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बाढ़ से तबाह नेपाल के पावर सेक्टर को भारत का सहारा, रोजाना 18 घंटे मिलेगी बिजली

काठमांडू  प्राकृतिक आपदा की मार झेल रहे पड़ोसी देश नेपाल की मदद के लिए भारत ने एक बार फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। भीषण बाढ़ और भूस्खलन के कारण नेपाल के हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे वहां बिजली का गंभीर संकट पैदा हो गया है। इस संकट से उबारने के लिए भारत ने 31 दिसंबर 2026 तक नेपाल को रोजाना 18 घंटे 654 मेगावाट (MW) तक बिजली निर्यात करने की मंजूरी दे दी है। नेपाल के 'नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी' के मुताबिक, इस तबाही में अब तक 1,385 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 5,130 लोग अभी भी लापता हैं। नेपाल और तिब्बत सीमा के पास बीते 26 अगस्त को हुए बर्फ की चट्टान खिसकने (Avalanche) के बाद आई इस तबाही ने दर्जनों गांवों और बुनियादी ढांचे को तहस-नहस कर दिया है। क्यों ठप पड़ गया नेपाल का पावर सेक्टर? नेपाल अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से नदियों और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर निर्भर है। लेकिन इस भौगोलिक निर्भरता का एक नुकसान यह भी है कि जब भी बाढ़ या भूस्खलन जैसी आपदा आती है, तो नेपाल का पावर ग्रिड रातों-रात धराशायी हो जाता है। 12 से ज्यादा पावर प्लांट तबाह: इस विनाशकारी बाढ़ में 12 से ज्यादा हाइड्रोपावर प्लांट या तो बह गए या उन्हें भारी नुकसान पहुंचा है। कर्मचारी भी लापता: पावर सेक्टर में काम करने वाले लगभग 900 कर्मचारी भी लापता बताए जा रहे हैं, जिससे मरम्मत का काम भी ठप पड़ा है। उलट गए हालात: जो नेपाल हाल के सालों में अपनी अतिरिक्त बिजली भारत को बेच रहा था, इस आपदा ने पासा पलट दिया। अब नेपाल को अपनी घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए भारत से बिजली मांगनी पड़ रही है। 654 MW बिजली सप्लाई का क्या है प्लान? भारतीय विद्युत मंत्रालय ने 13 सितंबर से 31 दिसंबर 2026 तक के लिए इस सप्लाई को हरी झंडी दे दी है। यह बिजली नेपाल को आधी रात 12 बजे से शाम 6 बजे तक यानी दिन के 18 घंटे उपलब्ध कराई जाएगी। कुल 654 मेगावाट में से 600 मेगावाट बिजली मुजफ्फरपुर-ढालकेबार 400 kV डबल-सर्किट लाइन के जरिए भेजी जाएगी। बाकी 54 मेगावाट बिजली तनकपुर-महेंद्रनगर 132 kV लाइन से सप्लाई होगी। दिन का समय क्यों चुना गया? दिन के समय भारत के पास अपनी सौर ऊर्जा की अच्छी-खासी उपलब्धता रहती है। ऐसे में अपनी सरप्लस ग्रीन एनर्जी का इस्तेमाल कर भारत पड़ोसी देश की मदद आसानी से कर पा रहा है। भारत ने साफ किया है कि यह व्यवस्था 31 दिसंबर तक के लिए है। जनवरी 2027 से नेपाल को कितनी बिजली दी जाएगी, इसका रिव्यू दिसंबर के आखिरी हफ्ते में किया जाएगा। मुश्किल वक्त में काम आई भारत-नेपाल की दोस्ती नेपाल के पास नदियां और पनबिजली की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन भारत के पास वह मजबूत ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर और बैकअप है जो किसी भी आपात स्थिति में नेपाल की लाइफलाइन बन सकता है। भारत के विद्युत मंत्रालय का कहना है कि इस फैसले से नेपाल को संकट से उबरने में मदद मिलेगी और दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऊर्जा संबंधों को और मजबूती मिलेगी। भारत के लिए यह कदम केवल एक मदद नहीं, बल्कि अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट' (पड़ोसी प्रथम) कूटनीति की एक ठोस और व्यावहारिक मिसाल है।

स्कॉटलैंड-नॉर्दर्न आयरलैंड में बढ़ी अलग देश की चाह, क्या टूटने की कगार पर पहुंचा UK?

लंदन  यूनाइटेड किंगडम फिर टूटने की कगार पर पहुंच गया है. स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड आजादी के लिए आवाज उठा रहे हैं. इसके लिए जनमत संग्रह कराने की तैयारी चल रही है. खासतौर से ये चर्चा इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि तीनों ही देशों के नेता वेल्स की राजधानी कार्डिफ में मिलने वाले है. इससे पहले हुए सर्वेक्षणों में स्कॉटलैंड में आजादी के पक्ष में 45 प्रतिशत, नॉर्दन आयरलैंड में तकरीबन 36 प्रतिशत लोग आजादी के समर्थन में रहे हैं।  दुनिया के नक्शे पर यूनाइटेड किंगडम यानी यूके एक मजबूत और सबसे पुराना राजनीतिक यूनियन है. इसमें इंग्लैंड, स्कॉटलैंड वेल्स और उत्तरी आयरलैंड हैं. मगर अब इसके टूटने का खतरा मंडरा रहा है. इंग्लैंड के साथी तीनों देश आजादी मांग रहे हैं. मगर सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों है? सैंकड़ों साल का ये साथ अब छूटने की कगार पर क्यों पहुंच गया है।  कैसे बना यूके? 1707 में एक्ट ऑफ यूनियन के बाद इंग्लैंड और स्कॉटलैंड एक राजनीतिक यूनियन में आए थे. स्कॉटलैंड यूके का हिस्सा तो बना था, मगर उसने अपनी अलग कानूनी और शैक्षणिक व्यवस्था की पहचान को बरकरार रखा. वेल्स इससे पहले ही यूके का हिस्सा बन चुका था. आयरलैंड की कहानी इससे अलग है. ब्रिटिश शासन के खिलाफ आयरिश राष्ट्रवाद लंबे समय तक मजबूत होता रहा. 20 वीं सदी में आयरलैंड दो हिस्सों में बंटा. नॉर्दर्न आयरलैंड यूके में बना रहा, जबकि शेष आयरलैंड आजादी के रास्ते पर आगे बढ़ा।  स्कॉटलैंड यूके से अलग क्यों होना चाहता है? स्कॉटलैंड की आजादी की मांग कोई नई बात नहीं है. यहां लंबे समय से स्कॉटिश नेशनल पार्टी इस मुद्दे को उठाती रही है. इसके पीछे कई कारण हैं. दरअसल स्कॉटलैंड की अपनी ऐतिहासिक पहचान है. उसकी अलग कानूनी व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली हैं. स्वतंत्रता समर्थकों का तर्क है कि जब स्कॉटलैंड की अपनी अलग पहचान है तो उसे अपना भविष्य तय करने का अधिकार होना चाहिए।  एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि स्कॉटलैंड के मतदाता कई बार जिस राजनीतिक दिशा में वोट करते हैं, लंदन की UK सरकार उससे अलग फैसला लेती है. इसका सबसे बड़ा उदारहण ब्रेक्सिट को बताया जाता है. 2016 के ब्रेक्सिट जनमत संग्रह में स्कॉटलैंड के अधिकांश लोगों ने यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष में मतदान किया था, लेकिन ब्रिटेन इससे बाहर चला गया।  2014 में क्या हुआ था? स्कॉटलैंड में UK से अलग होने को लेकर पहले ही जनमत संग्रह हो चुका है. 18 सितंबर 2014 को लोगों से पूछा गया था कि क्या स्कॉटलैंड एक स्वतंत्र देश होना चाहिए? इसमें आजादी के खिलाफ 55.3 प्रतिशत लोगों ने वोट किया था, जबकि आजादी के पक्ष में महज 44.7 प्रतिशत लोग थे. हालांकि स्कॉटलैंड की आजादी के समर्थक ऐसा मानते हैं कि अब हालात बदल चुके हैं. खासतौर से ब्रेक्सिट के बाद जनता से राय लेने का मौका मिलना चाहिए।  दूसरा जनमत संग्रह क्यों नहीं हो रहा? स्कॉटलैंड की सरकार और आजादी के समर्थक दोबारा जनमत संग्रह की मांग करते रहे हैं, लेकिन यूके सरकार इसकी अनुमति नहीं देती. मामला ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत तक भी पहुंच चुका है. यूके सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि आजादी एक संवैधानिक मुद्दा है, जिस पर यूके की संसद ही फैसला ले सकती है. इसलिए स्कॉटिश संसद के लिए वेस्टमिंस्टर की मंजूरी के बिना जनमत संग्रह कराना आसान नहीं है. यानी लोग क्या चाहते हैं इसके बारे में तभी पता किया जा सकता है जब सरकार इसके बारे में चाहे।  नॉर्दन आयरलैंड की कहानी क्या है? स्कॉटलैंड के पास चॉइस है कि वह यूके में रहना चाहता है या आजाद होना चाहता है, जबकि नॉर्दन आयरलैंड के सामने सवाल ये है कि उसे यूके में रहना है या आयरलैंड रिपब्लिक में जुड़ना है. उत्तरी आयरलैंड में इसे लेकर दो विचारधारा हैं. कुछ लोगों का मानना है कि इसे यूके का ही हिस्सा रहना चाहिए, जबकि एक बड़े वर्ग का मानना है कि इसे आयरलैंड गणराज्य का ही हिस्सा होना चाहिए. इसे लेकर दशकों से विवाद रहा है, जिसकी शुरुआत 1960 में शुरू हुई थी जो 1990 तक चली. इसे द ट्रबल्स भी कहा जाता है. इस दौरान दोनों पक्षों में हिंसा हुई. 1998 में एक गुड फ्राइडे एग्रीमेंट हुआ जो आयरलैंड का भविष्य तय करता है।  क्या था गुड फ्राइडे एग्रीमेंट? 10 अप्रैल 1998 को हुए इस ऐतिहासिक समझौते में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किया गया. इसमें ये तय किया गया कि नॉर्दन आयरलैंड यूके का हिस्सा तब तक रहेगा जब तक वहां की आबादी ऐसा चाहती है. अगर जनमत संग्रह में लोग आयरलैंड रिपब्लिक के साथ जाना चाहेंगे तो नॉर्दर्न आयरलैंड यूके से बाहर आ सकता है. हाल ही में इसे लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई है. हालांकि ये नहीं कहा जा सकता है कि सच में नॉर्दन आयरलैंड के लोग आयरलैंड रिपब्लिक से जुड़ना चाहते हैं या नहीं।   

AI डेवलपमेंट की स्पीड पर छिड़ी बहस, ट्रंप का चीन को बड़ा संदेश; क्या थमेगी रफ्तार?

 नई दिल्ली अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर होड़ लगातार तेज हो रही है. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वह AI के विकास की रफ्तार को कम करने के पक्ष में नहीं हैं. आयरलैंड के डूनबेग में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका AI के विकास में चीन से आगे है और वह इस बढ़त को बनाए रखना चाहते हैं. उन्होंने यहां तक कहा कि AI की वैश्विक दौड़ में जो जीतेगा, वही जीतेगा।  ट्रंप ने माना कि AI के लिए कुछ सुरक्षा नियम यानी गार्डरेल्स जरूरी हो सकते हैं. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी सरकार किस तरह के नियम लाने की तैयारी कर रही है. AI के तेजी से विकास को लेकर चिंता जताने वालों पर ट्रंप ने कहा कि तकनीक को लेकर ऐसा सोचने वाले लोग नकारात्मक सोच रखते हैं।  ट्रंप बोले- AI की रफ्तार नहीं रोकना चाहते ट्रंप का यह बयान AI इंडस्ट्री में विकास की रफ्तार को लेकर चल रही बहस के बीच आया है. एंथ्रोपिक AI के CEO डारियो अमोडेई ने एक दिन पहले कहा था कि AI इंडस्ट्री को विकास की रफ्तार कुछ धीमी करनी चाहिए, ताकि सुरक्षा उपायों को तकनीक के साथ कदम मिलाने का समय मिल सके. एलन मस्क और ओपनAI के CEO सैम ऑल्टमैन भी इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर सहमति जता चुके हैं।  वहीं, ट्रंप AI से जुड़े डेटा सेंटर के निर्माण के समर्थन में बने हुए हैं. अमेरिका में बड़ी टेक कंपनियां छोटे शहरों में कंप्यूटिंग डेटा सेंटर का नेटवर्क तैयार कर रही हैं. हालांकि, दोनों पार्टियों के नेता जमीन, पानी, बिजली की बढ़ती जरूरत और महंगे बिजली बिल को लेकर सवाल उठा रहे हैं।  चीन से मुकाबले को लेकर कोई समझौता नहीं ट्रंप के बयान से साफ है कि अमेरिका AI की रेस में चीन से अपनी बढ़त बनाए रखना चाहता है. इसी वजह से AI की विकास दर कम करने का सवाल अमेरिका के लिए अहम बन गया है. पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी कह चुके हैं कि डेमोक्रेट्स को AI को चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए।  नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल के निदेशक केविन हैसेट के मुताबिक, इस हफ्ते साइबर और साइंस-टेक्नोलॉजी से जुड़े अधिकारी AI की आगे की रणनीति पर बैठक कर सकते हैं. हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने भी AI के लिए कुछ सेफ्टी मेजर्स की जरूरत मानी है, लेकिन अमेरिका को AI में आगे बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया।  इसी बहस के बीच एंथ्रोपिक के पूर्व कर्मचारी जैकब कॉक्सन ने अमेरिका और चीन से मिलकर AI विकास की रफ्तार को जिम्मेदारी से कंट्रोल करने की अपील की है. उनका डर है कि अगर दोनों देश बिना पर्याप्त सुरक्षा के एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में लगे रहे, तो यही AI रेस खतरनाक साबित हो सकती है। 

बुलेट ट्रेन चलाने वाले ड्राइवरों की होगी खास ट्रेनिंग, 2027 में शुरू होगी सेवा; जानें कितनी मिलेगी सैलरी

मुंबई  भारत  की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना मुंबई-अहमदाबाद हाईस्पीड रेल कॉरिडोर के रूप में आगे बढ़ रही है. इसके साथ ही लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि इसके लिए किस तरह से ड्राइवरों का चयन किया जाएगा. सामान्य लोको पायलट से वह किस तरह अगल होगा और उन्हें कितनी सैलरी मिलेगी. बुलेट ट्रेन का संचालन नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) के माध्यम से किया जाएगा. ऐसा भी माना जा रहा है कि बुलेट ट्रेन के लिए ड्राइवरों का चयन कड़े मानकों के साथ किया जाएगा. उम्मीदवारों को मेडिकल फिटनेस, अच्छी दृष्टि, तेज प्रतिक्रिया क्षमता और साइकोमेट्रिक टेस्ट से गुरना पड़ सकता है. इसके लिए ट्रेन की संचालन की विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी।  सामान्य ट्रेनों से कितना अलग  बुलेट ट्रेन सामान्य ट्रेन से काफी अलग होता है. इसके आधुनिक टेक्नोलॉजी, हाई स्पीड ब्रेकिंग सिस्टम और सुरक्षा के भी कई अनिवार्य सुरक्षा के इंतजाम किया गया है, जिसके लिए चयनित उम्मीदवारों को लंबा तकनीकी ट्रेनिंग और प्रैक्टिस कराया जाएगा. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उन्हें बुलेट ट्रेन  चलाने की अनुमति मिलेगी।  कितनी होगी सैलरी?  हालांकि, बुलेट ट्रेन ड्राइवरों की सैलरी को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. मौजूदा रेलवे के अनुभवी मेल, एक्सप्रेस लोको पायलट कई तरह के भर्तों को मिलाने के बाद से 60 से 90 हजार रुपये होती है. हालांकि, बुलेट ट्रेन के ड्राइवरों को इससे ज्यादा सैलरी मिलने की संभावना है. कई मीडिया रिपोर्ट की माने तो, इनको 40 हजार से लेकर 1, 25,000 रुपये तक की सैलरी मिल सकती है।    कौन बन सकता है ड्राइवर?  भारत में पहली बुलेट ट्रेन चलाने की तैयारी तेज हो गई है. मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर पर चलने वाली इन ट्रेनों के लिए ड्राइवर यानी HSR Pilot की जरूरत होगी. यह जिम्मेदारी सामान्य ट्रेनों के लोको पायलट से अलग और ज्यादा तकनीकी होगी. बुलेट ट्रेन का ड्राइवर बनने के लिए उम्मीदवार के पास संबंधित इंजीनियरिंग में डिप्लोमा या डिग्री होनी चाहिए. इसके साथ भारतीय रेलवे या सरकारी मेट्रो में ट्रेन चलाने का कम से कम 3 साल का अनुभव जरूरी रखा गया है. इसका मतलब साफ है कि कोई व्यक्ति सीधे फ्रेशर के तौर पर बुलेट ट्रेन का ड्राइवर नहीं बन सकता।   

UN में भारत की बढ़ेगी ताकत! वीटो पावर को लेकर रूस-चीन के बाद महासचिव का बड़ा बयान

नईदिल्ली  दुनिया की राजनीति में भारत की ताकत लगातार बढ़ रही है और अब इसकी गूंज संयुक्त राष्ट्र के सबसे बड़े मंच पर भी सुनाई दे रही है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद में सुधार और उसके विस्तार की मांग का खुलकर समर्थन किया है. उन्होंने साफ कहा कि आज की दुनिया 1945 वाली दुनिया नहीं है. तब जो आर्थिक, जनसांख्यिकीय और भू-राजनीतिक तस्वीर थी, वह अब पूरी तरह बदल चुकी है. ऐसे में वैश्विक संस्थाओं की संरचना भी आज की दुनिया के हिसाब से बदलनी चाहिए. सबसे खास बात यह है कि गुटेरेस ने भारत का नाम लेकर कहा कि वह सुरक्षा परिषद में विस्तार की मांग के सबसे आगे रहने वाले देशों में है. यानी जिस स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकार की मांग भारत लंबे समय से करता रहा है, उसे अब एक और बड़ा अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला है. मामला यहीं खत्म नहीं होता. ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणा-पत्र में रूस और चीन ने भी भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका देने की मांग का समर्थन दोहराया है. दोनों देश सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और इनके पास अभी वीटो अधिकार भी है. ऐसे में उनका भारत के पक्ष में खड़ा होना काफी अहम माना जा रहा है।  वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण को सिर्फ नियम मानने वाला नहीं, बल्कि नियम बनाने वाला बनने की बात कही थी. गुटेरेस ने भी इसी सोच को आगे बढ़ाया. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र में ज्यादा ताकत मिलेगी या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट के साथ वीटो का अधिकार भी मिलेगा? संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने भारत की मांग को बताया अहम, दुनिया बदलने की दी दलील एंटोनियो गुटेरेस ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सुरक्षा परिषद के विस्तार को समय की जरूरत बताया. उनका कहना था कि मौजूदा संस्थागत ढांचा उस दुनिया को नहीं दर्शाता जिसमें हम आज रह रहे हैं. 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी, तब वैश्विक शक्ति संतुलन अलग था. आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भूमिका कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है. गुटेरेस ने कहा कि बदलती आर्थिक, जनसांख्यिकीय और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को वैश्विक संस्थाओं में भी जगह मिलनी चाहिए. उन्होंने खास तौर पर कहा कि भारत इस मांग को आगे बढ़ाने में सबसे आगे रहा है।  रूस-चीन ने भी भारत के लिए खोला बड़ा रास्ता ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणा-पत्र में रूस और चीन ने भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका की आकांक्षा का समर्थन किया. घोषणा-पत्र में संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार की जरूरत बताई गई है. इसमें सुरक्षा परिषद को ज्यादा लोकतांत्रिक, प्रतिनिधित्वपूर्ण, प्रभावी और सक्षम बनाने की बात कही गई. साथ ही विकासशील देशों की सदस्यता बढ़ाने पर जोर दिया गया है. चीन और रूस ने कहा कि भारत और ब्राजील जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय मामलों में ज्यादा बड़ी भूमिका मिलनी चाहिए. खासकर सुरक्षा परिषद में उनकी भागीदारी बढ़ाने की बात कही गई है. भारत के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि चीन खुद सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है।  भारत को अभी वीटो नहीं मिला, लेकिन रास्ता जरूर मजबूत हुआ यहां एक बात साफ समझना जरूरी है. गुटेरेस ने यह ऐलान नहीं किया है कि भारत को तत्काल वीटो अधिकार मिलने जा रहा है. सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत को स्थायी सदस्य बनाने की मांग का समर्थन जरूर किया गया है. मौजूदा व्यवस्था में पांच स्थायी सदस्य हैं चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका. इन पांचों के पास वीटो अधिकार है. यह व्यवस्था 1945 में सुरक्षा परिषद की स्थापना के समय से चली आ रही है. भारत अगर भविष्य में स्थायी सदस्य बनता है तो वीटो का सवाल अलग से तय होगा. फिलहाल बड़ा घटनाक्रम यह है कि भारत की दावेदारी को वैश्विक दक्षिण, ब्रिक्स और अब संयुक्त राष्ट्र प्रमुख की तरफ से भी मजबूत समर्थन मिलता दिख रहा है।  PM मोदी ने कहा- वैश्विक दक्षिण सिर्फ नियम मानने वाला नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण की भूमिका को लेकर बड़ा संदेश दिया था. उन्होंने कहा था कि विकासशील देशों को सिर्फ बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं रहना चाहिए. उन्हें नियम बनाने की प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. गुटेरेस के बयान को इसी दिशा में देखा जा रहा है. उनका कहना था कि दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है. ऐसी स्थिति में वैश्विक संस्थाओं में भी संतुलन और समानता दिखाई देनी चाहिए. सुरक्षा परिषद में सुधार इसी बड़े बदलाव का हिस्सा हो सकता है।  गुटेरेस ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर गाजा तक दुनिया के सामने रखी चुनौती     संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सिर्फ सुरक्षा परिषद सुधार की बात नहीं की. उन्होंने दुनिया के सामने मौजूद कई बड़ी चुनौतियों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले वर्षों में विकास की रफ्तार को कई गुना बढ़ा सकती है. लेकिन इसका फायदा फिलहाल कुछ कंपनियों और कुछ देशों तक ज्यादा सीमित है. अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता की खाई आय, अवसर, सुरक्षा और संप्रभुता की खाई को और बढ़ा सकती है. उन्होंने विकासशील देशों के लिए वित्तीय मदद बढ़ाने की भी बात की।      गुटेरेस ने जलवायु न्याय का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने विकसित देशों से अपने वादे पूरे करने की अपील की. इसके अलावा उन्होंने गाजा, मध्य पूर्व, यूक्रेन और सूडान समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में शांति की जरूरत बताई. उनका कहना था कि सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का सम्मान करना चाहिए।  क्या भारत को मिलेगा वीटो? अब पूरी दुनिया की नजर इस सवाल पर भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की उसकी मांग नई नहीं है. अब उसे रूस और चीन का समर्थन मिला है. ब्रिक्स के मंच से भी आवाज मजबूत हुई है और संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने भी … Read more

हॉर्मुज संकट में भारत ने बदली रणनीति, सोलर के साथ गैस से बिजली उत्पादन में 80% उछाल

नई दिल्ली एक तरफ यूएस और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से हॉर्मुज पर फिर तनाव बढ़ गया है. ऐसे में दुनियाभर को फिर गैस और बिजली की टेंशन सताने लगी है. लेकिन इसी बीच भारत ने अब बिजली के प्रोडक्शन को बढ़ाने के लिए ऐसा तरीका निकाल लिया है, जिससे बिजली का प्रोडक्शन बढ़ा है. देशभर में सितंबर की शुरुआत से बिजली की मांग तेजी से बढ़ी है. खासकर शाम के समय जब लोग काम से घर लौटते हैं, तब बिजली की खपत अचानक से बढ़ जाती है. इसी समय सोलर पावर का प्रोडक्शन भी कम हो जाता है, जिससे बिजली की कमी और बढ़ जाती है. इस स्थिति से निपटने के लिए बिजली कंपनियां अब गैस से चलने वाले पावर प्लांट्स का ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं. 1 से 9 सितंबर के बीच गैस आधारित बिजलीघरों ने 1,088.64 मिलियन यूनिट बिजली बनाई. पिछले साल इसी अवधि में प्रोडक्शन 603.70 मिलियन यूनिट था. यानी एक साल में गैस से बिजली प्रोडक्शन करीब 80 फीसदी बढ़ गया है।  बिजली की जरूरत ने बढ़ाई चिंता सितंबर में भी कई इलाकों में गर्मी और उमस बनी हुई है. ऐसे में घरों और कारोबारों में बिजली की खपत बढ़ी है. 9 सितंबर को देश में बिजली की अधिकतम मांग 267 गीगावॉट तक पहुंच गई. इस दौरान रात में करीब 7.7 गीगावॉट बिजली की कमी दर्ज हुई. अगले दिन यानी 10 सितंबर को मांग और बढ़कर 269 गीगावॉट हो गई. हालांकि, उस दिन बिजली की कमी घटकर करीब 6.1 गीगावॉट रह गई. शाम के समय यह समस्या इसलिए ज्यादा होती है क्योंकि सूरज ढलने के साथ सोलर पावर का प्रोडक्शन तेजी से कम हो जाता है. दूसरी तरफ घरों में पंखे, एसी, लाइट और दूसरे उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ जाता है।  गैस प्लांट से कैसे मिल रही मदद? गैस से चलने वाले बिजलीघरों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें जरूरत के हिसाब से जल्दी चालू किया जा सकता है और इनका प्रोडक्शन भी तेजी से बढ़ाया या घटाया जा सकता है. यही वजह है कि बिजली की अचानक बढ़ी मांग के समय ये प्लांट काफी काम आते हैं. देश में गैस आधारित बिजली प्रोडक्शन की कुल कैपेसिटी करीब 20.1 गीगावॉट है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एक सीनियर सरकारी अधिकारी के मुताबिक, फिलहाल शाम के समय बिजली की कमी को संभालने के लिए करीब 4.5 से 5.5 गीगावॉट गैस आधारित बिजली का इस्तेमाल किया जा रहा है।  कोयला और हाइड्रो से नहीं मिल रही पूरी मदद बिजली की बढ़ती जरूरत के बीच कोयला आधारित पावर प्लांट भी लगभग अपनी पूरी क्षमता से चल रहे हैं. ऐसे में उनसे अचानक और ज्यादा बिजली पैदा करवाना आसान नहीं है. वहीं, बारिश की कमी का असर हाइड्रो पावर यानी पानी से बनने वाली बिजली पर भी पड़ा है. दक्षिण और पश्चिम भारत के कई इलाकों में जलाशयों का जलस्तर कम है. इससे आने वाले दिनों में हाइड्रो पावर का प्रोडक्शन और घटने की आशंका है. ऐसे में बिजली की पीक डिमांड को पूरा करने के लिए गैस पावर की भूमिका और अहम हो गई है।  महंगी गैस के बावजूद बढ़ी खरीद बिजली बनाने वाली कंपनियों ने गैस की खरीद भी बढ़ा दी है. 1 से 10 सितंबर के बीच पावर सेक्टर की ओर से स्पॉट मार्केट में 30,53,300 MMBtu से ज्यादा नेचुरल गैस खरीदी गई. पिछले साल इसी अवधि में खरीद करीब 3,75,000 MMBtu थी. हालांकि, इस दौरान गैस की कीमत भी काफी बढ़ी. औसत स्पॉट गैस कीमत पिछले साल के 1,013 रुपये प्रति MMBtu से बढ़कर 2,420 रुपये प्रति MMBtu हो गई. यानी कीमत में करीब 139 फीसदी का इजाफा हुआ. इसके बावजूद बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए गैस प्लांट्स का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। 

लद्दाख बॉर्डर पर चीन को झटका! LAC पर कम हुई PLA की तैनाती, भारत की पकड़ हुई मजबूत

 नई दिल्ली भारत-चीन सीमा से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है. रक्षा मंत्रालय की 2025-26 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में उत्तरी सीमाओं पर चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी PLA की तैनाती में बड़ी कमी देखी गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC के सामने अपनी तैनाती घटाई है और अब उत्तरी सीमाओं और पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में करीब 10 कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड के बराबर बल तैनात हैं।  रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की तरफ से सभी LAC सेक्टर में सेना की तैनाती मजबूत बनी हुई है. भारतीय सेना किसी भी उभरती चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार और सही स्थिति में है. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत-चीन के बीच सकारात्मक राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर की बातचीत से उत्तरी सीमाओं पर हालात में ज्यादा स्थिरता आई है।  चीन के साथ फिर शुरू हुआ सैन्य संवाद रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और चीन के बीच सैन्य स्तर पर बातचीत भी फिर शुरू हुई है. इसमें अक्टूबर 2025 में पूर्वी लद्दाख में हुई 23वीं कोर कमांडर स्तर की बैठक भी शामिल है. दोनों देशों के बीच सैन्य बातचीत के जरिए सीमा से जुड़े मुद्दों को सुलझाने और तनाव कम करने की कोशिश जारी है।  इसके अलावा PLA के साथ बॉर्डर पर्सनल मीटिंग यानी BPM भी सभी सेक्टर में जारी हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बैठकों का माहौल सौहार्दपूर्ण रहा है और इनके जरिए दोनों पक्षों से जुड़े मुद्दों को उठाया और सुलझाया जा रहा है।  ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्षमताओं की समीक्षा रक्षा मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की मल्टी-डोमेन क्षमता, इंटेलिजेंस में बढ़त, तकनीकी ताकत और तीनों सेनाओं की संयुक्त ऑपरेशनल तैयारी को दिखाया।  ऑपरेशन के बाद सेना ने अपनी क्षमताओं और कमियों की समीक्षा भी की. इसके बाद फोर्स रिस्ट्रक्चरिंग, तीनों सेनाओं के बीच ज्यादा जॉइंटनेस और नई तकनीकों पर फोकस बढ़ाया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि बदलते सुरक्षा हालात को देखते हुए भारतीय सेना अपनी तैयारी और क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रही है।  डिफेंस मिनस्ट्री की सालाना रिपोर्ट में क्या है, बड़ी बातें     भारत और चीन के बीच प्रगाढ़ हो रहे रिश्तों के बीच ही भारतीय रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट आई है।     वित्त वर्ष 2025-26 की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2025 में उत्तरी सीमाओं के सामने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की सेनाओं की तैनाती में काफी कमी देखी गई।     इसमें LAC के साथ वाले इलाकों और पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में 10-10 'कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड' आकार की सेनाएं तैनात थीं।     इसका मतलब है कि लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक फैली LAC पर लगभग 45,000-50,000 चीनी सैनिक थे, और इतनी ही संख्या पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में भी थी।     रिपोर्ट के मुताबिक, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की 10 अतिरिक्त ब्रिगेड उसके पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में तैनात हैं। 2020 में टकराव, तक लद्दाख सीमा पर तैनात थे 60000 चीन सैनिक: रिपोर्ट हालांकि MoD की यह रिपोर्ट इस महीने जारी की गई है, लेकिन इसे अरुणाचल प्रदेश में सीमा पर मौजूदा तनाव के दौर से पहले तैयार किया गया था। उस तनाव के कारण अतिरिक्त सैनिकों को आगे के इलाकों में तैनात करना पड़ा था। 2020 के सीमा संकट के दौरान, लद्दाख सीमा पर लगभग 60,000 चीनी सैनिक तैनात थे। रिपोर्ट में भारतीय तैनाती का जिक्र नहीं है। अरुणाचल में टकराव के बाद कितने बदले हालात सालाना रिपोर्ट में अरुणाचल की स्थिति का खास तौर पर जिक्र नहीं है, लेकिन कहा गया है कि LAC के सभी सेक्टरों में भारतीय सेना की तैनाती मजबूत और अच्छी स्थिति में है, और वह किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। रिपोर्ट को अंतिम रूप दिए जाने के बाद के महीनों में, अरुणाचल के कम से कम दो इलाकों में सीमा पर तनाव हुआ है, जिसके चलते आगे तैनात सैनिकों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। लगातार जारी है बॉर्डर पर्सनल मीटिंग्स तनाव के बाद स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव (विशेष प्रतिनिधि) स्तर की बातचीत हुई, और उसके बाद मतभेदों को सुलझाने के लिए इस महीने की शुरुआत में कोर कमांडर स्तर की बैठक हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि जमीनी स्तर पर, टकराव के मुद्दों को सुलझाने के लिए सभी सेक्टरों में PLA के साथ सौहार्दपूर्ण और दोस्ताना माहौल में 'बॉर्डर पर्सनल मीटिंग्स' (सीमा कर्मियों की बैठकें) जारी हैं। ऑपरेशन सिंदूर पर रिपोर्ट में क्या है? 'ऑपरेशन सिंदूर' पर बनी रिपोर्ट में भारतीय सशस्त्र बलों के सफल हमलों का जिक्र है, जिन्होंने पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी बुनियादी ढांचे को नष्ट किया और वहां की सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ऑपरेशन के दौरान ड्रोन और एंटी-ड्रोन उत्पाद उपलब्ध कराने में भारतीय उद्योग की क्षमता में कमी थी, जिसे अब तेजी से विकास करके दूर किया जा रहा है।

ममता बनर्जी की जीत के बाद BJP कार्यकर्ता की मौत का राज खुलेगा? 5 साल बाद कब्र से निकला शव

कोलकाता पश्चिम बंगाल में भाजपा के एक कार्यकर्ता का शव करीब 5 साल बाद कब्र से निकाला गया है। जानकारी के मुताबिक कोर्ट के आदेश के बाद 2021 में संदेशखाली में चुनाव बाद हुई हिंसा में मारे गए कार्यकर्ता के कंकाल के अवशेष पांच साल बाद कब्र से निकाले गए हैं। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को इसकी पुष्टि की है। अब अवशेष का पोस्टमार्टम कराया जाएगा। नाजाट थाने के एक अधिकारी ने बताया कि पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई है और मौत के कारण का पता लगाने के लिए अवशेषों को पोस्टमार्टम और फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है। परिवार ने जरूरत पड़ने पर CBI से जांच कराने और मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। 2021 में क्या हुआ था? अधिकारी के मुताबिक 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के दिन झनझनिया गांव के निवासी आस्तिक चंद्र दास पर कथित तौर पर विजय जुलूस निकाल रहे तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने हमला किया था। उनके बेटे सुब्रत दास ने आरोप लगाया कि हमले में उनके पिता गंभीर रूप से घायल हो गए थे और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाने की इजाजत भी नहीं दी गई। इसके बाद उनकी घर पर ही मौत हो गई। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि उनके घर के बाहर पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था और उन्हें शव को दफनाने के लिए मजबूर किया गया। परिवार के मुताबिक शव का पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया था। पुलिस अधिकारी ने बताया कि राज्य में ममता बनर्जी की सरकार के हटने और भाजपा की सरकार बनने के बाद परिवार ने एक नई शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद अदालत ने शव को कब्र से निकालने का आदेश दिया। रविवार को मजिस्ट्रेट और परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में कंकाल के अवशेष कब्र से निकाले गए। जबरन शव दफनाने का आरोप परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि उनके घर के बाहर पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था और उन्हें शव को दफनाने के लिए मजबूर किया गया। परिवार के मुताबिक, शव का पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया था। पुलिस अधिकारी ने बताया कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद परिवार ने एक नई शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद अदालत ने शव को कब्र से निकालने का आदेश दिया। फरेंसिक जांच को भेजे गए अवशेष अधिकारियों ने कहा कि रविवार को मजिस्ट्रेट और परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में कंकाल के अवशेष कब्र से निकाले गए। नाजाट थाने के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई और मौत के कारण का पता लगाने के लिए अवशेषों को पोस्टमार्टम तथा फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है। परिवार ने जरूरत पड़ने पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से विस्तृत जांच कराने और मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने कहा कि यह घटना 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर झेलनी पड़ी ज्यादतियों का प्रमाण है। उस चुनाव में टीएमसी ने बड़ी जीत दर्ज की थी। उन्होंने कहा, कि टीएमसी के शासन में आतंक का माहौल था और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। हमें पता है कि न्याय होगा और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी सजा मिलेगी। पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले का एक गांव संदेशखाली 2024 में उस समय राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था, जब बड़ी संख्या में महिलाओं ने स्थानीय टीएमसी नेता शाहजहां शेख पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किए थे। भाजपा हुई हमलावर इस बीच भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने कहा है कि यह घटना 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को झेलनी पड़ी ज्यादतियों का प्रमाण है। उन्होंने कहा, ''टीएमसी के शासन में आतंक का माहौल था और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। हमें पता है कि न्याय होगा और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी सजा मिलेगी।''

BRICS समिट खत्म होते ही बदले बांग्लादेश के सुर, PM तारिक रहमान ने भारत से रिश्तों पर दिया बड़ा बयान

नई दिल्ली बांग्‍लादेश में शेख हसीना की सरकार को जबरन सत्‍ता से बेदखल करने के बाद मोहम्‍मद यूनुस ने अंतरिम सरकार की कमान संभाली थी. उनके रवैये से भारत और बांग्‍लादेश के रिश्‍ते काफी तल्‍ख हो गए थे. इसके बाद आम चुनाव कराए गए, जिसके बाद तारिक रहमान बांग्‍लादेश के नए प्रधानमंत्री बने. हालांकि, भारत के प्रति उनका रुख अभी तक कुछ ज्‍यादा ठीक नहीं रहा है. बांग्‍लादेश ने जिस तरह से ब्रिक्‍स समिट से दूरी बनाई, उसे रिश्‍तों में और कड़वाहट आई है. हालांकि, लगता है अब ढाका की अक्‍ल ठिकाने आई है. तारिक रहमान के देश ने भारत के साथ संबंधों को सुधारने की बात कही है. हालांकि, शेख हसीना के कार्यकाल में बनाए गए संबंधों को ‘अनकंफर्टेबल’ बताया गया है।  बांग्लादेश ने भारत के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को नए सिरे से तय करने की इच्छा जताई है. बांग्लादेश के विदेश मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि उनका देश भारत के साथ संबंधों को ‘रीसेट’ करना चाहता है और इन्हें आपसी हितों पर आधारित नए रिश्ते के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है. उन्होंने शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहने के दौरान दोनों देशों के संबंधों को ‘असहज’ करार दिया. कबीर ने कहा कि बांग्लादेश भारत के साथ एक नए रिश्ते की ओर बढ़ना चाहता है. उन्होंने कहा कि इसके लिए बहुपक्षीय मंचों के बजाय दोनों देशों के बीच सीधे द्विपक्षीय संवाद होना चाहिए. उनके मुताबिक, ढाका को भारत को लेकर अपनी ‘अत्यधिक निर्भरता’ वाली सोच से बाहर निकलकर संतुलित विदेश नीति अपनानी चाहिए।  अच्‍छे द्विपक्षीय संबंधों की वकालत हुमायूं कबीर ने कहा कि बांग्लादेश के लिए भारत महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे अपने संबंधों को केवल भारत के इर्द-गिर्द नहीं रखना चाहिए. कबीर ने कहा, ‘नाश्ता भारत में, दोपहर का भोजन भारत में और रात का खाना भी भारत में तो अपना खाना कब खाएंगे?’ उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को इससे बाहर निकलना होगा और भारत को एक अन्य देश के रूप में देखते हुए उसके साथ अच्छे द्विपक्षीय संबंध बनाए रखने चाहिए. कबीर की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दोनों देशों के रिश्तों में पिछले करीब दो वर्षों में तनाव बढ़ा है. अगस्त 2024 में युवा आंदोलन के बाद सत्ता से बेदखल हुईं शेख हसीना भारत आ गई थीं. हसीना को भारत में शरण दिए जाने के मुद्दे पर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और नई सरकार ने कई बार नाराजगी जताई है।  ब्रिक्स सम्मेलन को लेकर भी बढ़ी दूरी भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में ताजा तनाव प्रधानमंत्री तारिक रहमान के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होने के फैसले से भी जुड़ा है. ‘हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स’ की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश ने कहा था कि रहमान को सम्मेलन के लिए उचित तरीके से आमंत्रित नहीं किया गया था. हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार भारत ने रहमान को द्विपक्षीय यात्रा और बिम्सटेक के अध्यक्ष के तौर पर ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण दिया था. ढाका ने कथित तौर पर दोनों निमंत्रणों को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया।  भारत के साथ 101 समझौतों की समीक्षा इसी बीच बांग्लादेश भारत के साथ हुए 101 समझौतों और समझौता ज्ञापनों (एमओयू) की समीक्षा भी कर रहा है. सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के मुख्य सचेतक नुरुल इस्लाम मोनी ने शुक्रवार को कहा था कि सभी 101 समझौतों की समीक्षा की जा रही है और जल्द ही इसके नतीजे सामने आएंगे. जब उनसे पूछा गया कि क्या चटगांव और मोंगला बंदरगाहों को मित्र देशों के जहाजों के लिए इस्तेमाल की अनुमति देने वाले समझौते रद्द किए जाएंगे, तो उन्होंने कहा कि सभी समझौतों की समीक्षा की जा रही है. कबीर ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि इन समझौतों की जांच संसदीय प्रक्रिया के तहत की जा रही है। 

UCC को लेकर NDA में बढ़ी सरगर्मी, अमित शाह से मुलाकात करेंगे संजय झा; JDU बताएगी अपना रुख

नईदिल्ली  समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर बिहार में एनडीए के भीतर शुरू हुई बयानबाजी के बीच जेडीयू ने बड़ा बयान दिया है.जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन ने बताया कि पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा UCC के मसले पर जल्द ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात करेंगे. बता दें कि अमित शाह के 21 राज्यों में 2029 से पहले UCC लागू करने वाले बयान के बाद बिहार में दो अलग-अलग सुर सुनाई दिए. जदयू विधायक श्याम रजक ने कहा बिहार में UCC किसी कीमत पर लागू नहीं होगा. वहीं सरकार में मंत्री संतोष सुमन ने कहा अमित शाह ने कहा है तो अच्छी बात होगी, लागू हो सकता है. बताया जा रहा है कि अब इस खींचतान को खत्म करने के लिए संजय झा मोर्चा संभालेंगे।  UCC पर अमित शाह के ऐलान के बाद JDU की पहल बता दें कि हाल में ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा था कि 2029 से पहले भाजपा और भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी. इस बयान के बाद बिहार में UCC को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है. वहीं जेडीयू के विधायक श्याम रजक ने साफ-साफ कह दिया था कि जदयू बिहार में यूसीसी किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने देगी।  लेकिन, अब जब जेडीयू के शीर्ष नेतृत्व से कहा गया है कि अमित शाह से मुलाकात करके पार्टी अपना पक्ष रखेगी तो इसको डैमेज कंट्रोल के तौर पर देखा जा रहा है. दरअसल, जदयू का मानना है कि UCC जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बिना सभी समाजों से बातचीत के फैसला नहीं होना चाहिए. जेडीयू ने स्पष्ट किया है कि पार्टी इस मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व से बातचीत करेगी. जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन ने कहा कि पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा जल्द ही अमित शाह से UCC के मसले पर बातचीत करेंगे।  संजय झा अमित शाह के सामने रखेंगे पार्टी का पक्ष राजीव रंजन के बयान से साफ है कि जेडीयू इस मुद्दे को सार्वजनिक बयानबाजी तक सीमित रखने के बजाय गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत के जरिए आगे बढ़ाना चाहती है. संजय झा की अमित शाह से मुलाकात में बिहार की स्थिति और पार्टी के रुख पर चर्चा होने की संभावना है. बता दें कि जेडीयू पहले ही संकेत दे चुकी है कि संसद में किसी विधेयक का समर्थन करना और उसे अपने राज्य में लागू करने का फैसला करना दो अलग-अलग विषय हैं।  बिहार में UCC को लेकर JDU का रुख अलग जेडीयू के वरिष्ठ नेता श्याम रजक ने हाल ही में साफ कहा था कि बिहार में UCC लागू नहीं होगा. उनका कहना था कि पार्टी ने संसद में कानून का समर्थन जरूर किया था, लेकिन उसी समय यह भी स्पष्ट कर दिया था कि बिहार में इसे लागू नहीं किया जाएगा. ऐसे में संजय झा की अमित शाह से प्रस्तावित मुलाकात को बिहार के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यह मुलाकात गठबंधन के भीतर इस संवेदनशील मुद्दे पर समन्वय की कोशिश भी हो सकती है।