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Saudi Real Estate बना भारतीय निवेशकों की पहली पसंद, शानदार रिटर्न और नए अवसरों ने बढ़ाया आकर्षण

दुबई  खाड़ी देशों के रियल एस्टेट बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सऊदी अरब ने पहली बार विदेशी नागरिकों और विदेशी कंपनियों के लिए अपने प्रॉपर्टी बाजार के दरवाजे खोल दिए हैं। नए विदेशी रियल एस्टेट स्वामित्व कानून के लागू होने के साथ ही सरकार ने पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए ‘सऊदी प्रॉपर्टीज’ पोर्टल भी शुरू कर दिया है। इस फैसले को सऊदी अरब के आर्थिक परिवर्तन कार्यक्रम ‘विजन 2030’ का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य विदेशी निवेश बढ़ाना, वैश्विक पूंजी आकर्षित करना और देश को अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश का प्रमुख केंद्र बनाना है। यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष के असर से दुबई का रियल एस्टेट बाजार दबाव में दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में सऊदी अरब का नया कानून भारतीय प्रवासियों, एनआरआई निवेशकों और वैश्विक खरीदारों के लिए एक नए विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है। दशकों बाद विदेशियों को मिला प्रॉपर्टी का मालिक बनने का अधिकार सऊदी अरब (Saudi Arabia Property News) में लंबे समय से लाखों विदेशी नागरिक काम करते रहे हैं, लेकिन उन्हें केवल किराए के मकानों में रहने की अनुमति थी। अब पहली बार विदेशी नागरिकों को कानूनी रूप से आवासीय और निर्धारित श्रेणी की व्यावसायिक संपत्तियों का स्वामित्व प्राप्त करने का अवसर दिया गया है। भारतीय समुदाय सऊदी अरब में सबसे बड़े प्रवासी समुदायों में शामिल है। ऐसे में इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ भारतीय पेशेवरों, कारोबारियों और लंबे समय से वहां रह रहे परिवारों को मिलने की संभावना जताई जा रही है। अब वे केवल किराएदार नहीं बल्कि निर्धारित नियमों के तहत संपत्ति के मालिक भी बन सकेंगे। दुबई बाजार की सुस्ती के बीच सऊदी बना नया विकल्प पिछले कुछ समय से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर दुबई के रियल एस्टेट बाजार पर भी देखने को मिला है। विशेषज्ञों के अनुसार निवेशकों की सतर्कता बढ़ने से वहां संपत्तियों की खरीद-बिक्री की गति कुछ धीमी हुई है। इसी बीच सऊदी अरब ने विदेशी निवेशकों के लिए अपने बाजार को खोलकर क्षेत्रीय निवेश के समीकरण बदल दिए हैं। हालांकि एक्सपर्ट व्यू से दुबई की तुलना में सऊदी का रियल एस्टेट बाजार अभी शुरुआती चरण में है। यहां भविष्य की संभावनाएं मजबूत हैं, लेकिन रीसेल मार्केट और लिक्विडिटी को परिपक्व होने में अभी समय लग सकता है। इसके बावजूद विजन 2030 के तहत हो रहे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट इस बाजार को तेजी से आगे बढ़ा सकते हैं। ‘सऊदी प्रॉपर्टीज’ पोर्टल से पूरी प्रक्रिया होगी ऑनलाइन रियल एस्टेट जनरल अथॉरिटी (REGA) ने विदेशी रियल एस्टेट स्वामित्व कानून के साथ ‘सऊदी प्रॉपर्टीज’ नाम का डिजिटल पोर्टल लॉन्च किया है। इसका उद्देश्य आवेदन प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और पूरी तरह ऑनलाइन बनाना है। विदेशी खरीदारों को अब विभिन्न सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं होगी। आवेदन, सत्यापन और पात्रता की अधिकांश प्रक्रिया डिजिटल माध्यम से पूरी की जाएगी, जिससे निवेश प्रक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो जाएगी। किन लोगों को मिलेगा संपत्ति खरीदने का अधिकार नई नीति के तहत सऊदी अरब में वैध रूप से रह रहे विदेशी निवासी अपने रेजिडेंसी नंबर यानी इकामा के आधार पर सीधे आवेदन कर सकेंगे। पोर्टल पर उनकी पात्रता का डिजिटल सत्यापन किया जाएगा। सऊदी अरब से बाहर रहने वाले विदेशी नागरिक भी निवेश कर सकेंगे, लेकिन उन्हें अपने देश में स्थित सऊदी दूतावास या वाणिज्य दूतावास से डिजिटल पहचान प्राप्त करनी होगी। इसके बाद वे ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे। विदेशी कंपनियों को भी पहली बार सऊदी अरब में सीधे प्रॉपर्टी खरीदने की अनुमति दी गई है। इसके लिए उन्हें निवेश मंत्रालय (MISA) के ‘इन्वेस्ट सऊदी’ प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण कर राष्ट्रीय एकीकृत नंबर प्राप्त करना होगा। भारतीय निवेशकों के लिए क्यों अहम है यह फैसला भारतीय निवेशकों के लिए यह निर्णय कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सऊदी अरब में पहले से बड़ी भारतीय आबादी मौजूद है, जिससे किराए की मांग और आवासीय जरूरतें लगातार बनी रहती हैं। इसके अलावा देश में तेजी से विकसित हो रहे स्मार्ट शहर, औद्योगिक कॉरिडोर और पर्यटन परियोजनाएं भविष्य में प्रॉपर्टी की मांग को और बढ़ा सकती हैं।     रियल एस्टेट एक्स्पर्ट्स की माने तो लंबे समय के निवेश की सोच रखने वाले भारतीय निवेशकों के लिए यह बाजार बेहतर अवसर प्रदान कर सकता है। हालांकि निवेश से पहले स्थानीय कानून, कर व्यवस्था, स्वामित्व नियम और रीसेल शर्तों का विस्तृत अध्ययन करना आवश्यक होगा।     सऊदी अरब ने जिन क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोला है, उनमें दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें रेड सी प्रोजेक्ट, दिरियाह, अलउला और भविष्य का स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट नियोम (NEOM) प्रमुख हैं। सरकार इन क्षेत्रों को पर्यटन, व्यापार, तकनीक और वैश्विक निवेश का केंद्र बनाने की दिशा में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है।     इन परियोजनाओं के विकसित होने के साथ आवासीय, व्यावसायिक और होटल सेक्टर में भी बड़े निवेश की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। मक्का और मदीना के लिए अलग नियम हालांकि नई नीति के साथ कुछ महत्वपूर्ण प्रतिबंध भी लागू किए गए हैं। धार्मिक महत्व को देखते हुए मक्का और मदीना में संपत्ति स्वामित्व के नियम अलग रखे गए हैं। इन दोनों पवित्र शहरों में संपत्ति खरीदने का अधिकार सीमित श्रेणी के पात्र व्यक्तियों और सऊदी कंपनियों तक ही रखा गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले क्षेत्रों की विशेष पहचान को सुरक्षित बनाए रखना है। सऊदी अरब के इस फैसले के प्रमुख फायदे     विदेशी नागरिकों को पहली बार कानूनी रूप से प्रॉपर्टी खरीदने का अवसर।     भारतीय प्रवासियों और एनआरआई निवेशकों के लिए नया निवेश विकल्प।     पूरी आवेदन प्रक्रिया डिजिटल और पारदर्शी बनाई गई।     विजन 2030 के तहत विकसित हो रहे मेगा प्रोजेक्ट्स में निवेश की संभावना।     विदेशी कंपनियों को भी रियल एस्टेट बाजार में प्रवेश की अनुमति।     वैश्विक निवेश आकर्षित करने और अर्थव्यवस्था को विविध बनाने की दिशा में बड़ा कदम। किन बातों का रखना होगा ध्यान     निवेश से पहले स्थानीय संपत्ति कानूनों का अध्ययन आवश्यक होगा।     शुरुआती वर्षों में बाजार … Read more

West Bengal Politics: सुवेंदु अधिकारी के नए कानून पर सियासी घमासान, अपराधियों पर सख्त कार्रवाई का दावा

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार का दिन एक बड़े धमाके की तरह होगा. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी राज्य के 54 साल पुराने कानून में बदलाव करने जा रही है. एक ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ लाने जा रहे हैं, जो अपराधियों की रीढ़ तोड़ देगा. इस नए कानून को उत्तर प्रदेश के ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी कई गुना अधिक घातक और सख्त माना जा रहा है. इसे लेकर पूरे बंगाल के गुंडा-बवालियों में अभी से मौत का खौफ है. जानते हैं पूरी कहानी।  54 साल पुराने कानूनों की विदाई बंगाल राज्य सरकार1972 में बने कानून The West Bengal Maintenance of Public Order Act, 1972 उसमें संशोधन करने जा रही है.  इसे 1972 में पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा पारित किया गया था और उसी वर्ष राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून लागू हुआ था।  इस कानून का संक्षिप्त इतिहास 1960 और 70 का दशक के दौर में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसक आंदोलन और कानून-व्यवस्था की भारी समस्याएं थीं. सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को बनाए रखने, उग्रवादी गतिविधियों को रोकने और अवैध हथियारों पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार को विशेष शक्तियों की जरूरत थी, जिसके लिए यह कानून 1972 में लाया गया था।   ‘पश्चिम बंगाल में नया कानून? लेकिन अब बंगाल सरकार ‘पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ को विधानसभा में पेश करने जा रही है. उसने दशकों पुराने ढर्रे को बदल दिया है. 1972 के कानून अब आधुनिक संगठित अपराध और दंगाई मानसिकता से लड़ने के लिए नाकाफी साबित हो रहे थे. सुवेंदु अधिकारी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब बंगाल में ‘कानून का राज’ होगा, न कि ‘सिंडिकेट का राज’. 54 सालों से चली आ रही ढील अब हमेशा के लिए खत्म होने वाली है।  7 पीढ़ियों तक होगी वसूली, कोई नहीं बचेगा! इस कानून का सबसे खौफनाक पहलू इसका ‘रिकवरी मैकेनिज्म’ है. यदि कोई दंगाई सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, तो उसकी भरपाई सिर्फ अपराधी से नहीं, बल्कि उसकी संपत्ति से होगी. कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इसके प्रावधान इतने कड़े हैं कि एक बार दंगा करने पर अपराधी की आने वाली सात पीढ़ियां हर्जाना भरते-भरते कंगाल हो जाएंगी. यह केवल दंड नहीं, बल्कि ‘आर्थिक खात्मा’ है, जो दंगाइयों को कानून हाथ में लेने से पहले सोचने पर मजबूर कर देगा।  बुलडोजर मॉडल का भी ‘बाप’ है ये बिल उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ के मॉडल ने देशभर में दंगाइयों के बीच खौफ पैदा किया था, लेकिन सुवेंदु अधिकारी का यह नया बिल उससे भी दो कदम आगे है. इसमें ‘प्रिवेंटिव डिटेंशन’ (बिना मुकदमे हिरासत) और ‘एक्सटर्नमेंट’ (जिले से निष्कासन) जैसी शक्तियां पुलिस को असीमित अधिकार देती हैं. यह बिल दंगाइयों को पनाह देने वालों के खिलाफ भी ‘जीरो टॉलरेंस’ रखता है. किसी को पनाह देना भी अब दो साल की सीधी जेल का निमंत्रण होगा।  विपक्ष की रूह क्यों कांप रही है? जैसे ही इस बिल का ड्राफ्ट सामने आया, विपक्ष के गलियारों में सन्नाटा पसर गया है. जिन नेताओं को लगता था कि वे दंगों के जरिए अपनी राजनीति चमका लेंगे, उनकी रूह अब कांप रही है. वे जानते हैं कि यह कानून न केवल गुंडों को खत्म करेगा, बल्कि उन बड़े चेहरों को भी बेनकाब करेगा जो दंगों को स्पॉन्सर करते हैं. सुवेंदु अधिकारी सरकार ने साफ कर दिया है कि दंगा करना है, तो कीमत चुकाने के लिए तैयार रहो।  शांति और सुरक्षा का नया युग यह बिल बंगाल की बदलती तस्वीर का गवाह है. सरकार का कहना है कि यह कानून शरीफ नागरिकों की रक्षा के लिए एक ढाल है. जो बंगाल कल तक अराजकता की आग में जलता था. वह अब अपराधियों के लिए एक बड़ी जेल साबित होगा. सोमवार को जब यह कानून विधानसभा में बहस के लिए आएगा तो देखना यह होगा कि असल में क्या हुआ। 

क्या शुरू होने वाली है नई जंग? नेतन्याहू के बयान से भड़का ईरान, लेबनान में युद्ध के आसार तेज

बेरूत लेबनान दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व का एक छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण देश है. यहां इजरायल की सीमा से लगा दक्षिणी इलाका लंबे समय से तनाव का केंद्र रहा है. हिज्बुल्लाह ईरान समर्थित एक मजबूत संगठन है, यहां सक्रिय है. हाल के वर्षों में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच कई बार झड़पें हुई हैं।  2026  में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है. इजरायल ने साफ कहा है कि जब तक हिज्बुल्लाह अपने हथियार नहीं छोड़ता, उसके सैनिक लेबनान के दक्षिणी हिस्से से नहीं हटेंगे. वहीं ईरान का रुख है कि इजरायल को पहले पूरी तरह हटना चाहिए और लड़ाई बंद करनी चाहिए. यह जिद दोनों तरफ से नई जंग की स्क्रिप्ट लिख रही है।  विश्लेषकों के अनुसार, यह सिर्फ सीमा विवाद नहीं है. यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, हथियार नियंत्रण और बड़े देशों की रणनीति से जुड़ा मुद्दा है. लेबनान की अर्थव्यवस्था पहले से कमजोर है, लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं और अगर नई जंग छिड़ी तो मानवीय संकट और बढ़ जाएगा।  इजरायल का रुख: सुरक्षा पहले, हथियार छोड़ो इजरायल बार-बार कह रहा है कि उसकी सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है. हिज्बुल्लाह के पास हजारों रॉकेट और हथियार हैं जो इजरायल के शहरों को निशाना बना सकते हैं. इजरायली प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया है कि दक्षिणी लेबनान में एक सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखना जरूरी है. अगर हिज्बुल्लाह हथियार नहीं छोड़ता तो इजरायली सेना वहां बनी रहेगी।  इजरायल का तर्क है कि पिछले समझौतों में हिज्बुल्लाह ने हथियार छोड़ने का वादा किया लेकिन पूरा नहीं किया. इसलिए अब वे भरोसा नहीं कर रहे. इजरायल के अनुसार, हिज्बुल्लाह का हथियार रखना न सिर्फ इजरायल के लिए खतरा है बल्कि लेबनान की संप्रभुता को भी कमजोर करता है. इजरायल ने कई बार हवाई हमले किए हैं ताकि हिज्बुल्लाह की क्षमता कम हो. लेकिन इससे तनाव और बढ़ा है. अगर हिज्बुल्लाह फिर से हमला करता है तो इजरायल बड़े पैमाने पर कार्रवाई कर सकता है।  हिज्बुल्लाह और लेबनान की स्थिति  हिज्बुल्लाह खुद को लेबनान का रक्षक बताता है. उसके नेता कहते हैं कि इजरायल की मौजूदगी के खिलाफ वे हथियार नहीं छोड़ेंगे. हिज्बुल्लाह का मानना है कि इजरायल पहले लेबनान की जमीन छोड़े, तब बात हो सकती है. उन्होंने कुछ हथियार लेबनानी सेना को सौंपे लेकिन पूरी तरह से हथियार छोड़ने की बात नहीं मानी।  लेबनान सरकार कमजोर है. देश में आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और विभिन्न गुटों के बीच मतभेद हैं. हिज्बुल्लाह लेबनान की राजनीति में भी मजबूत है. अगर इजरायल नहीं हटता तो हिज्बुल्लाह समर्थकों में गुस्सा बढ़ेगा और नई लड़ाई शुरू हो सकती है. लेबनानी सेना दक्षिण में तैनात है लेकिन हिज्बुल्लाह की ताकत के आगे उसकी भूमिका सीमित लगती है।  ईरान का रणनीतिक खेल: इजरायल पहले हटे ईरान हिज्बुल्लाह का मुख्य समर्थक है. वह हथियार, पैसा और प्रशिक्षण देता है. ईरान का कहना है कि इजरायल को लेबनान से पूरी तरह हटना चाहिए और लड़ाई बंद करनी चाहिए. ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर इजरायल हमले जारी रखता है तो वह जवाब देगा. ईरान-इजरायल के बीच अप्रत्यक्ष युद्ध लंबे समय से चल रहा है।  ईरान के लिए लेबनान सिर्फ एक मोर्चा है. वह पूरे क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है. अगर इजरायल लेबनान में बना रहा तो ईरान दूसरे मोर्चों पर भी दबाव डाल सकता है. हाल के बयानों में ईरान ने कहा कि कोई भी समझौता लेबनान को कवर करे. इससे अमेरिका और इजरायल के बीच भी तनाव बढ़ा है।  नई जंग की संभावित स्क्रिप्ट: क्या हो सकता है? विश्लेषक मानते हैं कि अगर बात नहीं बनी तो नई जंग की स्क्रिप्ट इस तरह हो सकती है. पहले छोटी-छोटी झड़पें बढ़ेंगी. हिज्बुल्लाह रॉकेट दागेगा, इजरायल हवाई हमले करेगा. इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान में और अंदर घुस सकती है. ईरान हिज्बुल्लाह को और मदद भेजेगा या दूसरे इलाकों से दबाव डालेगा।  इससे लेबनान में बड़े पैमाने पर तबाही होगी। हजारों लोग मारे जा सकते हैं, लाखों विस्थापित होंगे. बुनियादी ढांचा बर्बाद होगा. इजरायल की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा क्योंकि सैनिकों की तैनाती महंगी है. अमेरिका, जो शांति चाहता है, बीच में फंस सकता है।  संयुक्त राष्ट्र और अन्य देश सीजफायर की कोशिश कर रहे हैं लेकिन दोनों पक्षों की जिद इसे मुश्किल बना रही है. अगर इजरायल हटने से इनकार करता रहा और हिज्बुल्लाह हथियार नहीं छोड़ा तो युद्ध टलना मुश्किल होगा।  लेबनान की जंग सिर्फ दो देशों की नहीं है. यह पूरे मध्य पूर्व को प्रभावित करेगी. सऊदी अरब, तुर्की जैसे देश प्रभावित होंगे. तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ेगा. मानवीय संकट गहराएगा. लेबनान में पहले से लाखों शरणार्थी हैं. नई जंग से भूख, बीमारी और बेघर होने की समस्या बढ़ेगी. बच्चे स्कूल नहीं जा पाएंगे, अस्पताल नष्ट हो जाएंगे।  क्या है समाधान? समाधान मुश्किल लेकिन नामुमकिन नहीं. दोनों पक्षों को समझौता करना होगा. इजरायल को सुरक्षा गारंटी मिले और हिज्बुल्लाह हथियारों का कुछ हिस्सा लेबनानी सेना को सौंप दे. ईरान को भी आश्वासन चाहिए कि उसके हित सुरक्षित हैं. अमेरिका और अन्य शक्तियां मध्यस्थता कर सकती हैं. लेबनान की सरकार को मजबूत होना चाहिए ताकि वह अपने पूरे इलाके पर नियंत्रण रख सके. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आर्थिक मदद देकर लेबनान को स्थिर करना चाहिए। 

RBI New Rule: ₹25,000 तक का लाभ मिलेगा, भारतीय रिजर्व बैंक ने लागू किए नए नियम

  नई दिल्‍ली सोचिए एक दिन आपके फोन पर एक मैसेज आता है कि आपके 20,000 रुपये कट गए हैं, जबकि आपने कभी इसका पेमेंट नहीं किया था और ना ही कोई अप्रूवल दिया था. फिर तुरंत आप इसकी जांच करते हुए बैंक से बात करते हैं, बैंक भी ये बताने में असमर्थ होता है कि पैसे कैसे मिलेंगे।  आपने शिकायत भी दर्ज करा दी कि आपके खाते से 20,000 रुपये का ऑनलाइन फ्रॉड हो चुका है, लेकिन सवाल हमेशा से रहेगा कि आपको पैसा वापस मिलेगा या नहीं? क्‍योंकि ज्‍यादातर ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में कस्‍टमर्स का पैसा रिकवर नहीं हो पाता है. हालांकि, अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) सीधे तौर पर शामिल हो चुका है।   RBI ने एक नया नियम निकाला है, जिसके तहत अगर आपके साथ ऑनलाइन फ्रॉड या UPI के जरिए स्‍कैम होता है तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया आपको मुआवजे का भुगतान करेगा. 24 जून 2026 को, आरबीआई ने नोटिफिकेशन जारी किया है। किस तरह के फ्रॉड पर मिलेगा मुआवजा ये नियम स्‍मॉल फाइनेंस बैंकों, पेमेंट बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और स्थानीय क्षेत्र बैंकों को छोड़कर सभी कमर्शियल बैंकों पर लागू होते हैं और 1 जनवरी, 2027 से उस तारीख को या उसके बाद किए गए किसी भी इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन के लिए प्रभावी होंगे।  सरल शब्दों में कहें तो, इसमें आज आप जितने भी प्रकार के डिजिटल भुगतान करते हैं, वे सभी शामिल हैं, जैसे यूपीआई ट्रांसफर, नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान, चाहे वे कार्ड स्वाइप या टैप करके किए गए हों या कार्ड की जानकारी ऑनलाइन दर्ज करके किए गए हों. अगर आपने डिजिटल माध्यम से पैसे का लेन-देन किया है, तो इसे इस कैटेगरी में रखा जाएगा।  कौन करेगा भुगतान?  जब कोई धोखाधड़ी वाला लेनदेन होता है, तो नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है, आप, बैंक, या कोई और? RBI ने यह भी जानकारी दी है कि यह तय किस आधार पर किया जाएगा. आरबीआई का कहना है कि बैंक सिर्फ यह कहकर हट नहीं सकता कि फ्रॉड के दौरान कस्‍टमर्स लापरवाह थे, अब उन्‍हें साबित भी करना होगा।  RBI ने रखा तीन कंडीशन     अगर धोखाधड़ी बैंक की गलती के कारण हुई है, जैसे कि सुरक्षा में चूक, सिस्टम में गड़बड़ी, या बैंक द्वारा आपको धोखाधड़ी की सूचना न भेजना, तो नियम स्पष्ट है. बैंक को पूरे पैसे का भुगतान करना होगा, चाहे कस्‍टमर ने इसकी जानकारी दी हो या नहीं।      अगर धोखाधड़ी किसी तीसरे पक्ष, जैसे कि भुगतान ऐप, भुगतान गेटवे या दूरसंचार प्रदाता के कारण हुई है, न कि आपके या बैंक के कारण, तो भी आपको शून्य दायित्व और पूर्ण धनवापसी प्राप्त होगी, लेकिन केवल तभी जब कस्‍टमर धोखाधड़ी की घटना की तारीख से पांच कैलेंडर दिनों के भीतर बैंक को इसकी सूचना देता है. पांच दिन बाद रिपोर्ट करें, और आपकी देनदारी बैंक की अपनी आंतरिक नीति के अनुसार तय की जाएगी।      अगर धोखाधड़ी आपकी लापरवाही के कारण हुई है, जैसे कि आपने अपना ओटीपी साझा किया, अपने बैंक से मिली स्पष्ट धोखाधड़ी की चेतावनी को अनदेखा किया, या कोई संदिग्ध ऐप डाउनलोड किया, तो नियम अधिक जटिल हैं, और यहीं पर इस अधिसूचना का वास्तव में नया हिस्सा सामने आता है।  आपकी गलती पर भी मिल सकती है रकम नए नियमों के तहत, भले ही आप तकनीकी रूप से लापरवाह रहे हों, जैसे कि आपने किसी फ़िशिंग लिंक पर क्लिक किया हो या कोई ऐसा ओटीपी शेयर किया हो जो आपको नहीं करना चाहिए था, फिर भी आपको मुआवजा मिल सकता है, बशर्ते नुकसान कम हो और आपने तुरंत कार्रवाई की हो।  कितना मिलेगा मुआवजा?  नोटिफिकेशन में कहा गया है कि मुआवजे का भुगतान पूरे लाइफ में एक ही बार किसी एक व्‍यक्ति को किया जाएगा. यह भुगतान 25,000 रुपये या 85 फीसदी जो भी कम हो किया जाएगा. अगर मान लीजिए किसी व्‍यक्ति के साथ 50 हजार रुपये की धोखाधड़ी हुई है और कस्‍टमर ने शिकायत दर्ज कराई है, तो उसे अधिकतम 25,000 रुपये का ही मुआवजा दिया जाएगा. अगर उसके साथ दोबारा फ्रॉड होता है तो उसे कोई मुआवजा नहीं मिलेगा।  कौन कितना करेगा पेमेंट?  छोटे धोखाधड़ी के मामलों में, खासकर 29,412 रुपये से कम के नुकसान वाले मामलों में, जहां मुआवजा नुकसान का 85 प्रतिशत होता है. घरेलू धोखाधड़ी के मामलों में, 65 प्रतिशत रिजर्व बैंक द्वारा, 10 प्रतिशत ग्राहक के बैंक द्वारा और बाकी 10 प्रतिशत लाभार्थी बैंक द्वारा वहन किया जाएगा. लाभार्थी बैंक, वह बैंक है जिसने सबसे पहले आपका चोरी हुआ पैसा प्राप्त किया था।  29,412 रुपये और 50,000 रुपये के बीच के थोड़े बड़े नुकसान के लिए, जहां मुआवजे की अधिकतम सीमा 25,000 रुपये है, RBI, ग्राहक का बैंक और लाभार्थी बैंक क्रमशः 19118 रुपये, 2941 रुपये और 2941 रुपये का योगदान करेंगे।   

New York News: जोहरान ममदानी का ऐलान, दो वर्षों तक किराए में बढ़ोतरी पर लगेगी रोक

न्यूयॉर्क  न्यूयॉर्क शहर के हाउसिंग बोर्ड ने  करीब दस लाख रेगुलेटेड अपार्टमेंट के किराए को दो साल तक न बढ़ाने के लिए वोट किया. मेयर जोहरान ममदानी ने अपने कार्यकाल के कुछ ही महीनों में अपने मुख्य चुनावी वादे को पूरा किया है।  शहर के 'रेंट गाइडलाइंस बोर्ड' ने 7-1 के वोट से अक्टूबर से शुरू होने वाले एक-साल और दो-साल के लीज के लिए किराए में बढ़ोतरी को जीरो तय किया है। मैनहट्टन के एक म्यूजियम ऑडिटोरियम में जमा हुए सैकड़ों किराएदारों ने इस नतीजे पर खुशी मनाई और सीटियां बजाईं।  ममदानी ने बताया ऐतिहासिक जीत न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने एक बयान में कहा, "यह शहर के किराएदारों के लिए एक ऐतिहासिक जीत है. यह वह राहत है, जिसके हमारे शहर के कामकाजी लोग हकदार हैं।  यह वोट हफ्तों तक चली उस सालाना प्रक्रिया का नतीजा था, जिसमें यह तय किया जाता है कि मकान-मालिक 'रेंट-स्टेबलाइज़्ड' अपार्टमेंट यानी 'जिनका किराया एक सीमा से ज़्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता' उनका किराया कितना बढ़ा सकते हैं. इन अपार्टमेंट में न्यूयॉर्क के करीब एक-चौथाई लोग रहते हैं. रेंट गाइडलाइंस बोर्ड वेतन, महंगाई, रखरखाव की लागत, टैक्स और मकान-मालिकों की आय जैसे कारकों पर विचार करता है।  बोर्ड की 2025 की स्टडी के मुताबिक, रेगुलेटेड अपार्टमेंट का औसत मासिक किराया 1,599 डॉलर था. वहीं, लिस्टिंग एजेंसी StreetEasy के मुताबिक, शहर में नए किराए पर दिए गए अपार्टमेंट का मीडियन किराया 3,950 डॉलर है।  जनवरी में पद संभालने के बाद से डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट जोहरान ममदानी ने बोर्ड के नौ में से छह सदस्यों को नियुक्त किया है. उन्होंने ऐसे लोगों को चुना है, जिनके बारे में उनका मानना ​​है कि वे किराएदारों के प्रति सहानुभूति रखते हैं. बता दें कि ममदानी ने  शहर को ज्यादा किफायती बनाने का वादा किया है।  बोर्ड मेंबर ने दिया इस्तीफा  वोटिंग से कुछ घंटे पहले, मकान मालिकों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक सदस्य ने इस्तीफा दे दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि बोर्ड में अपने लोगों को भरकर उसे एकतरफा बनाया जा रहा है और बोर्ड निष्पक्ष रहने की अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं कर रहा है. इस्तीफा देते हुए, क्रिस्टीना स्मिथ ने कहा कि नतीजे मेयर ने पहले ही तय कर लिए थे।  उन्होंने कहा, "नए सिरे से बने बोर्ड को किराया न बढ़ाने यानी रेंट फ्रीज का फैसला लेना था. उसके बाद जो कुछ भी हुआ, वह सब बस दिखावा था।  ममदानी के द्वारा नियुक्त की गईं बोर्ड की चेयर चैंटेला मिशेल ने कहा कि बोर्ड के सदस्यों और स्टाफ ने आजादी और ईमानदारी से काम किया।  बोर्ड में मकान मालिकों के दूसरे प्रतिनिधि, ममदानी द्वारा नियुक्त मैक्सिम विन, जब वोटिंग से पहले एक लंबा बयान पढ़ रहे थे, तो किराएदारों ने उनकी हूटिंग की. लेकिन जब कुछ मिनटों बाद उन्होंने अपनी बात खत्म की और किराया न बढ़ाने के पक्ष में वोट दिया, तो भीड़ का गुस्सा खुशी में बदल गया।  वोटिंग से पहले हुई पब्लिक हियरिंग में किराएदारों ने रेंट न बढ़ाने की मांग की या किराया कम करने की भी मांग की. उनका कहना था कि महंगाई और बढ़ते बिलों के मुकाबले उनकी आमदनी नहीं बढ़ रही है. जैसा कि मेयर बिल डी ब्लासियो के कार्यकाल में 2015 से 2021 के बीच सिर्फ़ एक साल के लीज़ के लिए तीन बार हुआ था।  मकान मालिकों के समूहों का तर्क था कि किराया न बढ़ाने से प्रॉपर्टी मालिकों के लिए अपनी बिल्डिंग का रखरखाव करना और मुश्किल हो जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मकान मालिक अपने मॉर्गेज यानी होम लोन की किस्तें भी नहीं चुका पा रहे हैं।  कुछ मकान मालिकों का कहना है कि उन्हें बिना रेगुलेशन वाले, मार्केट-रेट वाले अपार्टमेंट का किराया बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे वे अपने रेंट-स्टेबलाइज़्ड यानी किराया-नियंत्रित यूनिट्स से हुए नुकसान की भरपाई कर सकें. इनमें एक बिल्डिंग के मालिक छोटे-मोटे मालिकों से लेकर अमीर प्राइवेट इक्विटी निवेशक तक शामिल हैं।  चुनाव जीतने के बाद, जोहरान ममदानी क्वींस में करीब 2,300 डॉलर प्रति महीने के किराए वाले, रेगुलेटेड रेंट वाले वन-बेडरूम अपार्टमेंट से मैनहट्टन में मेयर के फाइव-बेडरूम वाले सरकारी आवास में चले गए।  गुरुवार को हुए मतदान ने जोहरान ममदानी के लिए एक सफल हफ्ते को और भी यादगार बना दिया. उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में न्यूयॉर्क की सीटों के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बनने की कड़ी टक्कर वाली दौड़ में तीनों वामपंथी उम्मीदवारों की जीत का भी जश्न मनाया। 

India-Japan Summit: 1 जुलाई को भारत दौरे पर आएंगी जापानी प्रधानमंत्री, द्विपक्षीय संबंधों को मिलेगी नई मजबूती

नई दिल्ली  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर जापान की पीएम साने ताकाइची तीन दिवसीय दौरे पर भारत पहुंचेंगी. पीएम ताकाइची 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होंगी. यह उनका पहला भारत दौरा है. प्रधानमंत्री ताकाइची 1-3 जुलाई, 2026 तक नई दिल्ली के आधिकारिक दौरे पर रहेंगी. यह समिट दोनों पक्षों को द्विपक्षीय सहयोग के पूरे स्पेक्ट्रम की समीक्षा करने और मजबूत करने के साथ-साथ परस्पर हितों के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करने का अवसर देगा।  यह प्रधानमंत्री ताकाइची का भारत का पहला आधिकारिक दौरा होगा. इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी अगस्त 2025 में जापान के दौरे पर पहुंचे थे, जहां वे 15वें भारत-जापान सालाना समिट में शामिल हुए. यह भारत-जापान विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी को और बढ़ाने के लिए दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को दिखाता है. इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2025 में टोक्यो में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के साथ भारत-जापान आर्थिक मंच कार्यक्रम के दौरान शीर्ष उद्योग जगत के नेताओं को संबोधित करते हुए दोनों देशों के बीच मजबूत आर्थिक साझेदारी पर प्रकाश डाला और द्विपक्षीय सहयोग को गहरा करने के लिए पांच-पॉइंट रोडमैप पेश किया।  प्रधानमंत्री मोदी ने कहा अभी भारत-जापान बिजनेस फोरम की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई. इसमें कंपनियों के बीच हुई बिजनेस डील का विस्तार से वर्णन दिया गया है. इस प्रगति के लिए मैं आप सभी का बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं. दो दिवसीय जापान दौरे पर पीएम मोदी ने प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष नुकागा फुकुशिरो और जापानी सांसदों के एक समूह के साथ एक बैठक की. इस दौरान भारत और जापान के बीच मजबूत और मैत्रीपूर्ण संबंधों पर चर्चा हुई. इसके अलावा, उन्होंने टोक्यो में जापान के 16 प्रांतों के राज्यपालों से मुलाकात की थी. प्रधानमंत्री की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने से संबंधित कई समझौते पर मुहर लगी।  ताकाइची का पहला भारत दौरा यह प्रधानमंत्री ताकाइची का भारत का पहला आधिकारिक दौरा होगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह दौरा अगस्त 2025 में 15वें भारत-जापान सालाना शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री मोदी के टोक्यो दौरे के बाद हो रहा है। यह दौरा भारत-जापान की विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी को और बढ़ाने के लिए दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है। पीएम मोदी ने जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के साथ मियागी प्रांत के सेंडाई शहर का दौरा किया था. इस दौरान दोनों नेताओं ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र की अग्रणी कंपनी टोक्यो इलेक्ट्रॉन मियागी लिमिटेड (टीईएल मियागी) का दौरा किया. कारखाने में उन्हें टीईएल की वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में भूमिका, उन्नत मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और भारत के साथ वर्तमान व भविष्य के सहयोग के बारे में जानकारी दी गई थी।  इस दौरे से दोनों देशों के बीच सेमीकंडक्टर निर्माण, टेस्टिंग और सप्लाई चेन में सहयोग के अवसरों की व्यावहारिक समझ बनी. प्रधानमंत्री की इस यात्रा को भारत के उभरते सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम और जापान की उन्नत तकनीक के बीच सामंजस्य के तौर पर रेखांकित किया गया।  दोनों नेताओं ने इस क्षेत्र में सहयोग गहन करने, जापान-भारत सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन साझेदारी के लिए सहमति को आगे बढ़ाने और भारत-जापान औद्योगिक प्रतिस्पर्धा व आर्थिक सुरक्षा वार्ता को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई. इस दौरान मजबूत, लचीली और भरोसेमंद सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन विकसित करने के साझा लक्ष्य पर भी जोर दिया गया। 

Operation Sindoor: सरकार ने पहली बार जारी किए 6 शहीद जवानों के नाम, वॉर मेमोरियल पर मिली अमर पहचान

 नई दिल्ली भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद हुए छह जवान अब औपचारिक रूप से देश के सामने आए हैं. सरकार ने पहली बार इन शहीदों के नाम सार्वजनिक किए हैं. इन नामों को नेशनल वॉर मेमोरियल की वेबसाइट पर रोल ऑफ ऑनर में शामिल किया गया है. युद्ध स्मारक की वॉल 3डी पर 2025 सेक्शन में अंकित किया गया है।  यह पहली बार है जब सरकार ने मई 2025 में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ चलाए गए क्रॉस-बॉर्डर ऑपरेशन सिंदूर में हुई मौतों की आधिकारिक पुष्टि की है. इससे पहले सरकार ने इन शहीदों की पहचान सार्वजनिक नहीं की थी, हालांकि मीडिया और सोशल मीडिया पर कई रिपोर्ट्स और अटकलें चल रही थीं।  मई 2025 में भारत ने पाकिस्तान और PoK में आतंकवादी बुनियादी ढांचे को निशाना बनाते हुए एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान चलाया था. इसे ऑपरेशन सिंदूर नाम दिया गया. यह चार दिनों तक चला. इसका मकसद सीमा पार से आने वाले आतंकवाद को कुचलना और भारत की सुरक्षा को मजबूत करना था. इस दौरान भारतीय सेना, वायुसेना और अन्य बलों ने संयुक्त रूप से कार्रवाई की।  अब तक सरकार ने ऑपरेशन के दौरान हुई सैन्य क्षति के बारे में विस्तार से नहीं बताया था. लेकिन राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर इन छह नामों को शामिल करना सरकार की ओर से पहली आधिकारिक स्वीकृति मानी जा रही है कि ऑपरेशन में भारतीय बलों को नुकसान हुआ था।  राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर अंकित छह शहीद सैनिकों और एयर वारियर्स के नाम इस प्रकार हैं…     सूबेदार मेजर पवन कुमार – हेडक्वार्टर 10 इन्फैंट्री ब्रिगेड       राइफलमैन सुनील कुमार, वीर चक्र – 4 जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री       लांस नायक दिनेश कुमार – 5 फील्ड रेजिमेंट       एविएशन टेक्नीशियन मूड मुरलीनायक – 851 लाइट रेजिमेंट       हवलदार सुनील कुमार सिंह – 237 फील्ड वर्कशॉप कंपनी       सार्जेंट सुरेंद्र कुमार, वायु मेडल – 39 विंग इनमें दो सैनिकों को वीरता के लिए सम्मानित किया गया था – राइफलमैन सुनील कुमार को वीर चक्र और सार्जेंट सुरेंद्र कुमार को वायु मेडल मिला था।  राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का महत्व राष्ट्रीय युद्ध स्मारक इंडिया गेट के पास है. यहां देश के सभी शहीद सैनिकों के नाम दीवारों पर अमर कर दिए जाते हैं. हर साल नए शहीदों के नाम संबंधित वर्ष के सेक्शन में जोड़े जाते हैं. इन छह नामों को 2025 सेक्शन में शामिल किया गया है।  रोल ऑफ ऑनर में नाम दर्ज होना सिर्फ औपचारिकता नहीं है. यह देश के लिए इन वीरों के सर्वोच्च बलिदान को मान्यता देने का तरीका है. परिवारों, साथी सैनिकों और पूरे देश के लिए यह भावनात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है. अब इन शहीदों को आधिकारिक रूप से फॉलेन हीरोज कहा जा रहा है।  सरकार की चुप्पी और अब खुलासा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कई दिनों तक दोनों तरफ से तनाव रहा. भारत ने आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करने का दावा किया, जबकि पाकिस्तान ने भी कुछ दावे किए. लेकिन भारत सरकार ने शुरुआत से ही सैन्य हताहतों की संख्या या नामों पर चुप्पी साध रखी थी. सुरक्षा कारणों और रणनीतिक वजहों से यह गोपनीयता बरती गई थी।  अब नाम जारी करने को विशेषज्ञ सकारात्मक कदम मान रहे हैं. इससे परिवारों को न्याय मिला है. देश के लोग अपने शहीदों को सलाम कर सकते हैं. ये छह जवान देश की रक्षा करते हुए अपनी जान न्योछावर कर गए. सूबेदार मेजर पवन कुमार जैसे अनुभवी जवान ब्रिगेड की अगुवाई करते थे।  राइफलमैन सुनील कुमार जैसे युवा सिपाही सीमा पर तैनात थे. एविएशन टेक्नीशियन और सार्जेंट जैसे एयर वारियर्स ने हवाई समर्थन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हर शहीद के परिवार में अब दर्द है, लेकिन गर्व भी है. पूरे देश को इन वीरों पर गर्व है. इनके बलिदान ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय सशस्त्र बल आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर अडिग हैं। 

Ketan Agrawal Murder Case: CM फडणवीस से मिले मृतक के पिता, फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई

मुंबई  महाराष्ट्र के लोनावला ग्रामीण इलाके में केतन अग्रवाल की हत्या के मामले में उनके पिता विशाल अग्रवाल ने पुणे में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर बेटे के लिए न्याय की मांग की है. मुख्यमंत्री ने दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने का भरोसा दिया और मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने के साथ-साथ सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम को विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने की मांग भी तत्काल स्वीकार कर ली।  महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ऑफिस से किए गए सोशल मीडिया पोस्ट में कहा गया, "लोनावला के ग्रामीण इलाके में केतन अग्रवाल की दुखद हत्या के मामले में केतन अग्रवाल के पिता विशाल अग्रवाल ने आज पुणे में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की और अपने बेटे के लिए न्याय की मांग की. हम यह पक्का करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि इस मामले में दोषियों को सबसे कड़ी सज़ा मिले. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उन्हें भरोसा दिलाया कि परिवार को न्याय दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।  पोस्ट में आगे कहा गया है कि इस मामले में फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने और उज्ज्वल निकम को स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त करने की उनकी मांग को भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तुरंत मान लिया और कानून एवं न्याय विभाग के सचिव को इस बारे में निर्देश जारी किए. सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने भी इस मामले में स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर काम करने के लिए अपनी सहमति दे दी है।  सिया के भाई साहिल को अफेयर के बारे में सब पता था लोहागढ़ किले से रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल मर्डर के मामले में जांच लगातार नए मोड़ ले रही है. अब इस हाई-प्रोफाइल केस में पुलिस की नजर सिया गोयल के भाई साहिल गोयल पर भी टिक गई है. पुलिस ने साहिल को पूछताछ के लिए तलब किया है. सूत्रों के मुताबिक, उसे अपनी बहन सिया गोयल और चेतन चौधरी के अफेयर की पहले से जानकारी थी. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि  उसने यह बात परिवार या किसी अन्य व्यक्ति से क्यों नहीं बताई।  पुलिस अधिकारियों का मानना है कि साहिल का बयान इस पूरे घटनाक्रम की कई अहम कड़ियों को जोड़ सकता है. फिलहाल उससे विस्तृत पूछताछ की जा रही है और उसके बयान को केस डायरी का हिस्सा बनाया जा रहा है. जांच टीम यह भी जानने की कोशिश कर रही है कि परिवार के भीतर सिया की मानसिक स्थिति, उसके रिश्तों और शादी को लेकर क्या चर्चाएं होती थीं।   भाई के बयान से खुल सकती हैं कई परतें सूत्रों के अनुसार, पुलिस के पास ऐसे कुछ इनपुट हैं जिनसे संकेत मिलता है कि साहिल को सिया और चेतन की दोस्ती या संपर्क के बारे में जानकारी थी. हालांकि, अभी तक पुलिस की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि क्या परिवार के किसी अन्य सदस्य को भी इन दोनों के संपर्क की जानकारी थी या नहीं. यदि किसी को पहले से जानकारी थी तो उसने इसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया, यह भी जांच का हिस्सा है।  पूछताछ में सामने आई हत्या की कथित पूरी साजिश इस बीच पुलिस जांच में एक बड़ा खुलासा सामने आया है. जांच अधिकारियों के अनुसार, आरोपी सिया गोयल और उसके कथित प्रेमी चेतन चौधरी ने पूछताछ के दौरान हत्या की पूरी योजना का क्रमवार विवरण बताया है. पुलिस के मुताबिक, 18 जून को लोहागढ़ किले पर पहुंचने से पहले दोनों ने पूरी योजना तैयार कर ली थी. तय हुआ था कि सिया एक निश्चित स्थान पर बैठकर पहले से तय इशारा करेगी. जैसे ही संकेत मिलेगा, चेतन पीछे से आकर केतन अग्रवाल को अचानक गहरी खाई में धक्का देगा. अधिकारियों का कहना है कि घटना ठीक उसी योजना के अनुसार हुई. केतन को अंतिम क्षण तक किसी तरह का संदेह नहीं हुआ और इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, उसे खाई में धक्का दे दिया गया।  शुरुआत में दोनों ने बचने की कोशिश की जांच अधिकारी के मुताबिक, शुरुआती पूछताछ में दोनों आरोपी लगातार एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे. चेतन चौधरी ने पहले दावा किया कि वह किले पर तो मौजूद था, लेकिन घटना वाले स्थान तक नहीं गया था. उसने यह भी कहा कि उसे नहीं पता कि आखिर वहां क्या हुआ. हालांकि पुलिस को उसके बयान पर भरोसा नहीं हुआ. तकनीकी साक्ष्यों, घटनास्थल से मिले तथ्यों और लगातार पूछताछ के बाद दोनों के बयान बदलने लगे. इसके बाद दोनों ने कथित रूप से अपराध स्वीकार करते हुए पूरी योजना पुलिस के सामने रखी  भागकर शादी नहीं, हत्या का रास्ता क्यों चुना ? पूछताछ के दौरान पुलिस ने दोनों आरोपियों से यह सवाल भी किया कि यदि वे एक-दूसरे से प्रेम करते थे तो भागकर शादी क्यों नहीं कर ली. पुलिस के अनुसार, दोनों का जवाब था कि यदि वे घर से भाग जाते तो दोनों परिवारों की सामाजिक बदनामी होती. इसी वजह से उन्होंने कथित तौर पर केतन को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. यह जवाब जांच अधिकारियों के लिए भी चौंकाने वाला माना जा रहा है क्योंकि पुलिस का मानना है कि यदि यह कथन सही है तो हत्या की साजिश पहले से सोची-समझी थी. पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि 18 जून की घटना पहली कोशिश नहीं थी. अधिकारियों के अनुसार, इससे पहले भी आरोपी केतन अग्रवाल को दो बार लोहागढ़ किले पर लेकर गए थे. जांच के मुताबिक, दोनों मौकों पर कथित योजना किसी कारण सफल नहीं हो सकी. इसके बाद तीसरी बार मौका देखकर वारदात को अंजाम दिया गया. पुलिस इन दावों की पुष्टि के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, मोबाइल लोकेशन और अन्य तकनीकी जानकारियों का विश्लेषण कर रही है।  नवंबर में होनी थी शाही शादी केतन अग्रवाल और सिया गोयल की सगाई हो चुकी थी. दोनों की शादी इसी वर्ष नवंबर में राजस्थान के उदयपुर स्थित एक महल में प्रस्तावित थी. दोनों परिवार विवाह की तैयारियों में जुटे थे और कार्यक्रम को लेकर उत्साह था. पुलिस के अनुसार, जांच में यह बात सामने आई है कि सिया कथित रूप से … Read more

लाउडस्पीकर से अजान पर सख्ती की तैयारी! डेनमार्क सरकार के बयान से छिड़ी नई बहस

कोपेनहेगन डेनमार्क की वामपंथी सरकार ने लाउडस्पीकर पर अजान देने पर रोक लगाने की बात कही है। सरकार में मंत्री मोर्टन बोडस्कोव ने कहा कि देश कुछ इलाके 'इस्लामाबाद के उपनगर' जैसे लगते हैं। ऐसे में हम अजान को कानूनी तौर पर बैन करने पर विचार कर रहे हैं। डेनमार्क सरकार ने नमाज से पहले अजान पर रोक लगाने के पीछे इस्लाम के प्रभाव के बढ़ने (इस्लामीकरण) की चिंता बताई जा रही है। सत्ताधारी सोशल डेमोक्रेट्स पार्टी की मस्जिदों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल रोकने की यह तीसरी कोशिश है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, सेंटर-लेफ्ट सोशल डेमोक्रेट्स पार्टी के सदस्य और सरकार में आव्रजन मंत्री मोर्टन बोडस्कोव ने अपने एक बयान में कहा है कि नई सरकार अजान पर रोक लगाने के कानूनी पहलुओं की फिर से जांच शुरू करेगी। उन्होंने इसके लिए प्लान तैयार कर लेने का दावा किया है। बोडस्कोव के नेतृत्व में डेनमार्क की आव्रजन और एकीकरण नीतियों को भी सख्त बनाया जा रहा है। यूरोप में बढ़ते प्रवासन और इस्लामीकरण को लेकर जारी बहस के बीच अब डेनमार्क ने भी बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर ली है. देश की सरकार मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर दी जाने वाली अजान पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की संभावना पर विचार कर रही है. डेनमार्क के इमीग्रेशन मामलों के मंत्री मोर्टन बोडस्कोव ने कहा कि अजान की आवाज डेनमार्क की पहचान का हिस्सा नहीं है और लोग यह महसूस न करें कि वे किसी यूरोपीय शहर की बजाय इस्लामाबाद के किसी शहर में पहुंच गए हैं।  बोडस्कोव ने डेनिश समाचार एजेंसी से बातचीत में कहा, "डेनमार्क की छतों के ऊपर अजान की आवाज नहीं सुनाई देनी चाहिए." उनका कहना है कि सरकार इस बात की कानूनी समीक्षा कर रही है कि क्या ऐसा प्रतिबंध देश के संविधान के दायरे में लगाया जा सकता है।  हालांकि, फिलहाल यह सिर्फ एक प्रस्ताव है और इसे अंतिम मंजूरी नहीं मिली है. डेनमार्क का संविधान सार्वजनिक रूप से धार्म के पालन की स्वतंत्रता देता है, इसलिए सरकार को यह भी देखना होगा कि ऐसा कानून संवैधानिक रूप से कितना टिकाऊ होगा।  पहले भी उठ चुका है यह मुद्दा डेनमार्क में यह बहस नई नहीं है. राजधानी कोपेनहेगन समेत कई इलाकों में पहले से ही स्थानीय शोर-शराबे से जुड़े नियमों के कारण लाउडस्पीकर पर अजान को सीमित किया गया है. इसके अलावा 2023 में सरकार ने धार्मिक ग्रंथों के अपमान पर भी कानून बनाया था. यह फैसला उस समय लिया गया था जब कुरान जलाने की घटनाओं के बाद कई मुस्लिम देशों ने कड़ी नाराजगी जताई थी।  डेनमार्क में करीब 2.7 लाख मुस्लिम रहते हैं और देशभर में लगभग 100 मस्जिदें हैं. ऐसे में अजान पर संभावित प्रतिबंध को मुस्लिम समुदाय से जुड़े बड़े फैसले के रूप में देखा जा रहा है।  यूरोप में तेज हुई इस्लामीकरण पर बहस हाल के वर्षों में यूरोप के कई देशों में प्रवासन, हिजाब, धार्मिक पहचान और सार्वजनिक धार्मिक गतिविधियों को लेकर बहस लगातार तेज हुई है. कई देशों में दक्षिणपंथी और इमीग्रेशन विरोधी दल यह दावा करते रहे हैं कि बड़े पैमाने पर प्रवासन यूरोपीय सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित कर रहा है।  बोडस्कोव ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया पोस्ट में भी कहा था कि जो विदेशी कानूनी रूप से डेनमार्क में रहने के हकदार नहीं हैं, उन्हें चरणबद्ध तरीके से वापस भेजा जाएगा. उन्होंने इसे सरकार की सख्त प्रवासन नीति का हिस्सा बताया।  हालांकि सरकार प्रतिबंध की तैयारी कर रही है, लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा. संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है और किसी भी नए कानून को अदालत में चुनौती दी जा सकती है. इसलिए सरकार फिलहाल कानूनी विशेषज्ञों से राय ले रही है. डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन की सरकार पहले भी अपनी सख्त प्रवासन नीतियों को लेकर सुर्खियों में रही है। 

1 जुलाई से पासपोर्ट बनवाने और रिन्यू कराने के लिए देना होगा ज्यादा पैसा, सरकार ने बढ़ाई फीस, जानिए कितना बढ़ा शुल्क

 नई दिल्ली केंद्र सरकार ने पासपोर्ट और उससे जुड़ी सर्विस की फीस में बड़ा बदलाव किया है. ये बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब देश भर में पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण माने जाने को लेकर बहस चल रही है. विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट (संशोधन) नियम, 2026 जारी करते हुए इसे अगले महीने से ही लागू करने के निर्देश दिए हैं।  साल 2012 में आखिरी बार हुआ था फीस में बदलाव नए नियमों के तहत 1 जुलाई 2026 से पासपोर्ट के नए शुल्क लागू होंगे. इस बदलाव के तहत अब पासपोर्ट बनवाना दो हजार रुपये तक महंगा पड़ सकता है. इससे पहले साल 2012 में आखिरी बार पासपोर्ट बनवाने की फीस बढ़ाई गई थी. इस तरह ये बदलाव 14 साल बाद हुआ है।  सरकार ने इसके लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. नई व्यवस्था लागू होने के बाद नया पासपोर्ट बनवाने, पासपोर्ट रिन्यू कराने और अन्य संबंधित सेवाओं के लिए संशोधित शुल्क देना होगा. इसके साथ ही पासपोर्ट नियम, 1980 की पुरानी शुल्क सूची (शेड्यूल-IV) को हटाकर नई शुल्क सूची लागू कर दी जाएगी. विदेश मंत्रालय ने कहा है कि 1 जुलाई 2026 से सभी पासपोर्ट सेवाओं पर नए शुल्क लागू होंगे।  फीस में कितना हुआ बदलाव 1 जुलाई से पासपोर्ट शुल्क में बदलाव, जानिए अब कितना देना होगा   36 पेज का पासपोर्ट (नया/री-इश्यू): पहले: ₹1,500 → अब: ₹2,500 (नॉर्मल) पहले: ₹3,500 → अब: ₹5,000 (तत्काल) 60 पेज का पासपोर्ट (नया/री-इश्यू): पहले: ₹2,000 → अब: ₹3,500 (नॉर्मल) पहले: ₹4,000 → अब: ₹6,000 (तत्काल) 36 पेज का खोया/क्षतिग्रस्त पासपोर्ट: पहले: ₹1,500 → अब: ₹5,000 (नॉर्मल) पहले: ₹3,500 → अब: ₹7,500 (तत्काल) 60 पेज का खोया/क्षतिग्रस्त पासपोर्ट: पहले: ₹2,000 → अब: ₹6,000 (नॉर्मल) पहले: ₹4,000 → अब: ₹8,500 (तत्काल) 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का 36 पेज का पासपोर्ट: पहले: ₹1,000 → अब: ₹1,750 (नॉर्मल) पहले: ₹3,000 → अब: ₹4,250 (तत्काल) नाबालिगों का खोया/क्षतिग्रस्त पासपोर्ट: पहले: ₹1,000 → अब: ₹4,250 (नॉर्मल) पहले: ₹3,000 → अब: ₹6,750 (तत्काल)