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डीके शिवकुमार का सख्त आदेश, कर्नाटक में योजनाओं पर फर्जीवाड़ा रोकने के लिए नए नियम

कर्नाटक कर्नाटक सरकार की 'पांच गारंटी' योजनाओं का लाभ अब केवल उन्हीं नागरिकों को मिलेगा, जिनका नाम मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) में दर्ज होगा। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने शुक्रवार को यह साफ कर दिया है। उन्होंने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिया है कि जो भी इन योजनाओं के असली हकदार हैं, उन्हें लाभ से वंचित न किया जाए, लेकिन अपात्र लोगों पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए। वोटर लिस्ट में नाम होना अनिवार्य विधान सौधा में एक समीक्षा बैठक के दौरान डीके शिवकुमार ने कहा कि सरकार की 'गृह ज्योति' जैसी योजनाओं का लाभ अब सिर्फ पंजीकृत मतदाताओं तक सीमित रहेगा। उन्होंने नागरिकों से अपील की है कि वे चल रहे 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के दौरान यह सुनिश्चित करें कि मतदाता सूची से उनका नाम न छूटे। मुख्यमंत्री ने कहा, "केवल वे मतदाता ही सरकारी योजनाओं के लाभार्थी होंगे, जिनके नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं।" दूसरे राज्यों के लोगों का रोका जाएगा फायदा समीक्षा बैठक में यह बात भी सामने आई कि दूसरे राज्यों से आकर कर्नाटक में रह रहे कई लोग भी 'गृह ज्योति' जैसी योजना का लाभ ले रहे हैं। इस पर सख्त रुख अपनाते हुए सीएम ने कहा, "हमारे राज्य की योजनाओं का लाभ सिर्फ कर्नाटक के लाभार्थियों को ही मिलना चाहिए। हमने पाया है कि दूसरे राज्यों के वोटर भी यह लाभ ले रहे हैं, इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।" गड़बड़ियों और फर्जीवाड़े पर लगेगी लगाम बैठक में कल्याणकारी योजनाओं में हो रहे कई तरह के फर्जीवाड़े और अनियमितताओं पर भी चर्चा हुई। अधिकारियों ने बताया कि योजना का पैसा यूपीआई (UPI) खातों और कर्नाटक के बाहर के बैंक खातों में ट्रांसफर किया जा रहा है। सीएम ने ऐसे पैसे के प्रवाह पर रोक लगाने और लाभ को केवल राज्य के भीतर सीमित रखने के निर्देश दिए। सीएम ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि मृत लाभार्थियों को भी पैसे का भुगतान जारी है। उन्होंने अधिकारियों को लाभार्थियों के रिकॉर्ड को 'रियल-टाइम' अपडेट करने का निर्देश दिया। 'गृह लक्ष्मी' योजना के तहत, बैंक खाते में पैसे आते ही कुछ बैंकों द्वारा उसे पुराने लोन की किस्तों (EMI) के रूप में काट लिए जाने के मामले भी सामने आए। इसके चलते कुछ महिलाओं ने अपने खाते बदल लिए। सीएम ने कहा कि लाभार्थियों को इस तरह की परेशानी का सामना नहीं करना चाहिए। ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 'गृह लक्ष्मी' सहायता राशि एक ही बैंक खाते के जरिए कई लाभार्थियों को भेजी गई, जिसमें लगभग 3 लाख किस्तों में करीब 60 करोड़ रुपये बांटे गए। ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए सीएम ने निर्देश दिया कि योजना का पैसा खाते में आते ही लाभार्थियों को एक ऑटोमेटेड वॉइस मैसेज भेजा जाए। क्या हैं कर्नाटक की 5 गारंटी योजनाएं और उनके ताज़ा आंकड़े? समीक्षा बैठक में राज्य की फ्लैगशिप योजनाओं के आंकड़ों पर भी चर्चा की गई। गृह ज्योति: हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली। (अब तक 1.65 करोड़ लाभार्थी मुफ्त बिजली का लाभ उठा चुके हैं।) गृह लक्ष्मी: परिवार की महिला मुखिया को हर महीने 2,000 रुपये की आर्थिक मदद। अन्न भाग्य: बीपीएल (BPL) परिवार के प्रत्येक सदस्य को हर महीने 10 किलो चावल। जुलाई 2023 से दिसंबर 2024 के बीच 11,561.05 करोड़ रुपये डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए भेजे गए हैं। साथ ही 4.44 करोड़ लाभार्थियों को 5 किलो अतिरिक्त चावल हर महीने दिया जा रहा है। शक्ति योजना: महिलाओं के लिए राज्य की सरकारी (नॉन-लग्जरी) बसों में मुफ्त यात्रा। मई के अंत तक महिलाओं ने 763 करोड़ मुफ्त बस यात्राएं की हैं, जिनके टिकट की कीमत लगभग 20,047.69 करोड़ रुपये है। साथ ही 2026-27 शैक्षणिक वर्ष में छात्रों को लगभग 10 लाख मुफ्त बस पास जारी किए जाने की उम्मीद है। युवा निधि: 18 से 25 साल के बेरोजगार स्नातकों को 3,000 रुपये और बेरोजगार डिप्लोमा धारकों को 1,500 रुपये प्रति माह का भत्ता- दो साल के लिए।

अमेरिका-ईरान डील के बाद होर्मुज से आवाजाही शुरू, ट्रांजिट के लिए कड़े नियम लागू

नई दिल्ली अमेरिका और ईरान में हुई डील के बाद अब होर्मुज से जहाजों का निकलना शुरू हो गया है। हालांकि इतने ज्यादा जहाज कतार में थे कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर जाम जैसी स्थिति बन गई है। पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी (PGSA) ने जहाजों को बिना किसी असुविधा को होर्मुज से पास करवाने के लिए कुछ सख्त नियम लागू किए हैं। इन नियमों के तहत जहाज की तरफ से कम से कम 48 घंटे पहले ट्रांजिट रिक्वेस्ट जमा करनी होगी। इसके बाद भी जहाज का संपर्क अथॉरिटी से लगातार बना रहना चाहिए। अगर इसमें किसी तरह की चूक होती है तो इसकी जिम्मेदारी जहाज के मालिक की होगी। पीजीएसए ने अपनी वेबसाइट के माध्यम से ट्रांजिट रिक्वेस्ट जमा करने की सुविधा दी है। क्यों इतना अहम है होर्मुज? बता दें कि होर्मुज फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है। अमेरिका के हमले के बाद मार्च से ही यह सामान्य आवाजाही के लिए बंद था। बेहद कम जहाजों को यहां से निकलने की अनुमति दी जाती थी। इसके बाद भी जहाजों पर हमले का खतरा बना रहता था। इसी जलमार्ग से खाड़ी देशों के लगभग 80 फीसदी तेल और गैस का निर्यात होता है। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया के लिए यह मार्ग बेहद अहम है। भारत भी अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का करीब 40 फीसदी आयात इसी मार्ग से करता आ रहा है। PGSA के मुताबिक ट्रांजिट ऐप्लिकेशन में यात्रा की पूरी जानकारी, रूट, संपर्क और शिप के बार में सारी जानकारी देनी होगी। इसके बाद ही इसे होर्मजु से गुजरने की अनुमति दी जाएगी। अथॉरिटी की तरफ से कहा गया है कि होर्मुज के पास पहुंचने से पहले ही जहाजों को अपनी रिक्वेस्ट भेज देनी चाहिए। पीजीएसए ने कहा कि जहाजों की सुरक्षित आवाजाही और किसी भी तरह की दुर्घटना को टालने के लिए यह प्रक्रिया लागू की गई है। बता दें कि युद्ध के दौरान होर्मजु में भी माइन्स बिछा दी गई थीं। इसलिए दुर्घटना संभावित क्षेत्र से जहाजों को गुजरने नहीं दिया जा सकता। 60 दिनों तक नहीं लगेगा कोई शुल्क समझौते के मुताबिक 60 दिनों तक ईरान जहाजों को पास कराने के बदले किसी भी तरह का शुल्क वसूल नहीं करेगा। स्ट्रेट से व्यापारिक जहाजों की सुगम आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा, पर्यावरण संबंधित भी कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। रखरखाव संबंधित सारे खर्च ईरान की सरकार वहन करेगी। गुरुवार को होर्मुस से होकर कम से कम 25 जाहज निकले। वहीं अप्रैल महीने में 7 से 8 जहाज ही होर्मुज से पास हो पाए थे। अमेरिकी हमले के बाद होर्मुज से जहाजों का निकलना बेहद कम हो गया था। बता दें कि एक दिन पहले यानी शुक्रवार से स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता शुरू होने वाली थी। तब तक उधर इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष बढ़ने लगा और इजरायल ने लेबनान में एयरस्ट्राइक कर दी। इसके बाद शुक्रवार की वार्ता टाल दी गई और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्विट्जरलैंड का दौरा भी रद्द कर दिया।

बच्चों के खिलाफ यौन शोषण रिपोर्ट पर विवाद, UN में इजरायल और प्रतिनिधियों में टकराव

नई दिल्ली संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक बैठक में दो राजनयिकों के बीच ऐसी बहस हुई कि दोनों तू-तड़ाक पर उतर आए। न्यूयॉर्क में 'युद्ध के दौरान बच्चों के खिलाफ यौन शोषण' जैसे गंभीर विषय पर चर्चा के दौरान इजरायली राजदूत और संयुक्त राष्ट्र महासचिव की प्रतिनिधि के बीच जमकर कहासुनी हो गई। इजरायली राजदूत डैनी डेनन गुतेरस की प्रतिनिधि प्रामिला पैटन से इस्तीफा मांगने लगे तो वह भड़क गईं और उन्होंने भी जमकर सुना दिया। रिपोर्ट में इजरायल ब्लैकलिस्ट प्रामिला पैटन ने बच्चों के खिलाफ अपराध को लेकर एक रिपोर्ट पेश की जिसमें इजरायल को ब्लैकलिस्ट किया गया था। इजरायली राजदूत ने कहा कि यह रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण है और जानबूझकर इजरायल का टारगेट किया जा रहा है। इजरायली राजदूत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव पहले से ही इजरायल को निशाना बनाना चाहते हैं और तुम लोग उनके सामने नतमस्तक होकर रिपोर्ट तैयार कर रहे हो। तू-तड़ाक पर उतरे इजरायली राजदूत गुतेरस की एक और प्रतिनिधि वानेसा फ्रेजियर ने भी अपनी रिपोर्ट में इजरायल को ब्लैकलिस्ट किया था। डेनन जब भड़क गए और तू-तड़ाक पर उतर आए तो फ्रेजियर ने कहा कि उन्हें किसी पर व्यक्तिगत तौर पर हमला नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर इजरायल को ब्लैकलिस्ट किया गया है तो इसके बाकायदा सबूत मौजूद हैं। डेनन ने कहा, तुम लोग यूएन के लिए काम करते हो और हम इसके सदस्य हैं। तुम चुप हो जाए, तुम्हारी रिपोर्ट बहुत ही शर्मनाक है। माल्टा की पूर्व राजनयिक फ्रेजियर ने गुतेरस की तरफ से इसी सप्ताह अपनी रिपोर्ट जारी की थी। इससे पहले गुतेरस ने भी कहा था कि इजरायल ने फिलिस्तीनियों के साथ जो कुछ किया है, उसके लिए उसे ब्लैकलिस्ट किया जाएगा। उन्होंने कहा था कि इजरायल ने गाजा में बच्चों पर कहर ढाया है। हजारों बच्चे अनाथ हो गए और हजारों अपाहिज हो गए। पिछले महीने पैटेन ने जब अपनी रिपोर्ट जारी की थी तब डेनन ने इसे नीचता बताया था। इजरायल के विदेश मंत्रालय ने यहां तक कहा था कि वह गुतेरस के साथ सारे संबंध खत्म करना चाहते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इन दोनों रिपोर्ट्स में इजरायल के दुश्मन हमास को भी ब्लैकलिस्ट किया गया है।

22.79 लाख अभ्यर्थियों की परीक्षा से पहले अलर्ट मोड में NTA, देशभर में फुल-स्केल रिहर्सल

नई दिल्ली  नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) ने NEET-UG की री-एग्जाम परीक्षा से ठीक एक दिन पहले देशभर में मेगा मॉक ड्रिल का आयोजन किया है। इस मॉक ड्रिल के जरिए एनटीए परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था, प्रश्नपत्रों की सुरक्षित ढुलाई और अन्य व्यवस्थाओं को अंतिम रूप से परख रही है। यह फुल-स्केल रिहर्सल सुबह 9 बजे से रात के 8 बजे तक चलेगी। देश के 551 और विदेश के 14 शहरों में 5,500 से अधिक परीक्षा केंद्र बनाए गए हैं, जिन्हें हाई-सिक्योरिटी जोन में तब्दील किया गया है। इस री-एग्जाम में 22.79 लाख से ज्यादा उम्मीदवार शामिल होंगे। इस मॉक ड्रिल को करने का मुख्य उद्देश्य 21 जून की मुख्य परीक्षा को पूरी तरह से सुरक्षित, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना है। मॉक ड्रिल का उद्देश्य क्या है? इसमें परीक्षा केंद्रों पर प्रश्न पत्रों की सुरक्षित डिलीवरी, सीसीटीवी निगरानी, बायोमेट्रिक सत्यापन, और बहुस्तरीय सुरक्षा जांच जैसी सभी प्रक्रियाओं का वास्तविक समय में परीक्षण किया जाता है। 6,669 पर्यवेक्षक तैनात किए गए एनटीए के अनुसार, पुनर्परीक्षा में कई एजेंसियों और प्रशासन के विभिन्न स्तरों के बीच घनिष्ठ समन्वय शामिल है, जिसमें 674 शहर समन्वयक शहर-स्तरीय संचालन की देखरेख कर रहे हैं और परीक्षा केंद्रों पर स्वतंत्र निगरानी के लिए 6,669 पर्यवेक्षक तैनात किए गए हैं। प्रत्येक परीक्षा केंद्र पर केंद्र अधीक्षक और पर्यवेक्षक नियुक्त किए गए हैं। एनटीए ने बताया कि पुनर्परीक्षा के सुचारू और निष्पक्ष संचालन को सुनिश्चित करने के लिए पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारियों सहित कुल मिलाकर 2 लाख से अधिक कर्मियों को तैनात किया गया है। एनटीए इस बार किसी तरह की चूक करना नहीं चाहती है।

100 पन्नों की जांच रिपोर्ट के बाद गिरी गाज, धामी सरकार का भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार

उत्तराखंड उत्तराखंड की नौकरशाही में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि एक भूमि खरीद मामले ने प्रशासनिक तंत्र की इतनी बड़ी परतें उधेड़ दी हों. एक आईएएस अधिकारी की बर्खास्तगी की संस्तुति, दो आईएएस और एक पीसीएस अधिकारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई, कुल 12 अधिकारियों और कर्मचारियों पर निलंबन और मुकदमे की तलवार. करीब 14 करोड़ रुपये मूल्य की बताई जा रही भूमि को 54 करोड़ रुपये में खरीदने के आरोपों से यह मामला शुरू हुआ था.  मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने जिस सख्ती के साथ कार्रवाई की है, उसने सचिवालय से लेकर जिलों तक एक स्पष्ट संदेश पहुंचाया है कि सरकारी धन से जुड़े मामलों में अब लापरवाही भी भारी पड़ सकती है. सबसे बड़ा सवाल: आखिर इतनी बड़ी कार्रवाई क्यों सरकार ने तत्कालीन नगर आयुक्त और आईएएस अधिकारी वरुण चौधरी के खिलाफ सेवा से बर्खास्त करने की संस्तुति की है. वहीं तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह के खिलाफ मेजर पनिशमेंट देने का निर्णय लिया गया है. इसके अलावा तत्कालीन एसडीएम अजयवीर सिंह के खिलाफ परनिंदा प्रविष्टि दर्ज करने और उनकी तीन सैलरी इनक्रीमेंट रोकने का आदेश दिया गया है. इसके साथ ही 10 अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी मुकदमा दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. कैसे खुली पूरे मामले की परतें अप्रैल 2025 में हरिद्वार नगर निगम द्वारा की गई एक भूमि खरीद अचानक सुर्खियों में आ गई. आरोप लगा कि जिस जमीन की वास्तविक कीमत लगभग 14 करोड़ रुपये के आसपास थी, उसे करीब 54 करोड़ रुपये में खरीद लिया गया. मामला सामने आते ही राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक हलकों तक सवाल उठने लगे. आखिर इतनी बड़ी राशि खर्च करने का निर्णय किन आधारों पर लिया गया? क्या जमीन की वास्तविक जरूरत थी? क्या खरीद प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप थी? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शासन में सचिव रणवीर चौहान को जांच की जिम्मेदारी सौंपी. 100 पन्नों की रिपोर्ट बनी कार्रवाई का आधार रणवीर चौहान ने हरिद्वार पहुंचकर पूरे मामले की गहन जांच की. फाइलों की पड़ताल हुई, अधिकारियों के बयान लिए गए और भूमि खरीद से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण किया गया. लंबी जांच के बाद करीब 100 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट शासन को सौंपी गई. इसी रिपोर्ट के आधार पर अब तक की सबसे बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई का फैसला लिया गया. सूत्रों के अनुसार रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. जांच में क्या मिला रिपोर्ट के मुताबिक भूमि खरीद की प्रक्रिया कृषि भूमि के मूल्यांकन के आधार पर शुरू हुई थी, लेकिन अंतिम खरीद वाणिज्यिक दरों पर की गई. जांच अधिकारियों को यह बिंदु सबसे अधिक संदिग्ध लगा. इसके अलावा भूमि खरीद के लिए जरूरी लैंड कमेटी का गठन नहीं किया गया. सामान्य परिस्थितियों में इतनी बड़ी खरीद से पहले कई स्तरों पर परीक्षण और अनुमोदन की प्रक्रिया होती है, लेकिन यहां कई महत्वपूर्ण चरण या तो पूरे नहीं किए गए या फिर अत्यधिक जल्दबाजी में निपटा दिए गए. जांच में यह भी सामने आया कि भू-उपयोग परिवर्तन से जुड़ी धारा-143 की प्रक्रिया असामान्य रूप से तेजी से पूरी की गई. बताया गया कि सामान्य तौर पर समय लेने वाली यह प्रक्रिया महज दो से तीन दिनों के भीतर पूरी हो गई. रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों के अनुसार तत्कालीन एसडीएम स्तर पर फाइल को आगे बढ़ाने के लिए स्टेनो से ही राजस्व संबंधी अभिमत तैयार करवाया गया. यदि यह तथ्य अंतिम रूप से सिद्ध होता है तो इसे प्रशासनिक नियमों की गंभीर अनदेखी माना जाएगा. जमीन पर भी उठे सवाल जांच रिपोर्ट में केवल कीमत और प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि भूमि चयन पर भी सवाल उठाए गए हैं. बताया गया कि खरीदी गई जमीन कूड़े के ढेर के पास स्थित थी और उसकी तत्काल आवश्यकता भी स्पष्ट नहीं थी. ऐसे में यह सवाल और बड़ा हो गया कि आखिर उसी भूमि को खरीदने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई. जांच एजेंसियां अब यह भी पड़ताल कर रही हैं कि भूमि चयन के दौरान क्या अन्य विकल्पों पर विचार किया गया था या नहीं. निलंबन से लेकर बर्खास्तगी तक मामला सामने आने के बाद सरकार ने तत्कालीन डीएम कर्मेंद्र सिंह, नगर आयुक्त वरुण चौधरी और एसडीएम अजयवीर सिंह को निलंबित कर दिया था. उस समय भी इस कार्रवाई को अभूतपूर्व माना गया था. लेकिन जांच रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई का दायरा और बढ़ गया. अब मामला केवल निलंबन तक सीमित नहीं है, बल्कि एक आईएएस अधिकारी की सेवा समाप्ति की संस्तुति तक पहुंच गया है. अब केंद्र सरकार की भूमिका अहम चूंकि मामला अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों से जुड़ा है, इसलिए अंतिम निर्णय की प्रक्रिया में केंद्र सरकार की भी भूमिका रहेगी. राज्य सरकार ने दोनों आईएएस अधिकारियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई के लिए कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को प्रस्ताव भेजने का फैसला किया है. इसके बाद केंद्रीय स्तर पर भी मामले की समीक्षा की जाएगी. कुछ बड़े अधिकारियों का कहना है कि राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह कार्रवाई मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की भ्रष्टाचार के खिलाफ घोषित 'जीरो टॉलरेंस' नीति का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है. सरकार का दावा है कि चाहे अधिकारी कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि सरकारी धन के उपयोग में अनियमितता या नियमों की अनदेखी पाई जाती है तो कार्रवाई तय है.

तूफान के बीच बड़ा हादसा टला, इंडिगो फ्लाइट पर बिजली गिरने के बाद बदला गया विमान

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से शुक्रवार को अगरतला जाने वाली इंडिगो की एक फ्लाइट एयरपोर्ट पर खड़ी थी. इसी दौरान जबरदस्त तूफान के दौरान बिजली गिरी और फ्लाइट उसकी चपेट में आ गई. सुरक्षा नियमों के तहत यात्रियों को विमान से उतारा गया और नियमों के मुताबिक जरूरी जांच की गई. इसके बाद दूसरे विमान का इंतजाम किया गया. न्यूज एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, एहतियातन ग्राउंड पर काम करने वाले दो कर्मचारियों को मेडिकल सुविधा के लिए ले जाया गया. सूत्रों के मुताबिक, किसी के घायल होने की खबर नहीं है. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) के एक अधिकारी ने बताया कि शुक्रवार को कोलकाता एयरपोर्ट पर तूफान के दौरान अगरतला जा रहे इंडिगो के एक विमान पर बिजली गिरी. क्या है पूरा मामला? रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना तूफान और बारिश के बीच हुई, जिसके लिए एयरपोर्ट ऑपरेशन्स कंट्रोल सेंटर (AOCC) ने मौसम संबंधी अलर्ट जारी किए थे. उन्होंने बताया कि इस घटना में कोई भी यात्री घायल नहीं हुआ. इंडिगो की फ्लाइट 6E6068 (VT-IPW) एरोब्रिज 56L पर खड़ी थी, तभी सुबह करीब 9:30 बजे उस पर बिजली गिरी. बिजली गिरने से विमान के पावर सिस्टम पर असर पड़ा, जिससे अचानक पावर ऑफ हो गया. अधिकारी ने बताया कि जब बिजली गिरी, तो A320 विमान में 141 यात्री और छह क्रू मेंबर सवार थे. एहतियात के तौर पर एयरलाइन ने यात्रियों को विमान से उतार दिया और बाद में उन्हें A321 विमान (VT-ICD) से रवाना किया गया. यह फ्लाइट असल में सुबह 9.20 बजे रवाना होने वाली थी, लेकिन यात्रियों के साथ दोपहर 12.50 बजे रवाना हुई. इंडिगो के मुताबिक, दो ग्राउंड स्टाफ मामूली रूप से प्रभावित हुए और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया. अधिकारी ने बताया कि मेडिकल चेकअप के तुरंत बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई. कोलकाता और आसपास के जिलों में शुक्रवार सुबह से ही आंधी-तूफान और बारिश हो रही है, जिससे कई इलाकों में जलजमाव हो गया है और ट्रैफिक में रुकावट आने की खबरें आईं.

क्या तेजस MK2 बदल देगा हवाई युद्ध का खेल? F-35 और Su-57 की जरूरत पर उठे सवाल

बेंगलुरु   दशकों पहले जिस देश के पास जितनी मजबूत आर्मी यानी थलसेना होती थी, उसे उतना पावरफुल माना जाता था. फिर हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बम हमले के बाद कॉम्‍बैट फील्‍ड में एयरफोर्स की धमाकेदार एंट्री हुई. आज 21वीं सदी में दुनिया दो भीषण सशस्‍त्र संघर्ष का साक्षी बनी है – रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान जंग. इन दोनों युद्ध में एक बात कॉमन है – एरियल अटैक यानी हवाई हमले. इन संघर्षों में पैदल सेना यानी आर्मी का न के बराबर यूज किया गया. हवाई हमले प्रमुख रहे. फाइटर जेट, मिसाइल और ड्रोन हमलों ने प्रतिद्वंद्वी देशों की हालत खराब करके रख दी. इसके दो परिणाम सामने आए हैं – पहला फाइटर जेट, मिसाइल और ड्रोन सिस्‍टम डेवलप करने वाले प्रोजेक्‍ट्स का रफ्तार मिली है. दूसरा, अल्‍ट्रा मॉडर्न टेक्‍नोलॉजी से लैस एयर डिफेंस सिस्‍टम विकसित करने पर जोर दिया जाने लगा है. भारत का मिशन सुदर्शन चक्र परियोजना नेशनल एयर डिफेंस सिस्‍टम का हिस्‍सा है. इसके अलावा देसी टेक्‍नोलॉजी के दम पर फाइटर जेट डेवलप करने की प्रक्रिया को भी रफ्तार मिली है. इसी क्रम में भारत के रक्षा वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है. तेजस फाइटर जेट के MK2 वेरिएंट Mk1A की तुलना में काफी कम रडार क्रॉस सेक्‍शन (RCS) हासिल करने में सफल रहा है।   इसका मतलब यह हुआ कि तेजस MK2 मॉडर्न रडार सिस्‍टम को चकमा दे सकता है. साथ ही THAAD और आयरन डोम जैसे एयर डिफेंस सिस्‍टम को धता बताने से महज कुछ कदम ही दूर है. इस खासियत के चलते तेजस MK2 चौथी और पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट के बीच का ब्रिज भी माना जा रहा है. साथ ही इसकी स्‍पीड राफेल फाइटर जेट जितनी होने वाली है।  भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम को एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मिली है. एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) द्वारा विकसित किए जा रहे तेजस MK2 फाइटर जेट (मीडियम वेट फाइटर) में रडार से बचने की क्षमता को लेकर महत्वपूर्ण सुधार किया गया है. परियोजना से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, तेजस MK2 का फ्रंटल रडार क्रॉस सेक्शन (आरसीएस) मौजूदा तेजस MK-1A की तुलना में लगभग 75 प्रतिशत कम होगा. इसका अर्थ है कि नए विमान की रडार पर दिखाई देने की संभावना काफी कम हो जाएगी, जिससे युद्धक्षेत्र में दुश्मन को चकमा देने और सर्वाइवल की क्षमता बढ़ेगी. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, ADA के परियोजना निदेशक ने बताया कि तेजस MK2 का फ्रंटल आरसीएस तेजस MK-1A का लगभग एक चौथाई होगा. स्वतंत्र आकलनों के अनुसार, साफ कॉन्फिगरेशन (बिना बाहरी हथियारों और अतिरिक्त ईंधन टैंकों के) में इसका फ्रंटल आरसीएस 0.1 से 0.2 वर्ग मीटर के बीच हो सकता है. यह आंकड़ा आधुनिक 4.5 पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की श्रेणी में काफी प्रभावशाली माना जाता है।  RCS में कमी लाने वाली प्रमुख खासियतें     एडवांस शेपिंग और एज अलाइनमेंट (किनारों का विशेष डिजाइन), जिससे रडार तरंगें अपने स्रोत की ओर वापस परावर्तित यानी रिफ्लेक्‍ट होने के बजाय दूसरी दिशा में मुड़ जाती हैं।      S-डक्ट (S-Duct) या ट्विस्टेड एयर इंटेक, जो इंजन के कंप्रेसर ब्लेड्स को छिपाते हैं. कंप्रेसर ब्लेड्स किसी भी लड़ाकू विमान में रडार के लिए सबसे बड़े परावर्तक (रिफ्लेक्टर) माने जाते हैं।      विमान के पंखों, फ्यूजलाज (मुख्य ढांचे), कैनार्ड्स और अन्य सतहों में 90 प्रतिशत से अधिक कंपोजिट सामग्री का उपयोग, जो धातु की तुलना में रडार ऊर्जा को अधिक प्रभावी ढंग से अवशोषित करती है।      स्वदेशी रडार एब्जॉर्बेंट मैटेरियल (RAM) कोटिंग, जिसे एएमसीए (Advanced Medium Combat Aircraft) कार्यक्रम के तहत विकसित तकनीकों के आधार पर तैयार किया गया है।      सतहों के बीच अधिक चिकने और निर्बाध संक्रमण (स्मूथ सरफेस ट्रांजिशन) तथा बाहरी उभारों और गैप्स की संख्या में कमी, जिससे रडार पर विमान की पहचान और भी कठिन हो जाती है।  मॉडर्न टेक्‍नोलॉजी के साथ बड़ा आकार दिलचस्प बात यह है कि तेजस MK2 फाइटर जेट आकार में अपने पूर्ववर्ती एमके-1ए से बड़ा है. इसमें लंबा फ्यूजलेज, क्लोज कपल्ड कैनार्ड और अधिक ईंधन तथा हथियार ले जाने की क्षमता होगी. सामान्य तौर पर विमान का आकार बढ़ने से उसकी रडार पहचान भी बढ़ जाती है, लेकिन डिजाइनरों ने एडवांस एयरोडायनामिक डिजाइन, स्मूथ ट्रांजिशन और व्यापक रूप से कंपोजिट सामग्री के इस्तेमाल के जरिए इसकी रडार पहचान को उल्लेखनीय रूप से कम करने में सफलता हासिल की है. तेजस एमके-1ए पहले से ही अपनी श्रेणी के विमानों में अपेक्षाकृत कम आरसीएस के लिए जाना जाता है. इसका अनुमानित फ्रंटल आरसीएस लगभग 0.5 वर्ग मीटर या उससे कम माना जाता है. अब इसमें चार गुना तक कमी लाकर तेजस MK2 को लो विजिबिलिटी वाले उन विमानों की श्रेणी में पहुंचाने का प्रयास किया गया है, जिनकी तुलना अक्सर महंगे और अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों से की जाती है।  रडार को चकमा देने की क्षमता रडार से कम दिखाई देने की यह क्षमता विमान को दुश्मन के रडार द्वारा देर से पकड़े जाने में मदद करेगी. इससे विशेष रूप से बियॉन्ड-विजुअल-रेंज (बीवीआर) एरियल वॉर में इंडियन एयरफोर्स को सामरिक बढ़त मिल सकती है. हालांकि, विमान को पूरी तरह हथियारों और ईंधन टैंकों से लैस करने के बाद भी कम आरसीएस बनाए रखना सबसे बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती बनी हुई है. बाहरी हथियार, पॉड और अतिरिक्त टैंक रडार सिग्नेचर को बढ़ा देते हैं. इसी कारण डिजाइनर एडवांस रडार और अन्य तकनीकों पर काम कर रहे हैं।  भारत के एरियल पावर को नई ऊंचाई रक्षा अधिकारियों का कहना है कि इन तकनीकी सुधारों के बावजूद विमान के विकास और वायुसेना में शामिल किए जाने की समयसीमा प्रभावित नहीं होनी चाहिए. भारतीय वायुसेना को अपनी भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए तेजस MK2 की आवश्यकता है, खासकर तब तक जब तक एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) परियोजना पूरी तरह मैच्‍योर नहीं हो जाती. GE F414 इंजन, ‘उत्तम’ एईएसए रडार और अन्य आधुनिक सिस्‍टम्‍स के साथ तेजस MK2 भारतीय वायुसेना के लिए एक शक्तिशाली लड़ाकू प्लेटफॉर्म साबित हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि कम रडार पहचान, एडवांस सेंसर, अधिक हथियार क्षमता और संभावित सुपरक्रूज क्षमता से यह विमान भविष्य के युद्धक्षेत्र में भारत की ताकत को नई ऊंचाई देगा। 

COVID-19 की उत्पत्ति पर नई बहस, चीन की लैब और अमेरिकी फंडिंग को लेकर सामने आए चौंकाने वाले दावे

बीजिंग /न्यूयॉर्क पूरी दुनिया को झकझोर देने वाली कोरोना महामारी को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है. कुछ दिनों पहले अमेरिकी खुफिया विभाग की निदेश का पद छोड़ने का ऐलान करने वाली तुलसी गबार्ड नेकोरोना वायरस को लेकर बड़ा खुलासा किया है. उन्होंने कहा कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के चीफ मेडिकल एडवाइजर एंथोनी फुसी ने चीन स्थित वुहान के उस लैब को फंडिंग की थी, जहां से कोरोना महामारी फैली थी।  प्रतिबंधित दस्तावेज हुए सार्वजनिक अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने हाल ही में अमेरिकी की ओर से फंड किए गए बायोलैब्स से संबंधित कई दस्तावेज को सार्वजनिक कर दिया.  उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि अमेरिका के राष्ट्रीय एलर्जी और संक्रामक रोग संस्थान (एनआईएआईडी) के पूर्व निदेशक एंथनी फौसी ने कोरोना महामारी की शुरुआत पर खुफिया आकलन को प्रभावित किया और बाद में संसद के सामने कसम खाकर ऐसे कनेक्शन को खारिज किया था।  राष्ट्रीय खुफिया निदेशक के दफ्तर (ओडीएनआई) ने इस दस्तावेज को जारी किया. गबार्ड का यह कदम ट्रंप प्रशासन के उस प्रयास में एक बड़ा कदम है, जिसमें महामारी की उत्पत्ति की फिर से समीक्षा करने और वैश्विक स्वास्थ्य संकट के दौरान अमेरिकी सरकारी एजेंसियों, वैज्ञानिकों और खुफिया अधिकारियों की भूमिका की जांच करने की बात कही गई है।  गबार्ड के अनुसार, नए जारी किए गए बातचीत और दस्तावेजों से पता चलता है कि जब वायरस नैचुरली निकला या चीन के वुहान की लैब से, इसपर बहस तेज हुई तो कैसे फौसी ने राष्ट्रीय एलर्जी और संक्रामक रोग संस्थान (एनआईएआईडी) के निदेशक के तौर पर काम करते हुए खुफिया अधिकारियों के साथ बातचीत की।  बाइडेन के अधिकारी पर तुलसी गबार्ड का बड़ा आरोप गबार्ड ने कहा, 'कोविड-19 महामारी की वजह से हमारे लाखों साथी, अमेरिकियों और दुनिया भर के अनगिनत लोगों को बहुत मुश्किल भरे दौर से गुजरना पड़ा. सालों के झूठ, सेंसरशिप और छिपाने के बाद, अमेरिकी लोग पारदर्शिता, सच्चाई और जवाबदेही के हकदार हैं.' उन्होंने आरोप लगाया कि डॉ. फौसी जैसे राजनीतिक स्वार्थी नेताओं ने अपने गलत कामों और सत्ता के दुरुपयोग को छुपाया, खुफिया जानकारी में हेरफेर किया, कांग्रेस से झूठ बोला और देश को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी सूचानाओं तक निर्वाचित राष्ट्रपति की पहुंच सीमित करके उनकी छवि को कमजोर किया।  ओडीएनआई ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पारदर्शिता संबंधी निर्देश के तहत उसने एक वर्ष तक चली गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की समीक्षा प्रक्रिया संचालित की. इस दौरान अनियमितताओं का खुलासा करने वाले अधिकारियों की गवाही भी एकत्र की गई. इन अधिकारियों ने आरोप लगाया कि वायरस की उत्पत्ति को लेकर आधिकारिक आकलनों पर सवाल उठाने के कारण उनके खिलाफ प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की गई।  ओडीएनआई ने दावा किया कि फौसी के खुफिया अधिकारियों के साथ अच्छे संबंध थे, जिससे वह कोविड-19 की शुरुआत के बारे में चर्चा में अहम भूमिका निभा पाए. इसमें आरोप लगाया गया कि फौसी ने खुफिया एजेंसियों से सलाह लेने वाले विशेषज्ञों के बारे में सुझाव दिए और ऐसे आकलन बनाने में मदद की जिन्हें बाद में वैज्ञानिक सहमति के तौर पर सबके सामने पेश किया गया।  बाइडेन सरकार ने की थी समीक्षा बैठक जुलाई 2021 के एक इंटेलिजेंस कम्युनिटी ईमेल में कहा गया था कि अधिकारी फौसी के सुझावों पर आगे बढ़ना चाहते थे क्योंकि उन्हें एक एसएमई के ​​तौर पर देखा जाता था, जिसके पास मौजूदा और ऐतिहासिक रिसर्च के बारे में बहुत जानकारी है और जो शायद ज्यादातर लोगों से बेहतर जानता है कि असली कोरोना वायरस विशेषज्ञ कौन हैं।  तत्कालीन बाइडेन सरकार ने कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर 90 दिनों की समीक्षा बैठक की थी. इसे लेकर दस्तावेज में बताया गया है कि 2021 में खुफिया अधिकारी ने 90-दिनों की समीक्षा के दौरान फौसी की तरफ से रिकमेंड किए गए वैज्ञानिक तक पहुंचने को लेकर चर्चा कर रहे थे. आंतरिक पत्राचार में उन्हें एक सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट बताया गया था, जिनकी रिकमेंडेशन्स को समीक्षा प्रक्रिया के लिए जरूरी माना गया था।  फौसी ने 2024 में कोरोना वायरस महामारी पर हाउस सिलेक्ट सबकमेटी के सामने अपनी गवाही में वायरल रिसर्च के बारे में इंटेलिजेंस एजेंसियों के साथ बातचीत की जानकारी से इनकार किया. रिपोर्ट में कहा गया है कि डॉक्यूमेंट्स में इंटेलिजेंस अधिकारियों और कोविड-की उत्पत्ति की जांच के बीच कई बातचीत दिखाई गई हैं. उस समय कुछ सरकारी कम्युनिकेशन ने इस दावे को खारिज कर दिया था कि वायरस को लैब में बनाया गया था, जबकि दूसरों ने लैबोरेटरी एक्सीडेंट सिनेरियो और वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की क्षमताओं की जांच की।  वुहान लैब को लेकर बड़ा खुलासा लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी की ओर से मई 2020 में तैयार किए गए एक आकलन में यह निष्कर्ष निकाला गया कि वुहान में लेबोरेटरी में बदले गए कोरोना वायरस के गलती से फैलने के लिए हालात मौजूद थे और लेबोरेटरी और प्राकृतिक उत्पत्ति की परिकल्पनाओं को बराबर महत्व दिया गया. ओडीएनआई रिलीज में अनियमितताओं का खुलासा करने वाले अधिकारियों के आरोप भी शामिल हैं कि जिन खुफिया विश्लेषकों ने लैब-लीक हाइपोथीसिस का समर्थन किया, उन्हें परेशानी झेलना पड़ी, किनारे कर दिया गया या अलग राय रखने से रोका गया।  तुलसी गबार्ड ने कहा कि इनमें से कई शिकायतों को आगे की समीक्षा के लिए इंटेलिजेंस कम्युनिटी इंस्पेक्टर जनरल के पास भेज दिया गया है. कोविड-19 की शुरुआत महामारी के सबसे विवादित मुद्दों में से एक है. अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ​​लंबे समय से बंटी हुई हैं, कुछ का मानना ​​है कि यह जानवरों से प्राकृतिक रूप से फैला है और कुछ लैब से जुड़ी घटना को ज्यादा संभावित वजह मानते हैं।   

क्या है ब्रह्मोस मिसाइल की सबसे बड़ी ताकत? जिस हथियार को भारत ने बनाया, उसे अब रूस भी अपनाने जा रहा

 नई दिल्ली भारत और रूस के संयुक्त प्रयासों से बनी दुनिया की सबसे तेज और सटीक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस मिसाइल ने वैश्विक रक्षा बाजार में एक नया इतिहास रच दिया है. अब तक जिस मिसाइल तकनीक के लिए भारत विदेशी ताकतों पर निर्भर रहता था, आज उसी भारत से रूस जैसा महाशक्ति देश ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल सिस्टम खरीदने की तैयारी कर रहा है।  ब्रह्मोस एयरोस्पेस के प्रमुख डॉ. जयतीर्थ आर. जोशी ने नागपुर में आयोजित एक रक्षा कार्यक्रम के इतर इसकी पुष्टि की है कि रूस अपनी सेना में ब्रह्मोस को शामिल करने का इच्छुक है और इसके लिए द्विपक्षीय बातचीत बेहद एडवांस्ड स्टेज में पहुंच चुकी है. भारत जल्द ही रूस को इन घातक प्रणालियों की आपूर्ति शुरू कर सकता है।  यह घटनाक्रम न केवल वैश्विक भू-राजनीति में भारत के बढ़ते कद को दर्शाता है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत अभियान की सबसे बड़ी सफलता की गवाही भी देता है. जिस मिसाइल को फिलीपींस जैसे देश पहले ही खरीद चुके हैं, उसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में अपनी संहारक क्षमता साबित कर पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है।  ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस की अचूक मारक क्षमता मई 2025 में हुए भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान भारतीय वायुसेना और थलसेना ने सीमा पार आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद करने के लिए ऑपरेशन सिंदूर चलाया था. इस ऑपरेशन के दौरान पहली बार ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल केवल परीक्षणों या सिमुलेशन तक सीमित न रहकर वास्तविक युद्धक्षेत्र में किया गया।  भारतीय सुखोई-30MKI लड़ाकू विमानों से दागी गई एयर-लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइलों ने दुश्मन के हवाई क्षेत्रों और आतंकी बुनियादी ढांचों पर पिन-पॉइंट सटीकता से हमला किया।  रडार को चकमा देने की इसकी काबिलियत और मैक 2.8 से 3.0 की सुपरसोनिक रफ्तार के कारण दुश्मन का कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम इसे ट्रैक या इंटरसेप्ट नहीं कर सका. ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के इस प्रदर्शन ने पूरी दुनिया, खासकर रूस के सैन्य कमांडरों का ध्यान खींचा. रूस ने देखा कि यह मिसाइल घने हवाई सुरक्षा कवच को भेदकर अत्यंत सटीक हमले करने में पूरी तरह सक्षम है।  आखिर रूस को क्यों पड़ी ब्रह्मोस की जरूरत? रणनीतिक तौर पर ब्रह्मोस को भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन- DRDO और रूस के NPO Mashinostroyenia ने मिलकर विकसित किया है. शुरुआत से ही इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता भारत रहा है. वर्तमान में रूस द्वारा ब्रह्मोस को अपनी सेना में शामिल करने के पीछे कई बड़े कारण हैं…     वॉर टेस्टेड और विश्वसनीय तकनीक: यूक्रेन संकट और हालिया वैश्विक तनावों के बीच रूस को ऐसी मिसाइलों की आवश्यकता है जो पहले से 'बैटल-प्रूवन' हो. ब्रह्मोस ने भारतीय सेना के तीनों अंगों में रहकर और ऑपरेशन सिंदूर में हिस्सा लेकर अपनी विश्वसनीयता साबित की है।      तेज गति और रडार से बचने की क्षमता: ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत इसकी गति है. ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज 3704.4 km/hr चलने के कारण यह दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल क्रूज मिसाइल है. समुद्र या जमीन की सतह से बेहद कम ऊंचाई पर उड़ने से रडार इसे बहुत देर से पकड़ पाते हैं, जिससे दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता।       स्वदेशीकरण और लागत में कमी: भारत ने ब्रह्मोस में बड़े पैमाने पर स्वदेशीकरण किया है. इसके स्वदेशी बूस्टर और वॉरहेड अब भारत में ही बन रहे हैं, जिससे इसके निर्माण और कच्चे माल की लागत में भारी गिरावट आई है. रूस के लिए भारत से रेडी-टू-यूज़ मिसाइल प्रणालियों की आपूर्ति लेना आर्थिक और रणनीतिक दोनों रूप से बेहद फायदेमंद है।  वैश्विक बाजार में भारत का डंका: फिलीपींस के बाद रूस की बारी ब्रह्मोस एयरोस्पेस के लिए यह दौर रिकॉर्ड मुनाफे और वैश्विक विस्तार का रहा है. वर्ष 2022 में फिलीपींस ने भारत के साथ लगभग 3,100 करोड़ रुपये का ऐतिहासिक सौदा कर ब्रह्मोस का पहला अंतरराष्ट्रीय खरीदार बनने का गौरव हासिल किया था, जिसकी मिसाइल खेपें पहले ही पहुंचाई जा चुकी हैं।  फिलीपींस के बाद अब वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ भी निर्यात वार्ता अंतिम चरण में है. अब इस कड़ी में रूस का नाम जुड़ना भारत के रक्षा निर्यात इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है. अब तक सैन्य साजो-सामान के लिए रूस पर निर्भर रहने वाला भारत अब खुद रूस को मिसाइल एक्सपोर्ट करेगा।  इस कदम से न केवल दोनों देशों के कूटनीतिक संबंध नए मुकाम पर पहुंचेंगे, बल्कि भविष्य में बनने वाली हाइपरसोनिक मिसाइल 'ब्रह्मोस-II' और इसके छोटे वेरिएंट 'ब्रह्मोस-एनजी' के संयुक्त विकास को भी नई रफ्तार मिलेगी। 

पैदल यात्रियों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, फुटपाथ को बताया मौलिक सुविधा

नई दिल्ली देश के करोड़ों पैदल यात्रियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने शुक्रवार (19 जून 2026) को माना कि फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘जीवन के अधिकार’ का हिस्सा है. अदालत ने कहा कि नागरिकों को सुरक्षित, बाधारहित और दिव्यांगों की सुविधा के मुताबिक फुटपाथ उपलब्ध कराना सरकारों की जिम्मेदारी है।  लीगल वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें सड़क सुरक्षा से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान कही. याचिकाकर्ता ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि देश के कई शहरों में या तो फुटपाथ हैं ही नहीं, और जहां हैं भी वहां अतिक्रमण, पार्किंग या अन्य बाधाओं के कारण पैदल चलना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में लोगों को मजबूर होकर सड़क पर चलना पड़ता है, जिससे सड़क हादसों का खतरा बढ़ जाता है।  अदालत ने और क्या कहा? जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने कहा, “संविधान के भाग-III के तहत पैदल चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है. यह अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत प्राप्त आवागमन की स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है. इसे अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(1)(b), अनुच्छेद 19(1)(c) और अनुच्छेद 21 के साथ पढ़ा जाना चाहिए. पैदल चलने के इस मौलिक अधिकार के दायरे में स्पष्ट रूप से चिन्हित फुटपाथों का अधिकार भी शामिल है. ये अधिकार प्राथमिक हैं और इन्हें मोटर चालित वाहनों की आवाजाही पर वरीयता प्राप्त होगी।  कोर्ट ने कहा, “यह वास्तव में अजीब है कि हम पैदल चलने के अधिकार को पहचानने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते. शायद इसकी वजह यह है कि पहियों ने हमारी सोच पर कब्जा कर लिया है. हमारी नगरपालिकाएं ऐसी सड़कें बनाने में व्यस्त रहीं जो मोटर वाहनों के लिए अधिक उपयुक्त हों।  दिव्यांगजनों की सुविधा पर दिया जोर कोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से दिव्यांगजनों के अधिकारों पर भी जोर दिया. अदालत ने कहा कि फुटपाथ ऐसे होने चाहिए, जिनका इस्तेमाल व्हीलचेयर या अन्य सहायक उपकरणों का इस्तेमाल करने वाले लोग भी आसानी से कर सकें. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे फुटपाथों की उपलब्धता, रखरखाव और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करें. साथ ही, फुटपाथों से अतिक्रमण हटाने को भी अनिवार्य बताया गया है।  सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अगर उचित फुटपाथ नहीं होंगे, तो पैदल यात्रियों को सड़क का इस्तेमाल करना पड़ेगा, जो उनकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है. इसलिए सुरक्षित फुटवे और फुटपाथ उपलब्ध कराना सिर्फ प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।