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पहली बार 12 परमाणु हथियार तैनात करने की रिपोर्ट से PAK में खलबली, सामने आया बड़ा रिएक्शन

नई दिल्ली दक्षिण एशिया में रणनीतिक संतुलन और सैन्य ताकत को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आई है. वैश्विक हथियारों की निगरानी करने वाली संस्था 'स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट' (SIPRI) की ताजा रिपोर्ट के बाद पूरे पाकिस्तान में हड़कंप मच गया है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने इतिहास में पहली बार अपने परमाणु हथियारों को केवल स्टॉकपाइलमें रखने के बजाय सीधे तौर पर ऑपरेशनल मोड में तैनात कर दिया है।  इस खुलासे के तुरंत बाद पाकिस्तान सरकार और वहां के विदेश मंत्रालय की तरफ से बेहद डरा हुआ बयान सामने आया है, जिसमें इस्लामाबाद ने खुले तौर पर माना है कि भारत की परमाणु ताकत अंतरराष्ट्रीय अनुमानों से कहीं ज्यादा बड़ी और घातक हो सकती है।  भारत की परमाणु ट्रायड और 'कैनिस्टराइजेशन' तकनीक से सहमा इस्लामाबाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि वे नई दिल्ली की तेजी से बढ़ती रणनीतिक क्षमताओं और बदलते परमाणु रुख पर बहुत बारीक नजर रख रहे हैं. पाकिस्तान ने विशेष रूप से भारत की मिसाइल प्रणालियों के कैनिस्टराइजेशन को लेकर गहरी चिंता जताई है।  कैनिस्टराइजेशन ऐसी अत्याधुनिक तकनीक है जिसमें परमाणु वॉरहेड को पहले से ही मिसाइल के अंदर सील करके रखा जाता है, जिससे युद्ध की स्थिति में मिसाइल को बहुत कम समय में और बेहद तेजी से दागा जा सकता है।  पाकिस्तान ने भारत की परमाणु-सक्षम पनडुब्बियों के जरिए समुद्र आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के विस्तार और लंबी दूरी की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) प्रणालियों के विकास को अपनी सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बताया है।  पहली बार 'डिप्लॉयड' मोड में आए भारतीय न्यूक्लियर वॉरहेड रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पास वर्तमान में लगभग 190 परमाणु वॉरहेड मौजूद हैं. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने वाली बात यह है कि इन 190 वॉरहेड्स में से 12 को 'ऑपरेशनल रूप से तैनात' श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है. यह पहली बार है जब किसी वैश्विक रक्षा एजेंसी ने भारत के परमाणु हथियारों के एक हिस्से को केवल भंडार के रूप में न देखकर, पूरी तरह से सक्रिय सैन्य तैनाती के रूप में दर्ज किया है।  पाकिस्तान ने इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया है कि जमीन, हवा और समुद्र तीनों मोर्चों से परमाणु हमला करने की भारत की क्षमता अब पूरी तरह परिपक्व और सुरक्षित हो चुकी है, जो किसी भी संकट के समय भारत की 'ऑपरेशनल रेडीनेस' यानी युद्ध की तैयारियों को कई गुना बढ़ा देती है।  अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गिड़गिड़ाया पाकिस्तान, कहा- वैश्विक शक्तियां ध्यान दें भारत की इस बढ़ती सैन्य और परमाणु ताकत से घबराए पाकिस्तान ने अब दुनिया के अमीर और ताकतवर देशों से गुहार लगानी शुरू कर दी है. पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से भारत को उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियां और आधुनिक हथियार सप्लाई करने वाले देशों से अपील की है कि वे इस पर तुरंत रोक लगाएं।  इस्लामाबाद का तर्क है कि भारत की यह आधुनिक होती सैन्य शक्ति दक्षिण एशिया में रणनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय सुरक्षा के संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगी. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का यह बयान उसकी अपनी आंतरिक कमजोरियों और भारत के मुकाबले रक्षा बजट में लगातार पिछड़ने की हताशा को दर्शाता है, क्योंकि भारत लगातार 'नो फर्स्ट यूज' की नीति पर कायम रहते हुए अपनी संप्रभुता को मजबूत कर रहा है। 

इंग्लैंड, आयरलैंड और जर्मनी में प्रवासी विरोधी माहौल, विदेश जाने की सोच रहे भारतीयों के लिए कितनी चिंता?

लंदन  कभी बेहतर पढ़ाई, अच्छी नौकरी और सुरक्षित भविष्य के सपने लेकर यूरोप जाने वाले प्रवासियों के लिए अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा. ब्रिटेन, आयरलैंड, जर्मनी, नीदरलैंड और कई दूसरे यूरोपीय देशों में पिछले कुछ सालों से प्रवासियों को लेकर बहस तेज होती जा रही है. ताजा हालात ये हैं कि कहीं सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, कहीं सरकारें वीजा नियम सख्त कर रही हैं और कहीं स्थानीय लोग अपने शहरों में बढ़ती आबादी और संसाधनों पर दबाव को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं।  ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यूरोप में प्रवासियों के खिलाफ यह गुस्सा क्यों बढ़ रहा है? क्या भारतीय भी इसके निशाने पर हैं? और अगर हां, तो फिर इस माहौल का भारतीय छात्रों, कामगारों और परिवारों पर क्या असर पड़ सकता है? इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें कुछ साल पीछे जाना होगा।  साल 2015 में सीरिया, अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया के कई हिस्सों में युद्ध और अस्थिरता की वजह से लाखों लोग यूरोप की ओर बढ़े. जर्मनी समेत कई देशों ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को स्वीकार किया. उस समय इसे मानवीय कदम माना गया. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतते गए, कई देशों में लोगों को लगने लगा कि स्कूलों, अस्पतालों, मकानों और सरकारी सेवाओं पर दबाव बढ़ रहा है।  बेहतर भविष्य और अच्छी नौकरी के लिए भारतीय भी बड़ी संख्या में यूरोप जाने लगे. शिक्षा से लेकर रहन-सहन, साफ हवा और परिवार के लिए बेहतर माहौल की तलाश में भारतीयों ने यूरोपीय देशों को चुना. इसी दौरान यूक्रेन युद्ध की वजह से भी लाखों लोग अन्य यूरोपीय देश पहुंचे. यहीं से प्रवास और शरणार्थियों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई।  ब्रिटेन में क्यों भड़का लोगों का गुस्सा? ब्रिटेन में पिछले कुछ वर्षों से प्रवासी एक बड़ा मुद्दा रहा है. यहां कहावत है कि लोग इंग्लिश चैनल पार करके छोटी नावों से आते हैं और संसाधनों पर कब्जा कर लेते हैं. जंगों और स्थानीय प्रताड़ना की वजह से जब लोग ब्रिटेन पुहंचते हैं और सरकार उन्हें स्वीकार करती हैं तो उनके रहने-सहने के लिए सरकारी इंतजाम भी किए जाते हैं।  कहा जाता है कि सरकार इन लोगों को अस्थायी रूप से होटलों में ठहराती है. कई शहरों और कस्बों में स्थानीय लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. उनका कहना था कि उनके इलाके में पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं, स्कूलों और आवास की कमी है. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर कई बार ऐसी खबरें और अफवाहें भी फैलती रही हैं, जिनसे तनाव बढ़ा. कुछ जगहों पर विरोध प्रदर्शन हिंसक भी हुए।  कई मामलों में पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा. हालांकि, इन प्रदर्शनों का मुख्य मुद्दा शरणार्थी नीति और अवैध प्रवास था, लेकिन माहौल ऐसा बना कि कई प्रवासी समुदायों को असुरक्षा महसूस होने लगी है।  आयरलैंड में क्या हुआ, प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? कुछ साल पहले तक आयरलैंड को प्रवासियों के प्रति आमतौर पर एक उदार देश माना जाता था. लेकिन हाल के वर्षों में वहां भी हालात बदलने लगे हैं. डबलिन और दूसरे शहरों में मकानों की भारी कमी है. किराए आसमान छू रहे हैं. स्थानीय लोगों का एक वर्ग मानता है कि बड़ी संख्या में नए लोगों के आने से दबाव और बढ़ा है. 2023 के आखिर में डबलिन में हुई हिंसा के बाद प्रवास और सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है. इसके बाद कई जगहों पर शरणार्थी केंद्रों और आवास योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन देखने को मिले. ताजा हालात ये हैं कि शहर-शहर में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं।  ताजा मामला उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में एक सूडानी शरणार्थी से जुड़ी चाकूबाजी से जुड़ा है, जिससे हालात तनावपूर्ण हो गए. घटना के विरोध में भड़की हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं. हालात को काबू में करने के लिए एंटी-राइट पुलिस, स्पेशल फोर्सेज और वॉटर कैनन की तैनाती की गई. प्रदर्शनकारियों पर ईंटें फेंकने और वाहनों में आग लगाने के आरोप हैं, जिसके बाद कई इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।  स्थानीय मीडिया की मानें तो कुछ दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े उपद्रवियों ने प्रवासियों और जातीय अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए कई इलाकों में घर-घर जाकर डराने-धमकाने की कोशिश भी की. इस दौरान कुछ मकानों और कारोबारों पर हमले किए गए और प्रदर्शनकारियों ने कई संपत्तियों को नुकसान भी पहुंचाया।  जर्मनी में प्रवासियों और शरणार्थिों पर बहस तेज जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. यहां लाखों विदेशी काम करते हैं. भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और इंजीनियरों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. लेकिन जर्मनी में भी प्रवास को लेकर राजनीतिक माहौल बदल रहा है. कुछ राजनीतिक दलों का कहना है कि देश को अपनी सीमाओं और शरणार्थी व्यवस्था पर ज्यादा नियंत्रण की जरूरत है।  दूसरी तरफ लाखों लोग ऐसे भी हैं जो प्रवासियों के समर्थन में सड़कों पर उतरते हैं. यानी जर्मनी में लड़ाई सिर्फ प्रवासियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि समाज दो अलग-अलग विचारधाराओं में बंटा हुआ नजर आ रहा है।  नीदरलैंड और दूसरे देशों में क्या तस्वीर है? यूरोप के अन्य देशों में भी प्रवास को लेकर बहस तेज हुई है. कहीं मुद्दा मकानों की कमी है, कहीं सुरक्षा को लेकर चिंता है, तो कहीं सरकारों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे सीमाओं को नियंत्रित नहीं कर पा रहीं. इटली लंबे समय से भूमध्य सागर के रास्ते आने वाले प्रवासियों का मुख्य प्रवेश द्वार रहा है. वहीं फ्रांस में भी समय-समय पर प्रवास और राष्ट्रीय पहचान को लेकर प्रदर्शन देखे जाते हैं. यानी हर देश की अपनी कहानी है, लेकिन लगभग हर जगह कुछ समान कारण दिखाई देते हैं।  दक्षिणी यूरोप के कई हिस्सों में इस समय बड़े पैमाने पर पर्यटन के खिलाफ भी विरोध बढ़ रहा है. नीदरलैंड, बेल्जियम, स्वीडन, फ्रांस, स्पेन और इटली के कई शहरों में भी स्थानीय लोग सड़कों पर उतरे हैं. लोगों का कहना है कि पर्यटकों की वजह से मकानों के किराए और संपत्तियों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जबकि सार्वजनिक सुविधाओं पर भी दबाव बढ़ा है।   स्पेन में बार्सिलोना और कैनरी द्वीप समूह समेत 40 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन हुए हैं. वहीं इटली के वेनिस, फ्लोरेंस, रोम और मिलान में किराये वाले पर्यटन आवासों के खिलाफ … Read more

3 भारतीय नागरिकों की मौत से बढ़ा तनाव, UN ने भी अमेरिका को सुनाई खरी-खरी; नियम-कायदों की दिलाई याद

नई दिल्ली ओमान तट के पास एक कॉमर्शियल जहाज पर हुए हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद भारत ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। नागरिकों की जान जाने की इस गंभीर घटना पर कड़ी आपत्ति जताते हुए विदेश मंत्रालय (MEA) ने अमेरिकी उप-राजदूत जेसन मीक्स को दोबारा तलब कर सख्त विरोध दर्ज कराया है। पिछले कुछ ही दिनों में यह दूसरी बार है जब भारत ने किसी अमेरिकी राजनयिक को तलब किया है। 30 मिनट तक चला कड़ा कूटनीतिक विरोध विदेश मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव (अमेरिका) नागराज नायडू ने जेसन मीक्स को तलब किया। यह बैठक लगभग 40 मिनट तक चली, जिसमें भारत ने कॉमर्शियल जहाज पर हुए हमले और उसमें तीन भारतीयों के मारे जाने पर अपना कड़ा आक्रोश व्यक्त किया। चूंकि भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर फिलहाल दिल्ली से बाहर हैं, इसलिए उनकी जगह जेसन मीक्स को यह कूटनीतिक विरोध सौंपने के लिए बुलाया गया। अमेरिका ने जहाजों पर हमला किया; टाइमलाइन     8 जून: अमेरिकी हमले में जहाज 'मैरीवेक्स' निशाना बना; 24 भारतीय क्रू सदस्यों को बचाया गया     9 जून: 'एमटी सेटेबेलो' पर हमला; 3 भारतीयों की मौत, 21 को बचाया गया     10 जून: अमेरिकी CdA मीक्स को तलब किया गया     11 जून: 'एमटी जलवीर' पर हमला; 20 भारतीय क्रू सदस्यों को बचाया गया     12 जून: अमेरिकी CdA मीक्स को तलब किया गया निशाना बने तीन प्रमुख जहाज और भारतीयों की मौत हालिया विवाद मुख्य रूप से तीन कॉमर्शियल जहाजों पर हुए हमलों से जुड़ा है, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय चालक दल मौजूद था। 'Settebello' पर हमला और मौतें: बुधवार को ओमान के सोहर बंदरगाह के पास इस पलाऊ-झंडे वाले टैंकर को निशाना बनाया गया। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी सेना द्वारा दागी गई मिसाइल के कारण जहाज के इंजन रूम में आग लग गई। जहाज पर 24 भारतीय सवार थे। इस भयावह हमले में 3 भारतीय नाविकों की जान चली गई, जबकि 21 को बचा लिया गया। 'MT Marivex' पर हमला: इससे पहले सोमवार को एक अन्य टैंकर, 'MT Marivex' पर भी अमेरिकी नौसेना द्वारा हमला किया गया था। उस जहाज पर भी 24 भारतीय नाविक मौजूद थे, जिन्हें सुरक्षित निकाल लिया गया था।  अमेरिकी नौसेना के हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत पर संयुक्त राष्ट्र समेत दूसरे संगठनों और देशों ने अमेरिकी कार्रवाई की तीखी आलोचना की है और इसे अस्वीकार्य बताया है. अमेरिकी दादागीरी के सामने तनकर खड़े होते हुए अंतर्राष्ट्रीय मेरीटाइम संगठन (अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन ) ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर असर डालने वाली सभी गतिविधियों में अंतरराष्ट्रीय कानूनों और समुद्र में व्यक्ति की सुरक्षा का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए. वहीं UN ने कहा कि वो IMO के बयान से इत्तेफाक रखता है।  बुधवार को अमेरिका ने पलाऊ के झंडे वाले एक टैंकर पर हमला किया था. इस टैंकर का नाम MT सेटेबेलो है. अमेरिका नौसेना ने सेटेबेलो पर मिसाइलों से हमला किया था. इस हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई थी।  भारत ने गुरुवार को कहा कि पिछले चार दिनों में ओमान के तट के पास भारतीय क्रू मेंबर वाले तीन कमर्शियल जहाजों पर अमेरिकी सेना ने हमला किया, जिसमें तीन भारतीयों की मौत हो गई. नई दिल्ली ने इन हमलों को लेकर अमेरिका के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया है।  दुनिया भर में जहाजों की सुरक्षा और समुद्री अनुशासन करने वाली संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने इस घटना के लिए अमेरिका की तीखी आलोचना की।  IMO ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट के पास हुई इस घटना में जहाज पर एक प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ, जिससे जहाज में आग लग गई और तीन नाविकों की मौत हो गई।  IMO के महासचिव आर्सेनियो डोमिंग्वेज ने कहा कि वह किसी भी पक्ष की ओर से की गई ऐसी किसी भी हरकत की "कड़ी" निंदा करते हैं, जिससे नाविकों की जान और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की सुरक्षा को खतरा हो।  "यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है. मेरी संवेदनाएं उन तीन नाविकों के परिवारों के साथ हैं जिनकी जान चली गई और उन सभी लोगों के साथ भी जो क्रू सदस्यों के बारे में खबर का इंतजार कर रहे हैं।  डोमिंग्वेज़ ने कहा कि IMO ने हर समय नाविकों, आम नागरिक जहाजों और नेविगेशन की आज़ादी की सुरक्षा की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है।  डोमिंग्वेज़ ने कहा, "अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर असर डालने वाली सभी गतिविधियों में अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्र में जीवन की सुरक्षा का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए. नाविकों की सुरक्षा एक साझा ज़िम्मेदारी है जिसे सबसे ज़्यादा अहमियत दी जानी चाहिए।  IMO के बयान से सहमति जताते हुए संयुक्त राष्ट्र के सेक्रेटरी-जनरल ने इस हमले की निंदा की. सेक्रेटरी-जनरल के प्रवक्ता स्टीफन डुजारिक ने ने कहा कि, 'खास बात यह है कि सेट्टेबेलो टैंकर पर हमला हुआ और कई भारतीय नाविक मारे गए. और इस हमले की इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइज़ेशन (IMO) के सेक्रेटरी-जनरल ने साफ़ तौर पर निंदा की थी. और हम उस बात का पूरी तरह से समर्थन और अनुमोदन करते हैं।    एमटी जलवीर पर हमला: ताजा मामला इस गिनी-बिसाऊ के ध्वज वाले जहाज एमटी जलवीर से जुड़ा है। अमेरिकी मध्य कमान ने एक बयान में कहा कि उसने एमटी जलवीर को ईरान के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंध का कथित तौर पर उल्लंघन करके ईरानी तेल परिवहन करने के प्रयास के आरोप में निष्क्रिय कर दिया। कमान ने कहा कि चालक दल द्वारा 'अमेरिकी सेना के निर्देशों का बार-बार पालन न करने' के बाद एक अमेरिकी विमान ने जहाज के इंजन कक्ष पर हमला किया। ओमान बंदरगाह के पास इस टैंकर पर हमले के बाद उसमें सवार 22 भारतीयों को बृहस्पतिवार को सुरक्षित निकाल लिया गया था। पिछले चार दिनों में ओमान तट के निकट अमेरिकी सेना द्वारा भारतीय चालक दल वाले व्यापारिक जहाजों पर हमले की यह तीसरी घटना है। भारत का सख्त रुख भारतीय नागरिकों की जान जाने से यह कूटनीतिक विवाद अब एक बेहद गंभीर मोड़ ले चुका है। विदेश मंत्रालय ने इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए स्पष्ट किया है कि वाणिज्यिक शिपिंग और निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाने की घटनाएं बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। भारत ने अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों … Read more

Inflation Alert: खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों से तेज हुई रिटेल महंगाई, जानिए कितना बढ़ा असर

नई दिल्ली देश में खाने-पीने की चीजों के दाम मई महीने में बढ़े हैं. रिटेल महंगाई दर मई के महीने में बढ़कर 3.93 प्रतिशत पहुंच गई है. अप्रैल महीने में महंगाई दर 3.48 प्रतिशत थी. हालांकि, महंगाई दर रिजर्व बैंक के अनुमान 4 प्रतिशत से नीचे रही है।  महंगाई दर रिजर्व बैंक के अनुमान 4 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे है. लगातार 16वें महीने महंगाई दर आरबीआई के लक्ष्य के नीचे रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और ईरान युद्ध के कारण महंगाई दर बढ़ी है. जून के मॉनिटरी पॉलिसी में आरबीआई ने वित्त वर्ष 27 के लिए महंगाई दर को सुधार करते हुए पहले के 4.6 प्रतिशत की तुलना में बढ़ाकर 5.1 फीसदी किया था।  ईरान, अमेरिका और इजरायल युद्ध के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रेशर बढ़ा है. करेंसी मार्केट पर भी इसका असर पड़ा है. हालांकि, इन सब झटकों के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था काफी मजबूत है और देश की जीडीपी 7.8 प्रतिशत है. खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमत महंगाई दर को बढ़ा रही है. इसकी कारण CPI में तेजी आई है।  अप्रैल के मुकाबले मई में दर्ज हुई बड़ी बढ़त सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मई महीने की खुदरा महंगाई दर ने अप्रैल के 3.48% के स्तर से एक लंबी छलांग लगाई है और यह सीधे 3.93% पर जा पहुंची है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सीपीआई (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) की गणना श्रृंखला में हाल ही में किए गए ढांचागत बदलावों के बाद से अब तक की यह सबसे बड़ी और उच्चतम रीडिंग दर्ज की गई है। इस वृद्धि का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आया उतार-चढ़ाव और घरेलू स्तर पर चुनिंदा खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आई मौसमी तेजी को माना जा रहा है, जिसने खुदरा बाजार के रुख को बदल दिया है। आरबीआई के निर्धारित बजटीय लक्ष्य के भीतर आंकड़े महंगाई के इस बढ़ते ग्राफ के बीच आम आदमी और नीति निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी तसल्ली यह है कि यह आंकड़ा अब भी केंद्रीय बैंक के नियंत्रण दायरे में है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक को देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए खुदरा महंगाई दर को 4% के मानक स्तर से नीचे रखने का वैधानिक लक्ष्य सौंपा हुआ है, जिसमें परिस्थितियों के अनुसार 2% का ऊपरी और निचला मार्जिन (टोलरेंस बैंड) शामिल किया गया है। वर्तमान में 3.93% की दर पर होने के कारण यह केंद्रीय बैंक के लिए नीतिगत ब्याज दरों (रेपो रेट) की समीक्षा करते समय बहुत अधिक आक्रामक रुख अपनाने के दबाव को कम करती है। पश्चिम एशिया के संकट का घरेलू बाजार पर सीधा असर बाजार विश्लेषकों का स्पष्ट अनुमान है कि पश्चिम एशिया क्षेत्र में जारी सैन्य और राजनीतिक गतिरोध के चलते वैश्विक व्यापारिक मार्गों पर माल ढुलाई की लागत में भारी इजाफा हुआ है। इस वैश्विक संकट के कारण भारत आयातित खाद्य तेलों, ईंधनों और अन्य आवश्यक कच्चे माल के लिए अधिक भुगतान कर रहा है, जिसका संचयी प्रभाव देश के भीतर खुदरा वस्तुओं के अंतिम मूल्य संवर्धन पर दिखाई दे रहा है। यदि आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर यह तनाव और गहराता है, तो आगामी तिमाहियों में घरेलू बाजार के भीतर खुदरा महंगाई दर के इस 4% के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।  

World Bank Report: भारत पर जताया भरोसा, कहा- वैश्विक चुनौतियों के बीच सबसे मजबूत इकोनॉमी

 नई दिल्ली अमेरिका-ईरान युद्ध से गहराया मिडिल ईस्ट संकट हो या फिर कोई और ग्लोबल टेंशन, तमाम चुनौतियों के बाद भी भारत रुकने वाला नहीं है. विश्व बैंक ने भी इंडियन इकोनॉमी का लोहा माना है और अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इन सबके बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ती हुई अर्थव्यस्थाओं में बना रहेगा. वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की विकास दर (India Growth Rate) 6.6% होने की उम्मीद जताई गई है।  इस रफ्तार से भागेगी इकोनॉमी World Bank ने गुरुवार को जारी अपनी वैश्विक आर्थिक संभावनाओं पर रिपोर्ट में ये बड़ी बात कही है. विश्व बैंक ने कहा कि भारत वित्त वर्ष 2026-27 में 6.6 फीसदी की दर से ग्रोथ करते हुए दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा. बीते साल इसकी रफ्तार 7.7 फीसदी रही थी, हालांकि ताजा अनुमान इससे काफी कम है।  ग्रोथ में बीते साल के मुकाबले कमी आने के पीछे विश्व बैंक ने कारण बताते हुए कहा है कि मिडिल ईस्ट युद्ध से ऊर्जा की कीमतों आए उछाल और अन्य इनपुट लागतों के कारण निजी डिमांड में वृद्धि धीमी पड़ सकती है और इसका असर ग्रोथ रेट पर देखने को मिल सकता है।  गिरावट के बाद उछाल की उम्मीद विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि वस्तु एवं सेवा कर यानी GST रेट कट से उपभोक्ता मांग को कुछ हद तक समर्थन मिलना चाहिए. इसके साथ ही भारतीय अर्थव्वस्था की रफ्तार को लेकर वर्ल्ड बैंक ने आगे कहा कि 2026-27 में ग्रोथ में गिरावट के बाद अगले वित्त वर्ष 2027-28 में इकोनॉमिक ग्रोथ रेट 7.2 फीसदी होने की उम्मीद है. मतलब भारत रुकने वाला नहीं है. घरेलू डिमांड में मजबूती और निर्यात वृद्धि में तेजी के चलते अगले दो वित्तीय वर्षों में विकास दर में फिर से उछाल आने की उम्मीद है।  युद्ध भी नहीं रोक पाया डिमांड विश्व बैंक के मुताबिक, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष से बढ़ती ग्लोबल अनिश्चितता के बावजूद, इस वर्ष 2026 की शुरुआत में भारत में आर्थिक गतिविधि मजबूत बनी रही, जिसे लचीली घरेलू मांग का सपोर्ट मिला था. इसमें कहा गया है कि प्राइवेट कंजंप्शन, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत रहा है, जबकि शहरी डिमांड में भी तेज सुधार देखने को मिल रहा है।  घरेलू बिक्री से टैक्स कलेक्शन भी लगातार बढ़ा है. इसके बीच ऊर्जा की बढ़ती लागत के साथ-साथ कृषि उत्पादों, उर्वरकों की कमी से पैदा हुए दबाव को कम करने के लिए, भारत में फ्यूल टैक्ट कट समेत कई बड़े कदम भी उठाए हैं. इसके साथ ही विश्व बैंक ने कहा है कि अमेरिकी टैरिफ में कटौती, तमाम देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTAs) से मिडिल ईस्ट संघर्ष के कारण कमजोर बाहरी डिमांड को कम करने में मदद मिली है।  दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा भारत मीडिया से बातचीत में वर्ल्ड बैंक के डिप्टी चीफ इकोनॉमिस्ट आयहान कोसे ने कहा कि इस दौरान भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा। भारत के आर्थिक प्रदर्शन और मध्य पूर्व संकट के असर के बारे में आईएएनएस के सवाल का जवाब देते हुए, कोसे ने कहा कि बेहतर अनुमान घरेलू मांग में "उम्मीद से अधिक मजबूत गति" को दिखाता है, जो अब तक मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष के बुरे असर की भरपाई से कहीं ज्यादा है। क्षेत्रीय विकास दर 7 प्रतिशत से घटकर 6.3 प्रतिशत होने की उम्मीद  वर्ल्ड बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र बना रहेगा। हालांकि, एनर्जी की ज्यादा कीमतों और संघर्ष के व्यापक असर के कारण 2025 में क्षेत्रीय विकास दर 7 प्रतिशत से घटकर 6.3 प्रतिशत होने की उम्मीद है। कोस ने कहा कि अनिश्चित वैश्विक माहौल के बावजूद भारत के आर्थिक आधार मजबूत बने हुए हैं। उन्होंने कहा, "भारत ने जरूरी नीतिगत उपाय लागू किए हैं। जब हम भारत की बड़ी तस्वीर को देखते हैं, तो उसमें अभी भी जबरदस्त गति दिखाई देती है।" वर्ल्ड बैंक ने दी चेतावनी वर्ल्ड बैंक ने चेतावनी दी कि मध्य पूर्व में संघर्ष के कारण 2026 में वैश्विक विकास दर 2025 के 2.9 प्रतिशत से घटकर 2.5 प्रतिशत होने की उम्मीद है, जो कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से सबसे धीमी गति होगी। तेल की ज्यादा कीमतें बढ़ती महंगाई और कड़े वित्तीय हालात का असर दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने की उम्मीद है। इसके बावजूद, भारत उन कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था जिनकी रेटिंग में सुधार हुआ। कोस ने कहा कि बेहतर आउटलुक की वजह घरेलू मांग और एक्सपोर्ट में आई तेजी थी। उन्होंने कहा, "घरेलू मांग और एक्सपोर्ट में तेजी की वजह से उम्मीद से अधिक ग्रोथ हुई," और इसी वजह से अनुमान को बढ़ाया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के लगातार विस्तार की वजह से दक्षिण एशिया दुनिया भर में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला क्षेत्र बना रहेगा। इस साल सुस्ती के बाद, 2027 में क्षेत्रीय ग्रोथ के 6.9 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। 2028 में भारत की ग्रोथ 7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। भारत-China को छोड़ बाकी का बुरा हाल विश्व बैंक का कहना है कि चीन और भारत को छोड़कर, विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति आय की धीमी रह सकती है. साउथ एशिया में विकास दर 2026 में घटकर 6.3 फीसदी रहने की उम्मीद है, जो मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट युद्ध के निगेटिव प्रभाव को दर्शाती है. इसमें एनर्जी कॉस्ट में तेजी, तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई में कमी और पर्यटन  सेक्टर में व्यवधान शामिल हैं। 

PM मोदी का नया सियासी वार! कांग्रेस ग्रोथ रेट का जिक्र कर विपक्ष पर साधा निशाना

नई दिल्ली एनडीए की मीटिंग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर बड़ा हमला बोला. पीएम मोदी ने कहा कि जिस धीमी विकास दर को दशकों तक ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ कहा गया, उसे वास्तव में ‘कांग्रेस ग्रोथ रेट’ कहा जाना चाहिए था, क्योंकि उस दौर की नीतियों, शासन शैली और आर्थिक फैसलों के लिए कांग्रेस जिम्मेदार थी, न कि देश की संस्कृति या बहुसंख्यक समाज. पीएम मोदी ने जो बातें कहीं हैं, वो कांग्रेस के ल‍िए मुसीबत के बीज की तरह हैं. क्‍योंक‍ि बीजेपी अब इस शब्‍द को लोगों के बीच ले जाएगी, उन्‍हें बताएगी क‍ि कांग्रेस राज में क‍िस तरह ह‍िन्‍दुओं के माथे पर कलंक मढ़ा गया।  पीएम मोदी ने कहा, NDA के 12 वर्षों की एक बड़ी सफलता ये भी है कि देश कांग्रेस के कुचक्र से आजाद हुआ है. कांग्रेस ने देश को लाचारगी, बेचारगी और हीन भावना के गर्त में गिरा दिया था. देश को यही एहसास कराया जाता था कि भारत में विकास धीरे-धीरे ही होता है, भारत में तेज विकास संभव ही नहीं है और बड़ी ही चतुराई से धीमी विकास को एक नाम दिया था, ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ यानी कार्यशैली कांग्रेस की, दायित्व कांग्रेस का, विफलता कांग्रेस की लेकिन कलंक देश की बड़ी हिंदू आबादी के नाम लगाया गया. जबकि असल में इस कुसंस्कृति का नाम होना चाहिए था कांग्रेस ग्रोथ रेट।  ‘कांग्रेस ग्रोथ रेट’ और ‘NDA ग्रोथ रेट’ का अंतर समझाया पीएम मोदी ने कहा- सवाल ये है कि अगर 12 साल में इतना कुछ हो सकता है तो फिर दशकों तक क्यों नहीं हुआ? ये ‘कांग्रेस ग्रोथ रेट’ और ‘NDA ग्रोथ रेट’ का अंतर है. एक व्यवस्था लोगों को इंतजार कराती थी. आज की व्यवस्था परिणाम दिखाती है. एक व्यवस्था काम अटकाती-भटकाती थी. आज की व्यवस्था कहती है, काम अभी होगा, समय पर होगा और बड़े पैमाने पर होगा. इसलिए 2014 से 2026 की कहानी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, ये उस भारत की कहानी है, जिसने पहली बार अपनी पूरी क्षमता के साथ दौड़ना तय किया है।  कहां से आया ये शब्‍द ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ शब्द मुख्य रूप से 1950 से 1980 के दशक के बीच भारत की औसत आर्थिक विकास दर के लिए इस्तेमाल किया गया था. उस दौर में भारत की जीडीपी वृद्धि दर करीब 3 से 3.5 प्रतिशत के आसपास रहती थी. जबकि आबादी तेजी से बढ़ रही थी. नतीजा यह हुआ कि प्रति व्यक्ति आय में बहुत सीमित बढ़ोतरी हुई. कहते हैं क‍ि इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले भारतीय अर्थशास्त्री राज कृष्‍णा ने किया था. उनका मकसद धीमी आर्थिक वृद्धि को व्यंग्यात्मक ढंग से बताना था. बाद में नेताओं ने इसका इस्‍तेमाल करना शुरू कर द‍िया, ज‍िसका ज‍िक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क‍िया।  पीएम मोदी ने इसे ‘कांग्रेस ग्रोथ रेट’ क्यों कहा? प्रधानमंत्री मोदी का तर्क है कि धीमी विकास दर के लिए भारत की सभ्यता, संस्कृति या समाज को जिम्मेदार ठहराना गलत था. उनके मुताबिक उस समय देश में जिस तरह की आर्थिक नीतियां लागू थीं, वे कांग्रेस सरकारों द्वारा बनाई गई थीं. स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारत में लाइसेंस-परमिट राज, सरकारी नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था और सीमित निजी निवेश का मॉडल लागू रहा. उद्योग लगाने से लेकर उत्पादन बढ़ाने तक लगभग हर काम के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत पड़ती थी. पीएम मोदी का कहना है कि विकास की धीमी गति की वजह यही नीतियां थीं. इसलिए उस दौर को हिंदू ग्रोथ रेट कहने के बजाय कांग्रेस ग्रोथ रेट कहना अधिक उचित होगा।  अटल सरकार का जिक्र क्यों किया? अपने भाषण में मोदी ने कहा कि देश ने पहली बार तेज विकास की झलक तब देखी जब अटल जी की सरकार आई. अटल सरकार के दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना, ग्रामीण सड़क योजना, दूरसंचार क्षेत्र में सुधार और बुनियादी ढांचे पर बड़े निवेश जैसे कदम उठाए गए थे. बीजेपी लंबे समय से दावा करती रही है कि आर्थिक सुधारों को गति देने और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव मजबूत करने में अटल सरकार की बड़ी भूमिका रही. मोदी ने इसी संदर्भ में अटल सरकार को तेज विकास का शुरुआती मॉडल बताया। 

रूसी तेल विवाद पर जयशंकर का पलटवार, बोले- जरूरत पड़ने पर खुद भारत के पास आए थे अमेरिका

नई दिल्ली  भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमेरिका और यूरोप को तेल के खेल पर अच्छे से धोया है. रूसी तेल की खरीद के मसले पर एस जयशंकर ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश दिया. फिनलैंड की धरती से एस जयशंकर ने अमेरिका को साफ सुनाया कि दिखावा न करो, अमेरिका का तेल वाला खेल भारत अच्छे से जानता है. उन्होंने कहा कि रूस से तेल खरीदने के मामले में भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखा है. भारत तेल की लागत और उपलब्धता के आधार पर तेल खरीदता है. भारत किसी दबाव या नैरेटिव को नहीं मानता. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जिस रूस तेल खरीद को लेकर आज सवाल उठाए जाते हैं, उसी के लिए कभी अमेरिका ने खुद भारत से आग्रह किया था कि भाई प्लीज रूसी तेल खरीद लो, वरना मार्केट की लंका लग जाएगी. वैश्विक तेल बाज़ार को स्थिर रखने के लिए ही अमेरिका ने भारत से रूसी तेल खरीद को लेकर गुहार लगाई थी।  दरअसल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका और यूरोप को दो टूक जवाब दिया है. उन्होंने कहा कि भारत ने रूस से तेल किसी राजनीतिक या वैचारिक कारण से नहीं, बल्कि अपनी जरूरतों और बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए खरीदा था. जयशंकर ने यह भी दावा किया कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मची हुई थी, तब अमेरिका ने खुद भारत से रूसी तेल खरीदने के लिए कहा था ताकि बाजार स्थिर बना रहे।  भारत क्यों और कैसे रूसी तेल खरीदने लगा विदेश मंत्री ने कहा कि 2022 से पहले भारत ने रूस से बहुत अधिक मात्रा में तेल नहीं खरीदा था, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद बनी परिस्थितियों ने भारत को नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर किया. उन्होंने बताया कि उस समय बाजार में जो तेल सबसे अधिक उपलब्ध था, वह रूसी तेल था. कारण कि यूरोपीय देश मिडिल ईस्ट से बड़े पैमाने पर तेल खरीद रहे थे, जो भारत का पारंपरिक सप्लायर रहा है. ऐसे में भारत के सामने रूस से तेल खरीदने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे।  जयशंकर ने अमेरिका की पोल खोली उन्होंने याद दिलाया कि उसी दौरान अमेरिका ने भारत से कहा था कि वह रूस से तेल खरीदे, ताकि वैश्विक तेल बादार में कीमतें और आपूर्ति संतुलित रह सके. लेकिन बाद में जब भारत ने अपने हित में निर्णय लेते हुए रूसी तेल की खरीद बढ़ाई, तो पहले उस पर टैरिफ लगाए गए और फिर प्रतिबंधों में ढील दी गई. अमेरिका के इस दोहरे रवैये पर टिप्पणी करते हुए जयशंकर ने कहा,’आइए यह दिखावा न करें कि इसमें कोई बहुत बड़ा सिद्धांत शामिल है. यह पूरा मामला ऑन-ऑफ’ जैसा है. मतलब जब सूट करे तो करो, जब न सूट करे तो मत करो. हम सब समझदार लोग हैं, हम जानते हैं खेल क्या है।  जयशंकर का पूरा बयान पढ़िए     फिनलैंड में एक पैनल चर्चा में एस जयशंकर ने कहा, ‘हमने 2022 तक ज़्यादा रूसी तेल नहीं खरीदा. रूस-यूक्रेन जंग के हालात ने हमें मार्केट में उतरने पर मजबूर किया. रशियन हमारे लगातार सप्लायर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि लोग यह याद रखें कि उस समय अमेरिका ने खास तौर पर भारत से रूसी तेल खरीदने के लिए कहा था ताकि ऑयल मार्केट स्टेबल हो सके. अगर आप देखें तो पहले पिछले साल रूसी तेल खरीदने पर हम पर टैरिफ लगाया, फिर अमेरिका ने रूसी तेल पर सैंक्शन हटा दिए. इसलिए यह दिखावा न करें कि इसमें कोई बड़ा प्रिंसिपल शामिल है. कुल मिलाकर बात यह है कि आपका सिद्धांत यह है कि जब हमें सूट करे तब सब ठीक और जब सूट न करे तब सब खराब. यहां हम सब समझदार हैं. हम जानते हैं कि खेल क्या है।  फिनलैंड में आयोजित एक टॉक में फिनलैंड की विदेश मंत्री एलीना वाल्टोनेन और यूएई की असिस्टेंट विदेश मंत्री लाना नुसेबेह के साथ एक पैनल चर्चा में भाग लेते हुए जयशंकर से रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की स्थिति पर सवाल पूछा गया।  सवाल: रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर यूरोप में ऐसा माना जा रहा है कि भारत दोनों पक्षों के बीच एक नैतिक समानता (Moral Equivalence) बनाने की कोशिश कर रहा है. जैसे कि आप कह रहे हों कि ‘यह बहुत बुरा हुआ और इसे रुकना चाहिए’ लेकिन आप रूस के प्रति अधिक सहानुभूति रख रहे हैं और उससे तेल खरीदने को तैयार हैं. आप यहां मौजूद लोगों को अपना यह रुख कैसे समझाएंगे? डॉ. एस. जयशंकर का जवाब: ‘मैं यहां दो बातें कहना चाहूंगा. पहली यह कि मैं तेल खरीदता हूं. मैं तेल की कीमत (Cost) और उसकी उपलब्धता (Availability) के आधार पर इसे खरीदता हूं. उस समय बाज़ार में उपलब्ध ज़्यादातर तेल रूसी था, क्योंकि यूरोपीय देश मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट का तेल खरीद रहे थे, जो कि हमारा पारंपरिक सप्लायर था. ऐसे में परिस्थितियों ने हमें एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया. दूसरी बात चूंकि आपने ‘नैतिक अस्पष्टता’ (Moral Ambiguity) की बात की है, तो मैं यह कहना चाहूंगा कि किसी भी यूरोपीय देश पर कभी भारतीय हथियारों से हमला नहीं हुआ है. काश, मैं यही बात भारत के संदर्भ में यूरोपीय हथियारों के लिए भी कह पाता.’ यूरोपीय देश उन हथियारों को बेचते हैं जिनका इस्तेमाल भारत पर हमला करने के लिए किया जाता है. ऐसा आज से नहीं, बल्कि पिछले कई सालों से हो रहा है. इसके विपरीत, हम भारतीयों ने कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे यूरोप की सुरक्षा खतरे में पड़े. मुझे लगता है कि यह एक बेहद वाजिब और सही तर्क है। 

चौंकाने वाली रिपोर्ट: 2013 के मुकाबले अब भारत में दोगुने दिनों तक पड़ रही हीटवेव

नई दिल्ली जलवायु परिवर्तन का असर अब भारत में साफ और बेहद खतरनाक रूप में दिखने लगा है. देश में पर्यावरण, वन्यजीव और मौसम के पैटर्न में बड़े बदलाव आ रहे हैं. सबसे चिंताजनक स्थिति हीटवेव की है, जिसके दिनों में पिछले कुछ वर्षों में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इन आंकड़ों से साफ है कि भारत एक तरफ जहां गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ तकनीक और संरक्षण के जरिए इनसे निपटने की कोशिशें भी की जा रही हैं।  हीटवेव का कहर: 13 साल में दोगुने हुए लू के दिन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में क्लाइमेट चेंज के कारण हीटवेव की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. अगर पिछले 13 सालों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो भारत में हीटवेव के दिनों की संख्या दोगुनी हो चुकी है. साल 2013 में जहां देश में लगभग 100 दिन हीटवेव के दर्ज किए गए थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 200 दिनों के पार पहुंच चुका है।  सरकार द्वारा संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में भारतीय क्षेत्र में रिकॉर्ड 554 हीटवेव दिन देखे गए, जबकि साल 2023 में यह संख्या 230 दिन थी. यानी सिर्फ एक साल के भीतर ही हीटवेव के दिनों में दोगुने से भी ज्यादा का उछाल आया है, जो यह दर्शाता है कि ग्लोबल वार्मिंग और स्थानीय मौसमी बदलाव कितनी तेजी से भारत को अपनी चपेट में ले रहे हैं।  भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, जब किसी क्षेत्र में अधिकतम तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा हो जाए और यह स्थिति कम से कम दो दिन तक बनी रहे, तो उसे हीटवेव कहा जाता है. मैदानी इलाकों में 40 डिग्री सेल्सियस और पहाड़ी क्षेत्रों में 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान हीटवेव की श्रेणी में आता है।  हीटवेव सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि लू का रूप ले लेती है, जो इंसानी शरीर के लिए बेहद खतरनाक होती है. विशेष रूप से गरीब, मजदूर वर्ग, बुजुर्ग और बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।  13 सालों में दोगुनी हुई हीटवेव की संख्या पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के आंकड़ों से साफ पता चलता है कि 2013 के मुकाबले अब हीटवेव के दिन दोगुने हो गए हैं. पहले जहां हीटवेव मुख्य रूप से अप्रैल-मई तक सीमित रहती थी, अब मार्च से जून तक और कभी-कभी जुलाई में भी इसका असर दिखने लगा है।   उत्तर भारत, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में हीटवेव की अवधि और तीव्रता बढ़ गई है. 2024-2025 के ग्रीष्मकाल में कई राज्यों में 40-45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान कई हफ्तों तक बना रहा, जिसने रिकॉर्ड तोड़ दिए।  जलवायु परिवर्तन क्यों जिम्मेदार? जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान बढ़ रहा है. भारत में औसत तापमान 0.6 से 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन आदि) की बढ़ती मात्रा वायुमंडल को गर्म कर रही है. मानवीय गतिविधियां जैसे जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल, जंगलों की कटाई, शहरीकरण और औद्योगीकरण इस वृद्धि के मुख्य कारण हैं. जलवायु मॉडल बताते हैं कि अगर ग्लोबल वार्मिंग यूं ही जारी रही, तो 2050 तक हीटवेव की संख्या और अवधि और भी ज्यादा बढ़ जाएगी।  क्षेत्रीय प्रभाव और हॉटस्पॉट     उत्तर भारत और इंडो-गंगा प्लेन: दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं.     पश्चिम भारत: राजस्थान और गुजरात में लंबे समय तक 45-48 डिग्री तापमान रहता है.     मध्य और दक्षिण भारत: महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में भी नई हीटवेव हॉटस्पॉट बन रहे हैं. शहरों में शहरी हीट आइलैंड इफेक्ट के कारण रात का तापमान भी नहीं गिरता, जिससे शरीर को आराम नहीं मिल पाता. इंसानी सेहत पर असर हीटवेव से हर साल हजारों लोग प्रभावित होते हैं. हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हार्ट अटैक और किडनी फेलियर के मामले बढ़ रहे हैं. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ता है. एक लंबा हीटवेव हजारों अतिरिक्त मौतें का कारण बन सकती है. 2015 की हीटवेव में 2000 से ज्यादा मौतें हुई थीं. अब स्थिति और बदतर हो रही है।  कृषि, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर असर     कृषि: गेहूं, चावल, फल और सब्जियों की पैदावार घट रही है. पशुधन भी प्रभावित हो रहा है.     पानी: भूजल स्तर गिर रहा है और जल संकट बढ़ रहा है.     अर्थव्यवस्था: मजदूरों की उत्पादकता घटती है. बिजली की मांग बढ़ती है. अर्थव्यवस्था को अरबों का नुकसान होता है. भारत में हीटवेव का दोगुना होना जलवायु संकट की घंटी है. 13 साल में 100 से 200 दिनों तक की बढ़ोतरी सिर्फ शुरुआत है. अगर हम अभी गंभीर कदम नहीं उठाए, तो आने वाले दशकों में यह संकट और भयावह रूप ले लेगा. हीटवेव अब कोई मौसमी घटना नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की स्थायी सच्चाई बन चुकी है। 

आखिर क्यों इस छोटे से देश में तीन दिन बिताएंगे प्रधानमंत्री मोदी? रणनीतिक वजहें आईं सामने

नई दिल्ली स्‍लोवाक‍िया, ज‍िसकी आबादी तकरीबन 55 लाख है, यानी जयपुर से भी कम. फ‍िर इस देश में ऐसा क्‍या है क‍ि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन द‍िन के दौरे पर जा रहे हैं. 1993 में स्लोवाकिया की आजादी के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली यात्रा होगी. पीएम मोदी वहां 14 से 16 जून तक रहेंगे. लगातार मीटिंग फ‍िक्‍स है. आपके मन में भी सवाल होगा क‍ि पीएम मोदी वहां इतना टाइम क्‍यों दे रहे हैं? वहां से क्‍या हास‍िल होने वाला है? स्लोवाकिया आकार में भले छोटा देश हो, लेकिन भारत के लिए उसकी रणनीतिक, आर्थिक और ज‍ियोपाल‍िट‍िकल अहमियत लगातार बढ़ रही है. यही वजह है कि पीएम मोदी का दौरा केवल एक औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि मध्य यूरोप में भारत की बढ़ती मौजूदगी का संकेत माना जा रहा है।  स्‍लोवाक‍िया क्‍यों है खास?     लगभग 55 लाख आबादी वाला स्लोवाकिया दुनिया के सबसे बड़े कार मैन्‍यूफैक्‍चर‍िंग सेंटर में गिना जाता है. यहां Volkswagen, Kia, Jaguar Land Rover और Stellantis जैसी कंपनियों के बड़े प्लांट हैं. भारत मैन्युफैक्चरिंग, ऑटो पार्ट्स और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में सहयोग बढ़ाना चाहता है।      स्लोवाकिया European Union का सदस्य है. ऐसे में उसके साथ मजबूत रिश्ते भारत को मध्य और पूर्वी यूरोप के बाजारों तक बेहतर पहुंच दिला सकते हैं. भारत और यूरोपीय यून‍ियन के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के दौर में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है।      रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप के कई देश अपने ड‍िफेंस इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को मॉडर्न बना रहे हैं. स्लोवाकिया भी उनमें शामिल है. भारत अपनी डिफेंस कंपनियों और स्वदेशी वेपन स‍िस्‍टम का एक्‍सपोर्ट बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में ड‍िफ‍ेंस पार्टनरश‍िप दोनों देशों के रिश्तों का बड़ा आधार बन सकता है।      स्लोवाकिया अपनी बिजली का बड़ा हिस्सा परमाणु ऊर्जा से पैदा करता है. भारत भी स्वच्छ ऊर्जा और न्यूक्लियर पावर क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है. इसलिए परमाणु तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं हैं।      मध्य यूरोप में भारत अपनी मौजूदगी बढ़ाकर रणनीतिक संतुलन बनाना चाहता है. स्लोवाकिया NATO और EU दोनों का सदस्य है. ऐसे में उसके साथ मजबूत संबंध भारत को यूरोपीय राजनीति और सुरक्षा ढांचे में अधिक प्रभावशाली साझेदार बनने में मदद कर सकते हैं।  दुन‍िया के ल‍िए मैसेज पीएम मोदी यह दौरा दिखाता है कि भारत की विदेश नीति अब केवल अमेरिका, रूस, ब्रिटेन या फ्रांस जैसे बड़े देशों तक सीमित नहीं है. मोदी सरकार छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों के साथ भी रिश्ते मजबूत कर रही है। 

होममेकर महिलाओं को मिला बड़ा सम्मान, मौत के मामलों में मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

नई दिल्ली एक्सीडेंट में जब किसी इंसान की मौत होती है, तब उसकी कमाई या सैलरी के हिसाब से मुआवजा तय होता है. लेकिन होम मेकर महिलाओं से जुड़े केस में यह मामला उलझ जाता है, क्योंकि होम मेकर महिलाओं की कोई तय कमाई नहीं होती. अब सुप्रीम कोर्ट ने होम मेकर (गृहिणियों) के मुआवजे को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है. अदालत ने कहा कि जब किसी दुर्घटना के कारण गृहिणी की मौत हो जाती है, तब उसका मुआवजा तय करते हुए उनके योगदान का आकलन आवश्यक है. अदालत ने कहा कि गृहिणियों का योगदान केवल परिवार तक सीमित नहीं होता, बल्कि वो मानव संसाधन और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.  ऐसे में उन्हें केवल “होममेकर” कहने के बजाय “नेशन बिल्डर” कहा जाना चाहिए।  होम मेकर की मौत पर 30 हजार रुपए मंथली के हिसाब से तय हो मुआवजा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गृहिणी द्वारा किए जाने वाले घरेलू काम और देखभाल की सेवाओं का आर्थिक मूल्य है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दुर्घटना की शिकार गृहणियों के मामले में मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए होम मेकर महिलाओं की मौत पर 30 हजार रुपए महीना के हिसाब से मुआवजा तय करने की बात कही।  एक्सीडेंट से जुड़े एक दावे की अपील पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला  वाहन दुर्घटना के दावों से जुड़ी एक अपील पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने कहा कि घर संभालने वाली महिला (होममेकर) का योगदान सिर्फ घर तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि देश के निर्माण में भी उनकी अहम भूमिका होती है. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा तय करते समय घर संभालने वाली महिला की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को घरेलू देखभाल के मामले में जो नुकसान होता है, उसे अलग से मान्यता दी जानी चाहिए।  जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसी उद्देश्य से घरेलू देखभाल के नुकसान (Loss of Domestic Care) का मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित किया है. पीठ ने यह भी कहा कि यह सिद्धांत पहले दिए गए फैसले में निर्धारित मानकों के अतिरिक्त है।  मुआवजा निर्धारण के लिए एक नया मार्गदर्शक सिद्धांत प्रदान करता है।  2001 में पंजाब की महिला की हादसे में मौत पर आया फैसला यह फैसला पंजाब में एक मोटर एक्सीडेंट दावे से जुड़ी अपील पर आया, जिसमें नवंबर 2001 में रेशमा नाम की एक महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. उसके पति और तीन बच्चों ने मुआवज़े के लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल का दरवाज़ा खटखटाया था. ट्रिब्यूनल ने 2003 में मुआवजा दिया, लेकिन यह मामला सालों तक मुकदमे में उलझा रहा, और पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अपील पर दिसंबर 2024 में जाकर फैसला सुनाया।  दुर्घटना के दो दशक से भी ज्यादा समय बाद इस तरह की देरी पर चिंता जताते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट मुआवजे के दाले पर आम तौर पर एक साल के अंदर फैसला हो जाना चाहिए. बेंच ने कहा ऐसे मामलों का फैसला आम तौर पर एक साल के अंदर हो जाना चाहिए।      कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से मोटर एक्सीडेंट क्लेम मामलों की मॉनिटरिंग करने और यह पक्का करने के लिए सही एडमिनिस्ट्रेटिव निर्देश जारी करने को कहा कि ऐसे मामलों का निपटारा तय समय में हो जाए।      इस फैसले के दूरगामी असर होने की उम्मीद है क्योंकि पूरे भारत में कोर्ट आम तौर पर मृतक होममेकर्स के लिए मौजूदा न्यूनतम वेतन के आधार पर उन्हें एक काल्पनिक इनकम देकर मुआवजा तय करते हैं, और अक्सर उन्हें स्किल्ड या अनस्किल्ड वर्कर्स के बराबर मानते हैं।      सुप्रीम कोर्ट का फैसला उस तरीके से अलग है, यह मानते हुए कि घरेलू देखभाल के काम को पारंपरिक लेबर-मार्केट बेंचमार्क तक कम नहीं किया जा सकता।      कोर्ट की ये बातें उन मिसालों पर आधारित हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि होममेकर्स के योगदान की, बिना पेमेंट के भी, मापने लायक आर्थिक वैल्यू है।      कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2021) और अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2010) सहित कई पिछले फैसलों में, सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने होममेकर्स द्वारा दी जाने वाली सेवाओं को गैर-कानूनी मानने के खिलाफ चेतावनी दी थी।      अदालत का यह ताजा फैसला एक कदम और आगे बढ़कर घरेलू देखभाल के नुकसान का आकलन करने के लिए हर महीने ₹30,000 का एक ठोस न्यूनतम बेंचमार्क तय करता है।      यह बेंचमार्क नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी (2017) में संविधान बेंच द्वारा तय किए गए सिद्धांतों के साथ काम करेगा, जो मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मुआवजा तय करने के लिए एक मिसाल है।