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सरकारी लापरवाही: एंबुलेंस नहीं मिली, पति के सामने पत्नी और बच्चे की गई जान

श्रीनगर उत्तराखंड के श्रीनगर में से स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई है। जहां एंबुलेंस नहीं मिलने से सरकारी कर्मचारी की गर्भवती पत्नी की मौत हुई है। साथ ही उसके पेट में ही बच्चे की जान भी गई है। बताया गया कि मृतक का पति ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना में कार्यरत है। इस घटना के बाद एक हंसता-खेलता परिवार उजड़ गया है। मिली जानकारी के अनुसार बुधवार शाम को 31 वर्षीय शिखा पत्नी विनोद घर पर अकेली थी। इस दौरान शिखा की चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग मौके पर पहुंचे। गर्भवती महिला कमरे में लहूलुहान हालत में मिली। स्थानीय लोगों की मदद से महिला को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बागी पहुंचाया गया। जहां गंभीर हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने उसे हायर सेंटर रेफर करने की बात कही। लेकिन, अस्पताल परिसर में खड़ी एंबुलेंस का चालक छुट्टी पर पाया गया। जिसकी वजह से मरीज तड़पती-चिल्लाती रही। करीब दो घंटे तक तड़पने के बाद रात 9 बजे एक 108 एंबुलेंस मौके पर पहुंची। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। श्रीनगर ले जाते समय बीच रास्ते में ही जच्चा और बच्चा दोनों ने दम तोड़ दिया। वहीं, चिकित्सकों का कहना है कि अत्यधिक रक्तस्राव होने के कारण महिला की मौत हुई है। जच्चा-बच्चा दोनों को बचाने की कोशिश की गई थी। लेकिन, कोई सफलता नहीं मिली। इसके बाद उसे हायर सेंटर रेफर कर दिया गया था।  

युद्ध की चेतावनी: ट्रंप के सैन्य कदम पर ईरान ने कहा—पूरी ताकत से जवाब देंगे

नई दिल्ली मिडल ईस्ट इस समय युद्ध की कगार पर खड़ा दिखाई दे रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब खुली सैन्य टकराव की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और देश के भीतर जारी विरोध प्रदर्शनों को लेकर दबाव बढ़ाते हुए युद्धपोतों को ईरान के नजदीक भेजने का फैसला किया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कदम ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाने और तेहरान पर रणनीतिक दबाव बनाने के लिए उठाया गया है। लेकिन ईरान ने इस तैनाती को सीधे युद्ध की धमकी करार देते हुए स्पष्ट किया है कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो वह “पूरी ताकत से” जवाब देगा। ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि किसी भी अमेरिकी हमले से केवल ईरान ही नहीं, बल्कि पूरा मध्य पूर्व युद्ध की आग में झुलस सकता है। तेहरान का कहना है कि वह आत्मरक्षा में न केवल जवाबी कार्रवाई करेगा, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया होगी, जिससे एक चेन रिएक्शन शुरू हो सकता है। इस संकट के बीच तुर्किये मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, जबकि इज़राइल और सऊदी अरब वॉशिंगटन पर दबाव बना रहे हैं कि ईरान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। इज़राइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए खतरा बताता रहा है, वहीं सऊदी अरब भी क्षेत्र में ईरानी प्रभाव को सीमित करना चाहता है। विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में एक भी गलत फैसला या सैन्य चूक पूरे क्षेत्र को पूर्ण पैमाने के युद्ध में धकेल सकती है। पहले से ही गाजा युद्ध, यमन संकट और लेबनान-इज़राइल तनाव से जूझ रहा मध्य पूर्व अब एक और बड़े टकराव की दहलीज पर खड़ा है। ईरान की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि अमेरिका की सैन्य धमकियों का उद्देश्य केवल परमाणु कार्यक्रम नहीं, बल्कि ईरान के भीतर जारी सरकार-विरोधी आंदोलनों को कमजोर करना भी है। हालांकि, तेहरान का दावा है कि वह आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर दबाव झेलने के लिए तैयार है।  

भारत को झटका! किर्गिस्तान ने रोका एनिमल प्रोडक्ट आयात, कहा– जोखिम बेहद गंभीर

किर्गिस्तान किर्गिस्तान ने निपाह वायरस के खतरे के मद्देनजर भारत से जानवरों और पशु उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक और दूसरे सबसे बड़े शहर ओश के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर आने वाले यात्रियों की जांच भी कड़ी कर दी गई है। रूस की समाचार एजेंसी तास के अनुसार, "भारत में फैल रहे निपाह वायरस को देखते हुए बिश्केक और ओश आने वाली सभी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के यात्रियों के लिए सख्त संक्रमण नियंत्रण उपाय लागू किए गए हैं।"   किर्गिस्तान के जल संसाधन, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की प्रेस सेवा ने कहा कि ये कदम भारत में निपाह वायरस के प्रकोप को ध्यान में रखते हुए उठाए गए हैं। बिश्केक के मानस हवाई अड्डे पर आने वाले सभी यात्रियों की विशेष कंप्यूटरों के जरिए तापमान जांच की जा रही है। बुधवार को किर्गिस्तान के अधिकारियों ने भारत से जानवरों और पशु उत्पादों के आयात पर औपचारिक रूप से रोक लगा दी। किर्गिस्तान के मंत्रालय ने यह भी कहा कि निपाह वायरस जानवरों से इंसानों में फैल सकता है। 

राहुल गांधी को नॉर्थ-ईस्ट से दिक्कत क्यों? अमित शाह के सवाल से गरमाई राजनीति, कांग्रेस बैकफुट पर

डिब्रूगढ़ केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने असम में कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखा हमला करते हुए गमछा विवाद को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने पूछा कि जब राहुल गांधी ने गणतंत्र दिवस के दिन राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में असम की पारंपरिक पहचान गमछा नहीं पहना, तो असम कांग्रेस इस पर चुप क्यों है? डिब्रूगढ़ में एक जनसभा को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा, “पूरे कार्यक्रम में केवल राहुल गांधी ही ऐसे नेता थे जिन्होंने नॉर्थ ईस्ट का गमछा नहीं पहना। आखिर उन्हें नॉर्थ ईस्ट से ऐसी क्या दुश्मनी है?” अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने न केवल देश में, बल्कि संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी ये गमछा पहनकर नॉर्थ ईस्ट की संस्कृति का सम्मान किया है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी एक नेता के व्यवहार से नॉर्थ ईस्ट की संस्कृति कमजोर नहीं होगी। उन्होंने कहा, “राहुल गांधी चाहे जो करें, नॉर्थ ईस्ट की संस्कृति हमेशा फलती-फूलती रहेगी।” उन्होंने कहा कि भाजपा इस क्षेत्र की संस्कृति का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगी। क्या है गमछा विवाद? गणतंत्र दिवस के बाद सामने आई तस्वीरों और वीडियो में राहुल गांधी कुछ समय बाद गमछा पहने हुए नजर नहीं आए, जिसके बाद भाजपा नेताओं ने इसे असम और नॉर्थ ईस्ट की संस्कृति का अपमान बताया है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा समेत कई भाजपा नेताओं ने इसे राहुल गांधी की “नॉर्थ ईस्ट विरोधी सोच” करार दिया। कांग्रेस का जवाब कांग्रेस ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राहुल गांधी ने कार्यक्रम की शुरुआत में गमछा (पटका) पहना था और बाद में बैठने के दौरान उसे उतार दिया। पार्टी ने यह भी कहा कि उस समय कई अन्य नेता, जिनमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी शामिल थे, गमछा पहने हुए नहीं दिखे। कांग्रेस ने भाजपा पर चुनिंदा राजनीति करने और एक औपचारिक कार्यक्रम को राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगाया। अवैध घुसपैठ पर भी कांग्रेस को घेरा गमछा विवाद के अलावा अमित शाह ने कांग्रेस पर अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने असम जैसे सीमावर्ती राज्यों में अवैध प्रवासियों को राजनीतिक वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल किया। शाह ने कहा, “अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देकर कांग्रेस ने सिर्फ अपना वोट बैंक मजबूत किया है।” उन्होंने कहा कि राज्य में बनने वाली अगली भाजपा सरकार असम से चुन-चुनकर घुसपैठियों को भगाएगी। डिब्रूगढ़ को दूसरी राजधानी बनाने की सराहना अमित शाह ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि डिब्रूगढ़ को असम की दूसरी राजधानी बनाने का फैसला ऐतिहासिक है। उन्होंने बताया कि यहां 250 एकड़ में नए विधानसभा परिसर की आधारशिला रखी जा चुकी है। शाह का दांव क्या? गमछा को लेकर उठा विवाद अब सांस्कृतिक सम्मान बनाम राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का रूप ले चुका है। भाजपा इसे नॉर्थ ईस्ट की अस्मिता से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस इसे बेवजह का राजनीतिक मुद्दा बता रही है। आने वाले चुनावों के मद्देनज़र यह बहस असम की राजनीति में और तेज होने की संभावना है। दरअसल, अमित शाह और भाजपा चाहती है कि असम में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले गमछा विवाद जोर पकड़े ताकि उनकी पार्टी के लोग असमिया लोगों को यह समझा सकें कि कांग्रेस असम और पूर्वोत्तर की संस्कृति के संरक्षक नहीं है, इसलिए उन्हें आगामी चुनावों में करारी शिकस्त दी जाए। भाजपा की यह रणनीति कांग्रेस को टेंशन दे सकती है। संभव है कि कांग्रेस इसकी काट में असमिया संस्कृति के प्रति अपने लगाव का सार्वजनिक प्रदर्शन भी करे ताकि भाजपा को इस मुद्दे पर माइलेज न मिल सके। इसके अलावा बांग्लादेशी घुसपैठियों का मसला उठाकर भी भाजपा मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की कोशिशों में जुटी है।  

अमेरिका को बड़ा झटका? भारत-चीन-रूस साथ आए, BRICS का डिजिटल भुगतान मॉडल क्या बदल देगा खेल

नई दिल्ली BRICS देशों की मजबूती हमेशा से ही अमेरिका को परेशान करती रही है। भारत, रूस और चीन की अगुवाई वाली इस समूह पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार निशाना साधा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इस समूह का डॉलर को सीधी चुनौती देना। अब ब्रिक्स के सदस्य देश डॉलर का तोड़ लेकर आए हैं जो डोनाल्ड ट्रंप की बेचैनी को और बढ़ा सकती है। BRICS एक डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर काम कर रहा है जिससे भारत, चीन और रूस जैसे देशों की डिजिटल करेंसियों को इंटीग्रेट किया जाएगा। बता दें कि भारत इस साल होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी भी रहा है। इस बीच डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर एक नए डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर चर्चा तेज हो गई है। हाल के दिनों में ब्रिक्स की साझा करेंसी को लेकर भी चर्चाएं हुई थीं, लेकिन अब यह स्पष्ट हो हो गया है कि ये समूह नई करेंसी नहीं, बल्कि एक साझा डिजिटल पेमेंट सिस्टम लाने की तैयारी में है। डिजिटल करेंसी को जोड़ने का प्लान रिपोर्ट के मुताबिक इस सिस्टम में भारत के ई-रुपया, चीन की डिजिटल युआन और रूस की डिजिटल रूबल जैसी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को एक साझा तकनीकी प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा। इसमें हर देश अपनी करेंसी पर पूरा कंट्रोल बनाए रखेगा। बदलाव सिर्फ इतना होगा कि इन करेंसी के जरिए आपसी लेनदेन आसान हो जाएगा। इस सिस्टम के जरिए ब्रिक्स देश आपस में होने वाले व्यापार का भुगतान सीधे अपनी डिजिटल करेंसी में कर सकेंगे। इसके लिए ना तो डॉलर की जरूरत होगी और न ही स्विफ्ट जैसे डॉलर आधारित सिस्टम से होकर भुगतान करना पड़ेगा। भारत की अहम भूमिका भारत इस पूरे मॉडल को आकार देने में अहम भूमिका निभा रहा है। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि करेंसी को मिलाने की बजाय सिस्टम को आपस में जोड़ना बेहतर रास्ता है। इसका आधार भारत का खुद का डिजिटल पेमेंट सिस्टम यूपीआई है, जिसने देश के अंदर डिजिटल पेमेंट को आसान बनाया है। इसके पीछे एक व्यावहारिक वजह भी है। पहले रूस के साथ व्यापार में रुपये में भुगतान हुआ, लेकिन बाद में रूस के पास इतने रुपये जमा हो गए, जिनका वह ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाया। बहुपक्षीय सिस्टम बनने से ऐसी समस्या से बचा जा सकेगा। काम कैसे करेगा ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम? ब्रिक्स डिजिटल पेमेंट सिस्टम दो अहम तकनीकी आधारों पर काम करेगा। पहला है सेटलमेंट साइकिल। इसका मतलब है कि हर लेनदेन का भुगतान तुरंत नहीं किया जाएगा। एक तय अवधि में आयात और निर्यात का हिसाब जोड़ा जाएगा और आखिर में सिर्फ अंतर की रकम का भुगतान होगा। उदाहरण के तौर पर, अगर चीन एक महीने में भारत से 500 अरब रुपये का सामान खरीदता है और भारत चीन से 450 अरब रुपये का सामान लेता है, तो सिर्फ 50 अरब रुपये का ही भुगतान करना होगा। इससे पैसों की जरूरत और ट्रांजेक्शन कॉस्ट दोनों कम होंगी। वहीं दूसरा आधार है फॉरेक्स स्वैप लाइन। अगर किसी देश को अस्थायी रूप से दूसरे देश की करेंसी की ज्यादा जरूरत पड़ती है, तो सेंट्रल बैंक आपस में करेंसी बदलकर संतुलन बना सकते हैं। क्यों डॉलर का विकल्प तलाश रहे देश? ब्रिक्स देश काफी अरसे से इस पर विचार कर रहे हैं। रूस को स्विफ्ट सिस्टम से बाहर करने और उसके 300 अरब डॉलर फ्रीज करने देने के बाद कई देश इसे चेतावनी के तौर पर देख रहे हैं। इससे पहले ईरान, उत्तर कोरिया और क्यूबा पर भी ऐसे कदम उठाए गए थे, लेकिन रूस जैसे बड़े देश के साथ ऐसा होने से डर बढ़ गया। ऐसे में ब्रिक्स का यह डिजिटल पेमेंट सिस्टम एक बैकअप की तरह काम कर सकता है, ताकि किसी संकट की स्थिति में व्यापार ठप न हो।

‘गजनवी भारतीय लुटेरा था’—हामिद अंसारी के विवादित बयान से सियासत गरम, BJP ने कांग्रेस को घेरा

 नई दिल्ली पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के एक बयान ने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है. अंसारी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि इतिहास की किताबों में जिन विदेशी आक्रांताओं और लुटेरों को दिखाया गया है, वे असल में ‘भारतीय लुटेरे’ थे. इस संदर्भ में उन्होंने महमूद गजनवी का भी उदाहरण दिया था, जिसे लेकर खासा विवाद पैदा हुआ है. अंसारी के इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीकी प्रतिक्रिया दी है. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुदांशु त्रिवेदी ने इस बयान को "बीमारी की मानसिकता" करार दिया और कहा कि पूर्व उपराष्ट्रपति का यह वक्तव्य देश के इतिहास और भावनाओं के प्रति अपमान है. उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रांताओं से जुड़ी इस तरह की सोच पूरी देश की बदनामी का कारण बनती है. बीजेपी के अन्य नेताओं ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा. राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अंसारी के कथित बयान का वीडियो साझा करते हुए दावा किया कि कांग्रेस और उसके समर्थक उन आक्रांताओं की महिमा मंडित करते हैं जिन्होंने मंदिरों को नष्ट किया. उन्होंने कहा, "गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को तबाह किया था, फिर भी उसे सराहा जा रहा है." प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करती है और आक्रांताओं के कृत्यों को नजरअंदाज करती है. उन्होंने कांग्रेस को ‘आधुनिक मुस्लिम लीग’ भी कहा. इतिहास को लेकर BJP प्रवक्ता सुदांशु त्रिवेदी ने कहा कि मुगल शासक बगदाद के खलीफा के नाम पर शासन करते थे, जैसे ब्रिटिश वायसराय ब्रिटिश राजाओं के प्रतिनिधि होते थे. उन्होंने इस बयान को देश की भावना के खिलाफ और और भ्रम फैलाने वाला बताया. इस मामले ने राजनीतिक घमासान बीजेपी और कांग्रेस के बीच बढ़ा दी है. दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं और यह विवाद अभी भी जारी है.

‘कोई नया गुट नहीं चाहिए’: तुर्की का पाकिस्तान-सऊदी के ‘इस्लामिक NATO’ संबंध में स्पष्ट

 नई दिल्ली सितंबर 2025 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA) किया. इस समझौते में दोनों देश इस बात पर सहमत हुए कि किसी एक पर हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. पाकिस्तान इस संगठन को इस्लामिक देशों का NATO (North Atlantic Treaty Organization) बनाने की फिराक में है और इसी कड़ी में पाकिस्तान के करीबी दोस्त तुर्की से लगातार बातचीत चल रही है. हाल ही में खबर आई कि तुर्की के इस डिफेंस पैक्ट में शामिल होने को लेकर बातचीत अंतिम चरण में है. लेकिन अब तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान ने कुछ ऐसा कह दिया है जो पाकिस्तान को हजम नहीं होगा. तुर्की के विदेश मंत्री ने कहा कि ऐसे समूह में किसी का वर्चस्व नहीं होना चाहिए बल्कि कोई भी समझौता ज्यादा समावेशी होना चाहिए. उन्होंने कहा कि तुर्की कोई नया गुट नहीं बनाना चाहता. तुर्की के विदेश मंत्री ने यूरोपीय संघ का दिया हवाला तुर्की के विदेश मंत्री ने ये बातें गुरुवार को अल-जजीरा को दिए इंटरव्यू में कही. सऊदी अरब-पाकिस्तान रक्षा समझौते और उसमें तुर्की की संभावित भागीदारी पर सवाल के जवाब में फिदान ने कहा, 'न तुर्की का, न अरब का, न फारसी का, न किसी और का वर्चस्व…किसी का वर्चस्व नहीं चाहिए. क्षेत्रीय देश जिम्मेदारी के साथ एक साथ आ रहे हैं. आप देखिए न कि कैसे यूरोपीय संघ ने जीरो से शुरू करके आज तक खुद को एकसाथ रखा है. हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं?' उन्होंने आगे कहा, 'हम कोई नया गुट नहीं बनाना चाहते. हम क्षेत्रीय एकजुटता का एक मंच बनाना चाहते हैं. ये समूह दो या तीन देशों से शुरू हो सकता लेकिन अगर समय के साथ यह बड़ा ढांचा बनता है तो अच्छा होगा.' उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा का जिम्मा बाहरी देशों के हाथों में नहीं सौंपना चाहिए. कहां तक बढ़ी डिफेंस पैक्ट में तुर्की के शामिल होने की बात सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बने रक्षा गठबंधन में तुर्की के शामिल होने को लेकर हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी. ब्लूमबर्ग ने कुछ दिनों पहले एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें कहा गया था कि इस मुद्दे पर तीनों देशों के बीच बातचीत अंतिम चरण में है. गठबंधन में अगर तुर्की शामिल होता है तो यह ब्लॉक त्रिपक्षीय रूप ले सकता है. इससे पहले समूह में तुर्की के शामिल होने के लेकर पाकिस्तान ने टिप्पणी की थी. पाकिस्तान ने कहा था कि ब्लॉक में किसी भी तीसरे देश को शामिल करने का फैसला पाकिस्तान और सऊदी अरब, दोनों की आपसी सहमति से तय होगा.  

एशिया में शक्ति संतुलन पर US की नजर, भारत-चीन को लेकर होगी खुली सुनवाई

वॉशिंगटन अमेरिका के फेडरल रजिस्टर नोटिस के अनुसार अमेरिकी कांग्रेस का एक एडवाइजरी पैनल अगले महीने सार्वजनिक सुनवाई करने वाला है। इसमें भारत के चीन और अमेरिका के साथ संबंधों और ये संबंध इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन को कैसे आकार देते हैं, इसकी जांच की जाएगी। अमेरिका-चीन आर्थिक एवं सुरक्षा समीक्षा आयोग ने कहा कि यह सुनवाई 17 फरवरी को वॉशिंगटन में होगी। सुनवाई का मुद्दा भारत, चीन और इंडो-पैसिफिक में शक्ति का संतुलन है। नोटिस के मुताबिक, सुनवाई में चीन-अमेरिका दोनों के साथ भारत के रिश्तों से जुड़े भूराजनीतिक और सैन्य मामलों की जांच की जाएगी। इनमें विवादित इलाके को लेकर तनाव, हिंद महासागर में समुद्री पहुंच और एक अहम इंडो-पैसिफिक ताकत के तौर पर भारत की भूमिका शामिल है। आयोग ने कहा कि इस सुनवाई में भारत-चीन संबंधों के आर्थिक और तकनीकी पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाएगा, जिसमें दो एशियाई ताकतों के बीच व्यापार और निवेश संबंध शामिल हैं। इसमें अहम और उभरते तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बनाने की भारत की कोशिशों पर भी ध्यान दिया जाएगा। इन क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और फार्मास्युटिकल सप्लाई चेन शामिल हैं। ये ऐसे सेक्टर्स हैं, जो सभी वैश्विक आर्थिक और सुरक्षा प्रतियोगिताओं के लिए केंद्र बन गए हैं। इसके अलावा, भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए अमेरिका की नीतियों की कोशिशों की समीक्षा भी की जाएगी। आयोग की ओर से साझा जानकारी के अनुसार, वह देखेगा कि आने वाले सालों में अमेरिका की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के लिए चीन के साथ भारत के रिश्ते का क्या मतलब है। इस सार्वजनिक सुनवाई की अध्यक्षता कमिश्नर हैल ब्रांड्स और जोनाथन एन स्टिवर्स मिलकर करेंगे। खासकर इंडो-पैसिफिक में भारत, अमेरिका के लिए एक अहम रणनीतिक साझेदार के तौर पर उभरा है। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ा है और तकनीक और सप्लाई चेन में संबंध गहरे हुए हैं। अमेरिका की नीति बनाने वाले भारत के विकल्प और क्षमता को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी मान रहे हैं। अमेरिकी संसद का भारत पर कितना ध्यान है, यह इस बात से जाहिर है कि आने वाली सुनवाई में किन मुद्दों पर चर्चा हो रही है। अमेरिकी संसद का ध्यान इन बातों पर भी है कि चीन और अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते इंडो-पैसिफिक में भविष्य के शक्ति संतुलन पर कैसे असर डाल सकते हैं।

PM मोदी पर ‘वशीकरण’ वाली बात से सियासत गरम, परमहंस आचार्य के बयान ने मचाई हलचल

नई दिल्ली देश में यूजीसी रूल्स को लेकर बड़ा विवाद था और इस मामले पर गुरुवार को उस वक्त विराम लग गया, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे लगा दिया। इसके साथ ही अदालत ने नियमों को नए सिरे से तैयार करने और उसके लिए एक कमेटी के गठन का आदेश सरकार एवं यूजीसी को दिया है। इस बीच इसे लेकर अयोध्या के परमहंस आचार्य ने बड़ा रोचक दावा किया है, जो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। आचार्य ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम मोदी पर तंत्र-मंत्र कराए थे और उसके असर के चलते ही वह वशीकरण का शिकार हो गए थे। इसी वशीकरण के चलते यूजीसी ने ऐसा नियम बनाया था, लेकिन अब हमने वैदिक मंत्रों से उन्हें मुक्त करा लिया है। मीडिया से बात करते हुए परमहंस आचार्य ने कहा, 'हमें लगा कि आखिर ऐसा कैसे हो गया। इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया कि उनके बढ़ते हुए प्रभाव को देखते हुए जरूर दुनिया ने तंत्र-मंत्र कराकर वशीकरण किया है। इसके बाद जब मैंने ध्यान लगाया तो पता लगा कि डोनाल्ड ट्रंप ने तंत्र-मंत्र कराकर वशीकरण किया था। अब हमने यहां वैदिक मंत्रों का पाठ किया है और अब मोदी जी पर किसी भी तंत्र-मंत्र या वशीकरण का असर नहीं पड़ेगा। अब हम उम्मीद करते हैं कि नरेंद्र मोदी जी ऐसा कोई कानून ना बनाएं, जिससे देश का विकास रुक जाए। उनसे देश को बहुत ज्यादा अपेक्षाएं हैं।' उन्होंने कहा कि फिर से ऐसा कुछ ना हो, इसकी मैं आशा करता हूं। हम लोग अयोध्या से उनकी कुशलता के लिए पूजा पाठ आदि करते रहेंगे। बता दें कि यूजीसी रूल्स को लेकर परमहंस आचार्य भी बेहद आक्रामक थे और सरकार पर हमले कर रहे थे। उन्होंने इन नियमों का विरोध करते हुए कहा था कि या तो इन्हें वापस लिया जाए या फिर उन्हें इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए। UGC रूल्स पर भड़के थे आचार्य परमहंस, मांगी थी इच्छामृत्यु आचार्य का कहना था कि इससे देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो जाएगी। हिंदू इससे बंटेगा भी और कटेगा भी। ऐसे नियम के चलते भाजपा पूरे देश से समाप्त हो जाएगी। उन्होंने कहा था कि मैं नहीं चाहता कि भाजपा हमारे सामने ही देश से खत्म हो जाए। इसलिए ऐसा देखने से पहले ही मैं मर जाना चाहता हूं और पीएम मोदी से मैं इच्छामृत्यु की मांग करता हूं। यूजीसी के इस नए नियम से पूरा देश जलेगा और लोग आपस में लड़ेंगे। उनका कहना था कि हमारी बहन-बेटियों का बलात्कार होगा। परमहंस आचार्य ने कहा कि यदि यह नियम पहले आया होता तो बिहार में भी आप 1000 फीसदी चुनाव हार गए होते। यदि आप इस नियम को वापस नहीं लेंगे तो मैं मर जाऊंगा।  

अलगाववाद का दांव उल्टा पड़ा? खालिस्तान पर नरमी अब कनाडा के लिए बन रही सिरदर्द

ओटावा कनाडा-अमेरिका तनाव के बीच यह कहना गलत नहीं होगा कि नियति का पहिया घूमकर वापस वहीं आ गया है। जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में कनाडा भारत के अलगाववादी तत्वों (खालिस्तान समर्थकों) को पनाह देता रहा है आज वही तर्क उसके अपने सबसे महत्वपूर्ण प्रांत अल्बर्टा के अलगाववादी दे रहे हैं। भारत अक्सर कहता रहा है कि अलगाववाद को हवा देना एक दोधारी तलवार है। दरअसल कनाडा का तेल समृद्ध प्रांत अल्बर्टा देश से अलग होने की मांग कर रहा है। इस आंदोलन का नेतृत्व 'अल्बर्टा प्रोस्पेरिटी प्रोजेक्ट' (APP) नामक समूह कर रहा है। अब इस आग में घी डालने का काम किया है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने।   विवाद की मुख्य वजह- बागियों के साथ गुप्त बैठकें और अरबों का कर्ज सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि अल्बर्टा प्रोस्पेरिटी प्रोजेक्ट के नेताओं ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठकें की हैं। इसके प्रतिनिधियों ने पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी विदेश विभाग के साथ कम से कम तीन बैठकें की हैं। फरवरी 2026 में एक और महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें अमेरिकी वित्त विभाग के शामिल होने की खबर है। अल्बर्टा प्रोस्पेरिटी प्रोजेक्ट ने अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर की ऋण सुविधा मांगी है ताकि आजादी के पहले दिन से ही अर्थव्यवस्था को संभाला जा सके। कनाडा के लिए क्या है अल्बर्टा का महत्व? अल्बर्टा कनाडा का सबसे अमीर प्रांत है और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कनाडा के कुल प्रमाणित तेल भंडार का 90% और वर्तमान उत्पादन का 80% हिस्सा इसी प्रांत से आता है। अलगाववादी समूह का तर्क है कि वे केंद्र सरकार की ऊर्जा नीतियों और भारी टैक्स से परेशान हैं। वे ब्रिटिश कोलंबिया और ओटावा की मंजूरी के बिना अमेरिका के माध्यम से नए पाइपलाइन रास्ते बनाने पर भी चर्चा कर रहे हैं। क्या रही अब तक की कूटनीतिक प्रतिक्रिया? इस खबर के बाहर आते ही कनाडा के भीतर गुस्से की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने सार्वजनिक रूप से अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिकी प्रशासन कनाडा की संप्रभुता का सम्मान करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे राष्ट्रपति ट्रंप के साथ अपनी हर बातचीत में इस बात को मजबूती से रखते हैं। हालांकि, उन्होंने इन बैठकों को सीधे तौर पर राजद्रोह कहने से परहेज किया, ताकि तनाव और न बढ़े। ब्रिटिश कोलंबिया के प्रीमियर (मुख्यमंत्री) डेविड ईबी ने इसे राजद्रोह करार दिया है। ओंटारियो के सीएम डग फोर्ड ने इसे अनैतिक बताते हुए अल्बर्टा की वर्तमान प्रीमियर डेनियल स्मिथ से इस आंदोलन की निंदा करने को कहा है। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इसे सामान्य मुलाकात बताया है, लेकिन अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट द्वारा अल्बर्टा को एक स्वाभाविक भागीदार कहना ओटावा के लिए चिंता का विषय बन गया है। अमेरिका में 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' यानी ट्रंप समर्थक इस स्थिति का मजा ले रहे हैं। कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स तो मजाक में कनाडा के प्रांतों के अमेरिका में विलय की खुलकर बात कर रहे हैं। कनाडा के प्रमुख अखबारों में क्या लिखा? अखबारों ने इसे कनाडा की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक वेक-अप कॉल बताया है। द ग्लोब एंड मेल के संपादकीय में तर्क दिया गया है कि विदेशी ताकतों (विशेषकर अमेरिका के MAGA गुट) का समर्थन अलगाववाद की आग में घी डालने जैसा है। ओटावा को अल्बर्टा की वास्तविक आर्थिक शिकायतों को दूर करना होगा, वरना बाहरी हस्तक्षेप की गुंजाइश बनी रहेगी। नेशनल पोस्ट अखबार का झुकाव अक्सर कंजर्वेटिव विचारों की ओर रहता है, लेकिन इसने भी विदेशी सहायता मांगने की निंदा की है। इसने $500 बिलियन की क्रेडिट लाइन की मांग को हास्यास्पद और अवास्तविक बताया गया है। अखबार के मुताबिक, अल्बर्टा का मुद्दा पूरी तरह से घरेलू है और इसमें वाशिंगटन को शामिल करना कनाडा के संघीय ढांचे के साथ खिलवाड़ है। दूसरों के मामलों में डबल स्टैंडर्ड अपनाता रहा है कनाडा कनाडा ने हमेशा भारत की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों को सिख डायस्पोरा की चिंता बताकर नजरअंदाज किया। लेकिन जब बात अल्बर्टा की आई, तो ओटावा की भाषा रातों-रात बदल गई। भारत जब कनाडा में खालिस्तानी गतिविधियों पर चिंता जताता था, तो ओटावा इसे 'घरेलू राजनीति' कहता था। लेकिन अब जब अल्बर्टा के नेता अमेरिका जाकर मदद मांग रहे हैं, तो कनाडा के नेता इसे राजद्रोह और विदेशी हस्तक्षेप करार दे रहे हैं। खालिस्तानी उग्रवाद पर नरम रहने वाले कनाडाई राजनेता अब अल्बर्टा के अल्बर्टा प्रोस्पेरिटी प्रोजेक्ट को देश की एकता के लिए खतरा बता रहे हैं। जिस तरह खालिस्तानी समर्थक कनाडा की धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करते हैं, वैसे ही अल्बर्टा के अलगाववादी अब अमेरिकी धरती का इस्तेमाल कनाडा के खिलाफ वित्तीय सहायता और मान्यता प्राप्त करने के लिए कर रहे हैं। अल्बर्टा का अलग होना कनाडा के लिए आर्थिक आत्महत्या जैसा होगा, क्योंकि कनाडा की तेल संपदा का केंद्र यही प्रांत है।