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राज्यसभा में भाजपा की नई स्थिति क्या है, दो-तिहाई बहुमत से NDA कितनी दूर?

नई दिल्ली राज्यसभा में NDA अब ताकतवर नजर आ रही है। हालांकि, अब भी सत्तारूढ़ गठबंधन दो तिहाई बहुमत से दूर है, लेकिन ताजा चुनाव नतीजों ने सीटों की संख्या में खासा इजाफा कर दिया है। 18 जून तक 10 राज्यों की 27 सीटों पर चुनाव हुए थे। वहीं, हाल ही में तृणमूल कांग्रेस सांसदों के इस्तीफे के बाद कहा जा रहा है कि एनडीए का आंकड़ा और बढ़ सकता है। NDA किसकी ताकत कितनी उच्च सदन में एनडीए का सबसे बड़ा दल भाजपा है। वहीं, गठबंधन अब 152 सीटों पर पहुंच गया है। सबसे पहले 24 सीटों पर जब सांसद निर्विरोध चुने गए, तो उनमें 19 एनडीए के थे। वही, गुरुवार को झारखंड में परिमल नथवानी की जीत ने एनडीए सांसदों की संख्या 20 पर पहुंचा दी है। खास बात है कि अब गठबंधन दो तिहाई बहुमत से महज 11 सीटें दूर है। बहुमत मिलने के आसार, पर कैसे? दरअसल, हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के 4 राज्यसभा सांसदों ने इस्तीफा दिया है। इनमें सुष्मिता देव, प्रकाश बरिक, सुखेंदु शेखर रे और कोयल मलिक का नाम शामिल है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत के बाद कहा जा रहा है कि इन सभी सीटों पर भाजपा आसानी से जीत दर्ज कर सकती है। अटकलें ये भी हैं कि आने वाले दिनों में कुछ और सांसद भी इस्तीफा दे सकते हैं। वहीं, राज्यसभा में बीजू जनता दल के 5 और YSRCP के 7 सांसद हैं। खास बात है कि ये दोनों ही दल किसी गठबंधन में शामिल नहीं हैं और कई मौकों पर एनडीए का साथ देते रहे हैं। हालांकि, ओडिशा विधानसभा चुनाव के बाद बीजद और भाजपा के समीकरणों में कुछ बदलाव देखा जा रहा है। क्यों जरूरी है दो तिहाई बहुमत संसद में संविधान संशोधन संबंधी विधेयकों को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। अब जब एनडीए यह आंकड़ा हासिल कर लेती है, तो परिसीमन से जुड़े बिल को लेकर राह आसान हो जाएगी। कहा जा रहा है कि सरकार आगामी मॉनसून सत्र के दौरान ही यह बिल दोबारा पेश कर सकती है। फिलहाल, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। विपक्ष के आंकड़े विपक्षी इंडिया गठबंधन के पास अभी 64 सांसद हैं। आठ सांसदों वाली डीएमके और तीन सांसदों वाली आप इस समूह से अलग हो गई हैं। लोकसभा में एनडीए की संख्या 300 पार जा सकती है, क्योंकि टीएमसी के लगभग 20 और सांसद एक अलग समूह बनाकर उसका समर्थन कर सकते हैं। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत पाने के लिए 363 सांसदों की जरूरत होती है। इधर, शिवसेना यूबीटी के बागी भी उनके साथ जा सकते हैं।

RJD-माले के बाद हेमंत सोरेन का अलग रुख, परिमल नथवानी की जीत ने INDIA गठबंधन की केमिस्ट्री बिगाड़ी

रांची  झारखंड की दो राज्यसभा सीटों पर हुए चुनाव में 'इंडिया ब्लॉक' की कलाई खुल गई. इंडिया ब्लॉक के पास पूरे वोट होने के बाद भी कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को करारी मात खानी पड़ी है. वहीं, नंबर गेम में कमजोर होने के बाद भी बीजेपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी राज्यसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहे।  राज्यसभा चुनाव के नतीजे सिर्फ दो सांसदों के चुनाव का परिणाम नहीं है. ये विधानसभा के भीतर राजनीतिक रिश्तों, गठबंधन प्रबंधन, भरोसे और रणनीतिक कौशल की भी परीक्षा थी. 56 विधायकों के साथ इंडिया ब्लॉक के पास राज्यसभा की दोनों सीटें जीतने के लिए जरूरी संख्या मौजूद थी, लेकिन उसके बाद भी एक ही सीट जीत सकी और एक पर हार का सामना करना पड़ा है।  झारखंड में इंडिया ब्लॉक का जेएमएम, कांग्रेस, आरजेडी, माले और लेफ्ट हिस्सा है और सत्ता में भी है. कांग्रेस ने अपने इन्हीं सहयोगियों के सहारे राज्यसभा चुनाव जीतने का तानाबाना बुना था, पर आरजेडी और माले ही नहीं बल्कि हेमंत सोरेन की पार्टी जेएमएम ने खेला कर दिया.  झारखंड में इंडिया गठबंधन कहीं अब टूट न जाए?  झारखंड में जेएमएम और नथवानी जीते झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में उतरे थे. जेएमएम से बैजनाथ राम और कांग्रेस से प्रणव झा तो निर्दलीय तौर पर परिमल नथवानी उम्मीदवार थे. नथवानी को बीजेपी सहित एनडीए का समर्थन था. 56 विधायकों के साथ इंडिया गठबंधन के पास दोनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त संख्या थी जबकि एनडीए के 24 विधायकों के साथ नथवानी को चार विधायकों के वोट की अतरिक्त जुगाड़ थी।  मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर विधायकों की बैठकें हुईं, मॉक पोल कराया गया, विधायकों को मतदान की तकनीकी भी सिखाई गई और सार्वजनिक रूप से एकजुटता का दावा किया गया, लेकिन नतीजों ने इन सारे दावे को पोल खोल दी. इंडिया ब्लॉक के विधायकों की क्रॉस वोटिंग के चलते कांग्रेस के प्रणव झा को मात खाना पड़ा. राज्यसभा चुनाव में जेएमएम प्रत्याशी बैजनाथ राम और बीजेपी समर्थित परिमल नथवानी जीतने में कामयाब रहे।  मंत्री का ओवर कॉन्फिडेंस वोटिंग के बाद झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी पूरी तरह कॉन्फिडेंट थे कि एक सीट तो कांग्रेस उम्मीदवार को ही मिलेगी. एनडीटीवी के रिपोर्टर ने जब इरफान अंसारी से कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की जीत वाले उनके दावे को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वे कभी गलत नहीं बोलते. रिजल्ट आने में अब कितने ही घंटे ही बचे हैं. कांग्रेस जीत जाएगी उसके बाद आप खुद हमारे उम्मीदवार से मिल लेना।  60 वोट तक का आंकड़ा पार कर लिया मंत्री इरफान अंसारी ने कहा कि वोटिंग हो चुकी है. हम लोग 61 वोटों तक जा रहे थे, हमें लगता है कि हमने 60 वोट तक का आंकड़ा पार कर लिया है. बीजेपी के हताश और निराश लोग यहां से निकल गए, क्यों कि बीजेपी यहां कहीं भी नहीं है. लेकिन इसके बाद भी बीजेपी ने हमको बहुत तंग किया. वोटिंग का  परिणाम इरफान अंसारी की सोच के एकदम उलट आया. चुनाव के नतीजों ने पार्टी ही नहीं सभी को चौंका दिया।  कांग्रेस को आरजेडी और माले का धोखा राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की हार ने इंडिया ब्लॉक की कलाई खोलकर रख दी है. क्या इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों ने वास्तव में कांग्रेस का साथ नहीं दिया? वहीं, अगर सहयोगियों ने साथ दिया तो फिर वोट कहां गए? झारखंड कांग्रेस के प्रभारी के राजू कहते हैं कि आरजेडी और माले के व‍िधायकों ने हमारे साथ धोखा कर द‍िया. उन्‍होंने हमारे कैंड‍िडेट को वोट नहीं दिया।  के राजू कहते हैं कि कांग्रेस के सभी 16 विधायोंके वोट सुरक्षित रहे, जेएमएम ने 4 वोट दिए और कांग्रेस को कुल 20 वोट मिले. यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि निर्दलीय उम्मीदवार ने पैसे का इस्तेमाल किया. हमारे गठबंधन के साथियों ने साथ नहीं दिया. इंड‍िया अलायंस के सभी सहयोगी पूरी मजबूती के साथ साथ खड़े रहते, तो परिणाम अलग हो सकता था।    कांग्रेस के दावे को मानें तो उसके 16 विधायक एकजुट रहे और जेएमएम के अतिरिक्त वोट भी उसे मिले हैं. कांग्रेस विधायक दीपिका पांडेय सिंह ने भी प्रणव झा की हार के लिए आरजेडी और माले को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि महागठबंधन की मजबूती का दावा करने वाले सहयोगी दलों को अपने रुख को स्पष्ट करना चाहिए. ऐसे में सवाल राजद और माले पर जाता है।  क्या सोरेन ने भी कांग्रेस के साथ खेला किया  झारखंड विधानसभा का गण‍ित देखें तो 81 सीटों वाले सदन में  जेएमएम के 34, कांग्रेस के 16, आरजेडी के 4 और लेफ्ट के दो विधायक हैं. इस तरह कुल 56 वोट इंडिया ब्लॉक के बनते हैं, जिसमें जेएमएम की जीत के बाद भी कांग्रेस को 20 वोट ही मिले हैं. कांग्रेस और माले के विधायक को मिलाकर तो 6 वोट बनते हैं, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को 8 वोट कम मिले है।  हेमंत सोरेन की पार्टी के उम्मीदवार 28 वोट से जीत सकते थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें 30 वोट सिक्योर किया. इस तरह से दो वोट ज्यादा रखा, जिसका नतीजा रहा कि कांग्रेस के वोट कम हो गए. आरजेडी और माले का वोट कांग्रेस को मिल भी जाता तो हार तय थी।  इंडिया गठबंधन के पास 56 का आंकड़ा था, तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा के जीत का वोट का ख्याल क्यों नहीं रखा फैक्ट यह है कि जीत के लिए 28 वोट चाहिए थे, लेकिन सोरेन ने अपने उम्मीदवार बैजनाथ राम के लिए 30 वोट सुरक्षित कर लिए. झामुमो ने जरूरत से 4 वोट ज्‍यादा लिए, जबकि कांग्रेस सिर्फ 20 वोटों पर सिमट गई. ऐसे में साफ है कि कांग्रेस की हार में जेएमएम भी कहीं न कहीं गेम कर गई है।  क्या झारखंड में टूट जाएगा गठबंधन  कांग्रेस जहां हार के लिए आरजेडी और माले को जिम्मेदार ठहरा रही है तो दूसरी ओर आरजेडी-माले का कहना है कि उन्होंने गठबंधन धर्म निभाया और कांग्रेस को अपने भीतर झांकना चाहिए. ऐसे में सच्चाई जो भी हो, लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि महागठबंधन में समन्वय नहीं था. यही कारण है कि परिणाम आने के बाद आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए।  राजनीति में हमेंशा परिणाम ही सबसे बड़ा प्रमाण माना … Read more

6 बागी सांसदों को Y+ सिक्योरिटी मिलने पर भड़की शिवसेना UBT, उद्धव समर्थक सड़कों पर उतरे

मुंबई  महाराष्ट्र गृह मंत्रालय ने उद्धव ठाकरे गुट के छह बागी सांसदों को वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा देने का निर्देश दिया है. यह आदेश महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक को जारी किया गया है. यह फैसला इन सांसदों के खिलाफ बढ़ते सुरक्षा खतरों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है. हाल ही में, इन सांसदों ने शिवसेना (यूबीटी) की संसदीय दल की बैठक में भाग नहीं लिया था, जिसके बाद संजय राउत ने उन्हें “गद्दार” और “धोखेबाज” करार दिया था।  सदस्यता रद्द करने की मांग करेंगे- अरविंद सावंत उद्धव ठाकरे गुट के छह बागी सांसद पार्टी की संसदीय दल की बैठक में शामिल नहीं हुए. इस पर लोकसभा में पार्टी के नेता अरविंद सावंत ने कहा कि सांसदों से पूछा जाएगा कि व्हिप जारी किए जाने के बावजूद वे बैठक में शामिल क्यों नहीं हुए. उन्हें जवाब देने के लिए सात दिन का समय दिया जाएगा. यदि वे जवाब नहीं देते हैं तो हम उनकी सदस्यता रद्द किए जाने की मांग को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखेंगे। संजय राउत भी आ जाएं- अठावले संजय राउत ने आरोप लगाया कि सांसदों को पाला बदलने के लिए 50-50 करोड़ रुपये दिए गए. इस पर रामदास अठावले ने कहा कि इतने पैसों की बात कर रहे हैं तो मैं उनसे कहूंगा कि आप भी आ जाइए. अठावले ने कहा कि पैसा देने जैसी कोई बात नहीं है. उन्होंने कहा कि ये झूठे आरोप हैं. उद्धव ठाकरे अगर हमारे साथ रहते तो ये नौबत नहीं आती. केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जो लोग आए हैं उनका शिंदे पर भरोसा है. अगर संजय राउत आरोप लगा रहे हैं तो वो इसे साबित करें कि पैसे कहां से आए।  17 जून 2026 को जारी इस मैसेज में महाराष्ट्र के विभिन्न पुलिस और खुफिया अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि हालिया संभावित सुरक्षा खतरों को देखते हुए संबंधित सांसदों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए।  आदेश में कहा गया है कि संबंधित जिला और पुलिस इकाइयां स्थानीय परिस्थितियों और खतरे के आकलन के आधार पर इन सांसदों को सुरक्षा मुहैया कराएं. इसके साथ ही, जिला स्तरीय सुरक्षा समीक्षा समितियों को उनकी सुरक्षा बढ़ाने, घटाने या यथावत रखने पर फैसला लेने को भी कहा गया है।  किन सांसदों को मिली सुरक्षा? जारी किए गए डॉक्यूमेंट में जिन सांसदों के नाम शामिल हैं, उनमें यवतमाल के सांसद संजय देशमुख, परभणी के सांसद संजय जाधव, मुंबई उत्तर-पूर्व के सांसद संजय दीना पाटिल, हिंगोली के सांसद नागेश पाटिल अष्टिकार, धाराशिव के सांसद ओमराजे निंबालकर और शिरडी के सांसद भाऊसाहेब वाघचौरे शामिल हैं।  जारी किए गए मैसेज में यह भी निर्देश दिया गया है कि जब ये सांसद अपने-अपने क्षेत्रों में दौरा करें या सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लें, तब स्थानीय पुलिस अतिरिक्त एहतियाती कदम उठाए, जिससे किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके।  यह घटनाक्रम ऐसे वक्त में सामने आया है, जब शिवसेना (UBT) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट के संपर्क में होने और पार्टी से अलग होने की अटकलें तेज हैं. ऐसे में इन सांसदों की सुरक्षा बढ़ाए जाने को राजनीतिक हलकों में काफी अहम माना जा रहा है।       

बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर, हाई कोर्ट के फैसले के बाद ऋतब्रत को मिली नई जिम्मेदारी

कलकत्ता विधानसभा से लेकर संसद तक बगावत झेल रहीं ममता बनर्जी को अब हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने टीएमसी से बागी हुए विधायक ऋतब्रत बनर्जी के विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इससे पहले पार्टी ने यहां विधानसभा स्पीकर रथेंद्र बोस के इस फैसले को चुनौती दी थी। ममता खेमे के विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने इस सिलसिले में कलकत्ता हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने कोई भी अंतरिम आदेश पास करने से इनकार कर दिया है. हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार स्पीकर का फैसला बरकरार रहेगा. तृणमूल कांग्रेस के नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने नेता प्रतिपक्ष के तौर पर टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी की नियुक्ति को चुनौती दी है।   टीएमसी की तरफ से दो नाम नेता प्रतिपक्ष के लिए गए थे. शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम का प्रस्ताव टीएमसी नेतृत्व के गुट की तरफ से भेजा गया, जबकि पार्टी के बागी विधायकों के गुट ने ऋतब्रत बनर्जी का नाम भेजा, जिसे पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथींद्र बसु ने स्वीकार किया और उन्हें नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर दिया।  कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार (18 जून, 2026) को शोभनदेब चट्टोपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह स्पीकर के फैसले पर कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं कर रहा है. जस्टिस कृष्ण राव ने सभी पक्षों को विरोध में हलफनामा दाखिल करने और दो हफ्ते में जवाब देने का निर्देश दिया है. अब अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी।  टीएमसी सांसद और सीनियर एडवोकेट कल्याण बनर्जी ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर कहा कि कोर्ट ने कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया है, लेकिन याचिका स्वीकार कर ली है. अब इस मामले में फाइनल हियरिंग होगी।  मंगलवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्ण राव ने पूछा था कि अगर एक ही राजनीतिक दल की तरफ से दो अलग-अलग नामों का प्रस्ताव भेजा जाए, तब अध्यक्ष का कर्तव्य क्या होगा, क्या वह स्वत: संज्ञान लेते हुए फैसला ले सकते हैं या फिर दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक होगा. इस पर अध्यक्ष के लिए पेश एडवोकेट बिल्वदल भट्टाचार्य ने दलील दी कि पश्चिम बंगाल विधानसभा परिलब्धियां अधिनियम, 1937 के अनुसार नेता प्रतिपक्ष वही सदस्य होता है जिसे सदन में सबसे अधिक संख्या वाले विपक्षी दल के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त हो।  उन्होंने यह भी कहा था कि अगर किसी दल का संख्याबल या उसके नेता को लेकर कोई विवाद होता है, तो उस मामले में अध्यक्ष का फैसला अंतिम और निर्णायक होगा. उधर, विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर का मामला भी चर्चा में है, जो नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से ही जुड़ा है. आरोप है कि टीएमसी सांसद और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी की तरफ से नेता प्रतिपक्ष के लिए भेजे गए शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम के प्रस्ताव पर विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी हैं।  इसे लेकर सबसे पहले ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने ही सवाल उठाए और शिकायत की, जिसके बाद मामला गरमा गया. विधायकों की शिकायत के बाद विधानसभा सचिव ने एफआईआर दर्ज कराई, जिसके बाद पश्चिम बंगाल क्राइम इंवेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) ने मामले की औपचारिक जांच शुरू की. जिन विधायकों के नाम विवादित दस्तावेजों पर हैं, उनके बयान दर्ज किए जा रहे हैं और हस्ताक्षरों के नमूने भी लिए जा रहे हैं। 

समाजवादी पार्टी पर राजभर का बड़ा हमला, बोले- जल्द होगा बड़ा विभाजन, कई नेता छोड़ेंगे साथ

लखनऊ यूपी में पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने बड़ा सियासी दावा किया है कि समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट होने वाली है. राम गोपाल यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी को चिट्ठी सौंपी है. खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट घोटाला का मास्टरमाइंड कौन है, पूरा उत्तर प्रदेश जानता है. शिकंजा कस रहा है तो सपा परेशान है.राजभर का कहना है कि महाराष्ट्र, बंगाल छोड़िए, समूची सपा भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है. बंगाल में टीएमसी के 20 सांसद बगावत कर चुके हैं. जबकि महाराष्ट्र में शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट के 9 में से 6 सांसद टूटने के कयास लगाए जा रहे हैं। महाराष्ट्र और बंगाल में बड़ी बगावत दो दलों में देखने को मिल रही है।  योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि आने वाले समय में समाजवादी पार्टी (सपा) को बड़ा झटका लगेगा. राजभर ने यहां तक कह दिया कि महाराष्ट्र और बंगाल छोड़िए, पूरी समाजवादी पार्टी भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है।  राजभर का यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो रही है. सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटे हैं. ऐसे माहौल में राजभर का यह दावा राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।  सपा पर क्यों साधा निशाना ? ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व पर हमला बोलते हुए कहा कि जैसे-जैसे विभिन्न मामलों में जांच एजेंसियों का शिकंजा कस रहा है, वैसे-वैसे सपा नेताओं की बेचैनी बढ़ती जा रही है. उन्होंने कहा कि खनन घोटाले और गोमती रिवर फ्रंट परियोजना से जुड़े मामलों को लेकर पूरा उत्तर प्रदेश जानता है कि इन प्रकरणों में कौन लोग चर्चा के केंद्र में रहे हैं. राजभर के मुताबिक, जब जांच आगे बढ़ती है तो कुछ लोगों की परेशानी भी बढ़ती है. हालांकि उन्होंने अपने बयान में किसी नए साक्ष्य या संभावित दल-बदल करने वाले नेताओं का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका दावा बड़ा माना जा रहा है. राजभर ने अपने बयान में सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि रामगोपाल यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखा है।   पहले भी अखिलेश यादव पर हमलावर रहे हैं राजभर यह पहली बार नहीं है जब ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला हो. पिछले कुछ समय से दोनों नेताओं के बीच बयानबाजी लगातार तेज होती गई है. हाल ही में राजभर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अखिलेश यादव को संबोधित करते हुए लंबी पोस्ट लिखी थी, जिसने राजनीतिक हलकों में काफी सुर्खियां बटोरी थीं. उस पोस्ट में राजभर ने अखिलेश यादव के विदेश दौरे को निशाने पर लिया था. उन्होंने तंज कसते हुए कहा था कि अगर घूमने ही जाना था तो लंदन और पेरिस की जगह काशी, अयोध्या, मथुरा, नैमिषारण्य या मां विंध्यवासिनी धाम चले जाते।  राजभर ने अपनी पोस्ट में लिखा था कि यदि अखिलेश प्रदेश के धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर जाते तो स्थानीय व्यापारियों को रोजगार मिलता. फूल बेचने वाले, मिठाई विक्रेता, छोटे होटल कारोबारी और परिवहन से जुड़े लोगों को भी लाभ होता. उन्होंने कहा था कि ऐसे दौरों से उत्तर प्रदेश के पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता और देश-दुनिया में सकारात्मक संदेश जाता. राजभर ने व्यंग्यात्मक अंदाज में यह भी कहा कि शायद अब अखिलेश यादव को लंदन और पेरिस ज्यादा पसंद आने लगे हैं और उन्हें विदेशी पर्यटन स्थलों पर जाना ज्यादा अच्छा लगता है।  नया भारत और नया उत्तर प्रदेश देखिए अपनी पोस्ट में राजभर ने अखिलेश यादव को सलाह भी दी थी कि उन्हें देश और उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थलों का भ्रमण करना चाहिए. उन्होंने लिखा था कि अब देश बदल चुका है और नया भारत तथा नया उत्तर प्रदेश विकास के नए मानक स्थापित कर रहा है. काशी से अयोध्या, मथुरा से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों तक पर्यटन और बुनियादी सुविधाओं में बड़ा बदलाव आया है. राजभर ने कहा था कि अपने देश की सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक स्थलों और ऐतिहासिक धरोहरों को देखने में एक जिंदगी भी कम पड़ सकती है। 

शिवसेना (UBT) में बड़ी टूट, 6 सांसदों ने चुनी अलग राह; राउत की प्रेस कॉन्फ्रेंस से बढ़ा सियासी घमासान

 मुंबई महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर से उद्धव ठाकरे को बड़ा सियासी झटका लगा है. शिवसेना (यूबीटी) के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर अलग अपना गुट बनाने का फैसला किया है. शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें अलग समूह माना जाए।  शिवसेना (यूबीटी) के जिन सांसदों ने स्पीकर को पत्र लिखा है, उसमें संजय जाधव , संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टिकर , ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय दीना पाटिल शामिल हैं। वहीं, शिवेसना (यूबीटी) के टिकट पर जीतकर आए 9 सांसदों में से छह सांसद एक साथ आए गए हैं तो तीन सांसद अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ खड़े हैं।  महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के 9 में से 6 सांसदों ने बगावत कर दी है। सूत्रों के अनुसार, छह सांसदों ने शिंदे गुट की शिवसेना में विलय के लिए बुधवार सुबह 9:30 बजे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को चिट्ठी भेजी है। सूत्रों के अनुसार, चिट्ठी भेजने वाले सांसदों में नागेश पाटिल आष्टीकर और संजय दीना पाटिल का नाम शामिल है। संजय दीना पाटिल ने पार्टी छोड़ने की अटकलों को खारिज किया था। उन्होंने कहा- मैं उद्धव ठाकरे की पार्टी का सांसद हूं और इसी पार्टी में रहूंगा। इधर, शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बागी सांसदों को गाली दी। राउत ने गाली देते हुए कहा- ये बेईमान लोग हैं। बेईमानी उनके खून में हैं। बाद में मीडिया से उन्होंने कहा- मराठी में ऐसे शब्द आम बोलचाल का हिस्सा हैं। उद्धव और अन्य पार्टी लीडर्स अपने सांसदों से लगातार संपर्क करने और उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है। पार्टी ने गुरुवार को दिल्ली में संसदीय समिति की बैठक बुलाई है। न्यूज एजेंसी PTI के अनुसार, पार्टी ने सभी सांसदों को व्हिप जारी कर बैठक में अनिवार्य रूप से शामिल होने का निर्देश दिया है। जो सांसद बैठक में नहीं आएंगे, पार्टी उनके खिलाफ डिस्क्वालिफिकेशन की कार्रवाई कर सकती है। उद्धव के सांसद एकनाथ शिंदे के साथ महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे के साथ खेला हो गया है. शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसदों ने बुधवार सुबह साढ़े 9 बजे स्पीकर को पत्र देकर एकनाथ शिंदे की पार्टी में विलय करने की मांग की है. उद्धव के 6 सांसदों ने अपना गुट बनाकर शिवसेना में विलय कर दिया है।  उद्धव की पार्टी के 6 बागी सांसद बुधवार सुबह  नांदेड़, पुणे और मुंबई से प्राइवेट प्लेन से दिल्ली पहुंचे. इस दौरान उनके साथ में एकनाथ शिंदे की शिवसेना के एक सीनियर नेता मौजूद थे, जिनके साथ दिल्ली आए और स्पीकर को अपने समर्थन का पत्र सौंपा है।  उद्धव के साथ सिर्फ 3 सांसद ही बचे यूबीटी में बगावत की अटकलों के बीच दिल्ली में संजय राउत के आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में अरविंद सावंत और चीफ व्हिप अनिल देसाई और नासिक के सांसद राजाभाऊ मौजूद थे. इस तरह शिवेसना (यूटीबी) के 9 में से 3 लोकसभा सांसद ही पहुंचे थे, 6 सांसद नहीं थे. इसके मतलब साफ है कि उद्धव की पार्टी में टूट का खतरा बना हुई है।  वहीं, शिवेसना (यूबीटी) के टिकट पर जीतकर आए 9 सांसदों में से छह सांसद एक साथ आए गए हैं तो तीन सांसद अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ खड़े हैं. उन्होंने कहा था कि सभी 9 सासंद हमारी पार्टी के टिकट पर जीतकर आए हैं. उद्धव ठाकरे ने उन्हें जिताने के लिए दिन-रात एक कर दिया. हमने उन्हें जितना हो सका, संसाधन दिए।  राउत ने कहा कि हमारे सांसद शिवसेना के चुनाव चिह्न मशाल पर चुने गए थे, जिसके नेता उद्धव ठाकरे हैं. वे पीएम मोदी के नाम पर नहीं जीते हैं. ऐसे में अगर अब कोई पाला बदलता है, तो हम किसी को नहीं छोड़ेंगे, अगर जिन्हें जाना है, वो इस्तीफा देकर जा सकते हैं. इससे साफ है कि उद्धव की पार्टी में टूट का खतरा टला नहीं है। 

काकोली घोष दस्तीदार का बड़ा राजनीतिक कदम, NCPI की कमान संभाली; NDA में एंट्री की तैयारी

कोलकाता तृणमूल कांग्रेस (TMC) से बगावत करने वाले सांसदों ने दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए एक बड़ा 'मास्टरस्ट्रोक' चला है। 20 बागी टीएमसी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय कर लिया है और अब इस पार्टी की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में ले ली है। कभी टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की बेहद करीबी मानी जाने वालीं और इस बगावत का प्रमुख चेहरा बनीं काकोली घोष दस्तीदार को NCPI का नया अध्यक्ष चुन लिया गया है। कैसे हुआ यह 'तख्तापलट'? सूत्रों के मुताबिक, बागी गुट और NCPI के बीच एक आपसी सहमति से यह टेकओवर हुआ है। काकोली घोष की ताजपोशी से ठीक दो दिन पहले NCPI की तत्कालीन अध्यक्ष शेवली कुंडू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद 30 मई को चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार को आधिकारिक तौर पर इस पार्टी (NCPI) का अध्यक्ष चुन लिया गया। रविवार को 20 बागी सांसदों के गुट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और उन्हें इस अनजान पार्टी के साथ अपने विलय की आधिकारिक जानकारी दी, जिसके बाद से यह पार्टी रातों-रात राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई है। अभिषेक बनर्जी से नाराजगी बनी बगावत की वजह टीएमसी के भीतर मचे इस घमासान की असल जड़ ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के अघोषित उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी को माना जा रहा है। बागी सांसदों का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी का रवैया बेहद 'अहंकारी' है और उन्होंने पार्टी के आंतरिक ढांचे को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है। इसी कथित मनमानी के चलते सांसदों में गुस्सा पनपा, जो अंततः इस बड़ी बगावत में तब्दील हो गया। बीजेपी नेताओं का मिला परदे के पीछे से साथ इस पूरे घटनाक्रम में बीजेपी आधिकारिक तौर पर तो कुछ नहीं कह रही है, लेकिन बागी सांसदों को उसका पूरा सहयोग मिला है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और अनुभवी सांसद निशिकांत दुबे ने बागी गुट के साथ लगातार चर्चा कर उनकी आगे की रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाई। बागी सांसदों की कई अहम बैठकें सीधे केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर ही हुईं। NDA में शामिल होने की अपील रविवार को स्पीकर ओम बिरला को दिए गए विलय के पत्र में इन 20 सांसदों ने खुद को बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA का हिस्सा बताया है। उन्होंने मांग की है कि चूंकि अब तक वे टीएमसी के साथ विपक्ष में बैठते थे, इसलिए अब उन्हें सत्ताधारी गठबंधन (NDA) के साथ सीटें आवंटित की जाएं। क्या है NCPI (नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया)? NCPI को जनवरी 2023 में एक राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता मिली थी। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में इसका पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल का है। यह पार्टी चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड 2000 से अधिक गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (RUPPs) में से एक है। साल 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने 4 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से एक उम्मीदवार को सबसे ज्यादा महज 536 वोट ही मिल सके थे। सुदीप बंद्योपाध्याय भी बागियों के साथ छह बार के सांसद और बागियों में सबसे वरिष्ठ सदस्य सुदीप बंद्योपाध्याय भी कुछ दिन पहले ही इस गुट में शामिल हो गए हैं। उन्होंने यह कदम काकोली घोष के NCPI के 'राजनीतिक मामलों की समिति' द्वारा अध्यक्ष चुने जाने के बाद उठाया। आगे क्या होगा? अगर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इस विलय को अपनी मंजूरी दे देते हैं, तो यह भारतीय राजनीति का एक बड़ा उलटफेर होगा। कल तक संसद या किसी भी राज्य विधानसभा में एक भी सदस्य न रखने वाली पार्टी NCPI रातों-रात लोकसभा की 5वीं सबसे बड़ी पार्टी और सत्ताधारी NDA का दूसरा सबसे बड़ा दल बन जाएगी।

हार के खिलाफ एक्शन में ममता बनर्जी, भवानीपुर परिणाम को लेकर हाईकोर्ट में दायर की याचिका

 कोलकाता ममता बनर्जी ने भवानीपुर की हार को कोलकाता हाईकोर्ट में चुनौती दी है. पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज दोपहर अचानक कोलकाता हाई कोर्ट पहुंच गईं और भवानीपुर विधानसभा रिजल्ट के नतीजे को चुनौती दी है. ममता बनर्जी के साथ सांसद डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेना और कल्याण बनर्जी मौजूद थे. रिपोर्ट के अनुसार ममता याचिका के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने कोर्ट पहुंचीं थीं।  भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच सीधी टक्कर थी. इस सीट से पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने जीत हासिल की है. जबकि ममता को हार का मुंह देखना पड़ा था. कांटे की टक्कर में इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने इस सीट पर ममता बनर्जी को 15104 वोटों से मात दी थी. इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी को 73917 और ममता बनर्जी को 58812 वोट मिले थे. तीसरे स्थान पर रहे सीपीएम के श्रीजीब विश्वास को 3556 वोट मिले थे।  ममता बनर्जी मतगणना के दिन 16-17 राउंड तक आगे ही थीं. लेकिन दोनों उम्मीदवारों के बीच गैप धीरे धीरे कम होता गया. आखिर मतगणना के आखिरी चरणों में शुभेंदु अधिकारी ने तगड़ी लीड ली और आखिरकार 15104 वोट से चुनाव जीत गए। इस सीट पर मतगणना के दौरान काफी हंगामा भी हुआ था। उन्होंने भवानीपुर विधानसभा रिजल्ट के नतीजे को चुनौती दी. ममता बनर्जी के साथ सांसद डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेना और कल्याण बनर्जी भी उपस्थित थे। आपको बता दें कि भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच सीधी टक्कर देखी गई थी. इस सीट से पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी ने जीत हासिल की. वहीं ममता को हार का मुंह देखने को मिला. कांटे की टक्कर में इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 15104 वोटों से हराया था।  

PCC दफ्तर का VIDEO बना चर्चा का विषय, दिग्विजय सिंह ने बदली सीट; पटवारी बोले- वे हमारे मार्गदर्शक हैं

भोपाल  मध्यप्रदेश कांग्रेस में घमासान मचा हुआ है। जिसका एक और वीडियो सामने आया है। जोकी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। दरअसल, मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने के बाद प्रदेश कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई थी। इसी दौरान खुले मंच पर दिग्गज नेताओं के बीच तनातनी देखने को मिली। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि जीतू पटवारी के सामने दिग्विजय सिंह अपनी कुर्सी छोड़कर हटे है। दरअसल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू होने से पहले मंच पर सभी नेताओं को सीट पर बैठने हेतु ठीक करते नजर आए। इस दौरान पटवारी ने हाथ का इशारा करते हुए कहा कि “ऐसा कर लो तो हरीश चौधरी भी आ जाएंगे।” जीतू पटवारी की यह बात सुनते ही वहां बैठे पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह तुरंत अपनी कुर्सी से उठ खड़े होते हैं और साइड में जाने लगते हैं। दिग्विजय सिंह को नाराज होता देख जीतू पटवारी उन्हें रोकने की कोशिश करते हैं और कहते हैं, “आप इधर ही रुक जाओ सर…”। लेकिन, दिग्विजय सिंह उनकी बात अनसुनी कर देते हैं और मुख्य जगह छोड़कर साइड में रखी एक अन्य कुर्सी पर जाकर बैठ जाते हैं। जबकि सह-प्रभारी हरीश चौधरी उनकी छोड़ी कुर्सी पर बैठ गए। ऐसे में पार्टी के भीतर नेताओं में तनातनी की स्थिती बनी हुई है। वीडियो सामने आने के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर हमला बोला. पार्टी के नेता ने कहा- कांग्रेस में वर्चस्व और कुर्सी की लड़ाई चल रही है, सभी नेता एक दूसरे को निपटने में लगे हैं. आइए, विस्तार से जानते हैं वीडियो में कुर्सी को लेकर क्या खींचतान हुई, जीतू पटवारी ने क्या कहा, भाजपा ने किस तरह निशाना साधा. कांग्रेस ने किस तरह बचाव किया?    दरअसल, कांग्रेस की राज्यसभा प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद कांग्रेस की ओर से भोपाल प्रदेश कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई थी. कॉन्फ्रेंस शुरू होने से पहले नेता बैठ रहे थे. इस दौरान मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी सिटिंग अरेंजमेंट संभालते हुए नजर आ रहे हैं।  'कुर्सी पर बैठ चुके पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को हाथ से इशारा करते हुए पटवारी कहते हैं, "ऐसा कर लो तो हरीश चौधरी भी आ जाएंगे." जीतू पटवारी की यह बात सुनते ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह तुरंत अपनी कुर्सी छोड़कर साइड की तरफ जाने लगते हैं. पटवारी उन्हें बीच में टोकते हुए कहते हैं, "आप इधर ही रुक जाओ सर", लेकिन दिग्विजय सिंह उनकी बात अनसुनी कर बगल की कुर्सी पर जाकर बैठ जाते हैं. इसके बाद उनकी खाली हुई जगह पर हरीश चौधरी बैठते हैं' . भाजपा- कांग्रेस में वर्चस्व और कुर्सी की लड़ाई  इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भाजपा ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला. प्रदेश प्रवक्ता अजय सिंह यादव ने कहा कि राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस देखकर ऐसा लग रहा है जैसे मुद्दा चुनाव हार का न होकर एक दूसरे की कुर्सी छीनने का है. जिस तरह से वरिष्ठ नेताओं का अपमान किया जा रहा है, उन्हें अपमानित करके ना बोलने दिया जा रहा है और ना कुर्सी पर बैठने दिया जा रहा है. यह कांग्रेस की रीति नीति जनता के सामने है. इसी तरह के बर्ताव की वजह से जनता कांग्रेस को गंभीरता से नहीं लेती है. कांग्रेस में वर्चस्व और कुर्सी की लड़ाई चल रही है, सभी नेता एक दूसरे को निपटने में लगे हैं।  पीसी शर्मा- दिग्विजय सिंह को कोई साइडलाइन करे यह संभव इस सियासी ड्रामे के वायरल होने के बाद पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने पार्टी का बचाव किया. उन्होंने कहा कि आज के समय में दिग्विजय सिंह को कोई साइडलाइन करे यह संभव नहीं है. कमलनाथ और दिग्विजय की आवश्यकता है. दिग्विजय सिंह जो कहते हैं, सोच समझकर कहते हैं. सभी सीनियर लीडर हैं, बैठकर चर्चा करेंगे आगे क्या करना है. हाईकमान फैसला करेगा। 

उद्धव खेमे में बढ़ी बेचैनी, शिंदे गुट के मंत्री के कार्यक्रम में पहुंचे संजय देशमुख

 मुंबई महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर बड़ा खेला होने जा रहा है. टीएमसी में बगावत के बाद अब उद्ध ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में टूट का खतरा मंडराने लगा है. शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 5 लोकसभा सांसदों ने उद्धव ठाकरे के आवास 'मातोश्री' पर बुलाई गई अहम बैठक में हिस्सा नहीं लिया, जिसके चलते 'ऑपरेशन टाइगर' के कयास लगाए जाने लगे हैं।  शिवसेना (यूबीटी) के पास मौजूदा समय में कुल 9 लोकसभा सांसद हैं, जिनमें से रविवार को हुई बैठक में सिर्फ 4 सांसद ही पहुंचे थे बाकी 5 सांसदों ने हिस्सा नहीं लिया. इसे  उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।  शिवसेना (यूबीटी) की टूट के लगाए जा रहे कयास पर उद्धव ठाकरने अपनी चुप्पी तोड़ दी है. उद्धव ठाकरे ने अब साफ-साफ कह दिया है कि अगर वे जाना चाहते हैं, तो खुशी-खुशी जाएं।  आज नहीं,  कल मेरा वक्त आएगा-उद्धव महाराष्ट्र में ऑपरेशन टाइगर की आशंका के बीच उद्धव ठाकरे ने एक तरह से चेतावनी के लहजे में अपने सांसदों से कहा है कि आज मेरा वक्त नहीं है, लेकिन कल जरूर आएगा. तब तक हमें सहना पड़ेगा और संघर्ष करना पड़ेगा. रविवार को मातोश्री में उद्धव ठाकरे ने अपना लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई थी, जिसमें पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 4 ही सांसद पहुंचे थे और पांच नहीं शामिल हुए थे।  उद्धव ने कहा था कि जिन लोगों ने बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना छोड़ी है, उन्हें एक दिन पछतावा जरूर होगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. चार साल पहले पार्टी में बड़ी फूट पड़ी थी, जब 40 विधायक अलग हो गए थे. उस समय मैं राज्य का मुख्यमंत्री था. क्या लोगों को सच में लगता था कि मुझे उस बात का पता नहीं था, जो बाकी सभी लोग साफ-साफ देख और समझ सकते थे? कोई जाना चाहता है, तो वह जा सकता है-उद्धव उद्धव ठाकरे ने कहा कि शिवसेना में चार साल पहते हुई बगावत की मुझे भनक लग गई थी कि क्या हो रहा है, लेकिन मैंने किसी से कुछ भी नहीं कहा, न ही उन पर कोई दबाव नहीं डाला और न ही उनके घोटालों की जांच के लिए कोई फाइल खुलवाई. अगर कोई पहले से ही जाना चाहता है, तो उसे जबरदस्ती रोकने का क्या मतलब है? ऑपरेशन टाइगर की चल रही चर्चा के बीच उद्धव ठाकरे ने बहुत अहम बयान दिया है. उन्होंने कहा कि अगर कोई जाना चाहता है, तो वह जा सकता है. मैं बस उनके अच्छे राजनीतिक भविष्य की कामना करूंगा. इस तरह से उद्धव ठाकरे ने मान लिया है कि जिन्हें जाना है, वो पार्टी को छोड़कर जा सकता है।  उद्धव की बैठक में जो पांच सांसद नहीं पहुंचे उद्धव ठाकरे के द्वारा मातोश्री पर बुलाई गई बैठक में शिवसेना (यूबीटी) के जो पांच सांसद नहीं पहुंचे थे, उसमें संजय जाधव, संजय देशमुख, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और नागेश पाटिल अष्टिकर हैं. इन पांच सांसदों के कारण पार्टी में फिर से फूट पड़ने की चर्चा शुरू हो गई।  हालांकि, शिवसेना (यूबीटी) खेमे ने तुरंत दावा किया कि ये सांसद बैठक में वर्चुअली (ऑनलाइन) शामिल हुए थे, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उद्ध ठाकरे सिर्फ नागेश पाटिल अष्टिकर से ही सीधे बात कर पाए. वहीं, बैठक में न शामिल होने वाले शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय देशमुख ने दिल्ली में एकनाथ शिंदे खेमे के मंत्री प्रताप राव जाधव से मुलाकात की है, जिसके बाद सियासी चर्चा तेज हो गई।  उद्धव के सांसद शिंदे के संपर्क में है-प्रताप जाधव उद्धव ठाकरे खेमे के नेता और केंद्रीय मंत्री प्रताप राव जाधव ने आजतक से बातचीत करते हुए कहा कि शिवसेना (यूबीटी) के सभी सांसद मेरे दोस्त हैं, हमने पहले साथ काम किया है. हमारी मुलाकात और बातचीत होती रहती है. एक बात साफ है कि शिवसेना (UBT) के कई सांसद पार्टी नेतृत्व (उद्धव ठाकरे) से वाकई नाखुश हैं।  प्रताप जाधव कहते हैं कि शिवसेना (यूबीटी) के सांसद उसी तरह से पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं, जैसे टीएमसी के सांसद थे. शिंदे के अगुवाई वाली ही शिवसेना असली शिवसेना हैं, जो बालासाहेब ठाकरे के सिद्धांतों पर काम कर रही है. शिवसेना (UBT) के सभी सांसदों का हमारी पार्टी में स्वागत है. UBT के कुछ सांसद एकनाथ शिंदे जी के संपर्क में हैं।