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देवभूमि में चुनावी रण सज चुका है, क्या धामी दोहराएंगे जीत या विपक्ष करेगा बड़ा उलटफेर?

देहरादून  उत्तराखंड की सियासत में 'चुनावी बिगुल' बज चुका है. विधानसभा चुनाव होने में आठ महीने से कम का समय बचा है. देवभूमि की सत्ता पर काबिज होने के लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जहां इतिहास रचने के इरादे से मैदान में उतरने की तैयारी में है, तो वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) इस बार सत्ता परिवर्तन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।  70 विधानसभा सीटों वाले इस पहाड़ी राज्य में चुनावी सरगर्मियां चरम पर हैं और हर दल अपनी रणनीतियों को धार देने में जुट गया है।  कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक और अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने में जुटी है. दूसरी ओर क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) भी राज्य निर्माण से जुड़े मूल मुद्दों को लेकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।  उत्तराखंड में सियासी शह-मात का खेल  बीजेपी ने 2022 में सत्ता परिवर्तन की रिवायत को तोड़ने में कामयाब रही, जब से उत्तराखंड बना है, 2022 में पहली बार था, जब कोई पार्टी लगातार दूसरी बार चुनाव जीतने में कामयाब रही. इस पर बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाना चाहती है तो कांग्रेस दस साल से चले आ रहे अपने सियासी वनवास खत्म करने की कवायद में है।  उत्तराखंड का चुनाव दो ध्रुवीय रहा है. कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है, लेकिन बसपा से लेकर सपा तक किस्मत आजमाती रही है. इसके अलावा उत्तराखंड राज्य बनवाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष करने वाले उत्तराखंड क्रांति दल भी पूरे दमदारी के साथ चुनावी तैयारी में जुटी है।  क्या रहे थे 2022 के चुनावी समीकरण? आगामी जंग को समझने के लिए पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़ों और सियासी उलटफेरों को देखना बेहद जरूरी है।       सीटें और वोट शेयर: 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 44.33% वोट शेयर के साथ 47 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की थी. वहीं, कांग्रेस 37.91% वोट पाकर महज 19 सीटों पर सिमट गई थी. इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 2 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 2 सीटें मिली थीं।      'आप' का सूपड़ा साफ: आम आदमी पार्टी (AAP) ने कर्नल अजय कोठियाल (जो अब भाजपा में हैं) को सीएम चेहरा बनाकर बहुत जोर-शोर से चुनाव लड़ा था, लेकिन पार्टी का खाता भी नहीं खुला और उसे केवल 3.3% वोटों से संतोष करना पड़ा।      दो बड़े सियासी उलटफेर: 2022 के चुनाव ने दो सबसे बड़े दिग्गजों को धूल चटाई थी. कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को लालकुआं सीट से हार का सामना करना पड़ा. वहीं, भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी अपनी पारंपरिक खटीमा सीट से कांग्रेस के भुवन कापड़ी से चुनाव हार गए थे।      धामी की चंपावत से वापसी: चुनाव हारने के बावजूद भाजपा आलाकमान ने पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताया और उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया. इसके बाद दिवंगत भाजपा नेता कैलाश गहतोड़ी ने चंपावत सीट खाली की, जहां हुए उपचुनाव में धामी ने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की।  मंडलों का गणित: कुमाऊं बनाम गढ़वाल उत्तराखंड की सियासी कुमाऊ और गढवाल में बंटी हुई है. राजनीतिक रूप से दोनों ही क्षेत्र की अपनी सियासी अदावत भी रही है. हालांकि, सत्ता का रास्ता कुमाऊं (29 सीटें) और गढ़वाल (41 सीटें) मंडलों से होकर गुजरता है. पिछले चुनाव में दोनों मंडलों का मिजाज काफी अलग रहा था।  2022 के चुनाव में गढ़वाल मंडल की 41 सीटों में से भाजपा ने 29 और कांग्रेस ने 8 सीटें जीती थीं. इसके अलावा बसपा दो सीटें और दो सीटें निर्दलीय ने जीती थी. कुमाऊं मंडल की 29 सीटों में से बीजेपी ने 18 और कांग्रेस ने 11 सीटें जीती थीं . इस तरह दोनों ही मंडलों पर बीजेपी का दबदबा रहा।  उत्तराखंड विधानसभा की कुल 70 सीटों में से 2022 के चुनाव में भाजपा ने 47 सीटों पर जीत दर्ज कर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी. कांग्रेस 19 सीटों तक सिमट गई थी, जबकि बसपा और निर्दलीय उम्मीदवारों को दो-दो सीटें मिली थीं।  वोट प्रतिशत के लिहाज से भी भाजपा कांग्रेस से आगे रही थी. भाजपा को 44.33 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के खाते में 37.91 प्रतिशत वोट आए थे. वहीं आम आदमी पार्टी, जिसने कर्नल अजय कोठियाल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा था, कोई सीट नहीं जीत सकी और उसका  2022 में भाजपा ने गढ़वाल में एकतरफा प्रदर्शन किया था, जबकि कुमाऊं मंडल में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी. यही वजह है कि इस बार दोनों दलों ने इन मंडलों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।  हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों में रैलियां प्रस्तावित थीं. अल्मोड़ा की रैली में भारी भीड़ भी जुटी, लेकिन खराब मौसम के कारण राहुल गांधी वहां पहुंच नहीं सके. कार्यकर्ताओं की मायूसी को देखते हुए उन्होंने अल्मोड़ा की रैली को फोन के माध्यम से और गढ़वाल की रैली को वर्चुअल माध्यम से संबोधित किया. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल इन दिनों पूरे राज्य का दौरा कर रहे हैं और कार्यकर्ताओं तथा लोगों से सीधे संपर्क में जुटे हैं।  भाजपा का 'मिशन 23' और विकास का रोडमैप मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राज्य के इतिहास में ऐसे पहले भाजपा सीएम बनने जा रहे हैं, जो अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे. भाजपा इस बार 'एंटी-इंकंबेंसी' को मात देने के लिए माइक्रो-लेवल पर काम कर रही है।  हारी हुई सीटों पर महा-मंथन: पार्टी ने 13 से 16 जून तक एक बड़ा अभियान शुरू किया है. इसके तहत भाजपा के लोकसभा सांसद, राज्यसभा सदस्य और कोर ग्रुप के वरिष्ठ नेता उन 23 विधानसभा सीटों पर उतर रहे हैं, जहां पिछले चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था।  ये नेता इन क्षेत्रों में न केवल प्रवास करेंगे बल्कि रात्रि विश्राम भी करेंगे. इसके जरिए पार्टी स्थानीय संगठन की सक्रियता का आकलन करेगी और हार के कारणों को समझेगी. इस तरह बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए अपनी मजबूत सीटों के साथ-साथ कमजोर सीटों पर मशक्कत करने में जुट गई है।  चुनावी मुद्दे और हथियार: भाजपा इस बार बुनियादी ढांचे के विकास, … Read more

PM Kisan 20वीं किस्त अपडेट: ₹2000 ट्रांसफर होने से पहले फटाफट चेक करें अपना नाम और पेमेंट स्टेटस

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 20 जून 2026 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के तारकेश्वर से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM Kisan) योजना की 23वीं किस्त जारी करेंगे. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, शनिवार को 3.45 बजे 23वीं किस्त के तहत 18 हजार 880 करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे 9 करोड़ 44 लाख से ज्यादा किसानों के खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए ट्रांसफर की जाएगी. 23वीं किस्त में 2 करोड़ 18 लाख से अधिक महिला किसानों को लाभ मिलेगा।  सरकार की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक, 23वीं किस्त जारी होने के साथ ही 24 फरवरी 2019 से शुरू हुई इस योजना के तहत कुल वितरण राशि 4 लाख 46 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगी. योजना की 23वीं किस्त में पश्चिम बंगाल में 45 लाख 35 हजार से अधिक लाभार्थियों को 907 करोड़ 21 लाख रुपये से अधिक की राशि दी जाएगी।  बता दें कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना के तहत देश के करोड़ों गरीब किसानों की आर्थिक मदद के लिए हर साल 6,000 रुपये दिए जाते हैं, जो तीन किस्तों में सीधे किसानों के खाते में पहुंचते हैं. इससे पहले 13 मार्च 2026 को पीएम किसान योजना की 22वीं किस्त जारी की गई थी।  इन किसानों की अटक सकती है किस्त PM-KISAN योजना का लाभ लेने के लिए कुछ शर्तें जरूरी हैं. जैसे बिना e-KYC के खातों में पैसा नहीं आएगा. बैंक खाता आधार से लिंक होना जरूरी है. फार्मर आईडी भी होनी चाहिए.वहीं,पीएम किसान योजना का लाभ लेने के लिए जमीन का रिकॉर्ड सही होना चाहिए. अगर सभी जरूरी शर्तें पूरी नहीं होंगी तो पीएम किसान योजना की 23वीं किस्त के पैसे अटक सकते हैं. अगर आप  प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के पात्र हैं, तो आज ही आधिकारिक वेबसाइट pmkisan.gov.in पर जाकर बेनिफिशियरी लिस्ट में अपना स्टेटस चेक कर सकते हैं।  Beneficiary लिस्ट में कैसे चेक करें नाम? सबसे पहले योजना की आधिकारिक वेबसाइट pmkisan.gov.in पर जाएं. जहां आपको ‘Farmers Corner’ सेक्शन में ‘Beneficiary Status’ विकल्प पर क्लिक करना है. इसके बाद आधार नंबर, मोबाइल नंबर या रजिस्ट्रेशन नंबर समेत मांगी गई सभी जानकारी भरने के बाद “Get Report” पर क्लिक करके बेनिफिशियरी लिस्ट में अपना स्टेटस चेक कर सकते हैं।  वहीं, अगर किसी किसान को अपना रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं पता है तो ‘Know Your Registration Number’ ऑप्शन पर क्लिक करके आधार या लिंक मोबाइल नंबर की मदद से इसे जान सकते हैं. फिर कैप्चा कोड और OTP डालकर चेक कर सकते हैं कि बेनिफिशयरी लिस्ट में नाम है या नहीं। 

टेक इंडस्ट्री में AI बना नया पैमाना, इस्तेमाल न करने वाले कर्मचारियों की नौकरी पर बढ़ा जोखिम

 नई दिल्ली क्या आप भी इस मुगालते में हैं कि बिना एआई सीखे आपका काम मजे से चलता रहेगा? अगर हां, तो ग्लोबल सर्वे एजेंसी 'गैलप' की यह ताजा स्टडी आंखें खोलेने के ल‍िए है. टेक इंडस्ट्री में इस समय एआई सिर्फ काम को आसान बनाने का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह आपकी नौकरी बचाने का सबसे बड़ा 'सुरक्षा कवच' बन चुका है।  गैलप के नए शोध के मुताबिक, जो टेक कर्मचारी अपने रोजमर्रा के काम में एआई का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, उनके नौकरी गंवाने (ले ऑफ) का खतरा एआई इस्तेमाल करने वाले साथियों की तुलना में तीन गुना ज्यादा है।  बता दें कि गैलप ने ये अनुमान अमेरिका के 23,000 से अधिक कामकाजी लोगों पर किए गए सर्वे के आधार पर लगाया है. इसमें वो 660 लोग भी शामिल थे जिनकी हाल ही में नौकरी चली गई थी. इसके स्टेटेस्ट‍िक मॉडल से कई बातें निकलकर आईं, जैसे जो टेक कर्मचारी महीने में कम से कम एक बार या उससे अधिक एआई टूल्स का इस्तेमाल करते हैं, उनके छंटनी की संभावना सिर्फ 6 फीसदी पाई गई।  वहीं नॉन-एआई यूजर्स कर्मचारी यानी जो एआई से दूरी बनाकर रखते हैं या बहुत कम इस्तेमाल करते हैं, उनकी नौकरी जाने का रिस्क सीधे 18 फीसदी तक पहुंच जाता है. रिपोर्ट में साफ किया गया है कि टेक इंडस्ट्री से बाहर के सेक्टर्स में भी एआई का इस्तेमाल न करने वाले कर्मचारी छंटनी के काफी करीब हैं, हालांकि वहां रिस्क का यह अंतर टेक सेक्टर जितना बड़ा नहीं है।  कंपनियों की नई 'फॉल्ट लाइन' बना एआई ये स्टडी इशारा करती है कि एआई यानी आर्ट‍िफ‍िश‍ियल इंटेल‍िजेंस अब कंपनियों के भीतर एक ऐसी विभाजक रेखा (फॉल्ट लाइन) बन चुका है, जो सीधे तौर पर लोगों के करियर को प्रभावित कर रहा है. कंपनियां अब न सिर्फ नए उम्मीदवारों को हायर करते समय 'एआई साक्षरता' चेक कर रही हैं, बल्कि मंदी या छंटनी के वक्त यह भी देख रही हैं कि किस कर्मचारी को रोकना है और किसे बाहर का रास्ता दिखाना है।  कर्मचारी कुछ और कह रहे हैं, कंपनियां कुछ और! इस रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू कंपनियों और कर्मचारियों के बीच का वैचारिक अंतर है. छंटनी का शिकार हुए केवल 1 फीसदी कर्मचारियों ने माना कि उनकी नौकरी जाने की सीधी वजह एआई है. अधिकांश ने इसके लिए कंपनियों के पुनर्गठन (Restructuring), कॉस्ट-कटिंग या खराब आर्थिक हालातों को ज़िम्मेदार ठहराया।  इसके उलट, 'चैलेंजर, ग्रे एंड क्रिसमस इंक' के डेटा के मुताबिक, पिछले महीने कंपनियों द्वारा की गई छंटनी की घोषणाओं में एआई सबसे बड़ा कारण था, जो कुल घोषणाओं का लगभग 40 फीसदी था. गैलप के मुख्य वैज्ञानिक जिम हार्टर का मीड‍िया को द‍िया बयान काफी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने कहा कि कर्मचारी अपनी नौकरी जाने के लिए सीधे एआई को दोष नहीं दे रहे हैं, जिससे एआई का वह अप्रत्यक्ष प्रभाव छिप जाता है जो कंपनियां छंटनी का फैसला लेते समय मन में रखती हैं। 

भारत की रक्षा ताकत को नई उड़ान, राजनाथ सिंह बोले- तय समय से पहले हासिल करेंगे उत्पादन और निर्यात लक्ष्य

  नयी दिल्ली  रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि देश रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है और तीन लाख करोड़ रुपए के रक्षा उत्पादन तथा 50,000 करोड़ रुपए के रक्षा निर्यात के लक्ष्यों को समय से पहले हासिल कर लिया जायेगा। सिंह ने नागपुर में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ यंत्र इंडिया लिमिटेड की आयुध निर्माणी अंबाझरी इकाई में अत्याधुनिक 10,000 टन एल्यूमिनियम एक्सट्रूज़न प्रेस के भूमि पूजन के अवसर पर यह बात कही। उन्होंने कहा है कि निगमीकरण के बाद आयुध निर्माणी बोर्ड का उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में 26,282 करोड़ रुपए तक पहुँच गया जो वित्त वर्ष 2019-20 में 12,755 करोड़ रुपए था। निर्यात भी 81 करोड़ से बढ़कर 4,561 करोड़ रुपए पहुंच गया है। उन्होंने कहा , "जो राष्ट्र अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करने में सक्षम होता है, वह अपने हितों की सुरक्षा के लिए सबसे अधिक आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है।" उन्होंने कहा कि यह एक्सट्रूज़न प्रेस देश के दृष्टिकोण में उस परिवर्तन का प्रतीक है, जिसमें आयात पर निर्भर रहने के बजाय महत्वपूर्ण वस्तुओं का घरेलू उत्पादन किया जा रहा है। उन्होंने मौजूदा भू-राजनीतिक परिदृश्य में भविष्य के लिए तैयार रहने के लिए सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं पर नियंत्रण को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित प्रेस देश में अपनी तरह की सबसे उन्नत सुविधाओं में से एक होगी। यह रक्षा प्रणालियों एवं विभिन्न प्लेटफॉर्म, अंतरिक्ष एवं विमानन संरचनाओं, मिसाइल कार्यक्रमों, रेलवे एवं परिवहन क्षेत्रों तथा अन्य रणनीतिक औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए आवश्यक बड़े और जटिल एल्यूमिनियम मिश्रधातु प्रोफाइलों के निर्माण में सहायता करेगी। यह परियोजना महत्वपूर्ण एल्यूमिनियम एक्सट्रूज़न के आयात पर निर्भरता कम करने, घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करने तथा स्वदेशी उत्पादन के माध्यम से रणनीतिक क्षेत्रों की भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होगी। रक्षा मंत्री ने कहा, "यह एक्सट्रूज़न प्रेस एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा करता है। आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइलें और उन्नत अंतरिक्ष कार्यक्रम ऐसे धातुओं की मांग करते हैं जो हल्की होने के साथ-साथ मजबूत भी हों और अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकें। ऐसी धातुएँ विशेष प्रक्रियाओं के माध्यम से तैयार की जाती हैं। यदि धातु की गुणवत्ता श्रेष्ठ होगी, तो वह हर परिस्थिति में प्रभावी सिद्ध होगी।" ऑपरेशन सिंदूर की सफलता में भारत-निर्मित उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए सिंह ने मजबूत हार्डवेयर के स्वदेशी निर्माण को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि बड़ी मशीनों की वास्तविक शक्ति हजारों महत्वपूर्ण अवयवों से मिलकर बनती है और यह एक्सट्रूज़न प्रेस इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देगा। रक्षा मंत्री ने कहा कि आज जबकि युद्ध का स्वरूप बदल रहा है और शत्रुओं की पहचान करना अधिक कठिन हो गया है, फिर भी पारंपरिक युद्ध और उससे जुड़े साधनों की प्रासंगिकता 1947 की तरह आज भी बनी हुई है और 2047 में भी काफी हद तक बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि एक मजबूत सैन्य-औद्योगिक आधार का महत्व लंबे समय तक बना रहेगा और यह एक्सट्रूज़न प्रेस भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में उठाया गया कदम है। रक्षा मंत्री ने कहा कि सरकार प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए प्रौद्योगिकी, कार्यबल, ज्ञान और राष्ट्र के प्रति विश्वास जैसे चार प्रमुख तत्वों पर एक साथ कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि सरकार के निरंतर प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं और 2014 में 46,000 करोड़ रुपये का घरेलू रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ हो गया है। उन्होंने कहा कि 2014 में भारत का रक्षा निर्यात 1,000 करोड़ से भी कम था, जो अब बढ़कर 38,424 करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है। उन्होंने कहा, "यह केवल आँकड़ों में वृद्धि नहीं है, बल्कि भारत की क्षमताओं में वृद्धि का प्रतीक है। यह राष्ट्र के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी को दर्शाता है। हम अगले 2-3 वर्षों के लिए निर्धारित 3 लाख करोड़ रुपए के रक्षा उत्पादन और 50,000 करोड़ रुपए के रक्षा निर्यात के लक्ष्यों को समय से पहले प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।" रक्षा मंत्री ने आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में यंत्र इंडिया लिमिटेड के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि बदलते समय और उभरती प्रौद्योगिकियों को ध्यान में रखते हुए आयुध निर्माणी बोर्ड का निगमीकरण प्रणाली को अधिक मजबूत और चुस्त बनाने के लिए किया गया था और यंत्र इंडिया लिमिटेड उसी परिवर्तन का परिणाम है। उन्होंने कहा, "निगमीकरण के बाद हमारी परिकल्पना थी कि नयी इकाइयों को पर्याप्त परिचालन स्वायत्तता मिले और उन्हें नवाचार, जोखिम उठाने, अनुसंधान तथा निर्यात में उत्कृष्टता प्राप्त करने के अवसर प्राप्त हों। सभी नयी रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयाँ इस दिशा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ी हैं। वित्त वर्ष 2019-20 में निगमीकरण से पहले आयुध निर्माणी बोर्ड का उत्पादन 12,755 करोड़ रुपए था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 26,282 करोड़ रुपए हो गया। रक्षा निर्यात के क्षेत्र में यह आँकड़ा निगमीकरण से पहले मात्र 81 करोड़ रुपए था, जो अब बढ़कर 4,561 करोड़ रुपए हो गया है, जिसमें यंत्र इंडिया लिमिटेड का योगदान 397 करोड़ रुपए है।" सिंह सिंह ने कहा कि प्रतिस्पर्धी दुनिया में "अनुसंधान एवं विकास" तथा "पूंजी निवेश" किसी औद्योगिक इकाई को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख तत्व हैं। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक प्रगति और प्रतिस्पर्धा के लिए अनुसंधान एवं विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है और जो संगठन नवाचार को अपनाते हैं, वही भविष्य का नेतृत्व करते हैं। पूंजी निवेश पर उन्होंने कहा कि नयी मशीनरी की स्थापना या आधुनिक उपकरणों में निवेश एक महत्वपूर्ण तकनीकी जुड़ाव प्रदान करता है। "आधुनिक मशीनरी के माध्यम से नयी प्रौद्योगिकियाँ विनिर्माण प्रणाली का हिस्सा बनती हैं, जिससे उत्पादन प्रक्रियाओं की दक्षता बढ़ती है, गुणवत्ता में सुधार होता है और पूरी प्रणाली अधिक आधुनिक एवं प्रभावी बनती है।" रक्षा मंत्री ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को कुशल मशीनरी स्थापना और आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि नवीनतम प्रौद्योगिकी और उन्नत उत्पादन प्रणालियों में निवेश भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इससे कॉर्पोरेट इकाइयाँ राष्ट्रीय अपेक्षाओं को पूरा कर सकेंगी और वैश्विक मानकों पर … Read more

सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी खुशखबरी, 8वें वेतन आयोग में बेसिक पे ₹51,000 बढ़ने की संभावना

 नई दिल्ली  8वें वेतन आयोग को मेमोरेंडम और सुझाव सौंपने की डेडलाइन बीते 15 जून को खत्म हो चुकी है. इसका मतलब है कि अब कोई नया सुझाव स्वीकार नहीं होगा. ये आठवें वेतन आयोग की प्रक्रिया का पहला प्रमुख चरण था. अब फोकस कर्मचारियों और पेंशनर्श की मांगों को लेकर आयोग द्वारा की जाने वाली सिफारिशों पर है।  कर्मचारी यूनियनों ने जो प्रस्ताव दिए हैं, उनमें उच्च मिनिमम बेसिक पे, DA का बेसिक पे में मर्जर के साथ ही फिटमेंट फैक्टर में संशोधन सबसे ऊपर है. Fitment Factor कर्मचारियों की सैलरी के कैलकुलेशन को एक दम से बदल देता और फिलहाल ये 2.57 लागू है, इसमें छोटा सा भी बदलाव सैलरी में बंपर उछाल ला सकता है. कर्मचारी संगठनों की डिमांड इसे बढ़ाकर 3.83 करने की है. अगर इसमें डिमांड के मुताबिक, बदलाव किया जाता है, तो फिर लगभग 55 लाख केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों और लगभग 69 लाख पेंशनभोगियों को बड़ा फायदा होगा।  Fitment Factor आखिर है क्या? फिटमेंट फैक्टर का कर्मचारियों की सैलरी में बड़ा रोल होता है, यह एक ऐसा आंकड़ा होता है, जिसका यूज केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा किसी कर्मचारी के पूर्व-संशोधित मूल वेतन (या पेंशन) को नए, संशोधित मूल वेतन में बदलने के लिए किया जाता है. इसमें किसी भी तरह का परिवर्तन सीधे सैलरी, पेंशन और संबंधित बकाया राशि को प्रभावित करता है. इसका फॉर्मूला 'New Basic Pay: Current Basic Pay x FF' होता है. फिलहाल, 7th Pay Commission के तहत केंद्रीय कर्मचारियों के लिए 2.57 लागू है, जिसे 3.83 करने की मांग उठ रही है।  अब तक ऐसे बदला फिटमेंट फैक्टर वेतन आयोगों के दौरान महंगाई और अन्य कारकों के चलते अब तक कई बार इसे बदला जा चुका है. छठे वेतन आयोग ने ये आंकड़ा 1.86 रखा गया था, जिसे 7वां वेतन आयोग लागू किए जाने के साथ 2.57 कर दिया गया था और इसका असर ये देखने को मिला कि छठे वेतन आयोग के दौरान जो न्यूनतम बेसिक सैलरी 7,000 रुपये थी, वो एक झटके में उछलकर 18,000 रुपये हो गया।  सरकार ने मांगी डिमांड, तो इतना सैलरी हाइक हालांकि, सरकार को तय करना है कि फिटमेंट फैक्टर कितना किया जाएगा, सरकार 3.83 को स्वीकार नहीं करती है तो कौन सा दूसरा रास्ता निकालती है? अगर ये डिमांड मान ली जाती है, तो फिर न्यूनतम बेसिक पे 68,940 रुपये हो जाएगा. यानी 18000 रुपये मिनिमम पे वालों को करीब 51000 रुपये की बढ़ोतरी मिलेगी।  लेकिन जरूरी नहीं फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाकर डिमांड के मुताबिक ही कर दिया जाए. 8वें वेतन आयोग के तहत अलग चयन भी हो सकता है, जैसे इसे 2.57, 3.0, 3.5 भी किया जा सकता है. ऐसे में अलग-अलग संभावनाओं के आधार पर Basic Salary Hike की गणना करें, तो 18000 रुपये न्यूनतम सैलरी…      फिटमेंट फैक्टर 3.0: ₹54,000     फिटमेंट फैक्टर 3.5: ₹63,000     फिटमेंट फैक्टर 3.83: ₹68,940 अब जिस कर्मचारी का वर्तमान बेसिक-पे 44,900 रुपये है, उसके लिए…     फिटमेंट फैक्टर 3.0: ₹1,34,700     फिटमेंट फैक्टर 3.5: ₹1,57,150     फिटमेंट फैक्टर 3.83: ₹1,71,967       हालांकि, ये आंकड़े सिर्फ उदाहरण के लिए हैं कि आखिर कैसे फिटमेंट फैक्टर सैलरी हाइक में बड़ा रोल निभाता है. इसे लेकर वास्तविक वेतन संशोधन आयोग की अंतिम सिफारिशों और सरकार की मंजूरी पर निर्भर करेगा। 

मौसम का कहर या आने वाली बड़ी चेतावनी? ग्लेशियर पिघलने से लेकर बाढ़ तक, क्यों बढ़ रही चिंता

 नई दिल्ली जलवायु परिवर्तन का सबसे क्रूर और भयानक चेहरा अब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अधिक आबादी वाले महाद्वीप यानी एशिया के सामने आ चुका है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा रिपोर्ट – स्टेट ऑफ द क्लाइमेट इन एशिया 2025- ने वैश्विक पर्यावरण वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के पैरों तले जमीन खिसका दी है. 17 जून 2026 को सार्वजनिक की गई इस वैज्ञानिक रिपोर्ट में यह खौफनाक खुलासा हुआ है कि एशिया महाद्वीप में तापमान बढ़ने की रफ्तार वैश्विक औसत से कहीं अधिक तेज हो चुकी है।  सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि साल 1991 से 2025 के बीच एशिया में तापमान वृद्धि की दर, वर्ष 1961-1990 की अवधि की तुलना में लगभग दोगुनी दर्ज की गई है. इस बेकाबू होती तपिश के कारण ही पिछला साल यानी 2025 एशिया के इतिहास का दूसरा सबसे गर्म साल साबित हुआ।  यह रिपोर्ट सिर्फ मौसमी आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक ऐसी गंभीर चेतावनी है जो यह साबित करती है कि जलवायु संकट अब किसी दूर के भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि भारत, चीन, जापान और पाकिस्तान सहित पूरे एशिया की वर्तमान और सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है।  एशिया में तापमान वृद्धि की तेज रफ्तार पिछले कुछ दशकों में एशिया दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल हो गया है जहां जलवायु परिवर्तन का सबसे तेज असर दिख रहा है.रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि वैश्विक औसत की तुलना में एशिया का तापमान कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. 1991-2025 की अवधि में तापमान वृद्धि की दर पिछले लंबे समय की तुलना में दोगुनी दर्ज की गई।  2025 में यह प्रभाव साफ दिखा. जापान, चीन और दक्षिण कोरिया ने अपने रिकॉर्ड की सबसे गर्म गर्मियां देखीं. मध्य और पश्चिम एशिया में कई महीनों तक लू का कहर जारी रहा. कजाकिस्तान में कुछ महीनों में तापमान सामान्य से 14 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा, जबकि बहरीन में लगातार 10 दिन 40 डिग्री से ऊपर तापमान दर्ज किया गया।  गर्मी और सूखे ने दक्षिण कोरिया में अब तक की सबसे बड़ी जंगल की आग को जन्म दिया. भारत में भी कई राज्यों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ीं और फसलों को नुकसान पहुंचा।  कहीं भारी बारिश और बाढ़, कहीं सूखा और जल संकट 2025 में एशिया के मौसम ने चरम रूप दिखाया. एक तरफ दक्षिण एशिया में असामान्य भारी मानसूनी बारिश हुई, तो दूसरी तरफ पश्चिम और मध्य एशिया सूखे की चपेट में रहे. पाकिस्तान में बाढ़ ने 1000 से ज्यादा लोगों की जान ली और 30 लाख से अधिक लोगों को विस्थापित कर दिया. वियतनाम में बाढ़ से 200 से ज्यादा मौतें हुईं और करीब 1.9 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ।  चक्रवात सेन्यार ने थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया में भारी तबाही मचाई. वहीं ईरान समेत कई देशों में लंबे सूखे और जल संकट ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दीं. अप्रैल 2025 में पश्चिम एशिया में आए धूल-रेत के तूफानों ने परिवहन, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया।  भारत में भी कुछ राज्यों में भारी बारिश से बाढ़ आई, जबकि कई हिस्सों में बारिश की कमी से सूखे जैसे हालात बने. यह स्थिति दिखाती है कि जलवायु परिवर्तन अब एक साथ सूखा और बाढ़ दोनों का खतरा बढ़ा रहा है।  हिमालय और तिब्बत के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं रिपोर्ट का सबसे अलार्मिंग हिस्सा हिमालयी और तिब्बती क्षेत्र से आया है. तिब्बती पठार दुनिया का तीसरा ध्रुव माना जाता है क्योंकि यहां ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद सबसे ज्यादा बर्फ है. लेकिन अब यह बर्फ तेजी से पिघल रही है. अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच 23 ग्लेशियरों में से सभी ने बर्फ खोई।  तियानशान और पामीर पर्वतों में बर्फ की भारी कमी दर्ज की गई. इससे न सिर्फ भविष्य में पानी की उपलब्धता पर असर पड़ेगा, बल्कि ग्लेशियर झील फटने (GLOF) जैसी आपदाओं का खतरा भी बढ़ गया है. भारत, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए यह बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि हिमालयी नदियां इन ग्लेशियरों पर निर्भर हैं. गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों का भविष्य इन ग्लेशियरों से जुड़ा हुआ है।  अब क्या करना चाहिए? डब्ल्यूएमओ की महासचिव प्रोफेसर सेलेस्टे साउलो ने स्पष्ट कहा है कि बढ़ते तापमान, गर्म महासागर, समुद्र स्तर वृद्धि और पिघलते ग्लेशियर एशिया के लिए गंभीर खतरा हैं. हमें तुरंत तीन काम करने होंगे- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां मजबूत करना और जलवायु अनुकूलन के उपाय तेज करना।   भारत को सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन पर और ज्यादा निवेश करना चाहिए. शहरों में हरे-भरे क्षेत्र बढ़ाने, वर्षा जल संचयन, सूखा प्रतिरोधी फसलें विकसित करने और तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव संरक्षण जैसे कदम उठाने होंगे. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी मदद मिलनी चाहिए।  समय अब कार्रवाई का है डब्ल्यूएमओ की 2025 रिपोर्ट सिर्फ पिछले साल का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि भविष्य की चेतावनी है. एशिया जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े मोर्चे पर खड़ा है. गर्मी, बाढ़, सूखा, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ता समुद्र स्तर हर दिन हमें याद दिला रहे हैं कि अब इंतजार करने का समय नहीं रहा।  भारत समेत पूरे एशिया को मिलकर काम करना होगा. अगर आज सही कदम उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित रहेंगी, वरना नुकसान बहुत भयानक होगा. जलवायु संकट अब कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है. समय रहते जागना और ठोस कार्रवाई करना ही एकमात्र रास्ता है।  महासागरों का बढ़ता खतरा एशिया के आसपास के महासागर भी खतरे की घंटी बजा रहे हैं. 2025 में समुद्री गर्मी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. जुलाई से सितंबर के दौरान एक करोड़ वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में समुद्री लू देखी गई, जो चीन या अमेरिका जितना बड़ा क्षेत्र है।  उत्तरी हिंद महासागर में समुद्र स्तर वैश्विक औसत से तेजी से बढ़ रहा है. भारत के तटों पर यह दर 4.9 मिलीमीटर प्रति वर्ष है, जबकि वैश्विक औसत 3.6 मिलीमीटर है. समुद्र में एसिडिफिकेशन भी बढ़ रहा है, जिससे मछली पालन, कोरल रीफ और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में हैं. गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों के तटीय इलाकों के लिए यह गंभीर खतरा है।  प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की … Read more

Telegram Ban Case: अदालत ने खींची रेड लाइन, जरूरत पड़ने पर सरकार लगा सकती है स्थायी प्रतिबंध

नई दिल्ली दिल्ली हाई कोर्ट ने टेलीग्राम पर बैन हटाने से इनकार कर दिया है. भारत सरकार ने टेलीग्राम पर RE-NEET एग्जाम के चलते अस्थाई बैन लगाने का फैसला लिया था, जिसको टेलीग्राम ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।  दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि सरकारी के पास पावर है. कोर्ट ने कहा है कि आईटी एक्ट सरकार को पूरे प्लेटफॉर्म/ऐप पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है. सरकार के पास यह आदेश जारी करने की शक्ति थी.हाई कोर्ट के इस फैसले के मायने उन सभी मैसेजिंग ऐप के लिए हैं, जो भारत में काम करते हैं।  हाई कोर्ट के फैसले से समझ आता है कि भारत में काम करने वाले सोशल मीडिया या मैसेजिंग ऐप के प्लेटफॉर्म को भारतीय कानून के बाहर नहीं रखा जा सकता है और उन्हें भारतीय संविधान के तहत काम करना होगा।  21 जून को भारत में NEET एग्जाम भारत में 21 जून को भारत में NEET 2026 का एग्जाम दोबारा होने जा रहा है, जिसके चलते भारत सरकार ने सावधानी के तौर पर टेलीग्राम पर अस्थाई प्रतिबंध लगाया था. इसके बाद टेलीग्राम ने सरकार के फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया और बैन हटाने से इनकार कर दिया है।  टेलीग्राम पर लगते रहे हैं गंभीर आरोप  टेलीग्राम पर अक्सर पेपर लीक और फेक पेपर सर्कुलेट होने के आरोप लगते रहे हैं. दिल्ली हाई कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल ने दलील देते हुए बताया गया है कि टेलीग्राम प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कई आतंकवादी गतिविधी में भी हुआ है. ये ऐसा प्लेटफॉर्म है, जिसको कई लोग गैर कानूनी सामान बेचने आदि में भी इस्तेमाल करते हैं।  टेलीग्राम पर ढेरों फीचर्स ऐसे हैं, जिसकी वजह से इसपर अस्थाई बैन लगाने का फैसला लिया गया है. इसपर बिना फोन नंबर के भी अकाउंट तैयार किया जा सकता है. साथ ही एक वर्चुअल ग्रुप में मैक्सिमम 2 लाख तक लोगों को शामिल किया जा सकता है।  व्हाट्सऐप भी जा चुका है कोर्ट  भारत में यह कोई पहला सोशल मीडिया ऐप नहीं है, जो भारतीय न्यायपालिका गया है. इससे पहले मेटा भी वॉट्सऐप पर लगाए गए एक पैनल्टी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा चुका है. साल 2024 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा व्हाट्सऐप पर 213 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। 

ब्रिटेन में बदले राजनीतिक समीकरण, ‘किंग ऑफ द नॉर्थ’ की जीत के बाद किएर स्टार्मर पर बढ़ा दबाव

लंदन  ब्रिटेन की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं. लेबर पार्टी के दिग्गज नेता और ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहैम ने संसदीय उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज की है, जिसके बाद प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर की कुर्सी पर खतरा और बढ़ गया है. उन्हें "किंग ऑफ द नॉर्थ" कहा जाता है।  उत्तरी इंग्लैंड के मेकरफील्ड सीट पर हुए चुनाव में बर्नहम ने 54.8 फीसदी वोट हासिल किए. उन्होंने निगेल फराज की पार्टी रिफॉर्म यूके के उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया, जिसे 34.5 फीसदी वोट मिले. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत सिर्फ एक सीट की जीत नहीं, बल्कि लेबर पार्टी के अंदर नेतृत्व परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है।  अपनी जीत के बाद बर्नहैम ने इसे "टर्निंग पॉइंट" यानी एक निर्णायक मोड़ बताया. उन्होंने कहा कि देश को ऐसी राजनीति से बचाना होगा जो समाज को बांटती है. बर्नहैम ने संकेत दिया कि वह देश को अमेरिका जैसी पोलराइज्ड राजनीति की दिशा में नहीं जाने देना चाहते।  अगर नेतृत्व का होगा चुनाव तो बर्नहैम हो सकते हैं उम्मीदवार 56 वर्षीय बर्नहैम लंबे समय से लेबर पार्टी के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं. वह सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण के आलोचक रहे हैं और कई बार खुलकर कह चुके हैं कि पिछले चार दशकों की आर्थिक नीतियां आम लोगों के लिए सफल नहीं रही हैं. उन्होंने पहले ही साफ कर दिया है कि अगर पार्टी नेतृत्व के लिए चुनाव होता है तो वह उम्मीदवार बनने को तैयार हैं।  दूसरी तरफ, किएर स्टार्मर की लोकप्रियता लगातार गिर रही है. दो साल पहले भारी बहुमत से चुनाव जीतने वाले स्टार्मर आज ब्रिटेन के सबसे अलोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में गिने जा रहे हैं. कई विवादों, नीतियों में बार-बार बदलाव और फैसलों में देरी के आरोपों ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया है. सांसदों ने किएर स्टार्मर से मांगा इस्तीफा पिछले महीने हुए स्थानीय चुनावों में लेबर पार्टी को बड़ा झटका लगा था. इसके बाद पार्टी के करीब एक चौथाई सांसदों ने स्टार्मर से पद छोड़ने की मांग की थी. रक्षा और स्वास्थ्य मंत्री समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने भी उनके नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए इस्तीफा दे दिया।  हालांकि, स्टार्मर अभी पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे. उन्होंने साफ कहा है कि वह किसी भी नेतृत्व चुनाव का सामना करेंगे और पार्टी को आंतरिक लड़ाई से बचना चाहिए. लेकिन बर्नहैम की जीत के बाद उनके लिए दबाव और बढ़ गया है।  अगर नेतृत्व परिवर्तन होता है तो पिछले एक दशक में ब्रिटेन को सातवां प्रधानमंत्री मिल सकता है. इतनी तेजी से नेतृत्व बदलना ब्रिटिश राजनीति में अस्थिरता का संकेत माना जा रहा है। 

डिजिटलीकरण, क्षमता विस्तार और सुस्थिर खनन पहलों की समीक्षा की

हैदराबाद  एनएमडीसी के वरिष्ठ प्रबंधन ने दोणिमलै कॉम्प्लेक्स की हाल ही में हुई एक यात्रा के दौरान परिचालन दक्षता को मजबूत करने, जिम्मेदार खनन प्रथाओं को बढ़ावा देने और कर्मचारियों तथा आसपास के समुदायों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के उद्देश्य से कई रणनीतिक पहलों की समीक्षा की । इस दौरे से प्रमुख परियोजनाओं की प्रगति का आकलन करने का अवसर मिला, जो दोणिमलै को भविष्य के लिए तैयार खनन परिसर में बदलने में मदद कर रही हैं । साथ ही, एनएमडीसी को भारत के सबसे बड़े और जिम्मेदार लौह अयस्क उत्पादक के रूप में सुस्थापित करती है । इस यात्रा के दौरान प्रबंधन ने कुमारस्वामी खदान से 10 एमटीपीए और दोणिमलै परिसर से 17 एमटीपीए के उत्पादन लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से चल रही क्षमता-विस्तार और बुनियादी ढांचे के विकास की पहलों की समीक्षा की । इन पहलों से एनएमडीसी के 100 एमटीपीए खनन कंपनी बनने के विजन में महत्वपूर्ण योगदान मिलने की उम्मीद है । प्रबंधन ने 35% तक Fe युक्त लौह अयस्क, लौह अयस्क स्लाइम्स और निम्न श्रेणी के लौह-युक्त पदार्थों जैसे बैंडेड हेमेटाइट जैस्पर (बीएचजे) और बैंडेड हेमेटाइट क्वार्ट्जाइट (बीएचक्यू) के उपयोग के लिए पहलों की भी समीक्षा की । परंपरागत रूप से, इन संसाधनों का सीमित उपयोग किया जाता था और मूल्यवान लौह सामग्री होने के बावजूद इन्हें अपशिष्ट के रूप में माना जाता था । लाभकारी और वैज्ञानिक खनिज प्रसंस्करण के माध्यम से, एनएमडीसी इन कम उपयोग किए गए संसाधनों को मूल्यवान कच्चे माल में बदल रहा है, मौजूदा खदानों से अधिक लौह अयस्क को पुनः प्राप्त कर रहा है, जबकि अपशिष्ट उत्पादन को कम कर रहा है । यह पहल खनन की सुस्थिर प्रथाओं का समर्थन करती है, खनिज संरक्षण में सुधार करती है, खनन कार्यों के पर्यावरणीय पदचिह्न को कम करती है और भारत के इस्पात क्षेत्र की कच्ची सामग्री की बढ़ती आवश्यकताओं में योगदान करती है । कुमारस्वामी खदान में नई लागू की गई स्वचालित गेट प्रबंधन प्रणाली दौरे के दौरान समीक्षा का एक अन्य महत्वपूर्ण बिन्दु था । डिजिटल प्रणाली ने रियल टाइम निगरानी और सामग्री की आवाजाही के सत्यापन को सक्षम बनाकर लौह अयस्क प्रेषण में पारदर्शिता और दक्षता को मजबूत बनाया  है । यह पहल यह सुनिश्चित करने में मदद करती है कि खनिज संसाधनों को उनके इच्छित गंतव्यों तक सुरक्षित रूप से पहुँचाया जाए, साथ ही मैनुअल हस्तक्षेप को कम किया जाए और परिचालन संबंधी निगरानी में सुधार लाया जाए । एनएमडीसी के सीएमडी श्री अमिताभ मुखर्जी ने कार्यपालक निदेशकों के साथ मिलकर हाल ही में विकसित बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का उद्घाटन किया, जिनमें हाई-राइज टावर शामिल हैं, जो कर्मचारी कल्याण और सामुदायिक विकास के प्रति एनएमडीसी की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता  है । भारत के सबसे बड़े लौह अयस्क उत्पादक के रूप में, एनएमडीसी का मानना है कि सतत विकास उत्पादन लक्ष्यों से परे होता है और इसमें कर्मचारियों के लिए बेहतर जीवन-स्तर बनाना, स्थानीय समुदायों का समर्थन करना और पर्यावरण प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित रखना शामिल है । इस अवसर पर बोलते हुए, एनएमडीसी के सीएमडी श्री अमिताभ मुखर्जी ने कहा, "हमारा दृष्टिकोण ऐसे खनन संचालन का निर्माण करना है, जिस पर भावी पीढ़िया गर्व कर सकें । भारत के सबसे बड़े लौह अयस्क उत्पादक के रूप में, हम दोणिमलै को एक मॉडल खनन परिसर बनाने की आकांक्षा रखते हैं, जो जिम्मेदार खनन, नवाचार और कर्मचारी कल्याण के उच्चतम मानकों को दर्शाता है । जैसे-जैसे एनएमडीसी अपने 100 एमटीपीए विजन की ओर बढ़ रहा है, हम भारत के इस्पात उद्योग को उच्च-गुणवत्ता वाले लौह अयस्क की आपूर्ति करने के लिए प्रतिबद्ध हैं । साथ ही, हम प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से हर संसाधन के मूल्य को अधिकतम करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, यहां तक कि निम्न श्रेणी के अयस्क को उत्पादक परिसंपत्तियों में बदल रहे हैं, साथ ही सुस्थिर और जिम्मेदार खनन प्रथाओं को बढ़ावा दे रहे    हैं ।

जेनेवा में भारत ने पाकिस्तान और OIC को घेरा, UNHRC में PoK पर दिया करारा जवाब

 जेनेवा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 62वें सत्र में भारत ने पाकिस्तान और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) द्वारा जम्मू-कश्मीर को लेकर की गई टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई है. भारत ने पाकिस्तान के सभी आरोपों को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान का ये प्रोपेगैंडा उसकी अपनी घरेलू नाकामियों और आतंकवाद को दिए जा रहे समर्थन को छिपाने की एक सोची-समझी साजिश है।  दरअसल, पाकिस्तान ने UNHRC में कश्मीर में कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठाया और जम्मू-कश्मीर को लेकर आपत्तिजनक दावे किए थे।  इसके जवाब में UN में भारत की स्थायी मिशन की फर्स्ट सेक्रेटरी अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) द्वारा किए गए दावों पलटवार करते हुए कहा, 'भारत को पाकिस्तान और OIC द्वारा हमारे खिलाफ दिए गए बयानों का जवाब देने के लिए मजबूर होना पड़ा है. हम पाकिस्तान के बेबुनियाद और दुर्भावनापूर्ण आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हैं और हम OIC द्वारा जम्मू-कश्मीर के संदर्भ को भी पूरी तरह खारिज करते हैं।  OIC के कोऑर्डिनेटर पद का गलत इस्तेमाल अनुपमा सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि पाकिस्तान द्वारा OIC कोऑर्डिनेटर की भूमिका का गलत इस्तेमाल केवल उसके इस धोखे को और पुख्ता करता है. भारत की ऐसे किसी भी प्रोपेगैंडा को कोई अहमियत देने की इच्छा नहीं है. जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा. एकमात्र अनसुलझा मुद्दा पाकिस्तान के कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों की वापसी है।  उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का ये झूठा प्रचार उसके अवैध कब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर में चल रहे दमन की कड़वी सच्चाई को दुनिया के सामने आने से कभी नहीं छिपा सकता।  भारत ने मानवाधिकार परिषद के सामने पाकिस्तान के कब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर की दयनीय स्थिति को मजबूती से रखा. अनुपमा सिंह ने कहा कि रावलकोट में चल रही त्रासदी, सैकड़ों निर्दोष नागरिकों की हत्या और वहां की गई बेरहम कार्रवाई उस सिस्टम का नतीजा है जो जबरदस्ती के अवैध कब्जे पर बना है. दशकों से सेना के कब्ज़े, डेमोग्राफिक इंजीनियरिंग और बुनियादी आजादी से इनकार के कारण वहां के हालात बदतर हो चुके हैं।  'अधिकारों का मांग वालों पर चलाई गोलियां' काउंसिल में बात रखते हुए भारतीय राजनयिक ने कहा कि वहां हालात ऐसे मोड़ पर आ गए हैं, जहां आम जनता द्वारा रोटी, बिजली, अधिकारों और सम्मान की मांग का जवाब गोलियों और बेरहमी से दिया जाता है. एक अवैध और गैर-कानूनी कब्जा सिर्फ ताकत के दम पर ही कायम रखा जा सकता है. उन्होंने पाकिस्तान को एक 'फ्रेंकस्टीन स्टेट' का जीता-जागता उदाहरण बताया जो अपने ही बनाए आतंकवाद से परेशान है।  Pak ने आतंकवाद को बनाया सरकारी नीति अनुपमा सिंह ने कहा कि ये वही देश है, जिसके मौजूदा रक्षा मंत्री आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने और उन्हें तैनात करने की डींगें मारते हैं जो वहां की एक सरकारी नीति है. इसके बावजूद पाकिस्तान खुद को आतंकवाद का शिकार बताता है, जो एक बड़ा विरोधाभास है।  सिंधु जल संधि पर भारत का रुख इसके साथ ही उन्होंने सिंधु जल संधि को पुरानी बताते हुए कहा कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला देश सद्भावना और दोस्ती पर आधारित सहयोग की उम्मीद नहीं कर सकता।  जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर, टेक्नोलॉजी में तरक्की और टिकाऊ स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती जरूरत के कारण 1960 में हुई इस संधि की प्रासंगिकता पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है. अंत में भारत ने पाकिस्तान को कड़ी नसीहत देते हुए कहा कि भारतीय इलाकों पर नजर रखने के बजाय, पाकिस्तान के लिए बेहतर होगा कि वह अपने घर को ठीक करे, क्योंकि इस काउंसिल में उसके दिखावे का आकर्षण खत्म हो चुका है।