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पश्चिम एशिया के तनाव से रसोई का बजट बिगड़ा, खाद्य तेलों की कीमतों में 20 रुपये तक बढ़ोतरी

चंडीगढ़  पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब आम आदमी की रसोई तक पहुंच गया है। खाद्य तेलों की कीमतों में पिछले एक महीने में 15 से 20 रुपये प्रति किलो तक का उछाल दर्ज किया गया है। कारोबारियों का कहना है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो कीमतों में और तेजी बनी रह सकती है।  कारोबारियों के अनुसार युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। इससे बायोडीजल की मांग बढ़ी है, जिसके कारण वनस्पति तेलों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। भारत अपनी जरूरत का करीब 60 से 66 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है। सामान्य तौर पर देश हर महीने 13 से 14 लाख टन आयात करता है, लेकिन मार्च में यह घटकर करीब 11 लाख टन रहने का अनुमान है। खासतौर पर सूरजमुखी तेल के आयात में भारी गिरावट आई है, जो फरवरी में लगभग 51 प्रतिशत तक कम हो गया। आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता और लगातार बढ़ती कीमतें इसकी मुख्य वजह हैं। युद्ध के कारण समुद्री मार्ग प्रभावित हुए हैं, जिससे जहाजों की आवाजाही और डिलीवरी पर असर पड़ा है। समुद्री किराया भी 60 डॉलर प्रति टन बढ़ा खाद्य तेल कारोबारी संजय विरमानी के मुताबिक समुद्री रास्तों में बाधा और बढ़ते जोखिम के कारण बीमा कंपनियां भी माल कवर करने से हिचक रही हैं। वहीं समुद्री किराया भी प्रति टन करीब 60 डॉलर तक बढ़ गया है। ब्राजील और अर्जेंटीना से आने वाले शिपमेंट भी प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बायोडीजल में बढ़ती खपत से भी बाजार पर दबाव बढ़ा है। राइस ब्रान की उपलब्धता घटने से राइस ब्रान ऑयल का उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसकी कीमत पिछले साल 350 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर अब करीब 700 रुपये तक पहुंच गई है। 20 से 30 प्रतिशत तक हो सकती है वृद्धि इसका असर बाजार में साफ दिख रहा है। सरसों तेल 132.50 से बढ़कर 147 रुपये, सोया रिफाइंड 131.20 से 150.10 रुपये और सनफ्लावर रिफाइंड 160 से 175 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो खाद्य तेलों की कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक और बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे आम उपभोक्ताओं की परेशानी और बढ़ेगी। 

पंजाब के छात्रों पर रुपये की गिरावट का असर, विदेश में पढ़ाई अब और महंगी

जालंधर  भारतीय रुपये के लगातार कमजोर होने और डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर (करीब 93 रुपये प्रति डॉलर) तक पहुंच गया है। इसका सीधा असर विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों, खासकर पंजाब के विद्यार्थियों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है।   पहले से ही महंगी विदेशी शिक्षा अब और अधिक बोझिल होती जा रही है, जिससे कई परिवार आर्थिक दबाव में आ गए हैं। रुपये की इस गिरावट ने न केवल कुल शिक्षा बजट को बढ़ाया है, बल्कि सालाना खर्च, लोन की अदायगी और अन्य छिपे हुए शुल्कों के रूप में भी अतिरिक्त बोझ डाल दिया है, जिससे विदेश में पढ़ाई का सपना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगा हो गया है। विदेशी मुद्रा का कारोबार करने वाले हेमंत का कहना है कि रुपये में गिरावट के कारण विदेश में पढ़ाई का कुल बजट औसतन 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गया है। उदाहरण के तौर पर, जो कोर्स पहले लगभग 1.2 करोड़ रुपये में पूरा हो जाता था, अब उसी पर करीब 1.5 करोड़ रुपये तक खर्च आ रहा है। यह वृद्धि केवल मुद्रा विनिमय दर में बदलाव के कारण हुई है, जिससे अभिभावकों की पहले से बनाई गई वित्तीय योजनाएं प्रभावित हो रही हैं और उन्हें अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ रहे हैं। डॉलर महंगा होने से छात्रों को हर साल अतिरिक्त राशि चुकानी पड़ रही है। उदाहरण के लिए, 55,000 डॉलर सालाना फीस वाले कोर्स में छात्रों को सिर्फ एक्सचेंज रेट की वजह से करीब 4.11 रुपये लाख अधिक देने पड़ रहे हैं। यह अतिरिक्त खर्च पूरे कोर्स अवधि में लाखों रुपये तक पहुंच जाता है, जो मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका साबित हो रहा है। विदेशी एजुकेशन की माहिर परमजीत का कहना है कि मुद्रा विनिमय के दौरान लगने वाले छिपे हुए शुल्क (हिडन चार्जेज) भी छात्रों के लिए बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्ष 2024 में भारतीय छात्रों को पारदर्शिता की कमी और अतिरिक्त शुल्कों के कारण 1,700 रुपये करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ। इन शुल्कों में बैंक मार्जिन, ट्रांसफर फीस और एक्सचेंज रेट में अंतर जैसी चीजें शामिल हैं, जिनके बारे में अधिकतर छात्रों और अभिभावकों को पहले से स्पष्ट जानकारी नहीं होती। एजुकेशन लोन पर भी असर रुपये के कमजोर होने का असर एजुकेशन लोन पर भी पड़ रहा है। लोन की कुल लागत और उसकी अदायगी पर सालाना 3 से 5 प्रतिशत तक अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है, जिससे छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद कर्ज चुकाना और मुश्किल हो सकता है। ब्याज के साथ-साथ मूलधन की राशि भी बढ़ने से कुल देनदारी पहले के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है। पंजाब से विदेश जाने वाले छात्रों के रुझान में भी हाल के समय में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। वर्ष 2023 में भारत से करीब 3.19 लाख छात्र कनाडा गए थे, जिनमें से लगभग 1.8 लाख यानी करीब 56 प्रतिशत अकेले पंजाब से थे। लेकिन 2024-25 में सख्त नियमों और बढ़ते खर्च के कारण पंजाब से कनाडा जाने वाले छात्रों के आवेदनों में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि बढ़ती लागत और नीतिगत बदलावों ने छात्रों के फैसलों को सीधे प्रभावित किया है। अमेरिका के मामले में स्थिति कुछ अलग नजर आती है। 2024-25 शैक्षणिक वर्ष में अमेरिका में लगभग 3.63 लाख भारतीय छात्र नामांकित रहे, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। हालांकि, इसके बावजूद 2025 की पहली छमाही में भारतीय छात्रों को जारी किए जाने वाले एफ-1 वीजा में 44 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो भविष्य में वहां जाने वाले छात्रों की संख्या पर असर डाल सकती है। अमेरिका में पढ़ाई पर चार लाख का अतिरिक्त बोझ खर्च के स्तर पर देखा जाए तो अमेरिका में पढ़ाई की औसत वार्षिक लागत 25,000 डॉलर से 55,000 डॉलर के बीच है, जिसमें रुपये की गिरावट के कारण 4 लाख तक का सीधा अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। वहीं कनाडा में ग्रेजुएशन की औसत फीस 33,417 और पोस्ट ग्रेजुएशन की 16,321 डॉलर है, जबकि जीआईसी फंड बढ़कर 20,635 कनाडाई डॉलर यानी करीब 13 लाख रुपये हो गया है, जो छात्रों के लिए शुरुआती निवेश को और भारी बना देता है। विकल्प बदलने लगे छात्र एजुकेशन एक्सपर्ट पूजा सिंह का कहना है कि “रुपये की गिरावट ने विदेशी शिक्षा को मिडिल क्लास परिवारों की पहुंच से धीरे-धीरे दूर कर दिया है। कई छात्र अब अपने विकल्प बदल रहे हैं या अपनी पढ़ाई को टाल रहे हैं। आने वाले समय में छात्र सस्ते देशों की ओर रुख कर सकते हैं या भारत में ही बेहतर अवसर तलाशेंगे।” कुल मिलाकर, डॉलर की मजबूती और रुपये की कमजोरी ने पंजाब के छात्रों के विदेशी शिक्षा के सपनों पर गंभीर आर्थिक दबाव डाल दिया है। यदि यही स्थिति बनी रहती है, तो आने वाले समय में विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में और गिरावट देखने को मिल सकती है, और उच्च शिक्षा के लिए वैश्विक विकल्प चुनना पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।   

बांगलादेश ने हटाया IPL टेलीकास्ट पर बैन, IND के साथ सीरीज का असर

ढाका तेज गेंदबाज मुस्ताफिजुर रहमान को इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) 2026 से रिलीज किए जाने के बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) और भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) के बीच संबंध बिगड़ गए थे. बांग्लादेश की तत्कालीन मोहम्मद यूनुस सरकार ने आईसीसी मेन्स टी20 वर्ल्ड कप 2026 के लिए अपनी टीम को भारत भेजने से इनकार कर दिया गया था. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (ICC) ने बांग्लादेश की जगह स्कॉटलैंड को टी20 वर्ल्ड कप खेलने की इजाजत दी।  इसी बीच मोहम्मद यूनुस सरकार ने खुन्नस निकालते हुए अपने देश में आईपीएल के प्रसारण पर बैन लगा दिया था. इस फैसले ने क्रिकेट फैन्स को चौंका दिया था क्योंकि आईपीएल दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा देखी जाने वाली टी20 लीग है. हालांकि अब बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है।  बांग्लादेश सरकार की ओर से ग्रीन सिग्नल बांग्लादेश के सूचना और प्रसारण मंत्री जहीर उद्दीन स्वपन ने साफ शब्दों में कहा है कि सरकार खेल और राजनीति को अलग रखना चाहती है और इंडियन प्रीमियर लीग के प्रसारण पर कोई रोक नहीं लगाएगी. उन्होंने कहा कि अगर कोई चैनल आईपीएल के मुकाबले दिखाना चाहता है तो सरकार उसे सकारात्मक तरीके से देखेगी।  जहीर उद्दीन स्वपन ने कहा, 'हम खेल को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहते. अगर कोई चैनल आईपीएल का प्रसारण करना चाहता है, तो हम उसे कमर्शियल नजरिए से देखेंगे और सकारात्मक फैसला लेंगे. हम किसी को भी टेलीकास्ट से नहीं रोकेंगे. अगर स्टार स्पोर्ट्स टेलीकास्ट करना चाहता है, तो वह कर सकता है. अगर हमारे किसी चैनल को टेलीकास्ट करना है, तो हम सकारात्मक तरीके से उसका स्वागत करेंगे, लेकिन हम किसी पर दबाव नहीं डालेंगे।  इससे साफ हो गया है कि अब बांग्लादेश सरकार की तरफ से कोई प्रशासनिक बाधा नहीं रहेगी. केबल ऑपरेटर्स एसोसिएशन की तरफ से भी स्थिति स्पष्ट कर दी गई है. एसोसिएशन के पदाधिकारी रेजाउल करीम लाबलू ने कहा कि फिलहाल आईपीएल टेलीकास्ट को लेकर कोई रोक नहीं है. उन्होंने कहा, 'अगर स्टार स्पोर्ट्स बांग्लादेश में आईपीएल दिखाता है, तो हम उसे प्रसारित कर सकते हैं. हमें इसे रोकने के लिए कोई निर्देश नहीं मिला है।  हालांकि बांग्लादेश सरकार ने आधिकारिक तौर पर पहले लगे प्रतिबंध के पीछे की वजहों को विस्तार से नहीं बताया, लेकिन माना जा रहा है कि यह फैसला उस समय के राजनीतिक माहौल, प्रसारण अधिकारों और बोर्ड्स के बीच चल रहे विवादों का मिश्रण था. कुछ रिपोर्ट्स में यह भी संकेत मिला था कि आईपीएल को लेकर भारत-बांग्लादेश क्रिकेट संबंधों में आई ठंडक का असर प्रसारण पर भी पड़ा था।  भारत के बांग्लादेश दौरे से कनेक्शन! अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आईपीएल पर बदला यह रुख भारत के आगामी दौरे से जुड़ा हुआ है? बांग्लादेश को इस साल सितंबर में अपने घर पर भारत के खिलाफ तीन वनडे और तीन टी20 मैच खेलने हैं. वैसे केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने पर ही भारतीय टीम बांग्लादेश की यात्रा करेगी।  भारत-बांग्लादेश के बीच क्रिकेट संबंध हमेशा से अहम रहे हैं, ऐसे में आईपीएल जैसे बड़े टूर्नामेंट पर नरमी दिखाना एक 'डिप्लोमैटिक सिग्नल' भी माना जा रहा है. भले ही बांग्लादेशी सरकार ने इसे सीधे तौर पर नहीं जोड़ा हो, लेकिन टाइमिंग बहुत कुछ कहती है। 

Jaipur Mega Stadium: दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्रिकेट ग्राउंड निर्माणाधीन, गहलोत के तीखे आरोप

जयपुर. राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वर्तमान भजनलाल सरकार के खिलाफ अपना हमला तेज कर दिया है। गहलोत ने अपनी चर्चित 'इंतज़ारशास्त्र' सीरीज के छठे अध्याय में जयपुर के चौंप में बन रहे विश्व के तीसरे सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम की बदहाली का मुद्दा उठाया है। एक वीडियो संदेश के साथ गहलोत ने आरोप लगाया है कि राजनीतिक द्वेष के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर का यह प्रोजेक्ट अब 'ठंडे बस्ते' में चला गया है। जो विश्व रिकॉर्ड बनना था, वो अब 'लापरवाही' का शिकार अशोक गहलोत ने अपनी पोस्ट में दर्द साझा करते हुए लिखा कि कांग्रेस सरकार ने राजस्थान को वैश्विक खेल मानचित्र पर लाने के लिए जयपुर के पास चौंप गांव में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम बनाने की आधारशिला रखी थी। इस स्टेडियम का काम 2024 तक पूरा होना था, लेकिन गहलोत का दावा है कि 36 महीने बीत जाने के बाद भी यह प्रोजेक्ट अधर में लटका हुआ है। गहलोत ने सवाल उठाया कि जनता के करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद खिलाड़ियों को अपनी ही धरती पर अंतरराष्ट्रीय मैच देखने और खेलने का मौका क्यों नहीं मिल रहा? RCA चुनाव और क्रिकेट की राजनीति पर कटाक्ष पूर्व मुख्यमंत्री ने केवल इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं, बल्कि खेल प्रशासन पर भी प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के चुनाव पिछले दो वर्षों से नहीं हो सके हैं। गहलोत के अनुसार, प्रशासनिक शून्यता और सरकार की अरुचि के कारण राजस्थान में क्रिकेट का भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। खिलाड़ियों के सपनों से खिलवाड़ बंद करे सरकार' गहलोत ने एक वीडियो साझा किया है जिसमें स्टेडियम की वर्तमान स्थिति (कथित रूप से रुका हुआ काम) को दिखाया गया है। उन्होंने भजनलाल सरकार से मार्मिक अपील करते हुए कहा: "राजनीतिक द्वेष छोड़िए, खिलाड़ियों के भविष्य से खिलवाड़ बंद कीजिए!" क्या है 'इंतज़ारशास्त्र' सीरीज? पिछले कुछ हफ्तों से अशोक गहलोत सोशल मीडिया पर एक विशेष सीरीज चला रहे हैं जिसे उन्होंने 'इंतज़ारशास्त्र' नाम दिया है। उद्देश्य: इस सीरीज के माध्यम से वे उन प्रोजेक्ट्स को उजागर कर रहे हैं जो उनकी सरकार के समय शुरू हुए थे लेकिन वर्तमान सरकार के कार्यकाल में कथित तौर पर ठप्प पड़े हैं। खेल-विरोधी सोच बनाम विकास का दावा गहलोत का आरोप है कि भाजपा सरकार केवल नाम बदलने या पुराने प्रोजेक्ट्स को रोकने में लगी है। उन्होंने 'इंतज़ारशास्त्र' के शीर्षक में सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया— ''खेल-विरोधी सोच ने डुबोया राजस्थान का नाम!''। इस बयान ने राजस्थान के खेल हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या वाकई बजट या मंशा की कमी के कारण चौंप स्टेडियम का काम रुका है?

पैर तुड़वाने और सिर पर पट्टी लगाने का खेल कर रही हैं ममता, विक्टिम कार्ड खेल रही हैं, शाह का बयान

कोलकाता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में अपने संबोधन में कहा कि बंगाल का आगामी चुनाव सिर्फ राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनता के मुद्दों को उठाने और उनकी आवाज को सामने लाने का निर्णय लिया है।  अमित शाह ने कहा कि आज की प्रेस वार्ता तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन के खिलाफ “चार्जशीट” है. उन्होंने दावा किया कि यह सिर्फ भाजपा की नहीं, बल्कि बंगाल की जनता की चार्जशीट है, जिसे भाजपा आवाज दे रही है।  “भय बनाम भरोसा” – चुनाव का नैरेटिव अमित शाह ने कहा कि आने वाला चुनाव यह तय करेगा कि बंगाल की जनता “भय” को चुनेगी या “भरोसे” को. उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 15 सालों में राज्य में भय, भ्रष्टाचार और भेदभाव की राजनीति हुई है।  उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस ने झूठ, डर और हिंसा के सहारे सत्ता बनाए रखने की राजनीति की है, जबकि किसी भी सरकार का आधार जनकल्याण होना चाहिए।  “चार्जशीट” में लगाए गए आरोप अमित शाह ने कहा कि यह चार्जशीट तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के “काले चिट्ठों” का संकलन है. उन्होंने आरोप लगाया कि:     •    बंगाल में “सिंडिकेट राज” स्थापित किया गया     •    राज्य “भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला” बन चुका है     •    सफेदपोश अपराधी सिस्टम में शामिल हैं     •    “कट मनी” आम बात हो गई है     •    उद्योगों के लिए बंगाल “ग्रेवयार्ड” बन गया है     •    घुसपैठियों को संरक्षण दिया जा रहा है     •    तुष्टिकरण सरकार की नीति बन गई है उन्होंने कहा कि जनता अब कहने लगी है कि “इससे तो कम्युनिस्ट शासन बेहतर था।  भाजपा के बढ़ते वोट शेयर का दावा अमित शाह ने भाजपा के बढ़ते प्रभाव का जिक्र करते हुए आंकड़े पेश किए:     •    2014 लोकसभा: 17% वोट, 2 सीट     •    2019 लोकसभा: 41% वोट, 18 सीट     •    2024 लोकसभा: 39% वोट, 12 सीट     •    2016 विधानसभा: 10% वोट, 3 सीट     •    2021 विधानसभा: 38% वोट, 77 सीट उन्होंने कहा कि भाजपा अब बंगाल में 40 फीसदी वोट शेयर के साथ मजबूत आधार बना चुकी है।  अमित शाह: ममता विक्टिम कार्ड की राजनीति करती हैं अमित शाह ने कहा, 'ममता दीदी ने हमेशा विक्टिम कार्ड की राजनीति की है. कभी पैर तुड़वा लेती हैं, कभी सिर पर पट्टी बंधवा लेती हैं, कभी बीमार हो जाती हैं और कभी चुनाव आयोग को गालियां देती हैं.” “भय से मुक्ति” का चुनाव अमित शाह ने कहा कि यह चुनाव कई तरह के “भय से मुक्ति” का चुनाव है:     •    जान-माल के नुकसान के डर से मुक्ति     •    संपत्ति लूटे जाने के डर से मुक्ति     •    रोजगार छिनने के डर से मुक्ति     •    महिलाओं की सुरक्षा को लेकर डर से मुक्ति     •    युवाओं के भविष्य पर छाए अंधकार से मुक्ति उन्होंने कहा कि यह चुनाव शांति, विकास और भरोसे का चुनाव है. घुसपैठ और जनसांख्यिकी पर बयान अमित शाह ने आरोप लगाया कि बंगाल में घुसपैठियों को वोटर बनाकर रखा गया है. उन्होंने कहा कि भाजपा का एजेंडा है कि ऐसे घुसपैठियों को देश से बाहर निकाला जाएगा. उन्होंने कहा कि बंगाल की जनता को तय करना है कि राज्य का भविष्य कौन तय करेगा।  चुनाव आयोग और न्यायपालिका का मुद्दा अमित शाह ने कहा कि बंगाल में चुनाव के दौरान सुप्रीम कोर्ट को ज्यूडिशियल अधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ी, जबकि अन्य राज्यों में ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने इसे राज्य प्रशासन की विफलता बताया. उन्होंने ममता बनर्जी पर चुनाव आयोग पर आरोप लगाने और “विक्टिम कार्ड” खेलने का भी आरोप लगाया।  डबल इंजन सरकार का उदाहरण अमित शाह ने कहा कि जहां भाजपा की “डबल इंजन सरकार” है, वहां विकास तेजी से हुआ है. उन्होंने उदाहरण दिए:     •    उत्तर प्रदेश में विकास की गति     •    मध्य प्रदेश में कृषि विकास     •    असम में उग्रवाद से विकास की ओर बदलाव     •    त्रिपुरा में “कैडर राज” का अंत     •    ओडिशा में पहली बार भाजपा सरकार

पहली बार पूरी तरह हाईटेक होगी जनगणना की प्रक्रिया और झालावाड़ की 12 तहसीलों सहित 1619 गांवों में शुरू होगा महाअभियान

झालावाड़ झालावाड़ जिले में करीब 15 साल बाद जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। इस बार जनगणना दो चरणों में आयोजित की जाएगी और विशेष बात यह है कि पहली बार इसे पूरी तरह डिजिटल माध्यम से किया जाएगा। अब तक की जनगणनाएं ऑफलाइन होती रही हैं, लेकिन इस बार मोबाइल एप के जरिए घर-घर जाकर जानकारी एकत्रित की जाएगी।   4000 कार्मिक जुटेंगे, गांव और शहरी वार्ड दोनों कवर होंगे जिले के सांख्यिकी विभाग के अनुसार इस जनगणना में करीब 4000 प्रगणक (कर्मी) लगाए जाएंगे। ये कर्मी जिले के 1619 गांव और शहरी क्षेत्र के 240 वार्ड में घर-घर जाकर प्रत्येक परिवार का विस्तृत विवरण जुटाएंगे। जिले की 12 तहसीलों के गांवों और आठ नगर निकायों के वार्डों को इसमें शामिल किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी तहसीलदार और नगर निकायों के ईओ स्तर के अधिकारी करेंगे।   समय-सारिणी और प्रश्नों का दायरा तय जनगणना दो चरणों में संपन्न होगी, जिसमें पहला चरण 1 मई से 15 जून तक और दूसरा चरण 1 मई से 15 मई तक चलेगा। पहले चरण में मकान की स्थिति, पानी, बिजली, नल, शौचालय, वेस्ट वाटर लाइन जैसी सुविधाओं के साथ परिवार के सदस्यों की संख्या सहित करीब 34 प्रश्नों की जानकारी मोबाइल एप के माध्यम से एकत्रित की जाएगी।   प्रशिक्षण की व्यापक तैयारी, अप्रैल में होगा आयोजन जनगणना से पहले प्रगणकों की नियुक्ति और प्रशिक्षण का कार्य अप्रैल माह में किया जाएगा। मास्टर ट्रेनर का प्रशिक्षण पहले जयपुर में आयोजित होगा, इसके बाद झालावाड़ के 56 फील्ड ट्रेनर को प्रशिक्षित किया जाएगा। ये प्रशिक्षित फील्ड ट्रेनर जिले के 4000 कर्मियों को जनगणना की बारीकियों से अवगत कराएंगे। 2001 और 2011 के आंकड़ों से मिलेगा तुलना का आधार विभाग के अनुसार जिले में 2001 की जनगणना में जनसंख्या 11 लाख 80 हजार 323 दर्ज की गई थी। वहीं 2011 में यह बढ़कर 14 लाख 11 हजार 129 हो गई थी, जिसमें 11 लाख 81 हजार 835 ग्रामीण और 2 लाख 29 हजार 291 शहरी आबादी शामिल थी। अब नई जनगणना से ताजा आंकड़े सामने आएंगे।   मोबाइल एप से आमजन भी कर सकेंगे सहयोग इस बार जनगणना के लिए एक मोबाइल एप लॉन्च किया जाएगा, जिसके माध्यम से प्रगणक डेटा एकत्रित करेंगे। आमजन भी इस एप के जरिए अपनी जानकारी दर्ज कर सकेंगे। हालांकि, एप के माध्यम से दी गई जानकारी का सत्यापन करने के लिए प्रगणक प्रत्येक परिवार तक पहुंचकर विवरण की पुष्टि करेंगे।

CM हिमंत का बयान: 99% हिंदू कांग्रेस छोड़ने को तैयार, हम ‘मियां’ समुदाय की कमर तोड़ देंगे

गुवाहाटी असम में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक बयानबाजी और दल-बदल का दौर तेज हो गया है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए दावा किया है कि कांग्रेस पार्टी के 99 प्रतिशत हिंदू सदस्य पार्टी छोड़ना चाहते हैं। कांग्रेस बन जाएगी 'एक समुदाय की पार्टी' समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में सीएम शर्मा ने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाने के साथ-साथ कांग्रेस के भविष्य पर कई बड़े दावे किए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में कांग्रेस के विघटन की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। उन्होंने दावा किया कि लगभग 99 प्रतिशत हिंदू कांग्रेस छोड़ना चाहते हैं। चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस केवल एक ही समुदाय की पार्टी बनकर रह जाएगी। कांग्रेस में मची है भगदड़ सीएम का यह बयान ऐसे समय में आया है जब चुनाव से ठीक पहले असम में कांग्रेस को लगातार बड़े झटके लग रहे हैं। पार्टी के कई दिग्गज नेता हाल ही में भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए हैं। इनमें कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई और प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इसके अलावा, कांग्रेस के टिकट पर पिछला चुनाव जीतने वाले विधायक- कमलाख्या डे पुरकायस्थ, शशिकांत दास, बसंत दास, सुशांत बोरगोहेन और रूपज्योति कुर्मी भी पार्टी छोड़ चुके हैं। विकास और 1.65 लाख नौकरियों का दावा अपनी सरकार के काम की तारीफ करते हुए सीएम सरमा ने कहा कि असम में बड़े राज्यों की तर्ज पर व्यापक विकास हुआ है। उन्होंने इस साल रिकॉर्ड तोड़ जीत के साथ भाजपा की सत्ता में वापसी का विश्वास जताया। उन्होंने कहा- हमने पिछले 5 सालों में 1.65 लाख लोगों को सरकारी नौकरियां दी हैं। यही कारण है कि राज्य में चुनाव एक 'उत्सवी माहौल' में संपन्न हो रहे हैं। घुसपैठ और 'पाकिस्तान-बांग्लादेश' वाला बयान शुक्रवार को मुख्यमंत्री ने इस बात को स्वीकार किया कि असम में घुसपैठ अभी भी एक बड़ा मुद्दा है। हालांकि, उन्होंने कहा- हम 9 अप्रैल के चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार हैं। जनता भाजपा को सत्ता में वापस लाने के लिए उत्साहित है। मैं चुनाव जीतूंगा और जो काम हमें करने हैं, वो हमारे घोषणापत्र में शामिल होंगे। भाजपा सत्ता में लौटी तो असम में बांग्लादेशी ‘मियां’ समुदाय की कमर तोड़ देगी : हिमंत असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने  कहा कि अगर अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में वापस आता है, तो उनकी सरकार राज्य में बांग्लादेशी 'मियां' समुदाय की 'कमर तोड़ देगी।' उन्होंने कहा कि सरकार एक 'मजबूत असमिया समाज' के निर्माण के लिए काम करेगी और अवैध प्रवासी मूल निवासियों को चुनौती नहीं दे सकेंगे। लखीमपुर जिले के ढाकुआखाना में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए शर्मा ने कहा, 'हमने राज्य के मूल निवासियों के लिए बहुत मेहनत की है। जो लोग बांग्लादेश से आकर असम की जमीन और घरों पर अतिक्रमण कर रहे थे, हमने राजनीतिक रूप से उनके हाथ-पैर तोड़ दिए।' उन्होंने कहा, 'इस बार हम बांग्लादेशी मियाओं की कमर तोड़ देंगे, ताकि वे असमिया लोगों के लिए चुनौती बनने की हिम्मत न कर सकें।' 'मियां' मूल रूप से असम में बांग्ला भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अपमानजनक शब्द है, और गैर-बांग्ला भाषी लोग आम तौर पर उन्हें बांग्लादेशी अप्रवासी मानते हैं। इससे पहले समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि 'बांग्लादेशी' लोग कांग्रेस को वोट देंगे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा- कांग्रेस में कौन जाना चाहता है? कांग्रेस भारत में अपनी सरकार नहीं बना सकती; वह पाकिस्तान या बांग्लादेश में सरकार बना सकती है। ऐसे में मैं कांग्रेस में कैसे जा सकता हूं? जब उनसे असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया और कहा- मैं उन्हें मुफ्त की पब्लिसिटी (मुफ्त प्रचार) नहीं देना चाहता। कांग्रेस का पलटवार: डीके शिवकुमार ने दिया जवाब असम के मुख्यमंत्री की इन टिप्पणियों पर कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डीके शिवकुमार ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। शिवकुमार ने हिमंत बिस्वा सरमा पर लोगों का 'ध्रुवीकरण' करने का आरोप लगाया। असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई का बचाव करते हुए शिवकुमार ने कहा- वह (सरमा) मेरे पीसीसी (PCC) अध्यक्ष के बारे में बोल रहे हैं। गौरव गोगोई के पिता (तरुण गोगोई) मुख्यमंत्री रहे हैं और वह खुद मौजूदा सांसद हैं। हिमंत उनसे डरे हुए हैं, इसीलिए उनके नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। राज्य में कोई बांग्लादेशी नहीं है।

Naxalism Debate: संसद में 30 को होगी चर्चा, बस्तर में 96% इलाका नक्सल प्रभाव से आजाद

रायपुर/जगदलपुर. पांच दशकों से भी अधिक समय से बस्तर के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर रहा नक्सलवाद आज समाप्ति की है. यह नराकात्मक विनाशकारी विचारधारा ने न केवल बस्तर के विकास को अवरुद्ध किया, बल्कि निर्दोष आदिवासियों की जान भी ली. लेकिन मजबूत राजनीतिक इरादे की बदौलत आज बस्तर का 96 प्रतिशत क्षेत्र नक्सली गतिविधियों से मुक्त हो चुका है. विषय पर 30 मार्च को लोकसभा में अहम चर्चा होगी. 1967 में जो चिंगारी बंगाल के नक्सलबाड़ी में फूटी थी, उसने आने वाले दशकों में बस्तर के जंगलों को आग में बदल दिया, इस आग ने हजारों जिंदगियां लीं, अनगिनत घर उजाड़े, और एक पूरे क्षेत्र को बदल कर रख दिया. लेकिन बस्तर ओलम्पिक 2024 के मंच से देश के गृहमंत्री अमित शाह ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने इस कहानी को एक तय समयसीमा दे दी, उन्होंने कहा कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा, यह पहली बार था जब इस लंबे संघर्ष के अंत की एक तारीख सामने आई, एक ऐसा वादा, जो सिर्फ शब्द नहीं बल्कि दशकों से चली आ रही इस लड़ाई का निष्कर्ष माना जा रहा है. अब जब 31 मार्च 2026 की तारीख जब करीब है, तो माहौल बदल चुका है. वो घोषणा सच्चाई में बदलती नजर आ रही है. इन 2 वर्षों में कुल 3000 नक्सली मुख्यधारा में जुड़ जाते हैं, 2000 नक्सली गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, अभियान इतना तेज होता है कि 500 से अधिक नक्सली ढेर कर दिए जाते हैं, जिसमें नक्सलियों का महासचिव भी शामिल रहता है. कुल मिलाकर 5000 से अधिक नक्सली कम हो गए, हालांकि, नक्सल के इतिहास में 1987 से 2026 तक 1416 जवान शहीद हुए है. जबकि 1277 आईडी ब्लास्ट हुए, जिसमें 443 जवान शहीद और 915 जवान घायल हुए हैं. इसके अलावा 4580 आईडी बरामद की गई है. छत्तीसगढ़ सरकार के आंकड़ों के अनुसार, आज बस्तर संभाग के पांच जिलों में से दंंतेवाड़ा में अब महज एक नक्सली सक्रिय है, वहीं नारायणपुर में दो, सुकमा में 5, बीजापुर में 11 और कांकेर में गिनती के 19 नक्सली सक्रिय है. हालांकि, तय संकल्प में सशस्त्र नक्सलवाद का खत्मा तो हो गया है, लेकिन अभी भी सबसे बड़ा चुनौती जवानों के लिए जंगलों में बिछी बारूद है. समय के साथ यह भी खोजकर निकाल लिए जाएंगे, और नष्ट कर दिए जाएंगे. गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि अब हम बस्तर के प्रत्येक गांव को ODF की तरह IED फ्री गांव बनाएंगे. अब बस्तर की आग बुझ गई, और बस्तर के जंगल, जो कभी डर का दूसरा नाम थे, एक बार फिर अपनी असली पहचान, अपनी शांति, और अपनी खूबसूरती के लिए जाने जाएंगे. अब बस्तर अपनी खूबसूरती के लिए पहचाने जाएगा. संसद में 30 मार्च को होगी चर्चा नक्सलमुक्त भारत के लिए निर्धारित मार्च 2026 की समय सीमा से पहले लोकसभा में नक्सलवाद उन्मूलन पर महत्वपूर्ण चर्चा होगी. लोकसभा की कार्यसूची के अनुसार, नक्सलवाद उन्मूलन के प्रयासों पर चर्चा के लिए 30 मार्च का समय आवंटित किया गया है. चर्चा की शुरुआत शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे करेंगे.

Hemant Soren in Assam: JMM का चुनावी बिगुल आज, सोरेन संभालेंगे कमान

रांची. असम विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने अपनी राजनीतिक सक्रियता तेज कर दी है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन शुक्रवार शाम असम पहुंच गए, जहां वे 28 मार्च से पार्टी के चुनावी प्रचार अभियान की औपचारिक शुरुआत करेंगे। उनका पहला कार्यक्रम कोकराझार जिले के गोसाई गांव विधानसभा क्षेत्र में प्रस्तावित है, जहां वे एक बड़ी जनसभा को संबोधित करेंगे। झामुमो के लिए यह चुनाव महज विस्तार का प्रयास नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री अगले कुछ दिनों तक असम में ही रहेंगे और विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में लगातार सभाएं करेंगे। हेमंत सोरेन के नेतृत्व में अभियान को धार पार्टी अध्यक्ष के रूप में हेमंत सोरेन खुद पूरे चुनावी अभियान की कमान संभाल रहे हैं। झामुमो ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह असम में अपने दम पर चुनाव लड़ रही है और इसके लिए संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय किया गया है। पार्टी महासचिव विनोद पांडेय असम में लगातार कैंप कर रहे हैं और चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उनके नेतृत्व में स्थानीय समीकरणों और मुद्दों के आधार पर प्रचार की रूपरेखा तैयार की जा रही है। स्टार प्रचारकों की तैनाती, संगठन हुआ सक्रिय झामुमो ने अपने 20 स्टार प्रचारकों की सूची चुनाव आयोग को सौंप दी है। इसमें हेमंत सोरेन के अलावा डा. सरफराज अहमद, सुप्रियो भट्टाचार्य, जोबा मांझी, दीपक बिरुआ, चमरा लिंडा, कल्पना मुर्मू सोरेन, अभिषेक प्रसाद और डा. महुआ माजी जैसे प्रमुख नेता शामिल हैं। पार्टी के कई मंत्री और विधायक जैसे दीपक बिरुआ, चमरा लिंडा और आलोक सोरेन, एमटी राजा पहले ही असम पहुंचकर स्थानीय स्तर पर चुनावी गतिविधियों को गति दे रहे हैं। चुनिंदा क्षेत्रों पर फोकस, स्थानीय मुद्दों पर जोर झामुमो की रणनीति असम के चुनिंदा विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रभाव को मजबूत करने पर केंद्रित है। पार्टी स्थानीय सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को प्रमुखता देते हुए मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। हेमंत सोरेन की सभाएं झामुमो कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के साथ-साथ पार्टी को नए क्षेत्रों में पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभा सकती है।

नैंसी ग्रेवाल हत्याकांड में नया मोड़, कनाडाई जांच एजेंसियों ने खालिस्तान समर्थकों पर शक जताया

चण्डीगढ़ पंजाबी मूल की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नैंसी ग्रेवाल की हत्या में एक नया और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। कनाडाई जांच एजेंसियों ने पहली बार यह संकेत दिया है कि इस हत्याकांड के पीछे खालिस्तानी समर्थक तत्वों का हाथ हो सकता है।  पुलिस का मानना है कि नैंसी का सोशल मीडिया पर खालिस्तान समर्थकों का लगातार और तीखा विरोध ही इस हत्या का मुख्य कारण बन सकता है। पंजाब के लुधियाना-जालंधर क्षेत्र की 45 वर्षीय नैंसी की 3 मार्च को ओंटारियो के लासाले में एक क्लाइंट के घर के बाहर चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस इस वारदात को सुनियोजित टारगेट किलिंग मान रही है।  40 से अधिक बार मिल चुकी थी धमकियां परिवार के अनुसार, नैंसी को खालिस्तान विरोधी वीडियो पोस्ट करने के कारण 40 से अधिक बार जान से मारने की धमकियां मिल चुकी थीं। इस बारे में विंडसर पुलिस को सूचित किया गया था लेकिन सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाई। जांच में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। पुलिस ओंटारियो में नैंसी के घर पर हुए पिछले साल के पेट्रोल बम हमले की भी जांच कर रही है, और शक जताया जा रहा है कि यह दोनों घटनाएं एक ही समूह के कृत्य हो सकती हैं। जांच में निजी रंजिश का भी एंगल पुलिस अब इस मामले में खालिस्तानी कट्टरपंथी लिंक की जांच कर रही है। हालांकि अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है लेकिन जांच में निजी रंजिश और अलगाववादी एंगल दोनों पहलुओं को ध्यान में रखा जा रहा है। सिख कल्चरल सोसाइटी विंडसर के पूर्व प्रधान हरजिंदर सिंह कंदोला ने जांच को निष्पक्ष और ठोस सबूतों के आधार पर करने की अपील की है, ताकि पूरे सिख समुदाय को बिना वजह बदनाम न किया जाए। नैंसी की मां और बहन ने आरोप लगाया है कि उनकी निडर आवाज को दबाने के लिए यह हत्या की गई।