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होर्मुज पार कर भारत की ओर बढ़ा एलपीजी टैंकर ग्रीन सान्वी, मुंबई तक यात्रा कब पूरी होगी?

मुंबई  होर्मुज स्ट्रेट से भारत के लिए एक और अच्छी खबर आई है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से भारतीय झंडे वाला एलपीजी टैंकर ग्रीन सान्वी सफलतापूर्वक पार हो गया है. इस जहाज पर लगभग 44,000 मीट्रिक टन LPG है. टैंकर ने शुक्रवार को होर्मुज स्ट्रेट पार किया और अनुमान है कि यह 6 अप्रैल तक मुंबई पहुंच जाएगा. मार्च महीने में यह होर्मुज पार करने वाला सातवां भारतीय जहाज है. अभी भी कई भारतीय तेल-गैस जहाज होर्मुज में फंसे हुए हैं और ईरानी क्लीयरेंस का इंतजार कर रहे हैं।  जहाज ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, ग्रीन सान्वी फारस की खाड़ी में खड़ा था और ईरान के समुद्री इलाके से होकर होर्मुज स्ट्रेट के पूरब में पहुंचा. इसके बाद यह मुंबई की ओर बढ़ रहा है. अनुमान है कि इस टैंकर में लगभग 44,000 मीट्रिक टन LPG है, जो पश्चिम एशिया युद्ध से पहले भारत की LPG खपत के आधे दिन के बराबर है. युद्ध के कारण सप्लाई में कमी आई है और देश में मौजूदा एलपीजी खपत कम है. विशेषज्ञों के अनुसार, अगले कुछ दिनों में दो और एलपीजी टैंकर  ग्रीन आशा और जग विक्रम भी होर्मुज पार करके भारत आने की उम्मीद है।  होर्मुज पार करने वाला सातवां भारतीय जहाज इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, ग्रीन सान्वी ईरान युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज पार करने वाला सातवां भारतीय जहाज है. अब तक आने वाले सभी सात जहाज एलपीजी टैंकर ही थे. ग्रीन सान्वी के ट्रांजिट के साथ, फारस की खाड़ी में अब 17 भारतीय झंडे वाले जहाज होर्मुज स्ट्रेट के पूरब में हैं. भारत अभी भी होर्मुज स्ट्रेट से भारतीय जहाजों के सुरक्षित पास के लिए ईरान के साथ डिप्लोमैटिक बातचीत कर रहा है. ईरान ने होर्मुज बंद कर रखा है और अब टोल वसूल रहा है, लेकिन भारत से अच्छे संबंधों के कारण भारतीय जहाजों को छूट दी गई है।  केवल कुछ देशों को ही होर्मुज पार करने की अनुमति पिछले हफ्ते ईरान ने कहा था कि केवल अमेरिका, इज़राइल और उनके सहयोगी देशों के अलावा मित्र देशों के जहाज ही ईरानी अधिकारियों के साथ तालमेल करके होर्मुज पार कर सकते हैं. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट उन देशों के लिए चालू है, जो ईरान के मित्र हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन, रूस, भारत, इराक और पाकिस्तान के जहाजों को समुद्री चोकपॉइंट से पार करने की अनुमति दी गई है।  ग्रीन सान्वी ने कैसे पार किया होर्मुज होर्मुज पार करते समय ग्रीन सान्वी ने भारतीय जहाज होने का संकेत दिया, जिसमें भारतीय नाविक सवार थे. यह संकेत ईरानी अधिकारियों के साथ तालमेल बनाने का एक स्टैंडर्ड प्रक्रिया बन गया है. ईरान और ओमान के बीच संकरे पानी के रास्ते से जहाजों की आवाजाही को रेगुलेट किया जाता है. यह रास्ता फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और ग्लोबल एनर्जी फ्लो के लिए महत्वपूर्ण है. भारतीय जहाजों को इंडियन नेवी द्वारा एस्कॉर्ट भी किया जाता है।  पिछले हफ्ते आए दो एलपीजी टैंकर पिछले हफ्ते जग वसंत ने कांडला में 47,612 मीट्रिक टन LPG डिलीवर किया, जबकि पाइन गैस ने न्यू मंगलौर में 45,000 मीट्रिक टन LPG डिलीवर की. ये दोनों टैंकर भी होर्मुज पार करके भारत पहुंचे. दो और एलपीजी जहाज ग्रीन आशा और जग विक्रम अब स्ट्रेट पार करने के लिए रेडी हैं और इंडियन नेवी के निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं. 28 फरवरी से ईरान-अमेरिका युद्ध जारी है. अमेरिका और इज़राइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था, जिसमें खामेनेई की मौत हुई. तब से होर्मुज बंद है। 

टाटा की Safari EV: 600Km रेंज और ऑल व्हील ड्राइव, कब आएगी?

मुंबई  टाटा मोटर्स देश की एक प्रमुख इलेक्ट्रिक कार निर्माता कंपनी है. कंपनी की पंच ईवी उन चुनिंदा कार्स में से एक है, जिन पर वेटिंग चल रही है. ऐसे में कंपनी ने एक नई इलेक्ट्रिक कार लाने पर विचार कर रही है, जो साइज में बड़ी और लुक्स में दमदार होगी. हम बात कर रहे हैं टाटा सफारी की, जो ईवी अवतार में आ रही है।  अभी तक ब्रांड की फ्लैगशिप ईवी हैरियर है, लेकिन जल्द ही ये ताज हैरियर की बड़ी बहन सफारी को मिल जाएगा. कंपनी इस साल ही अपनी सफारी ईवी को लॉन्च करने पर विचार कर रही है. ये कार 7-सीटर अवतार में आएगी. इसका सीधा मुकाबला महिंद्रा एक्सईवी 9एस (Mahindra XEV 9S) और विनफास्ट वीएफ एमपीवी 7 (Vinfast VF MPV 7) से होगा।  कब लॉन्च होगी कार? टाटा मोटर्स इस कार को फेस्टिव सीजन में लॉन्च कर सकती है. उम्मीद है कि कंपनी इस कार को दीवाली पर लॉन्च कर सकती है. जहां हैरियर 5-सीटर सेटअप में आती है. वहीं सफारी को कंपनी 7 सीटर सेटअप में लॉन्च कर सकती है. लॉन्च होने के बाद ये कंपनी की पहली थ्री रो इलेक्ट्रिक व्हीकल होगी।  इस कार का प्रोडक्शन अगस्त 2026 में शुरू हो सकता है. इंटरनली इस कार को Tayrona कहा जा रहा है. माना जा रहा है कि कंपनी इस कार को उसी प्लेटफॉर्म पर तैयार कर सकती है, जिस पर टाटा हैरियर ईवी को डेवलप किया गया है. कार का डिजाइन भी हैरियर ईवी की तरह ही रहेगा.  क्या कुछ मिल सकता है?  टाटा सफारी ईवी में भी हैरियर ईवी वाला ही बैटरी पैक और मोटर सेटअप मिल सकता है. ये कार 65kWh और 75kWh बैटरी पैक के साथ आ सकती है. रियर व्हील ड्राइव कॉन्फिग्रेशन में एक सिंगल मोटर मिलेगी, जो रियर साइड में लगी होगी. वहीं ऑल व्हील ड्राइव में डुअल मोटर सेटअप दिया जा सकता है।  रेंज की बात करें, तो हैरियर ईवी 75kWh बैटरी के साथ रियर व्हील ड्राइव वेरिएंट में 627 किलोमीटर की रेंज क्लेम करती है. वहीं ऑल व्हील ड्राइव वेरिएंट में रेंज घटकर 622 किलोमीटर हो जाती है. बात करें, 65kWh वाले मॉडल की तो इसमें 538 किलोमीटर की रेंज मिलती है. सफारी में कंपनी 100 किलोवॉट का डीसी चार्जिंग सपोर्ट दे सकती है। 

नितिन नवीन का बयान: कांग्रेस के शासनकाल में लोग रोटी के लिए भटकते थे

श्रीभूमि   असम के श्रीभूमि में आयोजित जनसभा में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भाजपा-एनडीए की जीत का दावा किया है। उन्होंने कहा कि सभा में उमड़ी भारी भीड़ इस बात का साफ संकेत है कि आने वाले समय में असम में भाजपा की प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनने जा रही है और जनता का पूरा आशीर्वाद पार्टी को मिलने वाला है। नितिन नवीन ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में भाजपा सरकार ने असम के विकास और उसकी समृद्ध विरासत, दोनों को आगे बढ़ाने का काम किया है। इससे पहले राज्य को अपराध का गढ़ बना दिया गया था। कांग्रेस के शासनकाल में लोगों को रोटी के लिए भटकना पड़ता था, रोजगार के अवसर नहीं थे और न ही महिलाओं और राज्य की जमीन की सुरक्षा सुनिश्चित थी।  इसी कारण असम की जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर सजा दी। उन्होंने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश और असम तेजी से विकास की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। सड़क, बिजली, रोजगार जैसे हर क्षेत्र में राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति की है। बराक वैली का जिक्र करते हुए नितिन नवीन ने कहा कि एक समय यह इलाका उपेक्षा और भेदभाव का शिकार था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। उन्होंने बताया कि ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर के जरिए इस क्षेत्र में विकास की रफ्तार तेज हुई है और लोगों तक सुविधाएं पहुंच रही हैं। नितिन नवीन ने केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत असम में 22 लाख गरीबों को पक्के घर दिए जा चुके हैं। साथ ही आने वाले समय में 15 लाख और मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा ओरुनोडोई (अरुणोदय) योजना के तहत लाभार्थियों को अब 3,000 रुपए की सहायता राशि दी जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार गरीबों के घर बनाने और उनके जीवन स्तर को बेहतर करने के लिए लगातार काम कर रही है। बता दें कि अरुणोदय योजना असम सरकार की एक प्रमुख कल्याणकारी योजना है। इसका उद्देश्य गरीब परिवारों को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान करना है।महिलाओं के सशक्तीकरण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पीएम मोदी और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में राज्य सरकार माताओं-बहनों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उनकी सुरक्षा, सम्मान और आर्थिक मजबूती सुनिश्चित करने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। रोजगार के मुद्दे पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि सरकार ने 2 लाख युवाओं को नौकरी देने का संकल्प लिया है। साथ ही नए उद्योग लगाने वालों को 5 लाख रुपए तक की आर्थिक सहायता देने की योजना भी बनाई गई है। उन्होंने पूर्व यूपीए सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा कि उस समय पक्की सड़कों का निर्माण नहीं किया गया, बल्कि यह तर्क दिया जाता था कि सड़क बनने से विदेशी घुसपैठ बढ़ेगी। इसके उलट, केंद्र सरकार ने चीन सीमा तक पक्की सड़कें बनाईं, जिससे अब कोई भी देश भारत की जमीन पर नजर डालने की हिम्मत नहीं कर सकता। असम में विधानसभा चुनाव केवल एक ही चरण में संपन्न होंगे। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार, राज्य की सभी 126 विधानसभा सीटों पर मतदान 9 अप्रैल को होगा।

इकोनॉमिस्ट की चेतावनी: ‘युद्ध 40 दिन से ज्यादा चला तो…’ खाद्य कीमतें 6 महीने के हाई पर पहुंच सकती हैं

 नई दिल्ली मिडिल ईस्ट में युद्ध (Middle East War) का असर लगभग हर देश में देखने को मिला है. अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग के चलते होर्मुज बंद होने से पैदा हुए ग्लोबल तेल संकट (Oil Crisis) ने पाकिस्तान, बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका समेत अन्य देशों की चिंता बढ़ा दी. संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) फूड प्राइस इंडेक्स के आकंड़े देखें, तो युद्ध के चलते दुनिया में खाने-पीने की चीजों के दाम छह महीने के हाई (Global Food Price Surge) पर पहुंच गए हैं।  आने वाले महीनों में बढ़ेगी टेंशन!  मार्च महीने में वैश्विक स्तर पर खाने-पीने की चीजों की कीमतें सितंबर 2025 के बाद से हाई लेवल पर पहुंच गईं. इससे आने वाले महीनों में किराने पर खर्च और उनके बिलों की स्थिति को लेकर नई चिंताएं पैदा हुई हैं।  एफएओ के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगातार दूसरे महीने बढ़ोतरी हुई है, जो ग्लोबल फूड मार्केट में महंगाई के बढ़ते दबाव का संकेत है     . जरूरी चीजों के मूल्य का आकलन करने वाला मानक FAO Food Price Index बीते मार्च महीने में औसतन 128.5 अंक रहा, जो फरवरी से 2.4% और वार्षिक आधार पर 1% का इजाफा दर्शाता है. इसके पीछे बड़े कारण की बात करें, तो खासतौर पर वेस्ट एशिया में जियो-पॉलिटिकल टेंशन के कारण बढ़ती ऊर्जा कीमतें, उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित होना है। FAO के चीफ इकोनॉमिस्ट मैक्सिमो टोरेरो का कहना है कि मिडिल ईस्ट जंग शुरू होने के बाद से कीमतों में जो वृद्धि हुई है, उसका सबसे बड़ा कारण तेल की ऊंची कीमतें हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष का फूड सिस्टम पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।  खाद्य मंहगाई (Food Inflation) के पीछे के कारणों की बात करें,तो कच्चे तेल की हाई कीमतों से ट्रांसपोर्टेशन और प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ती है. इसके साथ ही बायोफ्यूल की डिमांड में भी इजाफा देखने को मिलता है और इससे वनस्पति तेल जैसी वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं. फर्टिलाइजर्स पर असर एक बड़ी चिंता का विषय है, जो किसानों के बुवाई प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।  गेहूं और मक्का की कीमतों में इजाफा  वैश्विक स्तर पर फूड प्राइस में बढ़ोतरी के बारे में रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रमुख रूप से खाद की बढ़ती लागत के चलते गेहूं की कीमतों में ग्लोबली 4.3% की वृद्धि हुई, तो एथेनॉल की डिमांड मजबूत होने से मक्का का भाव बढ़ा है।  इसके अलावा वनस्पति तेल की कीमतों में सबसे तेज इजाफा देखने को मिला है, जो मासिक आधार पर 5.1% है. इसके अलावा सालाना आधार पर देखें, तो 13.2% की बढ़ोतरी देखने को मिली है. ये क्रूड प्राइस और बायोफ्यूल की डिमांड बढ़ने के चलते रही. मीट की कीमतों में 1% की वृद्धि हुई. डेयरी प्रोडक्ट्स की कीमतों में 1.2%, जबकि चीनी की कीमतों में 7.2% का उछाल आया।  इकोनॉमिस्ट ने दी चेतावनी एफएओ ने खाद्य सप्लाई के लिए संभावित जोखिमों की चेतावनी भी दी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक गेहूं उत्पादन 820 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1.7% कम है. इसके साथ ही इकोनॉमिस्ट टोरेरो ने वार्निंग देते हुए कहा कि मिडिल ईस्ट में मौजूदा संघर्ष 40 दिनों से अधिक समय तक चलता है, तो इसका वास्तविक प्रभाव बाद में देखने को मिल सकता है।  उन्होंने कहा कि किसान खाद का इस्तेमाल कम कर सकते हैं, बुवाई कम कर सकते हैं या कम लागत वाली फसलों की ओर रुख कर सकते हैं. ये ऐसे फैसले हैं, जिनसे आने वाले महीनों में पैदावार कम हो सकती है और आपूर्ति सीमित हो सकती है. टोरेरो की मानें, तो फिलहाल फूड प्राइस में जो तेजी देखने को मिली है, वो डराने वाली नहीं है, लेकिन इन क्षेत्रों में लगातार दबाव वैश्विक स्तर पर खाद्य लागत में बड़ी वृद्धि का कारण बन सकता है।   

समंदर में तनाव: जहाज रोकने पर चीन और अमेरिका के बीच हुआ आमना-सामना

वाशिंगटन दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें अमेरिका और चीन, समंदर में भी आमने-सामने आ गई हैं. ताजा विवाद पनामा झंडे वाले जहाजों को लेकर शुरू हुआ है, जिसने वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन पर नए खतरे खड़े कर दिए हैं. अमेरिका ने चीन पर आरोप लगाया है कि वह पनामा-फ्लैग वाले जहाजों को अपने बंदरगाहों पर रोक रहा है और उन्हें जानबूझकर देरी कर रहा है।  अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे "परेशान" या दबाव बनाने की रणनीति बताया. उन्होंने कहा कि चीन के इस कदम से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है, लागत बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय ट्रेड सिस्टम पर भरोसा कम हो रहा है।  आंकड़े भी इस विवाद को और गंभीर बनाते हैं. एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च महीने में चीन के बंदरगाहों पर जिन 124 जहाजों को जांच के नाम पर रोका गया, उनमें से 92 यानी करीब 75% पनामा के झंडे वाले जहाज थे. ये जहाज एक दिन से लेकर 10 दिन तक रोके गए. इससे पहले जनवरी और फरवरी में यह आंकड़ा काफी कम था, जो अब अचानक बढ़ गया है।  पनामा नहर से जुड़ा पूरा विवाद इस पूरे विवाद की जड़ पनामा नहर से जुड़ी है. पनामा कनाल दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से भारी मात्रा में वैश्विक व्यापार गुजरता है. हाल ही में पनामा की सुप्रीम कोर्ट ने एक हांगकांग आधारित कंपनी के नियंत्रण वाले दो बड़े पोर्ट टर्मिनल्स का कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया था. इसके बाद पनामा ने इन पोर्ट्स पर दोबारा नियंत्रण हासिल कर लिया।  अमेरिका लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि चीन इस नहर के जरिए अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो यहां तक कह चुके हैं कि जरूरत पड़ी तो अमेरिका पनामा नहर पर फिर से नियंत्रण हासिल कर सकता है. ऐसे में चीन द्वारा पनामा-फ्लैग जहाजों को रोकना इस बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा माना जा रहा है।  चीन ने अमेरिका पर पनामा पर कब्जा करने का लगाया आरोप चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. वॉशिंगटन में चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि अमेरिका बेबुनियाद आरोप लगा रहा है और असल में खुद पनामा नहर पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रहा है. पनामा सरकार ने इस विवाद को शांत करने की कोशिश की है. विदेश मंत्री ने माना कि जहाजों को रोके जाने के मामले बढ़े हैं, लेकिन इसे सामान्य समुद्री प्रक्रिया का हिस्सा बताया. उन्होंने कहा कि पनामा चीन के साथ सम्मानजनक संबंध बनाए रखना चाहता है।  लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि मामला इतना साधारण नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर चीन पनामा के झंडे वाले जहाजों को लगातार निशाना बनाता है, तो इससे पनामा की वैश्विक शिपिंग इंडस्ट्री पर बड़ा असर पड़ सकता है. पनामा दुनिया में जहाज रजिस्ट्रेशन का एक बड़ा केंद्र है और इससे उसे हर साल करीब 100 मिलियन डॉलर की कमाई होती है।   

निशातपुरा रेलवे स्टेशन का उद्घाटन जल्द, भोपाल को मिलेगा नया पांचवां रेलवे स्टेशन

 भोपाल  भोपाल मेन स्टेशन के साथ ही रानी कमलापति, संतनगर, मिसरोद के अलावा निशातपुरा के रूप में राजधानी भोपाल को जल्द ही पांचवा रेलवे स्टेशन मिलने जा रहा है। रेल मंत्रालय ने निशातपुरा रेलवे स्टेशन कमीशनिंग प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। बुनियादी सुविधाएं पूरी होने के साथ ही इसे ट्रेनों के हॉल्ट और यात्रियों के आवागमन के लिए खोल दिया जाएगा। निशातपुरा रेलवे स्टेशन पर मालवा एक्सप्रेस सहित कई अन्य ट्रेनों को हॉल्ट मिलेगा जिससे भोपाल रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों का ट्रैफिक वर्तमान के मुकाबले कम किया जा सकेगा। भोपाल स्टेशन पर अभी प्लेटफार्म उपलब्ध नहीं होने के चलते कई यात्री ट्रेन प्लेटफार्म खाली होने के इंतजार में आउटर पर खड़ी करनी पड़ती हैं। भोपाल रेल मंडल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट की जानकारी देते हुए डीआरएम पंकज त्यागी एवं सीनियर डीसीएम सौरभ कटारिया ने बताया कि भोपाल रेल मंडल में यात्री सुविधाओं में इजाफा करने के लिए नए प्रोजेक्ट लागू किए हैं। यात्री सुविधाओं में वृद्धि करने के लिए भोपाल रेल मंडल द्वारा माल परिवहन, टिकट चेकिंग अभियान, स्पेशल ट्रेनों का संचालन कर आमदनी में 14 प्रतिशत तक की वृद्धि की गई है। भोपाल रेलवे को वित्तीय 2025-26 में 896.38 करोड रुपए की आय अर्जित हुई है। इस राशि का इस्तेमाल यात्री सुविधाओं के एक्सटेंशन में किया जाएगा। इन ट्रेनों को निशातपुरा स्टेशन पर मिलेगा ठहराव डॉ. आंबेडकर नगर-श्रीमाता वैष्णो देवी कटरा एक्सप्रेस। इंदौर-पटना-इंदौर (शनिवार/सोमवार) साप्ताहिक एक्सप्रेस। इंदौर-पटना-इंदौर (सोमवार, बुधवार/बुधवार,शुक्रवार) द्वि-साप्ताहिक एक्सप्रेस। डा.आंबेडकर नगर-प्रयागराज जंक्शन-डा. आंबेडकर नगर एक्सप्रेस (प्रतिदिन) अहमदाबाद-पटना-अहमदाबाद (रविवार/मंगलवार) साप्ताहिक एक्सप्रेस। इंदौर-बरेली-इंदौर (गुरुवार/बुधवार) साप्ताहिक एक्सप्रेस। इंदौर-हावड़ा-इंदौर क्षिप्रा (मंगलवार, गुरुवार, शनिवार/सोमवार, गुरुवार, शनिवार) त्रि-साप्ताहिक एक्सप्रेस। भुज-शालीमार-भुज एक्सप्रेस (साप्ताहिक) यात्री सुविधाओं के एक्सटेंशन प्रोजेक्ट में भोपाल स्टेशन पर आधुनिक स्लीपिंग पॉड में फैमिली और सिंगल बेड की सुविधा को बढ़ाया जाएगा। 300 क्षमता वाला एग्जीक्यूटिव लाउंज डेवलप होगा। इंटीग्रेटेड पार्किंग सिस्टम के लिए स्टेशन के बाहर मल्टी लेवल पार्किंग भवन बनेगा। स्टेशन पर ड्रॉप एंड को फैसिलिटी की लेन बढ़ाई जाएंगी। भोपाल स्टेशन पर बनाए जा रहे सभी 6 बेस किचन और प्रीमियम ट्रेनों की मॉनिटरिंग में अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) का उपयोग भोपाल स्टेशन पर बनाए जा रहे सभी 6 बेस किचन और प्रीमियम ट्रेनों की मॉनिटरिंग में अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) का उपयोग किया जाएगा। जो नए सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे, उन्हें इंटरनेट के जरिए एआइ मॉनिटरिंग से लिंक कर यह व्यवस्था बनाई जाएगी। डीआरएम पंकज त्यागी के मुताबिक रेलवे में भी अन्य विभागों की तरह एआइ बेस्ड मॉनिटरिंग लगातार बढ़ रही है। भोपाल रेलवे स्टेशन पर नई टेक्नोलॉजी के 150 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं। सीनियर DCM बोले – भोपाल स्टेशन का दबाव कम होगा भोपाल रेल मंडल के सीनियर डीसीएम सौरभ कटारिया ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि निशातपुरा स्टेशन 2023 से तैयार किया जा रहा है और इसके अधिकतर कार्य पूरे हो चुके हैं। फिलहाल रेलवे द्वारा अंतिम परीक्षण किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि नव वर्ष में इस स्टेशन को शुरू करने की तैयारी चल रही है। जैसे ही उद्घाटन कार्यक्रम की अनुमति प्राप्त होगी, स्टेशन को ऑपरेशन में लाया जाएगा। उन्होंने बताया कि अब तक मालवा एक्सप्रेस और जबलपुर–वरावल (सोमनाथ) एक्सप्रेस का हॉल्ट निशातपुरा में नोटिफाई किया जा चुका है। भोपाल स्टेशन परिचालन की दृष्टि से अत्यधिक कंजस्टेड है। ट्रेनों का लगातार रिवर्सल होना यात्रियों की यात्रा में देर कराता है। निशातपुरा शुरू होने से न सिर्फ ऑपरेशन आसान होगा, बल्कि भोपाल के भीड़भाड़ वाले हिस्से में जाने का समय भी बचेगा। यात्री सीधे अपने गंतव्य तक पहुंच सकेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिए कि “भविष्य में यात्रियों की मांग और लोड के आधार पर और ट्रेनों के हॉल्ट बढ़ाए जाएंगे। कई गाड़ियों के रूट और ठहराव का मूल्यांकन किया जा रहा है, ताकि यात्रियों को अधिकतम सुविधा मिल सके। भोपाल स्टेशन से दो किलोमीटर दूर है निशातपुरा… भोपाल शहर में अभी 3 रेलवे स्टेशन हैं। इनमें भोपाल रेलवे स्टेशन, रानी कमलापति, संत हिरदाराम नगर शामिल हैं। निशातपुरा और मैन स्टेशन की कनेक्टिविटी बेहतर करने का भी एक प्रोजेक्ट है। संत हिरदाराम नगर स्टेशन का भी विकास कार्य चल रहा है। यह विकास कार्य पूरा होने पर यहां ट्रेनों के स्टॉपेज बढ़ेंगे। निशातपुरा NSG-3 कैटेगरी का स्टेशन होगा भोपाल में निशातपुरा स्टेशन एनएसजी-3 कैटेगरी में कर दिया गया है। इसके चलते पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम को अपग्रेड किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, निशातपुरा स्टेशन को 2017 से पहले सी कैटेगरी में रखा गया था। स्टेशनों के वर्गीकरण के मानदंडों को नवंबर 2017 से संशोधित किया गया है। नए वर्गीकरण के अनुसार, स्टेशनों के वर्गीकरण के लिए वहां आने वाले यात्रियों की संख्या को ध्यान में रखा गया है। स्टेशनों को तीन समूहों में बांटा गया है, गैर-उपनगरीय (एनएसजी), उपनगरीय (एसजी), और हाल्ट (एचजी)। इसके अलावा इन समूहों को क्रमशः 1-6, 1-3 और 1-3 ग्रेड में रखा गया है। नहीं बदलनी पड़ेगी इंजन की दिशा मालवा और ओवरनाइट एक्सप्रेस जैसी चार से ज्यादा ट्रेनें हैं, जिनके स्टॉपेज भोपाल स्टेशन पर हैं। यदि इन ट्रेनों का हाल्ट भोपाल में खत्म कर निशातपुरा तक सीमित किया जाता है, तो इनके इंजन की दिशा नहीं बदलनी पड़ेगी।इससे उन्हें सीधे इंदौर, उज्जैन और रतलाम की तरफ रवाना करना आसान हो जाएगा। वर्तमान में इन ट्रेनों के भोपाल आवागमन के दौरान इंजन की दिशा बदलने में आधे घंटे से अधिक का समय लगता है, जिसे बचाया जा सकेगा।

ट्रंप की 6 अप्रैल तक की मोहलत: ईरान के लिए नहीं, खुद के लिए थी ये समयसीमा

न्यूयॉर्क  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सरेंडर करने के लिए उसे छह अप्रैल तक की मोहलत दी थी. लेकिन, अब साफ हो चुका है कि यह मोहलत ईरान के लिए नहीं, बल्कि खुद डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य और राजनीतिक मजबूरी के लिए थी. 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान युद्ध में अमेरिका ने भारी सैन्य तैयारी की, बड़े-बड़े नौसैनिक बेड़े भेजे और नाटो देशों से साथ आने की अपील की, लेकिन होर्मुज की खाड़ी में ईरान की पकड़ इतनी मजबूत साबित हुई कि ट्रंप की सारी रणनीति हांफती नजर आ रही है. अब ट्रंप नाटो सहयोगियों को गरियाने लगे हैं और ईरान के जवाबी हमलों में अमेरिकी फाइटर जेट व हेलीकॉप्टर मारे जा रहे हैं।  ट्रंप प्रशासन ने शुरू से ही ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई. इजराइल के साथ मिलकर शुरू किए गए हमलों में अमेरिका ने ईरान के नेतृत्व, परमाणु सुविधाओं और मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाया. ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की नौसेना और वायु सेना तबाह हो चुकी है. लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया. इस समुद्री रास्ते से दुनिया के 20 प्रतिशत तेल की ढुलाई होती है. इस रास्ते के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया है और तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं।  पहले 48 घंटे का दिया था अल्टीमेटम ट्रंप ने शुरू में ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया कि होर्मुज खोलो वरना पावर प्लांट तबाह कर देंगे. फिर इसे बढ़ाकर छह अप्रैल कर दी. जानकारों के अनुसार यह विस्तार इसलिए किया गया क्योंकि अमेरिका को अपनी सैन्य तैयारी मजबूत करने का समय चाहिए था. इस दौरान अमेरिका ने फारस की खाडी में बड़े नौसैनिक फ्लीट भेजे, जिनमें सुपर कैरियर जैसे USS जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश भी शामिल हैं. साथ ही ट्रंप ने नाटो देशों से अपील की कि वे भी नौसेना भेजकर होर्मुज को खोलने में मदद करें।  लेकिन नाटो सहयोगी इस अपील पर खरे नहीं उतरे. यूरोपीय देशों ने साफ कहा कि वे अमेरिका-इजराइल युद्ध में सीधे शामिल नहीं होंगे. ट्रंप ने गुस्से में नाटो को कागजी शेर करार दिया और यहां तक कह दिया कि अमेरिका नाटो से बाहर निकलने पर विचार कर रहा है. उन्होंने कहा कि जब अमेरिका को जरूरत पड़ी तो सहयोगी पीछे हट गए, जबकि अमेरिका सालों से उनका बचाव करता रहा. नाटो महासचिव मार्क रुट्टे ने कुछ समर्थन जताया, लेकिन ज्यादातर यूरोपीय नेता ट्रंप की मांगों से दूर रहे. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तो ट्रंप की रणनीति को अस्थिर बताया. होर्मुज में अमेरिका की स्थिति कमजोर साबित हुई. ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता के सामने अमेरिकी नौसेना भी पूरी तरह ईरान को हिला नहीं पाई. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मजबूत नियंत्रण बनाए रखा और कुछ जहाजों को ही गुजरने दिया, जो ज्यादातर ईरान से जुड़े थे. इसमें कुछ भारत और चीन के जहाज थे।  अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनी विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज में ईरान की भौगोलिक स्थिति और एंटी-शिप मिसाइलें अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. अब युद्ध के करीब पांच हफ्ते बाद अमेरिका को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है. एक दिन पहले ही ईरान ने अमेरिकी F-15E फाइटर जेट को मार गिराया. उस जेट का पायलट लापता है. संभवतः वह ईरान के कब्जे में है. सर्च एंड रेस्क्यू के दौरान दो ब्लैकहॉक हेलीकॉप्टर भी ईरानी गोलीबारी के शिकार हुए, हालांकि वे सुरक्षित लैंड कर गए. एक अन्य A-10 वारथोग विमान को भी कुवैत के ऊपर मार गिराया गया. ये घटनाएं अमेरिकी एयर पावर के दावों पर सवाल खड़े करती हैं. ईरान के आईआरजीसी ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है।  डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि युद्ध समाप्ति की ओर है और अगले 2-3 हफ्तों में अमेरिका बहुत जोरदार हमले करेगा. उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसेना चली गई है, एयर फोर्स तबाह हो चुकी है और मिसाइल स्टॉक खत्म हो रहा है. लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. ईरान ने जवाबी हमलों में इजराइल और गल्फ देशों पर सैकड़ों मिसाइलें दागीं और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया. कुछ रिपोर्ट्स में अमेरिकी नौसैनिक अड्डों पर हमलों की भी बात कही गई।  यह युद्ध ट्रंप के लिए राजनीतिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर चुनौती बन गया है. ईरान ने अमेरिका की कमजोर नस पकड़ ली है. होर्मुज की बंदी और उसके सटीक जवाबी हमले ने डोनाल्ड ट्रंप को बैकफुट पर ला दिया है. अब ट्रंप खुद को बचाने की कोशिश में लगे हैं. अगर छह अप्रैल तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई तो पावर प्लांट पर हमले की धमकी फिर दोहराई जा सकती है, लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा करना और बड़ा संकट पैदा कर सकता है. कुल मिलाकर ट्रंप की मोहलत खुद उनकी हांफती रणनीति का प्रतीक बन गई है. ईरान ने दिखा दिया कि वह आसानी से दबने वाला नहीं है। 

हिना बलूच का सनसनीखेज खुलासा: पाकिस्तान की 80% आबादी गे, 20% बायसेक्सुअल

कराची  पाकिस्तानी ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता हिना बलूच का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो ने पाकिस्तान में बड़े विवाद को जन्म दे दिया है। वीडियो में हिना ने दावा किया है कि पाकिस्तान में कोई भी 'स्ट्रेट' (विषमलैंगिक) नहीं है और देश की पूरी आबादी या तो समलैंगिक (Gay) है या बायसेक्सुअल (Bisexual)। उनका तर्क है कि सामाजिक दबाव, धर्म और पारिवारिक सम्मान की आड़ में पाकिस्तान में लोग अपनी कामुकता को छिपाकर रखते हैं। पाकिस्तानी समाज का 'खुला रहस्य' 'क्वीर ग्लोबल' को दिए एक हालिया इंटरव्यू में हिना बलूच ने पाकिस्तानी समाज की इस स्थिति को एक 'खुला रहस्य' बताया। उन्होंने कहा, 'मेरा मानना है कि पाकिस्तान की आधे से अधिक आबादी वास्तव में गे है। वे बस इसे खुलकर कहना नहीं चाहते हैं। मुझे लगता है कि पाकिस्तान की 80 प्रतिशत आबादी गे है और बाकी 20 प्रतिशत बायसेक्सुअल है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि कामुकता के मामले में पाकिस्तान में कोई भी 'स्ट्रेट' है।' धर्म और संस्कृति की आड़ बलूच ने तर्क दिया कि कई लोग अपनी सेक्शुअल ओरिएंटेशन (यौन रुझान) को दबाते हैं या उससे इनकार करते हैं। अपने बचपन के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, 'लोग इससे इनकार करेंगे, वे इसके बीच में धर्म को लाएंगे, वे संस्कृति का हवाला देंगे, लेकिन यह एक खुला रहस्य है।' हिना बलूच ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को शेयर करते हुए बताया कि उनका निजी संघर्ष कामुकता को लेकर कम, बल्कि अपनी जेंडर एक्सप्रेशन (लिंग अभिव्यक्ति) को लेकर ज्यादा था। उन्होंने बताया, 'मुझे हमेशा इस बात की चिंता सताती थी कि मैं कैसे लिपस्टिक लगाऊं ताकि परिवार से गालियां न सुननी पड़ें। मैं कैसे महिलाओं वाले कपड़े और गहने पहनूं जिससे मुझे मार न खानी पड़े?' समुदाय का शोषण उन्होंने पाकिस्तान के 'ख्वाजा सरा' (ट्रांसजेंडर) समुदाय द्वारा सामना की जाने वाली प्रणालीगत और सामाजिक चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस समुदाय के कई लोगों को मजबूरन भीख मांगने, शादियों में नाचने या सेक्स वर्क (वेश्यावृत्ति) जैसे सीमित और शोषणकारी कामों में धकेल दिया जाता है। इन सामाजिक बंधनों और शोषण को अस्वीकार करते हुए, बलूच ने जेंडर और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया। वह 'सिंध मूरत मार्च' की सह-संस्थापक बनीं और पाकिस्तान के प्रसिद्ध 'औरत मार्च' में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने खुद को ट्रांसजेंडर और अल्पसंख्यक अधिकारों की एक मुखर पैरोकार के रूप में स्थापित किया। हिंसा और देश छोड़ना बलूच ने बताया कि एक विरोध प्रदर्शन के दौरान 'प्राइड फ्लैग' फहराने के बाद उन्हें भारी हिंसक प्रतिशोध का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा, उन्होंने कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा कथित अपहरण और दुर्व्यवहार का भी सामना किया। इन जानलेवा और खौफनाक अनुभवों ने अंततः उन्हें पाकिस्तान छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। बाद में, उन्होंने लंदन के प्रतिष्ठित 'SOAS विश्वविद्यालय' में स्कॉलरशिप हासिल की और अपनी सुरक्षा के लिए यूनाइटेड किंगडम (UK) में शरणार्थी का दर्जा मांगा।

आधे दाम में तैयार हुआ ‘S-400’, IAF ने थोक में ऑर्डर दिया, रूस चौंका

बेंगलुरु  रूस का एस-400 दुनिया का एक सबसे बेहतर एयर डिफेंस सिस्टम है. रूस के साथ चीन और भारत भी इस सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं. बीते साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने इसकी झांकी दिखाई थी. इसके बाद कुछ ही घंटों के भीतर पाकिस्तान घुटनों पर आ गया था. उसने सीज फायर की गुहार लगाई थी. एस-400 ने पाकिस्तान की सीमा से करीब 300 किमी भीतर जाकर उसके एक बड़े अवॉक्स सिस्टम को तबाह कर दिया था. खैर हम इस जंग की बात नहीं कर रहे है. हमारा आज का फोकस एस-400 है. भारत ने रूस से इस डिफेंस सिस्टम के पांच स्क्वाड्रन खरीदे है. इसमें से तीन की डिलिवरी हो गई है. चौथे की डिलिवरी लेने एयरफोर्स की टीम रूस जा चुकी है. वहीं पांचवें स्क्वाड्रन की डिलिवरी भी इसी साल होने की उम्मीद है. भारत इसके अलावा एस-400 के ही पांच और स्क्वाड्रन खरीदे की योजना पर काम रहा है।  इस बीच भारत अपना देसी एस-400 बना रहा है. इसका नाम प्रोजेक्ट कुश है. इस डिफेंस सिस्टम को डीआरडीओ विकसित कर रहा है. यह कई मामलों में एस-400 से बेहतर सिस्टम है. इसको पूरी तरह भारतीय एयरफोर्स की जरूरत के हिसाब से डेवलप किया गया है. एयरफोर्स ने पहली बार में ही इस सिस्टम के पांच स्क्वाड्रन के ऑर्डर दे दिए हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इस सिस्टम की लागत एस-400 की तुलना में आधी से भी कम है. ऐसे में रूस के चेहरे पर हैरानी साफ नजर आ रही है. रूस के हथियार कारोबार के लिए एस-400 एक सबसे प्रीमियम हथियार है।  प्रोजेक्ट कुश की खासियत एस-400 की तुलना में कुश न केवल लागत में कम है बल्कि यह राष्ट्रीय संप्रभुता, सॉफ्टवेयर स्वतंत्रता और लॉन्ग-टर्म मेंटेनेंस के मामले में भी कहीं बेहतर है. भारत ने 2018 में रूस से एस-400 के पांच स्क्वाड्रन की डील की थी. उस वक्त उसकी लागत करीब 5.45 अरब डॉलर यानी करीब 45 हजार करोड़ रुपये थी. वहीं प्रोजेक्ट कुश के पांच स्क्वाड्रन की कीमत सिर्फ 21,700 करोड़ रुपये है. यानी यह लागत आधी से भी कम है. यह बचत न केवल सिस्टम की खरीद पर हो रही बल्कि इसमें इस्तेमाल होने वाली मिसाइलें भी काफी सस्ती हैं. यह कुश सिस्टम तीन लेयर वाली इंटरसेप्टर मिसाइलों पर आधारित हैं. इसमें एम-1 मिसाइल की रेंज 150 किमी, एम-2 मिसाइल की रेंज 250 किमी और सबसे भारी एम-3 मिसाइल की रेंज 350 से 400 किमी के बीच है. इन मिसाइलों की कीमत 40 से 50 करोड़ के बीच है जबकि एस-400 की रूसी मिसाइलों की कीमत करीब 100 करोड़ रुपये हैं।  क्यों सस्ता है ये सिस्टम दरअसल, इन मिसाइलों का उत्पादन भारत डायनामिक्स लिमिटेड कर रहा है, जबकि एडवांस मल्टी-फंक्शन कंट्रोल रडार का निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (बीईएल) कर रहा है. ये दोनों कंपनियां डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर्स जैसी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं।  पूर्ण सॉफ्टवेयर और टेक्टिकल स्वतंत्रता रूसी सिस्टम एस-400 में सोर्स कोड लॉक रहता है. इनका उपयोग काफी हद तक विदेशी सप्लायर की मर्जी पर निर्भर करता है. कुश प्रोजेक्ट पूरी तरह स्वदेशी है. ऐसे में एयरफोर्स का मिशन अल्गोरिदम और कोर सॉफ्टवेयर पर पूरा नियंत्रण मिलता है. इससे किसी भी स्थिति में इसमें किल स्विच का खतरा नहीं रहता है. इसमें सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर दुश्मन नई स्टेल्थ टेक्नोलॉजी या इलेक्ट्रॉमिक वारफेयर का इस्तेमाल करता है तो भारत अपना रडार डिटेक्शन और ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर तुरंत अपडेट कर सकता है. उदाहरण के तौर पर अगर चीन अपने पांचवीं पीढ़ी के जे-20 या जे-35 फाइटर जेट का इ्स्तेमाल करे तो ये डिफेंस सिस्टम तुरंत अपने रडार डिटेक्शन और ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर को अपडेट कर देंगे।  लाइफ साइकल इकोनॉमी इस मामले में भी कुश एस-400 से काफी आगे हैं. दरअसल, लाइफ साइकल इनोनॉमी का मतलब एक सिस्टम को उसकी पूरी उम्र तक ऑपरेट करने में आने वाला खर्च से है. एस-400 और कुश जैसे बेहद आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम 25 से 30 सालों तक अपनी सेवा देते हैं. ऐसे में एस-400 जैसे विदेश प्लेटफॉर्म के मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेड में बहुत पैसे खर्च होंगे. ऐसे में कई भार पार्ट्स उपलब्ध नहीं होने के कारण पूरा सिस्टम ठप हो जाता है. वहीं कुश का पूरा मेंटेनेंस भारत में होगा. इस कारण कुश के ठप होने की संभावना न के बराबर है।  इसके अलावा कुश को इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम के साथ सहजता से इंटीग्रेट किया जा सकता है. इसे नेटा अवाक्स, भविष्य के अवाक्स, तेजस मार्क-2 देसी फाइटर जेट और ग्राउंड रडार के साथ तुरंत डेटा शेयर किया जा सकेगा।  प्रोजेक्ट कुश की रफ्तार भारत ने प्रोजेक्ट कुश को बेहद तेज गति से विकास कर रहा है. इस साल के शुरू में इसके एम1 इंटरसेप्टर का फ्लाइट टेस्ट पूरा हो गया है. रिपोर्ट के मुताबिक एम1, एम2 और एम3 वैरिएंट 2028 से 2030 के बीच सेना को सौंपे जाएंगे. अगर भारत के सिस्टम 100 फीसदी सफल हो जाते हैं तो यह मित्र देश रूस के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. भारत का यह सिस्टम काफी सस्ता है. ऐसे में संभावना है कि कम बजट वाले मुल्कों के लिए भारत ने एक शानदार एयर डिफेंस सिस्टम को विकसित किया है।