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Semicon India 2026 का आज होगा आगाज, 600+ प्रदर्शक और 300 ग्लोबल कंपनियां जुटेंगी

नई दिल्ली  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज  यहां तीन दिवसीय सेमीकॉन इंडिया 2026 का उद्घाटन करेंगे. इसमें वैश्विक चिप निर्माता, नीति निर्माता और निवेशक और प्रौद्योगिकी कंपनियां एक साथ आएंगी, क्योंकि भारत अपने सेमीकंडक्टर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का प्रदर्शन करेगा।  द्वारका के यशोभूमि में 'सिलिकॉन टू सिस्टम्स: बिल्डिंग द इकोसिस्टम' थीम के तहत हो रहा यह इवेंट इस बात पर जोर देता है कि भारत अब यह नहीं पूछ रहा है कि वह चिप्स बना सकता है या नहीं, बल्कि अब वह यह पूछ रहा है कि वह अपने आस-पास सब कुछ कितनी तेजी से बना सकता है।  तीन दिनों में 600 से अधिक प्रदर्शक, 300 अंतरराष्ट्रीय कंपनियां 15,000 वर्ग मीटर स्थान को भर देगी और 150 से अधिक प्रसिद्ध वक्ता ज्ञान और बुद्धिमत्ता को साझा करेंगे. छह देश मंडप और 12 राज्य मंडप एक स्टार्टअप शोकेस, एक छात्र हैकथॉन, एक श्रमिक विकास मंडप और महिला फोरम के साथ बैठेंगे. इनमें से प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र की एक छोटी झलक जिसे भारत ने पांच साल में बनाया है देखा जा सकता है. एक सरकारी विज्ञप्ति में कहा गया है।  गौरतलब है कि चिप को डिजाइन करने में सालों और बनाने में महीनों लग जाते हैं, लेकिन इसका असर हर फोन, हर कार, हर अस्पताल के उपकरण पर लंबे समय तक रहता है. आज हमारे जीवन का हर उपकरण इस बात पर निर्भर करता है कि किसी ने, कहीं न कहीं, उस चिप को पहले बनाया है।  चिप्स अब एक आला उत्पाद नहीं हैं. वे कारों, ड्रोन, हवाई जहाज, एमआरआई मशीनों और उपग्रहों के अंदर होते हैं. फिलहाल, वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग का मूल्य लगभग 4.3 ट्रिलियन डॉलर है और यह तेजी से बढ़ रहा है. सेमीकंडक्टर इस बढ़ते ढांचे के ठीक आधार पर हैं, इसकी नींव बनाते हैं. ऑटोमोबाइल, हेल्थकेयर से लेकर डिफेंस तक हर दूसरा उद्योग इस बात पर निर्भर करता है कि चिप फैब्रिकेशन प्लांट से क्या निकलता है. यही बात सेमीकंडक्टर को एक आधारभूत उद्योग बनाती है. बयान में कहा गया है।  दुनिया ने यह मुश्किल तरीके से सीखा. उदाहरण के लिए कोविड महामारी के दौरान कार फैक्ट्रियों को बंद करना पड़ा. स्टील या लेबर की कमी की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि उन्हें चिप्स नहीं मिल पा रहे थे. जिन देशों ने दशकों तक सेमीकंडक्टर को किसी और की समस्या माना था, वे अचानक अपनी कैपेसिटी बनाने के लिए दौड़ पड़े. महामारी ने चिप्स की रेस नहीं लगाई. इसने बस सभी को और तेज दौड़ने पर मजबूर कर दिया,' इसमें कहा गया।  सेमीकंडक्टर में भारत की दिलचस्पी उससे भी पुरानी है जितना ज़्यादातर लोग सोचते हैं. दशकों की चुपचाप कोशिशें, छोटी शुरुआत, और मुश्किल से सीखे गए सबक. लंबे समय से यह इच्छा थी, लेकिन इसके आस-पास का इकोसिस्टम कभी ठीक से नहीं बन पाया. यह एक अलग नजरिए से बदल गया. विदेशी निवेश, टैक्स और कस्टम में सुधारों ने इसके लिए दरवाजे खोल दिए. ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों ने धीरे-धीरे भारत में मैन्युफैक्चरिंग लाइनें लगानी शुरू कर दी और इसके नतीजों को नकारना मुश्किल है।  सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार 2014-15 में भारत ने लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये मूल्य के इलेक्ट्रॉनिक्स सामान का उत्पादन किया. 2025-26 तक यह संख्या 13.11 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई, जो सात गुना वृद्धि है. इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात लगभग 38,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.24 लाख करोड़ रुपये हो गया जो ग्यारह गुना वृद्धि है।  मोबाइल फोन एक और भी तीखी कहानी बताते हैं. उत्पादन 33 गुना बढ़ा 18,000 करोड़ रुपये से 6.27 लाख करोड़ रुपये हो गया. निर्यात 165 गुना बढ़ा, लगभग 1,500 करोड़ रुपये से 2.59 लाख करोड़ रुपये हो गया. 2014 में भारत के शीर्ष 100 निर्यात किए गए सामानों में स्मार्टफ़ोन भी शामिल नहीं थे।  वित्त वर्ष 2025-26 में स्मार्टफोन भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट किया जाने वाला कमोडिटी बन गया. पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और जेम्स एंड ज्वेलरी से भी आगे. भारत अब अपने इस्तेमाल होने वाले 99.2 फीसदी फोन खुद बनाता है, और मोबाइल के नेट इंपोर्टर से नेट एक्सपोर्टर बन गया है. यह पूरा मैन्युफैक्चरिंग इंजन अब 2.5 मिलियन नौकरियों को सपोर्ट करता है, ऐसा कहा गया।  एक देश जो कभी इलेक्ट्रॉनिक्स में गलत शुरुआत के लिए जाना जाता था, अब वॉल्यूम के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरर है. भारत का सेमीकंडक्टर पुश अब सिर्फ एक घरेलू कहानी नहीं है. इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के पाँचवें दिन, भारत औपचारिक रूप से पैक्स सिलिका कोएलिशन में शामिल हो गया. इसमें कहा गया है कि यह कोएलिशन अमेरिका और दूसरे पार्टनर देशों को एक साथ लाता है, जो ग्लोबल सिलिकॉन सप्लाई चेन को सुरक्षित करने पर फोकस करता है।  बयान में आगे कहा गया, 'इसका लक्ष्य जरूरी मिनरल और फैब्रिकेशन से लेकर एडवांस्ड एआई सिस्टम और डिप्लॉयमेंट इंफ़्रास्ट्रक्चर तक पूरे 'सिलिकॉन स्टैक' को सुरक्षित करना है. मिशन आसान है. जरूरी सामान का प्रोडक्शन और डिलीवरी सिर्फ कुछ कंपनियों, देशों या लोगों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए. आर्थिक दबाव का विरोध करें. इस सदी को तय करने वाली टेक्नोलॉजी को खुले, लोकतांत्रिक देशों के हाथों में रखें. भारत के लिए यह इस बात का सबूत है कि उसके सेमीकंडक्टर के सपने अब उसकी अपनी सीमाओं से कहीं आगे तक पहुँच गए हैं। 

अमेरिका-भारत ट्रेड टेंशन बढ़ी, 100% टैरिफ लगाने की तैयारी

 नई दिल्ली अमेरिका अब भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है। खबर है कि रूसी प्रतिबंधों से जुड़े इस बिल पर मतदान होना है। दरअसल, इस विधेयक में एक संशोधन का भी प्रस्ताव दिया गया है, जिसमें भारत समेत कई देशों का नाम जोड़ने की बात कही गई थी। कहा जा रहा है कि बुधवार को इस पर मतदान होना है, जहां संभावनाएं जताई जा रही हैं कि यह बिल पास हो सकता है। इसका नाम लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट है। अमेरिकी सीनेट में इसे 86-11 वोट से पास कर दिया गया था। अब अगर यह बिल प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पास हो जाता है, तो अमेरिका के राष्ट्रपति को रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का अधिकार मिल जाएगा। खास बात है कि 3 नवंबर को मिड टर्म चुनाव होने हैं और सदन के महज 4 दिन ही बचे हैं। बिल में क्या इस विधेयक के जरिए अमेरिकी सरकार रूस के नेतृत्व और एनर्जी सेक्टर पर प्रतिबंध लगाना चाहती है। साथ ही उन जहाजों पर भी बैन लगाना चाहता है, जिनकी मदद से रूस तेल सप्लाई पर लगी पाबंदियों को दरकिनार कर आसानी से तेल आगे बढ़ाता है। इसे शैडो फ्लीट या गुप्त बेड़ा भी कहा जाता है। अमेरिका दावा करता रहा है कि रूस कच्चे तेल की मदद से ही यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए पैसा जुटा रहा है। इन देशों का नाम डेमोक्रेट सांसद स्टेनी होयर ने संशोधन पेश किया गया था, जिसमें देशों के नाम जोड़ने का प्रस्ताव था। इनमें चीन, भारत, तुर्किए, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक गणराज्य, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाकिस्तान और किर्गिज रिपब्लिक को शामिल करने की मांग गई थी। इन देशों पर 100 फीसदी शुल्क लगाया जा सकता है। इसे प्रतिनिधि सभा में पारित किया जाना बेहद जरूरी है। इससे पहले जब इसे सीनेट में पास किया गया था, तब इसमें उन देशों के नाम शामिल नहीं किए गए थे। हालांकि, ऐसे 5 बड़े इम्पोर्टर्स के नामों को जोड़ा गया था, जो सबसे ज्यादा तेल और गैस खरीदते हैं। पहले भी बनाया भारत को निशाना खास बात है कि बीते साल भी अमेरिका ने भारत को रूसी तेल का हवाला कर निशाना बनाया था। तब भारत पर 25 और 25 फीसदी यानी कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया गया था। हालांकि, बाद में इसे कम किया गया। इतना ही नहीं अमेरिकी सरकार के कई नेताओं ने भारत की आपत्तिजनक शब्दों में आलोचना भी की थी। फिलहाल, दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर बातचीत चल रही है। कई नेता विरोध में भी खबरें हैं कि हकीम जेफ्रीज समेत कई डेमोक्रेटिक नेता इस बिल के विरोध में भी हैं। कुछ सांसदों की तरफ से बयान जारी किया गया था, 'प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक सदस्य यूक्रेन के समर्थन में पूरी मजबूती से खड़े हैं लेकिन लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट से फायदा होने के बजाय नुकसान अधिक होगा।' उन्होंने कहा, 'यह विधेयक शुल्क लगाने के राष्ट्रपति के अधिकारों का बहुत अधिक विस्तार करेगा लेकिन रूस पर प्रतिबंध लगाना अनिवार्य नहीं बनाएगा। ये दोनों ही बातें अस्वीकार्य हैं। इन खामियों के कारण अमेरिकियों के लिए वस्तुएं महंगी होंगी और दीर्घकाल के लिहाज से यूक्रेन के लिए समर्थन कमजोर होगा।'

एक विचार और कार्यशैली की यात्रा गुजरात से विकसित भारत तक—संकल्प, निर्णय और जनभागीदारी

नरेंद्र मोदी के सरकार के शीर्ष नेतृत्व में 25 वर्ष केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि एक विकसित होती शासन-दृष्टि और कार्यशैली का परिचय हैं। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुई यह यात्रा आज विकसित भारत 2047 के संकल्प तक पहुँच चुकी है। गुजरात में जल संकट, सूखा और क्षेत्रीय असमानताओं जैसी चुनौतियों के बीच जल-संरक्षण, सिंचाई, कृषि, बिजली और बुनियादी ढाँचे को प्राथमिकता दी गई। SWAGAT जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से तकनीक, निगरानी और जवाबदेही को प्रशासन का हिस्सा बनाया गया। प्रधानमंत्री बनने के बाद यही सोच राष्ट्रीय स्तर पर जनधन, उज्ज्वला, स्वच्छ भारत, आवास, आयुष्मान भारत और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में दिखाई दी। लक्ष्य रहा कि विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और नागरिक के जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो। डिजिटल इंडिया, UPI और DBT ने तकनीक को शासन का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया, वहीं Make in India और आत्मनिर्भर भारत ने भारत को वैश्विक विनिर्माण और नवाचार का केंद्र बनाने की दिशा में प्रयासों को गति दी। GST, अनुच्छेद 370 से संबंधित संवैधानिक परिवर्तन, नई शिक्षा नीति और महिला आरक्षण जैसे निर्णयों ने राष्ट्रीय नीति-विमर्श को प्रभावित किया। इन पर समर्थन और आलोचना दोनों हुए, लेकिन कठिन विषयों पर निर्णय लेने की प्रवृत्ति मोदी की कार्यशैली की प्रमुख पहचान बनी। अब लक्ष्य विकसित भारत 2047 है—एक ऐसा भारत जो आर्थिक रूप से मजबूत होने के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिला भागीदारी, कृषि, तकनीक और नवाचार में भी सक्षम हो। 25 वर्ष पीछे देखने का अवसर हैं, लेकिन 2047 आगे देखने का संकल्प है। नेतृत्व दिशा दे सकता है, लेकिन विकसित भारत का निर्माण जनता की सामूहिक भागीदारी से ही होगा। संकल्प से सिद्धि तक की यात्रा जारी है।

भारतीय वॉरशिप के सामने आया पाकिस्तानी जहाज, समुद्र में टक्कर से मची खलबली

मुंबई  भारत और पाकिस्तान के बीच समुद्री मोर्चे पर तनाव बढ़ाने वाली एक घटना सामने आई है। 15 सितंबर की शाम उत्तर अरब सागर में भारतीय नौसेना के एक फ्रंटलाइन युद्धपोत और पाकिस्तान नौसेना के एक जहाज के बीच टक्कर हो गई। सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तानी नौसैनिक जहाज एक नियमित निगरानी मिशन पर तैनात भारतीय युद्धपोत के बेहद करीब तेज गति से आया और इस दौरान उसने गैर-पेशेवर तथा असुरक्षित तरीके से मैन्युवरिंग की। इसी वजह से दोनों जहाजों की टक्कर हुई। हालांकि, टक्कर में किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं है। घटना के बाद भारत ने इसे गंभीरता से लिया है और पाकिस्तान के राजनयिक को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। अचानक सामने आया पाकिस्तानी जहाज अरब सागर के समंदर में दो देशों के युद्धपोतों के बीच सुरक्षित दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी होता है. खासकर तब, जब दोनों जहाज अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में काम कर रहे हों. इस घटना में भारतीय युद्धपोत अपनी नियमित निगरानी ड्यूटी कर रहा था. तभी पाकिस्तानी नौसेना का जहाज उसकी तरफ तेजी से बढ़ा. पाकिस्तानी जहाज ने जिस तरह से समुद्र में अपनी दिशा बदली, वह सुरक्षित नौवहन के नियमों के अनुरूप नहीं था. इसके बाद पाकिस्तानी जहाज ने भारतीय युद्धपोत को टक्कर मार दी. हालांकि, इस घटना में किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं है।  समंदर में इतनी हलचल क्यों मची? क्योंकि मामला भारत और पाकिस्तान की नौसेनाओं से जुड़ा है. इसलिए यह भिड़ंत काफी अहम है. दोनों देशों के बीच संबंध पहले से ही संवेदनशील हैं. ऐसे में समुद्र में दोनों देशों के युद्धपोतों का इस तरह आमने-सामने आना चिंता बढ़ाने वाला है. हालांकि, यह बात साफ है कि यह घटना को सैन्य हमला नहीं है. भारत की ओर से इसे पाकिस्तानी जहाज की असुरक्षित और गैर-पेशेवर गतिविधि से जुड़ी घटना बताया गया है. यही वजह है कि भारत ने मामले को केवल नौसेना स्तर तक सीमित नहीं रखा. इसे राजनयिक स्तर पर भी उठाया गया।  भारत ने पाकिस्तान के राजनयिक को किया तलब घटना के बाद भारत ने आज यानी बुधवार को नई दिल्ली में पाकिस्तान के टॉप राजनयिक प्रतिनिधि को तलब किया. भारत ने इस मामले पर औपचारिक विरोध दर्ज कराया. विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तानी नौसैनिक जहाज का व्यवहार अस्वीकार्य और गैर-पेशेवर था. भारत ने पाकिस्तान से कहा कि उसके सैन्य जहाजों को समुद्र में उचित सावधानी बरतनी चाहिए. साथ ही दोनों देशों के बीच हुए संबंधित समझौतों का पालन करना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटना दोबारा न हो।  1991 के समझौते का क्यों आया जिक्र? भारत ने इस घटना को अप्रैल 1991 में हुए भारत-पाकिस्तान समझौते से भी जोड़ा है. इस समझौते का मकसद सैन्य अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिक गतिविधियों को लेकर दोनों देशों के बीच गलतफहमी और दुर्घटना का खतरा कम करना था. इसके अनुच्छेद 10 में दोनों देशों के नौसैनिक जहाजों और पनडुब्बियों के बीच अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षित दूरी बनाए रखने की बात कही गई है. उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक, दोनों देशों के जहाजों को एक-दूसरे के तीन नॉटिकल मील के भीतर नहीं आना चाहिए. यानी इस तरह के समझौते का मकसद ही यह है कि दोनों देशों की सैन्य इकाइयां समुद्र में इस तरह की स्थिति पैदा न करें, जिससे टक्कर या किसी बड़े सैन्य विवाद का खतरा पैदा हो।  ऐसा पहले भी हो चुका है भारत और पाकिस्तान की नौसेनाओं के बीच समुद्र में टकराव का विवाद नया नहीं है. जून 2011 में भी आईएनएस गोदावरी और पाकिस्तान नौसेना के पीएनएस बाबर को लेकर विवाद हुआ था. उस समय दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए थे. भारत ने पाकिस्तान के जहाज पर जोखिम भरे तरीके से चलने का आरोप लगाया था और 1991 के समझौते के अनुच्छेद 10 का हवाला देते हुए विरोध दर्ज कराया था. इससे साफ है कि समुद्र में दोनों देशों के युद्धपोतों के बीच सुरक्षित दूरी और संचार कितना अहम है।  अब आगे क्या होगा? फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि इस घटना में किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं है. लेकिन भारत ने इसे गंभीरता से लेते हुए राजनयिक स्तर पर विरोध दर्ज कराया है. भारत ने पाकिस्तान से अपने नौसैनिक जहाजों को सावधानी बरतने और दोनों देशों के बीच मौजूद समझौतों का सम्मान करने को कहा है. साथ ही भारत के इस्लामाबाद स्थित प्रभारी राजदूत को भी पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के सामने इसी तरह का विरोध दर्ज कराने का निर्देश दिया गया है. यानी समुद्र में हुई एक टक्कर अब कूटनीतिक मुद्दा भी बन गई है. आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान इस घटना पर क्या प्रतिक्रिया देता है और दोनों देशों की नौसेनाएं भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए क्या कदम उठाती हैं।  कैसे हुई टक्कर? सूत्रों के मुताबिक, भारतीय नौसेना का फ्रंटलाइन युद्धपोत उत्तर अरब सागर में नियमित निगरानी मिशन पर था। इसी दौरान पाकिस्तान नौसेना का एक जहाज तेज गति से भारतीय युद्धपोत के करीब आया। बताया जा रहा है कि पाकिस्तानी जहाज की मैन्युवरिंग को असुरक्षित और गैर-पेशेवर माना गया। दोनों जहाजों के बीच पर्याप्त दूरी नहीं रह गई और आखिरकार उनकी टक्कर हो गई। फिलहाल सार्वजनिक तौर पर दोनों जहाजों के नाम और टक्कर की सटीक लोकेशन जैसी तकनीकी जानकारी सामने नहीं आई है। बड़ा नुकसान नहीं, फिर भी भारत ने क्यों जताई नाराजगी? घटना में फिलहाल किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं है, लेकिन मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में दोनों देशों के युद्धपोतों की सुरक्षित दूरी और संचालन को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच पहले से समझौता मौजूद है। भारत के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को नई दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन के कार्यवाहक राजदूत को तलब किया। उनके सामने पाकिस्तानी नौसैनिक इकाइयों के व्यवहार को “अस्वीकार्य और गैर-पेशेवर” बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया गया। भारत ने कहा कि इस घटना में पाकिस्तानी नौसैनिक जहाज का आचरण अप्रैल 1991 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य अभ्यासों, युद्धाभ्यासों और सैनिकों की आवाजाही के बारे में अग्रिम सूचना पर समझौता के आर्टिकल 10 के सीधे खिलाफ था। 1991 के समझौते में क्या है? भारत और पाकिस्तान ने अप्रैल 1991 में सैन्य गतिविधियों से जुड़ी गलतफहमियों और दुर्घटनाओं को रोकने के लिए एक … Read more

शहजाद भट्टी नेटवर्क अब UAPA के दायरे में, केंद्र सरकार ने आतंकी संगठन घोषित किया

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने पाकिस्तान से संचालित 'शहज़ाद भट्टी नेटवर्क' पर बड़ा ऐक्शन लेते हुए उसे गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन घोषित किया है। बुधवार (16 सितंबर) को गृह मंत्रालय (MHA) ने इसका ऐलान करते हुए कहा कि 'शहज़ाद भट्टी नेटवर्क' को गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आतंकवादी संगठन घोषित किया जाता है। गृह मंत्रालय ने कहा कि यह समूह हथियारों, विस्फोटकों और नशीले पदार्थों की सीमा-पार तस्करी में शामिल है, साथ ही यह युवाओं और छोटे-मोटे अपराधियों को आतंकवाद की ओर उकसाता भी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कार्यालय की तरफ से सोशल मीडिया एक्स पर एक आधिकारिक पोस्ट में कहा गया है, “आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस (सख्त रुख) की प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी की सोच को आगे बढ़ाते हुए, गृह मंत्रालय ने UAPA के तहत शाहज़ाद भट्टी नेटवर्क को आतंकवादी संगठन घोषित किया है। यह समूह हथियारों, विस्फोटकों और नशीले पदार्थों की सीमा-पार तस्करी में शामिल है और युवाओं तथा छोटे-मोटे अपराधियों को आतंकवाद के लिए उकसाता है। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और सांप्रदायिक सद्भाव को निशाना बनाते हुए, यह सिंडिकेट नफरत फैलाने वाला डिजिटल कंटेंट भी प्रकाशित करता था।” क्या है शाहजाद भट्टी नेटवर्क? गृह मंत्रालय के अनुसार, ‘शाहज़ाद भट्टी नेटवर्क (SBN)’ एक ऐसा संगठन है जिसका मकसद भोले-भाले युवाओं और स्थानीय अपराधियों को शामिल करके सीमा पार से हथियार, विस्फोटक और नशीले पदार्थों की तस्करी करना है। साथ ही, आतंकवादी गतिविधियों के ज़रिए देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, सांप्रदायिक सद्भाव और आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करना भी इसका मकसद है। इस साल के जश्न-ए-आजादी से ठीक पहले भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान से संचालित होने वाले इस आतंकी नेटवर्क के खिलाफ 14 राज्यों में एक साथ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की थी और उसके 200 से अधिक गुर्गों को गिरफ्तार किया था। मंत्रालय के मुताबिक, 'शाहज़ाद भट्टी नेटवर्क (SBN)’ हिंसक गतिविधियों के ज़रिए आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ती है। साथ ही, यह संगठन भड़काऊ संदेश फैलाने के लिए अलग-अलग डिजिटल कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहा है, जो देश की अखंडता के लिए एक बड़ी चुनौती है। यह नेटवर्क सोशल मीडिया के जरिए देश भर में हिंसा और जासूसी का नेटवर्क फैलाता था। ये नेटवर्क इंस्टाग्राम-फेसबुक से 'आतंकी भर्ती' करता था। उसके निशाने पर जेन-जी यानी 18 से 23-30 साल तक के बेरोजगार युवक हुआ करते थे।

मक्का के करीब ड्रोन का खतरा, सऊदी के कई शहरों में बढ़ी सुरक्षा

 दुबई  सऊदी अरब और हूतियों के बीच जंग फिर तेज हो गई है. दक्षिणी सऊदी के शहरों पर मिसाइल और ड्रोन हमले हुए हैं, मक्का की तरफ भेजे गए ड्रोन को मार गिराने का सऊदी ने दावा किया है. यानबू में तेल लोडिंग रोक दी गई है और यमन में सऊदी गठबंधन के हवाई हमले जारी हैं।   हूतियों ने दक्षिणी सऊदी अरब में नए मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं. खमिस मुशैत, अबहा और ताइफ जैसे शहरों में नागरिक और सैन्य इलाकों को निशाना बनाए जाने की खबर है. इन हमलों में 13 नागरिक घायल हुए, घरों को नुकसान पहुंचा और किंग खालिद एयर बेस के पास आग लगने की खबर सामने आई।  इस जंग का असर सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों और अहम समुद्री रास्तों पर भी दिख रहा है. हूतियों ने लाल सागर और बाब अल-मंदब स्ट्रेट के आसपास अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं. इसी बीच सऊदी अरब ने मक्का की तरफ हूतियों की तरफ से भेजे गए ड्रोन को इंटरसेप्ट कर नष्ट करने का दावा किया है. हालिया ड्रोन हमलों के बाद यानबू बंदरगाह पर तेल की लोडिंग भी रोक दी गई है।  सऊदी अरब ने हूती हमलों के खिलाफ कड़ी सैन्य कार्रवाई की बात कही है. इसके बाद सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने पश्चिमी और उत्तरी यमन में हूतियों के ठिकानों पर दर्जनों हवाई हमले किए हैं. वहीं अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए अपनी ट्रैवल एडवाइजरी को लेवल 3 कर दिया है और नागरिकों से सऊदी की यात्रा पर दोबारा विचार करने को कहा है. ऐसे में सऊदी-हूती जंग से जुड़े हर बड़े अपडेट के लिए जुड़े रहिए।  मक्का-मदीना पर हमलों के दावे को लेकर OIC ने की निंदा ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी OIC के महासचिवालय ने मक्का और मदीना क्षेत्र पर हूतियों के हमलों और सऊदी अरब के खिलाफ जारी हमलों की निंदा की है. OIC ने कहा कि पवित्र स्थलों, मस्जिदों और नागरिक ठिकानों पर हमले इस्लामी मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं।  OIC ने सऊदी अरब के साथ पूरी एकजुटता जताई है. संगठन ने पवित्र स्थलों, आम लोगों, सुरक्षा और सऊदी अरब की संप्रभुता की रक्षा के लिए उठाए जा रहे कदमों का समर्थन किया है।  Yemen PM ने कहा- बढ़ता हमला अब पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए खतरा यमन के प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी ने हूतियों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों को लेकर चिंता जताई है. अदन में उन्होंने संसद के डिप्टी स्पीकर मोहम्मद अल-शद्दादी से मुलाकात की. प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, बैठक में हूतियों की सैन्य बढ़त, नागरिकों और विस्थापित लोगों के खिलाफ कथित उल्लंघन और सरकारी संस्थानों के बीच तालमेल पर चर्चा हुई।  अल-जिंदानी ने कहा कि हूतियों की बढ़त अब सिर्फ यमन का अंदरूनी सैन्य मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गई है. उन्होंने हूतियों को ईरान से मिलने वाले समर्थन का भी आरोप लगाया. उनके मुताबिक, सऊदी अरब पर हूतियों के मिसाइल और ड्रोन हमलों को यमन के पश्चिमी तट पर बढ़ी सैन्य गतिविधियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।  हूती हमलों के बीच मिस्र क्यों गए थे सऊदी क्राउन प्रिंस? सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने मंगलवार को काहिरा में मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी से मुलाकात की. यह बैठक ऐसे वक्त हुई है जब हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी अरब के शिपिंग और तेल से जुड़े ठिकानों पर दबाव बढ़ा है. दोनों नेताओं ने लाल सागर और बाब अल-मंदब स्ट्रेट में समुद्री आवाजाही की आजादी और सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता दोहराई।  मिस्र के राष्ट्रपति कार्यालय ने सऊदी अरब को समर्थन देने की बात कही है. हालांकि, दोनों पक्षों ने आगे उठाए जाने वाले किसी ठोस कदम की जानकारी नहीं दी. रिपोर्ट के मुताबिक, मिस्र सऊदी अरब को सैन्य मदद देने की संभावना कम है, लेकिन अरब दुनिया में उसका प्रभाव है और वह सऊदी अरब के समर्थन में दूसरे देशों को साथ लाने में मदद कर सकता है।   अल-जौफ में सऊदी समर्थित बलों से सीधी भिड़ंत का दावा यमन में हूतियों और सऊदी समर्थित बलों के बीच जंग और तेज होती दिख रही है. हूती समर्थक मीडिया ने एक वीडियो जारी किया है, जिसमें सऊदी समर्थित बलों के साथ सीधी भिड़ंत का दावा किया गया है. करीब से शूट किए गए इस वीडियो में गोलीबारी और हमले होते दिखाई दे रहे हैं. हूती पक्ष के मुताबिक, यह लड़ाई अल-जौफ के पूर्वी इलाके में हुई।  वीडियो में लड़ाकों की आवाज भी सुनाई दे रही है. इसमें दुश्मन पर हमला करने और ऑपरेशन वाले इलाके के अंदर उसे निशाना बनाने की बात कही जा रही है. हालांकि, वीडियो में दिखाई दे रही जगह और इसमें किए गए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।  अल-जौफ के पूर्व में सऊदी समर्थित बलों से सीधी भिड़ंत का दावा हूती समर्थित मीडिया की ओर से जारी फुटेज में सऊदी समर्थित बलों के साथ सीधी भिड़ंत का दावा किया गया है. बताया गया है कि यह झड़प अल-जौफ के पूर्वी इलाके में हुई। वीडियो में इलाके में सऊदी समर्थित सैन्य जमावड़े को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया है. यह फुटेज अंसार अल्लाह की ओर से जारी किया गया है।   

EPFO से जुड़े करोड़ों कर्मचारियों को मिल सकता है फायदा, PF सैलरी लिमिट ₹25 हजार होने की संभावना

नई दिल्ली  देश के करोड़ों नौकरीपेशा कर्मचारियों के लिए एक बड़ी और महत्वपूर्ण खबर आ रही है. आज केंद्रीय कैबिनेट की अहम बैठक होने वाली है, कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) और कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) को लेकर एक बड़ा फैसला लिया जा सकता है. सरकार पीएफ और पेंशन के दायरे में आने वाले कर्मचारियों के लिए अनिवार्य मासिक वेतन सीमा को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे सकती है।  यदि कैबिनेट इस प्रस्ताव पर मुहर लगाती है, तो यह करीब 12 साल बाद पीएफ नियमों में होने वाला सबसे बड़ा सुधार होगा. इससे पहले आखिरी बार 1 सितंबर 2014 को इस सीमा को ₹6,500 से बढ़ाकर ₹15,000 किया गया था. इस नए फैसले से देश के संगठित क्षेत्र के करीब 1 करोड़ अतिरिक्त कर्मचारी सीधे तौर पर पीएफ और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आ जाएंगे।  किस पर और कैसे लागू होगा यह नया नियम? वर्तमान नियमों के अनुसार, जिन कर्मचारियों की बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ता (DA) मिलाकर ₹15,000 तक है, उनके लिए पीएफ खाता खोलना और उसमें योगदान देना अनिवार्य है. नई सीमा लागू होने के बाद, ₹25,000 तक की मासिक आय वाले सभी नए कर्मचारियों के लिए पीएफ और पेंशन फंड में योगदान करना जरूरी हो जाएगा।  हालांकि, ₹25,000 से अधिक बेसिक सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के लिए राहत की बात यह है कि उनके लिए इस योजना में शामिल होना पूरी तरह स्वैच्छिक रहेगा. वे अपनी इच्छा के अनुसार ही इसमें योगदान देने का फैसला कर सकते हैं।  इन-हैंड सैलरी और कंपनियों पर क्या पड़ेगा असर? इस फैसले का सीधा असर कर्मचारियों की टेक-होम (In-Hand) सैलरी पर पड़ेगा. जो कर्मचारी ₹15,000 से ₹25,000 के वेतन ब्रैकेट में आते हैं और अब तक पीएफ का हिस्सा नहीं थे, उनके वेतन से हर महीने पीएफ का 12% हिस्सा कटेगा. इस वजह से हर महीने उनके हाथ में आने वाली नगद सैलरी थोड़ी कम हो जाएगी, लेकिन दूसरी तरफ उनकी भविष्य की बचत और रिटायरमेंट फंड में तेजी से बढ़ोतरी होगी।  वहीं, उद्योगों और कंपनियों को वित्तीय बोझ से बचाने के लिए सरकार ने एक बीच का रास्ता निकाला है. प्रस्ताव के मुताबिक, कंपनियों को अपना पीएफ योगदान कैलकुलेट करने के लिए पुरानी ₹15,000 की लिमिट का इस्तेमाल जारी रखने की छूट मिल सकती है. इससे कंपनियों पर अचानक कोई बड़ा आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा. कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार जल्द ही इसकी आधिकारिक अधिसूचना जारी कर सकती है। 

2029 में देशभर में बढ़ सकते हैं पोलिंग स्टेशन, करीब 15.38 लाख मतदान केंद्रों का अनुमान

 नई दिल्ली भारत के चुनाव आयोग से सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी थी, इसमें देश में मौजूदा वोटिंग मशीनों की संख्या और 2029 के आम चुनाव से पहले नई मशीनों की खरीद की योजना से जुड़े सवाल पूछे गए थे. चुनाव आयोग के जवाब से संकेत मिलता है कि आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए देश के मतदान ढांचे का विस्तार किया जा रहा है।  आयोग के मुताबिक, 2029 का आम चुनाव देशभर में करीब 15.38 लाख पोलिंग स्टेशनों पर कराया जा सकता है. यह संख्या 2024 के लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल किए गए 10.52 लाख पोलिंग स्टेशनों के मुकाबले करीब 46 फीसदी अधिक है।  चुनाव आयोग के पास कितनी EVM?. RTI के जवाब में चुनाव आयोग ने बताया कि उसके पास फिलहाल करीब 30.48 लाख बैलेट यूनिट (BU) और 21.92 लाख कंट्रोल यूनिट (CU) उपलब्ध हैं. इन आंकड़ों की तुलना 2019 के लोकसभा चुनाव से करें तो उस समय चुनाव आयोग के पास करीब 14.88 लाख बैलेट यूनिट और 11.30 लाख कंट्रोल यूनिट थीं. यानी पिछले कुछ वर्षों में EVM का मौजूदा स्टॉक काफी बढ़ा है।  3.57 लाख बैलेट यूनिट और 1.25 लाख कंट्रोल यूनिट बदली जाएंगी 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग करीब 3.57 लाख बैलेट यूनिट और 1.25 लाख कंट्रोल यूनिट खरीदने की योजना बना रहा है, खास बात यह है कि आयोग ने इतनी ही संख्या में पुरानी मशीनों को रिटायर करने की भी योजना बताई है. इसका मतलब है कि नई EVM की खरीद से आयोग अपने कुल बेड़े को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की बजाय पुरानी मशीनों को नई मशीनों से बदलने की तैयारी कर रहा है. यानी 3.57 लाख बैलेट यूनिट और 1.25 लाख कंट्रोल यूनिट की खरीद लगभग वन-टू-वन रिप्लेसमेंट के तौर पर होगी।  EVM और VVPAT पर 486 करोड़ रुपये का खर्च चुनाव आयोग के मुताबिक, 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले EVM और VVPAT की खरीद पर करीब 486 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. VVPAT मशीन के जरिए मतदाता यह देख सकता है कि उसने जिस उम्मीदवार को वोट दिया है, उसकी पर्ची कुछ समय के लिए मशीन की पारदर्शी खिड़की के पीछे दिखाई देती है, इसके बाद यह पर्ची सीलबंद बॉक्स में चली जाती है। 

UPI और RuPay कार्ड से ₹2,000 तक का भुगतान रहेगा मुफ्त, वित्त मंत्रालय ने दी जानकारी

नई दिल्ली देश में यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड के इस्तेमाल पर लगने वाले शुल्कों को लेकर चल रही तमाम अटकलों पर केंद्र सरकार ने पूरी तरह से विराम लगा दिया है. वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग ने 14 सितंबर को एक आधिकारिक राजपत्र जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि दो हजार रुपये तक के यूपीआई लेन-देन और रुपे डेबिट कार्ड से भुगतान पर बैंक या कोई भी पेमेंट सिस्टम प्रदाता किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं वसूल सकते हैं।  सरकार ने यह कदम भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए के तहत मिले अधिकारों का उपयोग करते हुए उठाया है. इस नए आदेश के बाद बैंकों और भुगतान कंपनियों द्वारा ग्राहकों या दुकानदारों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, यानी किसी भी अन्य घुमावदार माध्यम से मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या कोई भी छिपा हुआ चार्ज वसूलने पर पूरी तरह कानूनी रोक लग गई है।  ग्राहक और दुकानदार दोनों को बड़ी राहत इस अधिसूचना में यह पूरी तरह स्पष्ट किया गया है कि यह नियम पैसे भेजने वाले (ग्राहक) और पैसे प्राप्त करने वाले (दुकानदार) दोनों पर समान रूप से लागू होगा. इसका सीधा मतलब यह है कि डिजिटल भुगतान करने पर ग्राहक से कोई अतिरिक्त फीस नहीं काटी जाएगी, और न ही ऐसा डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए किसी व्यापारी या छोटे दुकानदार से कोई चार्ज लिया जाएगा।  ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर क्या होगी स्थिति? इस नए आदेश से यह तो साफ हो गया है कि ₹2,000 तक के भुगतानों पर कोई सीधा या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं लगेगा. हालांकि, क्या ₹2,000 से अधिक के भुगतानों पर कोई चार्ज कटेगा और यदि हां, तो कितना? इस पर सरकारी राजपत्र में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं की गई है और मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर स्थिति अभी भी अस्पष्ट बनी हुई है. सूत्रों के मुताबिक, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) अगले एक हफ्ते के भीतर ₹2,000 से ज्यादा के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर लगने वाले चार्ज को लेकर नए नियम या गाइडलाइंस जारी कर सकता है।  हाल ही में सरकार ने कानून में संशोधन करने के लिए जो बिल पेश किया था, उसमें एक ऐसा ढांचा तैयार किया गया है जो भविष्य में कुछ चुनिंदा बड़े मर्चेंट भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने की अनुमति देता है. इसका मतलब है कि बैंक एक निश्चित सीमा से ऊपर के भुगतानों के लिए शुल्क ले सकेंगे. इस पर काफी चर्चा हुई थी, जिसके बाद सरकार ने स्पष्ट किया था कि आम जनता पर इसका कोई अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाएगा. व्यापक ढांचे के तहत, भविष्य की कोई भी एमडीआर व्यवस्था केवल एक निश्चित सीमा से ऊपर के कुछ चुनिंदा व्यापारिक लेन-देन तक ही सीमित रहेगी, जबकि आम लोगों के बीच होने वाले अन्य भुगतान पूरी तरह से मुफ्त बने रहेंगे।  बाहरी दबाव के दावों को बताया पूरी तरह गलत इसके साथ ही वित्त मंत्रालय ने उन सभी मीडिया रिपोर्ट्स और अफवाहों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें यह दावा किया जा रहा था कि सरकार किसी बाहरी प्रभाव या दबाव में आकर इस नीति में बदलाव कर रही है. मंत्रालय ने इन दावों को पूरी तरह से "झूठा, निराधार और भ्रामक" बताया है. सरकार का मुख्य मकसद छोटे डिजिटल लेन-देन को मुफ्त रखकर देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को और बढ़ावा देना है। 

सीरिया में डीजल की कीमतों ने मचाया हंगामा, एक झटके में 40% तक बढ़े दाम

दमिश्क कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग का असर दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल के दाम पर पड़ने लगा है। अभी भारत में फिलहाल राहत है, लेकिन सीरिया में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने पर लोगों का गुस्सा भड़क गया। वहां लोगों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने टायर जलाए और कई प्रमुख सड़कों को जाम कर दिया। इनमें राजधानी दमिश्क को औद्योगिक शहर अलेप्पो से जोड़ने वाला हाईवे भी शामिल है। एक झटके में 40% बढ़ा दिया डीजल का दाम रॉयटर्स के मुताबिक सीरिया की सरकार ने शनिवार को डीजल की कीमत 40% बढ़ाकर 175 सीरियाई पाउंड प्रति लीटर कर दी। यह करीब 1.32 डॉलर यानी लगभग ₹127 प्रति लीटर बैठता है। कीमतों में बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब सीरिया की करीब 90% आबादी गरीबी रेखा के नीचे रह रही है। सीरियाई गृहयुद्ध शुरू होने से पहले 2011 में यह आंकड़ा करीब एक-तिहाई था। पेट्रोल और गैस भी महंगी सरकार ने डीजल के अलावा कई अन्य ईंधनों की कीमतों में भी बढ़ोतरी की है। घरेलू और औद्योगिक गैस की कीमत करीब 9% बढ़ाई गई है। वहीं, 95 ऑक्टेन पेट्रोल 28% बढ़कर 195 पाउंड और 90 ऑक्टेन पेट्रोल 26% बढ़कर 185 पाउंड प्रति लीटर हो गया है। दुनिया के कई देशों में किमतें आसमान पर, लेकिन भारत में राहत युद्ध के बाद से भारत में अभी तक पेट्रोल-डीजल के रेट में करीब 8 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी की गई है। वहीं, पेट्रोल-डीजल महंगा करने वाले टॉप 5 देशों की बात करें तो नाइजीरिया पेट्रोल के मामले में टॉप पर है। यहां पेट्रोल 60.7 प्रतिशत महंगा हुआ है। जबकि, डीजल 92.3 प्रतिशत। यूएई में पेट्रोल 58.4 प्रतिशत महंगा हुआ है तो डीजल के दाम 70.6 प्रतिशत बढ़े हैं। म्यांमार में पेट्रोल 55.4 और डीजल 71.9 प्रतिशत महंगा हुआ है। मलेशिया में पेट्रोल करीब डेढ़ गुना महंगा हो गया तो डीजल के दाम 56 प्रतिशत से अधिक उछल गए हैं। अगर केवल डीजल की बात करें इंडेनेशिया दूसरा सबसे अधिक महंगाई की मार झेल रहा है। यह डीजल करीब 87 प्रतिशत महंगा हो चुका है। इसके बाद लेबनान है जहां डीजल 80 प्रतिशत महंगा हुआ है। रूस से तेल सप्लाई पर भी दबाव सीरिया के ऊर्जा मंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुलहमीद सलात के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर ईंधन खरीद की लागत बढ़ने और आयात पर सीरिया की भारी निर्भरता के कारण यह फैसला लिया गया है। परिस्थितियां बदलने पर कीमतें फिर घटाई या बढ़ाई जा सकती हैं। सीरिया इस साल रूस से करीब 60,000 बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन आयात कर रहा है। हालांकि दमिश्क ने अमेरिका से कहा है कि वह रूसी तेल की खरीद में भारी कटौती करने को तैयार है। यूक्रेन के रूसी रिफाइनरियों पर हमलों से रूस में ईंधन उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके बाद मॉस्को ने पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर भी पाबंदियां लगाई हैं। इससे सीरिया की तेल क सप्लाई पर दबाव और बढ़ गया है। सबसे बड़ी बनियास रिफाइनरी बंद: इसके अलावा सीरिया की सबसे बड़ी बनियास रिफाइनरी करीब तीन महीने से बंद है। यहां पहली बार बड़े स्तर पर रखरखाव का काम चल रहा है, जिससे ईंधन की कमी और गहरा गई है। फरवरी से पेट्रोल 86% और डीजल दोगुने से ज्यादा महंगा नई बढ़ोतरी के बाद सीरिया में 95 ऑक्टेन पेट्रोल की कीमत फरवरी के मुकाबले करीब 86% बढ़ चुकी है, जबकि डीजल की कीमत दोगुने से भी ज्यादा हो गई है। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 44% बढ़कर 72 डॉलर से 107 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई है।