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होर्मुज स्ट्रेट से गुजरेंगे भारतीय झंडे वाले 2 गैस टैंकर, LPG पर मिली गुड न्यूज

 नई दिल्ली दुनिया में जितना भी तेल और गैस समुद्र के रास्ते जाता है, उसका करीब 20 फीसदी सिर्फ एक रास्ते से गुजरता है होर्मुज की खाड़ी. यह एक बहुत ही पतली सी जलधारा है जो ईरान और ओमान के बीच में है. एक तरफ खाड़ी के देश हैं – UAE, कुवैत, सऊदी अरब, इराक. और इन सबका तेल बाहर जाने का एकमात्र समुद्री रास्ता यही है।  अब सोचिए – अगर यह रास्ता बंद हो जाए तो क्या होगा? दुनिया के पांचवें हिस्से का तेल और गैस रुक जाएगा. कीमतें आसमान छू लेंगी. और भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल बाहर से मंगाते हैं, उन्हें सबसे ज्यादा तकलीफ होगी।  हुआ क्या है अभी? ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जंग छिड़ी हुई है. ईरान ने धमकी दे दी कि जो भी जहाज होर्मुज से निकलने की कोशिश करेगा, उस पर हमला होगा।  बस इतना सुनते ही सैकड़ों जहाज वहीं लंगर डालकर रुक गए. कोई आगे जाने को तैयार नहीं. पिछले 24 घंटों में एक भी तेल का बड़ा जहाज होर्मुज से नहीं गुजरा. यह बहुत बड़ी बात है. मतलब रास्ता व्यावहारिक रूप से बंद पड़ा है।  भारत का क्या हाल है? भारत के 22 जहाज इस वक्त खाड़ी के अंदर फंसे हुए हैं. न आगे जा पा रहे हैं, न वापस आ पा रहे हैं. इनमें दो जहाज खास तौर पर चर्चा में हैं. पाइन गैस जिसे आईओसी यानी इंडियन ऑयल ने किराए पर लिया है. जग वसंत – जिसे बीपीसीएल ने किराए पर लिया है।  ये दोनों LPG टैंकर हैं. मतलब इनमें रसोई गैस जैसा ईंधन भरा है जो भारत के घरों तक पहुंचना है. ये दोनों जहाज UAE के शारजाह के पास लंगर डाले खड़े हैं. शनिवार को निकलने की तैयारी में बताए जा रहे हैं।  मोदी सरकार क्या कर रही है? भारत सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है. विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि भारत चाहता है कि उसके जहाज सुरक्षित और बिना रोक-टोक के निकल सकें।  और सबसे अहम बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद दूसरे देशों के नेताओं से बात कर रहे हैं ताकि इन जहाजों का सुरक्षित रास्ता निकाला जा सके. यह कूटनीति का खेल है. प्रधानमंत्री की कोशिश है कि ईरान तक यह बात पहुंचे कि भारत के जहाजों को जाने दिया जाए।  खबर के मुताबिक पिछले हफ्ते ईरान ने दो भारतीय LPG जहाजों को होरमुज से गुजरने दिया था. यानी ईरान ने भारत को थोड़ी रियायत दी. यह इसलिए भी समझ में आता है क्योंकि भारत और ईरान के रिश्ते पहले से ही ठीक-ठाक रहे हैं, और भारत ने हमेशा इस जंग में किसी एक तरफ खड़े होने से परहेज किया है।  पाकिस्तान वाला दिलचस्प किस्सा इस पूरी खबर में एक बहुत दिलचस्प बात और है. डेटा से पता चला है कि पाकिस्तान जाने वाला एक तेल का जहाज हाल ही में होर्मुज से गुजर गया. इसका मतलब यह है कि ईरान ने पूरी तरह रास्ता बंद नहीं किया है. वो चुन-चुनकर कुछ देशों को जाने दे रहा है. जिनसे उसके संबंध ठीक हैं, या जो उसके लिए काम के हैं – उन्हें रास्ता मिल रहा है।  यह एक तरह का दबाव का हथियार है. ईरान कह रहा है, "देखो, मैं सबको रोक सकता हूं, लेकिन जिसे चाहूं उसे जाने भी दे सकता हूं।  असली मुद्दा क्या है? यह सिर्फ कुछ जहाजों की कहानी नहीं है. यह उस रास्ते की कहानी है जिससे भारत का रसोई गैस, पेट्रोल और डीजल आता है. अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहा तो भारत में गैस और तेल की कमी हो सकती है. कीमतें बढ़ सकती हैं और आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। 

लिपुलेख दर्रे से भारत-चीन व्यापार शुरू होगा 6 साल बाद, गलवान झड़प के बाद था स्थगित

पिथौरागढ़  उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत और चीन के बीच बॉर्डर ट्रेड छह साल बाद फिर से शुरू होने जा रहा है। यह ट्रेड सेशन आमतौर पर जून से सितंबर तक चलता है। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट आशीष भटगाई ने बताया कि केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। विदेश मंत्रालय की ओर से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी होने के बाद यह प्रक्रिया आगे बढ़ी है। लिपुलेख दर्रे के जरिए तिब्बत के साथ बॉर्डर ट्रेड लंबे अंतराल के बाद 1992 में फिर शुरू हुआ था। हालांकि 2019 में COVID-19 महामारी और गलवान झड़प के कारण इसे बंद कर दिया गया था। पिछले साल 18-19 अगस्त को चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान भारत-चीन ने रुपए और युआन में ट्रेड करने का फैसला किया था। अब तक यह ‘वस्तु विनिमय’ आधारित यानी सामान के बदले सामान का लेन-देने होता था। लिपुलेख दर्रा औपचारिक व्यापारिक मार्ग ब्रिटिश काल में भी लिपुलेख दर्रा व्यापार और तीर्थयात्रा का प्रमुख केंद्र था। तिब्बत से व्यापारी नमक, बोराक्स, पशु उत्पाद, जड़ी-बूटियां और स्थानीय सामान बेचने आते हैं, जबकि भारतीय व्यापारी बकरी, भेड़, अनाज, मसाले, गुड़, मिश्री, गेहूं वहां ले जाते हैं। भारत-चीन के बीच साल 2005 में 12 करोड़ रुपए का आयात और 39 लाख रुपए का निर्यात हुआ था। साल 2018 में 5.59 करोड़ रुपए का आयात और 96.5 लाख रुपए का निर्यात हुआ था। नेपाल ने समझौते पर आपत्ति जताई थी लिपुलेख के साथ शिपकी ला और नाथु ला दर्रों से भी कारोबार बहाल करने का फैसला लिया गया था। हिमालय के तीन दर्रों से शुरू होने जा रहा भारत-चीन व्यापार पहली बार पूरी तरह सड़क के जरिए होगा। यहां मनी एक्सचेंज भी खुलेगा। हालांकि नेपाल ने इस समझौते पर आपत्ति जताई थी। उसका कहना है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं। उसने भारत और चीन से इस इलाके में कोई एक्टिविटी न करने की अपील की है। केंद्र ने राज्य सरकार से व्यवस्था करने को कहा विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनंद बर्धन को लेटर लिखकर हिमालयी दर्रे के जरिए व्यापार बहाल करने का अनुरोध किया है। लेटर में बताया गया है कि गृह मंत्रालय और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय से भी मंजूरी मिल चुकी है। प्रशासन ने ट्रेड पास जारी करने, करेंसी एक्सचेंज के लिए बैंकों की व्यवस्था, कस्टम विभाग की तैनाती और धारचूला प्रशासन को विस्तृत एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इसमें व्यापारियों के लिए ट्रांजिट कैंप, संचार, बैंकिंग, सुरक्षा और चिकित्सा सुविधाएं शामिल होंगी। व्यापारियों ने फैसले का स्वागत किया उत्तराखंड के पिथौरागढ़ सीमांत व्यापार संगठन के अध्यक्ष जीवन सिंह रोंकाली ने इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इससे व्यापारियों को 2019 से तकलाकोट (तिब्बत) के वेयरहाउस में रखे सामान को वापस लाने का अवसर मिलेगा।

DGCA के फैसले के खिलाफ इंडिगो और एअर इंडिया का विरोध, महंगे टिकटों की चेतावनी

 नई दिल्ली आपने कभी फ्लाइट बुक की होगी तो देखा होगा कि टिकट का दाम अलग होता है और सीट चुनने का चार्ज अलग. विंडो सीट चाहिए? पैसे दो. आगे की सीट चाहिए? और पैसे दो. परिवार के साथ बैठना है? उसके लिए भी पैसे. यह एक तरह से एयरलाइंस की अलग कमाई है। अब सरकार ने कहा, "नहीं. हर फ्लाइट की 60 फीसदी सीटें यात्रियों को फ्री में दो. सीट चुनने के पैसे मत लो." और इस पर एयरलाइंस भड़क गई हैं।  किसने क्या कहा? सरकार का यह फैसला MoCA यानी नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने लिया. और 18 मार्च 2026 को इसका ऐलान कर दिया. इसके खिलाफ FIA यानी भारतीय एयरलाइंस महासंघ ने MoCA के सचिव समीर सिन्हा को चिट्ठी लिखी है. FIA में कौन-कौन है? इंडिगो, एअर इंडिया और स्पाइसजेट. यानी देश की तीन सबसे बड़ी एयरलाइंस।  एयरलाइंस का तर्क क्या है? एयरलाइंस का कहना है कि यह फैसला उल्टा पड़ेगा. उनका कहना है कि पैसा तो यात्री ही देगा. एयरलाइंस ने साफ कहा, "अगर हम सीट का चार्ज नहीं लेंगे, तो वो पैसा कहीं से तो आएगा. और वो आएगा टिकट के दाम बढ़ाकर।  इसपर सोचने वाली बात है कि अभी आप 4,000 में टिकट लेते हैं और 300 में मनपसंद सीट. कुल 4,300. कल को हो सकता है टिकट ही 4,500 का हो जाए और सीट भले फ्री हो. आपका फायदा क्या हुआ? FIA का कहना है कि जो लोग सस्ती फ्लाइट लेते हैं. बजट ट्रैवलर, परिवार, बार-बार उड़ने वाले लोग उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान होगा. क्योंकि टिकट महंगे होंगे और उनकी जेब पर सीधा असर पड़ेगा।  एयरलाइंस की अपनी पहचान खत्म होगी अभी हर एयरलाइन अपने तरीके से सेवा देती है. कोई सस्ती सीट देता है, कोई ज्यादा लेगरूम देता है, कोई बेहतर खाना देता है. इससे यात्री अपनी पसंद की एयरलाइन चुन सकते हैं. अगर सब एक जैसे नियमों में बंध जाएंगे तो यह अलगप्पन खत्म हो जाएगा।  एयरलाइंस ने एक और बड़ा सवाल उठाया FIA ने यह भी कहा कि DGCA यानी जो सरकारी संस्था हवाई यातायात देखती है उसे कानूनी तौर पर यह अधिकार ही नहीं है कि वो सीट चार्ज जैसी अलग सेवाओं के दाम तय करे।  पहले की अदालती फैसलों का हवाला देते हुए कहा, "यह आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता." यानी एयरलाइंस सिर्फ विरोध नहीं कर रहीं वो यह भी कह रही हैं कि यह आदेश कानूनी रूप से सही नहीं है।  सबसे बड़ी शिकायत – बिना पूछे फैसला एयरलाइंस की सबसे बड़ी नाराजगी यह है कि यह आदेश बिना किसी से पूछे आ गया. FIA ने चिट्ठी में लिखा, "18 मार्च को प्रेस रिलीज से पहले हमें कुछ नहीं बताया गया. न कोई बैठक हुई, न कोई सलाह ली गई." यानी एक दिन अखबार में खबर आई और एयरलाइंस को पता चला कि सरकार ने नया नियम बना दिया।  एयरलाइंस की मांग क्या है? FIA ने सरकार से साफ कहा है कि यह आदेश वापस लीजिए. और यह भी चेताया कि अगर यह चलता रहा तो भविष्य में सरकार किसी भी सेवा के दाम में दखल दे सकती है. इससे एयरलाइंस को अपना कारोबार चलाना मुश्किल हो जाएगा। 

अमेरिकी अधिकारी ने किया बड़ा ऐलान, ‘3-4 दिन में बंदरगाहों तक पहुंचेगा तेल-गैस

नई दिल्‍ली अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग ने पूरी दुनिया के लिए संकट पैदा कर दिया है. इस बीच, अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने शुक्रवार को कहा कि समुद्र में फंसे ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध हटाने से तीन-चार दिनों के भीतर एशिया तक आपूर्ति पहुंच जाएगी।  यह बयान ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका ने समुंद्र में फंसे ईरानी तेल से प्रतिबंध हटा दिया है और 30 दिनों के लिए इन प्रतिबंधों से ढील दी है. इससे पहले वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने गुरुवार को कहा था कि अमेरिका जल्द ही समुद्र में टैंकरों में फंसे ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध हटा सकता है. इस कदम का उद्देश्य ईरान द्वारा स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने के कारण बढ़ती कीमतों को कम करना है।  फॉक्स बिजनेस नेटवर्क के साथ एक इंटरव्‍यू में क्रिस राइट ने कहा कि कुछ ही दिनों में, तीन या चार दिनों के भीतर, वह तेल बंदरगाहों पर पहुंचना शुरू हो जाएगा, जिसके बाद तेल की बढ़ती कीमतों को कम किया जा सकेगा. उन्‍होंने कहा कि मौजूदा प्रतिबंधों के कारण ईरान की कच्चे तेल के निर्यात की क्षमता सीमित हो गई है, जिससे तेल का भंडार बाजारों तक पहुंच नहीं पा रहा है।  ईरान से प्रतिबंध हटाया  अमेरिका ने समुद्र में फंसे ईरानी तेल टैंकरों को छूट दी है. अब ये तेल टैंकर एशिया के बंदरगाहों पर आसानी से पहुंच सकते हैं. अमेरिका ने 1 महीने यानी 19 अप्रैल तक इसमें छूट दी है।  गौरलब है कि वैश्विक तेल व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण जलमार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास ईरान की कार्रवाइयों के बाद कीमतों में भारी उछाल आया है. प्रतिबंध हटाने से आपूर्ति की समस्‍या खत्‍म हो सकती है।  गंभीर संकट का समाना कर सकती है दुनिया ऊर्जा अधिकारियों ने बाजार के दबाव को कम करने और इन आपूर्तियों पर निर्भर अन्य क्षेत्रों के लिए ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए तेल की सप्‍लाई बनाए रखने पर जोर दिया है. इस बीच, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल ने कहा है कि खाड़ी देशों से तेल और गैस की आपूर्ति बहाल करने में 6 महीने तक का समय लग सकता है. फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्‍यू में बिरोल ने चेतावनी दी कि दुनिया इतिहास के सबसे गंभीर ऊर्जा संकट का सामना कर सकती है।  इसके अलावा, सऊदी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान से संबंधित आपूर्ति में रुकावटें अप्रैल के अंत तक जारी रहती हैं, तो तेल की कीमत 180 डॉलर प्रति बैरल या उससे भी अधिक हो सकती है. अनुमानों के अनुसार, 180 डॉलर प्रति बैरल की दर पर अमेरिकियों को 7 डॉलर प्रति गैलन से अधिक भुगतान करना होगा। 

मिशन ईरान के करीब, ट्रंप ने सैन्य अभियान समेटने की ओर इशारा किया

वाशिंगटन अमेरिका-ईरान युद्ध के 21वें दिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला 'एग्जिट प्लान' साझा किया है.  'ट्रुथ सोशल' पर जारी एक विस्तृत पोस्ट में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका अपने सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने के 'बेहद करीब' है और अब वह मध्य पूर्व में जारी अपने बड़े सैन्य अभियानों को धीरे-धीरे कम करने (Winding Down) पर विचार कर रहा है।  ट्रंप ने अपनी पोस्ट में उन उपलब्धियों को गिनाया जिन्हें वे जीत का आधार मान रहे हैं' उन्होंने कहा, 'हमने ईरान की मिसाइल क्षमता, रक्षा औद्योगिक आधार, नौसेना और वायुसेना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है' ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियारों के करीब न पहुंच सके।  इस दौरान ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों-इजरायल, सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन और कुवैत की सुरक्षा सुनिश्चित की है और आगे भी उनकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।  ट्रंप के इस बयान का सबसे अहम हिस्सा 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की सुरक्षा को लेकर था. उन्होंने साफ लहजे में कहा कि जो देश इस समुद्री रास्ते का इस्तेमाल अपने तेल और व्यापार के लिए करते हैं, अब सुरक्षा और पुलिसिंग की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर मदद कर सकता है, लेकिन यह जिम्मेदारी अन्य देशों को निभानी चाहिए।  ट्रंप ने तर्क दिया, 'अमेरिका इस रास्ते का उपयोग नहीं करता है, इसलिए अन्य देशों को आगे आना चाहिए'' उन्होंने इसे उन देशों के लिए एक 'आसान सैन्य अभियान' बताया और कहा कि ईरान का खतरा खत्म होने के बाद अमेरिका की मुख्य भूमिका की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।  आपको बता दें कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम मार्ग है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है. हाल के हफ्तों में यहां हमलों और तनाव के कारण वैश्विक बाजारों पर भी असर पड़ा है. ट्रंप के इस बयान को ऐसे समय में देखा जा रहा है जब युद्ध को लगभग तीन हफ्ते हो चुके हैं और क्षेत्र में अस्थिरता बनी हुई है। 

मुंबई में घर की कीमतों में इजाफा, ईरान-इजरायल तनाव का पड़ा असर

मुंबई मुंबई में प्रॉपर्टी की कीमतें पहले से ही आसमान छू रहीं हैं और अब इनके रेट्स में और तेजी आ सकती है.  Anarock Group की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि मुंबई और उसके आसपास के इलाकों (MMR) में घरों की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसका मुख्य कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में चल रहा तनाव है, जिसकी वजह से निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सामान को लाने-ले जाने का खर्च और कच्चे माल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं।  रिपोर्ट के मुताबिक, ऊंची इमारतों को बनाने का खर्च पहले ही करीब ₹50 प्रति वर्ग फुट तक बढ़ चुका है. जानकारों का मानना है कि बिल्डर्स अब इस बढ़े हुए खर्च की भरपाई घर खरीदारों से करेंगे, जिसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो बजट होम या मध्यम आय वर्ग के घर तलाश रहे हैं।  निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख इनपुट्स की कीमतों में भी तीखी वृद्धि देखी गई है. स्टील की कीमतें लगभग 20 प्रतिशत बढ़कर ₹62 से ₹72 प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई हैं, जबकि हॉट रोल्ड कॉइल की कीमतें ₹51 से ₹56 प्रति किलोग्राम के बीच बनी हुई हैं, जिनमें आगे और बढ़ोतरी की आशंका है।  खाड़ी देशों में उत्पादन में कटौती के चलते एल्युमीनियम की कीमतें ₹3.5 लाख प्रति टन तक जा पहुंची हैं, जिसका उपयोग इमारतों के बाहरी हिस्सों और मेट्रो स्टेशनों जैसे बुनियादी ढांचे में प्रमुखता से होता है. साथ ही, सड़क निर्माण के लिए अनिवार्य बिटुमेन की कीमतें भी बढ़कर ₹48 से ₹51 प्रति किलोग्राम हो गई हैं।  लॉजिस्टिक्स में आ रही हैं बाधाएं लागत में इस अप्रत्याशित वृद्धि का सबसे बड़ा कारण लॉजिस्टिक्स में आने वाली बाधाएं हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावी रूप से बाधित होने के कारण शिपमेंट्स को अब 'केप ऑफ गुड होप' के लंबे रास्ते से भेजा जा रहा है, जिससे समुद्री मार्ग की दूरी 6,000 से 10,000 समुद्री मील बढ़ गई है और डिलीवरी में 10 से 20 दिनों की देरी हो रही है. इस बदलाव ने प्रति कंटेनर माल ढुलाई की लागत में ₹1.5 से ₹3.5 लाख की बढ़ोतरी कर दी है. इसके अलावा, ₹1 लाख प्रति टन के पार पहुंचे समुद्री ईंधन के ऊंचे दाम, युद्ध अधिभार (War surcharges) और बढ़ते बीमा प्रीमियम ने डेवलपर्स की वित्तीय चुनौतियों को और अधिक गंभीर बना दिया है।  

अप्रैल में राशन कार्ड धारकों को मिलेगा तिगुना अनाज, सरकार ने किया बड़ा ऐलान

नई दिल्ली सरकार गरीबी रेखा के नीचे आने वाले सभी लोगों को मुफ्त में राशन मुहैया कराती है। इस बीच केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश के सभी राशन कार्ड धारकों को अप्रैल महीने में तिगुना अनाज देने का ऐलान किया है। केंद्र सरकार के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने इसकी जानकारी दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है, ‘अप्रैल में सभी लाभार्थियों को तीन महीने (अप्रैल, मई और जून 2026) का राशन एक साथ मिलेगा। इसके लिए सभी लाभार्थी अपनी नजदीकी राशन दुकान से निर्धारित समय पर राशन प्राप्त कर सकते हैं।’ आपको बता दें कि सरकार ने फिलहाल इसके पीछे कोई ठोस कारण नहीं बताया है। 41 लाख फर्जी राशन कार्ड खत्म इससे पहले सरकार ने मंगलवार को संसद को बताया कि वर्ष 2025 में 41.41 लाख अपात्र राशन कार्ड खत्म किए गए। राज्यसभा में खाद्य राज्य मंत्री निमुबेन जयंतीभाई बंभानिया ने बताया कि हरियाणा में सर्वाधिक लगभग 13.43 लाख राशन कार्ड, राजस्थान में 6.05 लाख, उत्तर प्रदेश में 5.97 लाख, पश्चिम बंगाल में 3.74 लाख और मध्य प्रदेश में 2.60 लाख अपात्र राशन कार्ड खत्म किए गए। बंभानिया ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में प्रौद्योगिकी के उपयोग के परिणामस्वरूप सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए अपात्र राशन कार्डों को खत्म करने में सफलता हासिल की है। उनके अनुसार, वर्ष 2025 में कुल 41.41 लाख फर्जी राशन कार्ड खत्म किए गए, जबकि 2024 में यह संख्या 48.85 लाख और 2023 में 41.99 लाख थी। बंभानिया ने बताया कि पीडीएस में चल रहे सुधारों के तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राशन कार्ड और लाभार्थियों के आंकड़ों का पूरी तरह डिजिटलीकरण किया जा चुका है। देश की लगभग सभी उचित मूल्य की दुकानों (एफपीएस) को खाद्यान्न वितरण के लिए इलेक्ट्रॉनिक ''प्वाइंट ऑफ सेल'' (ईपीओएस) उपकरणों की स्थापना के माध्यम से स्वचालित किया गया है। इसके अलावा, 99.2 प्रतिशत लाभार्थियों को आधार से जोड़ा जा चुका है और 98.75 प्रतिशत खाद्यान्न वितरण आधार आधारित बायोमेट्रिक सहित डिजिटल प्रमाणीकरण के माध्यम से किया जा रहा है। मंत्री ने कहा, "पीडीएस का डिजिटलीकरण दक्षता और पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से किया जा रहा है, ताकि वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच सुनिश्चित हो सके और खाद्यान्न की चोरी आदि का समाधान किया जा सके।"

क्या BSNL का होगा प्राइवेटाइजेशन? सरकार ने साझा की अहम जानकारी

 नई दिल्‍ली बीएसएनएल को लेकर बुधवार को एक बड़ी जानकारी सामने आई. केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लोकसभा में भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) के प्राइवेटाइजेशन की किसी भी संभावना से इनकार करते हुए कहा कि सरकारी दूरसंचार ऑपरेटर पब्लिक सेक्‍टर की ही कंपनी है।  केंद्रीय मंत्री ने कहा कि बीएसएनएल के प्राइवेटाइजेशन का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. BSNL भारत की जनता की है और भारत की जनता के लिए है. सिंधिया ने कहा कि पीएम मोदी के नेतृत्‍व में सरकार BSNL को मजबूत करने और उसकी टेलीकॉम क्षमताओं का विस्‍तार करने पर फोकस कर रही है।  बीएसएनल के पास थे दो विकल्‍प  उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के लीडरशिप में प्राइवेटाइजेशन का कोई मुद्दा नहीं है, बीएसएनएल देश की जनता की सेवा के लिए है. बीएसएनएल के 4G रोलआउट को लेकर सरकार के नजरिए को समझाते हुए सिंधिया ने कहा कि कंपनी के पास दो विकल्प थे- या तो ग्‍लोबल कंपनियों से टेलीकॉम सेक्‍टर की चीजें खरीदें या स्वदेशी क्षमताएं डेवलप करे।   उन्होंने कहा कि बीएसएनएल ने अन्‍य कंपनियों की तरह, दक्षिण कोरिया, फिनलैंड, स्वीडन या चीन में स्थित अंतरराष्ट्रीय दिग्गजों से उपकरण खरीदकर 4जी नेटवर्क का निर्माण नहीं किया है, बल्कि खुद के उपकरण बनाए हैं।  ग्‍लोबल लेवल पर भारत का 4G डिजिटल स्टैक  सिंधिया ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री ने साहसिक फैसला लेते हुए कहा कि हम सिर्फ सेवाएं ही नहीं देंगे, बल्कि उपकरण भी बनाएंगे. विश्व में पहली बार, केवल चार देश दूरसंचार उपकरण बनाते हैं, और प्रधानमंत्री की बदौलत, भारत का 4G डिजिटल स्टैक अब एक उपकरण निर्माता के तौर पर वैश्विक मंच पर पहुंच चुका है।  5G से पहले 4G नेटवर्क पर फोकस बीएसएनएल उन्होंने यह भी कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री द्वारा सितंबर 2025 में किया गया था. सिंधिया ने कहा कि पहले बीएसएनएल के 8 करोड़ 55 लाख कस्‍टमर्स थे और अब यह संख्या 9 करोड़ 27 लाख हो गई है. हम 5जी को जल्द से जल्द शुरू करने के लिए 4G तकनीक को भी आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन हमें पहले 4G को स्थिर करना होगा. इससे पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी राज्यसभा में बीएसएनएल के पुनरुद्धार के बारे में बात की थी। 

ईरान जंग में अमेरिका का खून के आंसू रोने का कारण, 16 मिलिट्री जेट्स और टैंकर हुए तबाह

वाशिंगटन  ईरान जंग में अमेरिका को बहुत गहरी चोट लगी है. यह एक ऐसा जख्म है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका जमाने तक याद रखेंगे. जी हां, ईरान युद्ध की शुरुआत से अब तक अमेरिका के 16 मिलिट्री जेट्स तबाह यानी नष्ट हो चुके हैं. इनमें ड्रोन और लड़ाकू विमान भी शामिल हैं. इसमें एक नया नाम एफ-35 फाइटर जेट का भी जुड़ गया है. इसे ईरान ने हिट किया है. इसके कारण इस विमान की इमरजेंसी लैंडिंग हुई है और इसे नुकसान पहुंचा है. इन नुकसान को देखकर लगता है कि बहुत कुछ खोकर भी ईरान ने युद्ध में अमेरिका को खून के आंसू रुला दिए हैं. ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध 20 दिन से जारी है. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने एक साथ मिलकर ईरान पर अटैक किया था. उस अटैक में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए थे. तब से ही यह ईरान जंग जारी है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के साथ जंग शुरू होने के बाद से कम से कम 16 अमेरिकी सैन्य विमान नष्ट हो गए हैं. इनमें 10 MQ-9 रीपर ड्रोन शामिल हैं. इन्हें ईरान की गोलीबारी में मार गिराया गया है. अमेरिका के कई ऐसे विमान भी हैं, जिनमें क्रू मौजूद था और वे दुर्घटनाओं या हमलों में नष्ट हो गए. दावा किया गया कि सबसे अधिक नुकसान दुर्घटनाओं की वजह से हुआ. बताया गया कि कुवैत में तीन F-15 लड़ाकू विमान ‘फ्रेंडली फायर’ यानी अपनी ही सेना की गोलीबारी में गिर गए, जबकि एक KC-135 टैंकर विमान ईंधन भरने के ऑपरेशन के दौरान नष्ट हो गया, जिसमें सवार सभी छह क्रू सदस्यों की मौत हो गई. इसके अलावा सऊदी अरब के एक एयरफ़ील्ड पर ईरानी मिसाइल हमले में पांच KC-135 विमान क्षतिग्रस्त हो गए. हालांकि, ईरानी पक्ष का दावा है कि फ्रेंडली फायर नहीं, बल्कि उनके अटैक में अमेरिकी लड़ाकू विमान नष्ट हुए हैं। ईरान जंग में अमेरिका को गहरे जख्म मिले अब तक ईरानी एयर डिफेंस सिस्टम ने युद्ध के दौरान केवल बिना पायलट वाले ‘रीपर’ ड्रोन को ही सफलतापूर्वक निशाना बनाया है. इनमें से कम से कम नौ ड्रोन को हवा में ही मार गिराया गया, जबकि एक अन्य ड्रोन जॉर्डन के एक एयरफ़ील्ड पर बैलिस्टिक मिसाइल का शिकार हो गया. इसके अलावा दो अन्य ड्रोन अलग-अलग दुर्घटनाओं में नष्ट हो गए. ‘रीपर’ ड्रोन को विशेष रूप से अत्यधिक जोखिम वाले मिशनों के लिए डिजाइन किया गया है, क्योंकि इनमें कोई पायलट नहीं होता और इन्हें बदलने का खर्च भी अपेक्षाकृत कम होता है। ईरान जंग में अब भी अमेरिका का पूरा कंट्रोल नहीं ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को बेअसर करने के लिए अमेरिका और इजराय के शुरुआती प्रयासों के बावजूद पूरी तरह से हवाई वर्चस्व हासिल करना मुश्किल साबित हुआ है. ईरानी हिट के बाद एक अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान को मध्य-पूर्व में स्थित एक सैन्य अड्डे पर आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी. विमान का पायलट सुरक्षित बच गया और बताया जा रहा है कि उसकी हालत स्थिर है। अमेरिका ने कबूला सच अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि ईरानी हवाई क्षेत्र पर उनका नियंत्रण अभी भी सीमित है. जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन डैन केन ने कहा कि अमेरिका के पास फिलहाल केवल कुछ ही जगहों पर हवाई बढ़त हासिल है. उसका नियंत्रण पूरे क्षेत्र के बजाय केवल कुछ ही इलाकों तक सीमित है। आखिर अमेरिका को हुए नुकसान की वजह क्या विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन्स का पैमाना और उनकी तीव्रता ही शायद अधिक नुकसान की वजह हो सकती है. रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स के पूर्व अधिकारी पीटर लेटन ने कहा कि इस अंतर की वजह शायद कहीं अधिक जोरदार कोशिशें हो सकती हैं. हर दिन पहले के मुकाबले अधिक उड़ानें भरी जा रही हैं. यह नुकसान अमेरिकी सेना के सामने मौजूद चुनौतियों को उजागर करता है. खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम मार्गों को सुरक्षित करने के प्रयासों में, जहां सक्रिय हवाई सुरक्षा प्रणालियां अभी भी एक बड़ा खतरा बनी हुई हैं ईरान के निशाने पर आया एफ-35 जी हां, एफ-35 को अमेरिका का सबसे एडवांस फाइटर जेट माना जाता है. ईरान जंग में अब यह भी सेफ नहीं रहा. गुरुवार को ईरान की जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी F-35 स्टील्थ फाइटर जेट को निशाना बनाया गया. इसके बाद उसे मजबूरन इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी. सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना तब हुई जब यह पांचवीं पीढ़ी का घातक फाइटर जेट ईरान के ऊपर कॉम्बैट मिशन पर उड़ान भर रहा था. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रवक्ता कैप्टन टिम हॉकिन्स ने बताया कि ईरानी फायर के बाद विमान को मिडिल ईस्ट में स्थित अमेरिकी एयरबेस पर आपात लैंडिंग करनी पड़ी. फिलहाल, इस फाइटर जेट के नुकसान की जांच की जा रही है।

ईरान पर दबाव बढ़ाने की रणनीति! होर्मुज के लिए खर्ग द्वीप कब्जाने की तैयारी में ट्रंप

वॉशिंगटन ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच युद्ध दिन पर दिन और भीषण रूप ले रहा है। अब दोनों तरफ से ही तेल रिफाइनरियों पर हमले किए जा रहे हैं। ईरान की जवाबी कार्रवाइयों में कतर, सऊदी अरब, यूएई और इजरायल में तेल-गैस केंद्रों पर मिसाइलों और ड्रोन बरसाए गए हैं। वहीं, ईरान दुनियाभर को तेल सप्लाई करने वाले स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खोलने के लिए सहमत नहीं हो रहा है। इस बीच, अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप होर्मुज खुलवाने के लिए बड़ा प्लान तैयार कर रहे हैं। एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ईरान को होर्मुज खोलने पर मजबूर करने के लिए खर्ग द्वीप पर कब्जा करने की रणनीति तैयार कर रहे। कितना अहम है ईरान का खर्ग द्वीप खर्ग द्वीप वह द्वीप है, जो ईरान का ऑयल हब यानी कि तेल का मुख्य केंद्र माना जाता है। यहीं से ईरान को 90 फीसदी तेल मिलता है। यह द्वीप ईरान के दक्षिणी तट से करीब 25-30 किलोमीटर की दूरी पर है। पर्शियन गल्फ के बीच में होने की वजह से इसकी लोकेशन भी रणनीतिक है। हाल ही में ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी सेना ने इस द्वीप पर हवाई हमले भी किए थे। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने यहां पर 90 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया था, जिसमें मिसाइल स्टोरेज बंकर, एयर डिफेंस सिस्टम शामिल थे। खर्ग पर कब्जे की रणनीति एक्सियोस ने शुक्रवार को चार ऐसे सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी, जिन्हें इस मामले की जानकारी है, कि ट्रंप प्रशासन ईरान पर होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का दबाव बनाने के लिए, ईरान के खर्ग द्वीप पर कब्जा करने या उसकी घेराबंदी करने की योजनाओं पर विचार कर रहा है। खर्ग द्वीप पर कब्जा करने का ऑपरेशन, जो तट से 15 मील दूर स्थित है और ईरान के 90 फीसदी कच्चे तेल के निर्यात को प्रोसेस करता है, अमेरिकी सैनिकों को सीधे तौर पर हमला करने की जद में ला सकता है। इसलिए, ऐसा कोई भी ऑपरेशन तभी शुरू किया जाएगा जब अमेरिकी सेना होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास ईरान की सैन्य क्षमता को और कमजोर कर देगी। व्हाइट हाउस की सोच की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने कहा, “हमें हमलों के जरिए ईरानियों को और कमजोर करने, द्वीप पर कब्जा करने, और फिर उन्हें पूरी तरह से अपने शिकंजे में लेकर बातचीत के लिए इस्तेमाल करने में लगभग एक महीने का समय लगेगा।” और अधिक सैनिक भेज सकता है अमेरिका अगर ऐसे किसी ऑपरेशन को मंजूरी मिलती है, तो उसके लिए और ज्यादा सैनिकों की जरूरत होगी। तीन अलग-अलग मरीन यूनिट इस क्षेत्र की ओर रवाना हो चुकी हैं। एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि व्हाइट हाउस और पेंटागन जल्द ही और भी ज्यादा सैनिक भेजने पर विचार कर रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ''वह चाहते हैं कि होर्मुज खुला रहे। अगर ऐसा करने के लिए उन्हें खर्ग द्वीप पर कब्ज़ा करना पड़ा, तो वह होगा। अगर वह तटीय आक्रमण करने का फ़ैसला करते हैं, तो वह भी होगा। लेकिन अभी तक ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया है।'' उन्होंने आगे कहा कि ट्रंप समेत हर राष्ट्रपति के कार्यकाल में, संघर्ष वाले इलाकों में हमारे सैनिक हमेशा ज़मीन पर मौजूद रहे हैं। मुझे पता है कि मीडिया में इस बात को लेकर काफी चर्चा होती है, और मैं इसके पीछे की राजनीति भी समझता हूं, लेकिन राष्ट्रपति वही करेंगे जो सही होगा।