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विजय बने मुख्यमंत्री, तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन पर पीएम मोदी ने दी बधाई

तमिलनाडु तमिलनाडु में 10 मई से विजय थलापति का राज शुरू हो चुका है। विजय के ऐतिहासिक शपथ ग्रहण समारोह के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें तमिलनाडु का पद भार ग्रहण करने के लिए बधाई दी और साथ ही केंद्र सरकार की तरफ से पूरी मदद करने का भरोसा भी दिलाया। उन्होंने सोशल मीडिया साइट एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, "श्री सी. जोसेफ विजय को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने पर बहुत बधाई। उनके आगामी कार्यकाल के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं। केंद्र सकार तमिलनाडु सरकार और वहां के लोगों की भलाई के लिए लगातार काम करती रहेगी।"    तमिलनाडु की नई नवेली सरकार को बधाई देने के साथ ही एक दूसरे कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस को एक परजीवी पार्टी बताते हुए अन्य विपक्षी पार्टियों को चेताया भी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस दशकों तक डीएमके के साथ खड़ी रही, लेकिन हवा बदलते ही उसने पाला भी बदल लिया। कांग्रेस को लेकर चेताया कर्नाटक में एक कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने कहा, "तमिलनाडु की मौजूद स्थिति को देखिए। वहां पर पिछले पच्चीस से तीस वर्षों तक कांग्रेस और डीएमके के बीच घनिष्ठ संबंध रहे। डीएमके के साथ गठबंधन ने कई बार कांग्रेस को संकटों से उबारा। वास्तव में, 2014 से पहले दस वर्षों तक कांग्रेस का जो शासन चला, वह काफी हद तक डीएमके के समर्थन के कारण ही कायम रहा। लेकिन जैसे ही राजनीतिक हवा ने रुख बदला, कांग्रेस पार्टी ने डीएम के को धोखा दे दिया। सत्ता की लालसा में चूर कांग्रेस ने पहले ही मौके पर डीएमके को छुरा घोंपा। अब कांग्रेस को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए एक और पार्टी की जरूरत है, जिसके सहारे वह आगे बढ़ सके।" विजय की ऐतिहासिक शपथ इससे पहले, अभिनेता से राजनेता बने थलापति विजय ने रविवार सुबह चेन्नई के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में हुए एक भव्य कार्यक्रम में पद और गोपनीयता की शपथ ली। उनके साथ ही नौ नए मंत्रियों ने भी शपथ ली। इस दौरान हजारों की संख्या में समर्थक वहां मौजूद थे। लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी वहां पर पहुंचे। शपथ के साथ ही विजय तमिलनाडु के नौवें मुख्यमंत्री बन चुके हैं। अपने पहले ही भाषण में उन्होंने साफ कर दिया कि सत्ता का एक ही केंद्र होगा, और वह स्वयं विजय ही होंगे। गौरतलब है कि हाल ही में संपन्न तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटें जीतीं। बाद में पार्टी को विदुथलाई चिरुथाइगल काची (VCK) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का समर्थन मिला, जिससे उसकी सीटों की संख्या 120 हो गई और उसने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया। विजय का शपथ ग्रहण तमिलनाडु में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव है, क्योंकि लगभग 70 वर्षों में यह पहली बार है कि डीएमके-एआईएडीएमके गठबंधन से बाहर की कोई सरकार राज्य में सत्ता में आई है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया मोड़: टीएमसी-वामपंथी संभावित एकता से बदले समीकरण

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल में कभी वामपंथ की सबसे बड़ी विरोधी मानी जाने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सुर अब विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद बदलते नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ने भाजपा को रोकने के इराने से विपक्षी दलों से साथ आने की अपील की है। ममता ने संकेत दिए हैं कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उन्हें वामदलों और यहां तक कि धुर-वामपंथियों से भी परहेज नहीं है। उनका यह बयान न केवल बंगाल बल्कि देश की राजनीति में एक बड़ी हलचल पैदा कर रहा है। जिस ममता बनर्जी ने तीन दशक पुराने वामपंथी किले को ढहाया था, आज वही उनके साथ मंच साझा करने की बात कह रही हैं। ममता बनर्जी की राजनीति की नींव ही वामपंथ के विरोध पर टिकी थी। 1970 और 80 के दशक में जब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा अभेद्य माना जाता था, तब ममता बनर्जी एक आक्रामक युवा नेता के रूप में उभरीं। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से बनाई पहचान साल 2006-2008 के दौरान सिंगूर में टाटा नैनो प्लांट के खिलाफ भूमि अधिग्रहण आंदोलन और नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग की घटनाओं ने ममता बनर्जी को बंगाल की जनमानस का मसीहा बना दिया। उन्होंने 'मां, माटी, मानुष' का नारा दिया, जिसने वामपंथ के उस सर्वहारा वर्ग को अपनी ओर खींच लिया जो कभी माकपा (CPIM) का आधार था। साल 2011 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने वह कर दिखाया जो असंभव माना जाता था। उन्होंने 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका। बुद्धदेव भट्टाचार्य की हार और राइटर्स बिल्डिंग से लाल झंडे का हटना भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक थी। उस समय ममता ने कसम खाई थी कि वह बंगाल से वामपंथ का नामोनिशान मिटा देंगी। आज की मजबूरी या रणनीति? पिछले एक दशक में बंगाल की राजनीतिक जमीन पूरी तरह बदल चुकी है। वामदल हाशिए पर चले गए हैं और भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है। ममता बनर्जी अब महसूस कर रही हैं कि मतों का बिखराव अंततः भाजपा को फायदा पहुंचाता है। हालिया बयानों में ममता ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय स्तर पर और विशेष रूप से बंगाल में भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए विपक्ष की एकता अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यदि देश को बचाना है और धर्मनिरपेक्षता को कायम रखना है तो सभी गैर-भाजपाई ताकतों को एक साथ आना होगा। इसमें उन्होंने विशेष रूप से 'वाम' और 'घोर वामपंथी' विचारधारा वाले समूहों का नाम लेकर सबको चौंका दिया है। जमीनी कार्यकर्ताओं का टकराव बंगाल के गांवों में आज भी टीएमसी और वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच खूनी संघर्ष का इतिहास रहा है। क्या शीर्ष नेतृत्व के हाथ मिलाने से जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता एक-दूसरे को स्वीकार करेंगे? वामदलों के लिए ममता बनर्जी आज भी उनकी सत्ता छीनने वाली नेता हैं। माकपा के कई नेता ममता पर ही भाजपा को बंगाल में जगह देने का आरोप लगाते रहे हैं। धुर-वामपंथी समूह अक्सर संसदीय राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं या बेहद कट्टर रुख अपनाते हैं। ममता का उन्हें साथ आने का न्योता देना यह दर्शाता है कि वह भाजपा के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। ममता बनर्जी का यह हृदय परिवर्तन राजनीति की उस कड़वी सच्चाई को दर्शाता है जहां "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।" 2011 में जिस वामपंथ को उन्होंने अपना सबसे बड़ा शत्रु माना था, 2026 की दहलीज पर खड़े बंगाल में वह उसे एक संभावित सहयोगी के रूप में देख रही हैं। भाजपा के 'हिंदुत्व कार्ड' की बढ़ती स्वीकार्यता ममता बनर्जी अब एक व्यापक छतरी तैयार करना चाहती हैं। यदि यह गठबंधन आकार लेता है तो यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी गठबंधनों में से एक होगा। जहां 'तृणमूल' और 'लाल सितारा' एक ही झंडे के नीचे भाजपा को चुनौती देते नजर आएंगे।  

उत्तर प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार पर मुहर, जातीय समीकरण साधने में जुटी बीजेपी

लखनऊ उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ सरकार अपने सबसे बड़े राजनीतिक दांव की तैयारी में जुट गई है. लंबे समय से चर्चा में चल रहे मंत्रिमंडल विस्तार पर आखिरकार मुहर लग गई है और आज रविवार दोपहर लखनऊ के लोकभवन में नए मंत्रियों को शपथ दिलाई जाएगी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार शाम राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात की थी. योगी कैबिनेट में इस समय छह पद खाली हैं और माना जा रहा है कि इन सभी सीटों को भरा जाएगा. खास बात यह है कि इस बार किसी बड़े प्रयोग के बजाय सामाजिक और जातीय संतुलन साधने पर फोकस रखा गया है. बीजेपी ब्राह्मण, जाट, दलित, पासी, वाल्मीकि, लोधी और अति पिछड़ा वर्ग को साधने की रणनीति पर काम करती दिख रही है. यही वजह है कि जिन नामों की सबसे ज्यादा चर्चा है, वे अलग-अलग सामाजिक समूहों से हैं. योगी मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर तस्वीर लगभग साफ होती नजर आ रही है. सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार देर रात सभी संभावित मंत्रियों से मुलाकात कर अंतिम चर्चा कर ली है. मौजूदा राज्य मंत्री सोमेंद्र तोमर और अजीत पाल की प्रोन्नति लगभग तय मानी जा रही है. पश्चिम यूपी से आने वाले सोमेंद्र तोमर को कैबिनेट या स्वतंत्र प्रभार मिल सकता है, जबकि पाल बिरादरी से आने वाले सूचना एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री अजीत पाल का भी कद बढ़ाया जा सकता है. वहीं नए चेहरों में कन्नौज के तिर्वा से विधायक और लोधी समाज के नेता कैलाश राजपूत को मंत्रिमंडल में जगह मिलना तय माना जा रहा है. अलीगढ़ की खैर सीट से विधायक और वाल्मीकि समाज से आने वाले दलित नेता सुरेंद्र दिलेर भी नए मंत्री के तौर पर शपथ ले सकते हैं. मनोज पांडेय: सपा से BJP तक, अब कैबिनेट की दहलीज पर रायबरेली की ऊंचाहार सीट से विधायक मनोज पांडेय का नाम लगभग तय माना जा रहा है. कभी अखिलेश यादव के बेहद करीबी रहे मनोज पांडेय समाजवादी पार्टी सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने सपा से दूरी बनाकर बीजेपी का समर्थन किया और बाद में भगवा खेमे के साथ खुलकर खड़े नजर आए. मनोज पांडेय ब्राह्मण चेहरे के तौर पर बीजेपी के लिए अहम माने जा रहे हैं. राजनीति विज्ञान में पीएचडी कर चुके मनोज पांडेय का लंबा राजनीतिक अनुभव है. 2012 और 2017 में ऊंचाहार सीट से जीत हासिल कर चुके पांडेय अब बीजेपी के ब्राह्मण समीकरण को मजबूत करने वाले चेहरे के रूप में देखे जा रहे हैं. भूपेंद्र चौधरी: पश्चिम यूपी का बड़ा जाट चेहरा मुरादाबाद से आने वाले भूपेंद्र सिंह चौधरी बीजेपी के मजबूत संगठनात्मक नेताओं में गिने जाते हैं. आरएसएस से राजनीति की शुरुआत करने वाले भूपेंद्र चौधरी साल 1989 में बीजेपी में शामिल हुए थे. संगठन में कई अहम जिम्मेदारियां निभाने के बाद वे यूपी बीजेपी अध्यक्ष भी बने. जाट समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है. पश्चिमी यूपी में बीजेपी को मजबूत करने में उनकी बड़ी भूमिका रही है. योगी सरकार के पिछले कार्यकाल में वे पंचायती राज मंत्री रह चुके हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि उन्हें फिर से कैबिनेट में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है. कृष्णा पासवान: पासी समाज की मजबूत महिला चेहरा फतेहपुर जिले की खागा सीट से विधायक कृष्णा पासवान का नाम भी लगभग तय माना जा रहा है. पासी समाज से आने वाली कृष्णा पासवान बीजेपी की पुराने दलित चेहरों में शामिल हैं. उन्होंने कई बार चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की है. 2022 के चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी उम्मीदवार को करीबी मुकाबले में हराया था. बीजेपी दलित वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने के लिए पासी समाज को प्रतिनिधित्व देना चाहती है. इसी रणनीति के तहत कृष्णा पासवान का नाम आगे बढ़ाया गया है. हंसराज विश्वकर्मा: अति पिछड़े वर्ग पर BJP की नजर वाराणसी से एमएलसी और बीजेपी जिलाध्यक्ष हंसराज विश्वकर्मा का नाम भी चर्चा में है. विश्वकर्मा समाज पूर्वांचल की अहम अति पिछड़ी बिरादरी मानी जाती है. हंसराज विश्वकर्मा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी नेताओं में भी गिना जाता है. बीजेपी लंबे समय से गैर-यादव OBC वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. ऐसे में विश्वकर्मा समाज को कैबिनेट में जगह देकर पार्टी पूर्वांचल और अति पिछड़े वर्ग को बड़ा संदेश देना चाहती है.   सुरेंद्र दिलेर: वाल्मीकि समाज से नया दांव हाथरस से आने वाले सुरेंद्र सिंह दिलेर का नाम वाल्मीकि समाज के प्रतिनिधि के तौर पर चर्चा में है. उनका राजनीतिक परिवार लंबे समय से सक्रिय रहा है. उनके दादा किशन लाल दिलेर चार बार सांसद रहे, जबकि पिता राजवीर सिंह दिलेर विधायक और सांसद दोनों रहे. सुरेंद्र दिलेर लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं और वाल्मीकि समाज में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. बीजेपी दलित वोट बैंक में वाल्मीकि समुदाय को मजबूत संदेश देना चाहती है. कैलाश राजपूत: लोधी वोट बैंक साधने की कोशिश कन्नौज की तिर्वा सीट से विधायक कैलाश राजपूत भी संभावित मंत्रियों की सूची में शामिल हैं. वे लोधी समाज से आते हैं, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली समुदाय माना जाता है. कैलाश राजपूत अलग-अलग दौर में हर बार सत्ता पक्ष के साथ रहे हैं. साल 1996 में बीजेपी, 2007 में बसपा और फिर 2017 में बीजेपी से विधायक बने. इसके बाद फिर से विधायक बने. कन्नौज और आसपास के इलाकों में लोधी वोट बैंक पर उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. चर्चा में रहा मनोज पांडे का नाम प्रस्तावित मंत्रिमंडल विस्तार में जहां छह और मंत्री बनाए जा सकते हैं, वहीं मौजूदा राज्यमंत्रियों में से कुछ को राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और तीन को कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है. सपा से अलग होकर भाजपा को समर्थन देने वाले विधायक मनोज पांडे का नाम सबसे अधिक चर्चा में रहा है. लोकसभा चुनाव के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने भी मनोज पांडे और उनके परिवार से भेंट की थी. तभी से माना जा रहा था था कि उन्हें बीजेपी या सरकार में बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी. मनोज पांडे कल शाम लखनऊ आवास पहुंचे और सूत्रों के मुताबिक, सीएम योगी से मुलाकात की है. हालांकि, मुलाकात के बाद रात लगभग 10 बजे वह … Read more

टॉप 10 बंदरगाहों में चीन का दबदबा, भारत की मौजूदगी गायब

नई दिल्ली  आज समुद्री बंदरगाह वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर रोजमर्रा के सामान तक इन्हीं के जरिए दुनिया भर में पहुंचते हैं. वैश्विक समुद्री व्यापार के मोर्चे पर एक चौंकाने वाली तस्वीर उभर रही है. जो भारत के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है. साल 2024 के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के सबसे व्यस्त बंदरगाहों की सूची में चीन ने एकतरफा दबदबा बना लिया है. खास बात यह है कि दुनिया के सबसे बिजी पोर्ट्स की टॉप 20 लिस्‍ट में भारत का एक भी बंदरगाह शामिल नहीं है।  विजुएल कैपिटेलिस्‍ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में दुनिया भर के बंदरगाहों ने कुल 743 मिलियन शिपिंग कंटेनरों (TEUs) की प्रोसेसिंग की. इस कुल ट्रैफिक का आधे से ज्यादा हिस्सा केवल शीर्ष 20 बंदरगाहों से होकर गुजरा. इन 20 बंदरगाहों में सबसे ज्‍यादा नाम चाइनीज पोर्ट्स के हैं। दुनिया के 10 सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से 7 अकेले चीन के पास हैं. वैश्विक कंटेनर ट्रैफिक में चीन की हिस्सेदारी 40% से भी अधिक हो चुकी है. दुनिया के सबसे बिजी 20 बंदरगाहों की सूची में शंघाई बंदरगाह 51.5 मिलियन TEUs की प्रोसेसिंग के शीर्ष पर है। सिंगापुर बंदरगाह ने 2024 में 41.1 मिलियन TEUs का प्रबंधन कर दूसरा स्‍थान हासिल किया. यह शंघाई की तुलना में 10 मिलियन से भी कम है. तीसरे स्थान पर चीन का निंगबो-झोउशान पोर्ट है, जिसने 39.3 मिलियन TEUs का ट्रैफिक संभाला. यानी टॉप 3 में से दो पायदान केवल चीन के पास हैं।  चीन का शेनझेन 33.4 मिलियन TEUs के साथ चौथे और क़िंगदाओ पोर्ट 30.9 मिलियन TEUs के साथ पांचवें स्थान पर काबिज है. छठे नंबर पर भी चीन का ही ग्वांगझोउ बंदरगाह है, जिसने 26.1 मिलियन TEUs का व्यापार संभाला। सातवें स्थान पर दक्षिण कोरिया का बुसान पोर्ट जरूर आता है, लेकिन आठवें स्थान पर फिर से चीन का तियानजिन बंदरगाह 23.3 मिलियन TEUs के साथ अपनी जगह पक्की कर चुका है. मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देशों ने भी इस शीर्ष सूची में अपनी जगह बनाई है, लेकिन उनकी संख्या चीन के मुकाबले नगण्य है।  संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का जेबेल अली बंदरगाह 15.5 मिलियन TEUs के साथ नौवें और मलेशिया का पोर्ट क्लांग 14.6 मिलियन TEUs के साथ दसवें स्थान पर है।  इन देशों की मौजूदगी के बावजूद, पहले से दसवें पायदान तक चीन की सात बंदरगाहों की मौजूदगी वैश्विक समुद्री मार्ग पर उसके 'कब्जे' को ही बयां करती है।  यूरोप के गौरव माने जाने वाले बंदरगाह भी अब एशियाई बंदरगाहों की तुलना में काफी पीछे छूटते नजर आ रहे हैं. नीदरलैंड का रॉटरडैम पोर्ट 13.8 मिलियन TEUs के साथ 11वें स्थान पर है, जबकि इसके ठीक बाद चीन का हांगकांग बंदरगाह 13.7 मिलियन TEUs के साथ 12वें स्थान पर मौजूद है. बेल्जियम का एंटवर्प-ब्रुग्स पोर्ट 13.5 मिलियन TEUs के साथ 13वें पायदान स्‍थान पर है।  चीन का शियामेन बंदरगाह 12.3 मिलियन TEUs के साथ 14वें स्थान पर है. मलेशिया का तंजुंग पेलेपास पोर्ट भी इतने ही ट्रैफिक के साथ बराबरी पर खड़ा है. अमेरिका, जो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करता है, उसका लॉस एंजेलिस बंदरगाह मात्र 10.3 मिलियन TEUs के साथ 16वें स्थान पर है।  मोरक्को के टैंगर-मेड पोर्ट ने 10.2 मिलियन TEUs के साथ टॉप पोर्ट्स की सूची में 17वें स्थान पर काबिज है. इसके ठीक बाद फिर से चीन का ताइकांग बंदरगाह 9.7 मिलियन TEUs के साथ 18वें पायदान पर खड़ा है. अमेरिका का लॉन्ग बीच पोर्ट 9.6 मिलियन TEUs के साथ 19वें और और थाईलैंड का लैम चाबांग बंदरगाह 20वें स्थान पर हैं।  भारत के किसी भी बंदरगाह का नाम टॉप 20 की सूची में शामिल न होना यह दर्शाता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स के मामले में अभी हमें एक लंबी दूरी तय करनी है.  भारत अपने बंदरगाहों के आधुनिकीकरण पर काम कर रहा है, लेकिन चीन जिस गति से समंदर पर अपनी बादशाहत कायम कर चुका है, उससे मुकाबला करना एक बड़ी चुनौती होगी।  

सालों से अटकी योजनाओं का होगा आरंभ, बंगाल में डबल इंजन सरकार की योजना

 कोलकाता पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन में भले अभी कुछ समय हो, लेकिन चुनाव परिणाम सामने आते ही केंद्र सरकार ने राज्य में सालों से अटकी केंद्रीय योजनाओं और परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है. सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार ने सभी मंत्रालयों से उन योजनाओं और परियोजनाओं की सूची मांगी है जो पिछले लगभग 12 सालों से ममता बनर्जी सरकार के विरोध, देरी या प्रशासनिक अड़चनों के कारण लंबित पड़ी थीं।  सूत्रों का कहना है कि इस पूरी कवायद की जिम्मेदारी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सौंपी गई है. उन्होंने कई मंत्रालयों से ऐसी योजनाओं का विस्तृत ब्यौरा मांगा है, जो पश्चिम बंगाल में बाधित रही हैं. मंत्रालयों ने संबंधित सूचनाएं भेजना भी शुरू कर दिया है. केंद्र सरकार का उद्देश्य नई सरकार के गठन के तुरंत बाद इन परियोजनाओं के रास्ते की बाधाएं दूर कर तेज गति से काम शुरू करना है।  पिछले एक दशक में केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच कई योजनाओं को लेकर लगातार टकराव देखने को मिला. कई केंद्रीय योजनाएं राज्य में लागू नहीं की गईं या फिर उनके नाम बदलकर लागू किया गया. कई परियोजनाओं को जमीन आवंटन, प्रशासनिक अनुमति या अन्य कारणों से लंबे समय तक रोके रखा गया. अब केंद्र सरकार इन्हें प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है।  कई प्रमुख योजनाओं का मिलेगा लाभ सबसे प्रमुख योजना आयुष्मान भारत है जिसे पश्चिम बंगाल सरकार ने लागू करने से इनकार कर दिया था. इस योजना के तहत पात्र परिवारों को 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा मिलता है. ममता बनर्जी सरकार का कहना था कि राज्य की ‘स्वास्थ्य साथी’ योजना बेहतर है, केंद्र की 60:40 फंडिंग व्यवस्था और प्रधानमंत्री की तस्वीर वाले स्वरूप पर भी आपत्ति थी।  पीएम मोदी पहले ही कह चुके हैं कि नई सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में ही आयुष्मान भारत योजना को मंजूरी दी जाएगी।  प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना को लेकर भी लंबे समय तक केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवाद रहा. ममता सरकार अपनी ‘कृषक बंधु’ योजना को प्राथमिकता देती रही. हालांकि बाद में इसे आंशिक रूप से लागू किया गया, लेकिन लाभार्थियों के सत्यापन को लेकर खींचतान जारी रही. अब केंद्र सरकार इसे पूरी क्षमता के साथ लागू कराने की तैयारी में है।  इसी तरह  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी एक्ट यानी मनरेगा के फंड को कथित अनियमितताओं के कारण केंद्र ने रोक दिया था. इसे लेकर राज्य सरकार ने केंद्र पर आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया था. अब केंद्र इसे नए ढांचे के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी में है।  प्रधानमंत्री आवास योजना नाम बदलकर ‘बांग्ला आवास योजना’ किए जाने और उसमें कथित अनियमितताओं के बाद 2022 से फंडिंग रुकी हुई थी. अब इस योजना को दोबारा सक्रिय करने की तैयारी की जा रही है।  केंद्र सरकार के अनुसार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को पश्चिम बंगाल में काफी देर से लागू किया गया और आवंटित राशि का सीमित उपयोग हुआ. वहीं जल जीवन मिशन के तहत आवंटित फंड के बेहतर उपयोग और प्रभावी तरीके से लागू करने पर जोर दिया जाएगा।  शिक्षा क्षेत्र में पीएम श्री स्कूल नई शिक्षा एवं भाषा नीति और ‘उल्लास’ जैसी योजनाओं को लागू करने की तैयारी है. साथ ही प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत रुकी परियोजनाओं को भी मंजूरी मिलने की संभावना है. नमामि गंगे प्रोग्राम के तहत गंगा सफाई से जुड़े कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भूमि उपलब्ध न होने के कारण वर्षों से लंबित हैं।  केंद्र सरकार कई बार संसद में यह मुद्दा उठा चुकी है कि पश्चिम बंगाल में जमीन नहीं मिलने से परियोजनाओं में देरी हुई. अब इन प्रोजेक्ट्स को तेजी से पूरा करने की तैयारी है।  इसी तरह अंतरराष्ट्रीय सीमा पर संवेदनशील क्षेत्रों में बॉर्डर फेंसिंग को लेकर भी केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवाद रहा. केंद्र का आरोप था कि आवश्यक भूमि उपलब्ध नहीं कराई गई. अब इसे प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाने की योजना बनाई गई है।  प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को छोड़कर पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी ‘बांग्ला शस्य बीमा’ योजना शुरू की थी. राज्य सरकार का तर्क था कि उसका मॉडल किसानों के लिए अधिक लाभकारी है, जबकि केंद्र ने इसे राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिश बताया।  मृदा स्वास्थ्य कार्ड, और पीएम-प्रणाम जैसी योजनाओं को लागू करने की गति को लेकर भी केंद्र ने राज्य सरकार पर उदासीनता का आरोप लगाया।  केंद्र सरकार की रणनीति साफ है कि लंबे समय से रुकी परियोजनाओं को तेज गति से पूरा कर जमीन पर ‘डबल इंजन सरकार’ का असर दिखाया जाए. साथ ही केंद्रीय योजनाओं का दायरा बढ़ाकर लाभार्थियों की संख्या में विस्तार किया जाए, ताकि केंद्र सरकार की योजनाओं का सीधा लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे। 

मोदी सरकार की 12वीं सालगिरह: मोहन सरकार लाएगी खुशियों की सौगात

भोपाल  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार 26 मई 2026 को अपने 12 वर्ष पूरे कर 13वें वर्ष में प्रवेश करने जा रही है। इस मौके को खास बनाने के लिए भाजपा और एनडीए शासित राज्यों में तैयारियां शुरू हो गई हैं। मध्य प्रदेश में सरकार भी केंद्र सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ ही प्रदेश स्तर पर नई सौगातों की तैयारी कर रही है। केंद्र की योजनाओं के प्रचार का बनेगा रोडमैप सूत्रों के मुताबिक, मोहन सरकार इस अवसर पर केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों को प्रदेश की जनता के सामने प्रभावी तरीके से रखने का रोडमैप तैयार कर रही है। इसके तहत गांव-गांव और शहर-शहर तक योजनाओं की जानकारी पहुंचाने पर फोकस रहेगा। जनहित योजनाओं के विस्तार के निर्देश मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे जनहित से जुड़ी योजनाओं का विस्तृत खाका तैयार करें और उनके प्रभावी क्रियान्वयन की योजना बनाएं। सरकार के फोकस में खासतौर पर किसान,आदिवासी वर्ग,महिलाएं रहेंगे। ढाई साल पूरे होने पर भी सरकार का विशेष फोकस मई माह में मोहन सरकार के ढाई साल पूरे हो रहे हैं। ऐसे में सरकार इस अवधि को राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण मान रही है। माना जा रहा है कि इसी अवसर पर कुछ नई घोषणाएं और योजनाएं सामने आ सकती हैं। जनहित योजनाओं का खाका तैयार करने का आदेश सूत्रों के मुताबिक सीएम डॉ. मोहन यादव(CM Mohan Yadav) ने टॉप अफसरों से कहा है कि जनहित योजनाओं का खाका तैयार कर उनके विस्तार पर योजना तैयार करें। इनमें कि सान और आदिवासी सरकार की फोकस में होंगे। बता दें, मई में मोहन सरकार के भी ढाई साल पूरे होंगे। सरकार इस मौके को खास बनाना चाहती है। जनता को ये सौगात दे सकते हैं मुख्यमंत्री     दुग्ध उत्पादकों को दिए जाने वाले लाभों का दायरा बढ़ा सकते हैं।     आदिवासियों को उनकी जमीन का मालिकाना हक दिलाने में तेजी।     सड़क, सिंचाई व बिजली से वंचित क्षेत्रों में नई योजना की शुरु आत।     महिलाओं को स्वावलंबी बनाने, आर्थिक गतिविधियों से जोडऩा।     लघु उद्योगों की स्थापना के लिए अतिरिक्त छूट दी जा सक ती है।     कृषि आधारित उद्योगों में किसानों व उनके परिवारों को जोडऩे के प्रयास। मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा के लिए होगी बैठक बता दें कि प्रदेश में जहां एक ओर निगम मंडलों, प्राधिकरणों में राजनैतिक नियुक्तियां की जा रहीं हैं वहीं प्रदेश मंत्रि-मंडल मेें विस्तार भी संभावित है। इधर मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार का 13 मई को ढाई साल का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इसके लिए सीएम मोहन यादव द्वारा सभी मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई गई है। मुख्यमंत्री ने बैठकों की डेडलाइन भी तय कर दी है जिससे कई मंत्रियों की परेशानी बढ़ गई है। सीएम मोहन यादव ने मंत्रियों से कहा ​है कि समीक्षा बैठकें 8 मई से 10 मई के बीच विभागवार होंगी। भोपाल में राजनैतिक अटकलें तेज मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव(CM Mohan Yadav) शुक्रवार को दिल्ली पहुंचे। यहां उन्होंने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात की। सीएम मोहन यादव ने उन्हें अंगवस्त्रम ओढ़ाया और भेंट किया और स्मृति चिन्ह भेंट किया। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात के संबंध में ट्वीट भी किया। सीएम मोहन यादव ने दिल्ली में हुई इस भेंट की तस्वीरें अपने एक्स हेंडल पर पोस्ट की हैं। इधर सीएम के दिल्ली दौरे पर भोपाल में राजनैतिक अटकलें तेज हो गई हैं। बीजेपी में खासी गहमागहमी है। मंत्रियों के कामकाज की होगी समीक्षा इधर, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सभी मंत्रियों के कामकाज की विभागवार समीक्षा बैठकें बुलाने के निर्देश दिए हैं। ये बैठकें 8 से 10 मई के बीच आयोजित होंगी। भोपाल में राजनीतिक हलचल तेज हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दिल्ली दौरे और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात के बाद भोपाल के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। निगम-मंडलों में नियुक्तियों और संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर भी चर्चाओं का दौर जारी है।  

महाकाल मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाओं के साथ सिंहस्थ 2028 की तैयारी

उज्जैन  उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में अब सुविधाओं के विस्तार के साथ ही सिंहस्थ 2028 की व्यापक तैयारियां शुरू हो गई हैं। मंदिर प्रशासन श्रद्धालुओं की सुविधा और दर्शन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई बड़े बदलाव करने जा रहा है। आने वाले समय में श्रद्धालुओं को न सिर्फ दर्शन में आसानी होगी, बल्कि उन्हें मंदिर की अन्य प्रमुख आरतियों की जानकारी भी मिल सकेगी। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए लगेंगे नए शेड और बैरियर्स महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष रोशन कुमार सिंह ने बताया कि सिंहस्थ महाकुंभ 2028 को ध्यान में रखते हुए मंदिर की व्यवस्थाओं में लगातार सुधार किया जा रहा है। गर्मी के मौसम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। इसे देखते हुए महाकाल लोक में फिलहाल फॉगिंग फव्वारे लगाए गए हैं। इसके साथ ही श्रद्धालुओं को धूप और गर्मी से राहत देने के लिए करीब 11 करोड़ रुपये की लागत से फैब्रिकेशन शेड लगाया जाएगा। वहीं दर्शन व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए जल्द ही क्यूआर आधारित बैरियर्स भी लगाए जाएंगे, जिससे श्रद्धालुओं को व्यवस्थित और आसान तरीके से दर्शन हो सकेंगे। अब सांध्य और शयन आरती की जानकारी भी मिलेगी अभी तक देश-विदेश से आने वाले अधिकांश श्रद्धालु केवल सुबह होने वाली भस्म आरती के बारे में ही जानते हैं। मंदिर प्रशासन अब ऐसे प्रयास करेगा, जिससे श्रद्धालुओं को सांध्य आरती और शयन आरती के महत्व की भी जानकारी मिल सके। मंदिर समिति का मानना है कि इन आरतियों में शामिल होकर श्रद्धालु धार्मिक लाभ प्राप्त कर सकेंगे और बाबा महाकाल की विशेष पूजा परंपराओं से जुड़ पाएंगे। वेबसाइट पर शुरू होगा अन्नक्षेत्र मॉड्यूल मंदिर प्रशासन ने वेबसाइट पर अन्नक्षेत्र मॉड्यूल शुरू करने का भी निर्णय लिया है। इसके साथ ही वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए मंदिर समिति का 29974.37 लाख रुपये का प्रस्तावित बजट भी पारित किया गया है। सुरक्षा और व्यवस्था के लिए बढ़ेंगे इंतजाम सिंहस्थ महापर्व को देखते हुए मंदिर में 80 नई स्टील दानपेटियां बनाई जाएंगी। वहीं श्रद्धालुओं की सुरक्षा और कतार प्रबंधन को मजबूत करने के लिए करीब 1000 नए बैरिकेड्स लगाने की मंजूरी भी दी गई है। मंदिर प्रशासन का कहना है कि आने वाले वर्षों में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए व्यवस्थाओं को आधुनिक और सुरक्षित बनाया जाएगा, ताकि हर श्रद्धालु को सुगम और व्यवस्थित दर्शन का लाभ मिल सके।

69000 बेसिक: 8th Pay Commission के बाद आपकी सैलरी में बदलाव का हाल

  नई दिल्‍ली आठवें वेतन आयोग की टीम आए दिन अलग-अलग राज्‍यों में बैठकें कर रही है और कर्मचारियों की समस्‍या और मांग जानना चाहती है, ताकि वह एक रिपोर्ट तैयार कर सके और उसे सरकार को सौंप सके. अभी तक कर्मचारियों की ओर से कुछ मांग रखी गई है, जिसके मुताबिक, मिनिमम बेसिक सैलरी 69000 रुपये और फिटमेंट फैक्‍टर 3.83 रखने की बात कही गई है।  8वें वेतन आयोग की टीम ने दिल्‍ली, पुणे और उत्तराखंड में बैठक पूरी की है. अब अगर 8वें वेतन आयोग में कर्मचारियों की 3.83 फिटमेंट फैक्टर वाली मांग मान ली जाती है तो सिर्फ बड़े अधिकारियों की ही नहीं, बल्कि सरकारी चपरासी, क्लर्क, टीचर, रेलवे कर्मचारी से लेकर IAS अधिकारियों तक की सैलरी में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।  न्यूनतम बेसिक पे 18000 रुपये से बढ़कर करीब 69000 रुपये तक पहुंच सकती है. साथ ही 30 साल में पांच बार प्रमोशन हो सकता है. महंगाई भत्ता और एचआर के अलावा, अन्‍य भत्तों में तीन गुना इजाफा हो सकता है. हालांकि, यहां एक सैलरी अनुमान लगाया गया है, जिसके तहत हम ये जानने की कोशिश करेंगे कि किस लेवल के कर्मचारियों की कितनी सैलरी बढ़ सकती है?  आपकी कितनी बढ़ सकती है सैलरी?  8वें वेतन आयोग के तहत लेवल 1 में चपरासी और अटेंडेंट आते हैं. लेवल 2 में लोअर डिवीजन, लेवल 3 में कांस्‍टेबल और कुशल कर्मचारी आते हैं. लेवल 4 में ग्रेड डी स्‍टेनोग्राफर और यूनियर क्‍लर्क आते हैं, जिनकी मौजूदा सैलरी 25,500 रुपये है. अगर 3.83 रखा जाता है तो मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, सैलरी में बढ़ोतरी कुछ इस प्रकार हो सकती है।  संभावित नई बेसिक पे: लगभग 68,940 रुपये     लेवल-1: 18,000 रुपये  से बढ़कर लगभग 69,000 रुपये     लेवल-2: 19,900 रुपये से बढ़कर लगभग 76,000 रुपये     लेवल-3: 21,700 रुपये  से बढ़कर लगभग 83,000 रुपये     लेवल-4: 25,500 रुपये से बढ़कर लगभग 97,000 रुपये     लेवल-5: 29,200 रुपये से बढ़कर लगभग 1.11 लाख रुपये मिड लेवल कर्मचारियों की सैलरी बढ़ोतरी      लेवल-6: 35,400 रुपये से बढ़कर लगभग 1.35 लाख रुपये     लेवल-7: 44,900 रुपये  से बढ़कर लगभग 1.72 लाख रुपये     लेवल-8: 47,600 रुपये से बढ़कर लगभग 1.82 लाख रुपये     लेवल-9: 53,100 रुपये से बढ़कर लगभग 2.03 लाख रुपये सीनियर अधिकारियों सैलरी कितनी बढ़ सकती है     लेवल-13: 1.23 लाख रुपये से बढ़कर लगभग 4.71 लाख रुपये     लेवल-14: 1.44 लाख रुपये से बढ़कर लगभग 5.52 लाख रुपये     लेवल-15: 1.82 लाख रुपये से बढ़कर लगभग 6.97 लाख रुपये     लेवल-18: 2.50 लाख रुपये से बढ़कर लगभग 9.57 लाख रुपये  

सैकड़ों फ्री टीवी चैनल बंद होने की आशंका, 1.3 करोड़ दर्शकों पर पड़ेगा असर

नई दिल्ली Free TV Channels: भारत में स्मार्ट टीवी ने लोगों के टीवी देखने का तरीका पूरी तरह से बदल दिया है। अब सिर्फ इंटरनेट की मदद से दर्शक सैकड़ों चैनल और कंटेंट आसानी से देख पा रहे हैं। लेकिन अब इस सुविधा के भविष्य को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या यह फ्री सिस्टम आगे भी जारी रहेगा या नहीं। TRAI के नए नियम पर विचार टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) इस पर विचार कर रही है कि स्मार्ट टीवी ऐप्स को भी DTH और केबल टीवी की तरह नियमों के दायरे में लाया जाए। इस पर अंतिम फैसला 4 मई 2026 को आ सकता है। अगर यह नियम लागू होता है, तो कई फ्री चैनलों पर शुल्क लग सकता है। क्यों खत्म हो सकता है फ्री चैनलों का दौर? हाल ही में सामने आई जानकारी के मुताबिक Telecom Regulatory Authority of India यानी TRAI इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या स्मार्ट टीवी ऐप्स को भी DTH और केबल की तरह नियमों के दायरे में लाया जाए. इस मामले पर अंतिम फैसला 4 मई 2026 को आ सकता है. अगर ऐसा होता है तो अब तक मुफ्त में मिलने वाले कई टीवी चैनलों पर शुल्क लग सकता है।  कितने लोग होंगे प्रभावित? बताया जा रहा है कि भारत में करीब 13 करोड़ से ज्यादा लोग स्मार्ट टीवी के जरिए बिना किसी केबल या DTH कनेक्शन के 150 से अधिक चैनल मुफ्त में देख रहे हैं. इन यूजर्स को बस इंटरनेट और कुछ ऐप्स की जरूरत होती है जिससे वे न्यूज, एंटरटेनमेंट, स्पोर्ट्स और अन्य कई तरह के चैनल आसानी से एक्सेस कर लेते हैं।  DTH और स्मार्ट टीवी में क्या है फर्क? जहां एक तरफ DTH और केबल कंपनियां हर चैनल के लिए पैकेज बनाकर पैसे लेती हैं, वहीं स्मार्ट टीवी ऐप्स पर कई चैनल बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के उपलब्ध होते हैं. DTH कंपनियों को सरकार को भारी फीस देनी पड़ती है और उन्हें सख्त नियमों का पालन करना होता है जबकि स्मार्ट टीवी ऐप्स पर अभी तक ऐसे नियम लागू नहीं हैं. यही कारण है कि अब इस असमानता को खत्म करने की कोशिश की जा रही है।  क्या सभी यूजर्स पर पड़ेगा असर? हालांकि यह बदलाव बड़ा लग रहा है लेकिन हर यूजर पर इसका असर जरूरी नहीं है. आज के समय में ज्यादातर लोग स्मार्ट टीवी का इस्तेमाल Netflix, Amazon Prime Video और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए करते हैं. कई यूजर्स तो सिर्फ OTT कंटेंट या गेमिंग के लिए टीवी का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें फ्री चैनलों की जानकारी भी नहीं होती।  आने वाले समय में स्मार्ट टीवी पर फ्री चैनल देखना मुश्किल हो सकता है, लेकिन इसका असर हर किसी पर नहीं पड़ेगा. Telecom Regulatory Authority of India का फैसला यह तय करेगा कि भारत में टीवी देखने का अनुभव कितना बदलने वाला है।  करोड़ों यूजर्स पर असर भारत में करीब 13 करोड़ से ज्यादा लोग स्मार्ट टीवी के जरिए बिना DTH या केबल कनेक्शन के 150 से अधिक चैनल मुफ्त में देख रहे हैं। ये यूजर्स सिर्फ इंटरनेट और कुछ ऐप्स की मदद से न्यूज, एंटरटेनमेंट और स्पोर्ट्स चैनल आसानी से देख लेते हैं। बदलाव होने पर इन पर सीधा असर पड़ सकता है। DTH और स्मार्ट टीवी में अंतर DTH और केबल टीवी में हर चैनल के लिए पैकेज लेना पड़ता है और कंपनियों को सरकार को शुल्क भी देना होता है। वहीं स्मार्ट टीवी ऐप्स पर कई चैनल अभी मुफ्त में उपलब्ध हैं और उन पर नियम भी कम हैं। इसी असमानता को दूर करने के लिए नए नियमों पर चर्चा हो रही है। आगे क्या असर हो सकता है? अगर नए नियम लागू होते हैं तो स्मार्ट टीवी पर फ्री चैनलों का उपयोग महंगा हो सकता है। हालांकि इसका असर सभी यूजर्स पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि कई लोग अब OTT प्लेटफॉर्म जैसे Netflix, Amazon Prime Video और YouTube का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। TRAI का फैसला आने वाले समय में टीवी देखने के अनुभव को पूरी तरह बदल सकता है।

महंगाई का कहर: पाकिस्तान ने अपने ही लोगों पर डाला भारी बोझ, 11,000 करोड़ की रकम जुटाई

इस्लामाबाद पाकिस्‍तान के कटोरे में एक बार फिर अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भीख का पैसा डाल दिया है. इसके लिए पाकिस्‍तान को अपने ही लोगों का खून चूसना पड़ा. महंगाई बढ़ानी पड़ी और जब उसने आईएमएफ के सभी जरूरी मानक पूरे कर दिए तो अब 1.21 अरब डॉलर यानी करीब 11 हजार करोड़ रुपये का कर्ज उसे दिया गया है. आईएमएफ ने दो अलग-अलग चल रहे फाइनेंसिंग अरेंजमेंट्स के तहत पाकिस्‍तान के लिए यह कर्ज मंजूर किया है और माना जा रहा है कि अगले सप्‍ताह पैसे मिल जाएंगे।  आईएमएफ ने सितंबर 2024 में एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (EFF) के तहत 37 महीनों में 7 अरब डॉलर देने पर सहमति जताई थी. इसके अलावा रेजिलिएंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी (RSF) के तहत 1.4 अरब डॉलर देने का फैसला किया था. IMF के कार्यकारी बोर्ड ने EFF के तहत पाकिस्तान को लगभग 1 अरब डॉलर और RSF के तहत लगभग 21 करोड़ डॉलर देने पर सहमति दी है. इस तरह, कुल मिलाकर उसे 1.20 अरब डॉलर का कर्ज दिया गया है।  पाकिस्‍तान को कुल कितना पैकेज पाकिस्तान अब तक IMF से दो कर्ज पैकेजों के तहत कुल 8.4 अरब डॉलर में से 4.5 अरब डॉलर (करीब 40 हजार करोड़ रुपये) का कर्ज ले चुका है. एक्सप्रेस ट्रिब्यून के मुताबिक, यह पैसा अगले हफ्ते की शुरुआत में जारी किया जाएगा, जिससे पाकिस्‍तान के सेंट्रल बैंक का रिजर्व बढ़कर 17 अरब डॉलर हो जाएगा. हालांकि, यह भारत के 700 अरब डॉलर के रिजर्व के मुकाबले बहुत छोटा हिस्‍सा है।  कर्ज पाने के लिए जनता पर जुल्‍म पाकिस्‍तान को भले ही आईएमएफ से 1.20 अरब डॉलर का कर्ज मिल गया हो, लेकिन इस कर्ज को पाने के बाद भी पाक सरकार को पुराने वित्तीय और मौद्रिक लक्ष्यों पर टिके रहना पड़ा और स्थिरता के रास्ते पर बने रहने की प्रतिबद्धता का पालन करना होगा. भले ही इन नीतियों के खिलाफ जनता लगातार आवाज उठा रही है, क्‍योंकि इससे बेरोजगारी, गरीबी और आर्थिक असमानता बढ़ रही है. IMF की मंजूरी तब मिली जब सरकार ने वित्तीय और मौद्रिक लक्ष्यों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन दिखाया, लेकिन इस वित्तवर्ष की दूसरी छमाही में सरकार के इस रवैये को लेकर अलग-अलग स्‍वर उठ रहे हैं।  आईएमएफ के पैमाने पर खरा उतरा देश IMF मिशन ने जुलाई-दिसंबर 2025 की अवधि में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन की समीक्षा की थी, जिसमें 7 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की तीसरी समीक्षा शामिल थी. पाकिस्तान ने दिसंबर 2025 के अंत तक सभी क्वांटिटेटिव परफॉर्मेंस क्राइटेरिया पूरे किए और नेट इंटरनेशनल रिजर्व्स के फ्लोर पर भी बेहतर प्रदर्शन किया. साथ ही जनरल गवर्नमेंट का प्राइमरी बैलेंस टारगेट भी आसानी से हासिल किया. सरकार ने दिसंबर 2025 के अंत तक आठ में से छह इंडिकेटिव टारगेट्स पूरे किए, लेकिन फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू सबसे कमजोर कड़ी रहा. FBR द्वारा जुटाए गए नेट टैक्स रेवेन्यू और रिटेलर्स से इनकम टैक्स रेवेन्यू IMF के लक्ष्यों से कम रहे।