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El Niño vs Indian El Niño: मौसम वैज्ञानिकों की नजरें टिकीं, क्या भारत पर पड़ेगा बड़ा असर?

 नई दिल्ली ऑस्ट्रेलिया के ब्यूरो ऑफ मीटियोरॉलॉजी की हालिया रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है. प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान अल-नीनो की सीमा पार कर चुका है. नीनो 3.4 इंडेक्स जून 2026 की शुरुआत में +0.81°C तक पहुंच गया है, जो अल-नीनो की आधिकारिक सीमा +0.80°C से ज्यादा है. इस खबर से भारत के किसान, सरकार और आम लोग चिंतित हैं क्योंकि अल-नीनो अक्सर भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को कमजोर करता है।  अच्छी खबर यह है कि भारतीय महासागर में पॉजिटिव भारतीय महासागर द्विध्रुव (Positive Indian Ocean Dipole या IOD) विकसित होने की संभावना है, खासकर अगस्त-सितंबर में. यह अल-नीनो के निगेटिव असर को कुछ हद तक कम कर सकता है. भारत में अच्छी बारिश की संभावना बढ़ा सकता है।  अल-नीनो क्या है और यह भारत के मॉनसून को कैसे प्रभावित करता है? अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्री सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने से जुड़ी होती है. सामान्य रूप से, प्रशांत महासागर में पूर्वी हिस्से (दक्षिण अमेरिका के पास) ठंडा रहता है क्योंकि वहां ठंडे पानी का ऊपर आना होता है. लेकिन जब अल-नीनो आता है तो हवाओं में बदलाव से गर्म पानी पूर्व की ओर फैल जाता है. इससे पूरे क्षेत्र का तापमान बढ़ जाता है।  भारत के लिए अल-नीनो का मतलब अक्सर कम बारिश होता है. कारण यह है कि अल-नीनो ऊपर की हवाओं को प्रभावित करता है. सामान्य मॉनसून में, गर्म और नम हवा भारत की ओर आती है. लेकिन अल-नीनो के दौरान इंडोनेशिया और भारत के ऊपर वायुमंडल में सब्सिडेंस बढ़ जाता है, जो बादलों के बनने और बारिश को रोकता है. नतीजा- सूखा, अनियमित बारिश, फसलें प्रभावित और पानी की कमी।  रिपोर्ट के मुताबिक नीनो 3.4 इंडेक्स +0.81°C पहुंच चुका है. सभी मॉडल बताते हैं कि आने वाले महीनों में प्रशांत महासागर और गर्म होता रहेगा. भारतीय मौसम विभाग ने भी 2026 के मॉनसून के लिए औसत से कम बारिश (लगभग 90% LPA) की भविष्यवाणी की है. लेकिन मौसम विज्ञान में एक घटना अकेली नहीं चलती. यहां पॉजिटिव IOD की उम्मीद भारत के लिए राहत की किरण बन सकती है।  भारतीय महासागर द्विध्रुव क्या है?  भारतीय महासागर द्विध्रुव या IOD हिंद महासागर की एक महत्वपूर्ण जलवायु घटना है. इसे कभी-कभी 'भारतीय अल-नीनो' भी कहा जाता है. यह हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से यानी अफ्रीका के पास सोमालिया तट पर और पूर्वी हिस्से यानी इंडोनेशिया के पास समुद्री सतह के तापमान में अंतर पर आधारित है।  IOD के तीन चरण होते हैं…     पॉजिटिव IOD: पश्चिमी हिंद महासागर (अफ्रीका की ओर) का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है, जबकि पूर्वी हिस्सा (इंडोनेशिया की ओर) ठंडा रहता है. इससे पश्चिम की ओर नमी बढ़ती है।      निगेटिव IOD: ठीक उलटा- पूर्वी हिस्सा गर्म और पश्चिमी ठंडा।      न्यूट्रल: दोनों तरफ तापमान लगभग सामान्य. IOD की गणना IOD इंडेक्स से की जाती है, जो पश्चिमी-पूर्वी हिस्सों के तापमान के अंतर पर आधारित है. जून 2026 में इंडेक्स -0.34°C था, यानी न्यूट्रल की ओर. लेकिन रिपोर्ट और अन्य मॉडल अगस्त-सितंबर में पॉजिटिव IOD विकसित होने की संभावना जता रहे हैं।  पॉजिटिव IOD कैसे बनता है? सामान्य हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं. पॉजिटिव IOD में ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल जाती है. इससे पश्चिमी हिस्से में गर्म पानी जमा हो जाता है. पूर्व में ठंडे पानी का ऊपर आना बढ़ जाता है. इससे वायुमंडलीय सर्कुलेशन बदलता है- पश्चिम की ओर (भारत और अफ्रीका) नमी और वर्षा बढ़ती है, जबकि पूर्व (ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया) में सूखा पड़ सकता है।  पॉजिटिव IOD अल-नीनो को कैसे संतुलित करेगा? अल-नीनो और IOD दोनों महासागरों की घटनाएं हैं, लेकिन उनके प्रभाव अक्सर उलटे होते हैं. अल-नीनो भारत में बारिश कम करता है, जबकि पॉजिटिव IOD बारिश बढ़ाने में मदद करता है।  पॉजिटिव IOD के दौरान हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से से ज्यादा नमी भारत की ओर आती है. इससे दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की ताकत बढ़ती है. खासकर मॉनसून के दूसरे हिस्से (अगस्त-सितंबर) में इसका असर ज्यादा देखा जाता है. पॉजिटिव IOD वाले वर्षों में, भले ही अल-नीनो हो, भारत में सामान्य या ज्यादा बारिश हो सकती है।  उदाहरण के लिए- 1997-98 में मजबूत अल-नीनो था, लेकिन पॉजिटिव IOD ने भारत में अच्छी बारिश सुनिश्चित की. 2019 में भी पॉजिटिव IOD ने मॉनसून को मजबूत किया. 2026 में अगर IOD अगस्त-सितंबर तक पॉजिटिव हो गया तो यह अल-नीनो के सूखे प्रभाव को कम कर सकता है, खासकर मध्य और पश्चिमी भारत में।  वैज्ञानिक कारण- पॉजिटिव IOD से हिंद महासागर पर कम दबाव का क्षेत्र बनता है, जो मॉनसून की हवाओं को आकर्षित करता है. इससे बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से नम हवा ज्यादा मात्रा में भारत पहुंचती है. अल-नीनो का प्रभाव मुख्य रूप से जून-जुलाई में ज्यादा होता है, जबकि IOD बाद में सक्रिय होकर संतुलन बना सकता है।  भारत के लिए क्या मतलब है? कृषि, अर्थव्यवस्था और तैयारी भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी कृषि पर काफी निर्भर है. अच्छा मॉनसून फसलों के लिए जरूरी है- खासकर खरीफ की फसलें जैसे धान, मक्का, सोयाबीन आदि. अगर पॉजिटिव IOD ने मदद की तो जल संकट कम हो सकता है. बिजली उत्पादन बेहतर रहेगा और सूखे से बचाव हो सकता है. लेकिन पूरी उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. IOD की भविष्यवाणी अभी संभावना है, न कि पक्की. अगर IOD कमजोर रहा या अल-नीनो बहुत मजबूत हुआ (सुपर अल-नीनो) तो समस्या बनी रह सकती है. IMD और अन्य एजेंसियां लगातार निगरानी कर रही हैं।  भविष्य की चुनौतियां और जलवायु परिवर्तन का रोल जलवायु परिवर्तन के कारण ये घटनाएं ज्यादा तीव्र और अनिश्चित हो रही हैं. अल-नीनो-ला नीना चक्र तेज हो रहा है. IOD भी ज्यादा बार घट रहा है. वैज्ञानिक लगातार बेहतर मॉडल विकसित कर रहे हैं ताकि पूर्वानुमान सटीक हों. 2026 का मौसम महत्वपूर्ण होगा. पॉजिटिव IOD अगर आया तो यह 'मॉनसून बूस्ट' साबित हो सकता है।  अल-नीनो की चेतावनी गंभीर है, लेकिन प्रकृति अक्सर संतुलन बनाती है. पॉजिटिव भारतीय महासागर द्विध्रुव भारत के लिए उम्मीद की किरण है. यह अल-नीनो के प्रभाव को कम करके अच्छी बारिश ला सकता है. वैज्ञानिक निगरानी और सतर्कता से हम इस चुनौती का … Read more

खराब मौसम भी नहीं रोक पाया श्रद्धालुओं का उत्साह, केदारनाथ धाम पहुंचे 12 लाख से ज्यादा भक्त

 रुद्रप्रयाग उत्तराखंड के प्रसिद्ध केदारनाथ धाम में इन दिनों भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा है. खराब मौसम के बावजूद इस बार केदारनाथ धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी जा रही है. मात्र डेढ़ महीने में 12 लाख से ज्यादा भक्त बाबा केदारनाथ के दर्शन कर चुके हैं. रोजाना 15,000 से अधिक श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।  केदारनाथ मंदिर हिमालय की गोद में स्थित है. यहां पहुंचना आसान नहीं होता, मुश्किल रास्तों के बावजूद भक्तों का जोश हाई है. लोग हेलीकॉप्टर, पैदल, डंडी और घोड़ों के सहारे भी मंदिर तक पहुंच रहे हैं. ठंड के बावजूद श्रद्धालु लंबी कतारों में खड़े होकर बाबा के दर्शन की राह देख रहे हैं. मौसम खराब होने पर भी भक्तों के कदम नहीं थम रहे हैं और यात्रा का सिलसिला जारी है।  मंदिर प्रशासन और स्थानीय लोगों के अनुसार, इस सीजन में भक्तों की संख्या बहुत ज्यादा है. सिर्फ डेढ़ महीने में 12 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने मंदिर के द्वार पार किए हैं. यह संख्या इस छोटे से समय के लिए बहुत बड़ी मानी जा रही है।  इस भारी भीड़ से केदारनाथ नगर में रौनक छाई है. दुकानें, होटल, रेस्टोरेंट, ट्रांसपोर्ट, पोर्टर, घोड़े वाले और छोटे-छोटे विक्रेता सभी व्यस्त हैं. स्थानीय लोगों की अच्छी कमाई हो रही है. कई लोगों को नौकरी और रोजगार के नए अवसर मिले हैं. इस यात्रा ने न सिर्फ धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया है बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान की है।  बता दें कि केदारनाथ धाम की आध्यात्मिक शक्ति और भक्तों की अटूट आस्था ही इस भीड़ का मुख्य कारण है. खराब मौसम में भी लोग परिवार के साथ, दोस्तों के साथ और अकेले बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए निकल पड़ते हैं. केदारनाथ यात्रा इस बारफिर साबित कर रही है कि आस्था की राह में कोई बाधा नहीं रोक सकती।  भक्तों का यह लगातार आना न सिर्फ मंदिर की महिमा बढ़ा रहा है बल्कि पूरे क्षेत्र को भी सकारात्मक ऊर्जा दे रहा है. यात्रा अभी जारी है और अगर मौसम साथ देता रहा तो इस साल भक्तों की संख्या और भी बढ़ने की उम्मीद है। 

तेलंगाना में 89 लाख वोटरों का ‘जिन्न’ बाहर, कांग्रेस समेत सभी दलों की बढ़ी चिंता; क्या है पूरा मामला?

हैदराबाद  याद कीजिए पश्चिम बंगाल में जब एसआईआर हुआ तो करीब 70 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हो गए. यानी ऐसे वोटर जिनका हकीकत में कोई वजूद ही नहीं था या जो फर्जी थे. नतीजा क्या हुआ? ममता बनर्जी की अजेय मानी जाने वाली सरकार भरभरा कर ढह गई. अब ठीक वैसा ही ज‍िन्‍न कांग्रेस के गढ़ तेलंगाना में बाहर आया है. बंगाल में तो फिर भी एसआईआर में लाखों नाम कटे थे, तेलंगाना में तो प्री-एसआईआर यानी शुरुआती जांच में ही 89 लाख फर्जी या गड़बड़ वोटर पाए गए हैं. अगर छंटनी हुई तो तेलंगाना की स‍ियासत में भूचाल आना तय है।  क्या है ये 89 लाख का गड़बड़झाला? तेलंगाना में पिछले कई महीनों से चुनाव आयोग के अधिकारी एक खास मिशन पर लगे हुए थे. इसे तकनीकी भाषा में प्री-एसआईआर मैपिंग कहा गया. अध‍िकार‍ियों ने साल 2002 की वोटर लिस्ट उठाई और उसे आज की वोटर ल‍िस्‍ट से म‍िलान करवाया. मकसद था ये देखना कि वोटर लिस्ट में जो नाम दर्ज हैं, वो असली हैं या सिर्फ कागजों पर वोट डाल रहे हैं. तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी सी. सुदर्शन रेड्डी ने इसकी ड‍िटेल्‍स सामने रखी।  तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया क‍ि वोटर ल‍िस्‍ट में 11 तरह की गड़बड़‍ियां पाई गई हैं. अब तक कुल मिलाकर लगभग 89 लाख गड़बड़‍ियां सामने आ चुकी हैं. मतलब साफ है क‍ि 89 लाख वोटरों के डेटा में कुछ न कुछ ऐसा झोल है, जो सामान्य नहीं है. अब चुनाव आयोग इन सभी संदिग्ध वोटरों को नोटिस थमाएगा और उनसे पूछेगा कि तुम्हारा वजूद क्या है? जरा सबूत तो दिखाओ! 11 गड़बड़‍ियां क‍िस-क‍िस तरह की?     बाप-बेटे की उम्र में 15 साल से कम का अंतर: वोटर लिस्ट बता रही है कि कई मामलों में माता-पिता और उनके बच्चों की उम्र के बीच 15 साल से भी कम का अंतर है. यानी, कागज के हिसाब से कोई 13 या 14 साल की उम्र में ही माता-पिता बन गया।      दो भाई-बहनों के बीच 9 महीने से कम का अंतर: दो बच्चों के जन्म के बीच कम से कम 9 महीने का फासला होता है (जुड़वा बच्चों को छोड़कर). लेकिन तेलंगाना की वोटर लिस्ट में ऐसे हजारों भाई-बहन हैं, जिनके जन्म के बीच 9 महीने से भी कम का गैप है।      बाप-बेटे की उम्र में 50 साल से ज्यादा का अंतर: एक तरफ 15 साल से कम का अंतर है, तो दूसरी तरफ ऐसे वोटर भी हैं जहां माता-पिता और संतान की उम्र में 50 साल से ज्यादा का फासला दर्ज है।      दादा और पोते की उम्र में 40 साल से कम का अंतर: दादा और पोते के बीच कम से कम दो पीढ़ियों का फासला होता है. लेकिन यहां वोटर लिस्ट में दादा और पोते की उम्र के बीच 40 साल से भी कम का अंतर है।      रिश्तों का बदल जाना : सबसे मजेदार झोल ये है कि मौजूदा वोटर लिस्ट और पुरानी लिस्ट का जब मिलान किया गया, तो पता चला कि वोटर का नाम तो वही है, लेकिन उसके रिश्तेदारों के नाम या रिश्ते का प्रकार ही बदल गया है. जो पिछली लिस्ट में पिता था, वो नई लिस्ट में पति बन गया! अब होगा दूध का दूध-पानी का पानी सवाल ये कि इन 89 लाख संदिग्धों का क्या होगा? इसके लिए चुनाव आयोग SIR करने जा रहा है. तेलंगाना इससे पहले साल 2002 में एसआईआर हुआ था. यानी 22 साल बाद फिर से वोटर लिस्ट का पूरा पोस्टमार्टम होने जा रहा है।  25 जून से 24 जुलाई के बीच ‘बूथ लेवल ऑफिसर’ तेलंगाना के हर घर का दरवाजा खटखटाएंगे. वो एक फॉर्म देंगे, उसे भरवाएंगे, चेक करेंगे कि जो वोटर लिस्ट में लिखा है, वो आदमी हकीकत में उस घर में रहता भी है या नहीं. अगर दादा और पोते की उम्र में 30 साल का अंतर है, तो BLO पूछेगा कि ये कौन सा चमत्कार है! अगर जवाब नहीं मिला या वोटर गायब मिला, तो उसका नाम लिस्ट से काट दिया जाएगा।  तेलंगाना का गणित समझ‍िए तेलंगाना की कुल आबादी लगभग 3.5 से 4 करोड़ के बीच है. यहां कुल वोटरों की संख्या करीब 3 करोड़ 20 लाख के आसपास बैठती है. अब अगर 3.2 करोड़ वोटरों में से 89 लाख वोटर यानी करीब 27-28% वोटर संदिग्ध हैं, तो ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं है. अगर इस 89 लाख में से छंटनी के बाद 40 या 50 लाख वोटर भी फर्जी पाए गए और उनके नाम काटे गए, तो पूरा का पूरा चुनावी समीकरण बदल जाएगा।  जीत-हार का मार्जिन तेलंगाना विधानसभा चुनावों में कई बार हार-जीत का अंतर 2,000 से 5,000 वोटों का होता है. अगर हर विधानसभा क्षेत्र से 30,000 से 40,000 फर्जी वोट कट जाएं, तो उन सीटों पर नतीजे पूरी तरह से पलट सकते हैं। 

Road Accident Report 2024: देश में 4.87 लाख सड़क हादसे, 1.77 लाख लोगों की मौत; चौंकाने वाले आंकड़े आए सामने

 नई दिल्ली भारत में साल 2024 के दौरान हुए सड़क हादसों को लेकर सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की है. इसमें मरने वालों की संख्या बढ़कर 1.77 लाख से अधिक हो गई. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, देश में पिछले साल करीब 4.87 लाख दुर्घटनाएं दर्ज की गईं. ये संख्या 2023 के मुकाबले 1.48 प्रतिशत अधिक है।  न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, रोड एक्सीडेंट इन इंडिया 2024 की रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2024 में देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 4,87,707 सड़क हादसे हुए. ये सभी मामले पुलिस विभागों द्वारा दर्ज किए गए हैं।  इन हादसों में 1,77,175 लोगों की मौत हुई और 4,71,441 लोग घायल हुए हैं. इसका मतलब है कि देश में हर घंटे औसतन 56 एक्सीडेंट हुए और 20 लोगों ने अपनी जान गंवाई।  तमिलनाडु में सबसे ज्यादा हादसे, यूपी में सबसे ज्यादा मौतें इस रिपोर्ट से पता चलता है कि देश के अलग-अलग राज्यों में हादसों की स्थिति कितनी गंभीर है. साल 2024 में तमिलनाडु सड़क हादसों के मामले में सबसे ऊपर रहा. यहां साल भर के भीतर सबसे ज्यादा 67,526 सड़क हादसे दर्ज किए गए. वहीं उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 24,118 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई।  रिपोर्टस के अनुसार, एक्सप्रेसवे को मिलाकर सिर्फ नेशनल हाईवे (NH) पर ही साल भर में कुल 1,50,958 हादसे (31.0%) हुए. राज्य राजमार्गों पर 1,03,538 हादसे दर्ज किए गए. जबकि 2,33,211 दुर्घटनाएं अन्य सड़कों पर हुईं।  इसमें से नेशनल हाईवे पर 64,772 (36.6%) मौतें हुईं, स्टेट हाईवे पर 39,277 (22.2%) मौतें और अन्य सड़कों पर 73,126 (41.3%) मौतें दर्ज की गईं. साल के दौरान हुई कुल 1,64,378 जानलेवा दुर्घटनाओं में से 59,043 (35.9%) नेशनल हाईवे पर, 36,392 (22.1%) स्टेट हाईवे पर और 68,943 (41.9%) अन्य सड़कों पर हुईं है।  दोपहिया वाहन सवार सबसे ज्यादा शिकार मंत्रालय की रिपोर्ट में ये बात भी पूरी तरह स्पष्ट की गई है कि सड़क पर चलने वाले दोपहिया वाहन चालकों और राहगीरों की जिंदगी सबसे ज्यादा खतरे में है. हादसों में जान गंवाने वालों में सबसे बड़ा हिस्सा (46.2%) बाइक और स्कूटी चलाने वालों का था. दुर्घटनाओं में शामिल गाड़ियों की बात करें तो भी दोपहिया वाहनों की संख्या सबसे ज्यादा रही।  इसके बाद सड़क पार करने वाले या फुटपाथ पर चलने वाले पैदल लोग इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर है. इनकी कुल मौतों में हिस्सेदारी 20.6 प्रतिशत दर्ज की गई. वहीं कार, टैक्सी, वैन और हल्के मोटर वाहनों (LMVs) का इस्तेमाल करने वालों की हिस्सेदारी कुल मौतों में 12.4 प्रतिशत रही. कुल मिलाकर, दोपहिया वाहनों के बाद सबसे ज्यादा मौतें हल्की गाड़ियों और फिर भारी ट्रकों या लॉरियों की चपेट में आने की वजह से हुईं। 

पेपर लीक पर सख्ती: 551 शहरों में NEET प्रश्नपत्र की डिलीवरी के लिए अभेद्य सुरक्षा घेरा, जानिए पूरा प्लान

नई दिल्ली NEET 2026 री-एग्जाम को लेकर केंद्र सरकार ने सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए हैं. 21 जून को होने वाली परीक्षा से पहले प्रश्नपत्रों और अन्य गोपनीय सामग्री की सुरक्षित ढुलाई सुनिश्चित करने के लिए दो-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई है.सूत्रों के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) को इस पूरी प्रक्रिया में अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है.सरकार का लक्ष्य है कि परीक्षा सामग्री पूरी तरह सुरक्षित तरीके से देशभर के परीक्षा केंद्रों तक पहुंचे और किसी भी तरह की गड़बड़ी या सुरक्षा चूक की संभावना न रहे।  प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा व्यवस्था सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार ने परीक्षा सामग्री की ढुलाई और निगरानी के लिए दो-स्तरीय सुरक्षा कवर तैयार किया है. इसके तहत प्रश्नपत्रों और अन्य गोपनीय दस्तावेजों की पैकिंग, परिवहन और वितरण के दौरान CRPF और CISF के जवान लगातार सुरक्षा घेरा बनाए रखेंगे.परीक्षा से जुड़ी हर गतिविधि पर नजर रखी जाएगी ताकि किसी भी स्तर पर गोपनीयता से समझौता न हो।  551 शहरों तक कैसे पहुंचेगा NEET का पेपर? इस बार परीक्षा सामग्री को देशभर में पहुंचाने के लिए बड़े स्तर का लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार किया गया है. प्रश्नपत्रों को सबसे पहले हैदराबाद और अहमदाबाद स्थित प्रमुख केंद्रों से भेजा जाएगा.इसके बाद एयर और रोड ट्रांसपोर्ट के संयुक्त नेटवर्क के जरिए सामग्री को देश के लगभग 551 हब शहरों तक पहुंचाया जाएगा. इस पूरी प्रक्रिया को हब एंड स्पोक मॉडल के तहत संचालित किया जा रहा है, जिससे दूर-दराज के क्षेत्रों तक भी समय पर सामग्री पहुंच सके।  वायुसेना के विमान और हेलिकॉप्टरों का होगा इस्तेमाल सूत्रों का कहना है कि प्रश्नपत्रों की सुरक्षित और तेज ढुलाई के लिए भारतीय वायुसेना के विमान और हेलिकॉप्टर भी लगाए गए हैं. परीक्षा सामग्री के साथ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के जवान भी यात्रा करेंगे.इन जवानों का पूरा विवरण पहले ही रक्षा मंत्रालय को उपलब्ध कराया गया है ताकि उनके लिए आवश्यक यात्रा अनुमति और सुरक्षा मंजूरी समय पर जारी की जा सके।  यात्रा से पहले जमा करने होंगे हथियार सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात CAPF जवानों के लिए विशेष प्रोटोकॉल भी तय किया गया है. जो जवान सैन्य विमानों या हेलिकॉप्टरों में यात्रा करेंगे उन्हें उड़ान से पहले अपने सरकारी हथियार जमा कराने होंगे.यात्रा के दौरान हथियार सुरक्षित स्थान पर रखे जाएंगे और गंतव्य तक पहुंचने के बाद संबंधित जवानों को वापस सौंप दिए जाएंगे।  11 जून से शुरू हुई प्रश्नपत्र पहुंचाने की प्रक्रिया परीक्षा सामग्री को विभिन्न राज्यों और शहरों तक पहुंचाने का काम 11 जून से शुरू हो चुका है. अगले कई दिनों तक लगातार प्रश्नपत्र और अन्य गोपनीय सामग्री निर्धारित केंद्रों तक भेजी जाएगी.सुरक्षा एजेंसियां और प्रशासनिक टीमें इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रही हैं ताकि निर्धारित समय के भीतर सभी केंद्रों पर सामग्री पहुंच जाए।  परीक्षा खत्म होते ही शुरू होगा रिवर्स ऑपरेशन सिर्फ प्रश्नपत्र पहुंचाना ही नहीं बल्कि परीक्षा समाप्त होने के बाद उत्तर पुस्तिकाओं और अन्य दस्तावेजों को वापस सुरक्षित तरीके से लाना भी इस मिशन का हिस्सा है.21 जून को परीक्षा समाप्त होने के बाद उसी शाम से OMR उत्तर पुस्तिकाओं और अन्य परीक्षा सामग्री को एकत्र करने का अभियान शुरू हो जाएगा. इसके लिए भी अलग से सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई है।  हर स्‍टेप पर रहेगी कड़ी निगरानी परीक्षा सामग्री के प्रस्थान से लेकर केंद्रों तक पहुंचने और फिर OMR शीट्स की वापसी तक पूरी प्रक्रिया पर सुरक्षा एजेंसियों की नजर रहेगी. परिवहन, भंडारण और वितरण के हर चरण को संवेदनशील मानते हुए विशेष निगरानी की जा रही है.अधिकारियों का कहना है कि इस बार सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स के स्तर पर व्यापक तैयारी की गई है ताकि परीक्षा पूरी तरह निष्पक्ष और व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराई जा सके।  देश के सबसे बड़े परीक्षा अभियानों में से एक 21 जून को होने वाला NEET 2026 री-एग्जाम देश के सबसे बड़े परीक्षा अभियानों में से एक माना जा रहा है. लाखों अभ्यर्थियों से जुड़ी इस परीक्षा के लिए सुरक्षा एजेंसियों, प्रशासन, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क और रक्षा संस्थानों के बीच व्यापक समन्वय स्थापित किया गया है.केंद्र सरकार का मानना है कि मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और सख्त निगरानी के जरिए परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी बनाया जा सकता है। 

क्या होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाएगा भारत? G7 शिखर सम्मेलन में मोदी-मैक्रों की अहम बैठक

 नई दिल्ली पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास लगातार बिगड़ते सुरक्षा हालात के बीच फ्रांस ने भारत को एक अहम समुद्री सुरक्षा पहल में शामिल करने का प्रस्ताव दिया है. G7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की होने वाली द्विपक्षीय बैठक में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा होने की उम्मीद है।  फ्रांस कई साझेदार देशों के साथ मिलकर होर्मुज स्ट्रेट में फ्री शिपिंग और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय पहल पर काम कर रहा है. इस पहल में भारत को भी शामिल किए जाने की संभावना है. होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है।  रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मैक्रों की बातचीत में रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, सैन्य उपकरणों की खरीद, रणनीतिक साझेदारी और पश्चिम एशिया के ताजा हालात प्रमुख मुद्दे होंगे. हाल के महीनों में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़े तनाव के कारण खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा वैश्विक चिंता बन गई है।  भारत-अमेरिका-कतर समेत कई देशों की अलग मीटिंग G7 सम्मेलन के इतर पश्चिम एशिया पर केंद्रित एक विशेष बैठक भी होगी, जिसमें भारत, अमेरिका, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं के शामिल होने की संभावना है. इस बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर चर्चा हो सकती है।  विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस और स्लोवाकिया यात्रा की जानकारी देते हुए कहा कि मोदी और मैक्रों की बैठक में पश्चिम एशिया समेत सभी वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा होगी. उन्होंने संकेत दिया कि विभिन्न देशों द्वारा हाल में की गई नई पहलों और घोषणाओं पर भी विचार-विमर्श होगा।  फ्रांस युद्ध में शामिल नहीं, लेकिन समुद्री सुरक्षा जरूरी फ्रांसीसी अधिकारियों ने कहा कि समुद्री मार्गों का खुला और सुरक्षित रहना पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है. उनका कहना है कि फ्रांस किसी युद्ध का हिस्सा नहीं है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना जरूरी है।  फ्रांस ने भारत को अपना प्रमुख रणनीतिक साझेदार बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग का स्तर बेहद मजबूत है. रिपोर्ट में फ्रांसीसी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि, भारत अब G7 से जुड़े लगभग सभी प्रमुख मंचों का हिस्सा बन चुका है और वैश्विक मामलों में उसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है. इस बीच सिबी जॉर्ज ने यह भी संकेत दिया कि 14 से 16 जून के बीच होने वाली प्रधानमंत्री मोदी की स्लोवाकिया यात्रा के दौरान रक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ अहम ऐलान किए जा सकते हैं। 

पहली बार 12 परमाणु हथियार तैनात करने की रिपोर्ट से PAK में खलबली, सामने आया बड़ा रिएक्शन

नई दिल्ली दक्षिण एशिया में रणनीतिक संतुलन और सैन्य ताकत को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आई है. वैश्विक हथियारों की निगरानी करने वाली संस्था 'स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट' (SIPRI) की ताजा रिपोर्ट के बाद पूरे पाकिस्तान में हड़कंप मच गया है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने इतिहास में पहली बार अपने परमाणु हथियारों को केवल स्टॉकपाइलमें रखने के बजाय सीधे तौर पर ऑपरेशनल मोड में तैनात कर दिया है।  इस खुलासे के तुरंत बाद पाकिस्तान सरकार और वहां के विदेश मंत्रालय की तरफ से बेहद डरा हुआ बयान सामने आया है, जिसमें इस्लामाबाद ने खुले तौर पर माना है कि भारत की परमाणु ताकत अंतरराष्ट्रीय अनुमानों से कहीं ज्यादा बड़ी और घातक हो सकती है।  भारत की परमाणु ट्रायड और 'कैनिस्टराइजेशन' तकनीक से सहमा इस्लामाबाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि वे नई दिल्ली की तेजी से बढ़ती रणनीतिक क्षमताओं और बदलते परमाणु रुख पर बहुत बारीक नजर रख रहे हैं. पाकिस्तान ने विशेष रूप से भारत की मिसाइल प्रणालियों के कैनिस्टराइजेशन को लेकर गहरी चिंता जताई है।  कैनिस्टराइजेशन ऐसी अत्याधुनिक तकनीक है जिसमें परमाणु वॉरहेड को पहले से ही मिसाइल के अंदर सील करके रखा जाता है, जिससे युद्ध की स्थिति में मिसाइल को बहुत कम समय में और बेहद तेजी से दागा जा सकता है।  पाकिस्तान ने भारत की परमाणु-सक्षम पनडुब्बियों के जरिए समुद्र आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के विस्तार और लंबी दूरी की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) प्रणालियों के विकास को अपनी सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बताया है।  पहली बार 'डिप्लॉयड' मोड में आए भारतीय न्यूक्लियर वॉरहेड रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पास वर्तमान में लगभग 190 परमाणु वॉरहेड मौजूद हैं. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने वाली बात यह है कि इन 190 वॉरहेड्स में से 12 को 'ऑपरेशनल रूप से तैनात' श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है. यह पहली बार है जब किसी वैश्विक रक्षा एजेंसी ने भारत के परमाणु हथियारों के एक हिस्से को केवल भंडार के रूप में न देखकर, पूरी तरह से सक्रिय सैन्य तैनाती के रूप में दर्ज किया है।  पाकिस्तान ने इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया है कि जमीन, हवा और समुद्र तीनों मोर्चों से परमाणु हमला करने की भारत की क्षमता अब पूरी तरह परिपक्व और सुरक्षित हो चुकी है, जो किसी भी संकट के समय भारत की 'ऑपरेशनल रेडीनेस' यानी युद्ध की तैयारियों को कई गुना बढ़ा देती है।  अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गिड़गिड़ाया पाकिस्तान, कहा- वैश्विक शक्तियां ध्यान दें भारत की इस बढ़ती सैन्य और परमाणु ताकत से घबराए पाकिस्तान ने अब दुनिया के अमीर और ताकतवर देशों से गुहार लगानी शुरू कर दी है. पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से भारत को उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियां और आधुनिक हथियार सप्लाई करने वाले देशों से अपील की है कि वे इस पर तुरंत रोक लगाएं।  इस्लामाबाद का तर्क है कि भारत की यह आधुनिक होती सैन्य शक्ति दक्षिण एशिया में रणनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय सुरक्षा के संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगी. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का यह बयान उसकी अपनी आंतरिक कमजोरियों और भारत के मुकाबले रक्षा बजट में लगातार पिछड़ने की हताशा को दर्शाता है, क्योंकि भारत लगातार 'नो फर्स्ट यूज' की नीति पर कायम रहते हुए अपनी संप्रभुता को मजबूत कर रहा है। 

इंग्लैंड, आयरलैंड और जर्मनी में प्रवासी विरोधी माहौल, विदेश जाने की सोच रहे भारतीयों के लिए कितनी चिंता?

लंदन  कभी बेहतर पढ़ाई, अच्छी नौकरी और सुरक्षित भविष्य के सपने लेकर यूरोप जाने वाले प्रवासियों के लिए अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा. ब्रिटेन, आयरलैंड, जर्मनी, नीदरलैंड और कई दूसरे यूरोपीय देशों में पिछले कुछ सालों से प्रवासियों को लेकर बहस तेज होती जा रही है. ताजा हालात ये हैं कि कहीं सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, कहीं सरकारें वीजा नियम सख्त कर रही हैं और कहीं स्थानीय लोग अपने शहरों में बढ़ती आबादी और संसाधनों पर दबाव को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं।  ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यूरोप में प्रवासियों के खिलाफ यह गुस्सा क्यों बढ़ रहा है? क्या भारतीय भी इसके निशाने पर हैं? और अगर हां, तो फिर इस माहौल का भारतीय छात्रों, कामगारों और परिवारों पर क्या असर पड़ सकता है? इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें कुछ साल पीछे जाना होगा।  साल 2015 में सीरिया, अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया के कई हिस्सों में युद्ध और अस्थिरता की वजह से लाखों लोग यूरोप की ओर बढ़े. जर्मनी समेत कई देशों ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को स्वीकार किया. उस समय इसे मानवीय कदम माना गया. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतते गए, कई देशों में लोगों को लगने लगा कि स्कूलों, अस्पतालों, मकानों और सरकारी सेवाओं पर दबाव बढ़ रहा है।  बेहतर भविष्य और अच्छी नौकरी के लिए भारतीय भी बड़ी संख्या में यूरोप जाने लगे. शिक्षा से लेकर रहन-सहन, साफ हवा और परिवार के लिए बेहतर माहौल की तलाश में भारतीयों ने यूरोपीय देशों को चुना. इसी दौरान यूक्रेन युद्ध की वजह से भी लाखों लोग अन्य यूरोपीय देश पहुंचे. यहीं से प्रवास और शरणार्थियों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई।  ब्रिटेन में क्यों भड़का लोगों का गुस्सा? ब्रिटेन में पिछले कुछ वर्षों से प्रवासी एक बड़ा मुद्दा रहा है. यहां कहावत है कि लोग इंग्लिश चैनल पार करके छोटी नावों से आते हैं और संसाधनों पर कब्जा कर लेते हैं. जंगों और स्थानीय प्रताड़ना की वजह से जब लोग ब्रिटेन पुहंचते हैं और सरकार उन्हें स्वीकार करती हैं तो उनके रहने-सहने के लिए सरकारी इंतजाम भी किए जाते हैं।  कहा जाता है कि सरकार इन लोगों को अस्थायी रूप से होटलों में ठहराती है. कई शहरों और कस्बों में स्थानीय लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. उनका कहना था कि उनके इलाके में पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं, स्कूलों और आवास की कमी है. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर कई बार ऐसी खबरें और अफवाहें भी फैलती रही हैं, जिनसे तनाव बढ़ा. कुछ जगहों पर विरोध प्रदर्शन हिंसक भी हुए।  कई मामलों में पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा. हालांकि, इन प्रदर्शनों का मुख्य मुद्दा शरणार्थी नीति और अवैध प्रवास था, लेकिन माहौल ऐसा बना कि कई प्रवासी समुदायों को असुरक्षा महसूस होने लगी है।  आयरलैंड में क्या हुआ, प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? कुछ साल पहले तक आयरलैंड को प्रवासियों के प्रति आमतौर पर एक उदार देश माना जाता था. लेकिन हाल के वर्षों में वहां भी हालात बदलने लगे हैं. डबलिन और दूसरे शहरों में मकानों की भारी कमी है. किराए आसमान छू रहे हैं. स्थानीय लोगों का एक वर्ग मानता है कि बड़ी संख्या में नए लोगों के आने से दबाव और बढ़ा है. 2023 के आखिर में डबलिन में हुई हिंसा के बाद प्रवास और सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है. इसके बाद कई जगहों पर शरणार्थी केंद्रों और आवास योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन देखने को मिले. ताजा हालात ये हैं कि शहर-शहर में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं।  ताजा मामला उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में एक सूडानी शरणार्थी से जुड़ी चाकूबाजी से जुड़ा है, जिससे हालात तनावपूर्ण हो गए. घटना के विरोध में भड़की हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं. हालात को काबू में करने के लिए एंटी-राइट पुलिस, स्पेशल फोर्सेज और वॉटर कैनन की तैनाती की गई. प्रदर्शनकारियों पर ईंटें फेंकने और वाहनों में आग लगाने के आरोप हैं, जिसके बाद कई इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।  स्थानीय मीडिया की मानें तो कुछ दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े उपद्रवियों ने प्रवासियों और जातीय अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए कई इलाकों में घर-घर जाकर डराने-धमकाने की कोशिश भी की. इस दौरान कुछ मकानों और कारोबारों पर हमले किए गए और प्रदर्शनकारियों ने कई संपत्तियों को नुकसान भी पहुंचाया।  जर्मनी में प्रवासियों और शरणार्थिों पर बहस तेज जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. यहां लाखों विदेशी काम करते हैं. भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और इंजीनियरों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. लेकिन जर्मनी में भी प्रवास को लेकर राजनीतिक माहौल बदल रहा है. कुछ राजनीतिक दलों का कहना है कि देश को अपनी सीमाओं और शरणार्थी व्यवस्था पर ज्यादा नियंत्रण की जरूरत है।  दूसरी तरफ लाखों लोग ऐसे भी हैं जो प्रवासियों के समर्थन में सड़कों पर उतरते हैं. यानी जर्मनी में लड़ाई सिर्फ प्रवासियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि समाज दो अलग-अलग विचारधाराओं में बंटा हुआ नजर आ रहा है।  नीदरलैंड और दूसरे देशों में क्या तस्वीर है? यूरोप के अन्य देशों में भी प्रवास को लेकर बहस तेज हुई है. कहीं मुद्दा मकानों की कमी है, कहीं सुरक्षा को लेकर चिंता है, तो कहीं सरकारों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे सीमाओं को नियंत्रित नहीं कर पा रहीं. इटली लंबे समय से भूमध्य सागर के रास्ते आने वाले प्रवासियों का मुख्य प्रवेश द्वार रहा है. वहीं फ्रांस में भी समय-समय पर प्रवास और राष्ट्रीय पहचान को लेकर प्रदर्शन देखे जाते हैं. यानी हर देश की अपनी कहानी है, लेकिन लगभग हर जगह कुछ समान कारण दिखाई देते हैं।  दक्षिणी यूरोप के कई हिस्सों में इस समय बड़े पैमाने पर पर्यटन के खिलाफ भी विरोध बढ़ रहा है. नीदरलैंड, बेल्जियम, स्वीडन, फ्रांस, स्पेन और इटली के कई शहरों में भी स्थानीय लोग सड़कों पर उतरे हैं. लोगों का कहना है कि पर्यटकों की वजह से मकानों के किराए और संपत्तियों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जबकि सार्वजनिक सुविधाओं पर भी दबाव बढ़ा है।   स्पेन में बार्सिलोना और कैनरी द्वीप समूह समेत 40 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन हुए हैं. वहीं इटली के वेनिस, फ्लोरेंस, रोम और मिलान में किराये वाले पर्यटन आवासों के खिलाफ … Read more

3 भारतीय नागरिकों की मौत से बढ़ा तनाव, UN ने भी अमेरिका को सुनाई खरी-खरी; नियम-कायदों की दिलाई याद

नई दिल्ली ओमान तट के पास एक कॉमर्शियल जहाज पर हुए हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद भारत ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। नागरिकों की जान जाने की इस गंभीर घटना पर कड़ी आपत्ति जताते हुए विदेश मंत्रालय (MEA) ने अमेरिकी उप-राजदूत जेसन मीक्स को दोबारा तलब कर सख्त विरोध दर्ज कराया है। पिछले कुछ ही दिनों में यह दूसरी बार है जब भारत ने किसी अमेरिकी राजनयिक को तलब किया है। 30 मिनट तक चला कड़ा कूटनीतिक विरोध विदेश मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव (अमेरिका) नागराज नायडू ने जेसन मीक्स को तलब किया। यह बैठक लगभग 40 मिनट तक चली, जिसमें भारत ने कॉमर्शियल जहाज पर हुए हमले और उसमें तीन भारतीयों के मारे जाने पर अपना कड़ा आक्रोश व्यक्त किया। चूंकि भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर फिलहाल दिल्ली से बाहर हैं, इसलिए उनकी जगह जेसन मीक्स को यह कूटनीतिक विरोध सौंपने के लिए बुलाया गया। अमेरिका ने जहाजों पर हमला किया; टाइमलाइन     8 जून: अमेरिकी हमले में जहाज 'मैरीवेक्स' निशाना बना; 24 भारतीय क्रू सदस्यों को बचाया गया     9 जून: 'एमटी सेटेबेलो' पर हमला; 3 भारतीयों की मौत, 21 को बचाया गया     10 जून: अमेरिकी CdA मीक्स को तलब किया गया     11 जून: 'एमटी जलवीर' पर हमला; 20 भारतीय क्रू सदस्यों को बचाया गया     12 जून: अमेरिकी CdA मीक्स को तलब किया गया निशाना बने तीन प्रमुख जहाज और भारतीयों की मौत हालिया विवाद मुख्य रूप से तीन कॉमर्शियल जहाजों पर हुए हमलों से जुड़ा है, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय चालक दल मौजूद था। 'Settebello' पर हमला और मौतें: बुधवार को ओमान के सोहर बंदरगाह के पास इस पलाऊ-झंडे वाले टैंकर को निशाना बनाया गया। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी सेना द्वारा दागी गई मिसाइल के कारण जहाज के इंजन रूम में आग लग गई। जहाज पर 24 भारतीय सवार थे। इस भयावह हमले में 3 भारतीय नाविकों की जान चली गई, जबकि 21 को बचा लिया गया। 'MT Marivex' पर हमला: इससे पहले सोमवार को एक अन्य टैंकर, 'MT Marivex' पर भी अमेरिकी नौसेना द्वारा हमला किया गया था। उस जहाज पर भी 24 भारतीय नाविक मौजूद थे, जिन्हें सुरक्षित निकाल लिया गया था।  अमेरिकी नौसेना के हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत पर संयुक्त राष्ट्र समेत दूसरे संगठनों और देशों ने अमेरिकी कार्रवाई की तीखी आलोचना की है और इसे अस्वीकार्य बताया है. अमेरिकी दादागीरी के सामने तनकर खड़े होते हुए अंतर्राष्ट्रीय मेरीटाइम संगठन (अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन ) ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर असर डालने वाली सभी गतिविधियों में अंतरराष्ट्रीय कानूनों और समुद्र में व्यक्ति की सुरक्षा का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए. वहीं UN ने कहा कि वो IMO के बयान से इत्तेफाक रखता है।  बुधवार को अमेरिका ने पलाऊ के झंडे वाले एक टैंकर पर हमला किया था. इस टैंकर का नाम MT सेटेबेलो है. अमेरिका नौसेना ने सेटेबेलो पर मिसाइलों से हमला किया था. इस हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई थी।  भारत ने गुरुवार को कहा कि पिछले चार दिनों में ओमान के तट के पास भारतीय क्रू मेंबर वाले तीन कमर्शियल जहाजों पर अमेरिकी सेना ने हमला किया, जिसमें तीन भारतीयों की मौत हो गई. नई दिल्ली ने इन हमलों को लेकर अमेरिका के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया है।  दुनिया भर में जहाजों की सुरक्षा और समुद्री अनुशासन करने वाली संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने इस घटना के लिए अमेरिका की तीखी आलोचना की।  IMO ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट के पास हुई इस घटना में जहाज पर एक प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ, जिससे जहाज में आग लग गई और तीन नाविकों की मौत हो गई।  IMO के महासचिव आर्सेनियो डोमिंग्वेज ने कहा कि वह किसी भी पक्ष की ओर से की गई ऐसी किसी भी हरकत की "कड़ी" निंदा करते हैं, जिससे नाविकों की जान और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की सुरक्षा को खतरा हो।  "यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है. मेरी संवेदनाएं उन तीन नाविकों के परिवारों के साथ हैं जिनकी जान चली गई और उन सभी लोगों के साथ भी जो क्रू सदस्यों के बारे में खबर का इंतजार कर रहे हैं।  डोमिंग्वेज़ ने कहा कि IMO ने हर समय नाविकों, आम नागरिक जहाजों और नेविगेशन की आज़ादी की सुरक्षा की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है।  डोमिंग्वेज़ ने कहा, "अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर असर डालने वाली सभी गतिविधियों में अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्र में जीवन की सुरक्षा का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए. नाविकों की सुरक्षा एक साझा ज़िम्मेदारी है जिसे सबसे ज़्यादा अहमियत दी जानी चाहिए।  IMO के बयान से सहमति जताते हुए संयुक्त राष्ट्र के सेक्रेटरी-जनरल ने इस हमले की निंदा की. सेक्रेटरी-जनरल के प्रवक्ता स्टीफन डुजारिक ने ने कहा कि, 'खास बात यह है कि सेट्टेबेलो टैंकर पर हमला हुआ और कई भारतीय नाविक मारे गए. और इस हमले की इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइज़ेशन (IMO) के सेक्रेटरी-जनरल ने साफ़ तौर पर निंदा की थी. और हम उस बात का पूरी तरह से समर्थन और अनुमोदन करते हैं।    एमटी जलवीर पर हमला: ताजा मामला इस गिनी-बिसाऊ के ध्वज वाले जहाज एमटी जलवीर से जुड़ा है। अमेरिकी मध्य कमान ने एक बयान में कहा कि उसने एमटी जलवीर को ईरान के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंध का कथित तौर पर उल्लंघन करके ईरानी तेल परिवहन करने के प्रयास के आरोप में निष्क्रिय कर दिया। कमान ने कहा कि चालक दल द्वारा 'अमेरिकी सेना के निर्देशों का बार-बार पालन न करने' के बाद एक अमेरिकी विमान ने जहाज के इंजन कक्ष पर हमला किया। ओमान बंदरगाह के पास इस टैंकर पर हमले के बाद उसमें सवार 22 भारतीयों को बृहस्पतिवार को सुरक्षित निकाल लिया गया था। पिछले चार दिनों में ओमान तट के निकट अमेरिकी सेना द्वारा भारतीय चालक दल वाले व्यापारिक जहाजों पर हमले की यह तीसरी घटना है। भारत का सख्त रुख भारतीय नागरिकों की जान जाने से यह कूटनीतिक विवाद अब एक बेहद गंभीर मोड़ ले चुका है। विदेश मंत्रालय ने इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए स्पष्ट किया है कि वाणिज्यिक शिपिंग और निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाने की घटनाएं बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। भारत ने अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों … Read more

Inflation Alert: खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों से तेज हुई रिटेल महंगाई, जानिए कितना बढ़ा असर

नई दिल्ली देश में खाने-पीने की चीजों के दाम मई महीने में बढ़े हैं. रिटेल महंगाई दर मई के महीने में बढ़कर 3.93 प्रतिशत पहुंच गई है. अप्रैल महीने में महंगाई दर 3.48 प्रतिशत थी. हालांकि, महंगाई दर रिजर्व बैंक के अनुमान 4 प्रतिशत से नीचे रही है।  महंगाई दर रिजर्व बैंक के अनुमान 4 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे है. लगातार 16वें महीने महंगाई दर आरबीआई के लक्ष्य के नीचे रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और ईरान युद्ध के कारण महंगाई दर बढ़ी है. जून के मॉनिटरी पॉलिसी में आरबीआई ने वित्त वर्ष 27 के लिए महंगाई दर को सुधार करते हुए पहले के 4.6 प्रतिशत की तुलना में बढ़ाकर 5.1 फीसदी किया था।  ईरान, अमेरिका और इजरायल युद्ध के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रेशर बढ़ा है. करेंसी मार्केट पर भी इसका असर पड़ा है. हालांकि, इन सब झटकों के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था काफी मजबूत है और देश की जीडीपी 7.8 प्रतिशत है. खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमत महंगाई दर को बढ़ा रही है. इसकी कारण CPI में तेजी आई है।  अप्रैल के मुकाबले मई में दर्ज हुई बड़ी बढ़त सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मई महीने की खुदरा महंगाई दर ने अप्रैल के 3.48% के स्तर से एक लंबी छलांग लगाई है और यह सीधे 3.93% पर जा पहुंची है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सीपीआई (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) की गणना श्रृंखला में हाल ही में किए गए ढांचागत बदलावों के बाद से अब तक की यह सबसे बड़ी और उच्चतम रीडिंग दर्ज की गई है। इस वृद्धि का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आया उतार-चढ़ाव और घरेलू स्तर पर चुनिंदा खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आई मौसमी तेजी को माना जा रहा है, जिसने खुदरा बाजार के रुख को बदल दिया है। आरबीआई के निर्धारित बजटीय लक्ष्य के भीतर आंकड़े महंगाई के इस बढ़ते ग्राफ के बीच आम आदमी और नीति निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी तसल्ली यह है कि यह आंकड़ा अब भी केंद्रीय बैंक के नियंत्रण दायरे में है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक को देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए खुदरा महंगाई दर को 4% के मानक स्तर से नीचे रखने का वैधानिक लक्ष्य सौंपा हुआ है, जिसमें परिस्थितियों के अनुसार 2% का ऊपरी और निचला मार्जिन (टोलरेंस बैंड) शामिल किया गया है। वर्तमान में 3.93% की दर पर होने के कारण यह केंद्रीय बैंक के लिए नीतिगत ब्याज दरों (रेपो रेट) की समीक्षा करते समय बहुत अधिक आक्रामक रुख अपनाने के दबाव को कम करती है। पश्चिम एशिया के संकट का घरेलू बाजार पर सीधा असर बाजार विश्लेषकों का स्पष्ट अनुमान है कि पश्चिम एशिया क्षेत्र में जारी सैन्य और राजनीतिक गतिरोध के चलते वैश्विक व्यापारिक मार्गों पर माल ढुलाई की लागत में भारी इजाफा हुआ है। इस वैश्विक संकट के कारण भारत आयातित खाद्य तेलों, ईंधनों और अन्य आवश्यक कच्चे माल के लिए अधिक भुगतान कर रहा है, जिसका संचयी प्रभाव देश के भीतर खुदरा वस्तुओं के अंतिम मूल्य संवर्धन पर दिखाई दे रहा है। यदि आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर यह तनाव और गहराता है, तो आगामी तिमाहियों में घरेलू बाजार के भीतर खुदरा महंगाई दर के इस 4% के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।