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Indus Water Treaty: पाकिस्तान दिखा रहा हेग कोर्ट का कागज, भारत ने ठुकराया फैसला; जानें पूरा विवाद

नई दिल्ली  पाकिस्तान के आतंकवादी कृत्यों की सजा देने के लिए भारत ने जब सिंधु जल समझौता रद्द किया, तो शहबाज शरीफ को भी नहीं उम्मीद रही होगी कि इस बार उसे वाकई अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आंसू बहाने पड़ जाएंगे. हैरानी की बात ये है कि उसने इसके खिलाफ सबसे बड़ा हथकंडा नीदरलैंड में मौजूद मध्यस्थता न्यायालय यानि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में भारत की शिकायत करके अपनाया. इस पर सुनवाई हुई और कोर्ट ने कह दिया कि 1960 के सिंधु जल समझौते को लागू रखना चाहिए. अब पाकिस्तान इसी जजमेंट को लेकर जगह-जगह अपना रोना रो रहा है, हालांकि भारत साफ कर चुका है कि वो इस कोर्ट को मान्यता नहीं देता, ऐसे में इसका फैसला उसके लिए कागज के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं।  अब पाकिस्तान ने भारत के उस फैसले का औपचारिक विरोध किया है, जिसमें उसने स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration-PCA) के हालिया आदेशों को मानने से इनकार कर दिया है. ये आदेश 1960 की सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद को लेकर दिए गए हैं. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत को संधि का पूरी तरह पालन करना चाहिए. इस्लामाबाद का कहना है 60 साल पुरानी जल-बंटवारे की संधि अब भी कानूनी रूप से बाध्यकारी है और कोई भी देश एकतरफा तरीके से इसके प्रावधानों में बदलाव नहीं कर सकता. वो शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन में भी इस मुद्दे को उठा चुका है, लेकिन भारत का रुख साफ है कि वो इस फैसले को नहीं मानता।  भारत ने सिंधु जल संधि को किया रद्द भारत का रुख पाकिस्तान से बिल्कुल अलग है. नई दिल्ली ने सिंधु जल संधि को पूरी तरह स्थगित रखा है. भारत का कहना है कि इस पर दोबारा विचार तभी किया जाएगा, जब पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को स्थायी और सत्यापन योग्य तरीके से रोकने के लिए ठोस कदम उठाए. भारत ने PCA की कार्यवाही को भी मूल रूप से गलत और कानूनी रूप से अमान्य बताया है. भारत इस मामले में हेग स्थित इस न्यायिक मंच की कार्यवाही में शामिल नहीं हुआ. भारत का तर्क है कि इस आर्बिट्रल का गठन संधि में तय विवाद निपटाने की मूल व्यवस्था के खिलाफ हुआ है, इसलिए भारत PCA के आदेश या अंतरिम फैसले उसकी संप्रभु नीतियों पर लागू नहीं होते।  पाकिस्तान जगह-जगह पीट रहा छाती  पाकिस्तान लगातार बातचीत की मांग कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के फैसलों का हवाला दे रहा है. इसके पीछे मुख्य चिंता यह है कि भारत के फैसलों से पाकिस्तान को मिलने वाले पानी पर असर पड़ सकता है. इस्लामाबाद थर्ड पार्टी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के जरिए भारत को फिर से बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहा है. हालांकि भारत का स्टैंड साफ है कि वो द्विपक्षीय मुद्दों पर किसी का दखल नहीं चाहता. सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान की कोशिशों के बीच उसकी व्यापक कूटनीतिक स्थिति भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. पाकिस्तान ने कहा है कि चीन के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी पर भारत और चीन के बदलते संबंधों का कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन बिश्केक में पाकिस्तान के सिंधु के पानी का रोना रोने पर शी जिनपिंग ने कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी थी।  क्यों भारत ने रोका सिंधु का पानी? अप्रैल, 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगन में डाल दिया था. इस हमले में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने 26 निर्दोष नागरिकों, जिनमें अधिकतर पर्यटक थे, की हत्या कर दी थी. इसके बाद भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि जब तक सीमा पार आतंकवाद जारी रहेगा, तब तक संधि से जुड़े दायित्वों पर पुनर्विचार किया जाएगा. क्या है सिंधु जल संधि? सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी. इसके तहत भारत को पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलुज का पूरा अधिकार दिया गया, जबकि पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान को मिलता है. भारत को इन नदियों पर सीमित गैर उपभोगीय उपयोग, जैसे जलविद्युत उत्पादन, की अनुमति है. भारत का रुख अब बिल्कुल स्पष्ट है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते. जब तक हालात नहीं सुधरते, तब तक सिंधु जल संधि से जुड़े किसी भी अंतरराष्ट्रीय आदेश को वह स्वीकार नहीं करेगा।  भारत अपनी सुरक्षा चिंताओं, खासकर सीमा पार आतंकवाद, को इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण आधार मान रहा है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मध्यस्थता के जरिए दबाव बनाने की पाकिस्तान की कोशिशों का भारत पर अब तक सीमित असर दिखाई दे रहा है. दोनों देशों के बीच जल विवाद फिलहाल कूटनीतिक और रणनीतिक तनाव का एक अहम मुद्दा बना हुआ है। 

PM Modi Birthday: BJP की देशभर में बड़ी तैयारी, एक महीने तक चलेगा ‘सेवा संकल्प अभियान’

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक देशभर में 'सेवा संकल्प अभियान' शुरू करने जा रही है। एक महीने तक चलने वाले इस कार्यक्रम के तहत भाजपा देश भर में सेवा और जनकल्याणकारी कार्यक्रम आयोजित करेगी। इसका मकसद केंद्र सरकार की प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं और सार्वजनिक जीवन में पीएम मोदी के 25 साल के सफर की अहम उपलब्धियों को जमीनी स्तर तक पहुंचाना है। पीएम मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन को समर्पित इस अभियान का उद्देश्य उनके सेवा, सुशासन, गरीब कल्याण और विकसित भारत के संकल्प को जन-जन तक पहुंचाना है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े ने कहा कि इस देशव्यापी अभियान के दौरान भाजपा विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के हर वर्ग (युवा, महिलाएं और किसान) तक पहुंचेगी। सरकार के प्रमुख के तौर पर इस साल 25 वर्ष पूरे बता दें कि भाजपा हर साल 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर पूरे देश में पखवाड़े भर चलने वाला 'सेवा पखवाड़ा' मनाती है लेकिन इस बार इसका दायरा बढ़ाकर एक महीने कर दिया गया है और थीम 'सेवा पखवाड़ा' से बदलकर सेवा संकल्प अभियान कर दिया गया है।। तावड़े ने कहा, ''मोदी का व्यक्तित्व ऐसा है कि वे हर पल सेवा के लिए समर्पित रहते हैं।'' उन्होंने कहा, ''मोदी इस साल 17 अक्टूबर को (सरकार के प्रमुख के तौर पर) 25 साल पूरे करने जा रहे हैं। उन्होंने पहली बार 7 अक्टूबर, 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी। इसलिए हमने इस 25 साल के अहम पड़ाव को ध्यान में रखते हुए एक महीने तक चलने वाला देशव्यापी 'सेवा संकल्प अभियान' शुरू करने का फैसला किया है।'' 13 बड़े कार्यक्रम तय भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा कि एक महीने तक चलने वाले इस अभियान में 'सेवा की भावना' (जो मोदी के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है) पर केंद्रित विभिन्न गतिविधियां शामिल होंगी। पार्टी ने इस अभियान के तहत 13 बड़े कार्यक्रम तय किए हैं, जिनमें जनभागीदारी, युवाओं की भागीदारी, समाज सेवा और सांस्कृतिक गौरव पर ध्यान दिया जाएगा। सेवा संकल्प अभियान के तहत 13 कार्यक्रम क्या? 1. आशीर्वाद का दीया: अभियान की शुरुआत 17 सितंबर को देश भर के हर घर में दीया जलाकर होगी। इसमें उज्जैन के महाकाल महालोक में एक खास कार्यक्रम भी शामिल होगा, जो आभार व्यक्त करने का एक तरीका होगा। 2. वडनगर से वाराणसी यात्रा: पीएम मोदी के जन्मस्थान वडनगर को उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी से जोड़ने वाली एक खास 'जल, जन और सेवा संकल्प यात्रा' आयोजित की जाएगी, जिसमें दस-दस लोगों के समूह अलग-अलग रास्तों से होते हुए लोगों से बातचीत करेंगे। 3. विकसित भारत संकल्प यात्रा: इन्फ्लुएंसर विकास की प्रमुख जगहों की यात्रा करेंगे और विकास की जमीनी कहानियाँ देश के सामने लाएंगे। 4. आंगन का उत्सव: आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और योजनाओं का लाभ उठाने वाली माताओं को सम्मानित किया जाएगा, साथ ही पोषण और मातृ कल्याण योजनाओं पर बातचीत होगी। 5. 25 करोड़ बच्चों के सपनों का भारत: 'विकसित भारत' थीम पर देशभर में छात्रों के लिए ड्राइंग और भाषण प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। 6. नमो सेवा गाथा: संगीत वाले नुक्कड़ नाटकों के ज़रिए जनसेवा और बदलाव की कहानियाँ दिखाई जाएंगी। 7. सेवा ज्योति यात्रा: जनभागीदारी को बढ़ावा देने और सेवा के संकल्प को दोहराने के लिए स्थानीय स्तर पर यात्राएँ। 8. कहानी बदलाव की: सरकारी योजनाओं से लाभ उठाने वाले नागरिक असल बदलाव की अपनी प्रेरणादायक कहानियाँ साझा करेंगे। 9. सेवा मेरा योगदान: बड़े पैमाने पर सामाजिक सेवा गतिविधियाँ आयोजित करने की योजना है, जिनमें रक्तदान शिविर, सफाई अभियान, वृक्षारोपण और डिजिटल साक्षरता अभियान शामिल हैं। 10. सेवा सेतु अभियान: पात्र लाभार्थियों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए हर ब्लॉक और विधानसभा स्तर पर शिविर आयोजित किए जाएंगे। 11. रंगोली राष्ट्र: एक ही दिन देश भर की प्रमुख जगहों पर स्थानीय कला शैलियों में 'मानव रंगोली' बनाना। 12. राष्ट्रीय इनोवेशन चैलेंज: युवाओं और स्टार्ट-अप्स को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय इनोवेशन प्रतियोगिताएं। 13. जनसेवक महाकुंभ: इस अभियान का समापन 17 अक्टूबर को पंचायत से लेकर संसद तक के जन-प्रतिनिधियों के एक विशाल सम्मेलन के साथ होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सभा को संबोधित करेंगे। इस मौके पर, पार्टी 'वंदे मातरम' के सभी छह छंदों को एक साथ गाकर *गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड* बनाने की कोशिश करेगी। बीजेपी ने कहा कि यह अभियान सिर्फ एक जश्न नहीं है, बल्कि सेवा की भावना को हर नागरिक तक पहुंचाने का संकल्प है।

चांदी के आभूषण खरीदने वालों के लिए बड़ी खबर, अक्टूबर से Hallmarking जरूरी! बढ़ती कीमतों के बीच ग्राहक सुरक्षित

नई दिल्ली सरकारी अधिकारियों के अनुसार, उपभोक्ता संरक्षण और नियामक निगरानी को बढ़ाने के लिए अक्टूबर से चांदी के आभूषणों पर हॉलमार्किंग अनिवार्य होने जा रही है।इस फैसले से चांदी के आभूषण अनिवार्य स्वर्ण हॉलमार्किंग को नियंत्रित करने वाले नियामक ढांचे के करीब आ गए हैं। बीआईएस ने सबसे पहले 2000 में सोने के लिए एक स्वैच्छिक हॉलमार्किंग योजना शुरू की थी, जिसे सरकार ने जून 2021 में कम से कम एक मान्यता प्राप्त परख और हॉलमार्किंग केंद्र (एएचसी) वाले 256 जिलों में अनिवार्य कर दिया था। छह चरणों में लागू की गई अनिवार्य स्वर्ण हॉलमार्किंग अब भारत के 782 जिलों में से लगभग 400 जिलों तक विस्तारित हो चुकी है। चांदी की हॉलमार्किंग भी इसी तरह चरणबद्ध तरीके से लागू की जाएगी। यह कदम सरकार द्वारा चांदी की वस्तुओं के लिए परीक्षण और प्रमाणीकरण बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ-साथ छह अंकों की विशिष्ट पहचान (एचयूआईडी) प्रणाली की शुरुआत के बाद उठाया गया है। भारतीय मानक ब्यूरो ( बीआईएस ) वर्तमान में 102 जिलों में फैले 341 चांदी परख और हॉलमार्किंग केंद्रों का संचालन करता है, जिसके अंतर्गत 25,000 चांदी के आभूषण विक्रेता पंजीकृत हैं। बीआईएस चांदी के आभूषणों के लिए शुद्धता के सात ग्रेड मान्यता देता है, जो 800 से 999 भाग प्रति हजार तक होते हैं। चांदी की हॉलमार्किंग पर सरकार की मंशा भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के महानिदेशक संजय गर्ग के मुताबिक, चांदी की अनिवार्य हॉलमार्किंग की मांग खुद उद्योग की ओर से आ रही है. हालांकि, इसे लागू करने से पहले BIS नियामकीय ढांचे और जरूरी बुनियादी ढांचे का आकलन कर रहा है. इसमें टेस्टिंग क्षमता, असेइंग मानक और लैब नेटवर्क की उपलब्धता जैसे पहलू शामिल हैं. सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि व्यवस्था लागू होने पर उपभोक्ताओं और कारोबारियों दोनों को परेशानी न हो।  HUID सिस्टम से मिल रही पारदर्शिता फिलहाल चांदी की हॉलमार्किंग भले ही स्वैच्छिक हो, लेकिन अगर कोई ज्वेलर अपने उत्पाद पर हॉलमार्क लगाता है तो उस पर हॉलमार्क यूनिक आइडेंटिफिकेशन (HUID) नंबर देना अनिवार्य है. यह छह अंकों का अल्फान्यूमेरिक कोड होता है, जिससे ग्राहक BIS के डेटाबेस में जाकर चांदी की शुद्धता और ट्रेसेबिलिटी जांच सकता है. सितंबर 2025 से HUID का नियम लागू होने के बाद चांदी की स्वैच्छिक हॉलमार्किंग में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है।  बढ़ती कीमतें और बढ़ता भरोसा सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चांदी की स्वैच्छिक हॉलमार्किंग 2024 में 31 लाख आर्टिकल से बढ़कर 2025 में 51 लाख तक पहुंच गई है. अब तक 20 लाख से ज्यादा चांदी के आर्टिकल HUID नंबर के साथ हॉलमार्क किए जा चुके हैं. अधिकारियों का कहना है कि चांदी की कीमतों में हालिया उछाल और निवेशकों की बढ़ती रुचि के चलते शुद्धता और मानकीकरण का मुद्दा ज्यादा अहम हो गया है. इसी वजह से सरकार सोने की अनिवार्य हॉलमार्किंग के अनुभव से सीख लेकर चांदी के लिए रणनीति बना रही है।  भारत में चांदी की खपत और आगे की राह भारत दुनिया के सबसे बड़े चांदी उपभोक्ताओं में शामिल है. देश में सालाना चांदी की मांग करीब 5,000 से 7,000 टन के बीच आंकी जाती है, जबकि घरेलू उत्पादन इसका छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाता है. आभूषण और चांदी के बर्तन इस खपत का बड़ा भाग हैं, साथ ही औद्योगिक इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है. फिलहाल सरकार ने चांदी की अनिवार्य हॉलमार्किंग के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की है. अधिकारियों का कहना है कि उद्योग से व्यापक सलाह-मशविरा और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के बाद ही इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।  भारत में अक्टूबर 2005 से स्वैच्छिक आधार पर चांदी की हॉलमार्किंग उपलब्ध है, जिससे बीआईएस-पंजीकृत जौहरी मान्यता प्राप्त परख और हॉलमार्किंग केंद्रों पर अपने गहनों को प्रमाणित करवा सकते हैं। हालांकि, सितंबर 2025 से, हॉलमार्किंग से गुजरने वाली किसी भी चांदी की वस्तु पर बीआईएस द्वारा जारी छह अंकों का अल्फ़ान्यूमेरिक एचयूआईडी होना अनिवार्य है। इस पायलट कार्यक्रम का उद्देश्य राष्ट्रव्यापी कार्यान्वयन से पहले उद्योग की तैयारियों का आकलन करना है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1 सितंबर 2025 को एचयूआईडी पोर्टल लॉन्च होने के बाद से अब तक 77 लाख से अधिक चांदी के आभूषणों पर हॉलमार्किंग हो चुकी है। इस प्रणाली के तहत, प्रत्येक हॉलमार्क वाली वस्तु पर बीआईएस मानक चिह्न, 'सिल्वर' शब्द, उसकी शुद्धता श्रेणी और उसका विशिष्ट एचयूआईडी प्रदर्शित होना अनिवार्य है, जिससे उपभोक्ता बीआईएस केयर ऐप के माध्यम से उत्पाद के विवरण को डिजिटल रूप से ट्रैक और सत्यापित कर सकें।  

चीन के ‘महा प्रोजेक्ट’ से भारत की बढ़ी टेंशन, ब्रह्मपुत्र के पानी पर खतरे की आशंका; खेती पर भी असर

नई दिल्ली नेपाल में हाल की विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर दिखा दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा कितना गंभीर है. इसी बीच चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में से एक बना रहा है. इस प्रोजेक्ट में एक विशाल बांध (सुपर डैम) बनाया जा रहा है. ब्रह्मपुत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यारलुंग त्सांगपो के नाम से भी जाना जाता है. हाल ही में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस प्रोजेक्ट से बेहद गंभीर नुकसान की आशंका पैदा हो रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट हिमालय के उस भूकंपीय इलाके में है, जहां दुनिया में सबसे ज्यादा भूकंप आते हैं. इस क्षेत्र में पहले भी कई विनाशकारी भूकंप आ चुके हैं।  नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के स्ट्रैटेजिक स्टडीज के प्रोफेसर एमेरिटस ब्रह्मा चेल्लानी ने ‘प्रोजेक्ट सिंडिकेट' के लिए लिखे एक लेख में कहा कि इस प्रोजेक्ट को लेकर सबसे ज्यादा चिंता की बात अब विदेशी आलोचकों की चेतावनी नहीं, बल्कि चीन के अपने वैज्ञानिकों की चेतावनी है।  चेल्लानी ने बीजिंग से जुड़े एक चीनी भाषा के जर्नल ‘सेडिमेंटरी जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी' में हाल ही में छपे एक रिसर्च पेपर का हवाला दिया. इस पेपर में बांध बनाए जा रहे इलाके में गंभीर भूगर्भीय खतरों की बात कही गई है।  सुपर डैम से 'वॉटर बम' बनने का खतरा क्यों है?  पेपर में वैज्ञानिकों ने बताया कि वहां की जमीन की बनावट ढीली है और चट्टानों व मिट्टी के बीच पकड़ कमजोर है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर जमीन के अंदर मौजूद फॉल्ट में हलचल हुई या भूकंप आया, तो बड़े इलाके में जमीन अस्थिर हो सकती है. इससे बांध का जलाशय और आसपास बना बुनियादी ढांचा खतरे में पड़ सकता है. वैज्ञानिकों ने खतरा कम करने के लिए जलाशय के आसपास की ढलानों को मजबूत करने, उन्हें संभालने वाली संरचनाएं लगाने और प्रोजेक्ट के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों को दोबारा डिजाइन करने की सलाह दी है, ताकि किसी बड़ी तबाही का खतरा कम किया जा सके।  चेल्लानी ने कहा कि जब कम्युनिस्ट शासन के तहत काम करने वाले चीन के वैज्ञानिक भी ऐसी चेतावनी दे रहे हैं, तो पूरी दुनिया को इस पर ध्यान देना चाहिए।  भारत के लिए खतरा क्यों? भारत के पूर्वोत्तर के लिए ब्रह्मपुत्र बेहद महत्वपूर्ण नदी है. यह खेती, मछली पालन और आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) यानी पानी वाली प्राकृतिक जमीनों के लिए जरूरी है. इस नदी पर लाखों लोगों की जिंदगी और रोजी-रोटी निर्भर है. आगे चलकर यही नदी बांग्लादेश में जाती है, जहां यह देश के लिए मीठे पानी का सबसे बड़ा स्रोत है।  ‘प्रोजेक्ट सिंडिकेट' की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की मेकांग नदी पर बनाई गई बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की तरह यह विशाल बांध भी सीमा पार नदी के पानी के बहाव को बदल सकता है. इससे नीचे की ओर जाने वाली वह उपजाऊ मिट्टी और गाद भी कम हो सकती है, जिसमें कई पोषक तत्व होते हैं. यह गाद नदी के पर्यावरण और नदी किनारे की खेती के लिए बेहद जरूरी है. यहां तक ​​कि इसके सामान्य रिपेयर के काम से भी नदी के बहाव की दिशा में मौजूद इकोसिस्टम, खेती, तलछट के बहाव और बाढ़ के पैटर्न पर असर पड़ सकता है।  चेल्लानी ने लिखा कि इससे भी ज्यादा खतरनाक स्थिति तब बन सकती है, अगर भूकंप की वजह से बांध का ढांचा टूट जाए या बांध को नुकसान पहुंचने के बाद अचानक बहुत ज्यादा पानी छोड़ना पड़े. ऐसी स्थिति में नीचे भारत और बांग्लादेश की ओर बसे घनी आबादी वाले मैदानी इलाकों में बिना ज्यादा चेतावनी के भयंकर बाढ़ आ सकती है।  उनके मुताबिक, तिब्बत में शुरू हुई ऐसी इंजीनियरिंग से जुड़ी दुर्घटना आगे चलकर एक बड़ी मानवीय त्रासदी बन सकती है, जिसका असर बांग्लादेश तक पहुंच सकता है. बांग्लादेश दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों में से एक है।  चीन तिब्बत को बना रहा युद्ध का क्षेत्र? रिपोर्ट में कहा गया कि पर्यावरणीय खतरा इस पूरी कहानी का केवल एक हिस्सा है. चीन तिब्बत के पठार पर अपने नियंत्रण को धीरे-धीरे एक रणनीतिक ताकत के रूप में इस्तेमाल कर रहा है. तिब्बत का पठार एशिया की कई बड़ी नदियों का स्रोत है. चीन ने सीमा पार बहने वाली नदियों पर एक के बाद एक कई बांध बनाए हैं. तनाव के समय उसने नदियों से जुड़े पानी और बहाव के आंकड़े देने से भी इनकार किया है. इसके अलावा चीन ने नीचे की ओर बसे देशों के साथ पानी बांटने की किसी संधि में शामिल होने से भी इनकार किया है।  रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह पानी भी चीन की दबाव बनाने वाली रणनीति का एक और हथियार बन गया है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एक तरह से यह विडंबना है कि हाल की जानकारी से पता चलता है कि चीन के वैज्ञानिक शायद इस प्रोजेक्ट के खतरों को वहां के राजनीतिक नेतृत्व से ज्यादा साफ तौर पर समझते हैं।  चीन के अपने भूवैज्ञानिक वैज्ञानिक जब खतरे की चेतावनी दे रहे हैं, तब रिपोर्ट के मुताबिक बीजिंग को पारदर्शिता को प्राथमिकता देनी चाहिए और यह मानना चाहिए कि इस नदी का पानी सिर्फ चीन का मामला नहीं है. बांध के ऊपर की ओर बन रहा यह संभावित 'वॉटर बम' बनने से पहले चीन को अपनी सीमा के बाहर पड़ने वाले देशों की जिम्मेदारी को भी समझना चाहिए। 

Central Employees के लिए बड़ी खबर, 8वें वेतन आयोग से DA तक इन फैसलों का है इंतजार

नई दिल्ली केंद्रीय कर्मचारियों के लिए अगले दो महीने काफी अहम रहने वाले हैं। दरअसल, इन दो महीनों में ना सिर्फ केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) पर फैसला होगा बल्कि आठवें वेतन आयोग की कई अहम बैठकें भी होने वाली हैं। इन बैठकों के बाद वेतन आयोग कुछ अहम फैसले ले सकता है। आइए डिटेल में जान लेते हैं। कब होगा डीए पर फैसला? केंद्र सरकार के कर्मचारी और पेंशनभोगी जुलाई 2026 के महंगाई भत्ते (DA) में बदलाव पर सरकार के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। अगर सबकुछ ठीक रहा तो सरकार दशहरे तक इसका ऐलान कर सकती है। इस बार दशहरा 20 अक्टूबर को है। इसका मतलब है कि 20 अक्टूबर तक डीए का ऐलान हो सकता है। बता दें कि डीए की दर साल में दो बार एक तय फॉर्मूले के आधार पर बदली जाती है, जो 'ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स फॉर इंडस्ट्रियल वर्कर्स' (AICPI-IW) से जुड़ा होता है। सरकार ने 1 जनवरी 2026 से DA को 2 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 58% से 60% कर दिया था। पेंशनभोगियों के लिए महंगाई राहत यानी डीआर को भी बढ़ाकर 60% कर दिया गया था। अब 3 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान है। ऐसे में केंद्रीय कर्मचारियों का जुलाई से दिसंबर तक के लिए डीए बढ़कर 63% हो जाएगा। 8वें वेतन आयोग की ताबड़तोड़ बैठकें आठवें वेतन आयोग के गठन को 10 महीने पूरे होने वाले हैं। गठन के 10 महीने बाद अब वेतन आयोग अपनी रिपोर्ट को बनाने की तैयारी में है। जानकार बताते हैं कि वेतन आयोग की कर्मचारी संगठनों के साथ बैठकों का अंतिम दौर चल रहा है। 8वें वेतन आयोग की आने वाली बैठकें -9 सितंबर को पुडुचेरी में बातचीत -16 से 18 सितंबर तक चंडीगढ़ में बातचीत -7 और 8 अक्टूबर को बेंगलुरु में बातचीत यह संभव है कि वेतन आयोग अब अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा और जनवरी तक अंतरिम रिपोर्ट सरकार को सौंप सकता है। बता दें कि केंद्र सरकार ने 3 नवंबर 2025 को 8वां वेतन आयोग बनाया था। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला यह आयोग केंद्र सरकार द्वारा 3 नवंबर 2025 को स्थापित किया गया था। यह अस्थायी संस्था संबंधित सरकारी निकायों, पेंशनभोगियों और अन्य हितधारकों के साथ बातचीत के बाद सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपेगी। इसके दायरे में वेतन, भत्ते, पेंशन और सेवा में सुधार जैसे विषय शामिल हैं। उम्मीद है कि वेतन आयोग की फाइनल रिपोर्ट मई-जून 2027 तक पेश की जाएगी। अगर सैलरी, फिटमेंट फैक्टर, भत्ते या पेंशन में कोई बदलाव किया जाता है, तो यह 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों और उसके बाद सरकार के फैसले पर निर्भर करेगा। छठे और सातवें वेतन आयोग के दौरान, फिटमेंट फैक्टर क्रमशः 1.86 और 2.57 तय किए गए थे। 8वें वेतन आयोग के लिए, BPMS, NC(JCM) और AIDEF जैसे यूनियन और संगठन 3 से 4 तक के फिटमेंट फैक्टर की मांग कर रहे हैं।

~SKM प्रधानमंत्री से मिलने का समय दिये जाने का इंतज़ार कर रहा है ताकि उन्हें ज्ञापन सौंपा जा सके और SKM प्रतिनिधिमंडल के साथ खेती-किसानी से जुड़े संकट पर चर्चा की जा सके

 दिल्ली आज हुई एक ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में, SKM के नेताओं ने बताया कि उन्होंने PMO को एक पत्र भेजकर प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा है, ताकि वे भारत के किसानों की मांगों का ज्ञापन सौंप सकें। हालांकि PMO को SKM का पत्र मिल गया है, लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से अभी तक मिलने का कोई समय नहीं दिया गया है। इसलिए SKM का मानना है कि प्रधानमंत्री तक भारत के उन किसानों का पहुँच पाना मुश्किल हैं जो देश की आबादी का 65% हिस्सा हैं। यह हैरानी की बात है कि प्रधानमंत्री भारत के लोगों के एक बहुत बड़े हिस्से के प्रतिनिधियों से मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं; इससे पता चलता है कि RSS-BJP गठबंधन को भारत के किसानों की कितनी कम परवाह है। SKM को उम्मीद है कि समझदारी से काम लिया जाएगा और प्रधानमंत्री, संसदीय प्रणाली और भारत के संविधान की लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करते हुए, SKM के नेतृत्व वाले किसान प्रतिनिधिमंडल से मिलेंगे। साथ ही, वे केंद्र सरकार द्वारा 9 दिसंबर, 2021 को SKM को दिए गए लिखित आश्वासन को लागू न किए जाने के मुद्दे पर भी चर्चा करेंगे। याद दिला दें कि जो ज्ञापन प्रधानमंत्री को सौंपा जाना है, वही ज्ञापन पूरे भारत में सभी चुने हुए प्रतिनिधियों – यानी मुख्यमंत्रियों, सांसदों और विधायकों – को भी सौंपा जा रहा है। इस ज्ञापन में संसद और विधानसभाओं से मांग की गई है कि वे MSP@C2+50% के लिए कानून बनाएं, 42,000 रुपये प्रति माह की न्यूनतम मजदूरी की गारंटी दें, यह सुनिश्चित करें कि लोगों के हितों को नुकसान पहुंचाने वाले कोई भी FTA (मुक्त व्यापार समझौते) न हों, किसानों का पूरा कर्ज माफ करने के लिए कदम उठाएं, और कृषि संकट, बेरोजगारी, मजबूरी में पलायन तथा किसानों और दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्याओं को खत्म करने के लिए नीतियां बनाएं। साथ ही, इसमें 4 लेबर कोड को रद्द करने, मनरेगा (MGNREGA) को बहाल करने और राज्यों के संघीय अधिकारों की रक्षा करने और विभाजित किये जाने वाले पूल (जिससे सेस व सरचार्ज षामिल हैं।) में 50 प्रतिषत की हिस्सेदारी के राज्यों के अधिकार की रक्षा की जाये। SKM ने केंद्र सरकार का ध्यान कॉर्पोरेट हितों को बढ़ावा देने वाली मनमानी नीतियों के खिलाफ किसानों में बढ़ते गुस्से की ओर दिलाया है। प्राप्त जानकारी  के मुताबिक, SKM की ओर से 10 अगस्त को बुलाए गए विरोध प्रदर्शन में 480 से ज़्यादा ज़िलों में लगभग दस लाख लोगों ने हिस्सा लिया। यह पूरे देश में हुआ एक अहम विरोध प्रदर्शन था, जिसमें मोदी सरकार के खिलाफ आम लोगों का बढ़ता गुस्सा साफ दिखा। इसमें छात्र, युवा और महिलाओं के वर्गों ने भी हिस्सा लिया। SKM ने 3 अक्टूबर 2026 – यानी लखीमपुर खीरी शहीद दिवस – को 1 लाख गांवों में महापंचायतें करने का ऐलान किया है। 26 नवंबर 2026 से किसानों के संघर्ष को फिर से शुरू करने के लिए 10 लाख किसान वॉलंटियर्स (जिनमें 2.5 लाख महिला किसान शामिल हैं) की सूची  जारी की जाएगी। महापंचायतों में इन मुद्दों पर प्रस्ताव पास किए जाएंगे: 1. केंद्र सरकार द्वारा 9 दिसंबर 2021 को SKM को दिए गए लिखित आश्वासनों को लागू करना; 2. दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर 736 शहीद किसानों के सम्मान में शहीद स्मारक बनाना; 3. भारत के लोगों पर जन-विरोधी FTA थोपने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने झुकने वाली कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक मोदी सरकार से लड़ने के लिए मज़दूर-किसान एकता बनाना। अगर मोदी सरकार किसानों की अहम मांगों को नज़रअंदाज़ करती रही, तो SKM की नेशनल काउंसिल और जनरल बॉडी 12 अक्टूबर को हरियाणा के करनाल में बैठक करेगी। इस बैठक में 26 नवंबर, 2026 से किसानों के आंदोलन को फिर से शुरू करने के तरीके, जगहों और दूसरी ज़रूरी बातों पर फ़ैसला लिया जाएगा। प्रेस कॉन्फ्रेंस को एसकेएम राष्ट्रीय समन्वय समिति के सदस्य डॉ. अशोक धावले, अविक साहा, डॉ. सुनीलम, राजन क्षीरसागर, सत्यवान और पी कृष्णप्रसाद ने संबोधित किया।  

Trump Birthright Citizenship: अमेरिकी नागरिकता पर ट्रंप का दांव फिर फेल, कोर्ट ने नए आदेश पर लगाई रोक

वाशिंगटन अमेरिका में इमिग्रेशन पॉलिसी सख्त करने की कोशिश में लगे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक और झटका लगा है. अमेरिका में एक फेडरल जज ने बुधवार, 2 सितंबर को ट्रंप सरकार को झटका दिया. जज ने ट्रंप सरकार को जन्म के आधार पर मिलने वाली अमेरिकी नागरिकता के नियमों को सीमित करने वाले नए आदेश को लागू करने से रोक दिया है. इस फैसले से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका के अंदर जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को सीमित करने की नई कोशिश फिलहाल रुक गई है. इससे पहले भी ट्रंप ने ऐसा ही कदम उठाया था, लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पिछली कोशिश को खारिज कर दिया था।  अब कोर्ट में क्या हुआ? मैरीलैंड की अमेरिकी जिला जज डेबोरा बोर्डमैन ने यह शुरुआती रोक लगाई है. एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार मानवाधिकार संगठनों ने ट्रंप के 6 अगस्त के कार्यकारी आदेश को चुनौती दी थी. इस आदेश का निशाना उन लोगों पर था, जिन्हें ट्रंप ने “बर्थ टूरिज्म” यानी बच्चे को जन्म देने के लिए अमेरिका आने वाला बताया था।  बोर्डमैन ने अपने 35 पन्नों के फैसले में लिखा कि “सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना चुका है. इस मामले में शामिल बच्चों को जन्म के समय ही अमेरिकी नागरिक माना जाता है.” उन्होंने आगे कहा कि ट्रंप का 6 अगस्त वाला आदेश लगभग निश्चित रूप से असंवैधानिक है, यानी अमेरिकी संविधान के खिलाफ है. प्रवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया।  रिपोर्ट के अनुसार मैरीलैंड की संस्था वी आर कासा की लीगल डायरेक्टर शाना खदर ने कहा, “जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता पर हमला करने के मामले में ट्रंप सरकार इस अदालत में हार चुकी है, सुप्रीम कोर्ट में भी हार चुकी है और आज फिर हार गई।  ट्रंप के आदेश और अदालत के फैसले ट्रंप का नया कार्यकारी आदेश उन लोगों को निशाना बनाता है, जिनके बारे में उनका आरोप है कि वे पर्यटन के बहाने अमेरिका आते हैं, लेकिन असल में उनका इरादा बच्चे को जन्म देने का होता है. इस मुद्दे पर ट्रंप के पहले कार्यकारी आदेश में कहा गया था कि अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे माता-पिता या अस्थायी वीजा पर अमेरिका आए माता-पिता के यहां पैदा होने वाले बच्चों को अपने आप अमेरिकी नागरिकता नहीं मिलेगी।  निचली अदालतों ने ट्रंप के इस कदम को रोक दिया था. अदालतों ने कहा था कि अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के नागरिकता संबंधी नियम के तहत, अमेरिका की जमीन पर पैदा होने वाले लगभग हर व्यक्ति को अमेरिकी नागरिक माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट भी इस बात से सहमत हुआ।  जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को सीमित करने की ट्रंप की कोशिश उनकी अमेरिका में प्रवासियों की संख्या कम करने की बड़ी मुहिम का हिस्सा है. इस मुहिम में बिना कानूनी डॉक्यूमेंट वाले लाखों प्रवासियों को अमेरिका से निकालना और एक दर्जन से ज्यादा देशों के नागरिको को देश से निकाले जाने से मिली कानूनी सुरक्षा हटाना भी शामिल है। 

8th Pay Commission में 7% Increment हुआ लागू तो कितनी बढ़ेगी Salary? जानें पूरा कैलकुलेशन

नई दिल्ली  8वें वेतन आयोग के गठन के बाद से ही इस पर लगातार चर्चा चल रही है. देशभर के केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों की निगाह भी इसी पर टिकी है कि नए आयोग की सिफारिशों के बाद उनके वेतन और भत्तों में कितना उछाल आएगा. इसी पर मंथन करने के लिए वेतन आयोग के सदस्यों ने जयपुर में बैठक की थी और अब 7 व 8 सितंबर को चेन्नई में भी हितधारकों के साथ बातचीत करेंगे. आयोग के सदस्य तमाम कर्मचारी और पेंशनर्स के संगठनों से बातचीत करके उनकी डिमांड और जरूरतों की लिस्ट बना रहे हैं. इसमें सालाना इंक्रीमेंट भी इस बार बड़ा मुद्दा बना हुआ है. सभी कर्मचारी संगठनों ने एक सुर में कहा है कि सालाना 3 फीसदी का इंक्रीमेंट जायज नहीं है और इसे हर हाल में बढ़ाया जाना चाहिए।  सालाना वेतन वृद्धि का मौजूदा फॉर्मूला कहता है कि केंद्रीय कर्मचारियों को 3 फीसदी का इंक्रीमेंट मिलता है. हालांकि, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह राशि उनके खर्चे और बढ़ती महंगाई को पूरा करने में पर्याप्त नहीं होते हैं. संगठनों की डिमांड है कि इस इंक्रमेंट को कम से कम 5 से 7 फीसदी किया जाना चाहिए. अगर आयोग संगठन की बात मानता है और 7 फीसदी सैलरी इंक्रीमेंट को मंजूरी मिलती है तो आपकी सैलरी में कितना इजाफा होगा।  क्या है संगठनों की डिमांड केंद्रीय कर्मचारियों के मुख्य संगठन नेशनल काउंसिल ऑफ ज्वाइन कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM) का कहना कि 8वें वेतन आयोग में कम से कम 6 फीसदी का सालाना इंक्रीमेंट होना चाहिए. इसके अलावा आल इंडिया डिफेंस एम्पलॉयीज फेडरेशन (AIDEF) और फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशन (FNPO) ने भी सालाना 6 फीसदी सैलरी इंक्रीमेंट की सिफारिश की है. आल इंडिया न्यू पेंशन स्कीम एम्पलॉयीज फेडरेशन (AINPSEF) ने तो सालाना 7 फीसदी इंक्रीमेंट का मुद्दा उठाया है. हालांकि, रेलवे कर्मचारियों के संगठन ने 5 फीसदी इंक्रीमेंट पर ही संतोष जताया है।  अभी इंक्रीमेंट का कितना असर मौजूदा इंक्रीमेंट दर 3 फीसदी और इसे लेवल 1 के कर्मचारियों पर लागू किया जाए तो सालाना कितना इंक्रीमेंट होता है. 7वें वेतन आयोग में लेवल 1 के कर्मचारियों की बेसिक सैलरी 18 हजार रुपये है. इसमें 3 फीसदी इंक्रीमेंट होता है तो हर साल बेसिक सैलरी में सिर्फ 540 रुपये का इजाफा होगा और 10 साल में कुल 5,400 रुपये के इंक्रीमेंट के साथ बेसिक सैलरी 23,400 रुपये तक पहुंचेगी. लेवल 5 के कर्मचारियों की बेसिक अभी 29,200 रुपये है और 3 फीसदी इंक्रीमेंट पर सालाना वेतन वृद्धि 876 रुपये होगी. इसका मतलब है कि 10 साल में 8,760 रुपये के इंक्रीमेंट के साथ कुल बेसिक 37,960 रुपये ही पहुंचेगी।  8वें वेतन आयोग में कैसे होगा इंक्रीमेंट का असर कर्मचारी संगठनों का कहना है कि 3 फीसदी इंक्रीमेंट से एक वेतन आयोग के पूरे कार्यकाल में भी बेसिक सैलरी पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है. अगर इंक्रीमेंट को 7 फीसदी रखा जाए तो 10 साल में उनका बेसिक पे अमूमन दोगुने के करीब हो जाएगा. 7वें वेतन आयोग में लेवल 8 के कर्मचारी के बेसिक पे के आधार इंक्रीमेंट रेट लागू करके देखते हैं कि कितना असर पड़ता है. अभी लेवल 8 का बेसिक पे 47,600 रुपये है. अगर 8वां वेतन आयोग 2.15 का फिटमेंट फैक्टर लागू करता है तो 3,5,6 और 7 फीसदी इंक्रीमेंट के साथ सैलरी पर कितना असर पड़ेगा।  कितना बढ़ जाएगा आपका वेतन     लेवल 8 के कर्मचारी का अभी मूल वेतन 47,600 रुपये जो 2.15 का फिटमेंट फैक्टर लगने के बाद 1,02,340 रुपये हो जाएगा.     8वें वेतन आयोग के बाद लेवल 8 के कर्मचारी के 1,02,340 रुपये की बेसिक सैलरी पर 3 फीसदी इंक्रीमेंट होता है तो 10 साल में कुल मूल वेतन 1,40,78,561 रुपये पहुंच जाएगा.     अगर इंक्रीमेंट 5 फीसदी की दर से होता है तो बेसिक पे 10 साल में 1,54,46,658 रुपये हो जाएगा, जो 13,68,097 रुपये ज्यादा होगा.     अगर इंक्रीमेंट की दर 6 फीसदी निर्धारित होती है तो 10 साल में कुल मूल वेतन 1,61,87,071 रुपये होगा.     इसी तरह, 7 फीसदी का इंक्रीमेंट लगता है तो 8वें वेतन आयोग के तहत 10 साल में कुल बेसिक सैलरी के रूप में 1,69,67,703 रुपये का भुगतान किया जाएगा.  

NRI ने भर दिया भारत का डॉलर खजाना! RBI की स्कीम को मिला जबरदस्त रिस्पॉन्स, 127 अरब डॉलर जुटाए

नई दिल्ली प्रवासी भारतीयों (NRI) से डॉलर जुटाने की रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की खास पहल उम्मीद से कहीं ज्यादा सफल रही. 31 अगस्त 2026 तक फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) यानी FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए भारत में $100 बिलियन से ज्यादा की रकम आ चुकी थी. तेज इनफ्लो को देखते हुए RBI ने इस स्कीम के लिए दी गई स्पेशल स्वैप फैसिलिटी की विंडो तय समय से करीब एक महीने पहले ही बंद कर दी।  इस तेज डॉलर इनफ्लो से भारत का फॉरेक्स रिजर्व भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. 21 अगस्त तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार $729.3 बिलियन था. इससे कुछ ही हफ्ते पहले 24 जुलाई को यह करीब $682 बिलियन था।  मिडिल ईस्ट संकट से बढ़ा डॉलर का दबाव RBI का यह कदम ऐसे समय में आया, जब मिडिल ईस्ट में जारी जंग और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भारत के बाहरी खाते और रुपये पर दबाव बढ़ा रखा था. रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल फरवरी में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद भारत के फॉरेक्स रिजर्व में करीब $46 बिलियन की कमी आई थी. इसी दौरान 24 जुलाई तक रिजर्व करीब $682 बिलियन रह गया था, जबकि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 6% कमजोर हो चुका था. ऐसे माहौल में RBI ने NRI से विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए FCNR(B) डिपॉजिट को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई।  क्या है FCNR(B) डिपॉजिट? फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) यानी FCNR(B) अकाउंट NRI के लिए एक फिक्स्ड टर्म डिपॉजिट होता है. इसमें NRI अपनी विदेशी कमाई को भारत में विदेशी मुद्रा में जमा कर सकते हैं. उन्हें रकम को पहले भारतीय रुपये में बदलने की जरूरत नहीं होती. इस खाते की खासियत यह है कि मूलधन और उस पर मिलने वाला ब्याज दोनों विदेशी मुद्रा में ही वापस मिलते हैं. ऐसे में NRI को रुपये में उतार-चढ़ाव का जोखिम नहीं उठाना पड़ता।  क्यों शुरू करनी पड़ी खास स्वैप फैसिलिटी? FCNR(B) डिपॉजिट में इनफ्लो पहले कमजोर हो गया था. वित्त वर्ष 2024-25 में इस माध्यम से $7 बिलियन से ज्यादा की रकम आई थी, लेकिन FY26 में यह घटकर सिर्फ $946 मिलियन रह गई. इनफ्लो को फिर से बढ़ाने के लिए RBI ने जून 2026 में एक खास स्वैप फैसिलिटी का ऐलान किया था. इसके तहत 3 से 5 साल की अवधि वाले नए FCNR(B) डिपॉजिट पर बैंकों को रियायती स्वैप की सुविधा दी गई. इस व्यवस्था में हेजिंग की लागत RBI ने वहन की. इसका मकसद NRI को विदेशी मुद्रा भारत में जमा करने के लिए ज्यादा आकर्षक विकल्प देना था।  RBI की उम्मीद से कहीं ज्यादा आया पैसा RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा को शुरुआत में करीब $80 बिलियन के इनफ्लो की उम्मीद थी. लेकिन डिपॉजिट में पैसा आने की रफ्तार अनुमान से काफी ज्यादा रही. अगस्त की शुरुआत तक ही करीब $40.8 बिलियन आ चुके थे. इसके बाद 31 अगस्त तक FCNR(B) के जरिए आने वाली रकम $100 बिलियन के आंकड़े को पार कर गई. तेज इनफ्लो को देखते हुए RBI ने 30 सितंबर 2026 की तय डेडलाइन का इंतजार नहीं किया और स्पेशल स्वैप फैसिलिटी की विंडो करीब एक महीने पहले ही बंद कर दी।  फॉरेक्स रिजर्व और रुपये को मिला सहारा इस डॉलर इनफ्लो का असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दिखाई दिया. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, 21 अगस्त तक भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर रिकॉर्ड $729.3 बिलियन पर पहुंच गया था. 24 जुलाई को यह करीब $682 बिलियन था. इतना बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट को फाइनेंस करने और बाहरी झटकों से निपटने में मदद कर सकता है. रुपये को भी इससे कुछ राहत मिली. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 सितंबर को रुपया 0.4% मजबूत होकर 94.7988 प्रति डॉलर पर पहुंच गया. यह 1 जुलाई के बाद रुपये का सबसे मजबूत स्तर था. इस दौरान RBI ने ऑफशोर और ऑनशोर बाजारों में डॉलर की बिक्री भी की।  NRI से पहले भी RBI ने जुटाए हैं डॉलर मुश्किल आर्थिक परिस्थितियों में RBI के लिए NRI से विदेशी मुद्रा जुटाना कोई नया कदम नहीं है. 1991 के बैलेंस ऑफ पेमेंट्स संकट के दौरान भी प्रवासी भारतीयों के विदेशी मुद्रा संसाधनों का इस्तेमाल किया गया था. इसके बाद 2013 में रुपये पर दबाव बढ़ने के दौरान करीब $34 बिलियन जुटाए गए थे. $100 बिलियन से ज्यादा का फॉरेन करेंसी इनफ्लो दिखाता है कि संकट के समय NRI डिपॉजिट भारत के लिए विदेशी मुद्रा जुटाने का एक अहम जरिया बन सकता है। 

GDP पर उठे सवाल तो World Bank ने दिया जवाब, बोले- कम FDI से भारतीय अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ता बड़ा असर

 नई दिल्ली भारत की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को लेकर बहस तेज हो गई है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की GDP ग्रोथ 7.8% रही है. सरकार जहां इसे अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति का संकेत बता रही है, वहीं पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने GDP के आंकड़ों और इसकी गणना के तरीके पर सवाल उठाए हैं. इस बीच वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने GDP पर उठ रहे सवालों को खारिज करते हुए तीखी टिप्पणी की है।  विवाद की बड़ी वजह GDP की नई सीरीज है. फरवरी 2026 में सरकार ने GDP की नई सीरीज जारी की थी, जिसमें बेस ईयर 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया. इसके साथ आंकड़े जुटाने और उनकी गणना के तरीके में भी बदलाव किया गया. पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का कहना है कि नई सीरीज में पिछली तिमाहियों के आंकड़ों में बड़ा बदलाव आया है।  उन्होंने खास तौर पर जून 2025 की तिमाही के मौजूदा कीमतों वाले GDP आंकड़े में करीब 6 लाख करोड़ रुपये की कमी का मुद्दा उठाया है. सुभाष चंद्र गर्ग का तर्क है कि अगर पुराने आंकड़ों को आधार बनाया जाए तो जून 2026 की ग्रोथ का आंकड़ा काफी अलग दिखाई देगा और यह 2.6% के आसपास ठहरेगा. उनका यह दावा सरकार के 7.8% ग्रोथ के दावे के एकदम विपरीत है।  कांग्रेस भी सरकार पर उठा रही सवाल कांग्रेस भी GDP के आंकड़ों को लेकर सरकार पर निशाना साध रही है. पार्टी का आरोप है कि नई GDP सीरीज और आंकड़ों में बदलाव के जरिए अर्थव्यवस्था की तस्वीर को जरूरत से ज्यादा मजबूत दिखाया जा रहा है. कांग्रेस का कहना है कि सिर्फ GDP ग्रोथ बढ़ने से आम लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं हो जाती. रोजगार, कमाई, खपत और लोगों की जेब में बचने वाली रकम जैसे मुद्दों को भी देखना जरूरी है।  नीलकंठ मिश्रा ने दावों को बताया 'अल्पज्ञान' इस पूरे विवाद के बीच वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर GDP के आंकड़ों का बचाव किया. उन्होंने GDP की नई सीरीज पर सवाल उठाने वालों पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें 'अल्पज्ञानी और बेहद गलत दावों' को देखकर हैरानी होती है. उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और कांग्रेस पार्टी की ओर माना जा रहा है।  नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि GDP के आंकड़ों में हुए बदलाव को समझे बिना पुराने और नए आंकड़ों की तुलना करना सही नहीं है. उनके मुताबिक, नई सीरीज में आंकड़े जुटाने और अर्थव्यवस्था की वास्तविक गतिविधियों को मापने का तरीका बेहतर किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि गलत जानकारी कई बार सही जानकारी से ज्यादा तेजी से फैलती है. इसलिए सही तथ्यों को बार-बार सामने रखना जरूरी है।  सिर्फ GDP नहीं, ये आंकड़े भी सकारात्मक नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति समझने के लिए सिर्फ GDP का आंकड़ा देखना पर्याप्त नहीं है. उन्होंने अगस्त के कई आंकड़ों का हवाला दिया. उनके मुताबिक, कार और SUV की बिक्री में करीब 35% की बढ़ोतरी हुई है. दोपहिया वाहनों की बिक्री भी 20% से ज्यादा बढ़ी है. निर्यात में करीब 9% की बढ़ोतरी हुई है. कमर्शियल वाहनों की बिक्री में तो करीब 40% की तेजी देखने को मिली है. वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा के मुताबिक, यह कारोबार और निर्माण गतिविधियों में मजबूती का संकेत है।  कर्ज और निवेश में भी दिख रहा सुधार नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि बैंक लेंडिंग की ग्रोथ भी उम्मीद से बेहतर रही है. उनके मुताबिक, पहले कर्ज की धीमी रफ्तार की एक बड़ी वजह बैंकों की तरफ से कर्ज देने में कमजोरी थी, लेकिन अब इसमें सुधार दिखाई दे रहा है. टैक्स कलेक्शन में सुधार और निर्माण क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि देश में निवेश की गतिविधियां भी जारी हैं. निर्माण क्षेत्र के सभी संकेतक बेहद मजबूत हैं. उनका मानना है कि अब उन लोगों की संख्या बेहद कम हो जानी चाहिए जो लगातार निजी क्षेत्र के निवेश के कमजोर होने का रोना रोते हैं, क्योंकि देश में निवेश के स्पष्ट और पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं।  आम आदमी की कमाई अब भी चुनौती हालांकि, नीलकंठ मिश्रा ने यह भी माना कि अर्थव्यवस्था में अभी कुछ 'स्लैक' यानी कमियां मौजूद हैं. इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था अभी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रही है. उन्होंने वास्तविक वेतन यानी महंगाई को हटाने के बाद बचने वाली कमाई में धीमी बढ़ोतरी को इसका एक संकेत बताया. उनके मुताबिक, इस स्थिति को पूरी तरह बदलने में कुछ तिमाहियां लग सकती हैं. उन्होंने कहा कि इन कमियों को पूरी तरह से दूर करने और लेबर मार्केट को मजबूत करने के लिए देश को लगातार कई तिमाहियों तक औसत से अधिक की आर्थिक विकास दर बनाए रखनी होगी, ताकि मार्केट पूरी तरह से चुस्त हो सके और भविष्य में महंगाई के दबावों को नियंत्रित रखा जा सके।  7.5% तक पहुंच सकती है भारत की ग्रोथ भविष्य की अर्थव्यवस्था को लेकर वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने काफी सकारात्मक रुख दिखाया है. उनका कहना है कि देश पर बजट का दबाव अब कम हो रहा है और मौद्रिक नीतियां भी अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल बन रही हैं. इसका असर GDP ग्रोथ पर भी दिख रहा है. उनके मुताबिक, आने वाले समय में भारत की औसत GDP ग्रोथ 7% से ऊपर रह सकती है. यहां तक कि अगर सरकार की बजट और मौद्रिक नीतियां सामान्य यानी तटस्थ भी रहती हैं, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था करीब 7.5% की ग्रोथ हासिल कर सकती है. हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले समय में महंगाई का दबाव फिर बढ़ सकता है।