिवल' में प्रस्तुति देनी थी। जुबीन सिंगापुर और भारत के बीच राजनयिक संबंधों के 60 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित एक उत्सव में शामिल होने के लिए सिंगापुर आए थे। गायक की मृत्यु की खबर मिलते ही इस उत्सव को रद्द कर दिया गया।  

मां की सेहत बनी चिंता, राहुल गांधी ने कैंसिल किया केरल दौरा

नई दिल्ली कांग्रेस की सीनियर नेता और राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी की तबीयत स्थिर है। उन्हें मंगलवार की रात को ही सर गंगाराम अस्पताल में एडमिट कराया गया था। फिलहाल उनकी तबीयत स्थिर है और डॉक्टरों की निगरानी में वह स्वास्थ्य लाभ ले रही हैं। बुधवार को सर गंगाराम अस्पताल की ओर से उनकी सेहत के बारे में मेडिकल बुलेटिन जारी किया गया। अस्पताल प्रशासन के अनुसार उन्हें मंगलवार की रात को 10:22 बजे अस्पताल में एडमिट कराया गया था। गंगाराम अस्पताल के चेयरमैन डॉ. अजय स्वरूप ने बताया कि उनकी हालत स्थिर है और डॉक्टर उनकी सेहत की गहन निगरानी कर रहे हैं। उन्हें पेट और यूरिनरी इंफेक्शन की शिकायत कही जा रही थी। फिलहाल डॉक्टर इसी की जांच कर रहे हैं। उन्हें इलाज के तौर पर एंटीबायोटिक्स दी जा रही हैं ताकि वे जल्दी ही इंफेक्शन से उबर जाएं। सूत्रों का कहना है कि शायद मौसम में बदलाव के चलते सोनिया गांधी की सेहत खराब हुई है। इसी के चलते उन्हें निगरानी में रखा जा रहा है। अब तक उनकी सेहत को लेकर कोई चिंता वाली बात नहीं दिखी है। वह स्थिर हैं और डॉक्टरों की निगरानी में हैं। इस बीच रायबरेली के सांसद और उनके बेटे राहुल गांधी मां की सेहत को देखते हुए दिल्ली में ही रुके हैं। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी को आज केरल में एक चुनावी दौरे पर जाना था। लेकिन उन्होंने केरल का दौरा रद्द कर दिया। उनके स्थान पर पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ही कोझिकोड रवाना हुए हैं। बीते साल जून में भी सोनिया गांधी को पेट से जुड़ी समस्या हो गई थी और उन्हें अस्पताल में एडमिट कराना पड़ा था। उन्हें अस्पताल के गैस्ट्रो डिपार्टमेंट में निगरानी में रखा गया था। उससे कुछ दिन पहले ही उन्हें हिमाचल प्रदेश के शिमला में स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज में दाखिल कराया गया था। गौरतलब है कि सोनिया गांधी ने 2024 का आम चुनाव सेहत का हवाला देते हुए ही नहीं लड़ा था। वह फिलहाल राज्यसभा की सांसद हैं। इससे पहले वह रायबरेली से सांसद रहा करती थीं। अब इस परंपरागत सीट से उनके बेटे राहुल गांधी सांसद हैं। वहीं बेटी प्रियंका गांधी केरल की वायनाड लोकसभा सीट से सांसद हैं। बीते कई सालों से सोनिया गांधी की राजनीतिक सक्रियता पहले जैसी नहीं देखी जा रही। इसकी वजह उनकी खराब सेहत ही बताई जाती है। गौरतलब है कि INDIA अलायंस की बैठकों में भी अब सोनिया गांधी कम ही नजर आती हैं।  

सुप्रीम कोर्ट में हैरान करने वाला मामला: CJI के नाम पर फोन, जस्टिस सूर्यकांत सख्त

नई दिल्ली   सुप्रीम कोर्ट में रोजाना विभिन्न मामलों की सुनवाई होती है। बुधवार को सीजेआई सूर्यकांत ने एक शख्स को तगड़ी फटकार लगाई। सीजेआई ने एक आदेश पारित किया था, जिसके बाद शख्स ने उनके (सीजेआई) के भाई को फोन लगाकर पूछा कि यह आदेश कैसे पारित कर दिया। इस पर सीजेआई भड़क गए और शख्स के वकील से सुप्रीम कोर्ट में कड़े सवाल दागे। उन्होंने पूछा कि क्या अब वह मुझ पर हुक्म चलाएगा। लाइव लॉ के अनुसार, सीजेआई सूर्यकांत ने फोन कॉल करने वाले शख्स के वकील से कहा, ''आपके मुवक्किल के खिलाफ अवमानना ​​की कार्यवाही क्यों नहीं होनी चाहिए? उसने मेरे भाई को फोन करने की हिम्मत कैसे की और यह पूछा कि सीजेआई ने यह आदेश कैसे पारित किया? क्या वह मुझे हुक्म चलाएगा? आप इसकी पुष्टि करें, और फिर एक वकील के तौर पर, सबसे पहले आपको इस मामले से हट जाना चाहिए।'' सीजेआई सूर्यकांत ने चेतावनी देते हुए कहा कि भले ही वह भारत से बाहर कहीं भी छिप जाए, मुझे पता है कि ऐसे लोगों से कैसे निपटना है। दोबारा कभी ऐसी हिम्मत मत करना। मैं पिछले 23 सालों से ऐसे तत्वों से निपटता आ रहा हूं। दरअसल, सीजेआई सूर्यकांत एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें अपर कास्ट की जनरल कैटेगरी से धर्म बदलकर बौद्ध बनने के बाद एक पीजी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए बौद्ध प्रमाण पत्र के तहत मिलने वाले लाभों की मांग की गई थी। इस पर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के मुख्य सचिव को अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने के लिए दिशा निर्देश तय करने के लिए कहा था। इसी मामले में सीजेआई ने तब भी कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने तब इसे नए तरीके का फ्रॉड बताया था। यह याचिका निखिल कुमार पुनिया और एकता पुनिया ने दायर की थी। सीजेआई सूर्यकांत ने तब कहा था, "वाह! अब, यह एक नए तरह का धोखा है। हमसे और कुछ मत कहलवाइए।'' इस याचिका पर कड़ा रुख अपनाते हुए, शीर्ष अदालत ने हरियाणा सरकार से जवाब मांगा था और यह स्पष्ट करने को कहा कि वह 'सामान्य श्रेणी' के उन उम्मीदवारों को अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र कैसे जारी कर रही है, जो पहले परीक्षाओं में 'गैर-अल्पसंख्यक' आवेदकों के तौर पर शामिल हुए थे। बता दें कि सीजेआई सूर्यकांत इससे पहले भी कई मामलों में कड़ी फटकार लगा चुके हैं। एनसीईआरटी किताब विवाद में सोशल मीडिया पर की गई कुछ गैर जिम्मेदाराना कमेंट्स पर उन्होंने पिछले दिनों सख्ती दिखाई थी। उन्होंने कहा था कि सरकार ऐसी वेबसाइट्स और लोगों की पहचान करके बताए, जिन्होंने ऐसे टिप्पणियों को पब्लिश किया। उन्होंने ऐसी टिप्पणी करने वालों को चेतावनी देते हुए कहा था कि कुछ लोग भले ही देश के बाहर कहीं भी छिपे हुए हों, मैं उन्हें छोड़ने वाला नहीं हूं।  

ईरान से जंग खत्म करने के लिए ट्रंप की 15 शर्तें: एक महीने का सीजफायर, नो न्यूक्लियर और होर्मुज

वाशिंगटन इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने के करीब 25 दिन बाद अमेरिका अब सीजफायर की उम्मीद कर रहा है। बीते दिनों ईरान युद्ध में जीत का दावा करने वाले ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ उनकी बातचीत जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप सरकार ने समझौते के लिए ईरान को एक 15-सूत्रीय युद्धविराम योजना की पेशकश की है, जिसमें युद्ध में एक महीने का सीजफायर का जिक्र है। इस घटनाक्रम से अवगत एक अधिकारी ने यह जानकारी दी है। अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखे जाने की शर्त पर बताया कि युद्धविराम योजना पाकिस्तान के मध्यस्थों के जरिए ईरान को सौंपी गई। बता दें कि इससे पहले पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थता की पेशकश की थी। इसके बाद ट्रंप ने भी इसे हरी झंडी दे दी है और कहा है कि ईरानी नेतृत्व के ‘अच्छे लोगों’ के साथ उनकी बातचीत जारी है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने मंगलवार को अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि 15-सूत्रीय योजना ईरानी अधिकारियों को सौंप दी गई है। ट्रंप की योजना में क्या? हालांकि पूरा दस्तावेज अभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किया गया है, लेकिन कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि इस 15-सूत्रीय योजना का ढांचा तीन बड़ी मांगों पर आधारित है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग की गई है। ट्रंप कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि ईरान को अपनी परमाणु क्षमताओं को खत्म करना होगा। इसमें यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह रोकना, नतान्ज, फ़ोर्डो और इस्फहान जैसी अहम सुविधाओं को बंद करना और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति देना शामिल है। प्रॉक्सी मॉडल को छोड़ने की बात भी इसके अलावा अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता और संख्या को सीमित करे। यह मांग ईरान की प्रतिरोधक क्षमता को निशाना बनाती है, ना कि सिर्फ उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को। एक और बड़ी मांग यह है कि ईरान हिजबुल्लाह और हूती जैसे क्षेत्रीय गुटों को पैसे देना और हथियार मुहैया कराना बंद करे और पूरे मिडिल ईस्ट में अपने प्रॉक्सी मॉडल को छोड़ दे। इसके अलावा प्लान में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुला रखने, और सीजफायर की समय-सीमा तय करने की बात भी है। वहीं इन सब के बदले अमेरिका ईरान को प्रतिबंधों में पूरी तरह राहत दे सकता है। USA के कदम से इजरायल हैरान उधर, अमेरिका के इस अचानक सीजफायर प्रस्ताव ने इजरायली अधिकारियों को हैरान कर दिया है जो युद्ध जारी रखने के पक्ष में थे. दूसरी ओर, कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद पेंटागन क्षेत्र में 3,000 अतिरिक्त सैनिक तैनात कर रहा है. वर्तमान में मिडिल ईस्ट में लगभग 50,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. ईरान ने पहले ही चेतावनी दी है कि यदि सैन्य गतिविधियां बढ़ीं, तो वह खाड़ी में समुद्री बारूद (नेवल माइंस) बिछा सकता है।  नया नहीं है पीस प्लान विशेषज्ञों का कहना है कि ये 15-सूत्रीय ढांचा पूरी तरह नया नहीं है, बल्कि मई 2025 के उस प्रस्ताव पर आधारित है जो इजरायली हमलों के बाद विफल हो गया था. पहले की योजना में कथित तौर पर व्यापक शर्तें लगाई गई थीं, जिनमें ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर सख्त सीमाएं लगाना, यूरेनियम भंडार को बाहर भेजना, संवर्धन सुविधाओं को निष्क्रिय करना और प्रतिबंध राहत निधि के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करना शामिल था, जबकि केवल आंशिक प्रतिबंधों में ढील और संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में एक नागरिक परमाणु कार्यक्रम की पेशकश की गई थी।  इस बात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या ये प्रस्ताव औपचारिक रूप से ईरान को प्रस्तुत किया गया है. कुछ राजनयिकों को शक है कि कोई ठोस नया प्रस्ताव मौजूद भी है या नहीं और यदि है भी, तो संभवत इसे अभी तक तेहरान के साथ साझा नहीं किया गया है।  वहीं, ट्रंप ने दावा किया कि पिछले दो दिनों में हुई बहुत अच्छी और सार्थक बातचीत से ईरान के साथ प्रगति हुई है. हालांकि, तेहरान ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि बातचीत को फिर से शुरू करने के बारे में सीमित अप्रत्यक्ष संपर्कों के अलावा कोई गुप्त वार्ता नहीं हुई है।  विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता (ऑफ-रैंप) तलाश रहे हैं. हालांकि, दोनों देशों के बीच गहरे अविश्वास और ईरान के अंदर वार्ता के अधिकार को लेकर अनिश्चितता इस शांति प्रक्रिया में बड़ी बाधा है।  मानेगा ईरान? ईरान ने अब तक अमेरिका के साथ बातचीत की संभावना को खारिज ही किया है। ऐसे में इसकी बेहद कम संभावना है कि ईरान ट्रंप की इन मांगों को समर्थन देगा। इसकी वजह यह है कि यह प्रस्ताव किसी नई शांति पहल से ज्यादा, पहले नाकाम हो चुकी परमाणु वार्ताओं का ही एक नया रूप लगता है। ईरान का तर्क है कि पिछली बार बातचीत के बीच ही अमेरिका ने हमला कर दिया, जिससे नई गारंटियों पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है।

गुजरात में समान नागरिक संहिता लागू, लिव-इन में रह रहे लोग रहें सावधान, शादी में धोखाधड़ी पर 7 साल की सजा

अहमदाबाद  गुजरात विधानसभा ने  'गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक 2026' पारित कर दिया। इसमें शादी-विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों के बारे में एक समान कानूनी ढांचा प्रस्तावित किया गया है। इसी के साथ गुजरात यूसीसी लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया है। गुजरात विधानसभा की 182 सीटों में से 161 सीटों पर भारी बहुमत होने के कारण बीजेपी के कई सदस्यों द्वारा प्रस्तावित कानून पर अपने विचार रखने के बाद यह विधेयक बहुमत से पारित कर दिया गया। उत्तराखंड के बाद गुजरात दूसरा ऐसा भारतीय राज्य बन गया है, जिसने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के लिए विधेयक पारित किया है। हालांकि, इस विधेयक के कोई भी प्रावधान अनुसूचित जनजातियों के लोगों पर लागू नहीं होंगे। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने विधेयक पेश करते हुए कहा कि यह कानून संविधान के मूल सिद्धांतों और न्याय के विचार पर आधारित है. उनके अनुसार इस कानून का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों से जुड़े मामलों में एक समान कानूनी ढांचा स्थापित करना है, चाहे उनका धर्म या जाति कुछ भी हो. मुख्यमंत्री ने कहा कि यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों और दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों के कानूनों का अध्ययन करने के बाद तैयार किया गया है। विधानसभा में तकरीबन 8 घंटे से अधिक समय तक चली बहस के बाद विधेयक को ध्वनिमत से पारित किया गया. गुजरात में सत्तारूढ़ भाजपा ने इसे सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम बताया, जबकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इसका विरोध करते हुए इसे विधानसभा की सेलेक्ट कमेटी को भेजने की मांग की. विपक्ष का आरोप था कि सरकार ने इसे जल्दबाजी में पेश किया है और यह कुछ समुदायों के अधिकारों पर असर डाल सकता है. ‘गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड-2026’ नामक यह कानून पूरे राज्य में लागू होगा और गुजरात के उन निवासियों पर भी लागू होगा जो राज्य के बाहर रहते हैं. हालांकि, अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और संविधान द्वारा संरक्षित कुछ पारंपरिक समूहों (Traditional Groups) को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। फर्जी तरीके से विवाह करने पर जेल विधेयक के प्रमुख प्रावधानों में विवाह का अनिवार्य पंजीकरण, लिव-इन रिलेशंस का रजिस्‍ट्रेशन, तलाक के लिए समान नियम और बेटियों व बेटों को उत्तराधिकार में समान अधिकार शामिल हैं. कानून के अनुसार, विवाह का रजिस्‍ट्रेशन 60 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा. ऐसा न करने पर 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. वहीं, जबरन, धोखाधड़ी या दबाव में कराए गए विवाह के मामलों में 7 साल तक की सजा का प्रावधान रखा गया है. बहुविवाह या एक से अधिक विवाह करने पर भी समान सजा का प्रावधान किया गया है. तलाक के मामलों में भी नया प्रावधान किया गया है. इसके अनुसार अदालत की मंजूरी के बाद ही तलाक को वैध माना जाएगा और बिना ज्‍यूडिशियल प्रोसेस के किया गया तलाक अमान्य होगा. ऐसे मामलों में तीन साल तक की सजा का प्रावधान है. इसके साथ ही महिलाओं को बिना शर्त दोबारा विवाह करने का अधिकार भी सुनिश्चित किया गया है। गुजरात UCC: 10 प्‍वाइंट में जानें सबकुछ     गुजरात विधानसभा में पारित: गुजरात विधानसभा ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल को बहुमत से पारित कर दिया, जिससे राज्य इसे लागू करने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया (पहला उत्तराखंड).     समान कानून का उद्देश्य: बिल का मकसद सभी धर्मों और समुदायों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों पर एक समान कानूनी ढांचा लागू करना है।     सीएम भूपेंद्र पटेल का बयान: मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इसे समानता और न्याय पर आधारित कानून बताया, जो सभी नागरिकों पर बिना भेदभाव लागू होगा।     शादी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य: विवाह के 60 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन जरूरी होगा, नहीं करने पर 10,000 रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।     जबरन या धोखाधड़ी से शादी पर सजा: जबरन, धोखे या दबाव में की गई शादी पर अधिकतम 7 साल की सजा का प्रावधान रखा गया है. साथ ही बहुविवाह/पॉलिगैमी पर भी प्रतिबंध लगाया है।     तलाक के नियम सख्त: तलाक केवल अदालत की मंजूरी और रजिस्ट्रेशन के बाद ही मान्य होगा, अन्यथा 3 साल तक की सजा हो सकती है. महिलाओं को दोबारा शादी का अधिकार सुनिश्चित किया गया है।     लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन: लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य होगा; उल्लंघन पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 रुपये तक जुर्माना लग सकता है।     महिलाओं और बच्चों के अधिकार: बिल में महिलाओं के भरण-पोषण, बच्चों की पहचान, विरासत और सुरक्षा को कानूनी रूप से मजबूत करने का प्रावधान है।     राजनीतिक प्रतिक्रिया: बीजेपी ने इसे ऐतिहासिक और समानता की दिशा में बड़ा कदम बताया, जबकि कांग्रेस और AAP ने इसका विरोध करते हुए इसे चयन समिति को भेजने की मांग की और इसे संविधान विरोधी बताया।     संवैधानिक आधार: बिल को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत लाया गया है, जो राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश देता है। लिव-इन में रहने वालों हो जाएं सावधान विधेयक में लिव-इन संबंधों के पंजीकरण को भी अनिवार्य बनाया गया है. यदि कोई जोड़ा इसका पंजीकरण नहीं कराता है तो तीन महीने तक की कैद या 10 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है. यदि लिव-इन में रहने वाले व्यक्तियों की उम्र 18 से 21 वर्ष के बीच है, तो उनके माता-पिता को इसकी सूचना दी जाएगी. नाबालिगों से जुड़े मामलों में पॉक्सो कानून लागू होगा, जबकि विवाहित व्यक्ति द्वारा लिव-इन संबंध बनाने पर कड़ी सजा का प्रावधान रखा गया है. मुख्यमंत्री पटेल ने कहा कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा करना है. उनके अनुसार विवाह और संबंधों का पंजीकरण कानूनी मान्यता सुनिश्चित करेगा, महिलाओं को परित्याग से बचाएगा और बच्चों को पहचान, भरण-पोषण और उत्तराधिकार से जुड़े अधिकारों की बेहतर सुरक्षा देगा. विधेयक पारित होने के बाद मुख्यमंत्री ने X पर इसे गुजरात और देश के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया. उन्होंने कहा कि इस कानून से सभी धर्मों और समुदायों के लोगों के लिए समान कानूनी ढांचा लागू होगा और महिलाओं के अधिकारों को और मजबूती मिलेगी. बता दें … Read more

सुप्रीम कोर्ट की लताड़: जाति मुक्त समाज का वादा, अब हम खुद बांटने लगे

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को जमकर लताड़ा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि देश में हमें एक जाति मुक्त समाज बनाना था, लेकिन हम लगातार बंटते जा रहे हैं। इसके साथ ही देश की सर्वोच्च अदालत ने 2027 की जनगणना में 'विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों' की अलग से गणना करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह एक नीतिगत निर्णय है और यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय नहीं है। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, "भारत एक बहुत ही अनूठा देश है। एक जातिविहीन समाज विकसित करने के बजाय, हम अधिक से अधिक वर्गीकरण बनाना चाहते हैं।" जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सरकार भी इसके पक्ष में है तो सीजेआई ने संदेह जताते हुए कहा, "ये बहुत ही नपे-तुले कदम हैं। ये कोई साधारण दावे नहीं हैं जो अचानक हमारे सामने आ गए हैं। यह समाज को विभाजित करने की एक बहुत ही गहरी साजिश है। ये एजेंसियां भारत के भीतर की नहीं हैं। यदि हम जांच करेंगे, तो पता चल जाएगा कि इन्हें कहां से रूट किया जा रहा है।" DNT समुदाय के नेता दक्षकुमार बजरंगे और अन्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि इन समुदायों ने ऐतिहासिक अन्याय सहा है। अंग्रेजों ने इन्हें आपराधिक जनजाति (Criminal Tribes) करार दिया था। वर्तमान जनगणना फॉर्म में केवल एससी, एसटी और 'अन्य' की श्रेणियां हैं। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि एक अलग विकल्प दिया जाए ताकि इन समुदायों की सटीक जनसंख्या का पता चल सके। अंतिम गणना 1913 में दवे ने कोर्ट को बताया कि आखिरी बार इन समुदायों की गणना 1913 में हुई थी। इदाते आयोग (2017) और रेनके आयोग (2008) जैसी कई समितियों ने भी इनकी अलग से गिनती की सिफारिश की है। याचिका में कहा गया है कि भारत में लगभग 10 से 12 करोड़ की आबादी वाले इन समुदायों को आजादी के बाद कभी अलग से नहीं गिना गया। आंकड़ों के अभाव के कारण ये समुदाय कल्याणकारी योजनाओं और आरक्षण का लाभ उठाने में असमर्थ हैं। 1871 के 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' के कारण इन पर जो कलंक लगा था, वह कानून रद्द होने के बावजूद आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से इनका पीछा कर रहा है। कोर्ट का अंतिम फैसला पीठ ने मामले का निपटारा करते हुए कहा कि जनगणना की प्रक्रिया में वर्गीकरण या उप-वर्गीकरण करना पूरी तरह से केंद्र सरकार और विशेषज्ञों के कार्यक्षेत्र में आता है। कोर्ट ने कहा, "हमारी सुविचारित राय में याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई मांग नीतिगत दायरे में आती है, जिस पर निर्णय भारत सरकार के सक्षम प्राधिकारी को लेना है। यह न्यायसंगत मुद्दा नहीं है।" अदालत के इस फैसले के बाद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह आगामी 2027 की जनगणना में इन समुदायों की पहचान के लिए क्या कदम उठाती है।

मिडिल ईस्ट के तनाव से रियल एस्टेट प्रभावित, बढ़ सकते हैं घरों के दाम

मुंबई  रियल एस्टेट डेवलपर्स के संगठनों क्रेडाई (Credai) और नारेडको (Naredco) ने चेतावनी दी है कि अमेरिका-ईरान के बीच लंबे समय तक चलने वाला युद्ध निर्माण लागत को बढ़ा सकता है. ईंधन और माल ढुलाई की बढ़ती कीमतों के कारण स्टील और टाइल्स जैसी प्रमुख सामग्रियां महंगी हो सकती हैं. जिससे प्रोजेक्ट की समय-सीमा में देरी हो सकती है और घरों की कीमतें बढ़ सकती हैं।  यह प्रभाव मुख्य रूप से कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और लॉजिस्टिक्स में आने वाली बाधाओं के कारण है, जिसका असर स्टील और अन्य निर्माण सामग्रियों पर पड़ रहा है. इससे डेवलपर्स के मुनाफे पर भी दबाव बढ़ रहा है।  लगभग 20,000 डेवलपर्स का प्रतिनिधित्व करने वाले इन दोनों संगठनों ने निर्माण सामग्री की संभावित कमी के कारण रियल एस्टेट परियोजनाओं को पूरा करने में होने वाली देरी पर भी चिंता व्यक्त की है. रिपोर्ट्स के मुताबिक "स्टील, तार, पाइप और यहां तक कि कांच जैसी प्रमुख सामग्रियों की वर्तमान में कमी है. इसके अलावा, ईंधन से जुड़ी चुनौतियों के कारण सिरेमिक निर्माण जैसे क्षेत्र भी प्रभावित हुए हैं।  प्रोजेक्ट को पूरा करने में भी हो सकती है देरी एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह "संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो इससे निर्माण लागत में और वृद्धि हो सकती है और प्रोजेक्ट के पूरा होने की समय-सीमा प्रभावित हो सकती है।  इससे पहले, एनारॉक (Anarock) द्वारा किए गए एक विश्लेषण में कहा गया था कि मार्च की शुरुआत से हॉर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने रियल एस्टेट क्षेत्र को प्रभावित किया है. इसकी वजह से निर्माण सामग्री की लागत बढ़ गई है, सप्लाई चेन बाधित हुई है और परियोजनाओं में देरी या उनके रुकने का जोखिम बढ़ गया है।  स्टील की छड़ों की बढ़ती कीमतों का असर मुंबई, दिल्ली-एनसीआर और हैदराबाद जैसे ऊंची इमारतों वाले बाजारों में निर्माण कार्य पर पड़ने की आशंका है. साथ ही, इससे लग्जरी घरों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं, क्योंकि डेवलपर्स द्वारा दरों में 5% से अधिक की वृद्धि किए जाने की संभावना है। 

लोकसभा में सीटों का विस्तार, महिलाओं को मिलेगा 2029 से रिजर्वेशन, सरकार लाएगी नया संशोधन बिल

नई दिल्ली लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने के लिए सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम लेकर आई थी. यह बिल पारित हो जाने के बावजूद लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू नहीं हो सका है. अब सरकार जल्द से जल्द महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने, यह कानून लागू करने की तैयारी में है।  महिलाओं को आरक्षण देने के लिए सरकार अब संसद में संशोधन विधेयक लाएगी. इस बिल में लोकसभा सीटों के परिसीमन और सीटें बढ़ाने के लिए 2011 की जनगणना को ही आधार मानने का प्रावधान किया जाएगा. यह संशोधन विधेयक पारित होने के बाद नए परिसीमन में लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 816 हो जाएंगी. 816 सदस्यों वाली लोकसभा में 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगी।  गौरतलब है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम जो संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ था, उसमें यह प्रावधान था कि यह नई जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा. अब सूत्रों का कहना है कि सरकार इस हफ्ते नारी शक्ति अभिनंदन अधिनियम बिल में संशोधन लेकर आएगी. यह संशोधन इसलिए लाया जा रहा है, जिससे 2029 के लोकसभा चुनाव तक महिला आरक्षण लागू किया जा सके।  संविधान संशोधन लाने की भी तैयारी सरकार की तैयारी नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के साथ ही संविधान संशोधन लाने की भी है. यह संविधान संशोधन इसलिए लाया जाएगा, जिससे साल 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा में सीटें बढ़ाई जा सकें और 2029 के आम चुनाव में महिला आरक्षण लागू किया जा सके. साल 2011 की जनगणना के आधार पर 2029 के लोकसभा चुनाव में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती है. इसमें महिलाओं के लिए 273 सीटें आरक्षित की जा सकती हैं।  गृह मंत्री ने की विपक्ष के नेताओं से बात सरकार ने इसे लेकर विपक्षी दलों के नेताओं से बातचीत भी शुरू कर दी है. गृह मंत्री अमित शाह ने महिला आरक्षण बिल में संशोधन को लेकर शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (शरद पवार) जैसे विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बातचीत की है. शुरुआत में गृह मंत्री ने छोटे विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बातचीत की है. कांग्रेस जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टी और अन्य बड़े दलों के नेताओं के साथ बातचीत अभी बाकी है। 

लारीजानी की मौत के बाद ईरान को नया सुरक्षा प्रमुख, बागेर को सौंपी गई कमान

ईरान ईरान में सुरक्षा परिषद के प्रमुख अली लारीजानी की मौत के बाद देश में बड़ा नेतृत्व परिवर्तन हुआ है। मोहम्मद बागेर जुल्घदर को नया सिक्योरिटी चीफ नियुक्त किया गया है। हाल ही में इजरायली हवाई हमलों में लारीजानी की मौत हो गई, जिसके साथ उनका बेटा मोर्तेजा लारीजानी और उनके कार्यालय के प्रमुख अलिरेजा बयात भी शहीद हो गए। यह घटना 17 मार्च को तेहरान के बाहरी इलाके में हुई, जब वे अपनी बेटी के घर जा रहे थे। लारीजानी ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (SNSC) के सचिव थे और देश की रक्षा, परमाणु व विदेश नीति के प्रमुख वास्तुकार माने जाते थे।  

सरकार का दावा: सभी रिफाइनरियां पूरी क्षमता पर, 18,700 टन LPG की रिकॉर्ड सप्लाई

नई दिल्ली सरकार ने मंगलवार को बताया कि देश की सभी गैस रिफाइनरियां पूरी क्षमता के साथ काम कर रही हैं और सोमवार तक 18,700 टन कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति की जा चुकी है। अंतर-मंत्रालयी ब्रीफिंग में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि सभी रिफाइनरियां उच्च क्षमता पर चल रही हैं और देश में पेट्रोल व डीजल का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। सरकार देश भर में पीएनजी कनेक्शन बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। उन्होंने बताया कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (पीएनजीआरबी) ने सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (सीजीडी) कंपनियों को निर्देश दिया है कि जहां सुविधा उपलब्ध हो, वहां 5 दिनों के अंदर स्कूलों, कॉलेजों और आंगनवाड़ी किचन में पीएनजी कनेक्शन दिया जाए। उनके अनुसार, सोमवार को देश के 110 प्रमुख क्षेत्रों में करीब 7,500 घरेलू और व्यावसायिक पीएनजी कनेक्शन दिए गए। शर्मा ने कहा कि देश में 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं और ज्यादातर सामान्य रूप से काम कर रहे हैं, जहां पेट्रोल और डीजल का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। उन्होंने यह भी बताया कि एलपीजी की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं और सरकार आपूर्ति के स्रोतों को बढ़ाने पर भी काम कर रही है ताकि स्थिति स्थिर बनी रहे। साथ ही, राज्यों से निगरानी और व्यवस्था को मजबूत करने की अपील की गई है। उन्होंने कहा कि देश में एलएनजी का भी पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। मार्च के पहले तीन हफ्तों में 3.5 लाख से ज्यादा घरेलू और व्यावसायिक पीएनजी कनेक्शन दिए गए हैं, जबकि एलपीजी सिलेंडर की डिलीवरी सामान्य रूप से जारी है और घबराहट में बुकिंग में काफी कमी आई है। वर्तमान के भू-राजनीतिक हालात को देखते हुए एलपीजी सप्लाई पर लगातार नजर रखी जा रही है, लेकिन कहीं भी गैस खत्म होने की स्थिति सामने नहीं आई है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के अनुसार, किसी भी पेट्रोल पंप पर ईंधन की कमी नहीं है और सप्लाई नियमित रूप से जारी है। सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे घबराहट में खरीदारी न करें, क्योंकि पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। जरूरी सेक्टरों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिसमें घरेलू पीएनजी और सीएनजी ट्रांसपोर्ट को 100 प्रतिशत सप्लाई दी जा रही है, जबकि औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को करीब 80 प्रतिशत सप्लाई दी जा रही है।