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रूस-अमेरिका टकराव: पुतिन का जुकरबर्ग को सबक, चीन पर भी नजर

मॉस्को  मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp ने आरोप लगाया है कि रूस ने देश में उसकी सेवाओं को पूरी तरह ब्लॉक करने की कोशिश की है, ताकि यूजर्स को स्‍टेट सपोर्टेड डोमेस्टिक ऐप की ओर मोड़ा जा सके. Meta Platforms के स्वामित्व वाले इस ऐप के प्रवक्ता ने बताया कि रूस का यह कदम इंटरनेट स्पेस पर नियंत्रण बढ़ाने और विदेशी टेक कंपनियों की भूमिका सीमित करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है. तो क्‍या रूस भी चीन की राह पर चलने की तैयारी कर रहा है. दिलचस्‍प है कि चीन ने मैसेजिंग एप से लेकर सोशल साइट्स तक खुद की डेवलप की है. बीजिंग का उद्देश्‍य है कि इसके जरिये देश में पश्चिमी देशों के प्रभाव को रोका जा सकेगा और अमेरिका-यूरोप के टेक्‍नोलॉजी मोनोपोली पर लगाम लगाया जाएगा. अब रूस के कदम ने एक तरफ जहां मेटा चीफ मार्क जुकरबर्ग को उनकी औकात दिखा दी तो दूसरी तरफ अमेरिकी दादागिरी को भी ठोस चुनौती दी है. यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद मॉस्को और वेस्‍टर्न टेक्‍नोलॉजिकल कंपनियों के बीच तनाव लगातार बढ़ा है. रूसी अधिकारी घरेलू स्तर पर विकसित ऐप ‘MAX’ को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसे सरकार समर्थित बताया जा रहा है. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इस ऐप का इस्तेमाल यूजर्स की निगरानी और डेटा ट्रैकिंग के लिए किया जा सकता है, लेकिन सरकारी मीडिया ने इन आरोपों को निराधार करार दिया है. WhatsApp ने कहा कि रूस द्वारा उठाए गए कदम यूजर्स को एक सरकारी-स्वामित्व वाले सर्विलांस ऐप की ओर धकेलने की कोशिश है. कंपनी ने एक बयान में कहा, ‘हम उपयोगकर्ताओं को जुड़े रखने के लिए हर संभव प्रयास जारी रखेंगे.’ हालांकि, कंपनी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि रूस में सेवा बहाली को लेकर आगे की रणनीति क्या होगी. WhatsApp पर सख्‍ती इस बीच, क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने सरकारी समाचार एजेंसी TASS को दिए वीडियो बयान में कहा कि WhatsApp की वापसी रूसी कानूनों के पालन पर निर्भर करेगी. उन्होंने कहा, ‘अगर Meta कॉरपोरेशन कानून का पालन करती है और रूसी अधिकारियों के साथ संवाद करती है, तो समझौते की संभावना बन सकती है. लेकिन यदि कंपनी अडिग रुख अपनाती है और कानून के अनुरूप ढलने के लिए तैयार नहीं होती, तो कोई संभावना नहीं है.’ फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रूस के संचार नियामक रोसकोमनादज़ोर ने WhatsApp को अपने ऑनलाइन डायरेक्टरी से हटा दिया है. बताया जाता है कि रूस में इस ऐप के करीब 10 करोड़ यूजर्स हैं, जो इसे देश के सबसे लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स में से एक बनाता है. इस कदम को रूस की डिजिटल नीति में एक और सख्ती के तौर पर देखा जा रहा है. Apple पर भी गाज रूस ने पिछले साल WhatsApp और टेलीग्राम जैसी विदेशी मैसेजिंग सेवाओं पर कुछ कॉल सुविधाओं को सीमित करना शुरू कर दिया था. अधिकारियों का आरोप है कि ये प्लेटफॉर्म धोखाधड़ी और आतंकवाद से जुड़े मामलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ जानकारी साझा करने से इनकार करते हैं. इसके अलावा दिसंबर में Apple के वीडियो-कॉलिंग ऐप FaceTime को भी ब्लॉक कर दिया गया था. टेलीग्राम के रूसी मूल के संस्थापक पावेल ड्यूरोव पहले ही कह चुके हैं कि उनकी कंपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और यूजर्स की गोपनीयता की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध रहेगी. वहीं, मानवाधिकार संगठनों और डिजिटल राइट ग्रुप्‍स का कहना है कि रूस द्वारा घरेलू प्लेटफॉर्म्स को बढ़ावा देना और विदेशी सेवाओं को सीमित करना इंटरनेट स्वतंत्रता पर गंभीर असर डाल सकता है. डिजिटल संप्रभुता विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल तकनीकी कंपनियों और सरकारों के बीच नियामक संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डिजिटल संप्रभुता, डेटा नियंत्रण और नागरिकों की ऑनलाइन स्वतंत्रता जैसे व्यापक मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है. WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म के संभावित पूर्ण प्रतिबंध से रूस में लाखों यूजर्स की रोजमर्रा की संचार व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. संकेत साफ है कि रूस और वेस्‍टर्न टेक कंपनियों के बीच टकराव आने वाले समय में और गहरा सकता है, जिसका असर वैश्विक डिजिटल इकोसिस्टम पर भी पड़ सकता है.

पूर्व आर्मी चीफ की किताब लीक, अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन की जांच शुरू

नई दिल्ली पूर्व आर्मी चीफ जनरल (रिटायर्ड) एमएम नरवणे की किताब के लीक का मामला अब गंभीर साजिश की दिशा में बढ़ता दिख रहा है. सूत्रों के मुताबिक शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि किताब को मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस की अनिवार्य क्लीयरेंस के बिना सुनियोजित तरीके से लीक किया गया. कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और अमेरिका में बिकी किताब सूत्र बताते हैं कि किताब का सर्कुलेशन कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में हुआ. इतना ही नहीं, इन देशों में यह किताब ऑनलाइन सबसे पहले बिक्री के लिए उपलब्ध हुई. इसी को ध्यान में रखते हुए दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आपराधिक साजिश की धाराओं में एफआईआर दर्ज की है और जांच का दायरा अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया तक बढ़ाया गया है. जांच में यह भी सामने आया है कि लीक हुई कॉपी सबसे पहले .io डोमेन एक्सटेंशन पर अपलोड की गई थी, जो ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी से जुड़ा कंट्री कोड डोमेन है. इसके बाद यह कई अन्य होस्टिंग प्लेटफॉर्म पर फैल गई. किताब के ISBN नंबर की जांच स्पेशल सेल अब किताब के ISBN नंबर की भी जांच कर रही है. ISBN यानी इंटरनेशनल स्टैंडर्ड बुक नंबर, 13 अंकों का एक यूनिक डिजिटल कोड होता है जो किसी भी किताब की पहचान के लिए इस्तेमाल होता है. लीक वर्जन में जो ISBN नंबर मिला है, वह ‘Four Stars Of Destiny’ नाम से प्रकाशित एमएम नरवणे की किताब का ही बताया जा रहा है. इस कोड को लेकर Penguin India से भी पूछताछ की जा रही है. आज तक की पड़ताल में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी में ऑनलाइन बिक्री कर रही वेबसाइटों पर जो ISBN कोड मिला, वह भी Penguin India की ओर से जारी इसी किताब से जुड़ा पाया गया. राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की तैयारी संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाया जाएगा. रिजिजू ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने सदन को गुमराह किया और निराधार बयान दिए. हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह प्रस्ताव कब और किसकी ओर से लाया जाएगा. माना जा रहा है कि लोकसभा में सत्ता पक्ष का कोई सदस्य विशेषाधिकार प्रस्ताव का नोटिस दे सकता है.

US ट्रेड डील से न्यू लेबर कोड तक, इन मांगों को लेकर देशव्यापी भारत बंद

नई दिल्ली  संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और देश की 10 प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने भारत–अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते, केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों और नए श्रम कानूनों के विरोध में 12 फरवरी को भारत बंद का आह्वान किया है। आंदोलन को INTUC, AITUC, CITU, HMS सहित कई राष्ट्रीय यूनियनों का समर्थन प्राप्त है। संगठनों का दावा है कि करीब 30 करोड़ मजदूर हड़ताल में भाग ले सकते हैं. बंद के समर्थन में कई बैंक यूनियनों के शामिल होने से देशभर में बैंकिंग सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका है. AIBEA, AIBOA और BEFI जैसी यूनियनों ने हड़ताल में शामिल होने का निर्णय लिया है, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कामकाज धीमा रह सकता है. किन सेवाओं पर पड़ेगा असर? परिवहन सेवाएं कई राज्यों में प्रभावित हो सकती हैं. बस, ऑटो और ट्रक यूनियनों के समर्थन के कारण सार्वजनिक और निजी परिवहन बाधित हो सकता है. बड़े शहरों में यातायात व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका है. बैंकिंग सेवाओं में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में काउंटर सेवाएं धीमी रह सकती हैं और चेक क्लीयरेंस में देरी संभव है. हालांकि, बैंक औपचारिक रूप से बंद नहीं रहेंगे. ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और एटीएम सेवाएं सामान्य रूप से जारी रहेंगी.बाजार और व्यापार पर भी असर पड़ सकता है. कई व्यापारिक संगठनों और मंडियों ने हड़ताल को समर्थन दिया है, जिससे थोक और खुदरा बाजार आंशिक या पूर्ण रूप से बंद रह सकते हैं. सरकारी कार्यालयों में ट्रेड यूनियनों के प्रभाव वाले विभागों में कर्मचारियों की उपस्थिति कम रह सकती है, जिससे कामकाज धीमा हो सकता है. स्कूल और कॉलेजों के संबंध में स्थानीय प्रशासन स्थिति के अनुसार निर्णय ले सकता है. परिवहन और सुरक्षा कारणों से कुछ जिलों में छुट्टी घोषित की जा सकती है. SKM की किसानों से अपील ट्रेड यूनियनों का दावा है कि इस हड़ताल में संगठित और असंगठित क्षेत्रों के लाखों मजदूर शामिल हो सकते हैं. एसकेएम ने किसानों से अपील की है कि वे भारी संख्या में प्रदर्शनों में शामिल हों और औद्योगिक श्रमिकों के साथ एकजुटता दिखाएं. उनका कहना है कि सरकार की नीतियां केवल कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई जा रही हैं, जिससे आम जनता की आजीविका पर सीधा हमला हो रहा है.  कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने समर्थन किया है. उन्होंने एक्स पर पोस्ट साझा कर लिखा, 'आज देशभर में लाखों मजदूर और किसान अपने हक की आवाज बुलंद करने सड़कों पर हैं. मजदूरों को डर है कि चार श्रम संहिताएं उनके अधिकारों को कमजोर कर देंगी. किसानों को आशंका है कि व्यापार समझौता उनकी आजीविका पर चोट करेगा और मनरेगा को कमजोर या खत्म करने से गांवों का आखिरी सहारा भी छिन सकता है.' उन्होंने सरकार पर किसानों-मजदूरों की आवाज को नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हुए आगे लिखा, 'जब उनके भविष्य से जुड़े फैसले लिए गए, उनकी आवाज़ को नजरअंदाज किया गया. क्या मोदी जी अब सुनेंगे? या उन पर किसी 'grip' की पकड़ बहुत मजबूत है? मैं मजदूरों और किसानों के मुद्दों और उनके संघर्ष के साथ मजबूती से खड़ा हूं.' कौन-सी सेवाएं रहेंगी सामान्य? अस्पताल, एंबुलेंस और अन्य आपातकालीन सेवाएं सामान्य रूप से जारी रहेंगी. दमकल विभाग, हवाई यात्रा और एयरपोर्ट संचालन पर असर नहीं पड़ेगा. डिजिटल बैंकिंग और एटीएम सेवाएं भी चालू रहेंगी. क्या 12 फरवरी को बैंक बंद रहेंगे? भारतीय रिजर्व बैंक या किसी बैंक की ओर से 12 फरवरी को आधिकारिक अवकाश घोषित नहीं किया गया है. शाखाएं खुली रहेंगी, लेकिन यूनियन की भागीदारी के कारण सेवाओं में आंशिक बाधा आ सकती है. अगर आप 12 फरवरी को बाहर निकलने की प्लान बना रहे हैं तो अपने शहर की परिवहन व्यवस्था की स्थिति पहले से जांच लें. बैंकिंग कार्यों को संभव हो तो ऑनलाइन निपटाएं और बाजार या सरकारी कार्यालय जाने से पहले स्थानीय अपडेट अवश्य देखें. बंद की वजह: किन मुद्दों पर आंदोलन? कई किसान, मजदूर और कर्मचारी संगठनों ने भारत बंद का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:     भारत–अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते का विरोध     चार नए लेबर कोड वापसी की मांग     सरकारी उपक्रमों के निजीकरण का विरोध     पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली     न्यूनतम वेतन में वृद्धि     निर्माण और बिजली क्षेत्र के मजदूरों के अधिकारों की सुरक्षा     कृषि संबंधित कानूनों और नीतियों में बदलाव की मांग कई राज्यों में बस, ऑटो-रिक्शा और ट्रक यूनियनों के भी हड़ताल में शामिल होने की संभावना है, जिससे परिवहन सेवाओं पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है. किन सेवाओं पर पड़ेगा असर? 1. परिवहन सेवाएं कई राज्यों में बस, ऑटो और लॉरी ड्राइवर्स यूनियनों के समर्थन के कारण सार्वजनिक व निजी परिवहन प्रभावित हो सकता है. बड़े शहरों में यातायात व्यवस्था में बाधा आने की संभावना है.  2. बैंकिंग सेवाएं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में काउंटर सेवाएं धीमी रह सकती हैं. चेक क्लीयरेंस में देरी की आशंका बनी हुई है. हालांकि, बैंक बंद नहीं होंगे और ऑनलाइन लेन-देन व एटीएम सेवाएं सामान्य रहेंगी. 3. बाजार और व्यापार कई व्यापारिक संगठनों और मंडियों ने हड़ताल को नैतिक समर्थन दिया है, जिससे बड़े शहरों में थोक और खुदरा बाजार आंशिक या पूर्ण रूप से बंद रह सकते हैं. 4. सरकारी कार्यालय ट्रेड यूनियनों के अधिक प्रभाव वाले विभागों में कर्मचारियों की उपस्थिति कम रहने की संभावना, जिससे सरकारी कामकाज धीमा हो सकता है. 5. स्कूल और कॉलेज सुरक्षा और परिवहन समस्याओं को देखते हुए, कुछ राज्यों में जिला प्रशासन स्कूल-कॉलेजों की छुट्टी घोषित कर सकता है. जो सेवाएं सामान्य रूप से जारी रहेंगी     एंबुलेंस, अस्पताल और अन्य आपातकालीन सेवाएं     दमकल विभाग     हवाई यात्रा और एयरपोर्ट संचालन     डिजिटल बैंकिंग और एटीएम क्या बैंक औपचारिक रूप से बंद रहेंगे? नहीं. भारतीय रिजर्व बैंक या किसी भी बैंक ने 12 फरवरी को अवकाश घोषित नहीं किया है. शाखाएं खुली रहेंगी, लेकिन यूनियन भागीदारी के कारण सेवा में रुकावट आ सकती है.

केन्या के 20 लाख लोग भुखमरी की चेतावनी,सूखे के कारण भुखमरी के हालात

नैरोबी केन्या के उत्तर पूर्वी इलाकों से दिल दहला देने वाली खबरें आ रही हैं। संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, केन्या के कई हिस्सों में भीषण सूखे की वजह से 20 लाख से अधिक लोग भुखमरी की कागर पर खड़े हैं। सबसे बुरा असर पशुपालक समुदायों पर पड़ा है जिनका पूरा जीवन अपने पशुओं पर निर्भर रहता है। केन्या के राष्ट्रीय सूखा प्रबंधन प्राधिकरण ने बताया है कि देश के करीब 10 जिले इस वक्त पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। सोमालिया की सीमा से सटे मंडेरा जिले में स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि इसे चेतावनी स्तर पर रखा गया है, जिसका मतलब है कि वहां अब हालात काबू के बाहर हो रहें हैं।  पूर्वी अफ्रीकी देश केन्या इस समय पिछले कई दशकों के सबसे भीषण सूखे का सामना कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) और विभिन्न राहत संगठनों द्वारा जारी ताजा रिपोर्टों के अनुसार, देश के उत्तर-पूर्वी इलाकों में सूखे की स्थिति भयावह हो गई है, जिससे 20 लाख से अधिक लोग गंभीर भुखमरी का शिकार हैं। केन्या के राष्ट्रीय सूखा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक, देश के करीब 10 जिले इस समय सूखे से जूझ रहे हैं। सोमालिया से सटे केन्या के उत्तर-पूर्वी मंडेरा जिले में स्थिति “चेतावनी” स्तर पर पहुंच गई है। इसका मतलब है कि पानी की गंभीर कमी के कारण पशुओं की मौत हो रही है और बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। जनवरी के अंत में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि यही परेशानी सोमालिया, तंजानिया और यहां तक कि युगांडा तक फैल रही है, जहां लोग इसी तरह के मौसम और पानी की गंभीर कमी से जूझ रहे हैं। हाल के हफ्तों में सोमाली सीमा के पास सूखाग्रस्त इलाकों से झकझोर देने वाली तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें मवेशियों को बेहद कमजोर और कुपोषित हालत में देखा जा सकता है। इस संकट की सबसे बड़ी वजह दुनिया भर में बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग और जसवायु परिवर्तन है। वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती का तापमान का चक्र पूरी तरह से बिगड़ गया है। पहले केन्या और आसपास के इलाकों में बारिश का एक निश्चित समय होता था। अब वह समय लगातार छोटा होता जा रहा है। हाल ही में अक्टूबर से दिसंबर के बीच जो बारिश होनी चाहिए थी, वह पिछले कई दशकों के मुकाबले कम रही है। यह इलाका अब जलवायु परिवर्तन की मार झेलने वाला सबसे संवेदनशील हिस्सा बन गया है। बेजुबान जानवरों और मासूम बच्चों पर असर  इस सूखे का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि सोमालिया सीमा के पास का इलाका, जहां पशुओं को कभी इन परिवारों की संपत्ति और गौरव हुआ करते था। अब हड्डियों का ढांचा बनकर रह गए हैं। पानी और चारे की कमी के कारण हजारों पशु दम तोड़ चुके हैं। पशुओं की मौत का सीधा असर वहां रहने वाले लोगों की खाने और कमाई पर पड़ा है। दूध और मांस की कमी की वजह से छोटे बच्चे गंभीर कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही मदद नहीं पहुंची, तो यह स्थिति एक बड़े मानवीय संकट में बदल जाएगी क्योंकि बच्चों के शरीर में बीमारियों से लड़ने की ताकत खत्म होती जा रही है। पूरे क्षेत्र में हाहाकार  यह परेशानी सिर्फ केन्या तक सीमित नहीं है। जनवरी के अंत में जारी विश्व स्वास्थय संगठनों के आंकड़ों के अनुसार, यह संकट अब सोमालिया, तंजानिया और युगांडा जैसे पड़ोसी देश भी तेजी से फैल रहा है। पूरी दुनिया में हो रहे कार्बन उत्सर्जन और बढ़ते प्रदूषण का खामियाजा उन गरीब समुदायों को भुगतना पड़ रहा है।

US को अब भारत ही होगा भरोसेमंद साथी, अमेरिकी कंपनियों का मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनेगा देश में

नई दिल्ली  भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील हो चुकी है. अब एक और अच्छी खबर आई है. भारत अब अमेरिकी कंपनियों का सहारा बनेगा. जी हां, खुद अमेरिका का कहना है कि भारत अब चीन से निकलने वाली अमेरिकी कंपनियों के लिए नया ठिकाना होगा. अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) जैमिसन ग्रीर के मुताबिक, चीन से बाहर निकलने वाली अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत एक नया अड्डा हो सकता है. कारण कि यहां लोग हैं और मैनुफैक्चरिंग कैपेसिटी है. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के लिए इंपोर्ट के मामले में भारत एक अच्छा सोर्स हो सकता है. दरअसल, फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में जैमिसन ग्रीर ने ये बातें कहीं. जब उनसे पूछा गया कि अगर अमेरिकी कंपनियां चीन से सप्लाई चेन हटाना चाहें तो क्या भारत सही जगह है, तो उन्होंने साफ कहा कि हम जानते हैं कि कई कंपनियां पहले से ही उस दिशा में जा रही हैं. हम चाहते हैं कि सप्लाई चेन अमेरिका में हों या जितना हो सके घर के पास हों. लेकिन जब ग्लोबलाइजेशन से हटते हैं तो सप्लाई चेन को बदलना पड़ता है. भारत इसके लिए एक अच्छा रास्ता हो सकता है. वहां बहुत सारे लोग हैं, मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता है.’ भारत बनेगा अमेरिका का नया बिजनेस अड्डा उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘हम चाहते हैं कि अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग और अमेरिकी वर्कर सबसे पहले हों, लेकिन जहां हमें दूसरे देशों से आयात करना हो, वहां भारत एक अच्छा स्रोत हो सकता है,बशर्ते व्यापार संतुलित और निष्पक्ष हो.’ अमेरिका का यह बयान भारत के लिए बड़ा संदेश है. अमेरिका अब भारत को चीन का विकल्प मान रहा है. भारत की युवा आबादी, बढ़ती फैक्ट्री क्षमता, अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकार की नीतियां इसे आकर्षक बनाती हैं. कई अमेरिकी कंपनियां पहले से ही भारत में प्लांट लगा रही हैं. ऐपल, गूगल, अमेजन, टेस्ला जैसे नाम इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं. इससे क्या फायदा होगा? इस डील के बाद दोनों देशों को फायदा होगा. भारत को अमेरिकी बाजार में ज्यादा निर्यात का मौका मिलेगा, रोजगार बढ़ेंगे, टेक्नोलॉजी आएगी. वहीं, अमेरिका को सुरक्षित और भरोसेमंद सप्लाई चेन मिलेगी, चीन पर निर्भरता कम होगी. कुल मिलाकर देखा जाए तो अमेरिका का भारत पर भरोसा बढ़ता जा रहा है. साउथ एशिया में भारत अब अमेरिका का विश्वसनीय साथी बन रहा है. न सिर्फ ऊर्जा में, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन में भी. भारत बनेगा अमेरिका का नया बिजनेस अड्डा क्या भारत वास्तव में रूसी तेल खरीदना बंद कर रहा है? अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) जैमीसन ग्रीर या ग्रीयर ने मंगलवार को कहा कि भारत ने रूसी तेल की खरीद को पहले ही धीरे-धीरे कम करना शुरू कर दिया है और अमेरिका एवं अन्य स्रोतों से ऊर्जा की खरीद को फिर से बढ़ा रहा है. ‘फॉक्स बिजनेस’ के साथ इंटरव्यू में इस सवाल पर कि क्या भारत वास्तव में रूसी तेल खरीदना बंद कर रहा है, ग्रीयर ने कहा: ‘संक्षिप्त उत्तर हां है. उन्होंने पहले ही रूसी ऊर्जा उत्पादों की अपनी खरीद को कम करना शुरू कर दिया है. उन्होंने अन्य स्रोतों से खरीद को फिर से बढ़ाना शुरू कर दिया है.' सप्लाई चेन पर ग्रीर का पूरा बयान क्या है? फॉक्स न्यूज़ के साथ एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि अगर अमेरिकी कंपनियां चीन से सप्लाई चेन हटाना चाहती हैं, तो क्या भारत सही जगह होगी, तो इस पर अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव एम्बेसडर जैमीसन ग्रीर ने कहा, ‘हम जानते हैं कि कई कंपनियां पहले से ही उस दिशा में जा रही हैं. हम चाहते हैं कि सप्लाई चेन यहां यूनाइटेड स्टेट्स में हों और जितना हो सके घर के पास हों. हम जानते हैं कि जब आप ग्लोबलाइज़ेशन से हटते हैं और जब आप एक ज़्यादा मज़बूत और सुरक्षित इकॉनमी की ओर बढ़ते हैं, तो हमारे देश के सामने आने वाली सभी चुनौतियों का एक प्रोसेस होता है. किसी न किसी पॉइंट पर आपको सप्लाई चेन को इधर-उधर करना ही होगा; भारत इसके लिए एक रास्ता हो सकता है. उनके पास वहां बहुत सारे लोग हैं, उनके पास मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी है. बेशक, हम यह पक्का करना चाहते हैं कि अमेरिकन मैन्युफैक्चरिंग सबसे पहले और सबसे ज़रूरी हो और अमेरिकन वर्कर सबसे पहले हों, लेकिन जहां तक हम दूसरे देशों से इंपोर्ट करना चाहते हैं, भारत एक अच्छा सोर्स हो सकता है, जब तक यह बैलेंस्ड और फेयर हो.' भारत पर अब कितना टैरिफ है? भारत और अमेरिका ने शनिवार को अंतरिम व्यापार समझौते के लिए एक रूपरेखा पर पहुंचने की घोषणा की जिसके तहत दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कई वस्तुओं पर आयात शुल्क कम करेंगे. ट्रेड डील के साथ ही अमेरिका ने भारत का टैरिफ घटाकर 18 फीसदी कर दिया है. एडिशनल टैरिफ भी हटा दिया है.

पालमपुर में खुला देश का दूसरा ट्यूलिप गार्डन, महसूस करें ‘देखा एक ख्वाब’ वाली फीलिंग

पालमपुर  हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में धौलाधार की वादियों में देश का दूसरा ट्यूलिप गार्डन सैलानियों के लिए खोल दिया गया है. कश्मीर के बाद देश का दूसरा और प्रदेश का पहला ट्यूलिप गार्डन कुछ वर्ष पूर्व पालमपुर में हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान में स्थापित किया गया था. यहां पर ट्यूलिप्स की विभिन्न प्रजातियों को लगाया जाता है.  यह गार्डन हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ावा एवं पर्यटन को अग्रसर करने में मदद कर रहा है. गौर रहे कि कश्मीर में ट्यूलिप गार्डन में चर्चित ‘देखा एक ख्वाब को सिलसिले हुए’ गाना शूट हुआ था और यह गाना ट्यूलिप से जोड़ा जाता है. जानकारी के अनुसार, पालमपुर स्थित आईएचबीटी संस्थान केंद्र सरकार और सीएसआईआर ने 2022 को फ्लोरीकल्चर मिशन के तहत इस ट्यूलिप गार्डन का आगाज किया था. संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. भव्य भार्गव ने कहा कि इस बार ट्यूलिप की 6 किस्मों के  50000 पौधे लगाए गए है. उन्होंने बताया कि 5 साल में 23 लाख ट्यूलिप तैयार करने का लक्ष्य रखा है. सीएसआईआर ने 2022 को फ्लोरीकल्चर मिशन के तहत इस ट्यूलिप गार्डन का आगाज किया था. सीएसआईआर के निदेशक डॉ. सुदेश कुमार यादव ने बताया कि जब से यह गार्डन खोला गया है कि तब से अब तक 4 लाख से ऊपर दर्शक यहां आ चुके हैं. इस बार भी दर्शकों  का आंकड़ा एक लाख से अधिक रहने की संभावना है. डॉ. सुदेश कुमार यादव ने कहा कि  संस्थान कुछ कम्पनी के  के साथ मिलकर बल्ब प्रोडक्शन पर काम कर रहा हैं इसमें और ऑफ सीजन में ट्यूलिप लेने की कोशिश की जा रही है. इस वर्ष दिल्ली मुख्यालय में भी 1000 से ज्यादा ट्यूलिप लगाए गए है और उन्हें भी आम जनता के लिए खोला दिया गया है. संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. भव्य भार्गव ने कहा कि इस बार ट्यूलिप की 6 किस्मों के  50000 पौधे लगाए गए है.गौर रहे कि हालैंड में ट्यूलिप के फूलों की सबसे अधिक पैदावार होती है और वहीं से अन्य देश इन्हें आयात करते हैं. भारत में भी हालैंड से ही ट्यूलिप मंगवाए जाते रहे हैं. हालांकि, अब आईएचबीटी के वैज्ञानिकों के प्रयासों से देश में फूलों की खेती में एक बड़े बदलाव हुआ है.

केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर: 8वें वेतन आयोग पर सरकार ने दी नई जानकारी

नई दिल्ली सरकार ने साफ कर दिया है कि 8वां केंद्रीय वेतन आयोग (8th Pay Commission) औपचारिक रूप से गठित किया जा चुका है और तय समय सीमा के भीतर अपनी सिफारिशें देगा। राज्यसभा में पूछे गए सवालों के लिखित जवाब में वित्त मंत्रालय ने मंगलवार बताया कि 3 नवंबर 2025 को आयोग के गठन की अधिसूचना जारी कर दी गई थी। सांसदों ने सरकार से यह जानना चाहा था कि आयोग किन-किन मुद्दों की समीक्षा करेगा और उसकी सिफारिशें लागू होने की संभावित समय-सीमा क्या होगी। क्या है डिटेल सरकार के मुताबिक, 8वां वेतन आयोग केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतनमान, भत्ते, पेंशन ढांचे और सेवा शर्तों की समीक्षा करेगा। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है। यानी मौजूदा समय-सीमा को देखते हुए रिपोर्ट 2027 तक आने की संभावना है। हालांकि, सरकार ने फिलहाल यह नहीं बताया है कि सिफारिशें लागू करने का रोडमैप क्या होगा या कोई चरणबद्ध योजना तैयार की गई है या नहीं। सरकार के बजट पर कितना बोझ पड़ेगा संसद में यह सवाल भी उठा कि 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से केंद्र सरकार के बजट पर कितना बोझ पड़ेगा। इस पर सरकार ने कहा कि फिलहाल लागत का आकलन करना संभव नहीं है। आयोग की सिफारिशें आने और सरकार द्वारा उन्हें स्वीकार किए जाने के बाद ही वास्तविक वित्तीय प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकेगा। इसका मतलब है कि बजटीय योजना आयोग की अंतिम रिपोर्ट के बाद ही बनेगी। 12 फरवरी 2026 को देशव्यापी हड़ताल इधर, कर्मचारी संगठनों ने सरकार पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। कन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एंड वर्कर्स (CCGEW) ने 12 फरवरी 2026 को देशव्यापी एक दिन की हड़ताल का ऐलान किया है। उनकी मांगों में 20% अंतरिम राहत, 50% महंगाई भत्ते का मूल वेतन में विलय और एनपीएस खत्म कर पुरानी पेंशन योजना (OPS) लागू करना शामिल है। ऐसे में संसद के अंदर सवालों और सड़कों पर बढ़ते दबाव के बीच 8वें वेतन आयोग की कार्यवाही पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।

खुशखबरी: भारत की ट्रेड डील में संशोधन, दाल हटाई गई सूची से और अन्य बदलाव भी हुए लागू

नई दिल्ली India-US Trade Deal: भारत-अमेरिका ट्रेड डील में एक नया अपडेट हुआ है. अमेरिका ने भङारत के साथ हुई ट्रेड डील के फैक्टशीट में बड़ा बदलाव किया है. इस बदलाव से भारत को बड़ा फायदा होगा. दरअसल, वाइट हाउस ने फैक्टशीट में जो बदलाव किया है, उसके मुताबिक ट्रेड डील वाली लिस्ट से अब दाल हट गई है. पिछले हफ्ते भारत और अमेरिका ने अंतरिम व्यापार समझौते की घोषणा की थी. उस समय वाइट हाउस ने एक फैक्टशीट जारी की थी. उसमें कुछ बातें ऐसी थीं, जिनसे भारत को थोड़ी परेशानी हो सकती थी. इसे लेकर सवाल उठ रहे थे. लेकिन अब अमेरिका ने उस फैक्टशीट को अपडेट कर दिया है. ट्रेड डील वाली फैक्टशीट से कई चीजें हटा दी गई हैं या शब्द बदले गए हैं. इसमें सबसे अहम है दाल. जी हां, सबसे बड़ी खुशखबरी यह है कि दाल का जिक्र पूरी तरह हटा दिया गया है. पहले फैक्टशीट में साफ लिखा था कि भारत अमेरिकी दालों पर टैरिफ कम या खत्म करेगा. अब उस लिस्ट से ‘certain pulses’ शब्द निकाल दिए गए हैं. इसका मतलब साफ है कि भारत को अब अमेरिकी दालों पर टैरिफ घटाने की जरूरत नहीं है. भारतीय किसानों और दाल उत्पादकों के लिए यह बहुत अच्छी खबर है. पहला बड़ा बदलाव दाल दरअसल, बीते दिनों ही पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत हुई थी. इसके बाद अमेरिका और भारत के बीच ड्रेड डील पर सहमति बनी थी. इसके बाद एक फैक्टशीट जारी किया गया था. अब वाइट हाउस ने भारत के साथ हुए व्यापार समझौते का फैक्टशीट थोड़ा बदल दिया है. पहले की फैक्ट शीट में जो बातें लिखी गई थीं, अब उनमें से कुछ हिस्से हटा दिए गए हैं और कुछ शब्द भी बदल दिए गए हैं. पहला सबसे बड़ा बदलाव दाल ही है. दूसरा बड़ा बदलाव क्या? दूसरा बड़ा बदलाव है 500 अरब डॉलर खरीद का वादा. जी हां, भारत-अमेरिका ट्रेड डील के फैक्टशीट में पहले लिखा था कि भारत ‘committed’ है यानी वादा कर चुका है कि वह अमेरिका से 500 अरब डॉलर के सामान खरीदेगा. अब शब्द बदलकर ‘intend’ कर दिया गया है यानी ‘इरादा है’. मतलब कि भारत ने कोई वादा नहीं किया है, बल्कि भारत इरादा रखता है. इरादा डील के हिसाब से बदल भी सकता है, मगर वादा नहीं. यहां भी राहत ही राहत इसके अलावा खरीद की लिस्ट से ‘Agricultural products’ भी हटा दिए गए हैं. अब सिर्फ एनर्जी, आईसीटी, कोयला और दूसरे उत्पादों का जिक्र है. यानी कृषि उत्पादों को खरीदने का कोई दबाव नहीं रहा. बदले हुए वर्जन में टेक्स्ट से खेती के सामान का ज़िक्र हटा दिया गया है. अब इसमें लिखा है, ‘भारत ज़्यादा अमेरिकी प्रोडक्ट खरीदने और $500 बिलियन से ज़्यादा की US एनर्जी, इन्फॉर्मेशन और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी, कोयला और दूसरे प्रोडक्ट खरीदने का इरादा रखता है.’ और क्या बदलाव हुए? इसके अलावा, व्हाइट हाउस की अपडेटेड फैक्टशीट में भारत के अपने डिजिटल सर्विस टैक्स हटाने से जुड़ा टेक्स्ट भी हटा दिया गया है. पहले के टेक्स्ट में कहा गया था, ‘भारत अपने डिजिटल सर्विस टैक्स हटा देगा और डिजिटल ट्रेड में भेदभाव वाले या बोझिल तरीकों और दूसरी रुकावटों को दूर करने वाले मज़बूत बाइलेटरल डिजिटल ट्रेड नियमों पर बातचीत करने के लिए कमिटेड है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी लगाने पर रोक लगाने वाले नियम भी शामिल हैं. इसमें अब कहा गया है, ‘भारत ने डिजिटल ट्रेड के लिए भेदभाव वाले या बोझिल तरीकों और दूसरी रुकावटों को दूर करने वाले मज़बूत बाइलेटरल डिजिटल ट्रेड नियमों पर बातचीत करने का वादा किया है.’ राहत देने वाले हैं ये यूटर्न ये सारे बदलाव भारत के लिए राहत देने वाले हैं. अगर टैरिफ की बात करें तो भारत पर अब 18 फीसदी टैरिफ लग रहा है. यह पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन से कम है. यह समझौता लगभग एक साल की बातचीत के बाद हुआ. फरवरी 2025 से बातें चल रही थीं. पहले ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगा दिए थे. बाद में यह 18 फीसदी कर दिया गया. अब जब अमेरिका ने फैक्टशीट में ये बदलाव किए हैं तो लगता है कि भारत ने अपनी बात काफी मजबूती से रखी. भारत की दलीलों के कारण ही अमेरिका को कुछ बातें माननी पड़ीं. फैक्टशीट में बदलाव का क्या मतलब     दाल पर टैरिफ न घटाने का फैसला भारतीय किसानों के लिए बहुत बड़ा है. दाल हमारे देश में बहुत महत्वपूर्ण फसल है. अगर अमेरिकी दाल सस्ती होकर आती तो किसानों को नुकसान होता. अब वह खतरा टल गया.     500 अरब डॉलर की खरीद को भी ‘वादा’ से ‘इरादा’ बना दिया गया. इससे भारत पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं रहेगी.     डिजिटल टैक्स पर भी भारत को तुरंत कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.  सिर्फ भविष्य में नियमों पर बात होगी. भारत का हित सर्वोपरि पहले समझौते की घोषणा के समय कुछ बातें थोड़ी सख्त लग रही थीं. लेकिन अब अमेरिका ने खुद अपनी लिस्ट को नरम कर दिया है. इससे साफ है कि भारत ने डील में अपना हित अच्छे से सुरक्षित रखा है. आगे जब पूरा डिटेल्ड समझौता आएगा तब और साफ होगा. लेकिन फिलहाल ये बदलाव भारत के लिए सकारात्मक हैं.

अमेरिका की ईरान पर हमले की तैयारी, सैटेलाइट तस्वीरों ने किया बड़ा खुलासा

न्यूयॉर्क मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर चरम पर पहुंच गया है. सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि अमेरिकी सैन्य अड्डों पर लड़ाकू विमानों, टैंकरों और मिसाइल डिफेंस सिस्टम की संख्या तेजी से बढ़ रही है. प्लैनेट लैब्स और रॉयटर्स की तस्वीरों में कतर, जॉर्डन और सऊदी अरब के अड्डों पर बदलाव साफ दिख रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यह ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर हमले की तैयारी या जवाबी कार्रवाई से बचाव का संकेत हो सकता है.   अमेरिका-ईरान के बीच तनाव  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान से न्यूक्लियर डील चाहते हैं, लेकिन बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर भी रोक की मांग कर रहे हैं. ईरान ने साफ मना कर दिया है. ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर डील नहीं हुई तो अगला हमला बहुत बुरा होगा. पिछले साल अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर साइट्स पर हमले किए थे. अब फिर तनाव बढ़ रहा है. ईरान अपनी न्यूक्लियर साइट्स को मिट्टी से ढक रहा है. टनल बंद कर रहा है, जो हमले की आशंका दिखाता है. सैटेलाइट तस्वीरों में क्या दिख रहा है? अल उदेद एयर बेस, कतर: अमेरिकी सेंट्रल कमांड का मुख्यालय. 17 जनवरी से 1 फरवरी के बीच विमानों की संख्या बढ़ी है. मोबाइल पैट्रियट मिसाइल लॉन्चर्स तैनात किए गए है, जो ईरान की मिसाइलों से बचाव के लिए हैं.  मुवाफक साल्टी एयर बेस, जॉर्डन: 25 जनवरी से 2 फरवरी के बीच दर्जनों F-15E फाइटर जेट्स, A-10 ग्राउंड अटैक विमान और MQ-9 ड्रोन आए. यह ईरान के करीब है.  प्रिंस सुल्तान एयर बेस, सऊदी अरब: C-5 गैलेक्सी और C-17 ट्रांसपोर्ट विमान दिखे, जो भारी सामान ले जाते हैं. अन्य जगहों जैसे ओमान और डिएगो गार्सिया में भी विमान बढ़े हैं. कुल मिलाकर फाइटर जेट्स, टैंकर और डिफेंस सिस्टम की तैनाती बढ़ी है. इसका मतलब क्या है?     ट्रंप प्रशासन साफ संदेश दे रहा है कि वह तैयार है.     यह हमले की तैयारी हो सकती है, क्योंकि इतनी तैनाती महंगी है.     या ईरान की जवाबी मिसाइलों से बचाव, क्योंकि ईरान ने पहले अल उदेद पर हमला किया था.     ईरान भी अपनी न्यूक्लियर साइट्स (जैसे इस्फहान) को मजबूत कर रहा है, टनल मिट्टी से भर रहा है. आगे क्या? बातचीत चल रही है, लेकिन दोनों तरफ तैयारी जोरों पर है. अगर हमला हुआ तो क्षेत्रीय युद्ध हो सकता है. एक्सपर्ट कहते हैं कि यह डिप्लोमेसी को मजबूत करने का दबाव भी हो सकता है. 

चुनावी वादों ने खोली जापान की सच्चाई: वह तस्वीर जो दुनिया नहीं देखती

टोक्यो  यह खबर तो आपको भी पता चल गई होगी कि जापान में संपन्‍न हुए हालिया चुनाव में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता सनाए तकाची ने 75.7 फीसदी सीटों पर कब्‍जा जमाकर जीत हासिल की है. यह दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद किसी भी जापानी नेता को मिला सबसे बड़ा समर्थन है. इस चुनाव ने न सिर्फ जापान की सत्‍ता को ग्‍लोबल चर्चा का विषय बना दिया, बल्कि दुनिया के सामने जापान की ऐसी तस्‍वीर भी पेश की जिसके बारे में ज्‍यादातर लोगों को पता ही नहीं है. हमें आपको यही लगता होगा कि विकसित देशों की सूची में शामिल जापान आर्थिक प्रगति का रोल मॉडल है, लेकिन इस बार के चुनाव में की गई घोषणाओं ने जापान की पिछड़ी तस्‍वीर भी दुनिया के सामने रखी. दूसरा विश्‍व युद्ध समाप्‍त होने के बाद जापान साल 1960 से 1980 के बीच इकनॉमिक सुपरपॉवर बनकर उभरा. 90 के दशक तक जापान की जीडीपी ग्रोथ जी-7 में शामिल अन्‍य देशों के मुकाबले काफी तेज रही थी. इसके बाद से ही जापान की अर्थव्यवस्‍था पर दबाव बढ़ने लगा और आज तो यह भयंकर आर्थिक संकट में घिर चुका है. 60 से 70 और 70 से 80 के दशक में जापान की जीडीपी ग्रोथ 16.4 फीसदी और 17.9 फीसदी रही थी. साल 2010 से 2024 तक जापान की जीडीपी ग्रोथ शून्‍य से भी 2.4 फीसदी नीचे रही यानी फिलहाल वहां मंदी चल रही है. दुनिया में सबसे ज्‍यादा सरकारी कर्ज जापान इस समय आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थिति में है. एक तो उसकी जीडीपी ग्रोथ माइनस में चल रही है, जबकि सरकारी कर्ज जीडीपी के मुकाबले 230 फीसदी पहुंच गया है. यह दशकों से चले आ रहे घाटे वाले खर्चों का नतीजा है. जापान की नई प्रधानमंत्री सनाए तकाची ने अपने चुनावी वादों में अतिरिक्‍त खर्चों को घटाने और टैक्‍स कम करने का ऐलान किया था. इसके बाद से ही जापान के बॉन्‍ड मार्केट में हलचल बढ़ गई है. फिलहाल बॉन्‍ड यील्‍ड 3.56 फीसदी के साथ रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया है. इसे जापान के लिए डेट क्राइसिस की शुरुआत माना जा रहा है, जो ग्‍लोबल इकनॉमी के लिए जोखिम पैदा कर सकता है. कमजोर मुद्रा बन रही परेशानी जापान की मुद्रा येन भी लगातार कमजोर हो रही है, जो फिलहाल डॉलर के मुकाबले कई साल के निचले स्‍तर पर पहुंच गई है. जापान ने ब्‍याज दरों में बढ़ोतरी की है, जिससे आयात महंगा हो रहा है और महंगाई भी बढ़ रही है. अमेरिका के साथ टैरिफ वॉर की वजह से निर्यात में कमी आ रही और निवेश भी कमजोर पड़ा है. फिलहाल सबकुछ बैंक ऑफ जापान पर निर्भर करता है, जो आने वाले समय के लिए नीतियां निर्धारित करेगा और जापान को बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. गरीबों के लिए चुनावी वादे प्रधानमंत्री सनाए तकाची ने चुनावी वादों में गरीबों और निम्‍न आय वर्ग के लिए कई घोषणाएं की हैं. उनका कदम महंगाई से निपटने और स्थिर मजदूरी और बढ़ते खर्च से निपटने के लिए है. इस कड़ी में पीएम ने खाद्य उत्‍पादों पर 8 फीसदी का कंजप्‍शन टैक्‍स भी दो साल के लिए खत्‍म कर दिया है. इससे गरीब परिवारों के लिए भोजन की लागत कम होगी और उनके जीवन यापन में सुधार आएगा. साथ ही टैक्‍स छूट का दायरा भी बढ़ाए जाने की तैयारी है, ताकि निम्‍न आय वर्ग वालों की बचत को बढ़ाया जा सके.