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राहुल गांधी के Epstein Files बयान पर हरदीप पुरी का पलटवार, कहा– आरोपों में कोई सच्चाई नहीं

नई दिल्ली लोकसभा में बजट पर चर्चा के दौरान आज कांग्रेस संसद राहुल गांधी ने Epstein Files का जिक्र करते हुए सरकार पर हमला बोला। राहुल गांधी ने दावा किया कि अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट के पास मौजूद इन दस्तावेजों में एक केंद्रीय मंत्री और एक प्रमुख उद्योगपति का नाम शामिल है। सदन को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि एक खास उद्योगपति अभी तक जेल से बाहर क्यों है, जबकि उसका नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादित फाइलों में है। उन्होंने सीधे तौर पर केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम लेते हुए पूछा, "मंत्री जी बताएं कि उस उद्योगपति को एपस्टीन से किसने मिलवाया था?" सदन के बाहर भी राहुल ने दोहराया कि भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता खतरे में है और सरकार बाहरी दबाव में काम कर रही है। इन आरोपों को खारिज करते हुए केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने साफ किया कि राहुल गांधी का हमला पूरी तरह से बेबुनियाद है। उन्होंने बताया कि साल 2014 में जब वे एक अंतरराष्ट्रीय संस्था (IPI) से जुड़े थे और न्यूयॉर्क में थे, तब एक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में उनकी जेफरी एपस्टीन से दो-तीन बार औपचारिक मुलाकात हुई थी। जेफरी एपस्टीन अमेरिका का एक बदनाम फाइनेंसर था, जिस पर नाबालिगों के यौन शोषण और मानव तस्करी के आरोप थे। उसकी मृत्यु के बाद जारी की गई फाइलों में दुनिया भर की कई नामचीन हस्तियों, राजनेताओं और वैज्ञानिकों के नाम शामिल हैं, जो कभी न कभी उसके संपर्क में रहे थे।  

क्या घर बैठे अपडेट हो सकता है बच्चे का आधार? जानें नया तरीका, जब ऐप में न मिले सुविधा

नई दिल्ली बच्चों के आधार कार्ड नए UIDAI ऐप पर अपडेट हो सकते हैं लेकिन बायोमेट्रिक डिटेल्स अपडेट कराने के लिए आपको आधार सेंटर जाना होगा। क्या आपको अपने बच्चे का आधार अपडेट कराना है? सरकार ने 5 साल से बड़े बच्चों का आधार अपडेट कराना अनिवार्य कर दिया है। बता दें कि इसे MBU यानी कि Mandatory Biometric Update कहते हैं। इस उम्र से पहले बनने वाले आधार में बच्चों का बायोमेट्रिक डेटा जैसे कि आंखों का स्कैन (आईरिस स्कैन) और उंगलियों के निशान नहीं लिए जाते। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये ऑप्शन आपको UIDAI के ऐप में मिल जाएगा? क्या आप ऑनलाइन घर बैठे बच्चों का MBU करवा सकते हैं? इसका जवाब है नहीं। दरअसल नए आधार ऐप में आप आधार से जुड़ी कुछ जानकारी अपडेट करवा सकते हैं लेकिन बायोमेट्रिक डिटेल्स ऐप से अपडेट नहीं कराई जा सकती। क्या होता है MBU? MBU का मतलब है Mandatory Biometric Update, जो कि बच्चों के आधार कार्ड के लिए होता है। 5 साल से कम उम्र के बच्चों का आधार कार्ड बनवाते समय उनके बायोमेट्रिक डेटा नहीं लिए जाते। बच्चों का आधार कार्ड माता-पिता के आधार से लिंक होता है। हालांकि 5 साल की उम्र के बाद आधार को अपडेट कराना जरूरी होता है। इसे ही MBU कहते हैं। नए आधार ऐप से हो पाएगा काम? हाल ही में UIDAI ने नया आधार ऐप लॉन्च किया था। इसमें कई तरह के फीचर्स दिए गए हैं। मसलन मोबाइल नंबर और पता बदलने का ऑप्शन इस ऐप में दिया गया है। हालांकि बायोमेट्रिक अपडेट के लिए यूजर को आधार सेंटर विजिट करना पड़ता है। सेंटर पर ही क्यों अपडेट होता है डेटा? सवाल उठता है कि आखिर बायोमेट्रिक डेटा आधार सेंटर पर ही क्यों अपडेट होता है? ऐसा इसलिए क्योंकि बायोमेट्रिक डेटा लेने के लिए कुछ खास मशीनों जैसे कि फिंगरप्रिंट रीडर, आईरिस स्कैनर आदि की जरूरत पड़ती है। यह डिवाइस सेंटर पर मौजूद होते हैं और इसके लिए शख्स या बच्चे का सेंटर पर मौजूद होना जरूरी हो जाता है। वहीं नाम या पता जैसी जानकारी ऐप पर भी जरूरी डॉक्यूमेंट सबमिट करके अपडेट हो सकती है। Aadhaar ऐप ऐसे करेगा मदद हालांकि ऐसा नहीं है कि आधार ऐप बच्चे का आधार अपडेट कराने में बिल्कुल मदद नहीं कर सकती। अगर आप नया आधार ऐप इस्तेमाल करते हैं, तो ऐप में नीचे मौजूद Help ऑप्शन के जरिए मदद ले सकते हैं।     Help सेक्शन में आपको FAQ और CONTACT US का ऑप्शन मिलता है।     आप CONTACT US ऑप्शन के जरिए अपने पास मौजूद आधार सेंटर का पता लगा सकते हैं।     इसके अलावा बच्चों के स्कूलों और पोस्ट ऑफिस में भी MBU का काम किया जा रहा है। आप इन दो जगहों पर भी बच्चे की बायोमेट्रिक डिटेल्स आधार में अपडेट करवा सकते हैं।

सड़क पर चलते ही बजेगा संगीत! भारत के इस शहर में शुरू हुआ ‘मेलोडी रोड’ प्रयोग

मुंबई क्या आपने कभी सोचा है कि जिस सड़क पर आप गाड़ी चला रहे हैं, वही आपके लिए सुरीला संगीत बजाने लगे? भारत में यह कल्पना अब हकीकत बन चुकी है। देश में पहली बार एक ऐसी सड़क तैयार की गई है, जहां टायरों की गड़गड़ाहट नहीं, बल्कि मधुर संगीत सुनाई देगा। इस अनूठी पहल से न सिर्फ ड्राइविंग का अनुभव बदलेगा, बल्कि यह सड़क सुरक्षा की दिशा में भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में इस जादुई सफर की शुरुआत की गई है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुधवार को मुंबई के नवनिर्मित कोस्टल रोड (Coastal Road) पर इस 'मेलोडी रोड' खंड का उद्घाटन किया। समुद्र के किनारे सफर का आनंद अब संगीत के साथ दोगुना हो जाएगा। कैसे काम करती है यह जादुई तकनीक? यह कोई लाउडस्पीकर का कमाल नहीं, बल्कि हंगरी की एक विशेष तकनीक है। इसे वैज्ञानिक तरीके से डिजाइन किया गया है…     खास मार्किंग: सड़क के एक निश्चित हिस्से पर विशेष प्रकार की बारीक खांचें (Grooves) बनाई गई हैं।     संगीत का ट्रिगर: जैसे ही गाड़ी के टायर इन खांचों के ऊपर से गुजरते हैं, घर्षण (Friction) से एक खास फ्रीक्वेंसी पैदा होती है जो संगीत की धुन में बदल जाती है।     स्पीड की शर्त: संगीत का पूरा आनंद तभी मिलता है जब वाहन की गति 60 किलोमीटर प्रति घंटा हो। यदि गाड़ी इससे तेज या धीमी होगी, तो धुन बदल जाएगी। सुरक्षा और मनोरंजन का मेल फिलहाल इसे कोस्टल रोड के कुछ मीटर के हिस्से में प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया है। सरकार की योजना भविष्य में इसकी लंबाई बढ़ाने और अन्य प्रमुख सड़कों पर भी इसे लागू करने की है। यह तकनीक न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि ड्राइवर को एक निश्चित गति सीमा (60 kmph) बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित भी करती है, जिससे हादसों का खतरा कम होता है।

8वें वेतन आयोग के तहत कर्मचारियों को ₹9 लाख तक एरियर, जानिए फॉर्मूला

नई दिल्ली केंद्रीय कर्मचारी आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों का इंतजार कर रहे हैं। वैसे तो वेतन आयोग की सिफारिशें आने में एक साल से भी ज्यादा लगेंगे लेकिन लोग अपनी सैलरी का कैल्कुलेशन अभी से करने लगे हैं। दरअसल, वेतन आयोग की सिफारिशें फिटमेंट फॉर्मूले के तहत लागू होने की उम्मीद है। वहीं, सिफारिशें एक जनवरी 2026 से लागू होंगी तो ऐसे में कर्मचारियों को उम्मीद है कि उन्हें एरियर भी मिलेगा। एरियर की अवधि 18 से 24 महीनों तक की हो सकती है। अब सवाल है कि आखिर कितना तक एरियर मिल सकता है। आइए फिटमेंट फॉर्मूले के अलग-अलग आंकड़ों के हिसाब से समझ लेते हैं। लाखों रुपये का एरियर लेवल 1 से लेवल 5 तक के कर्मचारियों के लिए यह एरियर लाखों रुपये में मिल सकता है। अगर 1 जनवरी 2026 को प्रभावी तिथि मानते हुए 20 महीनों का एरियर लिया जाए और फिटमेंट फैक्टर 2.0, 2.15, 2.28 या 2.57 के आधार पर गणना की जाए, तो लेवल 1 से 5 तक के कर्मचारियों को एकमुश्त बड़ी रकम मिलने की संभावना बनती है। 9 लाख रुपये से ज्यादा एरियर मान लीजिए कि सातवें वेतन आयोग के तहत लेवल 1 कर्मचारियों की बेसिक सैलरी 18,000 रुपये है। वहीं,लेवल 5 कर्मचारियों की सैलरी 29,200 रुपये है। अब आठवें वेतन आयोग के तहत कर्मचारियों का 20 महीने का एरियर 3.60 लाख रुपये से 9.17 लाख रुपये तक बन जाता है। यह कैल्कुलेशन फिटमेंट फैक्टर 2.0, 2.15, 2.28 और 2.57 के आधार पर किया गया है। बता दें कि एरियर की गणना का तरीका सीधा होता है। इसमें 7वें वेतन आयोग के तहत मौजूदा बेसिक पे पर स्वीकृत फिटमेंट फैक्टर लागू कर नई बेसिक सैलरी तय की जाती है। इसके बाद पुरानी और नई सैलरी के बीच का मासिक अंतर निकाला जाता है और उसे देरी के महीनों की संख्या से गुणा किया जाता है। आमतौर पर एरियर में बेसिक पे का अंतर और संशोधित वेतन के अनुसार महंगाई भत्ते (DA) का अंतर शामिल होता है। मांगे गए हैं सुझाव हाल ही में 8वें केंद्रीय वेतन आयोग ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट लॉन्च कर दी है। आयोग ने MyGov पोर्टल पर एक संरचित प्रश्नावली के जरिए मंत्रालयों, विभागों, केंद्रीय कर्मचारियों और अन्य हितधारकों से सुझाव भी मांगे हैं। मतलब ये कि आप वेतन आयोग को किसी भी तरह के सुझाव दे सकते हैं। अगर सुझाव सही होंगे तो उस पर अमल भी किया जा सकता है। बता दें कि केंद्र सरकार ने जनवरी 2025 में 8वें वेतन आयोग की घोषणा की थी, जबकि वित्त मंत्रालय ने 3 नवंबर को इसकी अधिसूचना जारी की।

थाईलैंड के डे-केयर सेंटर में गोलीबारी, 22 बच्चों समेत 34 की हत्या

बैंकाक थाईलैंड से दहशतगर्दी की बड़ी घटनाएं सामने आई हैं. यहां दो अलग-अलग घटनाओं में 34 लोगों की हत्या कर दी गई है, जिसमें 22 बच्चे शामिल हैं. इन घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है. सामने आया है कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी ने डे-केयर सेंटर में घुसकर 34 लोगों की हत्या कर दी. इसके अलावा साउथ थाईलैंड के हाट याई में मौजूद एक स्कूल में 18 साल के युवक ने फायरिंग कर दो लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया और एक महिला कर्मचारी को बंधक बना लिया. इसे थाईलैंड के इतिहास की सबसे भयावह घटना के तौर पर देखा जा रहा है. एक पूर्व पुलिस अफसर ने एक डे-केयर सेंटर में अंधाधुंध फायरिंग कर दी. इस हमले में कम से कम 22 बच्चों और 12 वयस्कों की मौत हो गई. स्थानीय प्रशासन के अनुसार, यह देश के इतिहास की सबसे घातक मास शूटिंग है. घटना के बाद पूरे इलाके में शोक पसर गया और लोगों में गुस्सा भी है.  पुलिस मामले की जांच कर रही है और हमले के पीछे की मंशा का पता लगाने की कोशिश कर रही है.

संसद में पाकिस्तान का कबूलनामा! रक्षा मंत्री बोले- अमेरिका ने किया फायदा, हमें छोड़ा मुश्किल में

 इस्लामाबाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में स्वीकार किया है कि अमेरिका ने अपने रणनीतिक हितों के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और फिर उसे 'टॉयलेट पेपर से भी बदतर तरीके से फेंक दिया'. उन्होंने कहा कि अमेरिका की जंगों में शामिल होने का खामियाजा पाकिस्तान को भारी कीमत चुकाकर उठाना पड़ा. ख्वाजा आसिफ ने 1999 के बाद अफगानिस्तान में पाकिस्तान की दोबारा सक्रिय भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि उस वक्त इस्लामाबाद ने एक बार फिर वॉशिंगटन के साथ खड़े होने का फैसला किया, ताकि अमेरिकी समर्थन हासिल किया जा सके. उन्होंने साफ कहा कि यह फैसला पाकिस्तान के लिए तबाही भरा साबित हुआ. 'जिहाद के नाम पर बड़ी गलती हुई' पाकिस्तान में वर्षों से गढ़ी गई आधिकारिक धारणाओं को खारिज करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि अफगान युद्धों में पाकिस्तान की भागीदारी इस्लाम की रक्षा के लिए नहीं थी. उन्होंने खुलकर स्वीकार किया कि पाकिस्तानियों को जिहाद के नाम पर लड़ने और मरने भेजा गया, जो एक गलत फैसला था. ख्वाजा आसिफ ने यह भी बताया कि इन युद्धों को जायज ठहराने के लिए पाकिस्तान के शिक्षा पाठ्यक्रम तक में बदलाव किए गए और आज भी वे बदलाव पूरी तरह वापस नहीं लिए जा सके हैं. उन्होंने कहा कि 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ अफगान युद्ध धार्मिक कर्तव्य नहीं बल्कि अमेरिकी रणनीति का हिस्सा था. आसिफ के मुताबिक, रूस ने अफगानिस्तान पर इस तरह कब्जा नहीं किया था कि जिहाद का ऐलान जरूरी हो, इसके बावजूद पाकिस्तान उस युद्ध में कूद पड़ा. उन्होंने माना कि उस फैसले के दुष्परिणाम दशकों बाद भी देश भुगत रहा है. 'अमेरिका ने इस्तेमाल किया और छोड़ दिया' रक्षा मंत्री ने कहा कि 1999 के बाद अमेरिका के साथ फिर से खड़े होने की पाकिस्तान को बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी, जिससे देश आज तक पूरी तरह उबर नहीं सका है. उन्होंने पूर्व सैन्य शासकों जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ पर सीधा हमला करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने पाकिस्तान को ऐसी जंगों में झोंक दिया, जो उसकी नहीं थीं. संसद में बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान को 'टॉयलेट पेपर से भी बदतर' तरीके से इस्तेमाल किया गया. पहले जरूरत पड़ी तो साथ लिया गया और फिर बेरहमी से छोड़ दिया गया. 11 सितंबर 2001 के बाद के दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अमेरिका के नेतृत्व वाली वॉर ऑन टेरर में तालिबान के खिलाफ मोर्चा लिया. हालांकि बाद में अमेरिका वहां से चला गया, लेकिन उस जंग के दीर्घकालिक दुष्परिणाम आज भी पाकिस्तान झेल रहा है. ख्वाजा आसिफ ने कहा, 'इस नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो सकती.' उन्होंने इन फैसलों को अपरिवर्तनीय गलतियां करार देते हुए कहा कि इन्हीं कारणों से पाकिस्तान दूसरों की जंगों में एक मोहरा बनकर रह गया.

206 अरब डॉलर का अमेरिकी बाजार खुला भारत के लिए, कौन-कौन से सेक्टर होंगे फायदे में

नई दिल्ली भारत के एग्रीकल्चर सेक्टर के लिए एक बड़ा मौका सामने आया है. लंबे समय से भारतीय किसान और फूड एक्सपोर्ट करने वाले अमेरिकी मार्केट में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहते थे, और अब हालात उनके पक्ष में दिख रहे हैं. अमेरिका का कुल कृषि आयात बाजार करीब 206 अरब डॉलर का है, जो दुनिया के सबसे बड़े इम्पोर्ट मार्केट्स में गिना जाता है. नई ट्रेड व्यवस्था के तहत भारत को इस बड़े बाजार में एंट्री आसान होने जा रही है. कुछ भारतीय प्रोडक्ट्स को पूरी तरह जीरो ड्यूटी पर एंट्री मिलेगी, जबकि कई अन्य सामानों पर पहले से कम टैरिफ देना होगा. इसका सीधा असर यह होगा कि भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में ज्यादा किफायती और कॉम्पिटिटिव हो जाएगा. वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका के 46 अरब डॉलर के एग्रीकल्चर इम्पोर्ट सेगमेंट में भारत को जीरो ड्यूटी का फायदा मिलेगा. इसमें मसाले, प्रोसेस्ड फूड, फल, चाय, कॉफी और एसेंशियल ऑयल जैसे अहम प्रोडक्ट शामिल हैं. इसके अलावा करीब 160 अरब डॉलर के बड़े हिस्से में भारतीय सामान 18 प्रतिशत की कम रेसिप्रोकल टैरिफ रेट पर जाएगा. यानी पहले जहां ज्यादा ड्यूटी लगती थी, अब वहां कम शुल्क लगेगा. इससे एक्सपोर्ट की लागत घटेगी और अमेरिकी खरीदारों के लिए भारतीय प्रोडक्ट्स ज्यादा आकर्षक बनेंगे. भारत का होगा ट्रेड सरप्लस आंकड़े भी भारत के पक्ष में संकेत दे रहे हैं. साल 2024 में भारत ने अमेरिका को लगभग 3.4 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद निर्यात किए, जबकि आयात 2.1 अरब डॉलर का रहा. इस तरह भारत को करीब 1.3 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस मिला. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर नई टैरिफ व्यवस्था सही समय पर लागू हो जाती है, तो यह सरप्लस और बढ़ सकता है. इसका फायदा सीधे किसानों, प्रोसेसिंग यूनिट्स और एक्सपोर्ट कंपनियों को मिलेगा. यह जीरो ड्यूटी की सुविधा एक इंटरिम ट्रेड एग्रीमेंट पर साइन होने के बाद लागू होगी, जिसकी संभावना मार्च के आसपास जताई जा रही है. वहीं 18 प्रतिशत की कम टैरिफ दर तब प्रभावी होगी, जब अमेरिका इस संबंध में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी करेगा. उम्मीद है कि यह प्रक्रिया जल्दी पूरी हो सकती है. यानी आने वाले कुछ महीनों में जमीन पर इसका असर दिखने लगेगा. मसालों को मिलेगा सबसे अधिक लाभ अगर प्रोडक्ट कैटेगरी की बात करें तो मसालों के सबसे अधिक लाभ मिलने वाला है. अभी अमेरिका के कुल मसाला आयात में भारत की हिस्सेदारी करीब 18 प्रतिशत है, जिसकी वैल्यू लगभग 2.01 अरब डॉलर है. चाय और कॉफी की हिस्सेदारी फिलहाल 1 प्रतिशत से भी कम है, जबकि पूरा बाजार 9.38 अरब डॉलर का है. इसका मतलब है कि यहां ग्रोथ की बड़ी गुंजाइश मौजूद है. फलों में आम और केले जैसे प्रोडक्ट अमेरिका की कुल खरीद का सिर्फ 0.3 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं. वहीं प्रोसेस्ड फलों का इम्पोर्ट लगभग 759 मिलियन डॉलर का है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी करीब 4.6 प्रतिशत है. साफ है कि सही रणनीति के साथ यह आंकड़ा कई गुना बढ़ सकता है. वनों वाले प्रोडक्ट्स जैसे बांस की कोपलें, वेजिटेबल वैक्स, नट्स और बीजवैक्स भी अलग-अलग सेगमेंट में 0.2 प्रतिशत से लेकर 38 प्रतिशत तक हिस्सेदारी रखते हैं. अब जब टैरिफ में राहत मिलेगी, तो इन प्रोडक्ट्स की डिमांड में इजाफा हो सकता है. खास तौर पर वे प्रोडक्ट्स, जिनकी क्वालिटी पहले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाती है, उन्हें बड़ा फायदा मिल सकता है. मरीन सेक्टर को भी मिलेगा फायदा 18 प्रतिशत की रेसिप्रोकल टैरिफ व्यवस्था से मरीन सेक्टर को भी बड़ा बूस्ट मिल सकता है. खासकर झींगा जैसे उत्पाद, जिनका अमेरिकी इम्पोर्ट मार्केट करीब 25 अरब डॉलर का है. इसके अलावा बासमती और प्रीमियम चावल, तिल जैसे ऑयलसीड्स और कुछ खास फलों को भी इस रियायत का लाभ मिलेगा. अगर सप्लाई चेन मजबूत रही और क्वालिटी स्टैंडर्ड्स पूरे किए गए, तो भारत इस सेगमेंट में तेजी से आगे बढ़ सकता है. कुल मिलाकर यह कदम भारतीय एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है. लेकिन सिर्फ टैरिफ में छूट काफी नहीं होगी. सरकार और एक्सपोर्टर्स को क्वालिटी कंट्रोल, टाइमली सप्लाई, पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर भी फोकस करना होगा. अगर इन पहलुओं पर गंभीरता से काम हुआ, तो आने वाले समय में अमेरिकी बाजार में भारत की हिस्सेदारी कई गुना बढ़ सकती है और इसका सीधा फायदा देश के किसानों और एग्री-बिजनेस से जुड़े लोगों को मिलेगा.

ट्रंप का गुस्सा: महिला नेता की बात से प्रभावित, देश पर बढ़ाया टैरिफ

वाशिंगटन  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड पर टैरिफ बढ़ा दिया था। अब उन्होंने खुलकर इसकी वजह पर भी बात की है। उन्होंने कहा है कि उन्हें स्विट्जरलैंड की महिला नेता का बात करने का तरीका पसंद नहीं आया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी बताया कि महिला नेता छोटा देश होने का हवाला देते हुए टैरिफ में राहत की मांग भी कर रही थीं। फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने स्विस फेडरल काउंसिल की सदस्य कैरिन कैलर सटर से हुई बातचीत का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने स्विस नेता को बता दिया कि छोटा देश होने के बाद अमेरिका के साथ उसका 42 बिलियन डॉलर का ट्रेड डेफिसिट है। ट्रंप ने कहा, 'मैंने 30 फीसदी टैरिफ लगाया था, जो काफी कम था। इसके बाद मुझे कॉल आया, जो मुझे लगा कि स्विट्जरलैंड की प्रधानमंत्री का था। और वह बहुत आक्रामक, लेकिन अच्छे से बात कर रहीं थीं। वह बहुत आक्रामक थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि सर हम छोटे से देश हैं। हम ऐसा नहीं कर पाएंगे। हम ऐसा नहीं कर सकते। वह फोन रखने को तैयार ही नहीं थीं।' ट्रंप ने कहा, 'नहीं, नहीं, हम एक छोटा देश हैं। बार-बार एक ही बात। वह फोन रखने के लिए तैयार ही नहीं थीं और टैरिफ 30 फीसदी था। और जिस तरह से उन्होंने मुझसे बात की मुझे अच्छा नहीं लगा। ऐसे में उन्हें रियायत देने के बजाए, मैंने उसे बढ़ाकर 39 प्रतिशत कर दिया था।' उन्होंने दावा किया कि स्विट्जरलैंड अपना सामान अमेरिका निर्यात कर रहा था, लेकिन कोई भी टैरिफ नहीं दे रहा था। पहले भी किया था दावा दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भी ट्रंप ने स्विट्जरलैंड की नेता से बात करने का दावा किया था। उन्होंने कहा था, 'मुझे लगता है प्रधानमंत्री थीं। मुझे नहीं पता राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री किसका फोन था। एक महिला थीं। वह एक ही बात बार-बार दोहरा रही थीं। वह कह रही थीं, नहीं नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते। 30 फीसदी टैरिफ। हम बहुत छोटे देश हैं। लेकिन मैंने कहा कि आप भले ही छोटे हैं, लेकिन डेफिसिट बड़ा है।' खास बात है कि स्विट्जरलैंड में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं होता। यहां सरकार की अगुवाई फेडरल काउंसिल की तरफ से की जाती है, जिसमें सात सदस्य होते हैं। भारत के साथ डील हाल ही में अमेरिका ने भारत के साथ ट्रेड डील की है, जिसके बाद टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत पर आ गया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच 'ट्रुथ सोशल' पर बीते सोमवार को घोषणा की थी कि भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं।

वंदे मातरम् पर नया सरकारी फैसला: जन गण मन से पहले गायन, पालन होगा जरूरी

नई दिल्ली केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया है. इसके तहत राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के छह अंतरों वाला 3 मिनट 10 सेकंड का पूरा संस्करण कई आधिकारिक अवसरों पर बजाया या गाया जाना अब अनिवार्य कर दिया गया है. हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मंत्रालय का यह 10 पन्नों का आदेश 28 जनवरी को जारी किया गया है, जो सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, मंत्रालयों और संवैधानिक संस्थाओं को भेजा जा चुका है. गृह मंत्रालय के आदेश के अनुसार, तिरंगा फहराए जाने के समय, राष्ट्रपति के किसी कार्यक्रम में आगमन और प्रस्थान पर, राष्ट्र के नाम उनके संबोधन से ठीक पहले और बाद में, तथा राज्यपाल या उपराज्यपाल के आगमन-प्रस्थान और भाषणों से पहले-बाद में ‘वंदे मातरम्’ बजाया या गाया जाएगा. अगर किसी कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ और उसके बाद ‘जन गण मन’ होगा. इस दौरान उपस्थित लोगों को सावधान मुद्रा में खड़े रहना होगा. वंदे मातरम् के समय खड़ा होना अनिवार्य रिपोर्ट के मुताबिक, मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जब ‘वंदे मातरम्’ का आधिकारिक संस्करण बजाया या गाया जाए, तो श्रोताओं को सम्मान में खड़ा होना चाहिए. हालांकि, अगर किसी समाचार फिल्म या डॉक्यूमेंट्री में यह गीत फिल्म का हिस्सा हो, तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाएगी, ताकि कार्यक्रम में अव्यवस्था न हो. दरअसल अब तक ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रोटोकॉल नहीं था, जबकि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के लिए समय, धुन और प्रस्तुति के नियम पहले से तय हैं. यह पहली बार है जब छह अंतरों वाले विस्तारित संस्करण को आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं. क्या हैं नियम वंदे मातरम को कई आधिकारिक कार्यक्रमों में गाया जाना अनिवार्य किया गया है। इनमें ध्वजारोहण के दौरान, कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आने से पहले और जाने के बाद, राज्यपालों के आने से पहले और जाने के बाद शामिल है। पद्म पुरस्कार जैसे समारोहों के दौरान भी वंदे मातरम गाया जाना जरूरी है। इसके अलावा सरकार ने कार्यक्रमों की सूची भी जारी की है। अंग्रेजों ने की रोक लगाने की कोशिशें PIB के अनुसार, गाने और नारेदोनों के तौर परवंदे मातरम के बढ़ते प्रभाव से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने इसके प्रसार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए। नए बने पूर्वी बंगाल प्रांत की सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में वंदे मातरम गाने या बोलने पर रोक लगाने वाले परिपत्र जारी किए। शैक्षणिक संस्‍थानों को मान्यता रद्द करने की चेतावनी दी गई, और राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा लेने वाले छात्रों को सरकारी नौकरी से निकालने की धमकी दी गई थी। नवंबर 1905 में, बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों में से हर एक पर 5-5 रुपये का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि वे वंदे मातरम गाने के दोषी थे। रंगपुर में, बंटवारे का विरोध करने वाले जाने-माने नेताओं को स्पेशल कांस्टेबल के तौर पर काम करने और वंदे मातरम गाने से रोकने का निर्देश दिया गया। नवंबर 1906 में, धुलिया (महाराष्ट्र) में हुई एक विशाल सभा में वंदे मातरम के नारे लगाए गए। 1908 में, बेलगाम (कर्नाटक) में, जिस दिन लोकमान्य तिलक को बर्मा के मांडले भेजा जा रहा था, वंदे मातरम गाने के खिलाफ एक मौखिक आदेश के बावजूद ऐसा करने के लिए पुलिस ने कई लड़कों को पीटा और कई लोगों को गिरफ्तार किया। तीन कैटेगरी में बांटे गए कार्यक्रम आदेश में कार्यक्रमों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है. पहली श्रेणी में वे अवसर हैं, जहां राष्ट्रीय गीत केवल बजाया जाएगा, जैसे- नागरिक अलंकरण समारोह, राष्ट्रपति का औपचारिक राजकीय समारोहों में आगमन-प्रस्थान, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और बाद में, राज्यपाल या उपराज्यपाल का औपचारिक कार्यक्रमों में आगमन-प्रस्थान, परेड में राष्ट्रीय ध्वज लाए जाने के समय आदि. दूसरी श्रेणी में वे कार्यक्रम शामिल हैं, जहां गीत को बजाने के साथ-साथ सामूहिक गायन भी होगा. इसमें राष्ट्रीय ध्वज फहराने के अवसर, सांस्कृतिक और औपचारिक समारोह (परेड को छोड़कर), तथा राष्ट्रपति का किसी सरकारी या सार्वजनिक कार्यक्रम में आगमन और प्रस्थान शामिल है. इसके लिए कोयर, साउंड सिस्टम और आवश्यकता होने पर गीत के बोल वितरित करने की भी सलाह दी गई है. तीसरी श्रेणी में वे अवसर हैं, जहां ‘वंदे मातरम्’ गाया जा सकता है, जैसे स्कूलों के कार्यक्रम. आदेश में कहा गया है कि स्कूलों में दिन की शुरुआत सामूहिक रूप से राष्ट्रीय गीत गाकर की जा सकती है और छात्रों में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान बढ़ाने के प्रयास किए जाएं. वंदे मातरम् पर नए आदेश की खास बातें केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर क्या नया आदेश जारी किया है? गृह मंत्रालय ने निर्देश दिया है कि अब ‘वंदे मातरम्’ का छह अंतरों वाला, 3 मिनट 10 सेकंड का आधिकारिक संस्करण कई सरकारी और औपचारिक कार्यक्रमों में बजाया या गाया जाएगा. किन-किन मौकों पर ‘वंदे मातरम्’ बजाना या गाना अनिवार्य होगा? राष्ट्रपति के आगमन-प्रस्थान, तिरंगा फहराने, राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले-बाद, राज्यपाल/उपराज्यपाल के कार्यक्रमों और नागरिक अलंकरण समारोहों जैसे अवसरों पर. अगर ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ दोनों बजें तो क्रम क्या होगा? पहले ‘वंदे मातरम्’ और उसके बाद राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बजाया जाएगा. क्या सभी लोगों के लिए खड़ा होना जरूरी होगा? हां, जब आधिकारिक रूप से गीत बजाया या गाया जाए तो सभी को सावधान मुद्रा में खड़ा होना होगा. क्या हर स्थिति में खड़ा होना अनिवार्य है? नहीं, अगर किसी डॉक्यूमेंट्री या न्यूज़रील में ‘वंदे मातरम्’ फिल्म का हिस्सा हो, तो खड़े होने की जरूरत नहीं होगी. स्कूलों के लिए क्या निर्देश हैं? स्कूलों में दिन की शुरुआत सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम्’ गाकर की जा सकती है. वंदे मातरम् पर सरकार का जोर यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम्’ को लोकप्रिय बनाने पर जोर दे रही है. हाल ही में संसद में राष्ट्रीय गीत की 150वीं जयंती पर लंबी बहस हुई थी और इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड का विषय भी ‘स्वतंत्रता का मंत्र – वंदे मातरम्’ रखा गया था. बंगाली साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1870 के दशक में रचित इस गीत के पहले … Read more

फेक AI कंटेंट पर सख्ती: सरकार ने जारी की नई डिजिटल नियमावली

नई दिल्ली  भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही फर्ज़ी वीडियो, डीपफेक, ऑनलाइन ठगी और गलत जानकारी का खतरा भी बढ़ा है. इन्हीं समस्याओं पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने आईटी नियमों में बड़ा बदलाव किया है. भारत सरकार ने इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी ((Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) रूल्स, 2021 में संशोधन करते हुए नए नियम नोटिफाई किए हैं, जो 20 फरवरी 2026 से लागू होंगे. इन नए नियमों के तहत अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मैसेजिंग ऐप्स, वीडियो शेयरिंग साइट्स और एआई टूल्स को यह साफ बताना होगा कि कोई कंटेंट एआई से बना है या उसमें एआई का इस्तेमाल किया गया है. भारत सरकार का साफ कहना है कि यूजर्स को यह जानने का हक है कि वो जो भी देख या सुन रहे हैं, वह असली है या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई टेक्नोलॉजी की मदद से बनाया गया है. एआई और सिंथेटिक कंटेंट की नई परिभाषा भारत सरकार ने एआई-जनरेटेड कंटेंट और सिंथेटिक कंटेंट की परिभाषा को पहले से ज्यादा बेहतर बना दिया है. अब फोटो, वीडियो, ऑडियो, ग्राफिक्स या किसी भी डिजिटल कंटेंट को, अगर कंप्यूटर या एआई टेक्नोलॉजी से इस तरह बदला गया है कि आम यूज़र को उसमें फर्क न समझ आए, तो उसे सिंथेटिक कंटेंट माना जाएगा. इसका सीधा निशाना डीपफेक कंटेंट है, जिसमें किसी व्यक्ति की नकली वीडियो या आवाज़ बनाकर उसे गलत तरीके से पेश किया जाता है. ऐसे कंटेंट को अब गैरकानूनी जानकारी की कैटेगिरटी में रखा जाएगा. हालांकि, सरकार ने यह भी साफ किया है कि सामान्य फोटो एडिटिंग, कलर करेक्शन, सबटाइटल जोड़ना, ट्रांसलेशन, पढ़ाई या एक्सेसिबिलिटी से जुड़े काम सिंथेटिक कंटेंट नहीं माने जाएंगे, जब तक कि वो लोगों को गुमराह न करें.     AI कंटेंट पर लेबलिंग होगी जरूरी: नए नियमों के मुताबिक एआई से बने या बदले गए कंटेंट पर साफ लेबल लगाना अनिवार्य होगा. वीडियो में ऑन-स्क्रीन टैग दिखेगा और ऑडियो कंटेंट की शुरुआत में यह बताया जाएगा कि यह एआई से तैयार किया गया है. इसके अलावा कंटेंट में मेटाडेटा भी जोड़ा जाएगा, जिससे यह पता चल सके कि वह किस प्लेटफॉर्म या टूल से बनाया गया है.     कंटेंट हटाने की समय सीमा बेहद कम: अब किसी भी गैरकानूनी या नुकसानदेह कंटेंट को हटाने के लिए प्लेटफॉर्म्स को पहले की तरह 36 घंटे नहीं, बल्कि सिर्फ 3 घंटे का समय मिलेगा. आपातकालीन शिकायतों पर कार्रवाई का समय भी घटाकर 2 घंटे कर दिया गया है.     बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सख्ती: Facebook, Instagram, YouTube, X जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स को अब पोस्ट अपलोड करते वक्त यूजर्स से यह घोषणा लेनी होगी कि कंटेंट AI से बना है या नहीं. प्लेटफॉर्म्स को तकनीकी तरीकों से इस दावे की जांच भी करनी होगी और AI कंटेंट को साफ तौर पर अलग दिखाना होगा. नियमों का पालन न करने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है.     हर तीन महीने यूजर्स को चेतावनी जरूरी: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अब हर तीन महीने में यूजर्स को यह याद दिलाना होगा कि नियम तोड़ने पर अकाउंट सस्पेंड या बंद हो सकता है. ये नोटिस अंग्रेजी या भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं में दिए जा सकते हैं. गंभीर मामलों में प्लेटफॉर्म्स को पुलिस या जांच एजेंसियों को सूचना देना भी अनिवार्य होगा.     AI टूल देने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी: जो प्लेटफॉर्म एआई या डीपफेक बनाने के टूल देते हैं, उन्हें यूजर्स को साफ चेतावनी देनी होगी कि गलत इस्तेमाल करने पर जेल और कानूनी कार्रवाई हो सकती है. अगर कोई नियम तोड़ता है, तो प्लेटफॉर्म को कंटेंट हटाने, अकाउंट बंद करने, सबूत सुरक्षित रखने और जरूरत पड़ने पर जानकारी शेयर करने की जिम्मेदारी निभानी होगी. कुल मिलाकर, ये नए नियम भारत में एआई कंटेंट को लेकर अब तक की सबसे सख्त और व्यापक पहल माने जा रहे हैं, जो डिजिटल दुनिया को ज्यादा सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम हैं.