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आधुनिक युद्ध में टैंक बेकार या अब भी सबसे बड़ा हथियार? जानिए विशेषज्ञों की राय

नई दिल्ली पहले रूस-यूक्रेन और फिर ईरान बनाम इजरायल-अमेरिका। पिछले कुछ सालों में दुनिया दो बड़ी जंगें देख चुकी है। हालांकि, भारत-पाकिस्तान के बीच भी इस दौरान एक छोटा युद्ध हुआ, लेकिन लंबे कालखंड में रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल की जंग ही चली। इन दोनों जंगों में दुनिया ने देखा कि कैसे आधुनिक युद्ध का मैदान पूरी तरह से बदल चुका है। पैदल सैनिकों, बंदूकों और तोप की जगह अब मिसाइल, एयरक्राफ्ट और ड्रोन ने ले ली है। तो सवाल उठता है कि क्या थल सेना और तोपों की अहमियत अब खत्म हो गई है? इसका जवाब है-नहीं। डिफेंस एक्सपर्ट से जानें सब दरअसल, सैन्य एक्सपर्ट्स का तर्क है कि चाहे ड्रोन हों या फाइटर जेट ये दोनों ही जंग के असली मकसद को हासिल नहीं कर सकते, यानी किसी इलाके पर कब्जा नहीं कर सकते। आइए, यूक्रेन से मिले सबक और डिफेंस एक्सपर्ट की राय के आधार पर इस बात का विश्लेषण करते हैं कि युद्ध के तरीकों में तेजी से बदलाव के बावजूद टैंक और जमीनी सेना क्यों अब भी बेहद जरूरी हैं। टैंक अब भी जरूरी क्यों? जब 500 डॉलर का ड्रोन और 30,000 डॉलर की एंटी-टैंक मिसाइल करोड़ों की कीमत वाले टैंक को तबाह कर सकती है तो यह सवाल पूछा जा सकता है कि टैंकों पर निवेश क्यों करना चाहिए? ये सवाल इसलिए भी खड़ा हो रहा है, क्योंकि सोशल मीडिया पर यूक्रेन की सड़कों पर जलते हुए टैंकों के वीडियो भरे पड़े हैं। इससे लोगों को लगने लगा है कि टैंक अब बेकार हो चुके हैं। लेकिन कई सेनाएं बख्तरबंद युद्ध (आर्मर्ड वॉरफेयर) को छोड़ नहीं रही हैं। असल में कुछ सेनाएं तो इस पर और ज्यादा जोर दे रही हैं। टैंक में आज भी ये खूबियां वर्तमान स्थिति में टैंकों को छोड़ना नहीं, बल्कि उनके इस्तेमाल के तरीके पर फिर से सोचना ही समझदारी का काम है। दरअसल, टैंकों में आज भी ऐसी खूबियां हैं जिनका मुकाबला शायद ही कोई और हथियार कर सके। इसमें तेजी से चलने की क्षमता (मोबिलिटी), सुरक्षा और जबरदस्त मारक क्षमता (फायरपावर) एक अनोखा मेल है। टैंक की खासियत     ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चल सकते हैं     ऐसे हमले झेल सकते हैं, जिनसे गाड़ियां तबाह हो जाएं     मजबूत ठिकानों पर जबरदस्त हमला कर सकते हैं     टैंक कॉम्बिनेशन 'शॉक इफेक्ट' पैदा करता है घुटने टेकने पर करते हैं मजबूर टैंकों से एक ऐसा मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक फायदा मिलता है, जो बिना तैयारी वाले बचाव करने वालों को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है। आधुनिक युद्ध अब सिर्फ टैंकों के अकेले काम करने तक सीमित नहीं है। आज के जमाने में अलग-अलग तरह की सेनाओं को एक साथ मिलाकर काम करना ही सबसे बेहतर माना जाता है। 'कंबाइंड आर्म्स ऑपरेशन्स' में टैंक पैदल सेना (इन्फैंट्री), UAV, इंजीनियर और आर्टिलरी के साथ मिलकर बहुत अच्छी तरह से तालमेल बिठाकर हमले करते हैं। टैंकों को बचाती है पैदल सेना हमने हाल ही में देखा है कि गाजा या दक्षिणी लेबनान में इजरायली सेना शायद ही कभी पैदल सेना की सुरक्षा और लगातार ड्रोन की निगरानी के बिना मर्कावा टैंक तैनात करती है। पैदल सेना टैंकों को RPG जैसे करीबी खतरों से बचाती है, ड्रोन आगे जाकर जानकारी जुटाते हैं और आर्टिलरी दुश्मन के मजबूत ठिकानों को दबाती है। जब यह तालमेल सही तरीके से किया जाता है तो अकेले काम करने पर टैंकों को जिन खतरों का सामना करना पड़ता है, वे काफी कम हो जाते हैं।  

सेशेल्स सम्मान पर पाकिस्तान के बयान का भारत ने किया तीखा पलटवार

नई दिल्ली सेशेल्स के नए राष्ट्रपति सम्मान को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करना पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ को भारी पड़ गया है। भारत सरकार ने उनके इस बयान पर बेहद तीखा और कड़ा पलटवार किया है। सरकारी सूत्रों ने ख्वाजा आसिफ की मानसिक स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उनके पास कोई काम धंधा नहीं है और वे उन मामलों पर बचकाने कमेंट करके अपना वक्त काट रहे हैं, जिनकी उन्हें रत्ती भर भी समझ नहीं है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों ने पाकिस्तानी रक्षा मंत्री को आड़े हाथों लिया। सूत्रों ने तंज कसते हुए कहा कि ख्वाजा आसिफ को रक्षा मंत्रालय जैसी बड़ी जिम्मेदारी मिलना ही आज के पाकिस्तान के बदतर हालात को बयां करता है। भारत सरकार के सूत्रों ने कहा, "यह हर कोई जानता है कि ख्वाजा आसिफ मानसिक रूप से अस्थिर हैं। उन्हें मौजूदा जिम्मेदारी सौंपा जाना आज के पाकिस्तान के बारे में बहुत कुछ बताता है। साफ है कि उनके पास दिन भर करने के लिए कोई काम नहीं है। वे उन चीजों पर फालतू की टिप्पणी करके समय बर्बाद करते हैं, जिनका उन्हें कोई ज्ञान नहीं है। नफरत से भरे किसी व्यक्ति के भीतर से जब ईर्ष्या (जलन) बाहर आती है, तो वह बहुत ही घटिया लगती है।" यह तीखी प्रतिक्रिया तब आई जब आसिफ ने पीएम मोदी को मिले सेशेल्स के सम्मान का मजाक उड़ाया था और इसे 'पहले से सेटिंग करके' तैयार किया गया सम्मान बताया था। पीएम मोदी को मिला है सेशेल्स का सर्वोच्च सम्मान दरअसल, पिछले हफ्ते सेशेल्स के दौरे पर गए पीएम मोदी को वहां के नए राष्ट्रपति सम्मान 'गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन' से नवाजा गया था। पर्यावरण संरक्षण और छोटे द्वीपीय देशों के विकास में उनके योगदान के लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया। पीएम मोदी इस पुरस्कार को पाने वाले दुनिया के पहले नेता बने हैं। दिलचस्प बात यह है कि सेशेल्स सरकार ने पीएम मोदी के दौरे से कुछ हफ्ते पहले ही अपनी पुरानी पुरस्कार प्रणाली को बदलकर इस नए राष्ट्रीय सम्मान की शुरुआत की थी। अवॉर्ड पर क्यों हुआ विवाद? इस अवॉर्ड को लेकर भारत के भीतर भी सियासी घमासान मचा हुआ है। विपक्षी दलों ने सोशल मीडिया पर इस अवॉर्ड के ऑफिशियल साइटेशन (प्रशस्ति पत्र) की एक तस्वीर शेयर करते हुए दावा किया था कि इसमें स्पेलिंग और टाइपिंग की कई गलतियां हैं। विपक्ष का यह भी आरोप था कि इस सर्टिफिकेट को AI टूल्स की मदद से जल्दबाजी में तैयार किया गया है। विवाद बढ़ता देख सेशेल्स सरकार ने खुद सामने आकर सफाई दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सम्मान पूरी तरह असली और प्रामाणिक है। उन्होंने बताया कि देश में पुराना अवॉर्ड सिस्टम राजनीतिक विवादों के कारण रद्द कर दिया गया था और नया सिस्टम बनाया जा रहा था। इस नए सम्मान को वहां की कैबिनेट ने 24 जून को ही मंजूरी दी थी, यानी पीएम मोदी के पहुंचने से महज कुछ दिन पहले। गलतियों के मुद्दे पर सेशेल्स ने माना कि जो तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, वह दरअसल एक 'वर्किंग ड्राफ्ट' थी जो गलती से बाहर आ गई। अब असली और पूरी तरह जांचा हुआ सर्टिफिकेट जारी कर दिया गया है। समय की कमी के कारण इस सर्टिफिकेट को बनाने में डिजिटल डिजाइन टूल्स (AI) की मदद ली गई थी। इस बीच, सत्ताधारी भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पीएम मोदी को उनकी 'ग्रीन लीडरशिप' के लिए यह सम्मान मिलना पूरे देश के लिए एक बेहद गर्व का क्षण है।

ड्रोन और क्रूज मिसाइल का घातक कॉम्बो बनी S8000 बांडेरोल, जानिए कारण

नई दिल्ली रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में तकनीक और हथियारों का स्तर लगातार बदल रहा है. इस कड़ी में रूस द्वारा तैनात की गई नई S8000 बांडेरोल (Banderol) क्रूज मिसाइल ने यूक्रेन की एयर डिफेंस सिस्टम के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. यह हथियार पारंपरिक क्रूज मिसाइल और सुसाइड ड्रोन का एक घातक मिश्रण है, जिसका इस्तेमाल हाल ही में कीव पर हुए बड़े हमलों में बड़े पैमाने पर देखा गया है. सुरक्षा विशेषज्ञों और यूक्रेनी खुफिया एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस मिसाइल को मार गिराना इतना कठिन क्यों है? मशीन गन की पहुंच से बाहर बांडेरोल मिसाइल को मार गिराने में सबसे बड़ी चुनौती इसकी गति और इसका इंजन है. यूक्रेनी रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस मिसाइल की क्रूज गति 520 से 560 किमी/घंटा है, जो अधिकतम 650 किमी/घंटा तक पहुंच सकती है. यूक्रेन की सेना अक्सर मिसाइलों और ड्रोनों को रोकने के लिए मोबाइल फायर टीमों का उपयोग करती है, जो जमीन पर मौजूद भारी मशीन गन से हवाई टारगेट्स पर निशाना साधती हैं. बांडेरोल की जेट इंजन की वजह से गति इतनी अधिक है कि ये मैन्युअल मशीन गन टीमें इसका पीछा करने और सटीक निशाना लगाने में पूरी तरह बेकार साबित हो रही हैं. इसे रोकने के लिए 'गेपार्ड' जैसी अत्यधिक एडवांस और ऑटोमैटिक एंटी-एयरक्राफ्ट प्रणालियों की आवश्यकता होती है, जो तेज गति से चलने वाले लक्ष्यों को ट्रैक कर सकें.   छोटा आकार और बेजोड़ चालाकी पारंपरिक रूसी क्रूज मिसाइलों (जैसे Kh-101 या कैलिबर) की तुलना में बांडेरोल का आकार काफी छोटा है. लगभग 5 मीटर लंबाई और 2.2 मीटर विंगस्पैन के साथ यह रडार की नजरों से आसानी से बच निकलती है. यूक्रेनी सैन्य खुफिया विभाग (HUR) की रिपोर्ट से पता चलता है कि यह मिसाइल बेहद कम जगह में मुड़ने के साथ हवा में तेजी से मैन्यूवर कर सकती है. इसकी यही चालकी इसे यूक्रेन के हवाई सुरक्षा रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा देती है, क्योंकि इसके फ्लाइट पाथ का अनुमान लगाना बेहद कठिन होता है. जैमिंग-रोधी 'कोमेटा' एंटीना तकनीक हवाई सुरक्षा को भेदने के लिए इस मिसाइल में रूस की एडवांस कोमेटा (Kometa) डिजिटल सैटेलाइट नेविगेशन एंटीना प्रणाली का उपयोग किया गया है. यह तकनीक यूक्रेन के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यानी जैमिंग सिस्टम को पूरी तरह से बेअसर कर देती है. जब यूक्रेन की सेना मिसाइल के जीपीएस या नेविगेशन को बाधित करने की कोशिश करती है, तो यह जैमिंग-रोधी एंटीना मिसाइल को सुरक्षित रूप से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में मदद करता है. इस वजह से इसे बिना भौतिक रूप से नष्ट किए, केवल सिग्नल ब्लॉक करके रोकना लगभग असंभव हो जाता है.    रूस की बेहतरीन ई-कॉमर्स वाली चालाकी इस मिसाइल का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसका निर्माण और सप्लाई चेन है. यूक्रेन के 'वॉर एंड सैंक्शंस' पोर्टल के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद इस मिसाइल में 30 अलग-अलग विदेशी कंपनियों के 20 से अधिक मुख्य पार्ट्स और लगभग 20 माइक्रोचिप्स लगाए गए हैं. इसमें सबसे महत्वपूर्ण है इसका इंजन- चीन का Swiwin SW800Pro जेट इंजन, जो आमतौर पर रिमोट-कंट्रोल विमानों के लिए उपयोग किया जाता है. यह ई-कॉमर्स वेबसाइट 'AliExpress' पर मात्र $16,000 में आसानी से मौजूद है. इसके अलावा, इसमें जापान की मुराता बैटरियां, साउथ कोरिया के डायनामिक्सल सर्वो मोटर्स और अमेरिकी तथा स्विस मूल के वोल्टेज रेगुलेटर और माइक्रोकंट्रोलर्स शामिल हैं. प्रतिबंधों से बचने के लिए रूस ने आर्मेनिया, कजाकिस्तान, चीन, तुर्की और यूएई जैसे देशों के मध्यस्थों और शेल कंपनियों का एक जटिल नेटवर्क तैयार किया है, जिसके माध्यम से ये कलपुर्जे रूसी वितरकों तक पहुंच जाते हैं.    बड़े हमलों में रणनीति का हिस्सा रूस इस मिसाइल का उपयोग स्वतंत्र रूप से करने के बजाय एक सोची-समझी रणनीति के तहत कर रहा है. इसे बड़े पैमाने पर 'शहीद' ड्रोनों और भारी बैलिस्टिक मिसाइल के साथ मिलाकर दागा जाता है. जब सैकड़ों हथियार एक साथ यूक्रेन के हवाई क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तो वहां की हवाई सुरक्षा प्रणाली पूरी तरह व्यस्त हो जाती है. ऐसे समय में अपनी गति, छोटे आकार और चपलता के कारण बांडेरोल मिसाइलें सुरक्षा घेरे को तोड़कर नागरिक और बुनियादी ढांचों पर भारी तबाही मचाने में सफल हो जाती हैं.

गुजरात कार्यक्रम में पीएम मोदी ने कहावतों और मीम डायलॉग से बांधा माहौल

 साणंद  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को गुजरात के साणंद में सेमीकंडक्टर असेंबलिंग एंड टेस्टिंग प्लांट का उद्घाटन करते हुए अपने संबोधन में लोकप्रिय संवाद "सुन रहे हो न विनोद" का इस्तेमाल किया, जिस पर वहां मौजूद लोगों ने तालियां बजाईं और ठहाके लगाए। दरअसल, उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए "सीजी पावर एंड इंडस्ट्रियल साल्यूशंस" के चेयरमैन वेल्लायन सुबैया ने गुजराती की दो कहावतों का इस्तेमाल किया। जब पीएम मोदी बोलने आए, तो उन्होंने भी इन कहावतों का जिक्र किया। पीएम मोदी ने क्या कहा? पीएम ने कहा-सुबैया जी ने गुजराती की एक कहावत कही-निशान चूक माफ, पण नहीं माफ नीचू निशान (ऊंचा लक्ष्य चूकना माफ है, लेकिन कम लक्ष्य तय करना नहीं)। मैं कभी छोटे लक्ष्य नहीं रखता, न ही छोटा सोच रखता हूं। यदि मुझे कोई प्रतिमा बनानी हो, तो मैं उसे दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाऊंगा। प्रधानमंत्री का यह बयान स्पष्ट रूप से सरदार वल्लभभाई पटेल की "स्टेच्यू आफ यूनिटी" के संदर्भ में था। पंचायत वेब सीरीज का फेमस डायलॉग इसके बाद मोदी ने कहा- और सुबैया जी ने "काम बोले छे" भी कहा…। "सुन रहे हो न विनोद"… काम बोलता है। यह सुनते ही सभा में मौजूद लोग और मंच पर उपस्थित अन्य लोग ठहाके लगाने लगे। उल्लेखनीय है कि "सुन रहे हो न विनोद" (या "देख रहा है विनोद") लोकप्रिय वेब सीरीज पंचायत का एक प्रसिद्ध डायलॉग है। इंटरनेट पर यह संवाद बहुत बड़ा मीम बन गया है।  

UNSC अभियान और EU बैठक पर फोकस, जयशंकर का विदेश दौरा शुरू

नई दिल्ली  विदेश मंत्री एस. जयशंकर 5 से 15 जुलाई तक कतर, बहरीन, कुवैत, ओमान, न्यूयॉर्क और ब्रुसेल्स का दौरा करेंगे। MEA ने उनके शेड्यूल की जानकारी दी है। इसके अनुसार, विदेश मंत्री 5 से 10 जुलाई तक कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान की यात्रा करेंगे। इस यात्रा का मुख्य मकसद इन चार देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना है। इसके बाद, विदेश मंत्री 13 जुलाई को न्यूयॉर्क जाएंगे, जहां वे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के 2028-29 कार्यकाल के लिए भारत के आधिकारिक अभियान की शुरुआत करेंगे। फिर वे 14-15 जुलाई को ब्रुसेल्स में तीसरी भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (टीटीसी) की बैठक में शामिल होंगे। यूरोपीय संघ और बेल्जियम में समकक्षों से बातचीत करेंगे। जान लीजिए जयशंकर का पूरा शेड्यूल     विदेश मंत्रालय ने बताया कि मंत्री एस. जयशंकर 5 से 10 जुलाई तक कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान की आधिकारिक यात्रा पर रहेंगे।     इन देशों की यात्रा के दौरान, वे अपने समकक्षों और वहां के नेतृत्व से मुलाकात करेंगे।     यात्रा का फोकस इन चार देशों के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने पर होगा और साथ ही क्षेत्रीय घटनाक्रमों और आपसी हित के मुद्दों पर विचारों के आदान-प्रदान का अवसर भी मिलेगा।     इसके बाद, विदेश मंत्री 13 जुलाई को न्यूयॉर्क जाएंगे, जहां वे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के 2028-29 कार्यकाल के लिए भारत के आधिकारिक अभियान की शुरुआत करेंगे।     फिर वे 14-15 जुलाई को ब्रुसेल्स में तीसरी भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (टीटीसी) की बैठक में शामिल होंगे और यूरोपीय संघ और बेल्जियम में समकक्षों से बातचीत करेंगे। पीयूष गोयल भी जाएंगे ब्रुसेल्स केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को कहा कि केंद्रीय रेल, सूचना और प्रसारण, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव भी तीसरी भारत-यूरोपीय संघ व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (टीटीसी) बैठक में हिस्सा लेने के लिए ब्रुसेल्स जाएंगे। यह बैठक हाल ही में संपन्न हुए भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को और मजबूत करेगी और इसके कार्यान्वयन में मदद करेगी। हम सभी यूरोपीय आयोग के साथ बैठक के लिए जा रहे: पीयूष गोयल 17वें 'टॉय बिज इंटरनेशनल बी2बी एक्सपो' के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए मंत्री ने कहा कि हम सभी यूरोपीय आयोग के साथ बैठक के लिए जा रहे हैं। पीयूष गोयल ने आगे कहा कि हमारी कोशिश है कि यह उस मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) का पूरक बने जिसे हमने अंतिम रूप दिया है। इससे हमें समझौते की बारीकियों को ठीक करने और भविष्य में एफटीए को लागू करने और उससे लाभ उठाने में आसानी होगी। वाणिज्य मंत्री ने यह भी कहा कि टीटीसी बातचीत से व्यापार, प्रौद्योगिकी और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला जैसे प्रमुख क्षेत्रों में भारत और यूरोपीय संघ के बीच सहयोग मजबूत होने की उम्मीद है, साथ ही इससे एफटीए के प्रभावी कार्यान्वयन में भी मदद मिलेगी।

होर्मुज जलमार्ग पर टोल व्यवस्था की योजना, ईरान ने अमेरिका को दिया नया संकेत

नई दिल्ली पश्चिम एशिया की जंग के बाद अब ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर टैक्स लगाने की कवायद तेज कर दी है। चीन में ईरानी राजदूत ने शनिवार को बताया कि तेहरान होर्मुज पर सर्विस टैक्स लगाने की योजना बना रहा है, जल्दी ही इसे लागू किया जाएगा। इसके अलावा अमेरिका के खिलाफ युद्ध के दौरान ईरान का साथ देने और समर्थन करने वाले देशों के साथ इस प्रक्रिया में खास व्यवहार किया जाएगा। बता दें, 28 फरवरी को हुए हमले के बाद से ईरान की तरफ लगातार होर्मुज पर टैक्स लगाने की मांग उठ रही है। हालांकि, अमेरिका ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। बीजिंग में वर्ल्ड पीस फोरम में ईरान का पक्ष रखते हुए राजदूत अब्दोलरेजा रहमानी फजली ने कहा कि अब होर्मुज फ्री नहीं रहेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान अब ओमान के साथ मिलकर इस जलमार्ग के ट्रैफिक को कंट्रोल करने की योजना बना रहा है। फजली ने कहा, "होर्मुज स्ट्रेट ईरान के जल क्षेत्र में आता है। तो निश्चित तौर पर हम इस पर सर्विस फीस लेंगे।" हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सर्विस टैक्स को टोल की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। 'मित्र देशों को देंगे राहत'- ईरान ईरानी राजदूत ने कहा कि इस सर्विस टैक्स का उपयोग जहाजों की निगरानी करने, समुद्री ट्रैफिक से होने वाले पर्यावरणीय असर से निपटने के लिए किया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने साफ किया कि जिन देशों ने युद्ध के दौरान ईरान का साथ दिया था। उन्हें इससे राहत मिलेगी। ईरानी राजदूत की तरफ से यह बयान ऐसे समय में आए हैं, जब अमेरिका और ईरान का शांति समझौता लगातार नाजुक डोर पर टिका हुआ है। ट्रंप प्रशासन का साफ कहना है कि होर्मुज जैसा युद्ध के बाद चलता था, वैसा ही चलता रहेगा। इस पर किसी तरह का कोई टैक्स या सर्विस फीस नहीं लगेगी। होर्मुज स्ट्रेट की वर्तमान स्थिति क्या? 28 फरवरी को शुरु हुए युद्ध के पहले होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह से खुला हुआ था। ईरान भी इस पर किसी तरह के टैक्स की बात नहीं करता था। लेकिन अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने होर्मुज को बंद कर दिया और पूरी दुनिया ऊर्जा संकट से जूझने लगी। इसके बाद ईरान में होर्मुज पर टैक्स लगाने की चर्चा तेज हो गई। हाल ही में हुए अमेरिका और ईरान शांति समझौते में 60 दिनों तक होर्मुज को युद्ध पूर्व स्थिति में खोले रखने पर सहमति बनी है। लेकिन 60 दिनों के बाद क्या स्थिति होगी। इस पर अभी कोई बयान सामने नहीं आया है। अमेरिका की तरफ से साफ तौर पर कहा गया है कि होर्मुज पर किसी भी तरह का टैक्स मान्य नहीं होगा। लेकिन सवाल यही है कि क्या तेहरान वाशिंगटन की बात मानेगा? क्योंकि अब उसका दशकों पुराना अमेरिकी हमले का डर खत्म हो चुका है। दूसरी बात, इस युद्ध के दौरान उसे होर्मुज की जमीनी हकीकत का पता चल गया है कि यहां पर एक ड्रोन हमला भी तेल की कीमतों को बढ़ा सकता है। ऐसे में संभव है कि ईरान जल्दी ही इन्हीं हमलों और अन्य परेशानियों से बचाने के लिए होर्मुज सर्विस फीस लागू कर दे। अगर यह फीस लागू होती है, तो यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी हार साबित हो सकती है।

भारत का पासपोर्ट 26 देशों में वीजा-फ्री एंट्री के साथ भी रैंकिंग में गिरावट

नई दिल्ली ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स में भारत पिछले साल के मुकाबले एक पायदान फिसलकर 125वें स्थान पर पहुंच गया है। ग्लोबल सिटिजन स़ल्यूशन (GCS) की ओर से जारी पांचवीं एनुअल रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत से पहले नामीबिया 124वें स्थान पर है। वहीं अजरबैजान 126वें स्थान पर है। ज्यादातर पासपोर्ट रैंकिंग वीजा फ्री ट्रैवल के आधार पर तय की जाती है। लेकिन ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स में पासपोर्ट की मजबूती ग्लोबल मोबिलिटी, निवेश की क्षमता और जीवन की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर तय की जाती है 2021 के मुकाबले 2 स्थानों का सुधार इस रैंकिंग में कुल 197 देशों में भारत 125वें स्थान पर है। पिछले सा भारत 124वें स्थान पर था। वहीं 2021 में यह 127वें रैंक पर था। ऐसे में अगर 2021 से अब तक के रिकॉर्ड पर गौर करें तो भारत की स्थिति में दो पायदान का सुधार हुआ है। इसके अलावा भारत का कंपोजिट स्कोर भी 45.1 पर पहुंच गया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत 26 देशों को लोगों को वीजा फ्री एंट्री देता है। इनमें भूटान, जमायका, मकाओ, नेपाल, फिलिस्तीन, ट्यूनीशिया और अंगोला शामिल हैं। वहीं भारत के लोगों को अब भी 88 देशों में वीजा की जरूरत पड़ती है। इनमें अमेरिका, यूके, जर्मनी, फ्रांस, चीन और यूएई भी शामिल हैं। बता दें कि ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स रैंकिंग के लिए मुख्यतः तीन पैमानों पर काम करता है। एक है एनहैंस्ड मोबिलिटी (50 फीसदी), निवेश (25 पर्सेंट) और क्वालिटी ऑफ लिविंग (25 पर्सेंट)। कौन सा देश टॉप पर, देखिए लिस्ट ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स में सबसे टॉप पर स्वीडन है। इसके बाद स्विट्जरलैंड, फिनलैंड, जर्मनी, नीदरलैंड्स, डेनमार्क, आयरलैंड, यूके, ऩर्वे और सिंगापुर का स्थान है। किस स्थान पर हैं भारत के पड़ोसी भारत के पड़ोसी देश चीन इस रैंकिंग में 104वें स्थान पर है। वहीं बांग्लादेश 166, नेपाल 164 और पाकिस्तान 188वें स्थान पर है। पाकिस्तान का नाम सबसे निचले पायदान वाले देशों में शामिल है। टॉप 10 से बाहर अमेरिका ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में अमेरिका टॉप 10 से बाहर है। इसमें टॉप की रैंकिंग में ज्यादातर यूरोपीय देश हैं। अमेरिका और फ्रांस दोनों ही 11वें स्थान पर है। कनाडा इस रैंकिंग में 13वें स्थान पर है। दुनिया के सबसे कमजोर पासपोर्ट के मामले में सोमालिया, दक्षिण सूडान, यमन और सीरिया हैं। इसके अलावा इरिट्रिया 193वें स्थान पर और सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक 189वें स्थान पर है। क्यों कमजोर हो गया भारत का पासपोर्ट भारत का पासपोर्ट कमजोर होने के पीछे मोबिलिटी स्कोर बताया जा रहा है। 2021 के 18 से सुधरकर यह 2026 में 23 हो गया है। वहीं दूसरे देसों का ट्रैवल ऐक्सेस तेजी से बढ़ा है। ऐसे में ओवरऑल रैंकिंग के मामले में भारत का नुकसान हुआ है। टॉप 10 देशों में एशिया का एक ही देश है और वह है सिंगापुर। मोबिलिटी और इन्वेस्टमेंट के मामले में सिंगापुर का पासपोर्ट काफी आगे है।

रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने की कोशिश तेज, ट्रंप बोले समझौते की संभावना बनी हुई है

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से अलग-अलग फोन पर बातचीत की। बताया जा रहा है कि इस बातचीत में यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिकी प्रयासों को नई गति देने पर जोर दिया गया। क्रेमलिन के अनुसार, ट्रंप और पुतिन के बीच करीब 90 मिनट तक चली फोन कॉल में युद्ध समाप्ति की दिशा में ठोस कदम उठाने पर चर्चा हुई। पुतिन ने ट्रंप को अमेरिका की 250वीं स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी और यूक्रेन संकट पर विस्तृत बातचीत की। बातचीत के बाद क्या बोला रूस? क्रेमलिन के विदेश नीति सलाहकार यूरी उशाकोव ने बताया कि दोनों नेताओं ने यूक्रेन समझौते पर चर्चा की, जिसमें 7-8 जुलाई को तुर्की में होने वाले नाटो शिखर सम्मेलन को भी ध्यान में रखा गया। ट्रंप ने शत्रुता शीघ्र समाप्त करने और संकट के राजनीतिक समाधान के लिए अपनी तत्परता दोहराई। पुतिन ने युद्धक्षेत्र की नवीनतम स्थिति से ट्रंप को अवगत कराया और राजनीतिक-राजनयिक माध्यमों से समस्या सुलझाने पर रूस की प्राथमिकता बताई। जेलेंस्की से भी की बात ट्रंप ने इसके बाद यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की से फोन पर बात की। जेलेंस्की ने भी ट्रंप को स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी। दोनों नेताओं ने मोर्चे पर मौजूदा स्थिति और चल रही राजनयिक पहल की समीक्षा की। जेलेंस्की ने टेलीग्राम पर लिखा कि बातचीत बहुत अच्छी रही। युद्ध समाप्त करने की वास्तविक संभावना है और इसमें अमेरिकी संकल्प बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस दौरान दोनों ने नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान आगे चर्चा जारी रखने पर सहमति जताई। अमेरिकी दूत मध्यस्थता करेंगे क्रेमलिन सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर मॉस्को और कीव के बीच समझौता कराने के लिए मध्यस्थता के प्रयास तेज करेंगे। जरूरत पड़ने पर ये दूत मॉस्को यात्रा के लिए भी तैयार हैं। वार्ता के दौरान पुतिन ने ईरान संकट में अमेरिकी राजनयिक भूमिका की सराहना की और उम्मीद जताई कि इससे आपसी सहमति वाला दीर्घकालिक समाधान निकलेगा। इस दौरान पुतिन ने ट्रंप को मॉस्को आने का निमंत्रण भी दोहराया। नाटो शिखर सम्मेलन से पहले महत्वपूर्ण वार्ता बता दें कि ये फोन कॉल तुर्की में मंगलवार से शुरू हो रहे नाटो शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हुए हैं। सम्मेलन में यूक्रेन के लिए समर्थन और रूस के हमलों का मुद्दा प्रमुखता से उठने की उम्मीद है। हाल ही में रूस ने कीव पर इस साल के सबसे घातक हमलों में से एक किया था, जिसमें 30 लोग मारे गए। दूसरी ओर, यूक्रेन ने रूस के अंदर ड्रोन और मिसाइल हमले तेज कर दिए हैं, जिनमें तेल रिफाइनरियां और अन्य बुनियादी ढांचे निशाने पर हैं। गौरतलब है कि यह प्रयास ऐसे समय हो रहा है जब यूक्रेन युद्ध पर अमेरिका की अगुवाई वाली वार्ता कुछ समय से ठप पड़ी हुई थी।

ईरान में शोक सभा के बीच अमेरिका विरोधी माहौल, ट्रंप को लेकर भड़के नारे

नई दिल्ली ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के जनाजे के दौरान तेहरान की सड़कों पर रविवार को माहौल उस वक्त बेहद गरमा गया, जब मंच संभाल रहे एक आयोजक ने सरेआम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जान से मारने की अपील कर दी। न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (AP) के मुताबिक, खामेनेई की मौत के बाद यह पहला मौका है, जब आधिकारिक मंच से सीधे ट्रंप की मौत का आह्वान किया गया है। इस नारे के गूंजते ही जनाजे में मौजूद लाखों की भीड़ ने चिल्लाकर इसका समर्थन किया। 'दुनिया का सबसे खराब इंसान अब तक जिंदा क्यों है?' यह पूरी घटना रविवार को उस वक्त हुई, जब तेहरान में खामेनेई के लिए एक विशाल शोक सभा चल रही थी। गौरतलब है कि इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के एक साझा हमले में 86 साल के खामेनेई मारे गए थे, जिसके बाद ईरान युद्ध की शुरुआत हुई थी। जनाजे के दौरान लाउडस्पीकर पर मोहम्मद रसूली नाम के एक कवि ने कमान संभाली। रसूली ने पहले तो भीड़ से 'अमेरिका मुर्दाबाद' और 'इजरायल मुर्दाबाद' के पारंपरिक नारे लगवाए, लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने अपना रुख सीधे डोनाल्ड ट्रंप की तरफ मोड़ दिया मंच से खुली धमकी देते हुए रसूली ने अमेरिकी राष्ट्रपति का जिक्र करते हुए भीड़ से पूछा, "दुनिया का सबसे खराब इंसान अब तक जिंदा क्यों है?" इस बयान के आते ही वहां मौजूद लाखों लोगों ने शोर मचाकर अपनी सहमति जताई। इसी बीच सोशल मीडिया पर एक और वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक शख्स रोते और चिल्लाते हुए कह रहा है, "हम उसे क्यों नहीं मार देते जिसने हमारे इमाम को मारा? यह हमारा फर्ज है। अगर हमने तुम्हारे कातिल को नहीं मारा, तो आगे हमारे लिए सिर्फ कफन ही बचेगा। मैं तुम्हारे खून की कसम खाता हूं कि हम ट्रंप को मार डालेंगे।" हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि वीडियो में दिख रहा शख्स वही कवि है या कोई और। तेहरान की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब शनिवार के मुकाबले रविवार को तेहरान की सड़कों पर कहीं ज्यादा भारी भीड़ देखी गई। काले कपड़ों में लिपटे लाखों लोग खामेनेई की तस्वीरें, बैनर और झंडे लेकर बढ़ रहे थे। भीड़ में कई लोग ऐसे पोस्टर भी थामे हुए थे जिन पर ट्रंप को मारने की बात लिखी थी। पूरे ईरान में इस वक्त ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मारने की मांग करने वाले पोस्टर और ग्रैफिटी (दीवारों पर लिखे नारे) नजर आ रहे हैं। उधर, जिस वक्त तेहरान में ट्रंप को मारने की कसमें खाई जा रही थीं, ठीक उसी वक्त वाशिंगटन में डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की स्थापना की 250वीं वर्षगांठ के जश्न में शामिल हो रहे थे। वहां अमेरिकी सेना की तारीफ करते हुए ट्रंप ने ईरान पर तीखा तंज कसा। ट्रंप ने कहा, "हमें जबरदस्त कामयाबी मिली है। आप वेनेजुएला को देखिए, आप ईरान को देखिए। हमने सब खत्म कर दिया, हमने उनकी मिलिट्री को पूरी तरह मिटा दिया।" बातचीत के बीच नए सुप्रीम लीडर का शक्ति प्रदर्शन खामेनेई की मौत के बाद ईरान के शासकों के लिए यह जनाजा एक बड़े शक्ति प्रदर्शन का जरिया बन गया है। इसके जरिए देश के नए सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई के लिए जनसमर्थन जुटाने की कोशिश की जा रही है। यह सब ऐसे नाजुक समय पर हो रहा है जब ईरान, युद्ध को हमेशा के लिए रोकने के लिए वाशिंगटन के साथ पर्दे के पीछे बातचीत की मेज पर बैठा है। ईरान इस बातचीत में होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने रणनीतिक दबदबे का इस्तेमाल कर अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश में है। हालांकि, ईरान के भीतर इस बात का डर अब भी बना हुआ है कि इजरायल कभी भी उस पर दोबारा सैन्य कार्रवाई कर सकता है। जंग चलने की वजह से ही इस जनाजे को पहले टाल दिया गया था, और जब तक यह युद्ध पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक शांति समझौते की उम्मीदें अधर में लटकी हुई हैं।

लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने की योजना, संसद में फिर गरमाएगा परिसीमन का मुद्दा

नई दिल्ली केंद्र की भाजपा नीत एनडीए सरकार आगामी मॉनसून सत्र में महिला आरक्षण को 2029 से ही लागू करने के लिए एक नया संविधान संशोधन विधेयक और लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने के लिए परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) लाने की तैयारी में है। हालांकि, इन ऐतिहासिक विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जुटाने की होगी। संसद के पिछले बजट सत्र में संख्या बल की कमी के कारण 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिर गया था, जिसके बाद साधारण बहुमत से पास होने वाले परिसीमन विधेयक को आगे नहीं बढ़ाया गया था। इस बार सरकार नए सिरे से रणनीति बना रही है। दो-तिहाई बहुमत से कितनी दूर है NDA? संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन अनिवार्य है। मौजूदा स्थिति में पाला बदलने वाले सांसदों को जोड़ने के बाद भी एनडीए बहुमत के आंकड़े से पीछे है। लोकसभा में एनडीए की वर्तमान ताकत 319 सांसदों की हो चुकी हैं। इनमें टीएमसी 20 और शिवसेना यूबीटी के 6 सांसद भी शामिल हैं। अब भाजपा को संसद में 41 सीटों की आवश्यक्ता है। आपको बता दें कि 543 सीटों वाले लोकसभा में दो तिहाई बहुत में के लिए 360 सांसदों की जरूरत होती है। राज्यसभा का क्या है समीकरण राज्यसभा में NDA की वर्तमान ताकत 152 सांसदों की है। दो-तिहाई बहुमत के लिए 161 सांसदों की जरूरत है। भाजपा को यहां भी 9 सांसदों के समर्थन की आवश्यक्ता है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को या तो विपक्षी दलों का सीधा समर्थन चाहिए होगा या फिर मतदान के समय वॉकआउट के जरिए दो-तिहाई के लिए जरूरी कुल संख्या को कम करना होगा। तमिलनाडु का बदलता समीकरण विपक्षी और क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करने के लिए नए विधेयक में उनकी चिंताओं को दूर करना सबसे अहम होगा। 22 लोकसभा सांसदों वाली द्रमुक (DMK) का रुख हमेशा से सीटों के आवंटन पर मौजूदा स्थिति बनाए रखने का रहा है। डीएमके का मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों की सीटें कम नहीं होनी चाहिए। तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद सी. जोसेफ विजय की पार्टी TVK के सत्ता में आने से राज्य के राजनीतिक समीकरण बदले हैं, जिससे भाजपा के प्रति डीएमके के कड़े रुख में कुछ नरमी के संकेत मिले हैं। हालांकि डीएमके सांसद तिरुची शिवा का कहना है कि आधिकारिक प्रस्ताव सामने आने से पहले कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। क्या हैं संवैधानिक अड़चनें? इस पूरे विवाद और नए विधेयक के केंद्र में अनुच्छेद 81 के दो मुख्य कड़े नियम हैं। अंतर-राज्यीय सीटों का आवंटन यानी कि अनुच्छेद 81(2)(a)। यह नियम कहता है कि राज्यों को लोकसभा सीटें उनकी आबादी के अनुपात में मिलनी चाहिए। आपको बता दें कि देश में राज्यों के बीच सीटों के संतुलन को बनाए रखने के लिए 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों के आवंटन को पिछले 50 वर्षों से फ्रीज किया गया है। पहला फ्रीज 1976 में और दूसरा 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान लगाया गया था। इसकी मियाद 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े आने पर समाप्त हो जाएगी। 2011 की जनगणना का पेंच यदि सरकार 2011 की जनगणना को आधार बनाकर नया परिसीमन लाती है तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की सीटें दक्षिण भारत के केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी, क्योंकि उत्तर भारत की आबादी तेजी से बढ़ी है। केंद्र सरकार अन्य दलों का समर्थन हासिल करने के लिए अनुच्छेद 81 में संशोधन करके इस फ्रीज की समयसीमा को कुछ और दशकों के लिए आगे बढ़ा सकती है, जिससे राज्यों की मौजूदा सीटों का अनुपात सुरक्षित रहे। राज्य के भीतर का परिसीमन यह नियम राज्य के भीतर ही अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करता है ताकि राज्य के भीतर सभी क्षेत्रों में जनसंख्या का अनुपात बराबर रहे। वर्तमान में इसके लिए 2001 की जनगणना को आधार माना गया है। सरकार नए विधेयक में इसे बदलकर 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित करने का प्रस्ताव दे सकती है, जिस पर विपक्षी दलों में व्यापक सहमति बनने की संभावना अधिक है।