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सुप्रीम कोर्ट ने नीट पीजी Cut Off को लेकर जताई चिंता, कम Cut Off पर किया सवाल

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने नीट पीजी 2025 के क्वालिफाइंग कटऑफ को शून्य और नेगेटिव वैल्यू किए जाने पर चिंता जताई है. SC का कहना है कि माइनस 40 क्राइटेरिया तय करना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है. सीटें खाली रहने के कारण इस तरह का क्राइटेरिया सेट करना सही नहीं है. जजों ने जताई चिंता इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अराधे की बेंच कर रही थी. जजों ने कहा कि खाली सीटें बेकार नहीं जानी चाहिए, लेकिन सिर्फ कैंडिडेट्स की कमी के कारण कटऑफ इतना घटाना सही नहीं है. इससे एलिजिबिलिटी का जो क्राइटेरिया सेट किया जा रहा है, उसके कमजोर होने का डर है. याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट सत्याम सिंह राजपूत थे. NBEMS ने घटाया था परसेंटाइल दरअसल, नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने कुछ समय पहले NEET PG 2025 एडमिशन के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल में बदलाव किया है. सीट खाली रह जाने का हवाला देते हुए NBEMS ने परसेंटाइल घटाया. NBEMS ने बताया था कि राउंड 2 काउंसलिंग पूरी हो गई है और उसके बाद भी सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों की 18,000 से ज्यादा PG सीटें खाली रह गई थीं. ऐसे में परसेंटाइल घटाया गया. EWS वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल 50 से घटाकर 7 परसेंटाइल कर दिया गया था. वहीं जनरल PwBD कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए 45 की जगह केवल 5 परसेंटाइल का मानक तय किया गया था. इसके अलावा SC, ST और OBC वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल 40 से घटाकर शून्य (0) परसेंटाइल कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में क्या-क्या हुआ? केंद्र सरकार की ओर से सीटें खाली रह जाने का तर्क दिया गया. इस पर SC ने कहा कि आखिरी बैलेंस बनाने के लिए मानकों को कितनी हद तक गिराया जा सकता है. जजों ने केंद्र के उस तर्क पर भी विचार किया जिसमें कहा गया था कि जिन उम्मीदवारों को ढील के तहत दाखिला दिया जा रहा है, उनके पास पहले से MBBS की डिग्री है. हालांकि याचिकाकर्ताओं ने उनकी योग्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ MBBS होना पर्याप्त नहीं है. अगर वे NEET PG परीक्षा पास नहीं कर पाए हैं. कितनी हैं नीट पीजी की सीटें? इससे पहले देशभर के अलग-अलग हिस्सों में नीट परसेंटाइल घटाए जाने पर बवाल मचा था. भारत में हर साल करीब 2.4 लाख स्टूडेंट्स नीट पीजी परीक्षा देते हैं. इनमें से करीब 1 लाख स्टूडेंट्स पास होते हैं. फिलहाल देश में लगभग 80,000 नीट पीजी सीट्स हैं. समय-समय पर सीट में बदलाव होता रहता है. साल 2021 से 2025 सीटों की संख्या बढ़ाई गई है.

India-US डील की 10 बड़ी बातें: $30 ट्रिलियन का मार्केट और 18% टैरिफ का आगाज

 नई दिल्‍ली भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील अगले हफ्ते साइन हो समती है. हालांकि उससे पहले दोनों देश ने अंतरिम ट्रेड एग्रीमेंट (India-US Trade Agreement) का फ्रेमवर्क जारी किया है. इसके तहत भारत पर आज से  18 फीसदी टैरिफ लगाया जाएगा. रूस से तेल खरीदने को लेकर लगाया गया एक्‍स्‍ट्रा 25%  टैरिफ को भी हटा दिया गया है.  भारत और अमेरिका के इस फ्रेमवर्क को जल्‍द लागू किया जा सकता है और दोनों देशों के बीच व्‍यापक द्विपक्षीय व्‍यापार समझौता (BTA) के तौर पर बात आगे बढ़ेगी. यह फ्रेमवर्क 13 फरवरी से शुरू हो रहे भारत-अमेरिका द्व‍िपक्षीय व्‍यापार समझौता (BTA) वार्ता को आगे बढ़ाएंगे. पीयूष गोयल ने जानकारी दी कि इस वार्ता के तहत धीरे-धीरे बाजार पहुंच बढ़ेगी, सप्‍लाई चेन को मजबूत किया जाएगा और  ट्रेड बैरियर जैसे प्रावधान खत्‍म किए जा सकते हैं. साथ ही भारत और अमेरिका सभी औद्योगिक चीजों पर टैरिफ को कम कर सकते हैं. वाणिज्‍य मंत्री ने कहा कि यह ट्रेड डील भारत के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर का मार्केट खोलेगा.  ट्रेड डील की 10 बड़ी बातें     अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ को हटाकर 18 फीसदी टैरिफ आज से लागू कर दिया है.      टैरिफ कम करने के बाद भारत के लिए अमेरिका 30 ट्रिलियन डॉलर का मार्केट खोलेगा.      जिसके तहत टेक्‍सटाइल, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर उत्पाद, जैविक रसायन, घरेलू सजावट, हस्तशिल्प उत्पाद और चुनिंदा मशीनरी जैसे कारोबार को बडा अवसर मिलेगा.      भारत ने अगले पांच साल में 500 अरब डॉलर की वस्‍तुओं को खरीदने की सहमति जताई है, जिसमें तेल,  विमान, फाइटर जेट, एनर्जी और कुछ खाद्य पदार्थ शामिल हैं.      भारत अमेरिका के सभी औद्योगिक सामानों और कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर टैरिफ हटा देगा या कम कर देगा.      इसमें सूखे अनाज, पशु आहार के लिए लाल ज्वार, मेवे, ताजे और प्रोसेसिंग  फ्रूट, सोयाबीन तेल, शराब और स्पिरिट शामिल हैं.      वहीं अमेरिका भारत के लिए  जेनेरिक फार्मास्यूटिकल्स, रत्न और हीरे और विमान के पुर्जों जैसे चुनिंदा उत्पादों पर टैरिफ समाप्त कर देगा.      इस डील से लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME), किसानों और मछुआरों को ज्‍यादा लाभ होगा. महिलाओं और  युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे.      भारत ने  मक्का, गेहूं, चावल, सोया, मुर्गी पालन, मांस, दूध, पनीर (डेयरी), इथेनॉल (ईंधन), तंबाकू और कुछ सब्जियों जैसे प्रमुख उत्पादों पर कोई टैरिफ रियायत नहीं दी है.      भारत अगले पांच वर्षों में 500 अरब अमेरिकी डॉलर की अमेरिकी ऊर्जा, विमान, बहुमूल्य धातुएं, प्रौद्योगिकी उत्पाद और कोकिंग कोयला खरीदेगा. जीपीयू और डेटा-सेंटर उत्पादों के व्यापार को बढ़ावा देगा.   

सरकार की मंजूरी से 34 पुस्तकें मिलीं, लेकिन नरवणे की “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” क्यों नहीं है सुरक्षित?

नई दिल्ली भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की पुस्तक 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' (Four Stars of Destiny) को रक्षा मंत्रालय की मंजूरी अभी तक नहीं मिली है। यह वही किताब है जिसका जिक्र लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने किया था। इसको लेकर खूब हंगामा हुआ था। आपको बता दें कि पिछले पांच वर्षों में दर्जनों सैन्य अधिकारियों की पुस्तकों को हरी झंडी मिल गई, वहीं जनरल नरवणे की यह किताब इकलौती ऐसी पांडुलिपि बनकर उभरी है, जो अब भी समीक्षा के अधीन है।  एक रिपोर्ट में सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त जवाब के हवाले से कहा है कि रक्षा मंत्रालय ने बताया कि 2020 से 2024 के बीच कुल 35 पुस्तकों के शीर्षक अनुमोदन के लिए आए थे। उनमें से 32 को अप्रूव किया जा चुका है। सिर्फ तीन ही अभी तक पेंडिंग है। उनमें नरवणे की किताब भी शामिल है। RTI के अनुसार, जिन तीन किताबों को लंबित दिखाया गया था, उनमें से पूर्व सेना प्रमुख जनरल एन.सी. विज की पुस्तक 'अलोन इन द रिंग' मई 2025 में रिलीज हो चुकी है। वहीं ब्रिगेडियर जीवन राजपुरोहित की किताब को भी मंजूरी मिल गई है। अब इस सूची में जनरल नरवणे की किताब ही एकमात्र ऐसी है जो आधिकारिक रूप से मंत्रालय के पास अटकी हुई है। आखिर 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' में ऐसा क्या है? जनरल नरवणे 2019 से 2022 तक सेना प्रमुख थे। यह वह दौर था जब पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के साथ तनाव चरम पर था। दिसंबर 2023 में प्रकाशित इस पुस्तक के कुछ अंशों ने राष्ट्रीय सुरक्षा गलियारों में हलचल मचा दी थी। राहुल गांधी का दावा है कि किताब में जनरल नरवणे ने 31 अगस्त 2020 की उस रात का जिक्र किया है, जब चीनी टैंक रेचिन ला क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे। राहुल गांधी के मुताबिक, उन्होंने लिखा है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ बातचीत के दौरान उन्हें एक 'हॉट पोटैटो' (बेहद कठिन स्थिति) थमा दिया गया था। उन्हें पलक झपकते ही बड़े सैन्य फैसले लेने थे। माना जा रहा है कि लद्दाख गतिरोध और सरकार के साथ सैन्य संवाद के इन संवेदनशील खुलासों के कारण ही रक्षा मंत्रालय इसकी गहन समीक्षा कर रहा है। हाल ही में जिन अधिकारियों की पुस्तकों को मंजूरी मिली है, उनमें लेफ्टिनेंट जनरल एस.ए. हसनैन, मेजर जनरल जी.डी. बख्शी और लेफ्टिनेंट जनरल योगेश कुमार जोशी जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इस देरी पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार पूर्व सेना प्रमुख का अत्यधिक सम्मान करती है और विपक्ष महज इस मुद्दे का इस्तेमाल उनका मजाक उड़ाने के लिए कर रहा है। दूसरी ओर प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस और रक्षा मंत्रालय ने वर्तमान स्थिति पर चुप्पी साध रखी है।

ट्रंप सरकार का बड़ा फैसला: भारत पर 18% टैरिफ लागू होने की तारीख तय

 नई दिल्ली भारत के लिए बड़ी राहत की खबर है. अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर लगाए गए 25 प्रतिशत अतिरिक्त पेनल्टी टैरिफ को खत्म कर दिया है. व्हाइट हाउस की ओर से जारी कार्यकारी आदेश के मुताबिक संशोधित 18 प्रतिशत टैरिफ व्यवस्था 7 फरवरी 2026 से लागू होगी. यह आदेश भारतीय समयानुसार आज सुबह 10:30 बजे से प्रभावी होगा. इसके बाद भारत से अमेरिका में आयात किए जाने वाले उत्पादों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त एड-वेलोरम ड्यूटी लागू नहीं होगी. व्हाइट हाउस के कार्यकारी आदेश के अनुसार, भारत पर लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत आयात शुल्क अब खत्म कर दिया गया है. इसके साथ ही अमेरिका की आधिकारिक टैरिफ सूची में शामिल भारत से जुड़े विशेष कोड और प्रावधान भी हटा दिए गए हैं, जिनके तहत यह अतिरिक्त शुल्क लगाया जा रहा था. यह आदेश उन सभी वस्तुओं पर लागू होगा, जो 7 फरवरी 2026 को या उसके बाद अमेरिका में खपत के लिए पहुंचेंगी या वेयरहाउस से निकाली जाएंगी. यानी इस तारीख के बाद भारत से आने वाले उत्पादों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैक्स नहीं लिया जाएगा. इसका सीधा मतलब यह है कि 7 फरवरी की सुबह 10:30 बजे के बाद जो भी भारतीय सामान अमेरिका में आधिकारिक तौर पर एंट्री करेगा या अमेरिकी वेयरहाउस से बिक्री या इस्तेमाल के लिए बाहर निकाला जाएगा, उस पर सिर्फ सामान्य आयात शुल्क लगेगा, जो करीब 18% है. अतिरिक्त 25% टैक्स अब नहीं लिया जाएगा. इसके लिए बनाए गए खास टैरिफ कोड भी अमेरिकी टैरिफ लिस्ट से हटा दिए गए हैं. सरल शब्दों में कहें तो इस समय के बाद आने वाली या क्लियर होने वाली खेपों पर अब पेनल्टी टैक्स नहीं लगेगा, सिर्फ सामान्य ड्यूटी ही देनी होगी. जो खेपें पहले ही पहुंच चुकी हैं या रास्ते में हैं, या वेयरहाउस में हैं और जिन पर 25% अतिरिक्त टैक्स वसूला जा चुका है, उनके लिए भी राहत दी गई है. आदेश में साफ कहा गया है कि अगर अमेरिकी कस्टम्स ने पहले से 25% अतिरिक्त टैक्स वसूला है तो जरूरत पड़ने पर वह राशि वापस की जाएगी. यह रिफंड अमेरिकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) की सामान्य प्रक्रिया के तहत होगा. आमतौर पर अमेरिकी आयातक कंपनी या उसका कस्टम्स एजेंट इसके लिए आवेदन करता है. इसके लिए तय प्रक्रिया के तहत दस्तावेज जमा करने होते हैं. अधिकतर मामलों में रिफंड बिना ब्याज के और इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किया जाएगा. हालांकि यह रिफंड अपने आप सभी को नहीं मिलेगा. जिन कंपनियों पर इसका असर पड़ा है, उन्हें कस्टम्स के तय नियमों के मुताबिक आवेदन करना होगा. पीएम मोदी ने ट्रेड डील पर क्या कहा… इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड फ्रेमवर्क का स्वागत किया और इसे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए बड़ा बढ़ावा बताया. पीएम मोदी ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे पर सहमति बनी है और इसके लिए उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का धन्यवाद किया. पीएम मोदी ने कहा कि यह फ्रेमवर्क दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे, साझेदारी और गतिशीलता को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि यह समझौता 'मेक इन इंडिया' को मजबूती देगा और भारतीय किसानों, उद्यमियों, एमएसएमई, स्टार्टअप नवोन्मेषकों, मछुआरों समेत कई वर्गों के लिए नए अवसर खोलेगा. पीएम मोदी ने कहा कि इससे महिलाओं और युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे, मजबूत और भरोसेमंद सप्लाई चेन तैयार होंगी और वैश्विक विकास को गति मिलेगी. उन्होंने जोर देकर कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए भारत भविष्य-केंद्रित वैश्विक साझेदारियों पर लगातार ध्यान केंद्रित कर रहा है. भारत-अमेरिका व्यापार को मिलेगा फायदा विशेषज्ञों के मुताबिक इस फैसले से भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को मजबूती मिलेगी. भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में राहत मिलेगी और कई सेक्टरों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी. खासतौर पर मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए यह फैसला अहम माना जा रहा है.

HAL ने दूर की एयर फोर्स की टेंशन, देसी राफेल धमाल मचाने को तैयार, चीन-पाकिस्तान थर्र-थर्र कांपेंगे

बेंगलुरु  भारत का देसी राफेल अब धमाल मचाने को तैयार है. जिस बात की चिंता भारत के एयर फोर्स चीफ को सता रही थी, अब वह दूर होने जा रही है. खुद एचएएल यानी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने एयरफोर्स की टेंशन दूर कर दी है. अब चीन और पाकिस्तान थर्र-थर्र कांपेंगे. दरअसल, भारत का देसी लड़ाकू विमान तेजस एमके-1ए अब हवा में तूफान मचाने को पूरी तरह तैयार है. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) पहली खेप के पांच तेजस एमके-1ए विमान की डिलीवरी के लिए पूरी तरह तैयार है. एचएल का कहना है कि पांच LCA Mk1A फाइटर जेट की डिलीवरी में कोई देरी नहीं है और न कोई अड़चन है. इंडियन एयरफोर्स यानी IAF को स्वदेशी LCA Mk1A फाइटर जेट के पहले बैच की डिलीवरी होने वाली है. एचएएल ने अब देसी राफेल यानी LCA Mk1A फाइटर जेट की संभावित देरी की अटकलों को खारिज कर दिया है. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने गुरुवार को कहा कि पांच LCA Mk1A विमान डिलीवरी के लिए पूरी तरह से तैयार हैं, जिनमें सहमत स्पेसिफिकेशन्स के अनुसार प्रमुख अनुबंधित क्षमताएं शामिल हैं. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने एक आधिकारिक बयान में कहा, ‘पांच LCA Mk1A विमान पूरी तरह तैयार हैं. उनमें सभी बड़े कॉन्ट्रैक्ट वाले फीचर्स लगाए जा चुके हैं. इसके अलावा नौ और विमान बन चुके हैं और उड़ान भी भर चुके हैं. बस जनरल इलेक्ट्रिक (GE) से इंजन आने का इंतजार है. जनरल इलेक्ट्रिक (अमेरिकी कंपनी) ने अब तक पांच इंजन दे दिए हैं और आने वाले इंजनों का प्लान भी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की डिलीवरी स्कीम से मैच कर रहा है. यानी इस वित्तीय वर्ष में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड अपना टारगेट पूरा कर लेगा. तेजस एमके-1ए अब हवा में तूफान मचाने को पूरी तरह तैयार है. कंपनी ने क्या कहा? LCA Mk1A विमानों के अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने कहा कि कंपनी एक साथ कई रणनीतिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ा रही है, जिसमें इंडियन मल्टी रोल हेलीकॉप्टर (IMRH), तेजस LCA Mk2 और कॉम्बैट एयर टीमिंग सिस्टम (CATS) शामिल हैं, जिनमें से सभी के 2032 के बाद उत्पादन में आने की उम्मीद है. यह खबर उन खबरों पर पानी फेर देती है, जो कह रही थीं कि डिलीवरी में देरी हो रही है. अब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL ने साफ कर दिया है कि सब कुछ प्लान के मुताबिक चल रहा है. एचएएल को कितना ऑर्डर मिला दरअसल, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को फरवरी 2021 में भारतीय वायुसेना से 83 LCA Mk1A जेट (73 फाइटर और 10 ट्रेनर) के लिए पहला कॉन्ट्रैक्ट मिला था. बाद में सितंबर 2025 में 97 अतिरिक्त LCA Mk1A विमानों (68 फाइटर और 29 ट्विन-सीटर) के लिए 62,370 करोड़ रुपये से अधिक की लागत पर एक फॉलो-ऑन कॉन्ट्रैक्ट मिला. इन विमानों की डिलीवरी 2027-28 के दौरान शुरू होगी और छह साल की अवधि में पूरी हो जाएगी. कब तक पूरी फ्लीट मिलेगी इन लड़ाकू विमानों में 64 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री होगी, जिसमें 67 अतिरिक्त आइटम शामिल होंगे. कुल मिलाकर वायुसेना ने दो चरणों में इन विमानों के 180 का ऑर्डर दिया था. कुछ विमान पिछले साल डिलीवर किए जाने थे, लेकिन वायुसेना ने जोर दिया कि एचएएल विमानों को पूरी तरह से ऑपरेशनल कॉन्फ़िगरेशन में प्रदान करे. पिछले साल 17 अक्टूबर को कंपनी ने नासिक सुविधा से पहले तेजस Mk1A प्रोटोटाइप की पहली उड़ान का संचालन किया था. अभी, HAL की फाइटर एयरक्राफ्ट बनाने की क्षमता हर साल 24 एयरक्राफ्ट है. इस दर से 180 एयरक्राफ्ट के तेजस Mk1A ऑर्डर को पूरा करने में सात साल से ज़्यादा लगेंगे और वायुसेना को पूरा फ्लीट 2033 से पहले मिलने की उम्मीद नहीं है. एचएएल पांच तेजस फाइटर जेट की डिलीवरी करने को तैयार है. क्या है ये देसी राफेल? तेजस एमके-1ए हल्का लड़ाकू विमान है, लेकिन यह दमदार है. यही कारण है कि इसे भारत का देसी राफेल कहा जाता है. इसमें एडवांस्ड AESA रडार, बेहतरीन इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, मिसाइलों के लिए नई कैपेबिलिटी, रिफ्यूलिंग की सुविधा…सब कुछ है. इसमें 64 फीसदी से अधिक पार्ट्स भारतीय हैं. यानी 67 नए आइटम्स भारतीय कंपनियों ने बनाए हैं. यह आत्मनिर्भर भारत का सबसे बड़ा उदाहरण है. चीन-पाकिस्तान क्यों कांपेंगे? तेजस एमके-1ए छोटा फाइटर जेट है, लेकिन तेज, दमदार और मॉडर्न हथियारों से लैस है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि यह देसी राफेल पाकिस्तान के JF-17 और चीन के J-10, J-16 से मुकाबला करने में सक्षम है. जब 180+ तेजस आसमान में उड़ेंगे तो दुश्मन की सांसें अटक जाएंगी. खासकर बॉर्डर इलाके में. जब भारतीय पायलटों के हाथ में देसी राफेल होगा होगा तो दुश्मनों के होश उड़ने तय हैं.

रेल यात्रियों के लिए बड़ी खबर, RAC टिकट पर मिल सकता है रिफंड

नई दिल्ली  भारतीय रेलवे में सफर करने वाले लाखों यात्रियों को आने वाले समय में एक बड़ी राहत मिल सकती है। संसद की एक शक्तिशाली समिति ने रेल मंत्रालय को सुझाव दिया है कि आरएसी (RAC) टिकट पर यात्रा करने वाले वैसे यात्रियों को किराये का कुछ हिस्सा वापस करना चाहिए जिन्हें पूरा किराया देने के बावजूद ट्रेन में पूरी बर्थ नहीं मिल पाती है। संसद में 4 फरवरी को पेश की गई लोक लेखा समिति (PAC) की रिपोर्ट ‘भारतीय रेलवे में ट्रेनों के संचालन की समयबद्धता और यात्रा समय’ में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया है। वर्तमान नियमों के अनुसार, आरएसी श्रेणी के यात्रियों को कंफर्म टिकट के बराबर ही पूरा किराया देना पड़ता है, लेकिन यात्रा के दौरान उन्हें केवल बैठने के लिए आधी सीट (बर्थ) ही मिलती है। समिति ने इस व्यवस्था पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि बिना बर्थ सुविधा के पूरा किराया वसूलना न्यायोचित नहीं है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा, "समिति का मानना है कि चार्ट तैयार होने के बाद भी यदि यात्री आरएसी श्रेणी में ही रहता है और उसे पूरी बर्थ नहीं मिलती है तो उससे पूरा किराया लेना गलत है। मंत्रालय को एक ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिससे ऐसे यात्रियों को किराये का आंशिक हिस्सा वापस मिल सके।" फिलहाल, आईआरसीटीसी (IRCTC) के नियमों के मुताबिक यदि आरएसी ई-टिकट को ट्रेन छूटने के निर्धारित समय से 30 मिनट पहले तक कैंसिल नहीं किया जाता या ऑनलाइन टीडीआर (TDR) फाइल नहीं की जाती। ऐसे में कोई रिफंड नहीं मिलता है। समिति का तर्क है कि जब यात्री आधी सीट पर सफर करने को मजबूर है तो उसे सर्विस भी आधी ही मिल रही है, इसलिए भुगतान भी उसी अनुपात में होना चाहिए। यह सिफारिश अगर लागू होती है तो यह रेलवे के दशकों पुराने किराये ढांचे में एक बड़ा बदलाव होगा। इन 13 ट्रेनों में RAC पर पाबंदी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि रेलवे ने इस साल की शुरुआत से आरएसी नियमों में कुछ कड़े बदलाव किए हैं। अब वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस और अमृत भारत एक्सप्रेस जैसी 13 आधुनिक ट्रेनों में आरएसी टिकट धारकों को बोर्डिंग यानी ट्रेन में चढ़ने की अनुमति नहीं दी जा रही है। इन ट्रेनों में केवल कंफर्म टिकट वाले यात्री ही सफर कर सकते हैं। गुवाहाटी (कामाख्या)-रोहतक अमृत भारत एक्सप्रेस डिब्रूगढ़-लखनऊ (गोमती नगर) अमृत भारत एक्सप्रेस न्यू जलपाईगुड़ी-नागरकोइल अमृत भारत एक्सप्रेस न्यू जलपाईगुड़ी-तिरुचिरापल्ली अमृत भारत एक्सप्रेस अलीपुरद्वार – एसएमवीटी बेंगलुरु अमृत भारत एक्सप्रेस अलीपुरद्वार-मुंबई (पनवेल) अमृत भारत एक्सप्रेस कोलकाता (संतरागाछी) – ताम्बरम अमृत भारत एक्सप्रेस कोलकाता (हावड़ा)-आनंद विहार टर्मिनल अमृत भारत एक्सप्रेस कोलकाता (सियालदह)-बनारस अमृत भारत एक्सप्रेस तिरुवनंतपुरम सेंट्रल-तांबरम अमृत भारत एक्सप्रेस तिरुवनंतपुरम उत्तर-चार्लापल्ली अमृत भारत एक्सप्रेस नागरकोइल जंक्शन-मंगलुरु जंक्शन अमृत भारत एक्सप्रेस संसदीय समिति की सिफारिश के बाद अब गेंद रेल मंत्रालय के पाले में है। मंत्रालय को अब यह तय करना है कि वह इस पार्शियल रिफंड की गणना कैसे करेगा और इसे यात्रियों के खातों में डिजिटल रूप से वापस भेजने के लिए अपने सॉफ्टवेयर (CRIS/IRCTC) में क्या बदलाव करेगा।

95 प्रकार के मेटल्स में सोना-चांदी का है खास आकर्षण, जानें साइंस के नजरिए से क्यों हैं ये सबसे पसंदीदा

 नई दिल्ली दुनिया में करीब 95 ज्ञात धातुएं (Metals) हैं – लोहा, तांबा, एल्यूमिनियम से लेकर दुर्लभ प्लैटिनम तक. लेकिन हजारों साल से हर सभ्यता में सिर्फ सोना और चांदी ही मूल्य, सौंदर्य और धन के प्रतीक बने रहे हैं. मिस्र, रोम, भारत, चीन – सभी जगहों पर इन्हें देवता की तरह पूजा गया. गहने बनाए गए. सिक्के ढाले गए. आज भी शादियों में सोना-चांदी की मांग सबसे ज्यादा है. निवेश के रूप में ये सबसे सुरक्षित माने जाते हैं. आखिर इन दो धातुओं में ऐसा क्या खास है जो बाकी 93 धातुओं में नहीं? रासायनिक स्थिरता: ये कभी खराब नहीं होते सबसे बड़ी वजह विज्ञान में छिपी है. सोना और चांदी नोबल मेटल्स कहलाते हैं – यानी ये हवा, पानी, एसिड या नमी से आसानी से प्रतिक्रिया नहीं करते. सोना सबसे ज्यादा निष्क्रिय (इनर्ट) धातु है. यह ऑक्सीजन से नहीं जुड़ता. जंग नहीं लगता. हजारों साल तक चमक बरकरार रहती है. चांदी थोड़ी प्रतिक्रिया करती है. सल्फर से काली पड़ जाती है. लेकिन अन्य धातुओं की तुलना में बहुत कम. अन्य धातु जैसे– लोहा हवा लगते ही जंग लग जाता है. तांबा हरा पड़ जाता है. एल्यूमिनियम पर ऑक्साइड की परत बन जाती है. इसलिए प्राचीन काल में जब लोग कब्रों में सोने-चांदी के गहने दफनाते थे, तो हजारों साल बाद भी वे वैसा ही चमकदार मिलते था. यह स्थिरता ही इन्हें अमर धातु बनाती है. प्रकृति में शुद्ध रूप में मिलना प्राचीन मनुष्य को धातु गलाने (स्मेल्टिंग) की तकनीक नहीं थी. ज्यादातर धातुएं अयस्क (ऑक्साइड या सल्फाइड) के रूप में मिलती हैं, जिन्हें निकालने के लिए उच्च तापमान चाहिए. लेकिन… सोना और चांदी अक्सर शुद्ध रूप (नेटिव फॉर्म) में नदियों, चट्टानों में छोटे-छोटे दाने या टुकड़े के रूप में मिल जाते थे. इन्हें बस उठाकर हथौड़े से पीटकर आकार दिया जा सकता था. आज भी इतनी बड़ी मात्रा में इस्तेमाल क्यों?     गहने: भारत में सालाना 600-800 टन सोना सिर्फ गहनों में इस्तेमाल होता है. सौंदर्य और सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से.      निवेश: सोना सुरक्षित निवेश है – महंगाई और संकट में मूल्य बढ़ता है. औद्योगिक उपयोग…     चांदी: इलेक्ट्रॉनिक्स (सबसे अच्छी चालक), फोटोग्राफी, दर्पण, बैटरी.     सोना: इलेक्ट्रॉनिक्स (कनेक्टर), दंत चिकित्सा, अंतरिक्ष यान.     सांस्कृतिक महत्व: शादी-ब्याह, त्योहारों में परंपरा. विज्ञान और मानव स्वभाव का परफेक्ट मेल सोना और चांदी प्रकृति की ऐसी धातुएं हैं जो दुर्लभ, स्थिरता, सौंदर्य और इस्तेमाल होने का सही बैलेंस रखती हैं. अन्य धातुएं या तो बहुत आम हैं (जैसे लोहा) या बहुत प्रतिक्रियाशील या बहुत देर से खोजी गईं (जैसे प्लैटिनम). हजारों साल पहले मनुष्य ने जो चुना, वही आज भी पसंद है – क्योंकि विज्ञान और मानव भावनाएं दोनों इनके साथ में हैं. अगली बार जब आप सोने का गहना पहनें, तो याद रखिए – यह सिर्फ धातु नहीं, विज्ञान और इतिहास की जीती-जागती कहानी है. इसीलिए 5000-6000 ईसा पूर्व से सोने का इस्तेमाल शुरू हुआ. सबसे पुराना प्रमाण बुल्गारिया की वार्ना संस्कृति (4600 ई.पू.) से मिला है. चांदी का इस्तेमाल लगभग 4000 ई.पू. से शुरू हुआ. भौतिक गुण: सुंदरता और काम करने में आसानी     दुर्लभ लेकिन बहुत कम भी नहीं: दोनों पर्याप्त दुर्लभ हैं कि मूल्यवान लगें, लेकिन इतने कम नहीं कि मिलना असंभव हो.     चमक और रंग: सोना की पीली चमक और चांदी की सफेद चमक आंखों को बहुत आकर्षक लगती है.      मैलिबिलिटी और डक्टिलिटी: सोने की एक ग्राम को 1 वर्ग मीटर पतली शीट (गोल्ड लीफ) में पीटा जा सकता है. चांदी सबसे अच्छी बिजली और गर्मी की चालक है. ये आसानी से पिघलते नहीं (सोने का गलनांक 1064°C, चांदी का 962°C), इसलिए गहने बनाने में सुरक्षित. इतिहास में मुद्रा और मूल्य का प्रतीक क्यों बने?     टिकाऊ: खराब नहीं होते, इसलिए धन के रूप में जमा करने के बेस्ट है.       छोटे-छोटे टुकड़े किए जा सकते हैं.     पहचानने में आसान: नकली बनाना मुश्किल.      पूरी दुनिया में स्वीकृति: हर संस्कृति में मूल्यवान.     लिदिया (आधुनिक तुर्की) में 600 ई.पू. पहला सोने-चांदी का सिक्का बना. भारत में भी प्राचीन काल से रूप्य (चांदी) और हिरण्य (सोना) मुद्रा के रूप में इस्तेमाल होते थे.  

बांग्लादेश को अमेरिका का गुलाम बनाने की तैयारी में यूनुस? चुनाव से पहले सीक्रेट डील पर हलचल

ढाका  जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ ट्रेड डील की घोषणा की तब पड़ोसी बांग्लादेश में चिंताएं बढ़ गईं क्योंकि बांग्लादेश भी अमेरिका के साथ एक समझौता करने जा रहा है. ये चिंता इसलिए है क्योंकि बांग्लादेश-अमेरिका व्यापार समझौता पूरी तरह सीक्रेट रखा गया है. प्रस्तावित समझौते को लेकर सवाल ऐसे भी उठ रहे हैं कि क्या गैर-निर्वाचित मोहम्मद यूनुस प्रशासन के पास ऐसा समझौता करने का जनादेश भी है या नहीं. यह घटनाक्रम उन रिपोर्टों के बाद सामने आया है, जिनमें दावा किया गया है कि 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को गिराने वाली इस्लामी साजिश के साथ-साथ यूनुस प्रशासन को अमेरिकी डीप स्टेट का समर्थन मिला था. अमेरिका के साथ समझौता सीक्रेट रखा गया है जिसे लेकर बांग्लादेश के निर्यातक संगठनों और खासकर उसके अहम टेक्सटाइल सेक्टर के हितधारकों में चिंता बढ़ गई है. उनका कहना है कि समझौते की शर्तें बांग्लादेशी निर्यात को और नुकसान पहुंचा सकती हैं. बांग्लादेश के कुल निर्यात का 90 फीसदी से ज्यादा रेडीमेड गारमेंट्स और टेक्सटाइल्स का है. ट्रंप के टैरिफ की वजह से बांग्लादेश के वस्त्र उद्योग को पहले ही भारी नुकसान पहुंचा है और अगर अमेरिका के साथ कोई सीक्रेट समझौता हो जाता है तो बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले क्षेत्रों को यह प्रभावित कर सकता है. इससे बांग्लादेश की पूरी अर्थव्यवस्था को झटका लग सकता है. समझौते की वैधता पर उठ रहे सवाल समझौते की वैधता पर भी सवाल उठ रहे हैं. अमेरिका-बांग्लादेश ट्रेड डील बांग्लादेश में चुनाव से महज तीन दिन पहले 9 फरवरी को हो सकता है. ऐसे में सवाल यह है कि चुनाव से ठीक पहले और अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में यूनुस प्रशासन यह समझौता क्यों कर रहा है. बांग्लादेशी अखबार ‘प्रथम आलो’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में यूनुस प्रशासन ने अमेरिका के साथ एक नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट पर दस्तखत किए थे, जिसके चलते समझौते के ड्राफ्ट की जानकारी सार्वजनिक नहीं है. बांग्लादेशी अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी अनु मुहम्मद ने कहा है कि यूनुस प्रशासन की यह जल्दबाजी और झोल-झाल सिर्फ अमेरिका के साथ व्यापार समझौते तक सीमित नहीं है. उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट कर उन्होंने सवाल उठाए हैं कि आम चुनाव से ठीक पहले जल्दबाजी में बंदरगाह लीज पर दिया जा रहा, हथियार आयात किए जा रहे और अमेरिका के साथ 'अधीनता' वाले समझौते साइन किए जा रहे हैं. अनु मुहम्मद ने सवाल किया कि 9 फरवरी के बांग्लादेश-अमेरिका व्यापार समझौते से आखिर किसके हित सध रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि ये समझौते पूरी तरह गैर-पारदर्शी, अव्यावहारिक और अनियमित तरीके से आगे बढ़ाए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि विदेशी 'लॉबिस्ट' सलाहकार बनकर यूनुस प्रशासन के भीतर बैठाए गए हैं, जो इन समझौतों को किसी भी कीमत पर कराना चाहते हैं. यह भी आरोप हैं कि नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को इस्लामिस्ट जमात-ए-इस्लामी के समर्थन से ही अंतरिम सरकार का मुखिया बनाया गया. ट्रेड डील को लेकर चर्चा ऐसे समय में हो रही है, जब रिपोर्टें हैं कि अमेरिकी डिप्लोमैट्स जमात के साथ बातचीत कर रहे हैं. 12 फरवरी को होने वाले चुनाव में जमात को एक बड़े राजनीतिक खिलाड़ी के तौर पर देखा जा रहा है. कोलकाता में एक वर्चुअल प्रोग्राम को संबोधित करते हुए 2 फरवरी को शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद ने कहा कि बांग्लादेश एक 'फर्जी' चुनाव की ओर बढ़ रहा है, जिसका मकसद विदेशी हितों के प्रति वफादार कमजोर सरकार बनाना है. उन्होंने यूनुस शासन पर इस्लामवादियों के समर्थन से चलने और अपारदर्शी तरीके से फैसले लेने का आरोप लगाया. रोचक बात ये हैं कि 12 फरवरी को बांग्लादेश सिर्फ नई सरकार के लिए वोटिंग नहीं करेगा, बल्कि जुलाई चार्टर पर भी मुहर लगाएगा या उसे खारिज करेगा. इस चार्टर को खुद मोहम्मद यूनुस और उनकी सरकार आगे बढ़ा रही है और ‘यस वोट’ के पक्ष में कैंपेन चला रही है. 2024 के हसीना-विरोधी प्रदर्शनों के बाद तैयार किया गया यह चार्टर संविधान में संशोधन करेगा. माना जा रहा है कि यह संशोधन अंतरिम शासन की तरफ से की गई कथित गड़बड़ियों का भी बचाव करेगा. जल्दबाजी में समझौता क्यों कराना चाहती है यूनुस सरकार? अप्रैल 2025 में जब ट्रंप ने 100 देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ का ऐलान किया, तो बांग्लादेश पर 37 फीसदी का भारी टैरिफ लगा. जून 2025 में बांग्लादेश ने अमेरिका के साथ नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट साइन किया, जिससे टैरिफ पर बातचीत सीक्रेट हो गई. जुलाई में अमेरिका ने अचानक टैरिफ घटाकर 35 फीसदी और अगस्त में 20 फीसदी कर दिया. ढाका स्थित ‘डेली सन’ के मुताबिक, बांग्लादेश के वाणिज्य सचिव महबूबुर रहमान ने कहा है कि अमेरिका से 9 फरवरी की तारीख मिली है और उसी दिन समझौते पर दस्तखत होंगे. सबसे ज्यादा चिंता निर्यातकों, खासकर गारमेंट सेक्टर में है. बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट इनामुल हक खान ने कहा कि बिना किसी परामर्श के यह प्रक्रिया बेहद परेशान करने वाली है. उनका कहना है कि चुनाव से ठीक पहले समझौते पर दस्तखत करना ठीक नहीं है, क्योंकि इसके दूरगामी असर होंगे. यूनुस प्रशासन के जाने के कुछ ही दिनों बाद यह समझौता लागू कराने की जिम्मेदारी एक निर्वाचित सरकार पर आ जाएगी, जिसका इस समझौते की बातचीत में कोई रोल नहीं रहा. सेंटर फॉर पॉलिसी डायलॉग के वरिष्ठ फेलो देबप्रिया भट्टाचार्य ने कहा कि सवाल यह भी है कि क्या आने वाली सरकार के हाथ पहले से ही बांधे जा रहे हैं. डर क्यों फैला रहा है यह समझौता? समझौते की शर्तें किसी को नहीं पता. नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट के चलते समझौते के बाद प्रभावित होने वाले पक्ष पूरी तरह अंधेरे में हैं. चिंता सिर्फ निर्यातकों तक सीमित नहीं है, घरेलू बाजार पर निर्भर कारोबारी भी डरे हुए हैं. ढाका चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष तस्कीन अहमद ने कहा कि ड्राफ्ट की जानकारी न होने से इसके असर का आकलन करना मुश्किल है और इसे चुनाव से पहले साइन करने से बचा जा सकता था. ये चिंताएं जायज भी हैं क्योंकि शेख हसीना की सरकार को हटाने और यूनुस को सत्ता में लाने में अमेरिका पर संलिप्तता के आरोप लगे थे. बांग्लादेशी पत्रकार साहिदुल हसन खोकन के मुताबिक, हसीना को हटाने में अमेरिका सीधे तौर पर भले ही शामिल … Read more

मलेशिया दौरे से PM मोदी भारत को दिलाएंगे सेमीकंडक्टर और रेयर अर्थ में बड़ा लाभ

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कल से दो दिन के लिए (7-8 फरवरी 2026) मलेशिया की यात्रा पर जा रहे हैं. यह यात्रा दोनों देशों के बीच सेमीकंडक्टर और रेयर अर्थ एलीमेंट्स (REE) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नए दरवाजे खोलने का काम करेगी. हाल ही में यूनियन बजट 2026 में सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 और रेयर अर्थ कॉरिडोर्स की घोषणा के बाद यह यात्रा और भी खास हो गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत की सप्लाई चेन मजबूत होगी, नौकरियां बढ़ेंगी और चीन पर निर्भरता कम होगी. भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) कई बार कह चुके हैं कि कि रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग से सेल्फ-रिलायंस बढ़ेगी और चीन पर निर्भरता कम होगी. मलेशिया के साथ टेक्नोलॉजी शेयरिंग से यह आसान होगा. बता दें कि वैष्णव क्रिटिकल मिनरल्स पर काम कर रहे हैं. बेंचमार्क मिनरल इंटेलिजेंस (Benchmark Mineral Intelligence) में रेयर अर्थ एक्सपर्ट और रिसर्च मैनेजर नेहा मुखर्जी (Neha Mukherjee) ने भारत की नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन की तारीफ की है और कहा है कि मलेशिया जैसे पार्टनर्स से डाइवर्सिफिकेशन तेज होगा, जिससे चीन पर से निर्भरता घटेगी. कितना महत्वपूर्ण है मलेशिया? पीएम मोदी और मलेशियाई पीएम अनवर इब्राहिम के बीच बातचीत के केंद्र में अन्य मुद्दों के साथ सेमीकंडक्टर पर गहरा सहयोग भी होगा. मलेशिया सेमीकंडक्टर का बड़ा हब है, जहां दुनिया की 12-15 फीसदी REE प्रोसेसिंग होती है. भारत यहां से तकनीक और निवेश ले सकता है. बजट में इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के लिए 40,000 करोड़ रुपये का ऐलान हुआ है, जो इंडस्ट्री-लेड रिसर्च और ट्रेनिंग पर फोकस करेगा. इससे भारत में सेमीकंडक्टर इक्विपमेंट, मटेरियल और फुल स्टैक आईपी डेवलप होगा. मलेशिया रेयर अर्थ पर भी बड़ा जोर देता है. मलेशिया में लिनास प्लांट दुनिया का बड़ा REE प्रोसेसर है. 2025 में लिनास में पहली बार भारी REE (जैसे डिस्प्रोसियम ऑक्साइड) का कमर्शियल उत्पादन शुरू किया, जो चीन के बाहर पहला ऐसा प्लांट है. भारत के आम बजट में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिल नाडु में डेडिकेटेड REE कॉरिडोर्स बनाने का प्लान है. यह माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देगा. लक्ष्य है 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष REE परमानेंट मैग्नेट बनाना, जो EV, रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस में इस्तेमाल होंगे. गौरतलब है कि यह भारत सरकार की एक बड़ी योजना का हिस्सा है, जिसका नाम REPM है. इसे नवंबर 2025 में कैबिनेट ने मंजूरी दी थी, और कुल ₹7,280 करोड़ का बजट रखा गया है. भारत को कितना फायदा?     सप्लाई चेन मजबूत: मलेशिया से REE और सेमीकंडक्टर पार्ट्स आसानी से मिलेंगे. इससे भारत की मैन्युफैक्चरिंग स्पीड बढ़ेगी और चीन पर निर्भरता 20-30 फीसदी कम हो सकती है.     निवेश और टेक्नोलॉजी: मलेशिया के साथ JV से 3 अरब डॉलर का राजस्व और 24,800 नौकरियां पैदा होंगी. सेमीकंडक्टर मार्केट 2026 तक 64 अरब डॉलर और 2030 तक 110 अरब डॉलर पहुंचेगा.     EV और क्लीन एनर्जी: REE से EV बैटरी और मोटर सस्ते होंगे. मलेशिया 2030 तक EV प्रोडक्शन 15% बढ़ाना चाहता है, जिसमें भारत मदद कर सकता है.     ट्रेड बूस्ट: दोनों देशों का व्यापार 25 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. MICECA समझौते की समीक्षा से निर्यात बढ़ेगा.     स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप: रक्षा, डिजिटल टेक और हेल्थ में सहयोग बढ़ेगा, जो भारत को ASEAN में मजबूत बनाएगा. कुल मिलाकर, यह यात्रा भारत को आत्मनिर्भर बनाने में बड़ा रोल प्ले करेगी. 2030 तक REE से 3 अरब डॉलर राजस्व और 6.5 अरब डॉलर की आर्थिक ग्रोथ हो सकती है. भारत और मलेशिया में कितना व्यापार? 2025 में भारत-मलेशिया का कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 18-20 अरब डॉलर के आसपास रहा. भारत मलेशिया से मुख्य रूप से पाम ऑयल (करीब 2.8-3 अरब डॉलर का), इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स, कंप्यूटर हार्डवेयर और अन्य वनस्पति तेल आयात करता है. वहीं भारत मलेशिया को परिष्कृत पेट्रोलियम (रिफाइंड पेट्रोलियम, करीब 2.3 अरब डॉलर), कृषि उत्पाद जैसे बफेलो मीट, और कुछ इलेक्ट्रिकल मशीनरी निर्यात करता है. कैसे हैं दोनों देशों में ऐतिहासिक संबंध? दोनों देशों के बीच मजबूत नींव है. 2010 में MICECA (मलेशिया-इंडिया कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक कोऑपरेशन एग्रीमेंट) ने व्यापार को आसान बनाया. 2015 में संबंधों को स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप का दर्जा मिला, और 2024 में इसे अपग्रेड करके कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप बना दिया गया. ये समझौते टैरिफ कम करने, निवेश बढ़ाने और नए क्षेत्रों में सहयोग का रास्ता खोलते हैं. भारत-मलेशिया: भविष्य के प्लान क्या हैं? दोनों देश AITIGA (ASEAN-इंडिया ट्रेड इन गुड्स एग्रीमेंट) की समीक्षा कर रहे हैं, ताकि टैरिफ और मार्केट एक्सेस बेहतर हो. फोकस डिजिटल फाइनेंस, रिन्यूएबल एनर्जी, सेमीकंडक्टर और EV जैसे हाई-टेक क्षेत्रों पर है. मलेशिया में अनुमानित 16.2 मिलियन टन रेयर अर्थ एलीमेंट्स (REE) के रिजर्व हैं, जिनकी वैल्यू सैकड़ों अरब डॉलर है. ये रिजर्व भारत के साथ JV या टेक्नोलॉजी शेयरिंग के जरिए इस्तेमाल हो सकते हैं, खासकर REE प्रोसेसिंग और मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग में. व्यापार को 25 अरब डॉलर तक पहुंचाने का टारगेट है. क्या चुनौतियां हैं सामने? ट्रेड बैलेंस अभी असंतुलित है. मलेशिया का सरप्लस ज्यादा है, इसलिए भारत नए निर्यात सेक्टर (जैसे सर्विसेज और मैन्युफैक्चरिंग) ढूंढ रहा है. पर्यावरणीय मुद्दे भी बड़े हैं, खासकर पाम ऑयल की खेती से जुड़े जंगल कटाई और सस्टेनेबिलिटी के सवाल. REE माइनिंग में भी पर्यावरण सुरक्षा जरूरी है, ताकि प्रदूषण न फैले. दोनों देश इन मुद्दों पर बात करके बैलेंस्ड और ग्रीन ट्रेड बढ़ाना चाहते हैं. भारत-मलेशिया में ग्लोबल कनेक्शन? मलेशिया ने अमेरिका के साथ REE सप्लाई चेन पर MoU साइन किया है. भारत भी इंडो-US ट्रेड डील और क्रिटिकल मिनरल्स मिशन के जरिए काम कर रहा है. इससे REE और सेमीकंडक्टर की सप्लाई चेन मजबूत होगी, चीन पर निर्भरता कम होगी, और दोनों देश ग्लोबल वैल्यू चेन में बेहतर पोजिशन पा सकेंगे. कुल मिलाकर, ये रिश्ते सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी, एनर्जी और स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप का मजबूत आधार बन रहे हैं. मोदी की मलेशिया यात्रा कब है? 7-8 फरवरी 2026 को. यह उनकी तीसरी यात्रा है, जिसमें व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर बात होगी. मलेशिया से सेमीकंडक्टर में भारत को क्या फायदा? मलेशिया से टेक्नोलॉजी और निवेश मिलेगा. इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 से 40,000 करोड़ रुपये लगेंगे, जो जॉब्स और आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा. रेयर अर्थ एलीमेंट्स क्या हैं और क्यों जरूरी? REE विशेष … Read more

IIT रुड़की का अलर्ट: हिमालय से आएगी ‘सुनामी’, 93 लाख की आबादी होगी खतरे में, हजारों गांव होंगे प्रभावित

नई दिल्ली  हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच एक ऐसी तबाही आकार ले रही है, जो सुनामी से कम खतरनाक नहीं है. IIT रुड़की के रिसर्चर्स ने एक चौंकाने वाली स्टडी में बताया है कि हिमालय के पहाड़ों पर बनी ग्लेशियल झीलों का दायरा तेजी से बढ़ रहा है. ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में छपी रवींद्र कुमार और सौरभ विजय की इस रिसर्च के अनुसार, हाई माउंटेन एशिया (HMA) क्षेत्र में 2016 से 2024 के बीच इन झीलों के क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है. वर्तमान में करीब 31,000 से ज्यादा ऐसी झीलें हैं, जो 93 लाख लोगों के लिए सीधा खतरा बन गई हैं. क्या है ‘हिमालयी सुनामी’ या GLOF?     जब पहाड़ों पर स्थित ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उनका पानी खाली जगहों पर जमा होकर झीलें बना लेता है. इन झीलों के चारों ओर पक्के बांध नहीं होते, बल्कि ये ढीली चट्टानों, बर्फ और मलबे (Moraine) के प्राकृतिक बांधों से घिरी होती हैं.     जब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पानी का दबाव बढ़ता है या कोई एवलांच (बर्फ का तूफान) इन झीलों में गिरता है, तो ये बांध गुब्बारे की तरह फट जाते हैं. इसे ही ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) या हिमालयी सुनामी कहा जाता है.     केदारनाथ की 2013 वाली त्रासदी और 2023 में सिक्किम में आई बाढ़ इसी तरह के खतरे के बड़े उदाहरण हैं. ये झीलें इतनी ऊंचाई पर स्थित हैं कि जब इनका पानी नीचे गिरता है, तो वह जबरदस्त रफ्तार पकड़ लेता है.     इसमें सिर्फ पानी नहीं होता, बल्कि अपने साथ बोल्डर, मिट्टी और पेड़ों को बहाकर लाने वाला एक ‘चलता-फिरता पहाड़’ बन जाता है, जो रास्ते में आने वाली हर चीज को तबाह कर देता है. वैज्ञानिकों ने कैसे पहचाना इन 31,000 टाइम बमों को? हजारों फीट की ऊंचाई और बेहद कठिन रास्तों के कारण इन झीलों की निगरानी करना नामुमकिन जैसा था. लेकिन IIT रुड़की के वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी का सहारा लिया. उन्होंने नासा (NASA) और यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के ‘लैंडसैट 8’ के हाई-रेजोल्यूशन डेटा का उपयोग किया. इसके साथ ही यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के ‘सेंटिनल 1 और 2’ और कोपरनिकस डिजिटल एलिवेशन मॉडल की मदद ली गई. अमेरिका के नेशनल रिकॉनेस्सेंस ऑफिस द्वारा 3 जनवरी 1976 को ली गई इस तस्वीर में माउंट एवरेस्ट बीच में दिख रहा है. (AP) इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके राडार और ऑप्टिकल सेंसर बादलों के पार भी देख सकते हैं. इसकी मदद से वैज्ञानिकों ने 20,000 से 1,00,000 वर्ग मीटर तक की छोटी झीलों की भी सटीक पहचान की है. अब इस तकनीक से ‘तीसरे ध्रुव’ (Third Pole) कहे जाने वाले इस पूरे इलाके की रूटीन मॉनिटरिंग मुमकिन हो गई है. किन इलाकों में सबसे तेजी से फैल रही हैं झीलें? स्टडी के मुताबिक, झीलों के बढ़ने की रफ्तार हर इलाके में अलग-अलग है: किलियन शान (Qilian Shan): इस क्षेत्र में झीलों के क्षेत्रफल में सबसे ज्यादा 22.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. पूर्वी हिमालय: यह इलाका सबसे ज्यादा संवेदनशील है क्योंकि यहां इन झीलों की संख्या सबसे अधिक है. भारत की स्थिति: भारत में करीब 30 लाख लोग सीधे तौर पर इन अस्थिर झीलों के नीचे बसे हुए हैं. बढ़ती गर्मी और बदलते मानसून की वजह से ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं. जहां पहले बर्फ हुआ करती थी, अब वहां गहरे और अस्थिर पानी के तालाब बन गए हैं. 93 लाख लोगों पर मंडराता मौत का साया दुनिया भर में ग्लेशियर की बाढ़ से जितने लोगों को खतरा है, उनमें से 62 प्रतिशत लोग अकेले हाई माउंटेन एशिया क्षेत्र में रहते हैं. हिमालय के इस हिस्से में रहने वाले कई परिवार झीलों से महज 10 किलोमीटर के दायरे में बसे हैं. इसका मतलब है कि अगर कोई झील फटती है, तो लोगों को चेतावनी देने और सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए समय बहुत ही कम मिलेगा. ये झीलें ‘टिकिंग टाइम बम’ की तरह हैं, जिनकी दीवारें मिट्टी और बर्फ की बनी हैं. अगर ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार यही रही, तो आने वाले समय में केदारनाथ जैसे हादसों का खतरा और बढ़ सकता है.