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भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर को ट्रंप का खुला समर्थन, जानें IMEC की खासियत

 नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के लिए एक बड़े इकोनॉमिक कॉरिडोर को लेकर खुला समर्थन जताया है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान GCC और अरब देशों के नेताओं के साथ बैठक में ट्रंप ने भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी IMEC का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि मिडिल ईस्ट के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को ईरान के चोकपॉइंट से दूर ले जाने की जरूरत है।  ट्रंप ने कहा कि पड़ोसी देशों में कमर्शियल शिपिंग पर ईरान के हमलों ने इस जरूरत को और साफ कर दिया है. उन्होंने कहा कि उनका प्रशासन IMEC और तेल को बाहर निकालने के दूसरे रास्तों का मजबूती से समर्थन करता है. इसमें पाइपलाइन और दूसरे विकल्प भी शामिल हैं. ट्रंप ने कहा कि साथ मिलकर मिडिल ईस्ट के सामने दशकों से चली आ रही चुनौतियों को दूर करने का मौका है।  2023 में सामने आया था IMEC का प्लान भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को 2023 में सामने लाया गया था. इसका मकसद भारत को खाड़ी क्षेत्र के जरिए यूरोप से जोड़ना है. इसके तहत एक ईस्टर्न कॉरिडोर भारत को खाड़ी क्षेत्र से जोड़ेगा, जबकि नॉर्दर्न कॉरिडोर खाड़ी को यूरोप से जोड़ेगा।  इस कॉरिडोर में रेलवे और शिप-रेल ट्रांजिट नेटवर्क के साथ सड़क परिवहन के रास्ते भी शामिल हैं. ट्रंप के ताजा समर्थन से IMEC को लेकर अमेरिका की रणनीतिक सोच भी सामने आई है. ट्रंप ने इसे मिडिल ईस्ट की ऊर्जा सप्लाई को वैकल्पिक रास्तों से जोड़ने के संदर्भ में रखा।  ईरान को फिर दी सख्त चेतावनी बैठक में ट्रंप ने ईरान को एक बार फिर सख्त चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान को आर्थिक तौर पर अलग-थलग कर दिया है और उम्मीद है कि ईरान जल्द सही फैसला करेगा. ट्रंप ने कहा कि एक समय ऐसा भी आ सकता है जब बहुत देर हो जाएगी और अमेरिका के पास ईरान को एक राष्ट्र के तौर पर बने रहने देने का मौका नहीं होगा।  ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के साथ बैठक में मौजूद देशों के नेता भी चाहते हैं कि ईरान जल्द सही कदम उठाए. उन्होंने GCC और अरब देशों के नेताओं को अमेरिका के करीबी सहयोगी और साझेदार बताया और कहा कि उनका मकसद मिडिल ईस्ट को ज्यादा सुरक्षित और समृद्ध बनाना है।  ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब मिडिल ईस्ट में जंग और कमर्शियल शिपिंग पर हमलों के बीच ऊर्जा सप्लाई के वैकल्पिक रास्तों को लेकर चर्चा तेज है. ऐसे में IMEC को लेकर अमेरिका का खुला समर्थन भारत के लिए भी अहम माना जा रहा है। 

रेलवे के नए पेंशन नियम लागू, डेथ-डिसएबिलिटी मामलों में अब ऐसे तय होगी पेंशन

   नई दिल्ली रेलवे में नौकरी करने वालों के लिए पेंशन से जुड़ा एक ऐसा नियम आया है, जिसे कर्मचारी और उनके परिवार को जरूर समझना चाहिए. नौकरी के दौरान अगर किसी कर्मचारी को गंभीर बीमारी, हादसे या किसी ऐसी घटना का सामना करना पड़ता है, जिसका संबंध उसकी सेवा से है, तो उसके बाद मिलने वाली पेंशन सामान्य नियमों से अलग हो सकती है. कर्मचारी की स्थिति, मौत या डिसएबिलिटी किस तरह की घटना से जुड़ी है, इसके आधार पर पेंशन का पूरा ढांचा तय होगा।  रेलवे ने अब इसके लिए नए नियम लागू कर दिए हैं. रेलवे बोर्ड ने 'रेल सर्विस एक्स्ट्राऑर्डिनरी पेंशन रूल्स, 2026' को नोटिफाई कर दिया है. नए नियमों ने 1993 के एक्स्ट्राऑर्डिनरी पेंशन रूल्स की जगह ली है. इनमें सेवा के दौरान मौत या डिसएबिलिटी से जुड़े मामलों के अलावा फैमिली पेंशन, मेडिकल बोर्ड की अपील, डिसएबिलिटी की गणना, सेवा से जुड़ी बीमारियां और पेंशन में देरी जैसे कई प्रावधान शामिल किए गए हैं।  किन कर्मचारियों और परिवारों को मिलेगा फायदा? नए नियम उन मामलों में लागू होंगे, जहां कर्मचारी की डिसएबिलिटी या मौत का संबंध रेलवे सेवा से हो. अगर कर्मचारी डिसएबिलिटी के बाद भी रेलवे की सेवा में बना रहता है, तब भी इन नियमों के तहत प्रावधान लागू हो सकते हैं. इसके अलावा एक्स्ट्राऑर्डिनरी फैमिली पेंशन के दायरे में आने वाले परिवार भी इन नियमों से कवर होंगे. यानी कर्मचारी की सेवा से जुड़ी मौत की स्थिति में उसके परिवार को मिलने वाली पेंशन भी घटना की कैटेगरी के हिसाब से तय होगी. NPS के तहत आने वाले कर्मचारियों के लिए लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि उन्होंने 2025 के संबंधित नियमों के तहत कौन-सा विकल्प चुना है।  नए रूल्स में मौत और डिसएबिलिटी की 4 कैटेगरी नए नियमों में सेवा से जुड़ी मौत और डिसएबिलिटी को चार कैटेगरी में बांटा गया है. इन्हीं कैटेगरी से यह तय होगा कि कर्मचारी या उसके परिवार को किस तरह का पेंशन लाभ मिलेगा।  Category A: ऐसी मौत या डिसएबिलिटी जो प्राकृतिक कारणों से हुई हो और जिसका रेलवे सेवा से कोई संबंध नहीं हो।  Category B: ऐसी मौत या डिसएबिलिटी जो रेलवे सेवा के कारण हुई हो या सेवा की वजह से बढ़ी हो।  Category C: दंगे, हिंसा, खराब मौसम, राहत या बचाव अभियान जैसी गंभीर परिस्थितियों में हुई मौत या डिसएबिलिटी।  Category D: आतंकवादी हमले, युद्ध जैसी परिस्थितियों या दुश्मन की कार्रवाई से जुड़े मामले।  यानी हर मामले में एक जैसा पेंशन नियम लागू नहीं होगा. घटना की प्रकृति के आधार पर कर्मचारी या परिवार का लाभ बदल सकता है।  डिसएबिलिटी पेंशन कैसे तय होगी? नई व्यवस्था में डिसएबिलिटी पेंशन को दो हिस्सों में बांटा गया है- सर्विस एलीमेंट और डिसएबिलिटी एलीमेंट. सर्विस एलीमेंट कर्मचारी की पेंशन योग्य सैलरी यानी इमोल्यूमेंट्स या एवरेज इमोल्यूमेंट्स के 50% के बराबर होगा, जो भी अधिक हो. कैटेगरी B, C और D में 100% डिसएबिलिटी होने पर डिसएबिलिटी एलीमेंट 30% होगा. इस तरह 100% डिसएबिलिटी की स्थिति में पेंशन का ढांचा 50% सर्विस एलीमेंट और 30% डिसएबिलिटी एलीमेंट से बनेगा. खास बात यह है कि इसके लिए न्यूनतम क्वालिफाइंग सर्विस की शर्त नहीं रखी गई है. यानी 10 साल से कम सेवा वाले कर्मचारी को भी सर्विस एलीमेंट मिल सकता है. हालांकि ऐसी स्थिति में सर्विस ग्रेच्युटी का लाभ नहीं मिलेगा।  डिसएबिलिटी का प्रतिशत कैसे तय होगा? डिसएबिलिटी का प्रतिशत भी पेंशन तय करने में अहम भूमिका निभाएगा. मेडिकल बोर्ड अगर डिसएबिलिटी 50% तक तय करता है, तो डिसएबिलिटी एलीमेंट के लिए 50% ही माना जाएगा. अगर डिसएबिलिटी 50% से ज्यादा और 75% तक है, तो गणना के लिए इसे 75% माना जाएगा. वहीं 75% से ज्यादा और 100% तक डिसएबिलिटी होने पर 100% माना जाएगा. इस व्यवस्था को डिसएबिलिटी की ब्रॉड-बैंडिंग कहा गया है. इसका मकसद यह है कि कुछ स्तर की डिसएबिलिटी होने पर पेंशन की गणना कर्मचारी के लिए ज्यादा अनुकूल तरीके से की जा सके।  मौत होने पर परिवार को कितनी पेंशन? यहीं नए नियमों का एक अहम हिस्सा सामने आता है. Extraordinary Family Pension में विधवा या विधुर (जिसकी पत्नी मर गई हो) के अलावा पात्र आश्रित बच्चे, माता-पिता और आश्रित भाई-बहन भी शामिल हो सकते हैं. कैटेगरी A के मामलों में सामान्य पेंशन नियम लागू होंगे. लेकिन सेवा से जुड़ी गंभीर घटनाओं वाली कैटेगरी B, C और D में परिवार को अलग प्रावधान के तहत पेंशन मिलेगी. कैटेगरी B में फैमिली पेंशन कर्मचारी की पे के 60% के बराबर होगी. वहीं कैटेगरी C और D में फैमिली पेंशन कर्मचारी की बेसिक पे के 100% के बराबर होगी।  रेलवे बोर्ड के नियमों के मुताबिक फैमिली पेंशन ₹18,000 से कम नहीं होगी. अगर डिसएबिलिटी पेंशन पा रहा कर्मचारी उसी चोट या बीमारी के कारण बाद में मृत्यु को प्राप्त होता है, तो उसके लिए भी अलग प्रावधान दिए गए हैं. डिसएबिलिटी रिटायरमेंट की तारीख से सात साल के भीतर ऐसी मौत होने पर संबंधित कैटेगरी के तहत Extraordinary Pension का लाभ परिवार को मिल सकता है।  नौकरी जारी रही तो क्या होगा? मान लीजिए किसी कर्मचारी को डिसएबिलिटी हुई, लेकिन रेलवे ने उसे नौकरी से हटाने के बजाय सेवा में बनाए रखा. ऐसी स्थिति में उसे हर महीने डिसएबिलिटी एलीमेंट नहीं मिलेगा. इसके बजाय डिसएबिलिटी एलीमेंट की कैपिटलाइज्ड वैल्यू के आधार पर एकमुश्त मुआवजा दिया जाएगा. गजट नोटिफिकेशन में इसका उदाहरण भी दिया गया है. अगर कर्मचारी की उम्र 40 साल है, बेसिक पे ₹30,000 महीना है, वह Category B में आता है और डिसएबिलिटी 40% है, तो 30% डिसएबिलिटी एलीमेंट और 9.075 के कम्यूटेशन फैक्टर के आधार पर एकमुश्त रकम ₹3,92,040 बनती है।  पेंशन के लिए अलग से आवेदन नहीं नए नियमों में कर्मचारियों और परिवारों के लिए एक अहम राहत आवेदन की प्रक्रिया को लेकर है. डिसएबिलिटी पेंशन या Extraordinary Family Pension के लिए अलग से आवेदन करने की जरूरत नहीं होगी. संबंधित केस की जांच और उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हेड ऑफ ऑफिस की होगी. मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर मामले पर फैसला किया जाएगा. डिसएबिलिटी पेंशन के मामलों में तय समय के भीतर पेंशन पेमेंट ऑर्डर (PPO) जारी करना होगा।  पेंशन में देरी हुई तो इंटरेस्ट मिलेगा नए नियमों में पेंशन भुगतान में … Read more

डीप डिप्रेशन तट के करीब, विशाखापट्टनम-गोपालपुर के बीच लैंडफॉल के आसार

 नई दिल्ली बंगाल की खाड़ी के पश्चिम-मध्य और उससे सटे उत्तर-पश्चिम हिस्से में स्थित डीप डिप्रेशन अब तटीय इलाकों के बहुत नजदीक पहुंच चुका है. 23 सितंबर 2026 को सुबह 5:30 बजे भारतीय समय के अनुसार यह सिस्टम अक्षांश 18.0 डिग्री उत्तर और देशांतर 84.7 डिग्री पूर्व के पास केंद्रित था।  यह आंध्र प्रदेश के कलिंगपट्टनम से करीब 70 किलोमीटर पूर्व-दक्षिण पूर्व में, ओडिशा के गोपालपुर से 150 KM दक्षिण में, पुरी से 230 KM दक्षिण-पश्चिम में और विशाखापट्टनम से 150 KM पूर्व-उत्तर पूर्व में स्थित था. पिछले छह घंटों में यह पश्चिम दिशा में 12 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ा है।  मौसम विभाग के अनुसार यह सिस्टम पश्चिम-उत्तर पश्चिम दिशा में आगे बढ़ते हुए 23 सितंबर की रात तक उत्तर आंध्र प्रदेश और दक्षिण ओडिशा के तटों को पार कर सकता है. संभावित क्रॉसिंग क्षेत्र विशाखापट्टनम और गोपालपुर के बीच है और यह कलिंगपट्टनम के करीब से गुजर सकता है. डीप डिप्रेशन की स्थिति में ही तट पार करने की संभावना है. इससे तटीय जिलों में भारी बारिश, तेज हवाएं और समुद्री लहरों का खतरा बढ़ गया है।  सिस्टम की वर्तमान स्थिति और गति डीप डिप्रेशन बंगाल की खाड़ी में बने लो प्रेशर एरिया बना हुआ था. पिछले कुछ दिनों में यह लगातार तेज होता रहा और अब तट के बेहद करीब आ गया है. सुबह की स्थिति में यह कलिंगपट्टनम से महज 70 किलोमीटर दूर था जो दर्शाता है कि लैंडफॉल का समय निकट है. पश्चिम दिशा में इसकी गति 12 किलोमीटर प्रति घंटे रही है।  आगे पश्चिम-उत्तर पश्चिम मार्ग अपनाने से यह आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों से ओडिशा की ओर बढ़ेगा. इतने करीब आने से स्थानीय प्रभाव तेजी से महसूस होने लगेंगे. तटीय क्षेत्रों में बादल छाए रहेंगे और बारिश की तीव्रता बढ़ सकती है. समुद्र उग्र हो सकता है इसलिए मछुआरों को समुद्र में न जाने की सख्त सलाह दी गई है. निचले इलाकों में जलभराव की आशंका है।  उत्तर आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम, श्रीकाकुलम और आसपास के जिलों में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है. दक्षिण ओडिशा के गंजाम, पुरी और गोपालपुर क्षेत्रों में भी यही स्थिति रहने वाली है. तेज हवाएं पेड़ों को उखाड़ने और बिजली व्यवस्था को प्रभावित करने में सक्षम हैं. नदियों का जलस्तर बढ़ सकता है जिससे बाढ़ का खतरा पैदा होगा. शहरों में जल निकासी व्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।  प्रशासन ने तटीय जिलों में अलर्ट जारी रखा है. लोगों को ऊंचे स्थानों पर रहने, अनावश्यक यात्रा से बचने और मौसम विभाग के अपडेट्स पर नजर रखने की सलाह दी जा रही है. स्कूल और ऑफिस प्रभावित हो सकते हैं. किसानों को फसलों की सुरक्षा के उपाय करने को कहा गया है. राहत सामग्री और आपात टीमें तैयार रखी गई हैं।  तैयारी और आगे की निगरानी डीप डिप्रेशन के तट पार करने के बाद इसका प्रभाव आंतरिक क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है. तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में भी बारिश हो सकती है. सिस्टम के कमजोर पड़ने की प्रक्रिया पर नजर रखी जा रही है. मौसम विभाग नियमित बुलेटिन जारी कर रहा है. स्थानीय प्रशासन राहत शिविर और मेडिकल टीमें सक्रिय रखे हुए है।  इस तरह के सिस्टम मानसून के अंतिम चरण में आम हैं लेकिन तट के इतने करीब आकर तीव्र रहना चुनौती पैदा करता है. भारी बारिश से भूस्खलन का खतरा पहाड़ी इलाकों में बढ़ सकता है. बिजली कटौती और संचार बाधित होने की संभावना को ध्यान में रखते हुए बैकअप व्यवस्था जरूरी है।  लोगों को शांत रहकर आधिकारिक निर्देशों का पालन करना चाहिए. सोशल मीडिया पर अफवाहों से बचना बेहतर होगा. मौसम विभाग की वेबसाइट या ऐप से सही जानकारी लें. डीप डिप्रेशन के गुजरने के बाद भी कुछ दिनों तक मौसम अस्थिर रह सकता है. जलभराव वाले इलाकों में सावधानी बरतें. प्रशासन और नागरिकों के सहयोग से नुकसान को कम किया जा सकता है. सभी को सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि सिस्टम रात तक तट पार कर सकता है। 

भूटान PM त्शेरिंग टोबगे ने UNGA में की भारत की तारीफ, साझेदारी का किया जिक्र

नई दिल्ली भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से भारत के साथ अपने रिश्तों को लेकर खुलकर बात की. उन्होंने भारत को भूटान का भरोसेमंद दोस्त और साझेदार बताया. टोबगे ने कहा कि भूटान की महत्वाकांक्षी गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी यानी GMC परियोजना सीधे भारत की सीमा से लगी हुई है और इस विजन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत सरकार और असम सरकार का समर्थन हासिल है।  टोबगे ने कहा कि GMC की लोकेशन इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है. यह शहर भूटान के सबसे करीबी दोस्त और पड़ोसी भारत की सीमा पर स्थित है. उन्होंने कहा कि सीमा के दूसरी तरफ दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश और दुनिया की सबसे बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक मौजूद है. उनके मुताबिक, भारत के साथ यह कनेक्टिविटी GMC को दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बाजारों तक पहुंच का एक अहम रास्ता बनाती है।  GMC के लिए भारत की दोस्ती को बताया बड़ी ताकत भूटान PM ने कहा कि GMC को शुरुआत से ही वह चीज मिल रही है, जिसे कई नए शहर हासिल करने में दशकों लगा देते हैं. इसमें बड़े और तेजी से बढ़ते बाजारों तक पहुंच, कनेक्टिविटी और भारत जैसा भरोसेमंद दोस्त शामिल है।  उन्होंने कहा कि GMC की सोच को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ भारत सरकार और सीमा से लगे असम के पड़ोसियों का भी समर्थन मिला है. टोबगे ने इस समर्थन को परियोजना के लिए अहम बताया।  बोले- भरोसा खरीदा नहीं जा सकता शेरिंग टोबगे ने कहा कि भूटान के पास एक और ऐसी ताकत है जिसे खरीदा नहीं जा सकता और वह है भरोसा. उन्होंने कहा कि यह भरोसा शांति, राजनीतिक स्थिरता, कानून के राज और अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाने के रिकॉर्ड से बना है।  भूटान PM के मुताबिक, लंबे समय के निवेशकों के लिए भरोसा बेहद अहम है, क्योंकि इससे भविष्य को लेकर एक तरह की स्थिरता और भरोसा पैदा होता है. उन्होंने कहा कि GMC दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बाजारों के लिए एक गेटवे के तौर पर काम कर सकता है।  टोबगे के बयान में भारत और भूटान के रिश्तों के साथ-साथ GMC प्रोजेक्ट के लिए भारत की भूमिका पर भी खास जोर रहा. उन्होंने भारत के साथ सीमा से जुड़ी अपनी भौगोलिक स्थिति, बाजारों तक पहुंच और दोनों देशों के बीच भरोसे को GMC की बड़ी ताकत के तौर पर पेश किया। 

SIR विवाद के बीच EC का जवाब, कहा- फैसलों पर कोई औपचारिक असहमति नहीं

 नई दिल्ली मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेद की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब आयोग के सूत्रों ने सफाई दी है. ECI सूत्रों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर विचार के दौरान सवाल उठा सकते हैं, स्पष्टीकरण मांग सकते हैं या अपनी टिप्पणी दे सकते हैं. लेकिन ऐसी टिप्पणी को औपचारिक असहमति यानी डिसेंट नहीं माना जा सकता।  सूत्रों ने कहा कि SIR से जुड़े मुद्दों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने टिप्पणियां की थीं. इन पर फैसले से पहले विचार भी किया गया. लेकिन किसी भी चुनाव आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक डिसेंट दर्ज नहीं कराया. आयोग के मुताबिक, जिन आदेशों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उन पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं।  क्या है ऑब्जर्वेशन और डिसेंट में फर्क? चुनाव आयोग के मुताबिक, किसी मामले पर चर्चा के दौरान आयुक्त का सवाल उठाना या अपनी राय रखना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है. तीन सदस्यीय आयोग में सभी चुनाव आयुक्तों की बराबर भूमिका होती है. अगर किसी मुद्दे पर मतभेद हो तो बहुमत की राय के आधार पर फैसला होता है।  हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई. रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने कुछ कदमों को बिना उनकी जानकारी के उठाए जाने पर सवाल भी उठाए थे।  पहले भी चुनाव आयोग में दर्ज हो चुका है डिसेंट चुनाव आयोग के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी आयुक्त ने बहुमत की राय से अलग रुख अपनाया हो. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों समेत आचार संहिता से जुड़ी कुछ शिकायतों पर अपने सहयोगियों से अलग राय रखी थी।  2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी की कथित अयोग्यता से जुड़े मामले में चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और नवीन चावला से अलग राय रखी थी. इन मामलों में आयोग के भीतर अलग राय दर्ज करने की व्यवस्था का इस्तेमाल हुआ था।  पहले सिर्फ एक ही चुनाव आयुक्त होता था आज तीन सदस्यीय चुनाव आयोग है, लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था. 1950 में चुनाव आयोग के गठन के समय यह सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त वाला एक सदस्यीय निकाय था. 1950 से 1989 तक आयोग इसी व्यवस्था के तहत काम करता रहा।  1989 में पहली बार दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए, लेकिन उनकी नियुक्ति थोड़े समय के लिए रही. 1990 में आयोग फिर एक सदस्यीय हो गया. इसके बाद 1993 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के साथ तीन सदस्यीय व्यवस्था स्थायी हो गई।  इसलिए मौजूदा विवाद में अहम सवाल यही है कि चुनाव आयुक्तों की आंतरिक टिप्पणियों को किस तरह समझा जाए. ECI सूत्र इन्हें सामान्य डेलिबरेशन का हिस्सा बता रहे हैं, जबकि प्रकाशित रिपोर्ट में इन्हें रिकॉर्ड पर दर्ज आपत्तियों के रूप में पेश किया गया है।  आयोग के सूत्रों ने सिस्टम में किसी तरह के केंद्रीय हस्तक्षेप के आरोपों से इनकार किया है. उनका कहना है कि पूरे देश के लिए एक ही सिस्टम है और सभी ईआरओ उसी सिस्टम में डेटा फीड करते हैं. अब तक किसी ने इसको लेकर शिकायत नहीं की है. आयोग के सूत्रों का यह भी कहना है कि अधिकारी भी अलग-अलग विचारधाराओं से प्रभावित हो सकते हैं।  आयोग के सूत्रों के मुताबिक, मतभेद लोकतंत्र का आधार हैं और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. उनका कहना है कि पिछले 14 महीनों में ऐसे सैकड़ों मौके आए, जब शुरुआत में मतभेद होने के बावजूद आखिर में सर्वसम्मति से राय बनी. इस दौरान सुधार के लिए सैकड़ों कदम भी उठाए गए।  चुनाव आयुक्तों पर दावों को लेकर विपक्ष की प्रतिक्रिया चुनाव आयुक्तों को लेकर सामने आई रिपोर्ट पर विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं. टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने कहा कि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर कई बार आपत्ति जताई है तो राज्यसभा में पहले से लंबित प्रस्ताव को अब सामने लाना चाहिए. उन्होंने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग भी की।  वहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल समेत विपक्ष के कई नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज और एसआईआर को लेकर सवाल उठाए हैं. सिब्बल ने आरोप लगाया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म-6 में बदलाव और वोटर लिस्ट से जुड़े फैसलों पर आपत्ति जताई थी।  उन्होंने एसआईआर को रोकने और चुनाव आयोग के कामकाज की जांच की मांग की. विपक्ष के अन्य नेताओं, जिनमें कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी और जयराम रमेश, आप नेता सौरभ भारद्वाज और शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत शामिल हैं, ने भी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।  पूर्व चुनाव आयुक्त दावों पर क्या बोले? पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा, "मतभेद कहीं भी हो सकते हैं, लेकिन इलेक्शन कमिशन की मीटिंग के दौरान इन मतभेदों को एक-दूसरे को समझकर और समझाकर दूर किया जाता है. इसी तरह सर्वसम्मति से फैसले लिए जाते रहे हैं. लेकिन यह पहली बार हुआ है कि पिछले दस महीनों में 14 बार दो इलेक्शन कमिशनरों ने विरोध किया, फिर भी फैसले होते गए. कानूनन देखा जाए तो किसी भी एक इलेक्शन कमिशनर के पास अपने स्तर पर कोई पावर नहीं है. इलेक्शन कमिशन में तीनों लोग बैठते हैं, मीटिंग करते हैं और मिलकर फैसले लेते हैं. यही व्यवस्था शक्तिशाली है. किसी एक व्यक्ति को एडमिनिस्ट्रेटिव पावर के नाम पर कोई अतिरिक्त अधिकार नहीं दिया गया है। 

दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल, 29 सैंपल मानकों पर फेल; 191 NSQ निकले

   नई दिल्ली दवाओं से जुड़ी एक चिंताजनक खबर सामने आई है. विभिन्न कंपनियों द्वारा बनाई गई 29 दवाओं के सैंपल को 'मानक गुणवत्ता के नहीं' (NSQ) पाया गया. स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने मंगलवार इसकी जानकारी दी. बताया गया कि सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरीज ने अगस्त के अपने मासिक ड्रग अलर्ट में ऐसा पाया था।  फिर राज्य की ड्रग-टेस्टिंग लेबोरेटरीज ने भी 191 दवाओं के सैंपल को NSQ पाया है।    रूटीन रेगुलेटरी सर्विलांस के तहत, NSQ और नकली दवाओं की लिस्ट हर महीने सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) के पोर्टल पर दिखाई जाती है।  स्वास्थ्य मंत्रालय के एक बयान में कहा गया, 'अगस्त 2026 के महीने के लिए, सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरीज ने 29 दवाओं के सैंपल को मानक गुणवत्ता के नहीं (NSQ) के तौर पर पहचाना है और राज्य की ड्रग्स टेस्टिंग लेबोरेटरीज ने 191 दवाओं के सैंपल को NSQ पाया है।  बयान में कहा गया है कि दवाओं के सैंपल को NSQ के तौर पर तब पहचाना जाता है जब वे तय क्वालिटी पैरामीटर्स (गुणवत्ता के मानकों) में से किसी एक या अधिक में फेल हो जाते हैं. यह कमी सरकारी लैब द्वारा टेस्ट किए गए बैच के ड्रग प्रोडक्ट्स तक ही सीमित होती है और इससे बाजार में उपलब्ध अन्य ड्रग प्रोडक्ट्स को लेकर कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है।  इसके अलावा, दिल्ली के नेशनल कैपिटल टेरिटरी (NCT) से एक दवा के सैंपल को नकली पाया गया है. यह दवा अनधिकृत निर्माताओं द्वारा किसी दूसरी कंपनी के ब्रांड नाम का इस्तेमाल करके बनाई गई थी. मामले की जांच चल रही है और कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।  बयान में कहा गया है कि NSQ और नकली दवाओं की पहचान करने की यह कार्रवाई राज्य के रेगुलेटर्स के साथ मिलकर नियमित रूप से की जाती है ताकि यह पक्का किया जा सके कि ऐसी दवाओं की पहचान हो और उन्हें बाजार से हटाया जा सके। 

EPFO का नया नियम: ₹25 हजार बेसिक लिमिट के बाद 30-40-50 हजार सैलरी वालों पर क्या असर?

 नई दिल्ली जब से सरकार ने पीएफ की अनिवार्य वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये महीने किया है. तब से इस बात की चर्चा हो रही है कि जिनकी बेसिक सैलरी 25 हजार रुपये से ज्यादा है, उनके लिए क्या नियम है।   सरकार का कहना है कि इससे पहले 2014 में बदलाव हुआ था. अब नए बदलाव से लगभग 51 लाख नए कर्मचारी सीधे तौर पर PF, पेंशन और मुफ्त जीवन बीमा के दायरे में आ गए हैं. इस फैसले का मुख्य उद्देश्य देश के संगठित और असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कर्मचारियों को व्यापक सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना है. हालांकि, पीएफ कटौती बढ़ने के कारण टेक-होम सैलरी थोड़ी कम हो जाएगी।  पहले अगर कोई कर्मचारी 15,000 रुपये महीने से अधिक के बेसिक सैलरी पर पहली बार नौकरी में जुड़ता था, तो उसके लिए अनिवार्य रूप से पीएफ खाता खोलना जरूरी नहीं था।  महंगाई और न्यूनतम वेतन में तालमेल  दरअसल, साल 2014 से अब तक देश में औसत वेतन और न्यूनतम वेतन में काफी बढ़ोतरी हुई है. कई राज्यों में न्यूनतम वेतन ही 15,000 रुपये के आसपास पहुंच गया है. ऐसे में पुरानी सीमा प्रासंगिक नहीं रह गई थी. अनिवार्य अंशदान की सीमा बढ़ने से कर्मचारियों की मासिक बचत में इजाफा होगा, जिससे लंबी अवधि में उनका रिटायरमेंट फंड काफी बड़ा बनेगा।  अनिवार्य न्यूनतम योगदान पुरानी सीमा (15,000 रुपये पर कर्मचारी का 12% योगदान)= 1,800 रुपये/माह नई सीमा (25,000 रुपये पर कर्मचारी का 12% योगदान) = 3,000 रुपये/माह इसमें कंपनी और कर्मचारी दोनों की तरफ से 12-12% का योगदान दिया जाता है. ऐसे में 25,000 रुपये की सीलिंग पर कर्मचारी की सैलरी 1200 रुपये कम मिल सकती है, क्योंकि योगदान राशि 1800 रुपये से बढ़कर 3000 रुपये हो गई।  अब तमाम कर्मचारियों के मन में यह सवाल उठता है कि अगर उनकी बेसिक सैलरी 40,000 या 50,000 रुपये है, तो उन पर क्या नियम लागू होगा? नियम कहता है कि कंपनी कानूनी तौर पर केवल 25,000 रुपये की सीमा पर ही अपना हिस्सा 3,000 रुपये देने के लिए बाध्य है. आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं. राकेश एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं और उनकी बेसिक सैलरी 50 हजार रुपये है. राकेश की कंपनी CTC स्ट्रक्चर पर काम करती है, ऐसे में वो अपनी पूरी बेसिक (50,000 रुपये का 12%= 6,000 रुपये) पीएफ में कटवा सकते हैं. कंपनी भी 6000 रुपये ही जमा करेगी. लेकिन वह पैसा राकेश की ही CTC पैकेज से एडजस्ट होगा, जिससे राकेश की Take-Home सैलरी कम हो जाएगी. क्योंकि कंपनी केवल 25,000 रुपये की सीमा तक का ही दायित्व 3000 रुपये उठाएगी।  अगर किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 40 हजार रुपये मंथली है, तो क्या विकल्प है?  पहला विकल्प: अधिकतर निजी कंपनियां अनिवार्य वैधानिक सीमा पर ही पीएफ काटती हैं. इस हिसाब से कर्मचारी का योगदान 25,000 रुपये का 12%= 3,000 रुपये प्रति माह बनता है.   नियोक्ता का योगदान (12%): कुल 3000 रुपये, जो दो हिस्सों में बंटेगा- EPS (पेंशन फंड- 8.33%): 25 हजार रुपये का 8.33%= 2,083 रुपये/माह EPF (भविष्य निधि- 3.67%): ₹917/माह ऐसे में बेसिक 40 हजार रुपये होने के बावजूद कर्मचारी के वेतन से केवल 3,000 प्रति माह कटेंगे.  दूसरा विकल्प: पूरी बेसिक सैलरी यानी 40 हजार रुपये पर PF काटना.  अगर आपकी कंपनी और आप सहमत हैं, तो आप अपनी पूरी बेसिक सैलरी पर 12% पीएफ का योगदान दे सकते हैं.  कर्मचारी का योगदान: ₹40,000 का 12% = ₹4,800 प्रति महीने नियोक्ता का योगदान: कुल ₹4,800 प्रति माह EPS (पेंशन फंड): अधिकतम 25,000 की सीमा पर ही रहेगा, जो कि 2,083 रुपये महीने (अगर उच्च पेंशन का विकल्प नहीं चुना गया है.) EPF (भविष्य निधि): बचा हुआ पूरा हिस्सा यानी 2,717 रुपये/माह. ऐसे में कर्मचारी के वेतन से 4,800 रुपये प्रति माह कटेंगे और इतना ही योगदान कंपनी की तरफ से कुल पीएफ/पेंशन में जाएगा. लेकिन ऐसी स्थिति में इन हैंड सैलरी कम हो जाएगी। 

8वां वेतन आयोग: OPS-NPS पर क्या होगा फैसला? कर्मचारियों ने रखी मांग

नई दिल्ली केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए 8वां वेतन आयोग इस समय वेतन, पेंशन और भत्तों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार कर रहा है। 3 नवंबर 2025 को गठन के बाद आयोग को अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है और करीब 10 महीने बीत भी चुके हैं। आयोग की अध्यक्षता न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। आयोग कर्मचारी संगठनों, पेंशनर संगठनों और अन्य एसोसिएशनों से उनकी मांगों और सुझावों पर चर्चा कर रहा है। पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग शहरों में आयोग की बैठकें हो चुकी हैं। सितंबर में आयोग ने 9 सितंबर को पुडुचेरी और 16 से 18 सितंबर के बीच चंडीगढ़ में बैठकें कीं। अक्टूबर में बेंगलुरु में 7 और 8 अक्टूबर को बैठक प्रस्तावित है। फिटमेंट फैक्टर से लेकर पेंशन तक पर चर्चा आयोग के सामने कर्मचारी संगठनों की ओर से फिटमेंट फैक्टर बढ़ाने, वेतन संशोधन, पेंशन में सुधार और विभिन्न भत्तों में बदलाव समेत कई मांगें रखी गई हैं। हालांकि, इनमें पुरानी पेंशन योजना (OPS) और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) का मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण बना हुआ है। 2004 के बाद भर्ती हुए केंद्रीय कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा को लेकर कई कर्मचारी संगठनों ने आयोग के सामने अपनी चिंताएं रखी हैं। OPS की बहाली की मांग कई कर्मचारी संगठनों का कहना है कि मौजूदा अंशदायी पेंशन व्यवस्था से सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है। उनके मुताबिक कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए निश्चित पेंशन व्यवस्था जरूरी है। सर्वे ऑफ इंडिया की MSA ने OPS बहाल करने की मांग की है। संगठन ने अंतिम वेतन के 50 फीसदी के बराबर गारंटीड पेंशन की मांग भी रखी है। वहीं फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल आर्गेनाइजेशन ने NPS और UPS के तहत आने वाले कर्मचारियों को भी परिभाषित लाभ वाली पेंशन व्यवस्था में लाने की मांग की है। रेलवे सीनियर सिटिजनंस सोसाइटी ने भी न्यूनतम गारंटीड पेंशन और सेवानिवृत्ति के बाद अधिक वित्तीय सुरक्षा की मांग उठाई है। 8वें वेतन आयोग में आगे क्या होगा? इन संगठनों की मांगें उनके संबंधित ज्ञापनों के माध्यम से 8वें वेतन आयोग के सामने रखी गई हैं। दूसरे कर्मचारी और पेंशनर संगठनों ने भी फिटमेंट फैक्टर, पेंशन समानता और न्यूनतम पेंशन बढ़ाने समेत कई सुझाव दिए हैं। अब आयोग इन मांगों और विभिन्न पक्षों से मिले सुझावों का अध्ययन करेगा। इसके बाद आयोग अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपेगा। उपलब्ध समयसीमा के अनुसार अंतिम रिपोर्ट मई-जून 2027 के आसपास आने की संभावना बताई जा रही है।

भारत पर टैरिफ लगाने से पहले संभल जाए अमेरिका, रूसी तेल खरीद पर जेमी डिमॉन ने चेताया

नई दिल्ली जेपी मॉर्गन चेज के सीईओ जेमी डिमॉन ने रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर कार्रवाई को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को कोई सख्त कार्रवाई करने से पहले उसके असर को समझना चाहिए। यूएस को भारत और पूरी दुनिया के तेल बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखना होगा। डिमॉन ने यह बात मुंबई में जेपी मॉर्गन इंडिया इन्वेस्टर कॉन्फ्रेंस के दौरान सीएनबीसी-टीवी18 से बातचीत में कही। उन्होंने कहा, 'वॉशिंगटन को पहले समझना चाहिए कि भारतीय रिफाइनर रूस से मिलने वाले तेल का किस तरह इस्तेमाल करते हैं।' जेमी डिमॉन ने कहा, 'उम्मीद है कि अमेरिका इन सभी मुद्दों को समझेगा और ऐसा नहीं करेगा कि रूस के खिलाफ जरूरी कदम उठाते हुए भारत और दुनिया के तेल बाजार को नुकसान पहुंचा दे।' उन्होंने भारतीय रिफाइनरियों में इस्तेमाल होने वाले रूसी तेल को लेकर भी बात रखी। डिमॉन के मुताबिक, रूस से आने वाले तेल का कुछ हिस्सा भारत में रिफाइन होकर इस्तेमाल होता है और कुछ तेल रिफाइनरियों की खास जरूरत के मुताबिक खरीदा जाता है। उन्होंने कहा कि अगर भारत यह तेल रूस से नहीं खरीदेगा तो उसे किसी दूसरे देश से लेना होगा और हो सकता है कि वहां से मिलने वाला तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए सही न हो। रूस से तेल खरीदने पर 100% तक टैरिफ डिमॉन का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी कांग्रेस ने रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़ा विधेयक पास किया है। इस कानून के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। डिमॉन ने कहा कि अमेरिका को रूस पर दबाव बनाने के उपायों के साथ-साथ यह भी देखना चाहिए कि ऐसे कदमों का तेल बाजार पर कितना व्यापक असर पड़ सकता है। अमेरिका को यूक्रेन के समर्थन के लिए और कदम उठाने चाहिए। भारत पर अमेरिका और यूरोपीय संघ का दबाव रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिका और यूरोपीय संघ की ओर से दबाव बढ़ा हुआ है। भारत लगातार रूसी तेल खरीद को लेकर हो रही आलोचना को खारिज करता रहा है। नई दिल्ली ने अपनी ऊर्जा खरीद को निशाना बनाने को अनुचित और गैरवाजिब बताया है। रूस पर प्रतिबंध वाले अमेरिकी कानून पर भी भारत ने कहा कि इससे दोनों देशों के संबंध प्रभावित हो सकते हैं। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और रूसी तेल के बड़े खरीदारों में शामिल है।

वंदे मातरम् को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा जवाब

नई दिल्ली राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाता है या फिर सारे आंतरे नहीं गाता है तो उसपर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट नेइस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब भी मांगा है। गायक टीएम कृष्णा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई की वंदे मातरम् से जुड़े कानून की व्याख्या करते वक्त 1986 के 'बिजो एमैनुअल' के तय सिद्धातों को लागू किया जाएगा। आपको बता दें कि जुलाई में संसद के मॉनसून सत्र में एक संशोधन विधेयक लाकर वंदे मातरम को इसके अंतरगत लाया गया था। 29 जुलाई को राज्यसभा में और फिर 30 जुलाई को लेकसभा में विधेयक को पास करके कानून बनाया दिया गया और वंदेमातरम गाना अनिवार्य किया गया था। इसे राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम के दायरे में ले आया गया। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत को दो अंतरे तक ही सीमित रखने पर विचार करने से इनकार कर दिया है। हालांकि इस बात पर विचार करने को तैयार है कि इसे ना गाने को दंडनीय अपराध ना बनाया जाए। राष्ट्रगान ना गाने पर नहीं हो सकती सजा सीजेआई सूर्यकांत जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने बिजो इमैनुएल मामले में सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले का हवाला देते हुए कहा कि तय किया गया था कि राष्ट्रगान ना गाने पर किसी को सजा नहीं दी जाएगी और यह अब भी लागू होता है। बिजो इमैनुअल केस: 3 छात्रों ने राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वंदे मातरम से जुड़े कानून की व्याख्या करते समय 1986 के ‘बिजो इमैनुअल’ फैसले में तय सिद्धांतों को लागू किया जाएगा। दरअसल, 1986 के बिजो इमैनुअल बनाम केरल सरकार मामले में तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने के आधार पर उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता। ‘नक्सली’ शब्द पर सॉलिसिटर जनरल और मुरलीधर में बहस सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कृष्णा के वकील सीनियर एडवोकेट डॉ एस मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी हुई। संविधान के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया पर मुरलीधर की दलील के जवाब में मेहता ने ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया।     मुरलीधर: अभी आपने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, उसे वापस लें। यह कार्यवाही लाइव चल रही है। मैं इसका कड़ा विरोध करता हूं।     मेहता: मैंने कहा कि यही संवैधानिक तरीका है, न कि वह तरीका जो नक्सली चाहता है। और मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है।     मुरलीधर: “किसी बात पर विचार करना नक्सली होना नहीं है। इसके बाद जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति पर आतंकवादी होने का आरोप हो, तब भी संविधान के तहत उसके अधिकार बने रहते हैं। 2026 वंदे मातरम के अपमान पर कानून बना 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'वंदे मातरम' को राष्ट्रीय गीत घोषित किया था। लंबे समय तक इसके अपमान पर कोई अलग कानून नहीं था, लेकिन 2026 के मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम' बनाया। इस कानून के तहत 'वंदे मातरम' के गायन को जानबूझकर रोकने, इसमें बाधा डालने या इसका सार्वजनिक अपमान करने को दंडनीय अपराध माना गया है। ऐसा करने पर 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। इस बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार लाल किले की प्राचीर से 'वंदे मातरम' के पूरे 6 छंद गाए गए। केंद्र से मांगा जवाब सुप्रीम कोर्ट ने इस पीआईएल पर सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारियों के संबंध में कानून में दंड के प्रावधानों की समीक्षा होनी चाहिए। आपको बता दें कि कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी एम कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका फाइल की थी और कहा था कि वंदे मातरम के सभी 6 छंद गाना अनिवार्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि आखिरी के चार अंतरे में स्पष्ट रूप से हिंदू देवी देवताओं की आर्चना का भाव है और एक धर्मनिरपेक्ष देश में इसे अनिवार्य कर देना संविधान का उल्लंघन है। केंद्र सरकार की ओर से पेश एसजी तुषार मेहता ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कुछ लोग संविधान और कानून के राज में विश्वास नहीं करते और उनकी सोच नक्सलवादी है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय गीत की अहम भूमिका थी और इसे भुलाना नहीं चाहिए। तुषार मेहता ने क्या दलील दी? सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से नोटिस नहीं जारी करने की मांग की. इस पर उन्होंने दलील दी कि यह सनसेशन को बढ़ावा देने वाला होगा. इसके बाद सुनवाई के दौरान ही जस्टिस बागची ने कहा कि  इसमें कोई संदेह नहीं कि यह हमारा राष्ट्रीय गीत है।  याचिकाकर्ता की बात से सहमत दिखा सुप्रीम कोर्ट इस पर एसजी तुषार मेहता ने कहा कि दो पद गाए जाएं या छह पद गाए जाएं… यह सरकार से इतर कौन तय करेगा, कोई और तो नहीं कर सकता. इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने दखल दी. उन्होंने कहा कि लोगों की राय ली जानी चाहिए थी. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह सही बात है।  2 सप्ताह में देना है जवाब इसके बाद वंदे मातरम के छह पद गाने की अनिवार्यता के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने जवाब तलब किया. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि दो सप्ताह के अंदर केंद्र को इस मामले में देना होगा जवाब. याचिकाकर्ता के वकील ने एसजी की ओर से दलील में नक्सलाइट शब्द का उपयोग करने पर भी गंभीर आपत्ति जताई।