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बर्फबारी से जम्मू-कश्मीर में हाईवे बंद, उधमपुर में आवाजाही रोकी गई, डोडा में स्थिति गंभीर

डोडा  जम्मू संभाग में डोडा जिले के भलेसा क्षेत्र में पिछले 24 घंटों से लगातार दूसरे दिन भारी बर्फबारी जारी रही. बर्फबारी की वजह से सड़कें और सर्विस रुक गई है, इसलिए डोडा जिला प्रशासन की तरफ से एसडीएम गंडोह, भलेसा ने लोगों को सुरक्षा के लिए घर के अंदर रहने की सलाह दी है. तपमान जीरो से नीचे चला गया है. मैदानी इलाकों में करीब एक फीट बर्फबारी हुई है, जबकि ऊपरी पहाड़ी इलाकों में करीब दो से तीन फीट बर्फबारी हुई है. बिजली और पानी की सप्लाई समेत सभी जरूरी सर्विस रुक गई हैं. भूस्खलन, पेड़ गिरने और भारी बर्फ जमा होने की वजह से हाईवे और लिंक रोड समेत कई सड़कें बंद हैं. इलाके में हालात ठीक होने तक सिर्फ इमरजेंसी सर्विस को ही चलने दिया जा रहा है. लगभग तीन महीने के लंबे सूखे के बाद, शुक्रवार आधी रात से डोडा के भलेसा और उसके आस-पास के मैदानी इलाकों और ऊपरी इलाकों में बर्फबारी शुरू हो गई. जब पूरा इलाका बर्फ से ढक गया, तो लोगों ने इस लंबे समय से इंतजार की जा रही बर्फबारी पर काफी राहत और खुशी जाहिर की. रामबन जिले के बनिहाल शहर में भी शुक्रवार को मौसम की पहली भारी बर्फबारी हुई, क्योंकि पूरे इलाके में ताजी बर्फबारी हुई, जिससे सर्दी अपने पूरे जोर पर आ गई. बर्फबारी देर रात शुरू हुई और कई घंटों तक जारी रही, जिससे तापमान में भारी गिरावट आई और विजिबिलिटी कम हो गई. इस बीच, बारामूला, बडगाम और रामबन के हिल रिसॉर्ट शहर बटोटे में भी काफी बर्फबारी हुई, जिससे पूरा इलाका सफेद चादर से ढक गया. भारी बारिश और बर्फबारी की वजह से शुक्रवार को जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे (NH-44) बंद कर दिया गया, साथ ही उधमपुर के जखनी चौक पर भी आवाजाही रोक दी गई. बर्फबारी की वजह से हवाई यात्रा में भी रुकावट आई. श्रीनगर एयरपोर्ट और इंडिगो एयरलाइंस ने कई फ्लाइट को कुछ समय के लिए रोकने और कैंसल करने का ऐलान किया. अधिकारियों ने कहा कि लगातार बारिश और रामसू तक जमा हो रही बर्फ को देखते हुए, सड़क पर फिसलन की वजह से एहतियात के तौर पर राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर सभी तरह के ट्रैफिक को सुरक्षित जगहों पर रोक दिया गया. इससे पहले विधायक दलीप सिंह परिहार ने रविवार को कहा कि चल रहा भद्रवाह विंटर कार्निवल देश भर से टूरिस्ट को खींचकर जम्मू-कश्मीर की इकॉनमी में मदद कर रहा है. उन्होंने फेस्टिवल में शामिल होने के लिए दूर-दूर से आए विजिटर्स का शुक्रिया अदा किया.

ट्रंप बदल सकते हैं फैसला! भारत से 25% टैरिफ हटाने के मिल रहे संकेत

 नई दिल्ली अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ को लेकर बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि भारत पर लगाया गया यह टैरिफ अमेरिका के लिए "काफी सफल" रहा है. बेसेंट के मुताबिक, इस टैरिफ के बाद भारत द्वारा रूस से तेल की खरीद में भारी गिरावट आई है. फिलहाल यह टैरिफ लागू है, लेकिन अमेरिका इसे स्थायी नहीं मानता. स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया कि आने वाले समय में भारत पर लगाया गया 25% टैरिफ हटाया भी जा सकता है. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि अब इसे हटाने का एक रास्ता बन सकता है." यानी अगर हालात अनुकूल रहे और बातचीत आगे बढ़ी, तो अमेरिका भारत को टैरिफ में राहत दे सकता है. यह बयान ऐसे समय आया है, जब वैश्विक स्तर पर तेल व्यापार और रूस से जुड़े प्रतिबंधों को लेकर लगातार चर्चा चल रही है. भारत पर अमेरिका ने कितना टैरिफ लगाया है? अमेरिका ने भारत से आने वाले कई सामानों पर फिलहाल कुल मिलाकर 50% तक का टैरिफ लगा रखा है. इसमें से करीब 25% सामान्य टैरिफ है, जो भारत के लगभग 55% निर्यात पर लागू होता है. इसके अलावा अगस्त 2025 से एक अतिरिक्त 25% "ऑयल से जुड़ा पेनल्टी टैरिफ" लगाया गया, जो रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर दबाव बनाने के लिए है. अमेरिका, G7 और यूरोपीय देशों का रूसी तेल पर प्राइस कैप रूस के तेल को लेकर अमेरिका, G7 और यूरोपीय देशों ने एक प्राइस कैप सिस्टम भी लागू किया है. जनवरी 2026 तक यह कैप लगभग 47.60 डॉलर प्रति बैरल है, जिसे 1 फरवरी 2026 से घटाकर 44.10 डॉलर किया जाएगा. नियम यह है कि अगर रूसी तेल तय कीमत से ऊपर बेचा गया, तो उस पर बीमा, शिपिंग और फाइनेंस जैसी सेवाएं नहीं दी जाएंगी. अमेरिका का 500% टैरिफ का बिल अमेरिका का दावा है कि इस दबाव के बाद भारत ने रूसी तेल की खरीद कम कर दी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिलायंस जैसी बड़ी भारतीय रिफाइनरियों ने जनवरी 2026 में रूसी तेल लेना रोक दिया. वहीं भारत का कहना है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतें राष्ट्रीय हित और किफायती दामों के आधार पर तय करता है, लेकिन 500% टैरिफ वाले नए अमेरिकी बिल पर वह नजर बनाए हुए है.

रैगिंग का मामला: जूनियर्स को घंटों खड़ा कराया और शराब-सिगरेट पीने को कहा

बेंगलुरु  कर्नाटक के बेंगलुरु ग्रामीण जिले से रैगिंग की गंभीर घटना सामने आई है। देवनहल्ली पुलिस ने बताया कि आकाश ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के 23 सीनियर छात्रों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। इन पर जूनियर छात्रों के साथ उत्पीड़न करने का आरोप है। इस मामले में तीन मुख्य आरोपी छात्रों को गिरफ्तार भी कर लिया है। शिकायत के अनुसार, जूनियर छात्रों को शराब और सिगरेट लाने के लिए मजबूर किया गया। उन्हें घंटों खड़े होकर अपनी किताबें ऊपर उठाकर सजा के रूप में खड़ा रखा गया। रिपोर्ट के मुताबिक, कॉलेज के एडमिन हेड मिदुन माधवन तक इस मामले की शिकायत पहुंची। जब वह इसकी जांच करने गए, तो गुस्साए सीनियर्स ने उन पर हमला कर दिया। सीनियर्स पर जूनियर छात्रों पर लोहे की रॉड, पत्थर और लकड़ी की छड़ियों से हमला करने का भी आरोप है। घटना के दौरान एक छात्र की सोने की चेन भी छीन ली गई। इस मामले में देवनहल्ली पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया गया है। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए तीन आरोपियों (बिलाल, झिरिल और मिशाल) को गिरफ्तार कर लिया है। बाकी 20 आरोपित छात्रों की तलाश जारी है। एक बाहरी व्यक्ति भी शामिल सीनियर छात्रों ने 15 जनवरी को रैगिंग फिर से शुरू कर दी, जिसके बाद जूनियर छात्रों ने माधवन को इसकी सूचना दी थी। पुलिस के अनुसार, इसके बाद माधवन जूनियर छात्रों के साथ कॉलेज के पीछे एक चाय की दुकान के पास सीनियर छात्रों से मिलने गए और उन्हें चेतावनी दी। इस दौरान स्थिति और बिगड़ गई। सीनियर छात्रों ने कथित तौर पर जूनियर छात्रों और माधवन से मारपीट की। प्राथमिकी में कहा गया है कि सीनियर छात्रों के साथ आए एक बाहरी व्यक्ति नवीन ने उन पर लाठी-डंडों और पत्थरों से हमला किया। उन्हें धमकी भी दी थी।

रोकेया प्राची का दर्दनाक खुलासा! बोलीं—यूनुस ने करवाया हमला, जान बचाकर छोड़ा बांग्लादेश

ढाका  बांग्लादेश में कट्टरपंथी हैवानों की भीड़ हिंदुओं को ढूंढ-ढूंढ कर दर्दनाक मौत दे रही है. ये हिंदू किसी और देश नहीं बल्कि बांग्लादेश के ही नागरिक हैं लेकिन यूनुस ने अपने आंख-कान बंद कर लिए हैं. दीपू दास की मौत के बाद हुई कई हिंदुओं की हत्याओं पर कार्रवाई तो दूर की बात, यूनुस ने एक स्टेटमेंट तक जारी नहीं किया है. हाल ही में बांग्लादेश से भागीं एक एक्ट्रेस ने चौंकाने वाला खुलासा किया है.  बातचीत के दौरान बताया है कि किस तरह यूनुस ने उन पर अटैक करवाया था. एक्ट्रेस ने बांग्लादेश के अंदर हिंदुओं दर्दनाक हालातों को भी बयां किया है. ‘भीड़ ने किया अटैक, मेरे कपड़े फट गए’ ये बांग्लादेशी एक्ट्रेस रोकेया प्राची हैं, जो बांग्लादेश से भाग कर भारत में शरण ले चुकी हैं. उन्होंने हाल ही में  एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में बताया कि भागने से पहले उन पर कैसे अटैक हुआ था. रोकेया ने बताया कि 5th अगस्त 2024 के बाद अल्पसंख्यकों का नरसंहार हुआ, मंदिरों को निशाना बनाया गया, रेप और हत्याएं भी हुई हैं. अपने साथ हुई खौफनाक घटना के बारे में बताते हुए रोकेया ने कहा कि ’14 अगस्त 2024 को मुझपर भी हमला हुआ, यूनुस के मॉब ने मुझपर अटैक किया था. मेरे कपड़े फट गए, मुझे मारने की कोशिश हुई, लेकिन कुछ लोगों ने मुझे बचाया’. बांग्लादेश से कैसे भागीं उन्होंने बताया कि ‘अटैक में किसी तरह बचकर निकलने के बाद मैं अंडरग्राउंड हो गई थी और पिछले महीने में भारत आ गई. मैंने यूनुस के खिलाफ आवाज उठाई इसलिए मुझे रेप की, हत्या की धमकियां मिलीं. मैं तो सुरक्षित निकल आई लेकिन बांग्लादेश की दूसरी महिलाएं मेरी तरह खुशकिस्मत नहीं हैं. यूनुस दंगाईयों के गॉडफादर रोकेया ने कहा ‘यूनुस सरकार हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर को रोकना नहीं चाहते, वहां एक नहीं कई बल्कि कई दीपू चंद्र दास हैं, जिन्हें निशाना बनाया जा रहा है. यूनुस अपराधियों, दंगाईयों के गॉडफादर हैं. अगर आवामी लीग को चुनाव नहीं लड़ने दिया गया, तो बांग्लादेश नहीं रहेगा, यह जंगिस्तान बन जाएगा. यूनुस संविधान का इस्तेमाल संविधान को खत्म करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं’.

डंके की चोट पर भारत ने दिया ईरान का साथ, UN में पलट गया पूरा समीकरण

नई दिल्ली ईरान और भारत की दोस्ती से दुनिया वाकिफ है. मुश्किल घड़ी में अक्सर भारत अपने दोस्तों का साथ देता है. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है. पश्चिम देशों ने शुक्रवार को ईरान को यूएन में फंसााया. ऐसे में भारत से देखा नहीं गया. भारत ने डंके की चोट पर ईरान का साथ दिया. दरअसल, हुआ कुछ यूं कि यूएनएचआरसी यानी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में ईरान की मानवाधिकार उल्लंघनों पर एक बड़ा विवाद हुआ. शुक्रवार को यूएनएचआरसी ने ईरान की निंदा की और हाल के विरोध प्रदर्शनों पर क्रूर कार्रवाई की जांच का आदेश दिया. यह जांच हजारों लोगों की मौतों से जुड़ी है. ईरान इस मुद्दे पर बुरी तरह फंस गया था. पश्चिमी देश और नाटो सदस्य जैसे अमेरिका, फ्रांस और दक्षिण कोरिया ईरान के खिलाफ थे. वे सख्त कार्रवाई चाहते थे. लेकिन भारत ने डंके की चोट पर ईरान का साथ दिया. जी हां, भारत ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया. इससे पश्चिमी देश भौंचक्के रह गए. वे सोच भी नहीं पाए कि भारत जैसे बड़ा लोकतांत्रिक देश ईरान के पक्ष में खड़ा होगा. भारत का यह कदम ईरान के लिए मजबूत समर्थन था. भारत ने साफ कर दिया कि वह ईरान के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ है. इससे भारत की विदेश नीति की ताकत दिखी, जो संतुलित और स्वतंत्र है. पश्चिमी देशों को लगा कि वे आसानी से ईरान को अलग-थलग कर लेंगे, लेकिन भारत के वोट ने उनके प्लान पर पानी फेर दिया. भारत की तरह ही चीन ने भी ईरान का साथ दिया है. आखिर हुआ क्या? दरअसल, यह पूरी घटना जेनेवा में UNHRC की इमरजेंसी मीटिंग में हुई. यूएन की इस बॉडी ने ईरान के खिलाफ एक प्रस्ताव पास किया. यह 2022 में शुरू हुई जांच को बढ़ाने का था. अब UN जांचकर्ता हाल के दंगों की भी जांच करेंगे. यह जांच भविष्य में कानूनी कार्रवाई के लिए दस्तावेज तैयार करेगी. अधिकार समूहों का कहना है कि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यह सबसे बड़ा क्रैकडाउन था. इसमें आम नागरिक भी मारे गए. हालांकि, तेहरान सरकार ने इसे आतंकवादियों और दंगाइयों का काम बताया. उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल जैसे विदेशी दुश्मन इसके पीछे हैं. ईरान के यूएन मिशन ने इस प्रस्ताव की निंदा की. ईरान ने कहा कि वह बाहरी हस्तक्षेप नहीं सहन करेगा. बैठक में क्या हुआ? चीन, पाकिस्तान, क्यूबा और इथियोपिया जैसे देशों ने बैठक की उपयोगिता पर सवाल उठाया. चीन के राजदूत जिया गाइड ने कहा कि ईरान का दंगा आंतरिक मामला है. जांच के खर्च पर भी सवाल है. यूए में फंडिंग संकट है, जिससे अन्य जांचें रुकी हैं. यह स्पष्ट नहीं कि इस जांच का पैसा कौन देगा. इसके बाद बात अब वोटिंग की थी. इसमें कुल 46 देशों ने वोट किया. प्रस्ताव ईरान के खिलाफ था, यानी जांच बढ़ाने के पक्ष में. ईरान के खिलाफ प्रस्ताव के पक्ष में 25 वोट पड़े और विपक्ष में 7. 14 देशों ने वोटिंग से दूर रहने का फैसला किया.     ईरान के खिलाफ प्रस्ताव के पक्ष में कौन-कौन देश: फ्रांस, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान, नीदरलैंड्स, स्पेन, इटली, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क, फिनलैंड, आयरलैंड, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, चेक गणराज्य, लिथुआनिया, लातविया, एस्टोनिया. ये सभी पश्चिमी और नाटो देश हैं.     प्रस्ताव के खिलाफ में कौन-कौन: भारत, चीन, पाकिस्तान, क्यूबा, इथियोपिया, वेनेजुएला, बोलीविया. ये देश ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के खिलाफ हैं.     वोटिंग से दूर कौन-कौन रहे: ब्राजील, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, मलेशिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, तुर्की, मिस्र, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, बांग्लादेश, थाईलैंड, फिलीपींस. ये देश तटस्थ रहे, न पक्ष में न विरोध में. भारत का साथ क्यों अहम? ईरान पर यह वोटिंग दिखाती है कि दुनिया कितनी बंटी हुई है. पश्चिमी देश ईरान पर दबाव बनाना चाहते हैं. लेकिन भारत और चीन जैसे बड़े देशों ने ईरान का साथ दिया. भारत का वोट अहम था क्योंकि भारत ईरान से तेल आयात करता है और दोनों के बीच पुराने संबंध हैं. इससे भारत की नीति साफ हुई कि वह मानवाधिकार के नाम पर राजनीति नहीं होने देगा. ईरान में विरोध प्रदर्शन महिला अधिकारों से शुरू हुए थे. एक महिला महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत से भड़के. अब यह पूरे देश में फैल गया. हजारों गिरफ्तार हुए. महिलाएं हिजाब उतारकर विरोध कर रही हैं. सरकार ने इंटरनेट बंद किया और बल प्रयोग किया. अधिकार समूहों का कहना है कि मौतों की संख्या और बढ़ सकती है. बहरहाल, UN की जांच से सच्चाई सामने आएगी, लेकिन ईरान इसे मानने से इनकार कर रहा है.

अंतरिक्ष में भारत की बड़ी छलांग! ISRO ने किया ड्रीम प्रोजेक्ट का आगाज़

बेंगलुरु  भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ाते हुए अपने स्‍वदेशी स्थायी स्पेस स्टेशन के निर्माण की दिशा में काम शुरू कर दिया है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो-ISRO) ने भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station – BAS) की आधारशिला रखने की प्रक्रिया तेज कर दी है. योजना के अनुसार, इसका पहला मॉड्यूल वर्ष 2028 तक अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, जबकि 2035 तक इसे पूरी तरह से वर्किंग स्‍पेस स्‍टेशन के रूप में विकसित किया जाएगा. इसरो के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) ने हाल ही में भारतीय कंपनियों से ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (EoI) जारी कर BAS-01 नामक पहले मॉड्यूल के निर्माण में भागीदारी के लिए आमंत्रित किया है. यह पहली बार है जब भारत ने अपने स्थायी मानवयुक्त अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण की दिशा में औपचारिक और ठोस कदम उठाया है. यह स्टेशन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की तर्ज पर विकसित किया जाएगा, लेकिन पूरी तरह स्वदेशी तकनीक और संसाधनों के बल पर. ISRO के अधिकारियों के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के बाद अगला कदम है. गगनयान के जरिए भारत अपने अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की कक्षा तक भेजने की तैयारी कर रहा है, जबकि BAS के माध्यम से लक्ष्य अंतरिक्ष में लंबे समय तक इंसानी उपस्थिति स्थापित करना है. सरल शब्दों में कहें तो भारत अब केवल अंतरिक्ष में जाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वहां रहकर वैज्ञानिक शोध और तकनीकी प्रयोग भी करेगा. क्‍या है BAS-01 मॉड्यूल? BAS-01 मॉड्यूल का स्‍ट्रक्‍चर अल्‍ट्रा मॉडर्न होगा. प्रत्येक मॉड्यूल का व्यास लगभग 3.8 मीटर और ऊंचाई करीब 8 मीटर होगी. इन्हें हाई-पावर्ड एल्यूमिनियम एलॉय (AA-2219) से तैयार किया जाएगा, जो ह्यूमन मिशनों के लिए मान्यता प्राप्त सामग्री है. ISRO ने स्पष्ट किया है कि इन मॉड्यूल्स को वही सुरक्षा और गुणवत्ता मानक पूरे करने होंगे, जो गगनयान मिशन के लिए अनिवार्य हैं, क्योंकि भविष्य में अंतरिक्ष यात्री इन्हीं मॉड्यूल्स के भीतर रहकर काम करेंगे. क्‍या है ISRO की योजना? ISRO ने दो पूर्ण सेट मॉड्यूल धरती पर तैयार करने की योजना बनाई है, ताकि परीक्षण और गुणवत्ता मूल्यांकन के बाद सर्वश्रेष्ठ हार्डवेयर को अंतरिक्ष में भेजा जा सके. यह कार्य सामान्य निर्माण प्रक्रिया से कहीं अधिक जटिल है. कंपनियों को विशेष वेल्डिंग तकनीकों का विकास करना होगा और हाई स्‍टैंडर्ड का पालन करना होगा. आधे मिलीमीटर की भी त्रुटि स्वीकार्य नहीं होगी. इसके अलावा प्रेशर टेस्ट, लीक टेस्ट और नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग जैसी कठोर प्रक्रियाओं से गुजरना अनिवार्य होगा. पूरी तरह से स्‍वदेशी इस परियोजना की एक खास बात यह है कि यह पूरी तरह भारतीय प्रयास होगा. सरकार की ओर से उत्पादन सुविधाएं स्थापित करने के लिए कोई वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी और न ही किसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को आउटसोर्स करने की अनुमति होगी. इसरो कंपनियों को कच्चा माल, तकनीकी ड्रॉइंग और थ्री-डी मॉडल उपलब्ध कराएगा, लेकिन हाई क्‍वालिटी वाला हार्डवेयर समय पर तैयार करने की पूरी जिम्मेदारी सेलेक्‍टेड कंपनियों की होगी. स्‍पेस स्‍टेशन क्‍यों जरूरी? ISRO का मानना है कि भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन देश के वैज्ञानिक और तकनीकी भविष्य में अहम भूमिका निभाएगा. यहां माइक्रोग्रैविटी में दीर्घकालिक प्रयोग किए जा सकेंगे (मानव शरीर पर अंतरिक्ष वातावरण के प्रभावों का अध्ययन होगा और नई तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा) जो भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए आवश्यक होंगी. यदि तय समयसीमा के अनुसार काम आगे बढ़ता है, तो 2028 तक भारत का पहला स्पेस स्टेशन मॉड्यूल पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित हो सकता है. यह उपलब्धि भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में ला खड़ा करेगी, जिन्होंने न केवल अंतरिक्ष में मानव भेजा है, बल्कि वहां स्थायी मानव उपस्थिति स्थापित करने की क्षमता भी हासिल की है. यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में एक नया अध्याय होगा और आने वाले दशकों में देश की वैज्ञानिक क्षमताओं को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में सहायक बनेगा.

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्रीय कर्मचारियों पर एसीबी की जांच होगी संभव

नई दिल्ली/ जयपुर  सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) को केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों में अहम फैसला सुनाया. कोर्ट ने केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ एसीबी को जांच करने का अधिकार देते हुए 2 विशेष अनुमति याचिकाएं खारिज कर दीं. साथ ही स्पष्ट किया कि इसके लिए सीबीआई की पूर्व अनुमति जरूरी नहीं है. 'अनिल दायमा एवं अन्य बनाम राज्य राजस्थान एवं अन्य' मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जेबी पारडीवाला और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने की. याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक गौड़ उपस्थित हुए. जबकि राज्य राजस्थान की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने पैरवी की.  एसीबी के अधिकार क्षेत्र को दी गई थी चुनौती दरअसल, राजस्थान एसीबी ने केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए थे. कर्मचारियों ने एसीबी के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी थी. याचिका दायर करते हुए दलील दी गई कि एसीबी केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और जांच करने के लिए सक्षम नहीं है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है, "एसीबी द्वारा सीबीआई की पूर्व अनुमति या सहमति के बिना दायर किए गए आरोप-पत्र (चार्जशीट) विधिक रूप से अमान्य हैं. राज्य एजेंसी द्वारा संघ सरकार के अधीन कार्यरत अधिकारियों के विरुद्ध की गई जांच अवैध है. केवल सीबीआई को ही केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों की जांच करने का अधिकार है, एसीबी बिना सीबीआई की अनुमति के कोई कार्रवाई नहीं कर सकती और इस कारण पूरी जांच एवं आरोप-पत्र कानूनन शून्य हैं." हाईकोर्ट ने भी खारिज की थी याचिका इन सभी दलीलों को राजस्थान हाईकोर्ट (जयपुर पीठ) ने 3 अक्टूबर 2025 को ही खारिज कर दिया था और एसीबी की शक्तियों को वैध ठहराया था. इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर कीं. केस की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के सामने 2 मुख्य विधिक प्रश्न उठे.      क्या किसी राज्य की एंटी-करप्शन ब्यूरो को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केंद्रीय कर्मचारियों की जांच का अधिकार है? वो भी तब, जब अपराध राज्य की क्षेत्रीय सीमा के भीतर हुआ हो.      क्या सीबीआई की स्वीकृति के बिना एसीबी द्वारा दायर आरोप-पत्र वैध हैं और क्या उनके आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने एसीबी के अधिकार क्षेत्र पर कही ये बात इस संबंध में राजस्थान हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की पुष्टि करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसीबी को आपराधिक मामले दर्ज करने, जांच करने और आरोप-पत्र दाखिल करने का पूर्ण अधिकार है, भले ही अभियुक्त केंद्रीय सरकार का कर्मचारी ही क्यों न हो. न्यायालय ने इस तर्क को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया कि ऐसे मामलों में केवल सीबीआई ही जांच कर सकती है. अदालत ने यह भी कहा कि यह दावा करना गलत है कि अभियोजन केवल सीबीआई द्वारा ही प्रारंभ किया जा सकता है या यह कि एसीबी सीबीआई की अनुमति के बिना कार्यवाही नहीं कर सकती. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उच्च न्यायालय ने एसीबी के अधिकार क्षेत्र को मान्यता देते हुए सही कानूनी दृष्टिकोण अपनाया था. याचिका अस्वीकार करने में संकोच नहीं- सुप्रीम कोर्ट अदालत ने टिप्पणी की, “धारा 17-A की किसी भी प्रकार से कल्पना नहीं की जा सकती कि वह अवैध रिश्वत की मांग के मामलों पर लागू हो. हमें इस प्रकार की दलीलों को प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है.” यह निर्णय इस मामने में अहम हैं कि राज्य एंटी-करप्शन ब्यूरो (जैसे राजस्थान एसीबी) केंद्रीय सरकार के अधिकारियों के विरुद्ध भी भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कर सकती है. इसके लिए सीबीआई की स्वीकृति अनिवार्य नहीं है और एसीबी स्वतंत्र रूप से एफआईआर दर्ज कर सकती है. एजेंसी जांच कर सकती है और आरोप-पत्र दाखिल कर सकती है.   

यूरोप से FTA डील का असर: 200 अरब डॉलर का मार्केट, निवेश और रोजगार में जबरदस्त उछाल

 नई दिल्‍ली, भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) का ऐलान 27 जनवरी को होने जा रही है. FTA डील के तहत दोनों अपने देश के मार्केट में पहुंच आसान बनाएंगे. यूरोपीय संघ की वस्‍तुओं की भारत में कम टैरिफ या बिना टैरिफ एंर्टी मिल सकेगी, तो वहीं भारत भी यूरोपीय संघ के देशों में अपनी वस्‍तुओं को कम टैरिफ या बिना टैरिफ बेच सकेगा.  यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने स्विट्ज़रलैंड के दावोस में कहा कि यूरोपीय यूनियन भारत के साथ एक ऐसी डील करने जा रहा है, जो आजतक किसी भी देश ने नहीं किया है. उन्होंने कहा कि इससे 27 देशों के इस समूह को 'फर्स्ट मूवर एडवांटेज' मिलेगा. वहीं दूसरी ओर, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी आगामी भारत–ईयू व्यापार समझौते को 'मदर ऑफ़ ऑल डील्स' कहा था. आइए जानते हैं इस डील से भारत को क्‍या-क्‍या फायदे होंगे.  भारत के लिए एक बड़ा मार्केट भारत और EU के बीच साल 2024–25 में करीब ₹11.8 लाख करोड़ ($136.5 अरब) का व्यापार हुआ था, जिसमें  एक्‍सपोर्ट $75.8 डॉलर था और इम्‍पोर्ट $60.7 डॉलर रहा.  लेकिन अब एफटीए डील के बाद भारत का एक्‍सपोर्ट तेजी से बढ़ जाएगा. सर्विस सेक्‍टर से लेकर मैन्‍युफैक्‍चरिंग में भी भारत की वस्‍तुओं की संख्‍या यूरोप में बढ़ेगी. आगे बताए जा रहे आंकड़े से भी समझ सकते हैं कि भारत को कितना बड़ा फायदा हो सकता है. दरअसल, यूरोप में 450 मिलियन से ज्‍यादा लोग रहते हैं और यह दुनिया का  20 ट्रिलियन  डॉलर से बड़ा अर्थव्‍यवस्‍था वाला मार्केट है. एफटीए के बाद भारत को इस बड़े मार्केट में कम या बिना टैक्‍स के एंट्री मिलेगी. यूरोपीय संघ दुनिया के सबसे बड़े ट्रेड ब्लॉक्स में से एक माना जाता है, ऐसे में इसका हिस्‍सा बनकर भारत को लंबे समय तक एक्‍सपोर्ट, इन्‍वेस्‍टमेंट और बिजनेस में बड़ा लाभ मिलने वाला है. अनुमान है कि इस डील के बाद भारत का ईयू में कारोबार 136 अरब डॉलर से बढ़कर 200 से 250 अरब डॉलर हो सकता है.  भारत को क्‍या-क्‍या होंगे फायदे 1. एक्सपोर्ट तेजी से बढ़ेगी यूरोपीय संघ दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड ब्‍लॉक है. इस डील के बाद भारतीय प्रोडक्‍ट्स पर इम्‍पोर्ट ड्यूट कम या फिर खत्‍म हो जाएगी. एक रिपोर्ट्स के मुताबिक यूरोप अमेरिका पर निर्भरता खत्‍म करने के लिए भारत के ऑर्म्‍स की ओर देख रहा है, ऐसे में हथियारों की सप्‍लाई भारत से बढ़ सकती है. इसके साथ ही टेक्सटाइल, रेडीमेड गारमेंट, फार्मा प्रोडक्‍ट्स, चमड़ा, जूते, जेम्स एंड ज्वेलरी, आईटी और सर्विस सेक्टर चीजों का एक्‍सपोर्ट तेजी से बढ़ेगा.  2. Make in India को बूस्‍ट मिलेगा  एफटीए डील के बाद भारत और यूरोपीय यूनियन को वो चीजें भी भेजी जाएंगी, जो भारत में बनती हैं. इसमें डिफेंस इक्‍यूपमेंट से लेकर अन्‍य मैन्‍युफैक्‍चरिंग प्रोडक्‍ट्स शामिल हैं. साथ ही कम लागत में रॉ मैटेरियल भी यूरोप से आ सकेंगे, जिससे कम लागत में चीजों का भारत में निर्माण होगा.  बड़े स्‍तर पर निवेश भारत में आएगा, नई फैक्‍ट‍ियां खुलेंगी और टेक्‍नोलॉजी ट्रांसफर भी आसान होगा.  3. नई नाौकरियों के मौके इस डील के बाद उम्‍मीद की जा रही है कि मैन्युफैक्चरिंग, आईटी और डिजिटल सर्विस, लॉजिस्टिक्स और MSME सेक्टर में लाखों डायरेक्‍ट एंड इनडायरेक्‍ट रोजगार के अवसर बनेंगे.  4. भारतीय कंपनियों की यूरोप में एंट्री एफटीए डील के बाद नॉन टैरिफ बैरियर कम होगा,  जिससे ज्‍यादा से ज्‍यादा कंपनियां यूरोप में अपने कारोबार का विस्‍तार करेंगी. साथ ही भारतीय प्रोफेशनल्स को यूरोप में काम करने के ज्‍यादा मौके भी मिलेंगे.  5. चीन पर निर्भरता कम होगी भारत लंबे समय से चीन का विकल्‍प तलाश रहा है. यूरोप से डील के बाद यह ख्‍वाहिश पूरी हो सकती है. भारत के लिए यूरोप एक भरोसेमंद सप्‍लाई चेन पार्टनर बन सकता है. फिर बहुत सी चीजों पर चीन से निर्भरता कम होगी. साथ ही इलेक्ट्रिक व्हीकल, रिन्यूएबल एनर्जी और ग्रीन हाइड्रोजन के लिए नई फंडिंग मिल सकती है.  6. यूरोपीय निवेश से भारतीय कंपनियों फायदा यूरोप बड़े स्‍तर पर अमेरिका को फंड देता है, लेकिन अब अमेरिका उतनी तेज से ग्रो करने वाली इकोनॉमी नहीं है और बार-बार अमेरिकी दबाव के कारण यूरोप को कई समस्‍याओं का भी सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में भारत यूरोप के लिए बड़ा मार्केट बन सकता है, जिसमें वे दाव लगा सकते हैं, क्‍योंकि भारत के इकोनॉमी अभी दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली इकोनॉमी है. यूरोपीय निवेश से स्‍टॉर्टअप्‍स को भी बेनिफिट्स होगा. 

ट्रंप से ताकतवर निकले मोदी और जिनपिंग, अमेरिकी एक्सपर्ट ने दी राय

नईदिल्ली  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुकाबले जानकार चीनी समकक्ष शी जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्यादा ताकतवर मान रहे हैं। उनका कहना है कि कई मायने में ये दोनों नेता ट्रंप से ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब ट्रंप लगातार टैरिफ के जरिए अमेरिकी के मोटे मुनाफे, युद्ध रुकवाने और नोबेल के हकदार होने जैसे दावे कर रहे हैं।  राजनीतिक जानकार इयन ब्रेमर ने कहा कि अमेरिका सबसे शक्तिशाली देश है, लेकिन ऐसा ट्रंप की स्थिति में नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, 'राष्ट्रपति ट्रंप सबसे ताकतवर नेता नहीं हैं। शी जिनपिंग हैं। ऐसा क्यों। क्योंकि जिनपिंग के पास मिडटर्म इलेक्शन नहीं है। उनके पास स्वतंत्र न्यायपालिका नहीं है। ट्रंप तीन सालों में पद पर नहीं रहेंगे, लेकिन जिनपिंग रहेंगे।' उन्होंने कहा, 'जब ट्रंप मीडिया और सुर्खियां बटोर रहे हैं, शी जिनपिंग उनसे ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। मोदी बेहतर स्थिति में हैं।' ब्रेमर ने कहा कि पीएम मोदी का लंबा कार्यकाल उन्हें बदलाव और लंबी अवधि के फायदे देखने की अनुमति देता है। जबकि, ट्रंप या कई यूरोपीय नेताओं के मामले में ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा, 'एक नेता के तौर पर, मोदी का लंबे समय तक सत्ता में बने रहना और उनकी नीतियों में निरंतरता उन्हें कई यूरोपीय नेताओं के मुकाबले ज्यादा प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने या दबाव का सामना करने की ताकत देती है। और हमने पिछले कुछ समय में ऐसा होते देखा भी है।' ट्रंप के बोर्ड से कई बड़े नेता दूर ट्रंप ने हमास और इजराइल के बीच हुए युद्धविराम को बनाए रखने के प्रयासों का नेतृत्व करने के लिए गुरुवार को अपने ‘शांति बोर्ड’ का औपचारिक रूप से अनावरण किया। हालांकि अमेरिका के कई शीर्ष सहयोगी इसमें हिस्सा नहीं लेने का विकल्प चुना। रूस फिलहाल विचार कर रहा है, ब्रिटेन ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। फ्रांस के इनकार के बाद नॉर्वे और स्वीडन ने संकेत दिया है कि वे इसमें शामिल नहीं होंगे। फ्रांसीसी अधिकारियों ने रेखांकित किया कि उनका देश गाजा शांति योजना का समर्थन करता है, लेकिन उसे इस बात की चिंता है कि यह बोर्ड संघर्षों के समाधान के मुख्य मंच के रूप में संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने की कोशिश कर सकता है।

लालू और केजरीवाल के बाद अगला नंबर कौन? ममता पर रडार, 3 सीएम जेल जा चुके हैं

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी करीब 35 साल पुराने वामपंथी किले को ध्वस्त करने में 2011 में सफल हो गईं तो उसके बाद से उनका रथ कभी नहीं रुका. भाजपा की लाख कोशिशों के बावजूद ममता ने तीसरी बार 2021 में बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार बना ली. इस साल 2026 में करीब 2 महीने बाद होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 6 महीने के अंदर कई दौरे हो चुके हैं. चुनाव ज्यों-ज्यों करीब आता जाएगा, उनके दौरों का सिलसिला भी तेज होगा. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते जेपी नड्डा ने बंगाल का हाल ही में दौरा किया था. नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बने नितिन नवीन ने भी इस साल होने वाले सभी 5 राज्यों के चुनावों में भाजपा का परचम लहराने का संकल्प लिया है. नतीजे क्या होंगे, यह तो जनता तय करेगी, लेकिन ममता बनर्जी केंद्रीय एजेंसियों से पंगा लेकर मुश्किल में पड़ती नजर आ रही हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट प्रवर्तन निदेशालय (ED) के आरोपों पर उनके प्रतिकूल कोई फैसला देता है तो ममता की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. सीबीआई और ED से मुख्मंत्रियों के टकराव का हश्र लोग देख चुके हैं. CBI से उलझे, पर जेल जाने से नहीं बचे लालू बिहार का सीएम रहते लालू प्रसाद यादव पर जब पशुपालन घोटाले के आरोप लगे और सीबीआई ने जांच शुरू की तो राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के समर्थकों ने खूब हुड़दंग मचाया. इसे ऐसे समझा जा सकता है. मामले की जांच कर रहे सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक यूएन बिश्वास जांच के क्रम में जब-जब कोलकाता से पटना जाते तो अपनी पत्नी को यह कहना नहीं भूलते कि कुछ भी हो सकता है. हालत यह थी कि लालू यादव को गिरफ्तार करने के लिए बात सेना बुलाने तक पहुंच गई. कोई पैंतरा काम नहीं आया और अंततः 30 जुलाई 1997 को लालू यादव को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया. बाद में मुकदमा चला और उन्हें सजा भी हुई. सीबीआई से उलझने के बावजूद लालू बच नहीं पाए. आजादी के बाद सेंट्रल एजेंसी द्वारा मुख्यमंत्री पद पर रहे किसी व्यक्ति के गिरफ्तार होने की यह पहली घटना थी. उन्होंने समझदारी नहीं दिखाई होती तो सीएम रहते ही वे गिरफ्तार हो जाते. जब उन्हें गिरफ्तारी की आशंका प्रबल होती दिखी तो अरेस्ट होने से 2 दिन पहले ही 28 जुलाई 1997 को ही उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सीएम बना दिया. ED के नोटिस की अवहेलना अरविंद पर भारी दिल्ली का सीएम रहते अरविंद केजरीवाल ने भी केंद्रीय एजेंसी ED से पंगा लिया. दिल्ली शराब नीति में घपले के आरोप में ईडी की ओर से पछताछ के लिए उन्हें लगातार 9 नोटिस भेजे गए. उन्होंने उसका न कोई जवाब दिया और न पूछताछ के लिए ईडी के समक्ष हाजिर ही हुए. आखिरकार ईडी ने उनके आवास पर छापा मारा और 21 मार्च 2024 को मनी लांड्रिंग मामले में पहली बार उन्हें गिरफ्तार किया. मुख्यमंत्री पद पर रहते केजरीवाल की यह पहली गिरफ्तारी थी. हालांकि इस मामले में उन्हें जमानत जल्द ही मिल गई, लेकिन उन्हें जेल से बाहर निकलने का मौका नहीं मिला. दूसरी बार उन्हें 26 जून 2024 को सीबीआई ने तिहाड़ जेल से ही गिरफ्तार कर लिया. अगर वे लालू यादव की तरह समझदारी दिखाते तो सीएम के रूप में उनके गिरफ्तार होने का रिकार्ड नहीं बनता. वे भी अपनी पत्नी को सीएम की कुर्सी पर बिठा सकते थे. उनकी पत्नी बाद में जिस तरह राजनीति में रुचि दिखाने लगी थीं, उससे लगता है कि उन्हें या किसी अन्य को भी सीएम न बनाना केजरीवाल की बड़ी चूक थी. केजरीवाल ने दूसरा रिकार्ड यह बनाया कि वे करीब 6 महीने तक जेल से ही सरकार चलाते रहे. बाद में इस पर कोर्ट से लेकर मीडिया तक हंगामा मचा तो उन्होंने आतिशी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी. यानी ईडी से पंगा लेना अरविंद केजरीवाल को महंगा पड़ा. हेमंत सोरेन ने ED को छकाया, पर बचे नहीं झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन पर जमीन घोटाले का आरोप लगा. मामला मनी लांड्रिंग का बना तो ईडी ने जांच के लिए उन्हें कई बार नोटिस भेजा. इस मामले को हेमंत सोरेन ने हल्के में लिया. वे ईडी से राहत की उम्मीद में हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट का चक्कर लगाते रहे. 10 नोटिस के बावजूद जब हेमंत सोरेन ने ईडी को कोई जवाब नहीं भेजा तो आखिरकार ईडी ने उन्हें 31 जनवरी 2024 को उनके सरकारी आवास से गिरफ्तार कर लिया. हेमंत ने भी लालू जैसी ही चालाकी की. फर्क यही रहा कि उन्होंने अपनी पत्नी के बजाय पिता शिबू सोरेन के सहयोगी रहे और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के अति विश्वसनीय सहयोगी चंपाई सोरेन को गिरफ्तारी से कुछ देर पहले ही नेता घोषित कर दिया. खुद सीएम पद से इस्तीफा दे दिया. अब चंपाई के सीएम बनने की सिर्फ औपचारिकता बच गई. चंपाई के चयन के पहले ही हेमंत सोरेन ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया, इसलिए गिरफ्तारी की तारीख तो एक ही रही, सिर्फ समय बदल गया. हालांकि चंपाई सोरेन को सीएम बनाना बाद में उनकी बड़ी भूल साबित हुई. जमीन घोटाले का मामला अभी अदालत में है, लेकिन जमानत मिलने के बाद हेमंत सोरेन ने एक ही टर्म में दूसरी बार सीएम पद की शपथ लेने का रिकार्ड बना दिया. बहरहाल, हेमंत सोरेन भी ईडी से पंगा लेकर बच नहीं पाए. आईपैक पर ई़डी रेड को लेकर ममता बनर्जी भी टकरा रही हैं. ममता का ED से पंगा, परिणाम की प्रतीक्षा ममता बनर्जी ने न सिर्फ ईडी के खिलाफ मोर्चा खोला है, बल्कि वे पहले सीबीआई से भी टकरा चुकी हैं. केंद्रीय एजेंसियों से उनका टकराव कई बार अदालतों तक भी पहुंचा है. ममता का आरोप है कि विपक्ष को परेशान करने के लिए बेवजह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ईडी, सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल करती है. हालांकि बंगाल में कई मंत्री और नेताओं को सेंट्रल एजेंसियों ने भ्रष्टाचार के आरोपों में न सिर्फ गिरफ्तार किया, बल्कि छापों के दौरान उनके और करीबियों के घरों से भारी नकदी और अकूत संपत्ति के दस्तावेज भी बरामद-जब्त … Read more