samacharsecretary.com

आगरा का पेठा से बनारस की लस्सी तक प्रदेश के हर जिले के खास व्यंजन को ब्रांड बनाने की तैयारी

योगी सरकार की ओडीओसी योजना में यूपी के 75 जिलों का स्वाद: हर जनपद का पारंपरिक व्यंजन बनेगा पहचान आगरा का पेठा से बनारस की लस्सी तक प्रदेश के हर जिले के खास व्यंजन को ब्रांड बनाने की तैयारी योगी सरकार ने की 75 जिलों के पारंपरिक व्यंजनों की व्यापक मैपिंग, ब्रज से बुंदेलखंड और पूर्वांचल तक हर क्षेत्र के स्वाद को मिलेगा मंच स्थानीय खानपान से पर्यटन, रोजगार और छोटे कारोबार को मिलेगी नई रफ्तार, ‘टेस्ट ऑफ यूपी’ के रूप में देश-विदेश में पहचान बनाने की रणनीति लखनऊ उत्तर प्रदेश के विविध स्वाद और समृद्ध खानपान परंपरा को नई पहचान देने की दिशा में योगी आदित्यनाथ सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। ओडीओपी की तर्ज पर ‘एक जनपद एक व्यंजन (ओडीओसी)’ के तहत प्रदेश के सभी 75 जिलों के प्रमुख पारंपरिक व्यंजनों की व्यापक मैपिंग कर ली गई है, जिससे अब हर जिले की अपनी एक खास फूड आइडेंटिटी तय हो गई है। इस पहल में आगरा का पेठा, मथुरा का पेड़ा, वाराणसी की लस्सी, जौनपुर की इमरती, गोरखपुर के समोसे, मेरठ की रेवड़ी-गजक, लखनऊ का मलाई मक्खन, सहारनपुर का शहद और मुजफ्फरनगर का गुड़ जैसे प्रसिद्ध व्यंजनों को प्रमुखता दी गई है। इसके साथ ही अन्य जिलों के स्थानीय और पारंपरिक स्वाद जैसे कासगंज की सोन पापड़ी, अयोध्या की दही-जलेबी, बलिया का सत्तू, चित्रकूट का मावा और बागपत का घेवर भी इस सूची में शामिल किए गए हैं। हर क्षेत्र का अलग स्वाद, एक ही पहचान हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट बैठक में ओडीओसी को लागू करने के प्रस्ताव पर मुहर लग गई है। योजना के तहत ब्रज क्षेत्र की मिठास, अवध की समृद्ध कचौड़ी-समोसा संस्कृति, पूर्वांचल का देसी स्वाद और बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजन, इन सभी को एक प्लेटफॉर्म पर लाकर ‘टेस्ट ऑफ यूपी’ की अवधारणा को मजबूत किया जा रहा है। इससे प्रदेश के खानपान की विविधता को एकीकृत पहचान मिलेगी। इस पहल का सीधा फायदा स्थानीय कारीगरों, हलवाई, छोटे दुकानदारों और फूड उद्यमियों को मिलेगा। पारंपरिक व्यंजनों की मांग बढ़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और छोटे कारोबार को मजबूती मिलेगी। पर्यटन में भी आएगा उछाल योगी सरकार ओडीओसी को पर्यटन से जोड़कर फूड टूरिज्म को बढ़ावा देने की रणनीति पर काम कर रही है। अब पर्यटक किसी जिले में जाएंगे तो वहां के प्रसिद्ध व्यंजन का अनुभव लेना भी उनकी यात्रा का हिस्सा होगा। योगी सरकार की योजना है कि इन व्यंजनों को बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग के जरिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया जाए। इससे न सिर्फ यूपी के स्वाद को वैश्विक पहचान मिलेगी, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक छवि भी और मजबूत होगी। उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के प्रमुख व्यंजन 1. आगरा: पेठा /नमकीन (दालमोठ)/गजक/ पराठा 2. फिरोजाबाद: आलू उत्पाद/ आलू टिक्की/कचौड़ी 3. मैनपुरी: सोहन पापड़ी/भुना हुआ आलू  4. मथुरा: पेड़ा/छप्पन भोग/माखन मिश्री/ रबड़ी 5. अलीगढ़: डेयरी उत्पाद/कचौड़ी/इमरती/इगलास के चमचम 6. हाथरस: रबड़ी 7. कासगंज: मूंग का दलमा/कलाकंद/सोन पपड़ी/सोरों की मोठ की चाट 8. एटा: चिकोरी/घेवर पूड़ी 9. अयोध्या: कचौरी/टिकिया/ पेड़ा/कुल्हड़ वाली दही जलेबी 10. सुलतानपुर: पेड़ा/समोसा/पूड़ी और कोहड़े की सब्जी/लाल पेड़ा 11. बाराबंकी: चंद्रकला मिठाई/लाल पेड़ा 12. अमेठी: समोसा/गुड़ की खीर/गुलगुला/बड़ी वाली पूड़ी 13. अंबेडकर नगर: बालूशाही/चाट/खजाना/लाल गन्ने की गोटी 14. आजमगढ़: तहरी (मूंग दाल की)/सफेद गाजर का हलवा/लौंगलता 15. बलिया: सत्तू आधारित उत्पाद/बाटी-चोखा 16. मऊ: लिट्टी-चोखा/गोंठा की भेली 17. बरेली: सेवइयां/बर्फी/ छोले-भटूरे/ चाट 18. बदायूं: खोआ आधारित मिठाई/पेड़ा/ पेड़े/लौंज 19. पीलीभीत: जलेबी/खोआ मिठाई/लस्सी/लौंज 20. शाहजहांपुर: लौंग बर्फी/गुड़/समोसे/खुरचन 21. बस्ती: ठेकुआ/पूरी-सब्जी/सिरका/गुड़ 22. संत कबीर नगर: खोआ आधारित मिठाई/समोसा/पेड़ा 23. सिद्धार्थनगर: खोआ आधारित मिठाई (राम-कचौरी)/मखाना/कालानमक चावल/रामकटोरी 24. बांदा: सोहन हलवा/बालूशाही 25. चित्रकूट: मावा 26. हमीरपुर: बुंदेली व्यंजन (दाल भरे/डुबरी फरा/महुआ बर्फी/माड़े/सन्नाटा) 27. महोबा: दाल बाफला/तिलकुट/देसावरी पान/खजूर का गुड़ 28. गोड़ा: इटियाथोक का दही बड़ा व कचौड़ी 29. बहराइच: चमचम 30. बलरामपुर: नारियल बर्फी/कलाकंद/ घमंजा/ चाट 31. श्रावस्ती: इमरती 32. गोरखपुर: लिट्टी-चोखा/लहसुन वाले छोले समोसे/ बर्फी 33. महाराजगंज: लिट्टी-चोखा/खोआ आधारित मिठाई (राम-कचौरी)/गुड़/मीठा समोसा 34. देवरिया: मालपूआ/लिट्टी-चोखा/दही/गुड़ की जलेबी 35. कुशीनगर: केला चिप्स/पेड़ा/लाल खोरमा 36. झांसी: दाल बाफला/बालूशाही 37. जालौन: रसगुल्ले/गुझिया 38. ललितपुर: दूध हलवा/बाजरे की रोटी 39. कानपुर: समोसा/लड्डू/मलाई मक्खन (मलइयो) 40. कानपुर देहात: खाद्य तेल/लस्सी 41. औरैया: शुद्ध देसी घी/दूध बर्फी मिठाई/बालूशाही/ गुड़ 42. इटावा: सरसों आधारित उत्पाद (सरसों की चटनी/सलाद) मट्ठा के आलू/खीर मोहन 43. फर्रुखाबाद: दालमोठ/भुने आलू 44. कन्नौज: गट्टा मिठाई/खोआ का पेड़ा 45. लखनऊ: रेवड़ी/आम उत्पाद/चाट/मलाई मक्खन 46. हरदोई: आलू पूरी/लड्डू/लाओझड़  47. लखीमपुर खीरी: केला/गुड़/खोआ पेड़ा/खीर मोहन/रसगुल्ले 48. रायबरेली: मसाले 49. सीतापुर: मक्खन मलाई/समोसा/मिर्ची पकौड़ा/पेड़ा 50. उन्नाव: काला जामुन/समोसा/कचौड़ी/त्रिलोक परी 51. मेरठ: रेवड़ी/गजक/नानखटाई 52. गाजियाबाद: सोया चाप/मिर्ची का अचार 53. गौतम बुद्ध नगर: केक/बेकरी उत्पाद 54. हापुड़: पापड़ 55. बुलंदशहर: कचौरी/खुरचन/पेड़ा 56. बागपत: बालूशाही/घेवर 57. मिर्जापुर: लाल पेड़ा/बालूशाही/रसगुल्ला/पेड़ा 58. भदोही (संत रविदास नगर): दाल पीठा/ठेकुआ/खोआ पेड़ा/गुझिया/रबड़ी 59. सोनभद्र: गुलाब जामुन 60. मुरादाबाद: दाल 61. रामपुर: हल्दी हलवा (हलवा) 62. अमरोहा: आम पन्ना/आम चटनी/सेव/लड्डू 63. संभल: सेवइया/गजक/सोनपापड़ी 64. बिजनौर: गजक/सिंघाड़ा कचौरी/सोनपापड़ी और बतीसा 65. प्रयागराज: सब्जी-कचौरी/समोसा/रसगुल्ला 66. फतेहपुर: बेड़मी पूरी-सब्जी/पेड़ा/सूतफेनी 67. कौशांबी: गुड़ से बनी मिठाई/चाट/बर्फी/मुंगौरा 68. प्रतापगढ़: आंवला आधारित उत्पाद/गुलाब जामुन 69. वाराणसी: तिरंगा बर्फी/ठंडाई-लस्सी/कचौरी/बनारसी पान/लौंग लत्ता/मलइयो  70. जौनपुर: इमरती/मिठाई एटमबम/जौनपुरी मूली 71. गाजीपुर: मिर्च का अचार/मटर चाट/रसगुल्ला/जलेबी 72. चंदौली: काले चावल के उत्पाद (जैसे खीर)/गुलाब जामुन/लस्सी 73. सहारनपुर: शहद आधारित उत्पाद/चाट/घेवर 74. मुजफ्फरनगर: गुड़/चाट (टिक्की)/पेड़ा 75. शामली: गुड़ आधारित उत्पाद/चाट/मिठाई

सीनियर IAS अधिकारियों का पुनर्वितरण, ACS होम ने संभाला सामान्य प्रशासन विभाग, अतिरिक्त जिम्मेदारी जनसंपर्क

भोपाल   मध्य प्रदेश में एक और बड़ा प्रशासनिक फेरबदल हुआ है। कुछ अधिकारियों को नई जिम्मेदारियां सौंपी गई है।  ACS संजय कुमार शुक्ल अपर मुख्य सचिव गृह , ACS शिवशेखर शुक्ला अपर मुख्य सचिव सामान्य प्रशासन और अरविंद दुबे संचालक जनसंपर्क (अतिरिक्त प्रभार)होंगे। इस बाबत आदेश भी जारी  हो गए हैं। मध्यप्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन विभाग ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के तबादले और नवीन पदस्थापना के आदेश जारी किए हैं। नए आदेश के तहत दो वरिष्ठ अधिकारियों के दायित्वों में बदलाव किया गया है, वहीं एक अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। 1994 बैच के आईएएस अधिकारी  संजय कुमार शुक्ल को अपर मुख्य सचिव गृह विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है, इसके साथ ही शुक्ल को विमानन विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया है। वहीं दूसरी ओर  1994 बैच के ही वरिष्ठ अधिकारी शिवशेखर शुक्ल को अपर मुख्य सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग का दायित्व सौंपा गया है। इसके अलावा उन्हें संस्कृति विभाग एवं आयुक्त-सह-संचालक, स्वराज संस्थान का प्रभार दिया गया है।

राहु-सूर्य की युति से बनेगा ग्रहण योग, 10 मई को कई राशियों पर संकट के संकेत

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, आने वाली 10 मई 2026 को ग्रहों की स्थिति एक अशुभ योग का निर्माण कर रही है. इस दिन क्रूर ग्रह राहु और ग्रहों के राजा सूर्य एक ही राशि में गोचर करेंगे, जिससे ग्रहण योग की स्थिति बनेगी. ज्योतिषियों का मानना है कि इस युति का नकारात्मक प्रभाव कई राशि के जातकों के जीवन पर देखने को मिल सकता है. मेष राशि: करियर में चुनौतियां ग्रहण योग के कारण मेष राशि वालों को कार्यक्षेत्र में संभलकर रहने की जरूरत है. इस दौरान आपके बनते काम बिगड़ सकते हैं, अधिकारियों के साथ वैचारिक मतभेद होने की आशंका है. निवेश के मामलों में सावधानी बरतें, वरना आर्थिक नुकसान हो सकता है. सिंह राशि: मान-प्रतिष्ठा पर संकट सिंह राशि के स्वामी सूर्य हैं, इसलिए राहु के साथ उनकी युति इस राशि के लिए तनावपूर्ण रहेगी. समाज में आपकी छवि प्रभावित हो सकती है. इस अवधि में क्रोध पर नियंत्रण रखें. किसी भी बड़े निर्णय को फिलहाल टाल देना ही बेहतर होगा. कन्या राशि: स्वास्थ्य और धन हानि कन्या राशि के जातकों के लिए 10 मई के बाद का समय उतार-चढ़ाव भरा रह सकता है. अचानक स्वास्थ्य बिगड़ने या पुराने रोगों के उभरने की संभावना है. फिजूलखर्ची बढ़ने से बजट बिगड़ सकता है, इसलिए पैसों के लेन-देन में सतर्कता बरतें. वृश्चिक राशि: पारिवारिक कलह के संकेत इस अशुभ योग का असर आपके पारिवारिक जीवन पर पड़ सकता है. घर के सदस्यों के बीच तालमेल की कमी और छोटी-छोटी बातों पर विवाद होने के योग हैं. वाणी पर संयम रखें, वाहन चलाते समय विशेष सावधानी बरतें. उपाय और सावधानी ग्रहण योग के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए जातकों को भगवान शिव की उपासना करनी चाहिए. 10 मई को 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करें, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना शुभ फलदायी रहेगा. इसके अलावा, दान-पुण्य करने से भी ग्रहों की शांति होती है.

जैक इंटरमीडिएट परीक्षा में पलामू का सुधार, कॉमर्स में सबसे बेहतर रिजल्ट

 पलामू झारखंड अधिविद्य परिषद (जैक) द्वारा आयोजित इंटरमीडिएट वार्षिक परीक्षा-2026 का परिणाम बुधवार को जारी कर दिया गया। इस बार पलामू जिले के छात्र-छात्राओं ने विज्ञान, कला और वाणिज्य तीनों संकायों में बेहतर प्रदर्शन करते हुए पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय सुधार दर्ज कराया है। जिले में विज्ञान संकाय का रिजल्ट 90.16 प्रतिशत, कला संकाय का 94.54 प्रतिशत और वाणिज्य संकाय का 95.99 प्रतिशत रहा। सर्वाधिक सफलता कॉमर्स संकाय में मिली है। राज्य स्तरीय रैंकिंग में भी पलामू ने सुधार किया है। आर्ट्स में पिछले वर्ष जहां पलामू का स्थान 24वां था, वहीं इस वर्ष 18वां स्थान प्राप्त हुआ है। कॉमर्स में जिला 13वें से 10वें स्थान पर पहुंच गया है। हालांकि साइंस में पलामू एक पायदान नीचे खिसककर तीसरे से चौथे स्थान पर आ गया है। जैक इंटरमीडिएट परीक्षा 2026 के परिणाम ने यह साबित किया है कि जिले की शिक्षा व्यवस्था में लगातार सुधार हो रहा है। तीनों संकायों में विद्यार्थियों के प्रदर्शन ने पलामू की शैक्षणिक स्थिति को मजबूती दी है। साइंस में 4.37 प्रतिशत बढ़ा रिजल्ट इस वर्ष विज्ञान संकाय में जिले के 17,926 परीक्षार्थी परीक्षा में शामिल हुए थे। इनमें 16,163 विद्यार्थी सफल घोषित किए गए। कुल 13,476 परीक्षार्थी प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए, जिनमें 7,569 छात्र और 5,907 छात्राएं शामिल हैं। वहीं 2,683 विद्यार्थियों ने द्वितीय श्रेणी प्राप्त की, जिनमें 1,654 छात्र और 1,029 छात्राएं हैं। चार छात्राएं तृतीय श्रेणी से पास हुई हैं। विज्ञान संकाय में 1,756 विद्यार्थी असफल घोषित किए गए। पिछले वर्ष जिले का साइंस रिजल्ट 85.79 प्रतिशत था, जबकि इस वर्ष यह बढ़कर 90.16 प्रतिशत पहुंच गया। यानी पिछले साल की तुलना में 4.37 प्रतिशत अधिक विद्यार्थी सफल हुए हैं।बाक्स : आर्ट्स में 5.98 प्रतिशत अधिक सफलता आर्ट्स संकाय में इस वर्ष 10,646 परीक्षार्थी शामिल हुए थे, जिनमें 10,065 विद्यार्थी सफल रहे। जिले का रिजल्ट 94.54 प्रतिशत रहा, जो पिछले वर्ष के 88.56 प्रतिशत से 5.98 प्रतिशत अधिक है। आर्ट्स में 4,141 विद्यार्थियों ने प्रथम श्रेणी प्राप्त की, जिनमें 1,341 छात्र और 2,800 छात्राएं शामिल हैं। वहीं 5,589 विद्यार्थी द्वितीय श्रेणी से पास हुए, जिनमें 2,118 छात्र और 3,471 छात्राएं हैं। तृतीय श्रेणी में 335 विद्यार्थी सफल हुए, जिनमें 187 छात्र और 148 छात्राएं शामिल हैं। 571 विद्यार्थी असफल घोषित किए गए। कॉमर्स में सबसे बेहतर प्रदर्शन कॉमर्स संकाय में इस वर्ष 549 छात्र-छात्राएं परीक्षा में शामिल हुए थे। इनमें 527 विद्यार्थी सफल हुए, जबकि 22 परीक्षार्थी असफल रहे। जिले का रिजल्ट 95.99 प्रतिशत रहा, जो तीनों संकायों में सबसे बेहतर है। कॉमर्स में 411 विद्यार्थियों ने प्रथम श्रेणी हासिल की। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार कॉमर्स में 3.32 प्रतिशत अधिक विद्यार्थी सफल हुए हैं। राज्य स्तरीय रैंकिंग में भी पलामू ने सुधार करते हुए 13वें स्थान से 10वें स्थान पर जगह बनाई है।

मनातू की नई कहानी: नक्सल प्रभावित क्षेत्र अब बन रहा शिक्षा का केंद्र

तरहसी (पलामू)  कभी नक्सलवाद, बारूद और दहशत के लिए कुख्यात रहा पलामू जिले का मनातू इलाका आज शिक्षा और उम्मीद की नई कहानी लिख रहा है। यहां मनातू थाना परिसर में शुरू हुई सामुदायिक कोचिंग ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सही दिशा और मार्गदर्शन मिले तो कठिन से कठिन हालात भी बदले जा सकते हैं। इस पहल से जुड़े सभी 25 छात्र-छात्राओं ने इंटरमीडिएट परीक्षा में शत-प्रतिशत सफलता हासिल कर क्षेत्र का नाम रोशन किया है। वर्षों तक जिस क्षेत्र में शाम ढलते ही सन्नाटा डर में बदल जाता था, वहीं आज बच्चों के हाथों में किताबें और आंखों में उज्ज्वल भविष्य के सपने दिखाई दे रहे हैं। मनातू थाना परिसर, जो कभी सुरक्षा और अपराध की चर्चाओं तक सीमित था, अब शिक्षा के केंद्र के रूप में पहचान बना रहा है। पुलिस नहीं गुरुजी, थाना बना पाठशाला तत्कालीन थाना प्रभारी निर्मल उरांव ने अपनी जिम्मेदारियों के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा को मिशन बना लिया। उनके प्रयासों से थाना परिसर में सामुदायिक कोचिंग की शुरुआत की गई, जहां पुलिसकर्मी न केवल सुरक्षा व्यवस्था संभालते हैं, बल्कि छात्रों को पढ़ाई में मार्गदर्शन भी देते हैं। यह कोचिंग मुख्य रूप से मजदूर और किसान परिवारों के बच्चों के लिए शुरू की गई थी, जो आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते थे। यहां उन्हें निःशुल्क शिक्षा, मार्गदर्शन और आत्मविश्वास मिला, जिसका परिणाम आज शत-प्रतिशत सफलता के रूप में सामने आया है। रेशमी कुमारी ने हासिल किया 70 प्रतिशत अंक इस कोचिंग की छात्रा रेशमी कुमारी ने साइंस संकाय में 70 प्रतिशत अंक हासिल किए। उन्होंने बताया कि उनके पिता मजदूरी करते हैं और यदि पुलिस की यह पहल नहीं होती तो उनका आगे पढ़ना मुश्किल था। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि निर्मल उरांव बच्चों को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं कराते थे, बल्कि जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देते थे। उनका संदेश था.जिस हाथ में कलम मजबूत हो, वहां अंधेरा ज्यादा देर टिक नहीं सकता। ”मनातू की यह कहानी आज इस बात का प्रमाण बन गई है कि जब खाकी सिर्फ कानून नहीं, बल्कि बदलाव की जिम्मेदारी भी उठाती है, तो सबसे कठिन हालात में भी सफलता की नई इबारत लिखी जा सकती है। नक्सल से शिक्षा की ओर बदलता मनातू मनातू, जो कभी अफीम की खेती और नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता था, अब शिक्षा और विश्वास की नई पहचान बन रहा है। ग्रामीणों ने पहली बार पुलिस और जनता के बीच इतना आत्मीय और सकारात्मक रिश्ता महसूस किया है। पलामू एसपी कपिल चौधरी ने सभी सफल छात्रों को बधाई दी और कहा कि शिक्षा ही समाज परिवर्तन का सबसे मजबूत माध्यम है। उन्होंने विद्यार्थियों को आगे भी मेहनत करने और बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित किया।

वास्तु शास्त्र: घर में छिपकली का दिखना शुभ या अशुभ? जानिए संकेत

गर्मियों के मौसम शुरू होने के साथ ही घर की दीवारों पर छिपकलियां नजर आने लगती हैं. जिन्हें देखकर अक्सर लोग बहुत ही ज्यादा डर जाते हैं. बड़े बुजुर्गों की मानें तो घर की दीवार पर मोर का पंख लगाने से चिपकली चली जाती है. लेकिन, चिपकली को कुछ लोग शुभ संकेत बोलते हैं और कुछ लोग अशुभ. लेकिन, यह इस बात पर निर्भर करता है कि छिपकली का रंग क्या है? दरअसल, काली रंग की छिपकली को लोग अशुभ मानते हैं. हल्के पीले रंग की छिपकली शुभ मानी जाती है. वास्तु शास्त्र में भी इस बात का जिक्र है कि घर में चिपकली का आना शुभ संकेत भी हो सकता है. क्योंकि छिपकली को मां लक्ष्मी का स्वरूप ही माना जाता है. कहा जाता है कि अगर घर में हल्के पीले रंग की छिपकली है तो यह मां लक्ष्मी के आगमन का संकेत है और घर में सुख-समृद्धि आने वाली है. तो आइए ज्योतिर्विद प्रीतिका मजूमदार जी से जानते हैं कि घर में छिपकली दिखने के कौन से शुभ संकेत और कौन से अशुभ होते हैं. दीवार और फर्श पर रेंगती छिपकली का दिखना वास्तु शास्त्र के अनुसार, अगर छिपकली दीवार पर चलती हुई दिखाई दे, तो इसे अच्छे समाचार माना जाता है. वहीं, अगर फर्श पर रेंगती हुई दिखे, तो इसे धन लाभ से जोड़ा जाता है. नौकरी या बिजनेस करने वालों के लिए भी इसे तरक्की और लाभ का संकेत माना जाता है. जो लोग नौकरी की तलाश में हैं, उनके लिए यह नए अवसर मिलने का इशारा हो सकता है. अनाज वाली पर जगह पर छिपकली का दिखना वास्तु शास्त्र के मुताबिक, अगर छिपकली अनाज रखने की जगह, जैसे चावल या गेहूं के डिब्बे के पास दिखे, तो इसे बहुत शुभ माना जाता है. ऐसी स्थिति में घर की आर्थिक स्थिति मजबूत होने और धन-धान्य में वृद्धि के संकेत माने जाते हैं. अगर दो छिपकलियां एक साथ दिखाई दें, तो इसे पुराने दोस्तों से मुलाकात या रिश्तों में सुधार का संकेत माना जाता है. पति-पत्नी के बीच चल रही समस्याएं भी धीरे-धीरे सुलझने लगती हैं. काली छिपकली का दिखना वास्तु शास्त्र के अनुसार, अगर घर में काली रंग की छिपकली नजर आए, खासकर मंदिर या पूजा वाले स्थान के आसपास, तो कुछ लोग इसे अच्छा संकेत नहीं मानते हैं. क्योंकि काला रंग नकारात्मकता फैलाता है. जो यह संदेश देता है कि घर में कुछ परेशानियां आने वाली हैं. ऐसे में लोग सतर्क रहने और घर के माहौल को सकारात्मक बनाए रखने की सलाह भी दी जाती है. वहीं दूसरी तरफ, सामान्य तौर पर पूजा स्थान के पास छिपकली का दिखना कई मान्यताओं में शुभ भी माना जाता है. खासकर अगर यह शुक्रवार के दिन दिखाई दे, तो इसे मां लक्ष्मी की कृपा से जोड़कर देखा जाता है. लोगों का मानना है कि इससे घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है और आर्थिक स्थिति बेहतर हो सकती है. शरीर के इन अंगों का छिपकली का गिरना होता है शुभ – वास्तु शास्त्र के अनुसार, कमर के बीच में अगर छिपकली गिरे तो पैसों से जुड़ा लाभ होता है. – पेट पर छिपकली गिरना भी शुभ कहलाता है. – नाभि पर छिपकली गिरने से इच्छाएं पूरी होती हैं. – दाहिनी हाथ पर छिपकली गिरे तो धन लाभ मिलता है. लेकिन, बाएं हाथ पर छिपकली गिरने से संपत्ति से जुड़ा कोई नुकसान हो सकता है. – दाहिनी आंख पर छिपकली गिरने का मतलब किसी से मुलाकात होगी. बाईं आंख पर छिपकली गिरने का मतलब होता है बड़ी हानि होना.

पटना से मुजफ्फरपुर तक बनेंगे आधुनिक टाउनशिप, अलग-अलग थीम पर होगा विकास

पटना बिहार में शहरीकरण को बढ़ावा देने के लिए 11 सेटेलाइट टाउनशिप विकसित करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। प्रत्येक सेटेलाइट टाउनशिप का विकास एक खास थीम पर किया जाना है। थीम का चयन स्थानीय विशेषता और जरूरत के अनुसार किया जाएगा। नगर विकास विभाग इसकी तैयारी में जुट गया है। विभाग ने 11 सेटेलाइट टाउनशिप क्षेत्र में जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी है। मास्टर प्लान बनने तक यह रोक जारी रहेगी। सड़क, पार्क, स्कूल, मैदान या अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए जमीन चिह्नित करने के बाद रोक हटा दी जाएगी। टाउनशिप को कोर और विशेष क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है। कोर क्षेत्र का विकास सबसे पहले किया जाना है। इसी क्षेत्र के मास्टर प्लान में थीम का चयन किया जाएगा। हालांकि, किस टाउनशिप को किस थीम पर विकसित किया जाएगा, इसका अंतिम निर्णय होना बाकी है। बावजूद नगर विकास विभाग के विशेषज्ञों ने इसकी रूपरेखा बना ली है। उदाहरण के लिए राजधानी पटना के पास बन रही पाटलिपुत्र टाउनशिप को एजुकेशन-स्पोर्ट्स सिटी और लॉजिस्टिक हब के रूप में पहचान दी जाएगी। इसी तरह गयाजी के पास बन रही मगध टाउनशिप को बोधगया और गयाजी के सांस्कृतिक, धार्मिक और पर्यटकीय महत्व की पहचान दी जाएगी। मुजफ्फरपुर के पास बन रही तिरहुत टाउनशिप को औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके अलावा सोनपुर के पास विकसित हो रहे हरिहरनाथपुरम को एयरोसिटी की तर्ज पर विकसित किया जाना है। थीम की जरूरत के हिसाब से यहां बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएंगी। जरूरत की बुनियादी सुविधाएं विकसित होंगी इसी तरह अन्य सेटेलाइट टाउनशिप के थीम की योजना बनाई जा रही है। बिहार शहरी आयोजना स्कीम नियमावली 2026 के अनुसार टाउनशिप की योजना थीम के आधार पर बनेगी। इसमें सड़क नेटवर्क, सार्वजनिक सुविधाओं के लिए प्लॉट, अवसंरचना, उद्यान, खुले क्षेत्र, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आवास आदि की भी सुविधा होगी। सेटेलाइट टाउनशिप की स्थानीय खासियत ● पाटलिपुत्र (पटना) : लॉजिस्टिक्स हब, एजुकेशनल-स्पोर्ट्स सिटी। ● हरिहरनाथपुरम (सोनपुर): पौराणिक महत्व, एरोसिटी। ● मगध (गया): पर्यटन और धार्मिक – सांस्कृतिक महत्व। ● मिथिला (दरभंगा): मेडिकल हब, सांस्कृतिक विरासत। ● तिरहुत (मुजफ्फरपुर): औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र। ● सीतापुरम (सीतामढ़ी): धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन। ● कोसी(सहरसा): व्यावसायिक केंद्र। ● पूर्णिया (पूर्णिया): मेडिकल हब, आर्थिक गतिविधियों का केंद्र। ● अंग (मुंगेर): विरासत और वाणिज्यिक केंद्र। ● विक्रमशिला (भागलपुर): शिक्षा और सांस्कृतिक केंद्र। ● सारण (छपरा): आवासीय और औद्योगिक केंद्र।

18-40 उम्र के लोग बन सकते हैं सिविल डिफेंस रक्षक, सेना के साथ करेंगे काम

 चंडीगढ़ ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ के अवसर पर चंडीगढ़ प्रशासन ने सिविल डिफेंस वाॅलंटियर्स (सीडीवी) के दूसरे बैच के नामांकन अभियान की घोषणा की है। प्रशासन का कहना है कि यह पहल शहर में आपदा प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र को और मजबूत बनाने की दिशा में अहम कदम है। प्रशासन के अनुसार वर्ष 2025 में सिविल डिफेंस वाॅलंटियर्स का पहला बैच गठित किया गया था, जिसमें 419 स्वयंसेवकों को शामिल किया गया। इन वालंटियर्स को महात्मा गांधी स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (एमजीएसआइपीए) में सात दिन का विशेष प्रशिक्षण दिया गया था। प्रशिक्षण के दौरान प्रेक्टिकल सेशन, फिजिकल फिटनेस टेस्ट, लिखित परीक्षा और माक ड्रिल करवाई गई थीं। इस प्रशिक्षण में फायर विभाग, स्वास्थ्य विभाग, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) और भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड के विशेषज्ञों ने भाग लिया। वालंटियर्स को आपदा प्रबंधन, प्राथमिक उपचार, रेस्क्यू आपरेशन, निकासी प्रक्रिया, ट्रैफिक प्रबंधन, संकट के समय संचार व्यवस्था और बेसिक फायर फाइटिंग का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद सभी वालंटियर्स को सिविल डिफेंस की यूनिफार्म और बेरेट भी प्रदान की गई। प्रशासन ने बताया कि सिविल डिफेंस की संरचना में चीफ वार्डन, डिप्टी चीफ वार्डन, डिविजनल वार्डन, डिप्टी डिविजनल वार्डन, पोस्ट वार्डन और सेक्टर वार्डन जैसे पद शामिल हैं। प्रशासन ने नामांकन के लिए सेक्टर-38 स्थित महिला भवन में विशेष कैंप आयोजित करने का फैसला लिया है। इच्छुक नागरिक 8 मई को दोपहर 12 बजे से वहां जाकर अपना पंजीकरण करा सकते हैं। प्रशासन ने शहरवासियों से अपील की है कि वह अधिक से अधिक संख्या में इस मुहिम का हिस्सा बनें। भर्ती के लिए जरूरी शर्तें -आवेदक का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है। -18 से 40 वर्ष के बीच के युवा आवेदन कर सकते हैं। -शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह फिट होना जरूरी है। -आवेदक का कोई भी आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होना चाहिए। इन पदों पर भी होंगे नामांकन सिविल डिफेंस के तहत न केवल वॉलंटियर्स, बल्कि विभिन्न संगठनात्मक पदों के लिए भी आवेदन मांगे गए हैं, जिनमें चीफ वार्डन और डिप्टी चीफ डिविजनल वार्डन, डिप्टी डिविजनल वार्डन,पोस्ट वार्डन और सेक्टर वार्डन शामिल हैं। पहले बैच में 419 हुए तैयार वर्ष 2025 में प्रशासन ने पहले बैच का गठन किया था, जिसमें 419 स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया गया। इन्हें एमजीएसआईपीए (MGSIPA) में 7 दिनों की ट्रेनिंग दी गई थी। इस ट्रेनिंग में आर्मी की वेस्टर्न कमांड, एनडीआरएफ, फायर और स्वास्थ्य विभाग के वॉलंटियर्स को आपदा से लड़ने के गुर सिखाए थे। सेक्टर-38 महिला भवन में होगा कार्यक्रम दूसरे बैच के लिए नामांकन अभियान 8 मई को दोपहर 12 बजे से महिला भवन, सेक्टर-38 सी, चंडीगढ़ में आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम में यूटी चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। कार्यक्रम के दौरान आपदा प्रबंधन और सिविल डिफेंस की उपलब्धियों पर आधारित काफी टेबल बुक भी जारी की जाएगी और नए वाॅलंटियर्स का औपचारिक नामांकन किया जाएगा। यह योग्यता प्रशासन के अनुसार आवेदन करने वाले व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना, आयु 18 वर्ष से अधिक होना, शारीरिक और मानसिक रूप से फिट होना जरूरी है। साथ ही आवेदकों को निर्धारित प्रशिक्षण लेने के लिए तैयार रहना होगा। प्रशासन ने शहरवासियों से इस पहल में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील करते हुए कहा कि इससे सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी और आपदा के समय एक सक्षम एवं जागरूक समाज तैयार किया जा सकेगा।

घर में न लगाएं ये पौधे वास्तु के अनुसार अशुभ पौधे

वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में रखे पेड़-पौधे सिर्फ सजावट का सामान नहीं होते, बल्कि वे घर की ऊर्जा (Energy) पर गहरा असर डालते हैं.  जहाँ कुछ पौधे घर में सौभाग्य और खुशहाली लाते हैं, वहीं कुछ पौधे ऐसे भी हैं जिन्हें घर की सीमा के अंदर लगाना बहुत अशुभ माना जाता है. गलत पौधों का चुनाव न सिर्फ आपकी तरक्की रोक सकता है, बल्कि परिवार में झगड़े और पैसों की तंगी का कारण भी बन सकता है. अगर आपने भी अनजाने में ये पौधे लगाए हैं, तो इनके बारे में जान लेना जरूरी है. भूलकर भी न लगाएं ये अशुभ पौधे: गुलाब के पौधे को छोड़कर, घर के अंदर या मुख्य दरवाजे पर कभी भी कांटेदार पौधे जैसे कैक्टस नहीं लगाने चाहिए. वास्तु के अनुसार, ये पौधे घर के माहौल में  तनाव पैदा करते हैं. इससे परिवार के सदस्यों के बीच आपसी तालमेल बिगड़ता है और कड़वाहट बढ़ती है. बोनसाई के पौधे: बोनसाई के पौधे दिखने में तो बहुत सुंदर लगते हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार इन्हें घर में रखना अच्छा नहीं माना जाता.  बोनसाई पौधों को बढ़ने से रोका जाता है ताकि वे छोटे रहें. माना जाता है कि इन्हें घर में रखने से परिवार के सदस्यों की प्रगति और करियर में भी रुकावटें आने लगती हैं.   इमली का वृक्ष: घर के आंगन या मुख्य परिसर के पास इमली का पेड़ होना अच्छा नहीं माना जाता. लोक मान्यताओं और वास्तु के अनुसार, इमली के पेड़ पर नकारात्मक ऊर्जा का वास होता है. इसे घर के पास लगाने से परिवार के लोगों में डर, घबराहट और मानसिक बेचैनी बढ़ सकती है. दुग्ध युक्त पौधे: ऐसे पौधे जिनकी शाखाओं को तोड़ने पर दूध जैसा सफेद तरल निकलता है (जैसे मदार या आक), घर में लगाने से बचना चाहिए.  ये पौधे धन की हानि का कारण बन सकते हैं और स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालते हैं.   मुरझाए या सूखे पौधे: घर में कभी भी सूखे हुए पौधे न रखें.  वास्तु के अनुसार, सूखे पौधे शोक और नकारात्मकता का प्रतीक होते हैं, जो घर की जीवंतता और सकारात्मक ऊर्जा को पूरी तरह सोख लेते हैं.

अबूझमाड़ में डिजिटल सूर्योदय: ताहकाडोंड में पहली बार गूंजी मोबाइल की घंटी

अबूझमाड़ में डिजिटल सूर्योदय: ताहकाडोंड में पहली बार गूंजी मोबाइल की घंटी ​रायपुर      छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का वह हिस्सा, जिसे कभी 'अबूझ' (अनजान) कहा जाता था, अब डिजिटल संकेतों से जुड़कर अपनी नई पहचान लिख रहा है। नारायणपुर जिले के ओरछा विकासखंड अंतर्गत सुदूर वनांचल ग्राम ताहकाडोंड में मोबाइल टावर की स्थापना ने सदियों के संचार सन्नाटे को तोड़ दिया है। अब यहाँ के ग्रामीण अपनों से बात करने के लिए पहाड़ियों की ऊंचाइयों पर नहीं चढ़ते, बल्कि घर बैठे दुनिया से जुड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्र में संचार क्रांति का यह अध्याय वास्तव में सराहनीय है। 'नो सिग्नल' से सीधे 'कनेक्टिविटी' तक का यह सफर केवल तकनीक का नहीं, बल्कि विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का है। ​पहाड़ियों की चढ़ाई से मिली मुक्ति      ​ग्राम पंचायत मेटानार के आश्रित ग्राम ताहकाडोंड और उसके आसपास के क्षेत्र लंबे समय से 'नो नेटवर्क ज़ोन' में थे। ग्रामीणों के लिए एक फोन कॉल करना किसी चुनौती से कम नहीं था; उन्हें सिग्नल खोजने के लिए ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ना पड़ता था या कई किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक आना पड़ता था। टावर की स्थापना के साथ ही अब ताहकाडोंड, कदेर और ब्रेहबेड़ा जैसे गांवों के लगभग 400 ग्रामीण सीधे तौर पर लाभान्वित हो रहे हैं। ​विकास की नई जीवनरेखा: आपातकालीन और प्रशासनिक सेवाएँ      ​कनेक्टिविटी का यह विस्तार केवल बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन रक्षक भी सिद्ध हो रहा है। ​अब आपात स्थिति में ग्रामीण तुरंत 108 एंबुलेंस को कॉल कर सकते हैं। त्वरित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध होने और समय पर इलाज मिलने से मातृ-शिशु मृत्यु दर में कमी और गंभीर बीमारियों के प्रबंधन में मदद मिलेगी। ​इंटरनेट के माध्यम से ग्रामीण अब ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और विभिन्न सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन घर बैठे कर पा रहे हैं। यह डिजिटल सशक्तिकरण की दिशा में ठोस कदम का संकेत है। ​पारदर्शिता और ई-गवर्नेंस के साथ शासन की योजनाओं की जानकारी अब सीधे हितग्राहियों तक पहुँच रही है, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म हो रही है और कार्यों में तेजी आई है। ​     ​बदलती सामाजिक-आर्थिक तस्वीर       अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में मोबाइल टावर की स्थापना शासन की सेवाओं को अंतिम छोर तक पहुँचाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह न केवल संचार सुविधा है, बल्कि विकास का एक सशक्त माध्यम है।     ​ताहकाडोंड के ग्रामीणों ने इस पहल पर हर्ष व्यक्त करते हुए इसे एक नए युग की शुरुआत बताया है। मोबाइल नेटवर्क आने से न केवल शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार होगा, बल्कि स्थानीय उत्पादों के बाजार और युवाओं के लिए सूचना के नए द्वार भी खुलेंगे। शासन का यह प्रयास सिद्ध करता है कि भौगोलिक बाधाएं अब विकास के आड़े नहीं आएंगी।