samacharsecretary.com

दिल दहला देने वाला कांड: बाप की लाश काटकर छिपाने वाले बेटे की जुबान पर अब ‘माफी’

लखनऊ यूपी की राजधानी लखनऊ में पैथालॉजी और शराब की दुकानें चलाने वाले कारोबारी मानवेंद्र सिंह की हत्या से प्रदेश को दहला देने वाले उनके इकलौते बेटे अक्षत को बुधवार को जेल भेजा जा रहा है। इसके पहले जब आशियाना पुलिस अक्षत को कोर्ट में पेश करने के लिए ले जा रही थी उस वक्त मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए अक्षत ने जो कुछ कहा उससे लगा कि जैसे उसे अब अपने किए पर पछतावा हो रहा है। अक्षत ने कहा- ‘सॉरी…गलती से हो गया।’ उधर, मानवेंद्र का अंतिम संस्कार भी उनके इकलौते बेटे के नहीं बल्कि भतीजे के हाथों हुआ। घर की मान्यता के अनुसार मानवेंद्र के पिता भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए। लखनऊ के आशियाना के बंगला बाजार में मानवेंद्र सिंह को 20 फरवरी को उनके बेटे अक्षत ने सोते समय सिर में गोली मारी थी। गोली से उनका भेजा उड़ गया था और कमरे में मांस से लोथड़े फैल तक गए थे। इसके बाद शव बाथरूम में घसीट कर ले गया। वहां आरी और चाकू से हाथ-पैर काटकर एक बोरी में रखे। अगले दिन कार से बोरी ले जाकर सदरौना में नहर किनारे झाड़ियों में छिपाया था। मंगलवार को यह खुलासा दोपहर पुलिस की पूछताछ में हुआ। पुलिस टीम अक्षत को घटनास्थल उसके घर ले गई थी। आधे घंटे पूछताछ की कि उसने कैसे और कहां पिता को मारा था? बोरी में मिले मानवेंद्र के हाथ और पैर आशियाना पुलिस टीम हत्यारोपित अक्षत को मंगलवार सुबह सदरौना लेकर पहुंची थी। सदरौना ने वह नहर किनारे झाड़ियों में पुलिस को ले गया। वहां एक बोरी रखी मिली। बोरी में मानवेंद्र के कटे हुए हाथ-पैर रखे थे। पुलिस ने उसे बरामद कर लिया और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। सिर से सटाकर मारी गोली, बाथरूम में ले गया शव पूछताछ के दौरान अक्षत ने बताया कि 19 फरवरी को देर रात पिता से उसका नीट की पढ़ाई को लेकर विवाद हुआ था। इसके बाद वह बेडरूम में सो गए थे। अक्षत पुलिस टीम को बेडरूम में ले गया। 20 फरवरी को तड़के करीब 4:30 बजे उसने राइफल उठाई। पापा के सिर से सटाकर उन्हें गोली मार दी। बिस्तर और कंबल में मांस से लोथड़े चिपक गए थे। गोली की आवाज सुनकर बहन कृति जाग गई। उसने विरोध किया तो उसे धमकाया। वह चुप हो गई थी। पिता का शव खींचकर बाथरूम में ले गया। वहां आरी और चाकू से हाथ-पैर काटे। मांस के लोथड़े बोरी में भरे फिर कार की डिग्गी में रख आया था। खून से सना तकिया और कंबल जलाए अक्षत ने पुलिस को पूछताछ में बताया कि गोली मारने से कंबल, चादर और तकिया पर खून लग गया था। मांस के लोथड़े चिपक गए थे। वह सब भी वह बोरी में भरकर सदरौना में नहर किनारे ले गया था। वहां सब कुछ जला दिया था। पुलिस ने अधजले कपड़े और राख आदि भी बरामद कर ली है। एसीपी कैंट अभय प्रताप मल्ल ने बताया कि आरोपी अक्षत को उसके घर ले जाकर मौका मुआयना किया गया। घटना के बारे में जानकारी ली गई। अक्षत ने बताया कि उसने पिता की हत्या के लिए एक दिन पहले ब्लिंकिट से दो चाकू मंगवाई थी। आरी और ड्रम वह खुद बाजार से खरीदकर लाया था।

मौसम अपडेट: दो नए वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से बदलेगा मौसम, इन इलाकों में बारिश का अलर्ट जारी

नई दिल्ली उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों में दो नए वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की दस्तक हो रही है। इन कमजोर वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की वजह से पहाड़ी राज्यों में 26-28 फरवरी और दो व तीन मार्च को बारिश व बर्फबारी की चेतावनी जारी की गई है। इसके अलावा, इस हफ्ते उत्तर पश्चिम भारत के कई हिस्सों में अधिकतम तापमान सामान्य से तीन से पांच डिग्री अधिक रहने वाला है। मौसम विभाग के अनुसार, 25 व 26 फरवरी को अंडमान व निकोबार द्वीप समूह में छिटपुट से लेकर काफी व्यापक बारिश, बिजली और 30-40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने की संभवाना है। इसके अलावा, 25 फरवरी को अरुणाचल प्रदेश, उप हिमालयी पश्चिम बंगाल, सिक्किम, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, पुडुचेरी, कराईकल, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक, केरल, माहे, लक्षद्वीप में छिटपुट से मध्यम बारिश होने का अलर्ट जारी किया गया है। वहीं, 25 व 26 फरवरी को उत्तर आंतरिक कर्नाटक में और 26 फरवरी को तेलंगाना में भी यही संभावना है। 26 और 27 फरवरी को जम्मू कश्मीर में, 27 व 28 फरवरी को हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में छिटपुट बारिश होगी। पंजाब और हिमाचल प्रदेश में 26 फरवरी तक कुछ इलाकों में सुबह से शाम तक घना कोहरा रहने की संभावना है। अगले सात दिनों के दौरान उत्तर पश्चिम अज्ञैर मध्य भारत के मैदानी इलाकों में अधिकतम तापमान में दो से तीन डिग्री की बढ़ोतरी होगी। अगले 24 घंटे में महाराष्ट्र में अधिकतम तापमान में कोई अहम बदलाव होने की संभावना नहीं है और उसके बाद छह दिनों में इसमें दो से तीन डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होगी। अगले दो दिनों के दौरान पूर्वी भारत में अधिकतम तापमान में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन होने वाला नहीं है।  

चीन-नीति पर फिर घिरे पंडित नेहरू: BJP ने उठाए पुराने समझौते, लगाए गंभीर आरोप

नई दिल्ली भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बुधवार (25 फरवरी) को कांग्रेस पर आरोप लगाया कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने पूरे कार्यकाल में बार-बार 'क्षेत्रीय समझौते' किए और भारत की सीमाओं का हमेशा के लिए 'पुन: निर्धारण' कर दिया। भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर सरकार पर कांग्रेस के हमले की पृष्ठभूमि में भाजपा ने विपक्षी दल पर पलटवार किया है। भाजपा प्रवक्ता अनिल बलूनी ने 'कम्प्रोमाइज्ड कांग्रेस' हैशटैग के साथ सोशल मीडिया 'एक्स' पर लिखा, ''प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू का पहला कर्तव्य: भारत की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना था लेकिन उन्होंने इसके बजाय अपने पूरे शासनकाल में क्षेत्रीय समझौते किए।" बलूनी ने आगे लिखा, "तिब्बत को टुकड़े-टुकड़े में गंवा दिया गया। अक्साई चिन को लेकर समझौता कर लिया गया। बेरुबारी को लेकर समझौता कर लिया गया। पंजाब के गांवों को लेकर समझौता कर लिया गया। रण के कच्छ को लेकर समझौता किया गया। और कश्मीर को लेकर भी करीब-करीब टुकड़ों में समझौता कर लिया गया।'' भाजपा सांसद ने दावा किया, ''बार-बार समझौते। यह नेहरू का नेतृत्व था। एक व्यक्ति के समझौते करने की वजह से भारत का नक्शा हमेशा के लिए बदल गया।'' ''डाक, टेलीग्राफ और फोन सेवाएं चीन को सुपुर्द कर दी गईं बलूनी ने आरोप लगाया कि नेहरू ने तिब्बत में भारत के अधिकारों को छोड़ दिया। उन्होंने दावा किया, ''डाक, टेलीग्राफ और फोन सेवाएं चीन के सुपुर्द कर दी गईं। तिब्बत को चीन के क्षेत्र के रूप में पहचाना गया। माओ को पूरा बफर जोन मुफ्त में सौंप दिया गया।'' भाजपा नेता ने कहा, ''अक्साई चिन: चीन ने 1951 से सैन्य सड़क बनाना शुरू किया। तत्कालीन आईबी प्रमुख बीएन मलिक ने 1952 में नेहरू को आगाह किया था लेकिन उन्होंने पूरी तरह अनदेखी की। सड़क 1957 में बनकर तैयार हो गई। 1959 में नेहरू ने संसद में कहा: 'इन अफवाहों पर ध्यान मत दो'। आठ साल का झूठ, जबकि भारत की जमीन को हथिया लिया गया।'' पश्चिम बंगाल का आधा क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिया बेरुबारी पर नेहरू-नून के समझौते का जिक्र करते हुए बलूनी ने आरोप लगाया कि प्रथम प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल का आधा क्षेत्र बिना कैबिनेट मंजूरी के पाकिस्तान को दे दिया। उन्होंने आरोप लगाया, ''कोई कैबिनेट मंजूरी नहीं। पश्चिम बंगाल सरकार से कोई परामर्श नहीं। उच्चतम न्यायालय ने नाखुशी जताते हुए कहा था: प्रधानमंत्री भारतीय जमीन को उपहार में नहीं दे सकते। नेहरू ने अपने समर्पण को कानूनी रूप देने के लिए नौवां संविधान संशोधन कराया।'' जनमत संग्रह का ऐलान पाक को कूटनीतिक हथियार भाजपा प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि नेहरू ने मंत्रिमंडल की मंजूरी के बिना कश्मीर में 'सार्वजनिक रूप से' जनमत संग्रह का ऐलान कर दिया और पाकिस्तान को ''एक स्थायी कूटनीतिक हथियार'' दे दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू ने 1960 में सारजा माजरा, रख हरदित सिंह, पठानके और फिरोजपुर के हिस्सों को पाकिस्तान को सौंप दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका समझौते के खिलाफ मंगलवार को आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री ने 'एपस्टीन फाइल्स' जारी होने की धमकियों के बाहरी दबाव में समझौते को मंजूरी दी।  

भोजशाला से कमाल मौला मस्जिद तक: धार में हिंदू-मुस्लिम टकराव की जड़ क्या है?

धार मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला परिसर से जुड़ी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद एक बार फिर यह विवाद चर्चा में आ गया है। सैकड़ों सालों से हिंदू और मुसलमान इस पर अपना-अपना दावा पेश करते रहे हैं। इस बीच हाई कोर्ट में एएसआई ने जो रिपोर्ट पेश की है उसमें कहा गया है कि कमाल मौला मस्जिद को मंदिर के पुराने अवशेषों से बनाया गया है। आइए नजर डालते हैं भाजशाला परिसर के एक साल के पुराने इतिहास पर। 1034 ईस्वी में भोजशाला की स्थापना 1010 से 1055 तक मालवा क्षेत्र में राजा भोज का शासन था। इस दौरान उन्होंने 1034 में सरस्वती सदन की स्थापना की, जिसे भोजशाला भी कहा जाता है। यहां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। मुस्लिम शासकों का आगमन और कमाल मौला 1305-1531- इस कालखंड में अलाउद्दीन खिलजी और दिलावर खान गोरी ने महालकदेव और गोलादेव को हराकर धार पर कब्जा कर लिया। उन्होंने राजा भोज के समय बने कई मंदिरों और स्मारकों को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद यहां स्वतंत्र मालवा सत्नत की स्थापना की गई और भोजशाला के अधिकांश हिस्से को भी ध्वस्त कर दिया गया। यहीं 1459 में मौलना कमालुद्दीन का मकबरा भी बनाया गया जिन्हें कमाल मौला के नाम से भी जाना जाता है। कमाल मौला का वास्तविक नाम शेख कमल अल-दीन था। वह मालवा में 14वीं शताब्दी के प्रमुख सूफी संत थे। निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य रहे कमाल मौला का देहांत 1331 में हुआ था। कहा जाता है कि औलिया ने उन्हें मालवा क्षेत्र में धार और आसपास के इलाकों में इस्लाम के प्रचार के लिए भेजा गया था। कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के चेयरमैन अब्दुल समद कहते हैं कि कमाल मौला मकबरा मस्जिद और विवादित भोजशाला के करीब है। कैसे वाग्देवी की प्रतिमा पहुंच गई लंदन 1732- में धार पर मराठा शासकों का कब्जा हो गया। 1875 में भोजशाला के पास खुदाई के दौरान वाग्देवी की प्रतिमा मिली, जिसे 1880 में एक अंग्रेज अधिकारी लेकर लंदन चला गया। तब से वाग्देवी की प्रतिमा लंदन के एक म्यूजियम में है। फिर कैसे आई मौजूदा व्यवस्था 1909 में धार शासकों ने प्राचीन स्मारक कानून 1904 लागू किया और धार दरबार गैजेट जारी करते हुए इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया। 1934 में धार के शासकों ने यहां से अवैध अतिक्रमण हटाते हुए भोजशाला का साईनबोर्ड लगाया। 1934 में तब के धार के दीवान के नादकर ने भोजशाला को कमाल मौलाना मस्जिद घोषित किया और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी। हिंदू मुस्लिम टकराव और ASI के हवाले भोजशाला 1944 में मौलाना कमलुद्दीन का पहला उर्स हुआ और हिंदू-मुसलमानों के बीच इस स्थल को लेकर टकराव बढ़ गया। 1952 में हिंदुओं ने बसंत पंचमी पर भोज उत्सव का आयोजन किया। 1952 में एएसआई ने भोजशाला को संरक्षित घोषित किया। 1988 में भी मरम्मत के दौरान यहां एक मूर्ति मिली थी। 1997 में धार के कलेक्टर ने शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज और बसंत पंचमी पर हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी। अप्रैल 2003 में एएसआई ने हिंदुओं को फूल और अक्षत से हर मंगलवार को पूजा की अनुमति दी, जबकि मुसलमान शुक्रवार को नमाज अदा कर सकते हैं। जब शुक्रवार के दिन आई बसंत पंचमी 2006 में शुक्रवार के दिन बसंत पंचमी होने की वजह से कर्फ्यू लागू करना पड़ा। कड़ी सुरक्षा के बीच दोनों समुदायों ने अपने आयोजन किए। इसके बाद 2013 में भी जब ऐसा मौका आया तो कड़ी सुरक्षा और तनाव के बीच पूजा और नमाज हुई। हालांकि,तब लोगों ने आरोप लगाया कि आम लोगों को वहां नहीं जाने दिया गया और पुलिसकर्मियों ने ही परंपरा निभाई। 2016 में भी जब ऐसा मौका आया तो वहां दोनों समुदाय के लोग आपस में भिड़ गए थे। मार्च 2024 में सर्वेक्षण का आदेश मध्य प्रदेश की इंदौर बेंच ने मार्च 2024 में भोजशाला परिसर में सर्वे का आदेश दिया। इसे छह महीने सप्ताह में पूरा करना था। मार्च 2024 में एएसआई ने सर्वे की शुरुआत की जो 98 दिनों तक चला। 15 जुलाई 2024 को एएसआई ने 2189 पन्नों की सर्वे रिपोर्ट मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में पेश की। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को एएसआई रिपोर्ट को खोलने और सभी पक्षों को देने को कहा। इके बाद हाई कोर्ट ने रिपोर्ट की समीक्षा शुरू की और सभी पक्षों को दो सप्ताह में अपनी आपत्तियां, विचार, सलाह, सिफारिश आदि दोनों को कहा है।

केरल के बाद अब दिल्ली का नाम बदलने की चर्चा, बीजेपी सांसद ने रखीं ये दलीलें

नई दिल्ली केरल का नाम बदलकर केरलम किए जाने के फैसले पर केंद्र सरकार की मुहर लगने के बाद अब दिल्ली की नई पहचान की मांग भी उठ गई है। भाजपा के सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने दिल्ली का नाम बदलकर 'इंद्रप्रस्थ' करने की मांग की है। उन्होंने इसके लिए गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को लेटर लिखकर अपनी दलीलें पेश की हैं। दिल्ली के चांदनी चौक से भाजपा सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ करने पर विचार करने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि ऐसा कदम भारत की राजधानी की ऐतिहासिक और सभ्यतागत पहचान को पुनर्स्थापित करेगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि दिल्ली में किसी स्थान पर,संभवतः पुराना किला में पांडवों की प्रतिमाएं स्थापित की जाएं, जिससे दिल्ली की प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को पुनर्जीवित किया जा सके। विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने का सुझाव खंडेलवाल ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को भी लेटर लिखा है और उनसे अनुरोध किया है कि दिल्ली विधानसभा में दिल्ली का नाम 'इंद्रप्रस्थ' करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया जाए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लिखे एक लेटर में खंडेलवाल ने कहा कि भारत विश्व की सबसे प्राचीन जीवित सभ्यताओं में से एक है और उसकी राष्ट्रीय राजधानी का नाम भी उसके गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करना चाहिए। और क्या दलीलें खंडेलवाल ने कहा कि ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्य और दीर्घकालिक सभ्यतागत परंपराएं यह स्थापित करती हैं कि वर्तमान दिल्ली ही प्राचीन इंद्रप्रस्थ का स्थल है, जो पांडवों द्वारा स्थापित भव्य राजधानी थी, जैसा कि महाकाव्य महाभारत में वर्णित है। महाभारत में इंद्रप्रस्थ को यमुना नदी के तट पर बसा एक समृद्ध और भव्य नगर बताया गया है, जो आज की दिल्ली के भौगोलिक स्वरूप से पूरी तरह मेल खाता है। उन्होंने आगे बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा पुराना किला में की गई खुदाई में लगभग 1000 ईसा पूर्व के प्राचीन बसावट के प्रमाण मिले हैं, जिनमें पेंटेड ग्रे वेयर (PGW) संस्कृति के अवशेष भी शामिल हैं, जिन्हें महाभारत काल से जोड़ा जाता है। उनके अनुसार ये खोजें इस ऐतिहासिक धारणा को मजबूत करती हैं कि प्राचीन इंद्रप्रस्थ इसी स्थान पर स्थित था जहां आज दिल्ली है। खंडेलवाल ने कहा कि 'दिल्ली' नाम अपेक्षाकृत बाद के मध्यकालीन दौर में प्रचलन में आया, जिसे इतिहासकार ढिल्लिका या देहली जैसे नामों से जोड़ते हैं। लेकिन यह इसकी मूल और प्राचीन सभ्यतागत पहचान का प्रतिनिधित्व नहीं करता। सांसद ने बताया क्या होगा फायदा खंडेलवाल ने कहा, 'इंद्रप्रस्थ राजधानी की मूल सभ्यतागत पहचान का प्रतीक है, जबकि दिल्ली इतिहास के एक बाद के चरण को दर्शाता है। राजधानी का नाम इंद्रप्रस्थ करना भारत की प्राचीन विरासत से उसके संबंध को पुनर्स्थापित करेगा और भारत की सांस्कृतिक निरंतरता को मजबूत करेगा।' खंडेलवाल ने यह भी कहा कि भारत में कई शहरों के ऐतिहासिक नाम पुनर्स्थापित किए जा चुके हैं, जिनमें मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और प्रयागराज प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि इंद्रप्रस्थ नाम पहले से ही दिल्ली के कई प्रमुख संस्थानों और स्थानों में प्रचलित है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस ऐतिहासिक नाम को समाज में स्वाभाविक स्वीकृति प्राप्त है। खंडेलवाल ने कहा कि दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ करना भारत की राजधानी की सभ्यतागत पहचान को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा, जिससे राष्ट्रीय गौरव मजबूत होगा और विश्व के सामने भारत की प्राचीन विरासत और भी प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत होगी। औपचारिक प्रक्रिया शुरू करने की मांग उन्होंने गृह मंत्री श्री अमित शाह से आग्रह किया कि इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और अन्य विशेषज्ञों से परामर्श कर इस प्रस्ताव पर औपचारिक प्रक्रिया शुरू की जाए। खंडेलवाल ने कहा, 'यह कदम न केवल एक ऐतिहासिक विसंगति को दूर करेगा, बल्कि भारत की महान सभ्यता की विरासत को सम्मान देने और उसे संरक्षित रखने की हमारी प्रतिबद्धता को भी सशक्त करेगा।'  

सीटें कम, दावेदार ज्यादा: महाराष्ट्र BJP की बैठक में नामों पर गहन चर्चा, लिस्ट पहुंची दिल्ली

नई दिल्ली/मुंबई देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने वाले हैं। इन सीटों के लिए रेस जारी है और उन दलों में मंथन भी तेज है, जो सीटें जीतने की स्थिति में हैं। फिलहाल महाराष्ट्र में भी हलचल तेज है, जहां भाजपा बीते कई सालों से लगातार अपनी पकड़ मजबूत बना रही है। 2024 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा दल बनी भाजपा में दावेदारों की कमी नहीं है, लेकिन उसके पास 4 सीटें ही फिलहाल जीतने का मौका है। राज्य में 7 सीटों पर राज्यसभा इलेक्शन होना है। भाजपा सूत्रों का कहना है कि इन चार में से एक सीट पर रिपब्लिक पार्टी ऑफ इंडिया के नेता रामदास आठवले का चुना जाना लगभग तय है। अब बची एक सीट, जिसे लेकर भाजपा में दावेदारों की भरमार हैं। इसी को लेकर मंगलवार को देर रात मीटिंग चली। मुंबई में हुई इस बैठक में कई सीनियर नेता मौजूद थे। सीएम देवेंद्र फडणवीस और प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण समेत कुल 12 नेता मीटिंग में थे। इस दौरान कई नामों पर चर्चा हुई, लेकिन राज्य स्तर से किसी भी नाम पर सहमति नहीं बनी है। इसके चलते कई नाम केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष विचार के लिए दिल्ली भेजे गए हैं। इन नामों पर मंथन के लिए घंटों बैठक चली। भाजपा सूत्रों का कहना है कि रामदास आठवले का नाम तय माना जा रहा है। उनके अलावा एक सीट के लिए जिन नामों पर चर्चा हुई, उनमें विनोद तावड़े, रावसाहब दानवे, प्रीतम मुंडे, विजय राहटकर और भागवत कराड़ शामिल हैं। पार्टी सूत्रों ने कहा कि नेतृत्व चाहता है कि किसी ऐसे नेता को मौका दिया जाए, जो अनुभव भी हो और क्षेत्रीय एवं सामुदायिक प्रतिनिधित्व भी हो सके। सूत्रों ने कहा कि इस मीटिंग में सभी ने खुलकर बात की और अपनी ओर से जिन नामों के बारे में वे सोच रहे थे, उनका प्रस्ताव रखा। अब इन नामों को दिल्ली भेजा गया है। जल्दी ही नामों की सूची पर विचार करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण दिल्ली जाकर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात करेंगे। अंत में केंद्रीय नेतृत्व की ओर से ही फैसला लिया जाएगा। पार्टी सूत्रों का कहना है कि भाजपा की लीडरशिप चाहती है कि राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम 28 फरवरी तक फाइनल कर दिए जाएं। किन नेताओं के तय माने जा रहे हैं नाम, अब दिल्ली में चर्चा होगी दरअसल महाराष्ट्र भाजपा में ऐसे कई नेता हैं, जो राज्य सरकार में शामिल नहीं हैं। ऐसे में वे चाहते हैं कि उन्हें राज्यसभा ही भेज दिया जाए। भाजपा सूत्रों का कहना है कि विनोद तावड़े का राज्यसभा जाना तय माना जा रहा है। इसके अलावा प्रीतम मुंडे की दावेदारी पर भी विचार चल रहा है। वहीं अजित पवार की एनसीपी की ओर से पार्थ पवार को भेजा जा सकता है और उनकी मां सुनेत्रा पवार अब राज्य में ही डिप्टी सीएम का पद संभालेंगी। इस तरह अजित पवार फैमिली ही मुंबई से दिल्ली तक की राजनीति का कंट्रोल अपने पास रखेगी।  

UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, CJI सूर्यकांत बोले—‘सीमा पार कर रही हैं ऐसी याचिकाएं’

नई दिल्ली UGC यानी विश्विद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में फिर याचिका दाखिल हुई है। बुधवार को इस याचिका पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि याचिका मीडिया में पब्लिसिटी हासिल करने के मकसद से की गई है। उन्होंने पूछा कि इस याचिका में अन्य याचिकाओं से अलग क्या है। एडवोकेट ने कहा, 'मेरा आधार यह है कि नियमों को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बनाया गया है।' हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब इक्विटी रेगुलेशंस के खिलाफ किसी ने शीर्ष न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इसपर सीजेआई ने कहा कि इसके जरिए मीडिया में चर्चा में आने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा, 'यह जनहित याचिका (PIL) क्यों? अब यह हद से ज्यादा हो रहा है। यह सब केवल बाहर मीडिया को संबोधित करने के लालच में किया जा रहा है। वरना आप यूट्यूब पर कैसे आएंगे! इस याचिका में ऐसा क्या अलग है जो दूसरी याचिकाओं में नहीं था?' जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक सुप्रीम कोर्ट ने नियमों पर जनवरी में रोक लगा दी थी। न्यायालय ने कहा कि यह प्रारूप 'प्रथम दृष्टया अस्पष्ट' है, इसके 'बहुत व्यापक परिणाम' हो सकते हैं और इसका प्रभाव 'खतरनाक रूप से' समाज को विभाजित करने वाला भी हो सकता है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा था कि विनियमों में 'कुछ अस्पष्टताएं' हैं और 'इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।' दरअसल, नियमों को लेकर दलीलें दी गईं थीं कि यूजीसी ने जाति-आधारित भेदभाव की 'गैर-समावेशी' परिभाषा अपनाई है और कुछ श्रेणियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा है। इन नियमों के खिलाफ देश में कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए जिसमें छात्र समूहों और संगठनों ने इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग की। इन याचिकाओं में इस विनियम को इस आधार पर चुनौती दी गई कि जाति-आधारित भेदभाव को सिर्फ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में ही परिभाषित किया गया है। क्या हैं नियम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 में यह अनिवार्य किया गया है कि इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय से तथा दिव्यांग एवं महिला सदस्य शामिल होने चाहिए।  

Apple का नया आलीशान ऑफिस बेंगलुरु में, ₹2.84 करोड़ मासिक किराया

बेंगलुरु  Apple बेंगलुरु में 10 साल के लिए ऑफिस स्पेस लीज पर लेकर भारत में अपना विस्तार कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, दिग्गज टेक कंपनी ने 'एम्बेसी जेनिथ' (Embassy Zenith) नाम की कमर्शियल ऑफिस टावर में 1.21 लाख वर्ग फुट का वर्कस्पेस हासिल किया है, जिसका मासिक किराया 2.84 करोड़ रुपये है. इस विस्तार के बाद, एप्पल अब इस पूरी इमारत में कुल 3.89 लाख वर्ग फुट क्षेत्र का उपयोग कर रहा है. रियल एस्टेट डेटा एनालिटिक्स फर्म 'प्रॉपस्टैक' (Propstack) द्वारा प्राप्त दस्तावेजों के मुताबिक, नया लीज समझौता सटीक रूप से 1,21,203 वर्ग फुट के चार्जेबल एरिया के लिए है. एप्पल ने पूरे 10 साल के लिए  ऑफिस लीज पर लिया है. इस जगह का कुल किराया लगभग 1,333 करोड़ रुपये होगा. यह ऑफिस स्पेस इमारत की ग्राउंड फ्लोर से लेकर चौथी मंजिल तक फैला हुआ है. 14.24 करोड़ की सिक्योरिटी जमा की यह प्रॉपर्टी मैक चार्ल्स (इंडिया) द्वारा लीज पर दी गई है और इस लीज की शुरुआत 25 सितंबर 2025 से हो चुकी है. आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, एप्पल पहले ही सिक्योरिटी डिपोजिट के रूप में 14.24 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है.  यह भी रिपोर्ट किया गया है कि 3 अप्रैल 2026 से किराए में हर साल 4.5% की वृद्धि होगी. समझौते में यह भी उल्लेख किया गया है कि एप्पल 2 अप्रैल 2030 से पहले इस लीज को समाप्त नहीं कर सकता है. इसके अलावा, एप्पल 123 पार्किंग स्लॉट के लिए अलग से मासिक शुल्क का भुगतान करेगा, जिसकी कीमत 11.07 लाख रुपये तय की गई है. हालांकि रियल एस्टेट डेटा एनालिटिक्स ने विस्तार के इस विवरण का खुलासा किया है, लेकिन एप्पल ने इस नए जोड़े गए स्पेस के बारे में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है. फिर भी, कंपनी धीरे-धीरे अपने ऑफिस और रिटेल स्टोर नेटवर्क को बढ़ाकर भारत में अपनी उपस्थिति का विस्तार कर रही है.

दो दशक का सफर: इजरायल के साथ पीएम मोदी की हर यात्रा ने रचा इतिहास

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय इजरायल की यात्रा पर हैं। उनकी यह यात्रा ऐतिहासिक होगी। वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री होंगे, जो इजरायली संसद 'नेसेट' को संबोधित करेंगे। इसी बीच, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर 'मोदी आर्काइव' नामक अकाउंट ने उनकी ऐतिहासिक इजरायली यात्राओं और उससे जुड़ी तस्वीरों को शेयर किया है। 'मोदी आर्काइव' के अनुसार, नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर 2006 में पहला इजरायल दौरा किया था। वे इजरायल की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय कृषि प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी 'एग्रीटेक-2006' में एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ गए थे, जिसमें भारत के कृषि क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-इजरायल बिजनेस फोरम में 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' (एक बूंद अधिक फसल) स्लोगन के साथ गुजरात का एग्रीकल्चरल विजन पेश किया। शायद यह पहली बार था, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस बात को कहा, जो आगे चलकर 'प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना' का आधिकारिक आदर्श वाक्य बन गया। गुजरात डेलीगेशन की इंटरनल रिपोर्ट में बताया गया कि उनके प्रेजेंटेशन को 'सबसे ज्यादा तालियां और तारीफ' मिली। 11 साल बाद 2017 में प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने इजरायल का दौरा किया। यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय यात्रा थी। मोदी आर्काइव में बताया गया है, "2006 में जो एग्रीकल्चर थीम चली थी, वह इस बार भी जारी रही।" इसमें कहा गया है कि इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू ने तेल अवीव स्थित डेंजीगर फ्लावर फार्म (पुष्प उद्यान) का दौरा किया। यहां इजरायल की लीडिंग फ्लावर जेनेटिक्स कंपनी ने एक नया सफेद गुलदाउदी बनाया था और उसका नाम 'मोदी' रखा। फूलों की खेती इजरायल के सबसे एडवांस्ड एग्रीकल्चरल एक्सपोर्ट सेक्टर में से एक है। फ्लावर फार्म का दौरा इस बात का संकेत था कि इजरायली एग्रीकल्चरल इनोवेशन कहां तक पहुंच गया है। इसमें आगे कहा गया है कि यात्रा के दौरान कृषि क्षेत्र में साइन किया गया 3-साल का वर्क प्रोग्राम उस पहल का औपचारिक संस्थानीकरण था, जिसकी शुरुआत बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से एग्रीटेक-2006 में की थी। 'मोदी आर्काइव' में कहा गया है कि मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने जिस रिलेशनशिप पर काम किया था, वह प्रधानमंत्री के तौर पर 'सरकार-से-सरकार' की रूपरेखा बन गई। बाद में तेल अवीव में भारतीय प्रवासियों को अपने संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि कृषि क्षेत्र में इजरायल का सहयोग भारत को दूसरी ग्रीन रेवोल्यूशन में मदद कर सकता है। 'मोदी आर्काइव' में कहा गया कि 2006 और 2017 की यात्राओं को जोड़ने वाली कड़ी कृषि और जल संसाधन प्रबंधन है। दोनों देश अलग-अलग दृष्टिकोणों से समान समस्याओं पर काम कर रहे थे। भारत के पास व्यापक पैमाना, कृषि भूमि और आवश्यकता थी। वहीं, इजरायल ने सीमाओं को तकनीक में बदलते हुए ड्रिप सिंचाई, वेस्टवॉटर रीसाइक्लिंग और डीसैलिनेशन जैसे सिस्टम विकसित किए। मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने 2006 में ही पहचान लिया था कि ये वही तकनीकें हैं जिनकी गुजरात और भारत को जरूरत है और वे प्रधानमंत्री के रूप में इसे राष्ट्रीय प्रतिबद्धता बनाने के लिए वापस आए। इसमें कहा गया कि जब वे 2017 में पहुंचे तो कृषि सहयोग का एजेंडा राज्य यात्रा की तैयारी कर रहे अधिकारियों की ओर से अचानक तैयार नहीं किया गया था। इसकी रूपरेखा मई 2006 की एक दोपहर से ही बननी शुरू हो गई थी, जब मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने 'एग्रीटेक-2006' में एक हजार से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने प्रेजेंटेशन दी थी और इस विश्वास के साथ लौटे थे कि भारत और इजरायल मिलकर क्या बना सकते हैं। 9 साल के बाद फिर 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल दौरे पर गए हैं। इस बार भी भारत-इजरायल का एजेंडा कृषि, जल प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा पर केंद्रित रहने की उम्मीद है।

राजस्थान में 2 बच्चों से अधिक वाले उम्मीदवार भी पंचायत-नगरपालिका चुनाव में हिस्सा ले सकेंगे

जयपुर राजस्थान में दो से अधिक बच्चे वाले भी अब पंचायत और नगरपालिका चुनाव लड़ सकते हैं. राजस्थान कैबिनेट का फैसला. कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा- ‘कैबिनेट ने राजस्थान पंचायतीराज संशोधन बिल और राजस्थान नगरपालिका संशोधन बिल 2026 को मंजूरी दे दी है. कैबिनेट से मंजूरी के बाद पूरी संभावना है कि यही बिल राजस्थान विधानसभा के मौजूदा सत्र में पेश किया जाएगा. इससे पहले दो से अधिक बच्चे वाले पंचायत व नगरपालिका चुनाव नहीं लड़ सकते थे. समय की जरूरत है दो बच्चों की बाध्यता को हटाना: राज्यवर्धन सिंह राठौड़ कैबिनेट बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में राज्य के उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कहा कि राजस्थान सरकार ने आज बड़ा फैसला करते हुए पंचायत और नगरपालिका चुनाव में दो संतान का नियम हटा दिया है. अब किसी व्यक्ति के कितने भी बच्चे हैं वो पंचायत और नगरपालिका चुनाव लड़ सकता है. इससे पहले दो से अधिक संतान पर पंचायत और स्थानीय निकाय के चुनाव लड़ने पर रोक थी. राजस्थान के उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कहा ये समय की जरूरत है, इसलिए फैसला किया. राठौड़ ने कहा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत या बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री के बयान से इस फैसले का कोई संबंध नहीं है. राठौड़ ने कहा कि अगर हम उनके बयान से फैसला करते तो तीन बच्चे की भी बात कर सकते थे. 1995 में भैरोंसिंह शेखावत की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार ने राजस्थान में पंचायत चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों की बाध्यता लागू की थी. अब बीजेपी की भजनलाल सरकार ने ही इसे पलट दिया है. पंचायती राज चुनाव में दो संतानों की पाबंदी हटाने के मामले पर मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा कि पहले जनसंख्या का दबाव काफी तेज था, अलग तरह की स्थिति थी, अब पहले से हालत में सुधार हुआ, ऐसे में पहले जैसे स्थिति नहीं है. पंचायती राज चुनाव में दो संतान से अधिक संतान होने की धारा 19 के मामले में उसके स्पष्टीकरण में नगर पालिका की धारा 24 में संशोधन करके दो या अधिक संतान होने के बावजूद भी अगर जानते जनप्रतिनिधि अन्य योग्यताएं रखता है. चाहे पंचायती राज का इलेक्शन हो या नगर निगम का कोई इलेक्शन है चुनाव लड़ने के लिए योग्य माना जाएगा.