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Russian Oil Discount पर अमेरिका का बड़ा कदम, जानिए भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर

 नई दिल्ली रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने वाले भारत के लिए आने वाले दिनों में एक नई चुनौती खड़ी हो सकती है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिया है कि वाशिंगटन रूसी तेल खरीद पर दी गई छूट (सैंक्शंस वेवर) को लंबे समय तक जारी रखने के पक्ष में नहीं है और इसे जल्द से जल्द समाप्त करना चाहता है।  अमेरिकी सीनेट की फॉरेन रिलेशन कमेटी की सुनवाई के दौरान रुबियो ने कहा कि रूसी तेल पर प्रतिबंध अमेरिकी नीति का हिस्सा है और मौजूदा छूट केवल अस्थायी व्यवस्था है. उन्होंने कहा, "हम इसे जितनी जल्दी संभव हो खत्म करना चाहते हैं. यह छूट वैश्विक तेल आपूर्ति को बनाए रखने के लिए दी गई थी।  मौजूदा वेवर 17 जून को समाप्त होने वाला है. यह छूट पहली बार मार्च में दी गई थी और बाद में दो बार बढ़ाई गई. यूक्रेन युद्ध और ईरान से जुड़े तनावों के कारण वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति संकट की आशंका को देखते हुए अमेरिका ने यह कदम उठाया था।  भारत इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है. पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने भारी छूट पर तेल बेचना शुरू किया और भारत दुनिया के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल रहा. इससे भारत को कम कीमत पर ऊर्जा मिल सकी और घरेलू अर्थव्यवस्था को राहत मिली।  रुबियो ने स्वीकार किया कि इस छूट का फायदा सिर्फ भारत को ही नहीं बल्कि दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं को मिला है. उन्होंने कहा कि रूसी तेल की सप्लाई ने वैश्विक बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद की।  हालांकि अमेरिका लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि रूस के तेल निर्यात से मिलने वाला राजस्व यूक्रेन युद्ध को वित्तीय समर्थन देता है. इसी वजह से वाशिंगटन चाहता है कि भारत समेत बड़े खरीदार धीरे-धीरे रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करें।  हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की थी. अमेरिका का आरोप था कि भारत रूसी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से मॉस्को की मदद कर रहा है. बाद में दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के तहत इस अतिरिक्त टैरिफ को वापस लेने का फैसला किया गया।  व्हाइट हाउस की तरफ से जारी एक फैक्ट शीट में दावा किया गया था कि भारत ने रूसी तेल के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आयात को रोकने की प्रतिबद्धता जताई है. हालांकि भारत सरकार ने सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी प्रतिबद्धता की पुष्टि नहीं की।  एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर अमेरिका भविष्य में प्रतिबंधों में ढील देता है या रूसी तेल को लेकर अधिक लचीला रुख अपनाता है, तो भारत को फिर से सस्ते तेल का बड़ा फायदा मिल सकता है. वहीं अगर छूट समाप्त हो जाती है, तो भारत वैकल्पिक सोर्सेज जैसे वेनेजुएला, पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ाने की रणनीति अपना सकता है। 

सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर, 8वें वेतन आयोग को लेकर नई समयसीमा तय

 नई दिल्‍ली 8वें वेतन आयोग (CPC) के तहत एक बड़ा अपडेट सामने आया है. आयोग ने सुझाव और मांग रख्‍ने की डेडलाइन बढ़ाकर 15 जून तक कर दी है. इससे केंद्र सरकार के कर्मचारियों, पेंशनर्स और अन्‍य कर्मचारियों को सैलरी, पेंशन और अलाउंस में संशोधन पर विचार करने के लिए एक्‍स्‍ट्रा समय मिल गया है।  यह विस्‍तार ऐसे समय में हुआ है, जब कर्मचारी यूनियनों और पॉलिसी मेकर्स के बीच लंबे समय से इंतजार किए जा रहे फिटमेंट फैक्‍टर पर चर्चा तेज हो गई है. नए नोटिफिकेशन में 8वें वेतन आयोग ने ऐलान किया है कि  हितधारकों द्वारा अपने ज्ञापन और सिफारिशें प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 15 जून होगी. इससे पहले आयोग द्वारा दी गई समय सीमा को 31 मई तक बढ़ा दिया गया था और यह दूसरी बार है जब समय सीमा बढा़ई गई है।  आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि सुझाव केवल उसकी आधिकारिक वेबसाइट 8cpc.gov.in के माध्यम से ही स्वीकार किए जाएंगे. परामर्श प्रक्रिया के दौरान फिजिकल डॉक्‍यूमेंट्स, ईमेल, हार्ड कॉपी और पीडीएफ लेटर स्वीकार नहीं की जाएंगी. इस विस्तार का मतलब आयोग द्वारा अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप देने से पहले कर्मचारी यूनियनों, पेंशनर्स ग्रुप, डिफेंस इम्‍प्‍लाई के प्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों की व्यापक भागीदारी को प्रोत्साहित करना है।  कौन-कौन कर सकता है सिफारिशें   केंद्र सरकार के कर्मचारी, पेंशनर्स, रक्षाकर्मी, अखिल भारतीय सेवा अधिकारी, केंद्र शासित प्रदेश के कर्मचारी और सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य पात्र अपनी मांग रख सकते हैं. इस पैनल से उम्‍मीद की जाती है कि वह अपने चयन के 18 महनों के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश कर देगा. हालांकि, जरूरत पड़ने पर अंतरिम रिपोर्ट भी जारी की जा सकती है।  फिटमेंट फैक्टर आठवें वेतन आयोग के सबसे अधिक ध्यान से देखे जाने वाले पहलुओं में से एक है फिटमेंट फैक्टर, जो वेतन और पेंशन संशोधनों की लिमिट तय करता है. यह संशोधित बेसिक सैलरी और पेंशन के कैलकुलेशन में उपयोग किया जाने वाला एक फैक्‍टर है. हाई फिटमेंट फैक्‍टर से सैलरी और रिटायरमेंट प्रॉफिट में अधिक बढ़ोतरी होती है।  उदाहरण के लिए  छठा वेतन आयोग (2006): फिटमेंट फैक्‍टर 1.86, सातवां वेतन आयोग (2016): फिटमेंट फैक्‍टर 2.57 सातवें वेतन आयोग के फार्मूले के तहत न्यूनतम बेसिक सैलरी ₹18,000 तय किया गया था. 2.57 के फिटमेंट फैक्टर को लागू करने से पिछले सैलरी स्‍ट्रक्‍चर की तुलना में वेतन में काफी बढ़ी हुई है।  8वें वेतन आयोग के तहत क्‍या हैं मांगे?  कई यूनियनों का तर्क है कि बढ़ती महंगाई, आवास की बढ़ती लागत, हेल्‍थ खर्च और बेहतर पेंशन व्यवस्था की आवश्यकता एक व्यापक संशोधन को उचित ठहराती है. खबरों के अनुसार, कई कर्मचारी ग्रुप 3.0 से 4.0 के बीच फिटमेंट फैक्टर की मांग कर रहे हैं, जिससे न्यूनतम बेसिक लेवल पर बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है।  अगर 3.8 से 4.0 की लिमिट में फिटमेंट फैक्टर को मंजूरी मिल जाती है, तो हितधारकों के साथ परामर्श के दौरान चर्चा किए गए अनुमानों के अनुसार, न्यूनतम मूल वेतन संभावित रूप से ₹69,000 और ₹72,000 के बीच बढ़ सकता है। 

बढ़ते तापमान ने बढ़ाई किसानों की चिंता, गेहूं की फसल पर मंडरा रहा संकट

नई दिल्ली जलवायु परिवर्तन का असर अब भारत की खाद्य सुरक्षा पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है. एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ता तापमान, विशेष रूप से सर्दियों में गर्मी और रात के समय तापमान में बढ़ोतरी देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर रही है।  क्लाइमेट ट्रेंड्स (Climate Trends) की रिपोर्ट, 'व्हीट अंडर स्ट्रेस: क्लाइमेट चेंज, राइजिंग हीट एंड अडैप्टेशन पाथवेज इन इंडिया’स मेजर व्हीट-ग्रोइंग स्टेट्स' में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन दशकों में पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में गेहूं की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई है।  रिपोर्ट बनाने वाली प्रमुख लेखिका और क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बल्यान कहती हैं कि, भारत के गेहूं उत्पादन के सामने सबसे गंभीर लेकिन कम पहचाने गए खतरे में से एक रात के तापमान में लगातार वृद्धि है. गर्म रातें पौधों में श्वसन प्रक्रिया बढ़ा देती हैं, जिससे अनाज बनने के लिए आवश्यक कार्बोहाइड्रेट भंडार कम हो जाते हैं।   उन्होंने बताया कि फरवरी और मार्च में अचानक बढ़ने वाली गर्मी गेहूं के दाने भरने की अवधि को छोटा कर रही है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ रहा है. गेहूं के दाने छोटे और सिकुड़े हुए रह जाते हैं, जिससे कुल उत्पादन घटता है और गेहूं की क्वालिटी भी खराब हो जाती है।  रिपोर्ट के अनुसार, सभी प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में रात का तापमान दिन के तापमान की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है. गुजरात में यह वृद्धि दिन के तापमान की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक दर्ज की गई है. वहीं, फरवरी का महीना सबसे तेजी से गर्म हो रहा है, जिसमें प्रति दशक 0.69 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है।  क्लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला का कहना है कि, जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का जोखिम नहीं रह गया है. यह पहले से ही हमारे खाद्य तंत्र और ग्रामीण आजीविका को प्रभावित कर रहा है. किसानों को लगातार फसल नुकसान, घटती गुणवत्ता और बढ़ती लागत का सामना करना पड़ रहा है।  विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु-स्मार्ट कृषि, बेहतर चेतावनी प्रणाली, टिकाऊ खेती और किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने वाले उपायों को प्राथमिकता दिए बिना देश की खाद्य सुरक्षा को लंबे समय तक सुरक्षित रखना कठिन होगा।  रिपोर्ट के अनुसार, गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में न्यूनतम तापमान अधिक तेजी से बढ़ रहा है, जिससे रात के समय गर्मी का प्रभाव बढ़ रहा है. यह स्थिति विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चिंताजनक है, जो भारत के गेहूं उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं।  अध्ययन में पाया गया कि फूल आने, दाना भरने और पकने जैसे महत्वपूर्ण चरण बढ़ते तापमान से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं. फरवरी और मार्च में बढ़ती गर्मी फसल की वृद्धि अवधि को कम कर रही है, जिससे दाने छोटे और सिकुड़े हुए रह जाते हैं तथा उत्पादन में गिरावट आती है. इसके अलावा, कटाई के दौरान होने वाली बेमौसम बारिश फसल को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ भंडारण हानि भी बढ़ा रही है।  रिपोर्ट में गुजरात और पंजाब के किसानों के अनुभवों का भी जिक्र किया गया है. किसानों ने खराब अंकुरण, कम टिलरिंग, बढ़ते कीट प्रकोप और घटती गुणवत्ता जैसी समस्याओं की जानकारी दी है. छोटे और सीमांत किसान इन चुनौतियों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।  विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर बुवाई, गर्मी-सहनशील किस्मों का उपयोग, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और मौसम आधारित सलाह सेवाओं को मजबूत करना जरूरी है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जलवायु-अनुकूल कृषि रणनीतियों को तेजी से लागू करना होगा। 

Venezuela Oil Deal में भारत निभा सकता है बड़ी भूमिका, खास तेल से बदल सकती है तस्वीर

नई दिल्ली अगर कोई आपसे पूछे कि दुनिया में सबसे ज्यादा तेल किस देश के पास है, तो शायद आपका जवाब सऊदी अरब, रूस या अमेरिका होगा. लेकिन सच यह है कि दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला के पास है. भारत को इस तेल की जरूरत है. और इसी जरूरत को पूरी करने के ल‍िए वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज भारत आ रही हैं. उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात होगी. लेकिन क्‍या आपको पता है क‍ि वेनेजुएला का तेल यूं ही मार्केट में नहीं आ सकता, वो काफी भारी होता है. उसके ल‍िए एक जादुई तेल ‘नेफ्था’ की जरूरत होती है, और वो तेल भारत के पास भरपूर मात्रा में है. इसल‍िए भारत और वेनेजुएला के ल‍िए यह व‍िन व‍िन स‍िचुएशन होगी।  विदेश मंत्रालय के मुताबिक, वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज  7 जून तक भारत दौरे पर रहेंगी. इस दौरान वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगी और ऊर्जा, व्यापार, निवेश, दवा, स्वास्थ्य तथा परिवहन जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा होगी. उनके साथ वेनेजुएला सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री भी भारत आ रहे हैं।  दोनों एक दूसरे की जरूरत यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब वेनेजुएला दुनिया भर में अपने तेल के लिए नए खरीदार तलाश रहा है. दूसरी तरफ भारत भी तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, रूस से तेल आपूर्ति को लेकर भू-राजनीतिक चुनौतियां और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता ने नई दिल्ली को वैकल्पिक विकल्पों की तलाश के लिए प्रेरित किया है. ऐसे में भारत और वेनेजुएला की जरूरतें एक-दूसरे से मिलती हुई दिखाई दे रही हैं।  तेल है, लेकिन बेच नहीं पा रहा वेनेजुएला     आप जानकर हैरान होंगे कि दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाला देश अपने तेल को बेचने के लिए संघर्ष कर रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह वेनेजुएला के कच्चे तेल की प्रकृति है. सऊदी अरब या खाड़ी देशों का अधिकांश तेल अपेक्षाकृत हल्का होता है. उसे निकालना, पाइपलाइन में भेजना और जहाजों में भरना आसान होता है. लेकिन वेनेजुएला का तेल बेहद भारी और गाढ़ा है।      विशेषज्ञों का कहना है कि उसका तेल कई मामलों में बिटुमेन जैसा व्यवहार करता है. यही कारण है कि उसे जमीन से निकालने, पाइपलाइन में बहाने और बंदरगाह तक पहुंचाने में बड़ी दिक्कत आती है. यानी वेनेजुएला के पास तेल तो बहुत है, लेकिन वह आसानी से बहने वाला तेल नहीं है. यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती है. यहीं पर भारत के जादुई तेल यानी नेफ्था की जरूरत पड़ती है।  क‍ितना नेफ्था का प्रोडक्‍शन करता है भारत? भारत में रिफाइनरियां हर साल लगभग 18-20 मिलियन टन नेफ्था का उत्पादन करती हैं. नेफ्था खुद ही एक रिफाइंड पेट्रोलियम फ्रैक्शन होता है. रिफाइनरियों में इसे आगे प्रोसेस कर हाई-ऑक्टेन पेट्रोल, पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक जैसे एथिलीन, प्रोपिलीन और अन्य उत्पादों में बदला जाता है. आम तौर पर 1 टन नेफ्था से लगभग 0.7 से 0.9 टन तक पेट्रोल या अन्य हल्के ईंधन उत्पाद प्राप्त किए जा सकते हैं, हालांकि यह रिफाइनरी की तकनीक और कच्चे तेल की गुणवत्ता पर निर्भर करता है. भारत के कुल पेट्रोलियम उत्पाद उत्पादन में नेफ्था की हिस्सेदारी करीब 6-7% रहती है।  जादुई तेल है क्‍या? जादुई तेल यानी नेफ्था एक हल्का हाइड्रोकार्बन मिश्रण है, जो रिफाइनरियों में कच्चे तेल को प्रोसेस करने के दौरान प्राप्त होता है. इसका इस्तेमाल पेट्रोकेमिकल उद्योग, ईंधन मिश्रण और कई औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है.लेकिन वेनेजुएला के लिए नेफ्था की अहमियत कुछ और ही है. उसके भारी कच्चे तेल को बहने लायक बनाने के लिए उसमें नेफ्था मिलाया जाता है. यानी नेफ्था एक तरह का थिनर या डायल्यूएंट बन जाता है. यह भारी तेल को पतला करता है, जिससे उसे पाइपलाइन और टैंकरों के जरिए आसानी से ले जाया जा सके. अगर यह नेफ्था न मिले, तो वेनेजुएला के कई तेल क्षेत्रों से उत्पादन और निर्यात करना बेहद मुश्किल हो सकता है।  वेनेजुएला के ल‍िए मुश्क‍िल क्‍यों बड़ी? आमतौर पर तेल उत्पादक देश दूसरे देशों को तेल बेचते हैं. लेकिन वेनेजुएला की स्थिति अलग है. उसे अपना तेल निकालने और बेचने के लिए पहले दूसरे देशों से नेफ्था जैसे हल्के हाइड्रोकार्बन खरीदने पड़ते हैं. यानी जिस देश के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, वह अपने तेल को बाजार तक पहुंचाने के लिए हाइड्रोकार्बन आयात करने पर मजबूर है. यही वजह है कि नेफ्था की आपूर्ति वेनेजुएला के लिए सिर्फ एक व्यापारिक मुद्दा नहीं, बल्कि उसकी पूरी ऑयल इकोनॉमी की लाइफलाइन है।  भारत क्यों बन सकता है सबसे अहम साझेदार? भारत दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग शक्तियों में शामिल है. देश में हर साल करोड़ों टन नेफ्था का उत्पादन होता है. गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में स्थित बड़ी रिफाइनरियां घरेलू जरूरतों के साथ-साथ निर्यात के लिए भी पर्याप्त मात्रा में नेफ्था तैयार करती हैं. रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियां इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाती हैं. यही कारण है कि भारत वेनेजुएला के लिए सिर्फ तेल खरीदने वाला ग्राहक नहीं, बल्कि ऐसा साझेदार बन सकता है जो उसके तेल उद्योग की सबसे बड़ी समस्या का समाधान भी दे सकता है. अगर भारत से नेफ्था की नियमित आपूर्ति बढ़ती है, तो वेनेजुएला का भारी तेल अधिक मात्रा में वैश्विक बाजार तक पहुंच सकता है।  भारत को क्या फायदा होगा? सबसे बड़ा फायदा ऊर्जा सुरक्षा का होगा. भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. इसलिए किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा करती है. वेनेजुएला के साथ मजबूत ऊर्जा संबंध भारत को एक अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध करा सकते हैं. इसके अलावा भारतीय कंपनियों को वेनेजुएला के तेल और गैस क्षेत्रों में निवेश के अवसर भी मिल सकते हैं. यदि भारत नेफ्था एक्‍सपोर्ट करता है और बदले में लांगटर्म की डील म‍िलती है तो यह दोनों देशों के लिए फायदे का सौदा बन सकता है।   

LPG बाजार में बड़ा बदलाव, अमेरिका बना भारत का बड़ा सप्लायर; खाड़ी देशों की बढ़ी टेंशन

  नई दिल्ली पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने भारत की ऊर्जा खरीद व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है. इसी बदलाव का असर है कि मध्य-पूर्वी देशों से भारी मात्रा में लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) आयात करने वाला भारत अमेरिका से यह पेट्रोलियम उत्पाद खरीद रहा है. अब अमेरिका पारंपरिक खाड़ी देशों को पीछे छोड़ते हुए भारत का सबसे बड़ा LPG सप्लायर बन गया है. वहीं, रूस भू-राजनीतिक तनाव और प्रतिबंधों के बावजूद, भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है।  डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में भारत के कुल LPG आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 55% रही, जबकि फरवरी में यह केवल 14% थी. इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह अमेरिका इजरायल का ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करना है।  28 फरवरी को दोनों देशों ने ईरान पर हमला कर दिया था जिसके बाद शुरू हुए युद्ध ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में भारी तबाही मचाई. इस युद्ध ने एनर्जी सप्लाई चेन पर बहुत बुरा असर डाला क्योंकि ईरान ने तेल-गैस की सप्लाई के लिए अहम समुद्री रास्ते होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया. फिलहाल दोनों पक्षों के बीच बेहद नाजुक युद्धविराम कायम है और युद्ध खत्म करने के लिए कोई भी बातचीत अपने आखिरी मुकाम तक नहीं पहुंच पा रही है।  LPG के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर भारत अब अमेरिका की तरफ मुड़ा  भारत पारंपरिक रूप से अपनी अधिकांश LPG जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर रहा है. लेकिन युद्ध के कारण संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, कुवैत और कतर जैसे देशों से आयात बहुत कम हुआ है. भारत के LPG आयात में इन देशों की संयुक्त हिस्सेदारी फरवरी में 81% से घटकर मई में केवल 16% रह गई।  मई में अमेरिका से भारत को LPG निर्यात 73% बढ़कर लगभग 6.66 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया. इससे खाड़ी क्षेत्र से आने वाले कार्गो में आई भारी गिरावट की भरपाई करने में मदद मिली।    सप्लाई में आई रुकावट के चलते भारत को घरेलू स्तर पर भी सख्त कदम उठाने पड़े. सरकार ने हाल ही में पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) कनेक्शन वाले उपभोक्ताओं के लिए LPG सिलेंडर खरीदने पर रोक लगा दी और कुछ उद्योगों को LPG की सप्लाई कम कर दी ताकि घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दी जा सके।  घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी ने भी स्थिति को कुछ हद तक संभालने में मदद की है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत का LPG उत्पादन संघर्ष से पहले लगभग 35,000 मीट्रिक टन प्रतिदिन था जो बढ़कर 50,000-52,000 मीट्रिक टन प्रतिदिन तक पहुंच गया है. इससे आयात पर निर्भरता कुछ कम हुई है लेकिन देश की कुल मांग का लगभग 60% हिस्सा अब भी आयात से पूरा होता है।  तेल आयात पर भी ईरान संघर्ष का असर भारत के तेल आयात में भी संघर्ष का असर देखने को मिला है. मई में रूस से कच्चे तेल का आयात 24% बढ़कर 19.5 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया, जो भारत के कुल लगभग 49 लाख बैरल प्रतिदिन के कच्चे तेल आयात का बड़ा हिस्सा है।  केप्लर के विश्लेषकों का कहना है कि रूस से मिलने वाला तेल भारतीय रिफाइनरियों को सही कीमत पर मिल रहा है. भारत को यह तेल ऐसे वक्त में मिल रहा है जब खाड़ी देशों से सप्लाई लगभग रुकी हुई है।  इसके साथ ही भारत ने वेनेजुएला और ओमान से भी खरीद बढ़ाई है. मई में ओमान से कच्चे तेल का आयात 179% बढ़ा, जो यह दिखाता है कि भारतीय रिफाइनरियां ऐसे सप्लायरों की ओर रुख कर रही हैं जिन्हें समंदर के जरिए देश में लाना आसान हो। 

‘2-3 हफ्तों में तेल की कीमतों में बड़ा उछाल’, Hormuz संकट पर ग्लोबल ऑयल कंपनियों की वॉर्निंग

 नई दिल्ली करीब दो महीने पहले अमेरिका के इन्वेस्टमेंट बैंक जेपी मॉर्गन ने एक विश्लेषण जारी किया था, जिसमें सवाल पूछा गया था कि 'दुनिया के पास काम चलाने लायक कच्चे तेल का न्यूनतम स्टॉक खत्म होने में कितना वक्त लगेगा?.' इसका सार ये था कि भले ही बाजार में करोड़ों बैरल तेल मौजूद हो, लेकिन अगर इस्तेमाल के लिए उपलब्ध भंडार बहुत कम हो जाए तो पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है. इंसानी शरीर में ब्लड प्रेशर की तरह असली मुद्दा तेल की मात्रा नहीं, बल्कि उसके लगातार प्रवाह का है।  करीब चार हफ्ते बाद बैंक ने एक और विश्लेषण जारी किया, जिसमें बताया गया कि .होर्मुज स्ट्रेट सितंबर तक क्यों खुल जाएगा… किसी न किसी तरह. बैंक के मुताबिक, 2026 की शुरुआत में वैश्विक तेल भंडार 8.4 अरब बैरल था, लेकिन उसमें से केवल 0.8 अरब बैरल ही ऐसा था जिसे इस्तेमाल किया जा सकता था।  संक्षेप में कहें तो, अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहता है और तेल की महंगाई के कारण मांग में कमी 55 लाख बैरल प्रतिदिन पर स्थिर रहती है, तो OECD देशों (Organisation For Economic Co-operation and Development) के कमर्शियल तेल भंडार जून तक भारी दबाव में आ सकते हैं।  इसके बाद सितंबर तक दुनिया के तेल भंडार उस न्यूनतम स्तर पर पहुंच सकते हैं, जहां से सामान्य संचालन करना मुश्किल हो जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि जेपीमॉर्गन की पिछली रिपोर्ट के बाद तेल की कीमतें बढ़ने के बजाय घटी हैं, इसलिए मांग में गिरावट की रफ्तार भी धीमी पड़ गई है।  सप्लाई कम फिर भी गिर रही तेल की कीमतें… बड़ा तूफान आने वाला है इस दौरान सबसे हैरानी वाली बात यह रही कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से रोजाना करीब 1 करोड़ बैरल तेल जरूरतमंद देशों तक नहीं पहुंच पा रहा था. सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति में कीमतें तेजी से बढ़नी चाहिए थीं ताकि मांग कम हो जाए. लेकिन इसके उलट मार्च के आखिर में बहुत अधिक बढ़ने और फिर एक महीने बाद दोबारा बढ़ने के बाद तेल की कीमतें गिरने लगीं. इससे मांग कम होने के बजाय और बढ़ी है. इसी वजह से जेपीमॉर्गन ने रिपोर्ट जारी कर कहा था कि वैश्विक तेल बाजार के गणित में कुछ गड़बड़ है।  इसके कुछ हफ्ते बाद गोल्डमैन सैक्स ने भी कहा कि होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के बावजूद, मई में वैश्विक तेल भंडार रिकॉर्ड 87 लाख बैरल प्रतिदिन की दर से घटे।  फिर भी मई में तेल की कीमतें काफी नीचे रहीं. इसकी एक बड़ी वजह बाजार को रोजाना दिए जाने वाले वो संकेत थे जिनमें सरकारी और गैर-सरकारी सूत्र लगातार यह कह रहे थे कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता बस होने ही वाला है।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तेल बाजार भले ही इस खतरे को नजरअंदाज करना चाहे, लेकिन अब तेल उद्योग की बड़ी कंपनियां खुलकर चेतावनी देने लगी हैं।  तेल स्टोरेज खत्म होने का झटका बाजार सह नहीं पाएगा हाल ही में शेवरॉन के CEO माइक वर्थ ने कहा कि अगले दो महीनों में तेल की कीमतें बढ़ने की संभावना है क्योंकि पहले से ही बेहद कम स्तर पर मौजूद कच्चे तेल के भंडार ईरान युद्ध की वजह से लगातार घट रहे हैं।  उन्होंने गुरुवार को एक कॉन्फ्रेंस में कहा, 'सुरक्षा के लिए मौजूद अतिरिक्त भंडार खत्म हो रहा है और ऐसा झटका सहने की क्षमता भी खत्म होती जा रही है. बाजार के पास इस असंतुलन को संभालने की क्षमता अब पहले की तुलना में काफी कम रह गई है।  उन्होंने आगे कहा, 'अगले कुछ हफ्तों में यह दबाव सीधे तेल की कीमतों में दिखने लगेगा. जून और खासकर जुलाई में कीमतें ऊपर जाएंगी।  वर्थ की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पिछले एक हफ्ते में तेल की कीमतों में करीब 10% की गिरावट आई है. इसकी वजह यह उम्मीद रही कि अमेरिका और ईरान तीन महीने से चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए कोई समझौता कर सकते हैं. इसी संघर्ष के कारण होर्मुज स्ट्रेट बंद है, जो दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से के कच्चे तेल की आवाजाही का रास्ता है।  उनकी चेतावनी से यह चिंता भी बढ़ गई है कि अगर युद्ध खत्म करने के लिए कोई समझौता हो भी जाता है तब भी तेल की कीमतें महीनों तक ऊपर बनी रह सकती हैं. वैसे भी फिलहाल ऐसा कोई समझौता होता हुआ नजर नहीं आ रहा. इस संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार से रोजाना 1.2 से 1.3 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति गायब हो चुकी है।  युद्ध खत्म हो भी जाए तब भी अगले साल तक नहीं सुधरेंगे तेल बाजार के हालात वर्थ की बात अन्य तेल अधिकारियों की चेतावनियों से भी मेल खाती है. इनमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की सरकारी तेल कंपनी Adnoc के प्रमुख भी शामिल हैं. उन्होंने पिछले सप्ताह कहा था कि अगर संघर्ष खत्म भी हो जाए, तब भी होर्मुज स्ट्रेट में तेल की सामान्य आवाजाही अगले साल से पहले बहाल होने की संभावना नहीं है।  ADNOC के सीईओ सुल्तान अल-जाबेर ने 21 मई को एक प्रोग्राम में कहा, 'संघर्ष से पहले के स्तर की 80% तेल आपूर्ति बहाल होने में कम से कम चार महीने लगेंगे और पूरी क्षमता से तेल प्रवाह 2027 की पहली या शायद दूसरी तिमाही से पहले शुरू नहीं होगा।  जेपीमॉर्गन की तरह वर्थ ने भी कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद तेल की कीमतें उतनी नहीं बढ़ीं जितनी उम्मीद थी. इसकी वजह यह रही कि देशों ने इमर्जेंसी के लिए अच्छी मात्रा में तेल जमा कर रखा था, अमेरिका ने बाजार को तेल दिया और ईरान, रूस, वेनेजुएला के प्रतिबंधित तेल भी बाजार में पहुंचे. लेकिन अब ये भंडार तेजी से घट रहे हैं।  ऑयल प्राइस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें एक बड़ा फैक्टर चीन के तेल भंडार हैं जो चुपचाप तेजी से कम हो रहे हैं. इसमें कमर्शियल और स्ट्रैटेजिक दोनों तरह के भंडार शामिल हैं. चीन के रणनीतिक भंडार में करीब 1.4 अरब बैरल तेल होने का अनुमान है. अगर चीन इन्हें बड़े पैमाने पर बाजार में उतारता है, तो संकट कुछ समय के लिए टल सकता है।  वर्थ ने यह भी कहा कि मौजूदा ऊर्जा संकट सरकारों को सीख देगा कि वो भविष्य के लिए … Read more

ईरान के हमले से कुवैत में तबाही, हवाई अड्डा बना निशाना

कुवैत  कुवैत अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ईरान की मिसाइल और ड्रोन हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई है। कुवैत स्थित भारत के दूतावास ने इसकी पुष्टि कर दी है। कुवैत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया है कि हमले में 63 लोग घायल हुए हैं, जिनमें हवाई अड्डे के कर्मचारी और यात्री शामिल हैं। घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हमले में हवाई अड्डे की सुविधाओं और राजनयिक मिशनों को काफी नुकसान पहुंचा है। इससे एक बार फिर पश्चिम एशिया में तनाव काफी ज्यादा बढ़ गया है। इंडियन एंबेसी की ओर से जारी बयान में कहा गया है, 'कुवैत स्थित भारतीय दूतावास आज कुवैत के हवाई अड्डे पर हमले में एक भारतीय नागरिक की दुखद मौत पर अपनी संवेदना व्यक्त करता है। दूतावास मृतक के परिवार के संपर्क में है और कुवैती अधिकारियों के साथ मिलकर मृतक के परिवार और घटना में घायल हुए लोगों को हर संभव सहायता देने के लिए समन्वय स्थापित किए हुए है।' कुवैत ने जताई कड़ी नाराजगी कुवैत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से उनकी जमीन पर क्रूर हमले किए हैं। ईरान के इस तरह के हमले क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया। बयान के अनुसार, इन हमले में कुवैत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे सहित कई नागरिक और महत्वपूर्ण ढांचागत सुविधाओं को निशाना बनाया गया। कुवैती विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह ईरान के इन हमलों को पूरी तरह खारिज करता है। इस तरह की घटनाएं ना केवल क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाती हैं बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और 2026 के सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 2817 का भी उल्लंघन हैं। कुवैत की संप्रभुता, सुरक्षा और उसके नागरिकों की रक्षा रेड लाइन है, जिसे किसी भी हालत में पार नहीं किया जा सकता। कुवैत देगा ईरान को जवाब! कुवैत सरकार ने इन हमलों का जवाब देने के लिए संभावित उपायों पर विचार करने की बात कही है। कुवैत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस स्थिति पर ध्यान देने और तनाव कम करने के लिए तत्काल कूटनीतिक प्रयास तेज करने की अपील की है। कुवैती रक्षा मंत्रालय ने बताया है कि हमले में कुवैत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के यात्री टर्मिनल-1 (टी1) को कई ड्रोन हमलों का निशाना बनाया गया। कुवैत पर हमलों के समय ही बुधवार सुबह को बहरीन के गृह मंत्रालय ने भी चेतावनी सायरन बजाए जाने की जानकारी दी है। गृह मंत्रालय ने बताया कि बुधवार को एक चेतावनी सायरन बजाया गया जिसमें नागरिकों और निवासियों से शांत रहने और सुरक्षा संबंधी आधिकारिक निर्देशों को पालन करते हुए करीब सुरक्षित स्थान पर जाने की अपील की गई।

कर्नाटक की सियासत में नया अध्याय: डीके शिवकुमार ने संभाली कमान, 13 मंत्रियों का शपथ ग्रहण

कर्नाटक कर्नाटक में पिछले तीन साल से चल रहा मुख्यमंत्री पद का विवाद आखिरकार थम गया है। कांग्रेस के अहम रणनीति कार माने जाने वाले डीके शिवकुमार राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली है। बुधवार को कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं की मौजूदगी में डीके शिवकुमार ने पद और गरिमा की शपथ ली। उनके साथ कर्नाटक कांग्रेस के बड़े दलित नेता जी परमेश्वर ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही डीके के 13 और मंत्रियों ने शपथ ली, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र का नाम भी शामिल है राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए निकले डीके शिवकुमार सबसे पहले अपनी मां के आवास पर पहुंचे। यहां पर उन्होंने उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद वह सीधे लोकभवन पहुंचे, जहां पर कांग्रेस के तमाम बड़े नेता समेत संत समाज उनकी प्रतीक्षा में था। शिवकुमार ने सबसे पहले वहां मौजूद संतों का अभिवादन किया। संतों ने मिलकर ‘होने वाले मुख्यमंत्री’ को पटका पहनाकर उनका स्वागत किया। इसके बाद शिवकुमार मंच पर पहुंचे, जहां सबसे पहले उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया का गले लगकर अभिवादन किया। इसके बाद उन्होंने राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का स्वागत किया। संविधान की प्रति लेकर ली शपथ राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले शिवकुमार को बुलाया, तो डीके के हाथ में लाल रंग की संविधान की प्रति भी थी। इसी प्रति को हाथ में लेकर उन्होंने पद और गोपनीयता की शपथ ली, जिस वक्त डीके शपथ ले रहे थे उनके कार्यकर्ताओं के बीच में जबरदस्त जोश देखने को मिला। शपथ लेने के बाद डीके ने मंच पर जनता के सामने झुककर उनका अभिवादन किया। डीके के शपथ लेने के बाद जी परमेश्वरा ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद एक-एक करके बाकी मंत्रियों ने भी अपने पद की शपथ ली। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के बेटे यतींद्र भी शामिल थे। नए मंत्रियों में कौन-कौन शामिल? कर्नाटक में तीन साल के उठा पटक के बाद सत्ता संभालने वाले डीके शिवकुमार की टीम में नए नाम भी शामिल हुए हैं। उप मुख्यमंत्री के रूप में जी. परमेश्वर ने शपथ ली है। इसके अलावा के.एच. मुनियप्पा, के.जे. जॉर्ज, एम.बी. पाटिल, रामलिंगा रेड्डी, सतीश जारकीहोली, कृष्णा बायर गौड़ा, प्रियांक खरगे, यू.टी. खादर, ईश्वर खंड्रे, यतींद्र सिद्दारमैया, बैरथी सुरेश और शरण प्रकाश पाटिल ने भी मंत्री के रूप में पद और गरिमा की शपथ ली। वीआईपी रहा सीएम शिवकुमार का शपथ ग्रहण कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे शिवकुमार का शपथ ग्रहण समारोह भव्य रहा है। इस दौरान उनके परिवार के सदस्य में मौजूद रहे। उनकी मां गौरम्मा, पत्नी उषा और उनके बच्चे शामिल थे। समारोह में धार्मिक गुरु, फिल्म जगत की हस्तियां, खिलाड़ी और उद्योगपति भी मौजूद थे। चालीस से अधिक धर्मगुरु समारोह में उपस्थित थे। इसके अलावा अभिनेता रविचंद्रन, अभिनेत्री जयमाला, किच्चा सुदीप, रम्या, पूर्व क्रिकेटर वेंकटेश प्रसाद और उद्योगपति अनिल कुंबले जैसी जानी-मानी हस्तियां भी मौजूद थीं। परंपरा से हटकर शपथ ग्रहण समारोह पश्चिम दिशा के बजाय पूर्व दिशा की ओर मुख करके आयोजित किया गया। यह निर्णय आध्यात्मिक और ज्योतिषीय सलाहकारों की सलाह पर लिया गया था। लोक भवन परिसर में स्थित 'ग्लास हाउस' में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे, जहां निर्धारित स्थानों पर लगभग 3,500 मेहमानों के बैठने की व्यवस्था की गई थी। धर्मगुरुओं के लिए अलग से व्यवस्था की गई थी, जबकि समारोह की कार्रवाई को सभी तक पहुंचाने के लिए छह एलईडी स्क्रीन लगाई गई थीं। इस कार्यक्रम के लिए 2,000 से अधिक वीआईपी पास जारी किए गए थे। बता दें, तीन साल तक चली खींचतान के बाद सिद्दारमैया ने आखिर कार अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद शिवकुमार का राजतिलक तय माना जा रहा था। हालांकि, दिल्ली में पार्टी नेताओं ने इस पर चुप्पी साध रखी थी, लेकिन बाद में पूरा मामला खुल गया। दिल्ली से लौटकर आए सिद्धारमैया ने अपने पद से इस्तीफा दिया और इसके साथ ही पूरी कैबिनेट को भंग कर दिया गया। शिवकुमार ने विधायकों के साथ अपना समर्थन दिखाते हुए राज्यपाल से शपथ के लिए समय मांगा। इसके बाद तीन जून की तारीख तय हुई। बुधवार तीन जून को पद और गरिमा की शपथ लेने के साथ ही कर्नाटक में कांग्रेस का किंगमेकर आखिरकार किंग बन ही गया।  

Mumbai Weather Alert: तेज आंधी और भारी बारिश की चेतावनी, मॉनसून को लेकर आई बड़ी खबर

मुंबई  महाराष्ट्र में झमाझम बारिश का दौर शुरू होने जा रहा है। IMD यानी भारत मौसम विज्ञान विभाग ने राज्य के कई हिस्सों में आंधी और तूफान की संभावनाएं जताई हैं। खास बात है कि मॉनसून की एंट्री का तारीख नजदीक आने के साथ ही देश के कई हिस्सों में मौसम बदलने लगा है। कहा जा रहा है कि पुणे में पूरे सप्ताह बारिश की संभावनाएं जताई जा रही हैं। मौसम विभाग का कहना है कि 4 जून को मॉनसून केरल में दस्तक दे सकता है। खबर है कि मुंबई और पुणे के साथ ठाणे और पालघर जिले में येलो अलर्ट जारी कर दिया गया है। यहां बारीश और तेज हवाएं चल सकती हैं। इसके अलावा कोंकण और पश्चिम महाराष्ट्र बेल्ट में प्री मॉनसून गतिविधियां और मजबूत हो सकती हैं। ऐसे में क्षेत्र में झमाझम बारिश होने के आसार हैं। खास बात है कि महाराष्ट्र के कई जिले लंबे समय से उमस और गर्मी का सामना कर रहे थे। ऐसे में बारिश तापमान राहत दे सकती है। 4 जून तक मुंबई में बारिश खास बात है कि इस सप्ताह की शुरुआत से ही मुंबई में बारिश दर्ज की जा रही थी। अब संभावनाएं हैं कि 4 जून तक शहर में बारिश हो सकती है। वहीं, पुणे में कम से कम 6 जून तक हल्की बारिश हो सकती है। फिलहाल, शहर में 3 और 5 जून को लेकर येलो अलर्ट जारी किया गया है। वहीं, 4 जून को लेकर कोई चेतावनी जारी नहीं की गई है। इस दौरान बारिश जारी रहने की संभावनाएं हैं। मौसम के जानकारों का कहना है कि अगले 5 दिनों के दौरान राज्य के कई हिस्सों में तेज हवाएं चल सकती हैं। इस दौरान इनकी रफ्तार 40 से 50 किमी प्रतिघंटा तक पहुंच सकती है। उन्होंने बताया कि इस दौरान आंधी-तूफान के साथ कुछ स्थानों पर छिटपुट बारिश हो सकती है। खास बात है कि एक्सपर्ट्स ने साफ किया है कि बारिश के मौजूदा दौर का मॉनसून के आगमन से लेना देना नहीं है। महाराष्ट्र में मॉनसून क्षेत्रीय मौसम विभाग का कहना है कि प्री मॉनसून गतिविधियों के लिए पूरे महाराष्ट्र में स्थिति अनुकूल हैं। दोपहर और शाम के समय में बारिश की ज्यादा संभावनाएं हैं। 4 जून को आएगा मॉनसून मंगलवार को IMD ने बताया कि मॉनसून 4 जून के आसपास केरल पहुंच सकता है। आईएमडी ने अपने दैनिक पूर्वानुमान में कहा, 'दक्षिण-पश्चिम एवं दक्षिण-पूर्व अरब सागर के कुछ और हिस्सों, लक्षद्वीप तथा केरल और तमिलनाडु के कुछ भागों में चार जून के आसपास दक्षिण-पश्चिम मानसून के और आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं।' आईएमडी ने पहले अनुमान जताया था कि केरल में मानसून की दस्तक 26 मई के आसपास होगी। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। बाद में विभाग ने 29 मई को कहा कि मानसून अगले हफ्ते पहुंच सकता है।

इंडसइंड बैंक की मुश्किलें गहराईं! 2000 करोड़ की गड़बड़ी के बाद अब PMO-RBI में शिकायत

मुंबई  प्राइवेट सेक्टर के प्रमुख बैंक इंडसइंड बैंक की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। बैंक में करीब ₹2,000 करोड़ की डेरिवेटिव्स अकाउंटिंग गड़बड़ी सामने आने के बाद अब एक व्हिसलब्लोअर ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और कई अन्य नियामक एजेंसियों से मामले की जांच की मांग की है। मामले से जुड़े डॉक्यूमेंट्स के अनुसार शिकायत की प्रतियां गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO), राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (NFRA) और अन्य एजेंसियों को भी भेजी गई हैं। इस खबर के बाद शुरुआती कारोबार में ही इंडसइंड बैंक के शेयर आज करीब 2.50 प्रतिशत से अधिक नीचे 888.80 रुपये पर आ गए। अंदरूनी कारोबार और गवर्नेंस में खामियों के आरोप इकनॉमिक टाइम्स की खबर के मुताबिक शिकायत में बैंक के पूर्व पूर्वी भारत जोनल हेड समीर अग्रवाल पर इनसाइडर ट्रेडिंग यानी गोपनीय जानकारी के आधार पर शेयर ट्रेडिंग का आरोप लगाया गया है। व्हिसलब्लोअर का दावा है कि समीर अग्रवाल ने बैंक की गोपनीय जानकारियों का इस्तेमाल करते हुए अपने परिवार और संबंधित संस्थाओं के जरिए शेयरों में कारोबार कराया। आरोप है कि सार्वजनिक रूप से महत्वपूर्ण जानकारी सामने आने से पहले करीब ₹815 करोड़ के शेयर डील के जरिए लगभग ₹46 करोड़ का लाभ कमाया गया। माइक्रोफाइनेंस लोन और ऑडिट रिपोर्ट को लेकर भी सवाल शिकायत में केवल इनसाइडर ट्रेडिंग ही नहीं, बल्कि कई अन्य गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं। इनमें वित्तीय रिकॉर्ड में हेरफेर, माइक्रोफाइनेंस लोन की एवरग्रीनिंग, ऑडिट निष्कर्षों को दबाने और कथित अनियमितताओं को छिपाने के प्रयास शामिल हैं। व्हिसलब्लोअर का आरोप है कि बैंक के कुछ सीनियर अफसरों और बोर्ड के सदस्यों ने इन मुद्दों को दबाने की कोशिश की। इंडसइंड बैंक ने आरोपों को किया खारिज बता दें इकनॉमिक टाइम्स द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में इंडसइंड बैंक ने इन आरोपों को खारिज किया है। बैंक ने कहा कि वह व्हिसलब्लोअर द्वारा लगाए गए आरोपों को स्वीकार नहीं करता। बैंक के अनुसार सभी शिकायतों की आंतरिक रूप से जांच की गई है और आवश्यक कार्रवाई नियामकीय नियमों तथा बैंक की नीतियों के अनुसार की गई है। बैंक ने यह भी कहा कि कुछ मामलों की जानकारी उसने स्वयं संबंधित अधिकारियों को दी थी। चूंकि मामला अभी समीक्षा के दायरे में है, इसलिए बैंक इस पर और टिप्पणी नहीं करेगा। बढ़ सकती है नियामकों की निगरानी विशेषज्ञों का मानना है कि ₹2,000 करोड़ की अकाउंटिंग गड़बड़ी के बाद सामने आई इस नई शिकायत से इंडसइंड बैंक पर नियामकीय निगरानी और बढ़ सकती है। अगर जांच एजेंसियां आरोपों में प्रथम दृष्टया सच्चाई पाती हैं, तो बैंक और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विस्तृत जांच शुरू हो सकती है।