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डॉलर पर बढ़ा वैश्विक दबाव! सेंट्रल बैंक घटा सकते हैं होल्डिंग्स, बदल सकता है आर्थिक समीकरण

न्यूयॉर्क क्‍या डॉलर के बुरे दिन शुरू होने वाले हैं, अब डॉलर दुनिया में दबदबे वाली करेंसी नहीं रहेगी या क्‍या दुनिया को डॉलर का विकल्‍प मिल गया है? एक रिपोर्ट में ऐसा खुलासा किया गया है, जिसके बाद आपके भी मन में ये सभी सवाल घूमने लगेंगे. रॉयटर्स की रिपोर्ट में एक सर्वे के हवाले से कहा गया है कि दुनिया अब डॉलर रिजर्व को कम करने की तैयारी कर रही है. दुनिया में ऐसा पहली बार होने जा रहा है।  यह सर्वे ऑफिशियल मॉनिटरी एंड फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशंस फोरम (OMFIF) की ओर से की गई है. इस सर्वे में कहा गया है कि पहली बार दुनिया के केंद्रीय बैंक आने वाले 10 सालों में अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) में अमेरिकी डॉलर की हिस्‍सेदारी बढ़ाने के बजाय घटाने की योजना बना रहे हैं, जो यह संकेत देता है कि फॉरेक्‍स रिजर्व पोर्टफोलियो को दुनिया डाइवर्सिफाइड रखना चाहती है।  पहले क्‍यों होती थी सिर्फ डॉलर बढ़ाने की बात?  दरअसल, दुनिया में सबसे स्थिर करेंसी डॉलर मानी जाती रही है और पूरी दुनिया डॉलर में ही एक दूसरे देश से कारोबार कर रहे हैं. चाहे तेल का आयात हो या किसी फूड आइटम्‍स का निर्यात डॉलर में ही लेनदेन होता रहा है, लेकिन अब स्थिति‍ धीरे-धीरे बदल रही है. कई देश लोकल करेंसी में आयात-निर्यात करना शुरू कर चुके हैं और अमेरिका के दबाव वाली राजनीति से नाराज भी दिख रहे हैं. सर्वे में खुलासा हुआ है कि ऐसा पहली बार है कि ज्‍यादातर देश डॉलर होल्डिंग्‍स को अगले 10 साल में कम करने जा रहे हैं।  क्‍यों हो रही डॉलर घटाने की बात?  सर्वे के अनुसार, केंद्रीय बैंकों को तीन बड़े रिस्‍क दिखाई दे रहे हैं, जो डॉलर को लेकर पैदा हुए हैं. इसमें सबसे बड़ा अमेरिकी राजनीतिक अनिश्‍चतता, जिससे डॉलर की स्थिर रहने पर सवाल खड़ा हुआ है. दुसरा कई देशों के साथ अमेरिका का जियो-पॉलिटिकल टेंशन, जिस कारण डॉलर में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. खासकर ईरान जंग के दौरान डॉलर में अस्थिरता काफी दिखाई दी है. तीसरी सबसे बड़ी वजह ग्‍लोबल फाइनेंशियल सिस्‍टम का मल्‍टीपोलर होना यानी ज्‍यादातर देश अब सिर्फ डॉलर नहीं, बल्कि अलग-अलग करेंसी में एक दूसरे के साथ ट्रेड कर रहे हैं. इसका सीधा मतलब है कि दुनियाभर के देश अब सिर्फ डॉलर पर निर्भर नहीं रहना चाहते हैं।  डॉलर की जगह कौन-कौन सी करेंसी ज्‍यादा पसंद हैं  अभी डॉलर का विकल्‍प स्‍पष्‍ट तौर पर दिखाई नहीं देता है, लेकिन अगर ऐसा ही रहा तो बहुत जल्‍द दुनिया डॉलर को पीछे छोड़कर किसी दूसरे करेंसी की ओर बढ़ेगी. सर्वे में कहा गया है कि डॉलर की जगह सबसे ज्‍यादा पसंद किए जाने वाली चीजों में सोना, यूरो, ब्रिटिश पाउंड, चीनी युआन, नॉर्वे की क्रोन और न्‍यूजीलैंड डॉलर है. हालांकि, सर्वे का यह भी कहना है कि यूरो और युआन की अपनी लिमिटेशन हैं, यही कारण है कि वे डॉलर का पूर्ण विकल्‍प नहीं बन पाए हैं।  सोने का बढ़ रहा रिजर्व रॉयटर्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस सर्वे से पहले एक अन्‍य सर्वे में कहा गया है कि रिकॉर्ड संख्या में केंद्रीय बैंक अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की योजना बना रहे हैं. कई देशों के लिए सोना अब जियो-पॉलिटिकल रिस्‍क के खिलाफ सुरक्षा और रिजर्व को डाइवर्सिफाई रखने का प्रमुख साधन बनता जा रहा है।  डॉलर का वजूद मिट जाएगा? रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी तक ऐसा नहीं दिखाई देता है कि डॉलर का प्रभुत्‍व दुनिया से खत्‍म हो जाएगा, क्‍यों डॉलर अभी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और सुरक्षित निवेश के रूप में उसकी भूमिका बहुत मजबूत बनी हुई है. बदलाव अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे हो रहा है।  भारत पर क्‍या असर होगा?  अगर डॉलर से निर्भरता कम होती है तो भारत जैसे देश अपनी करेंसी को बढ़ावा दे सकते हैं और दुनिया के साथ रुपये में कारोबार बढ़ सकता है. साथ ही अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने और अन्य मुद्राओं का हिस्सा बढ़ा सकते हैं. हालांकि, ये अचानक नहीं होगा, बल्कि डॉलर का दबदबा धीरे-धीरे कम हो सकता है। 

TMC अकाउंट फ्रीज मामला: हाईकोर्ट ने अर्जेंट सुनवाई से किया इनकार, ममता बनर्जी की बढ़ी मुश्किलें

कलकत्ता कलकत्ता हाईकोर्ट से मंगलवार को ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को बड़ा झटका लगा है. कोर्ट ने पार्टी के तीन बैंक खातों को फ्रीज करने के खिलाफ दायर याचिका पर अर्जेंट सुनवाई करने से स्पष्ट मना कर दिया है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस सौगत भट्टाचार्य कर रहे हैं. उन्होंने ममता गुट की याचिका पर तुरंत सुनवाई करने से मना कर दिया. उन्होंने आगे कहा कि इस केस की सुनवाई भी आम मामलों की तरह ही होगी, यानी जो नंबर तय है, उसी लिस्टिंग के अनुसार सुनवाई की जाएगी। ममता गुट के वकील किशोर दत्ता ने कोर्ट को बताया कि टीएमसी के तीन बैंक खातों पर रोक लगा दी गई है. इस वजह से इन खातों से किसी भी तरह का पेमेंट और लेन-देन नहीं हो पा रहा है. वकील ने कहा कि इन खातों में लगभग 440 करोड़ रुपये की भारी रकम फंसी हुई है. उन्होंने इस संकट को देखते हुए कोर्ट से तुरंत सुनवाई करने की अपील की, लेकिन अदालत ने उनकी ये मांग मानने से साफ इनकार कर दिया। बैंक खातों में 440 करोड़ जमा तृणमूल कांग्रेस के जिन तीन बैंक खातों पर रोक लगाई गई है, उनमें लगभग 440 करोड़ रुपये जमा हैं। यह कार्रवाई बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के समर्थक कुछ विधायकों द्वारा बिधाननगर पुलिस आयुक्तालय के साइबर अपराध थाने में दर्ज कराई गई शिकायतों के बाद की गई है। शिकायत में उन्होंने प्राथमिकी दर्ज कर खातों की विस्तृत जांच कराने की मांग की थी।विधायकों ने अपनी शिकायत में बैंक खातों में जमा धन के स्रोत पर सवाल उठाते हुए सभी लेन-देन की जांच कराने की मांग की। उन्होंने जांचकर्ताओं से यह पता लगाने का आग्रह किया कि खातों में जमा धन वैध स्रोतों से आया है या फिर कथित अवैध गतिविधियों, जैसे 'कट मनी' की वसूली, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और घोटालों से अर्जित रकम से जुड़ा हुआ है। बता दें कि फलता के चुनाव के बाद कई ऐसे वीडियो सामने आए थे जिनमें लोगों को कटमनी वापस की गई थी। दरअसल सरकारी योजनाओं को लाभ देने के लिए वसूला गया धन कट मनी कहा जाता है। आरोप है कि ममता बनर्जी की सरकार में धड़ल्ले से लोगों से कटमनी वसूली जाती थी। तय समय से होगी सुनवाई सोमवार को मामले की शीघ्र सुनवाई की मांग किये जाने पर अदालत ने बैंक, पुलिस और राज्य सरकार को पक्षकार बनाने तथा उन्हें नोटिस जारी करने का निर्देश दिया था. मंगलवार को सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद फिर से त्वरित सुनवाई का अनुरोध किया गया, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया. न्यायमूर्ति ने दोहराया कि मामले की सुनवाई तय प्रक्रिया के अनुसार ही होगी. इस मामले में राज्य सरकार भी एक पक्ष है. राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से अनुरोध किया कि यदि त्वरित सुनवाई संभव नहीं है, तो कम से कम गुरुवार को पक्षों को अपनी दलीलें रखने का अवसर दिया जाये।  बागी विधायकों की शिकायत पर हुई कार्रवाई टीएमसी के इन बैंक खातों पर ये कार्रवाई बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी से जुड़े कुछ विधायकों की शिकायत के बाद हुई है. इन विधायकों ने बिधाननगर पुलिस कमिश्नरेट के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी. अपनी शिकायत में उन्होंने इस मामले की पूरी जांच करने और एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी।  इन बागी विधायकों ने खातों में जमा करोड़ों रुपयों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने जांच टीम से मांग की है कि इस पैसे के सोर्स की जांच की जाए. वे पता लगाना चाहते हैं कि ये पैसा ईमानदारी की कमाई का है या फिर किसी गलत काम से आया है. उन्हें शक है कि ये पैसा कट-मनी (कमीशन), पब्लिक फंड की हेराफेरी और किसी बड़े घोटाले का हो सकता है। 

डोनाल्ड ट्रंप की ताकत बढ़ी! सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने दिए व्यापक अधिकार

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी ताकत दी है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मानें तो अब वह किसी भी एजेंसी चीफ को कभी भी बटा सकते हैं. जी हां, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति की शक्तियों का दायरा काफी बढ़ा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा स्वतंत्र फेडरल एजेंसियो के प्रमुखों को हटाए जाने के फैसले को सही ठहराया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में  कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब स्वतंत्र संघीय एजेंसियों के प्रमुखों को अपनी इच्छा से पद से हटा सकते हैं. हालांकि, इस फैसले में फेडरल रिजर्व यानी अमेरिकी केंद्रीय बैंक को इससे अलग रखा गया है।  सुप्रीम कोर्ट ने क्या अपवाद रखा? अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जजों अपने फैसले में यह भी कहा कि फेडरल रिजर्व की गवर्नर लिसा कुक (Lisa Cook) फिलहाल अपने पद पर बनी रहेंगी. वह ट्रंप प्रशासन की ओर से उन्हें हटाने की कोशिश के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने उन पर मॉर्गेज फ्रॉड के आरोप लगाए हैं. हालांकि, कुक ने इन आरोपों से इनकार किया है।  अब ट्रंप को वजह बताने की जरूरत नहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, फेडरल रिजर्व को छोड़कर बाकी स्वतंत्र एजेंसियों के प्रमुखों को हटाने के लिए अब राष्ट्रपति को किसी खास वजह अथवा कारण की जरूरत नहीं होगी. इससे पहले संघीय कानूनों के तहत ऐसे अधिकारियों को हटाने के लिए ठोस कारण बताना जरूरी था. यानी देश के सेंट्रल बैंक को छोड़कर कोर्ट ने माना कि राष्ट्रपति अपनी मर्जी से एजंसियों के प्रमुखों को हटा सकते हैं।  सुप्रीम कोर्ट ने पलटा 91 साल पुराना फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 91 साल पुराने अपने ही ऐतिहासिक फैसले Humphrey’s Executor v. United States को भी पलट दिया. उस फैसले में राष्ट्रपति के अधिकार सीमित किए गए थे ताकि स्वतंत्र एजेंसियां राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम कर सकें. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कोर्ट के 6 कंजर्वेटिव जजों के बहुमत से आया, जिसे ट्रंप प्रशासन की शक्तियों में बड़ी बढ़ोतरी के तौर पर देखा जा रहा है. इस बेंच में 9 जज शामिल थे।  चीफ जस्टिस ने क्या कहा अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति को अधिकारियों को हटाने से रोकने वाली व्यवस्था संविधान में तय शक्तियों के बंटवारे के खिलाफ है. जजों ने फेडरल ट्रेड कमीशन की पूर्व सदस्य रेबेका स्लॉटर के मामले में फैसला सुनाया, जिन्हें ट्रंप ने बिना किसी कारण के निकाल दिया था, जबकि फेडरल कानून के एक नियम के अनुसार कारण बताना जरूरी है।  इस फैसले का लॉजिक दूसरी एजेंसियों पर भी लागू होता है, जिनमें नेशनल लेबर रिलेशंस बोर्ड, मेरिट सिस्टम्स प्रोटेक्शन बोर्ड और कंज्यूमर प्रोडक्ट सेफ्टी कमीशन शामिल हैं, जहां ट्रंप ने बोर्ड के सदस्यों को भी निकाल दिया है. इस फैसले के बाद डोनाल्ड ट्रंप काफी खुश हैं।  डोनाल्ड ट्रंप हुए खुश डोनाल्ड ट्रंप ने एक ट्रुथ सोशल पोस्ट में इस फैसले पर अपनी खुशी और सहमति जताई. उन्होंने लिखा, ‘यह बहुत सम्मान की बात है कि मौजूदा प्रेसिडेंट होने के नाते यह ऐतिहासिक और अभूतपूर्व फैसला मिला, जो प्रेसिडेंशियल शक्तियों के संबंध में अब तक दिए गए सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक है। 

मानसून पड़ा कमजोर! जून में सामान्य से 42% कम बारिश, एल-नीनो ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली  प्रशांत महासागर में सक्रिय एल-नीनो का असर भारत में इस साल साफ-साफ देखने को मिल रहा है। साल 1927 से 2026 तक यह तीसरा ऐसा मौका है, जब जून का महीना सबेस सूखा साबित होने जा रहा है। महीने के अंत होने में कुछ घंटे शेष है और देश भर में 42% बारिश की कमी देखने को मिल रही है। दरअसल, जून में अब तक देश भर में औसतन केवल 92.2 मिमी बारिश हुई है, जबकि सामान्य तौर पर यह आंकड़ा 157.7 मिमी होना चाहिए था। अगर आज यानी मंगलवार को जून महीने के आखिरी दिन अच्छी बारिश होती है तो कुल मिलाकर लगभग 100 मिमी बारिश होने की संभावना है। पिछले 100 सालों में कब-कब सूखा रहा जून का महीना? जून का महीना पिछले 100 सालों में तीन बार सूखा रहा है। मौसम इतिहास में जून महीने में इससे कम बारिश पिछले 100 सालों में सिर्फ 2009 (87.5 मिमी) और 2014 (92.1 मिमी) दर्ज की गई थी। यह दोनों साल 20 वर्षों के भीतर के ही हैं। राहत की बात यह है कि जून में जहां देश के अधिकांश हिस्सों, विशेष रूप से मध्य भारत में जहां अब तक मानसून की सबसे अधिक कमी रही है, वहां अच्छी बारिश होने की उम्मीद है। IMD के अनुसार, जुलाई के पहले हफ्ते से मध्य भारत सहित देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून रफ्तार पकड़ेगा और अच्छी बारिश होगी। बारिश की भारी कमी बता दें कि जून के महीने में मध्य भारत में अब तक भारी वर्षा हुई है, लेकिन यह 54% तक कम है। इसके बाद पूर्वी और उत्तरपूर्वी भारत में 41%, उत्तर-पश्चिमी भारत में 30% और दक्षिणी भारत में 28% की कमी देखी गई है। देश के चारों तरफ इतनी भारी मात्रा में बारिश की कमी शायद इस बात का संकेत है कि एल-नीनो का प्रभाव भारत के मानसून पर पड़ना शुरू हो गया है। क्या अल नीनो लाएगा सूखा, महंगाई और पानी का संकट?  जून में  देश में जितनी बारिश होनी चाहिए थी, उससे 64 प्रतिशत कम बारिश हुई है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत 16 राज्यों में मानसून की रफ्तार थम गई है।  सवाल है कि क्या इस साल मानसून कमजोर पड़ रहा है? क्या अल नीनो इसकी वजह है? अगर बारिश कम हुई तो क्या होगा, क्या महंगाई बढ़ेगी? क्या फसलें प्रभावित होंगी और आखिर वैज्ञानिक क्यों कह रहे हैं कि आने वाले महीने बेहद अहम हैं? आखिर मानसून क्यों थम गया?  इस समय मानसून तेलंगाना के भद्राचलम इलाके के आसपास अटका हुआ है. मानसूनी हवाएं आगे बढ़ने की बजाय कमजोर पड़ गई हैं. 15 जून की सैटेलाइट तस्वीरों में देश के बड़े हिस्से से मानसूनी बादल गायब दिखाई दिए. IMD के मुताबिक 4 जून से 15 जून के बीच देश में सामान्य रूप से 53.7 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन हुई केवल 19.2 मिलीमीटर यानी बारिश में 64 प्रतिशत की कमी. इसी वजह से मौसम वैज्ञानिक लगातार एक शब्द दोहरा रहे हैं- अल नीनो।  क्या है अल नीनो? भारत में बारिश कम हो रही है, लेकिन इसकी कहानी हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर से शुरू होती है. सामान्य परिस्थितियों में, पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली ट्रेड विंड्स गर्म समुद्री पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं. यही गर्म पानी बादलों को जन्म देता है और यही सिस्टम भारतीय मानसून को ऊर्जा देता है, लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं तो समुद्र का संतुलन बिगड़ जाता है और गर्म पानी वापस मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की ओर फैलने लगता है. समुद्र का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाता है. इसी स्थिति को वैज्ञानिक अल नीनो कहते हैं।  अल नीनो सिर्फ समुद्र का तापमान नहीं बढ़ाता. ये पूरी पृथ्वी के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है. समुद्र गर्म होता है, उसके ऊपर की हवा गर्म होती है. बादलों का पैटर्न बदलता है. हवाओं की दिशा बदलती है और मानसून कमजोर पड़ सकता है. IMD के मुताबिक, अल नीनो के वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका बढ़ जाती है।  एल-नीनो का प्रभाव अमेरिकी एजेंसी इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी के अनुसार, प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती गर्मी से एल-नीनो मध्यम तीव्रता के करीब पहुंच चुका है और आने वाले महीनों में इसके और मजबूत होने की आशंका है। एल-नीनो प्रशांत महासागर के पानी का गर्म कर देते है, जिसे वैश्विक मौसम प्रभावित होता है। यह हवाओं का रुख बदलकर भारतीय मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसी के कारण 4 जून को केरलम पहुंचे मानसून की रफ्तार अभी तक सुस्त है और जून में देश की दैनिक वर्षा महज एक ही दिन सामान्य से अधिक रही है।  

World’s Tallest Dam: चीन का नया कमाल, 315 मीटर ऊंचे डैम से होगा रिकॉर्ड बिजली उत्पादन

बीजिंग  चीन ने दुनिया के सबसे ऊंचे डैम के हाइड्रोपावर स्टेशन के पहले यूनिट को बिजली ग्रिड से जोड़ दिया है. यह स्टेशन चीन के सिचुआन प्रांत में बना है. शुआंगजियांगकोउ हाइड्रोपावर स्टेशन 315 मीटर ऊंचा है. इसकी कुल क्षमता 20 लाख किलोवॉट है. इससे हर साल औसतन 7.7 अरब यूनिट बिजली बनेगी. यह प्रोजेक्ट बिजली बनाने के साथ यांग्त्जे नदी के ऊपरी हिस्से में बाढ़ का खतरा कम करने में भी मदद करेगा।  शुआंगजियांगकोउ हाइड्रोपावर स्टेशन का डैम 315 मीटर ऊंचा है. इसी के साथ यह दुनिया का सबसे ऊंचा डैम बन गया है. इसे बनाने में 4.6 करोड़ क्यूबिक मीटर से ज्यादा समान का इस्तेमाल हुआ है. यह मात्रा इतनी ज्यादा है कि इससे पूरी पृथ्वी की भूमध्य रेखा के चारों ओर करीब 1 मीटर ऊंची दीवार बनाई जा सकती है।  हर साल बनेगी 7.7 अरब यूनिट बिजली इस हाइड्रोपावर स्टेशन की क्षमता 20 लाख किलोवॉट है. इसके पूरी तरह शुरू होने के बाद हर साल औसतन 7.7 अरब यूनिट बिजली बनेगी. इससे साफ एनर्जी का उत्पादन बढ़ेगा. साथ ही कोयला जैसे ईंधनों पर निर्भरता भी कम हो सकती है।  यह प्रोजेक्ट पहाड़ों के बीच और बेहद ठंडे इलाके में बनाया गया है. इसे बनाने के दौरान इंजीनियरों को गहरी नदी और कड़ाके की ठंड जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इनसे निपटने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल किया गया. इनमें हेलियोस्टैट बेस्ड सरफेस हीटिंग और पूरी तरह बंद एयर-सपोर्टेड मेम्ब्रेन सिस्टम शामिल हैं।  बाढ़ का खतरा कम करने में भी करेगा मदद यह हाइड्रोपावर स्टेशन सिर्फ बिजली बनाने के लिए नहीं है. यह यांग्त्जे नदी के ऊपरी हिस्से में पानी के बहाव को नियंत्रित करेगा. इससे बाढ़ का खतरा कम करने और पानी के बेहतर इस्तेमाल में भी मदद मिलेगी।  शुआंगजियांगकोउ हाइड्रोपावर स्टेशन चीन के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में से एक है. दुनिया का सबसे ऊंचा डैम बनने के साथ इसने एक नया रिकॉर्ड भी बनाया है. इससे बिजली उत्पादन बढ़ेगा और बाढ़ नियंत्रण में भी मदद मिलेगी। 

9,000 कर्मचारियों पर गिरी गाज, तंबाकू बनाने वाली कंपनी ने क्यों लिया इतना बड़ा फैसला?

मैक्सिको दुनिया की सबसे बड़ी तंबाकू कंपनियों में शामिल ब्रिटिश अमेरिकन टोबैको (British American Tobacco – BAT) ने एक बड़ा फैसला लिया है। तंबाकू बनाने वाली इस कंपनी ने वैश्विक स्तर पर करीब 9,000 कर्मचारियों की छंटनी करने की घोषणा की है। कंपनी का कहना है कि बदलते बाजार और लगातार घटती सिगरेट की डिमांड को देखते हुए अब वह अपने कारोबार का फोकस रेगुलर सिगरेट से हटाकर वेप (Vape), ई-सिगरेट और निकोटीन पाउच जैसे नए उत्पादों की ओर ले जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, BAT इस साल के अंत तक 5,500 कर्मचारियों की नौकरी खत्म करेगी, जबकि करीब 3,500 पदों को आउटसोर्स किया जाएगा, यानी कई विभागों का काम दूसरी कंपनियों को सौंप दिया जाएगा। कंपनी के अमेरिका से बाहर करीब 47,000 कर्मचारी हैं और यह छंटनी उनमें से लगभग 20 प्रतिशत कर्मचारियों को प्रभावित कर सकती है। कंपनी का टारगेट साल 2028 तक हर साल करीब 600 मिलियन पाउंड (करीब 6,800 करोड़ रुपये से अधिक) की लागत बचत करना है। इसके लिए BAT अपने पूरे बिजनेस मॉडल में बड़े बदलाव कर रही है। BAT का मानना है कि दुनिया भर में लोग धीरे-धीरे सिगरेट छोड़ रहे हैं और अब धूम्रपान के विकल्प के तौर पर वेप और निकोटीन पाउच जैसे उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। यही वजह है कि कंपनी आने वाले सालों में अपनी कुल आय का आधे से ज्यादा हिस्सा इन नए उत्पादों से कमाना चाहती है। कंपनी पहले ही अपने लोकप्रिय ब्रांड Vuse (वेपिंग डिवाइस) और Velo (निकोटीन पाउच) पर बड़ा निवेश कर चुकी है। BAT की रणनीति फिलिप मॉरिस जैसी दूसरी बड़ी तंबाकू कंपनियों से मिलती-जुलती है, जो तेजी से स्मोक-फ्री उत्पादों की ओर बढ़ रही हैं। BAT (British American Tobacco) ने यह भी अनुमान लगाया है कि साल 2026 में दुनिया भर में रेगुलर सिगरेट की बिक्री में करीब 2 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। यही वजह है कि कंपनी भविष्य की तैयारी अभी से कर रही है। छंटनी के साथ-साथ BAT अपनी कई फैक्ट्रियों को भी बंद कर रही है। इसी साल जनवरी में कंपनी ने दक्षिण अफ्रीका में स्थित अपनी एक सिगरेट फैक्ट्री बंद करने की घोषणा की थी। कंपनी का कहना था कि अवैध तंबाकू कारोबार के कारण उत्पादन प्रभावित हो रहा था। इसके अलावा BAT अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ऑटोमेशन और डेटा एनालिटिक्स का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रही है। कंपनी का मानना है कि नई तकनीक के जरिए कई काम पहले से अधिक तेजी और कम लागत में किए जा सकते हैं। यही कारण है कि कई प्रशासनिक और सर्विस से जुड़े कार्य अब बाहरी कंपनियों को सौंपे जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, BAT ने यूके, सिंगापुर, पोलैंड, मलेशिया, रोमानिया, मैक्सिको और कोस्टा रिका समेत कई देशों में अपनी सर्विस सेंटर गतिविधियों को आउटसोर्स करना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान में भी कंपनी ने कुछ सेवाएं स्थानीय टेक्नोलॉजी कंपनी को सौंप दी हैं। BAT के मुख्य कार्यकारी अधिकारी टाडेउ मारोको ने कहा कि यह फैसला आसान नहीं है, क्योंकि इससे हजारों कर्मचारियों की नौकरियां प्रभावित होंगी। हालांकि, उन्होंने कहा कि कंपनी प्रभावित कर्मचारियों को हर संभव सहयोग देने की कोशिश करेगी और भविष्य की जरूरतों के हिसाब से खुद को तैयार करेगी। एक्सपर्ट का मानना है कि आने वाले सालों में तंबाकू उद्योग में इसी तरह के बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। सिगरेट की घटती डिमांड और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढ़ने के कारण कंपनियां अब ऐसे उत्पादों पर ज्यादा निवेश कर रही हैं, जिन्हें वे स्मोक-फ्री विकल्प के रूप में पेश कर रही हैं।  

मोदी कैबिनेट विस्तार की चर्चाएं तेज, किस मंत्री की होगी छुट्टी और कौन बन सकता है नया चेहरा?

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में परिवर्तन की चर्चा काफी समय से हो रही है, लेकिन जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे और अमित शाह के राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद ये चर्चा तेज हो गई. कैबिनेट में बदलाव कब होगा, इसको लेकर भी दो तरह की चर्चाएं हो रही हैं. कहा जा रहा है कि 28 या 29 जून को कैबिनेट में फेरबदल हो सकता है या फिर मानसून सत्र के बाद बदलाव होगा. मानसून सत्र 21 जुलाई से 21 अगस्त तक चलेगा, फिर 21 अगस्त के बाद कैबिनेट में बदलाव संभव है।  ये पीएम मोदी के काम करने का स्टाइल है, आखिरी समय तक किसी को कुछ नहीं पता होता कि क्या होने वाला है. कैबिनेट रीशफल में भी यही दिख रहा है. चर्चाएं और कयास लग लग रहे हैं. अब आपको बताते हैं कि मोदी कैबिनेट रीशफल में किस किस को मौका मिल सकता है. और किस-किस का पत्ता कट सकता है।  सूत्रों के मुताबिक कहा जा रहा है कि… * उद्धव गुट और TMC से टूटे कुछ सांसदों को मौका मिल सकता है. * उद्धव गुट से आए संजय दीना पाटिल को जगह मिल सकती है. * एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे को कैबिनेट रैंक दिया जा सकता है. * TMC से आए काकोली घोष, सुदीप बंदोपाध्याय और शताब्दी रॉय की भी चर्चा है. तीनों में से कोई एक कैबिनेट में शामिल हो सकता है. * केंद्रीय मंत्री और यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी को संगठन में भेजा जा सकता है. पंकज चौधरी की जगह नया मंत्री बनाया जा सकता है. * दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा को भी संगठन भेजा जा सकता है. हर्ष मल्होत्रा की जगह भी नया मंत्री बनाया जा सकता है. * इसके अलावा कई वरिष्ठ मंत्रियों को संगठन भेजा जा सकता है. * इनकी जगह युवा चेहरों को कैबिनेट में मौका दिया जा सकता है. यानी उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी का साथ छोड़कर आने वाले सांसदों को मौका मिल सकता है. तो वहीं कई पुराने वरिष्ठ नेताओं को वापस संगठन भेजा जा सकता है और उनकी जगह युवाओं को मौका मिल सकता है. यानी एक तरफ उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी हैं, जिनकी पार्टी ही टूट गई है, फिर भी पुराने कैबिनेट में फेरबदल की चर्चाओं के बीच पीएम मोदी ने केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को जन्मदिन की बधाई दी है।  25 जून को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का जन्मदिन था. पीएम मोदी ने कहा कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी लागू करने में धर्मेंद्र प्रधान की सराहनीय भूमिका है. पीएम मोदी की इस बधाई की बड़ी चर्चा हो रही है क्योंकि इंडी गठबंधन से लेकर कॉक्रोच पार्टी तक धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रही है. पेपर लीक के मामले पर धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विपक्ष हमलावर है. ऐसे में पीएम मोदी के बधाई संदेश के कई मतलब निकाले जा रहे हैं। 

Pregnancy के बाद बढ़ा घर का किराया! मकान मालिक के फैसले के खिलाफ कोर्ट पहुंचा दंपती

सैन फ्रांसिस्को सैन फ्रांसिस्को के एक कपल ने अपने मकान मालिक के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है, उनका आरोप है कि मकान मालिक ने उनके घर का किराया करीब 71% तक बढ़ा दिया. सबा और गोकसाल ओनी नाम के इस कपल का दावा है कि महीने के किराए में की गई 10,000 डॉलर (करीब 8.3 लाख रुपये) की यह भारी-भरकम बढ़ोतरी सिर्फ इसलिए की गई ताकि उन्हें मरीना स्थित अपना घर छोड़ने पर मजबूर किया जा सके।  इस जोड़े ने 'सैन फ्रांसिस्को स्टैंडर्ड' को बताया कि वे 'एविला स्ट्रीट' पर स्थित अपने तीन बेडरूम और तीन बाथरूम वाले घर की लीज रिन्यू कराने की तैयारी कर रहे थे. इसी दौरान उन्होंने मकान मालिक को यह जानकारी दी कि उनके घर दूसरा बच्चा आने वाला है. महिला का दावा है कि उसने मकान मालिक को भेजे एक टेक्स्ट मैसेज में लिखा था, “हमारे पास आपके साथ साझा करने के लिए एक बेहद खूबसूरत खबर है, हमारे घर नवंबर में दूसरा बच्चा आने वाला है।  ओनी परिवार करीब 10 महीने पहले ही इस घर में शिफ्ट हुआ था और वे अपनी नन्हीं बेटी के स्वागत के लिए इसी घर में रहना चाहते थे. 42 वर्षीय सबा एक बायोटेक स्टार्टअप की सीईओ हैं, जबकि 36 साल के गोकसाल नौकरी करने के साथ-साथ फैमिली एंड मैरिज थेरेपी में मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रहे  हैं।  खुशखबरी के बाद मिला 'रेंट शॉक' अगस्त में जैसे ही सबा ने मकान मालिक को अपने दूसरे बच्चे की खबर दी, मकान मालिक ने शुरुआत में उन्हें बधाई दी और कहा कि उनका फिलहाल सैन फ्रांसिस्को लौटने का कोई इरादा नहीं है. हालांकि, उन्होंने यह जरूर कहा कि वे इस प्रॉपर्टी को बेचने पर विचार कर रहे हैं. कुछ ही घंटों बाद बातचीत का रुख पूरी तरह बदल गया. मकान मालिक ने घर बेचने की बात की।   इसके कुछ हफ्ते बाद किराएदारों को नए किराए का एक प्रस्ताव मिला. इसमें कहा गया कि अगर वे एक साल और रुकना चाहते हैं, तो मासिक किराया 14,000 डॉलर से बढ़ाकर 24,000 डॉलर कर दिया जाएगा. मकान मालिकों ने जनवरी तक रुकने के लिए 18,000 डॉलर प्रति माह का एक अस्थायी विकल्प भी दिया।  किराए में इस अचानक और भारी बढ़ोतरी से ओनी परिवार दंग रह गया. कपल ने अपने तीन साल के बेटे का एडमिशन पास के ही एक प्लेस्कूल में करा दिया था और महीनों लगाकर घर को सजाया था. उन्होंने बताया कि किराए की इस मनमानी बढ़ोतरी के कारण उन्हें अपनी बेटी के जन्म से महज कुछ हफ्ते पहले नया घर ढूंढने के लिए मजबूर होना पड़ा. आखिरकार उन्होंने पास में ही एक दूसरा घर खरीद लिया, लेकिन वह आकार में छोटा था और इसके कारण उन्हें उस फर्नीचर को भी बेचना पड़ा जो उन्होंने एविला स्ट्रीट वाले घर के लिए खरीदा था।  कपल ने मकान मालिक के खिलाफ मुकदमा दायर किया. याचिका में आरोप लगाया गया कि मकान मालिकों का इरादा कभी भी बढ़ा हुआ किराया वसूलने का था ही नहीं. बल्कि, उन्होंने किराए की बढ़ोतरी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया ताकि परिवार को घर से निकाला जा सके और बिना किराएदारों के प्रॉपर्टी को आसानी से बेचा जा सके. उनके वकील  ने कहा कि उनकी फर्म के पास अब ऐसे मामले बहुत आ रहे हैं, जहां मकान मालिक किराएदारों को निकालने के लिए भारी किराया बढ़ा देते हैं।  किराएदारों का कहना है कि मकान मालिक कानूनी बेदखली के खर्च से बचने के लिए इस हथकंडे का इस्तेमाल करते हैं। 

Pakistan से Paris तक फीका पड़ा चीन का एयर डिफेंस, जानिए क्यों घट रही है वैश्विक मांग

बीजिंग  पेरिस में दुनिया के सबसे बड़े ड‍िफेंस फेयर में से एक यूरोसैटरी खत्म हुआ. यहां अमेरिका, फ्रांस, इजरायल, साउथ कोरिया और चीन समेत दुनिया की बड़ी ड‍िफेंस कंपनियां अपने सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम लेकर पहुंचीं. चीन भी पूरे आत्मविश्वास के साथ गया. नोरिन्को ने स्काई ड्रैगन-100, यितियन-II, लेजर वेपन और एंटी-ड्रोन सिस्टम का प्रदर्शन किया. लेकिन क‍िसी ने द‍िलचस्‍पी नहीं द‍िखाई. सवाल ये क‍ि अगर चीनी सिस्टम इतने दमदार हैं, तो यूरोप और नाटो देशों की कतारें चीन के स्टॉल पर क्यों नहीं दिख रहीं? जवाब वॉर जोन में छ‍िपा है।  चीन के एयर डिफेंस सिस्टम का सबसे बड़ा ग्राहक पाकिस्तान है. पाकिस्तान के पास HQ-9/P जैसे लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम हैं, जिन्हें चीन अपनी तकनीकी क्षमता का प्रतीक बताता है. यही वजह है कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ा और भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, तब रक्षा विशेषज्ञों के बीच यह सवाल उठा कि पाकिस्तान के चीनी एयर डिफेंस सिस्टम का प्रदर्शन कैसा रहा।      भारत और पाकिस्तान, दोनों ने इस अभियान के बारे में अलग-अलग दावे किए. भारत ने सबूतों के साथ कहा क‍ि उसने चाइनीज एयर ड‍िफेंस स‍िस्‍टम की धज्‍ज‍ियां उड़ा दीं. इसके बाद से चीनी एयर ड‍िफेंस सिस्‍टम को लेकर शक गहराने लगा. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल पूछे जाने लगे क‍ि चीनी ड‍िफेंस स‍िस्‍टम क्‍या सच में पाक‍िसतान में प‍िट गया? किसी भी हथियार के लिए वास्तविक युद्ध उसकी सबसे बड़ी परीक्षा होता है और यही परीक्षा चीन के लिए असहज सवाल छोड़ गई।  पेरिस में चीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यूरोसैटरी में चीन का उद्देश्य साफ था ग्लोबल साउथ के अलावा यूरोप में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाना. लेकिन रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह रास्ता आसान नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की सबसे बड़ी ताकत उसकी कम कीमत है. अमेरिका या यूरोप के मुकाबले चीन अपने एयर डिफेंस सिस्टम काफी सस्ते में बेच सकता है. यही कारण है कि पाकिस्तान, मिस्र, अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों ने चीनी सिस्टम खरीदे हैं. लेकिन यूरोप का बाजार सिर्फ कीमत नहीं देखता. वहां यह भी देखा जाता है कि हथियार असली युद्ध में कितना सफल रहा है, क्या वह नाटो नेटवर्क के साथ काम कर सकता है, उसकी लॉजिस्टिक्स कैसी हैं और लंबे समय तक उसका रखरखाव कितना भरोसेमंद रहेगा।  युद्ध ने बदल दिया एयर डिफेंस का गणित यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दुनिया को दिखा दिया कि अब सिर्फ लड़ाकू विमान नहीं, बल्कि ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइलें भी युद्ध का चेहरा बदल रही हैं. इसी वजह से एयर डिफेंस बाजार अचानक दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता रक्षा बाजार बन गया है. अमेरिका के THAAD और Patriot, यूरोप के SAMP/T NG तथा दक्षिण कोरिया के M-SAM और L-SAM जैसे सिस्टम चर्चा में हैं।  दक्षिण कोरिया ने इस दौड़ में तेजी से जगह बनाई है. यूएई ने दावा किया कि उसके M-SAM सिस्टम ने ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमलों के दौरान 30 में से 29 लक्ष्यों को मार गिराया. इसके बाद सऊदी अरब और इराक जैसे देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई।  चीन की असली दिक्कत सिर्फ तकनीक नहीं साउथ चाइना मार्निंग पोस्‍ट की र‍िपोर्ट के मुताबिक- रक्षा विशेषज्ञ बेन्स नेमेथ का कहना है कि कोई भी देश सिर्फ तकनीकी स्पेसिफिकेशन देखकर हथियार नहीं खरीदता. ग्राहक यह भी देखते हैं कि हथियार कितने युद्धों में इस्तेमाल हुआ, उसका रिकॉर्ड कैसा है, ट्रेनिंग और सपोर्ट कैसा मिलेगा और भविष्य में स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता कैसी रहेगी।  यही वजह है कि अमेरिकी और इजरायली सिस्टमों के पास वर्षों का युद्ध अनुभव है. यूरोपीय सिस्टमों के पास नाटो का भरोसा है. दक्षिण कोरिया तेजी से विश्वसनीय विकल्प बन रहा है. चीन के पास कीमत का फायदा जरूर है, लेकिन युद्ध में सिद्ध प्रदर्शन और रणनीतिक भरोसे के मामले में उसे अभी लंबा रास्ता तय करना है।  ईरान ने भी बढ़ाए सवाल विश्लेषकों ने ईरान का उदाहरण भी दिया है. ईरान की एयर ड‍िफेंस में रूसी और कुछ चीनी मूल के उपकरण शामिल हैं. हालिया अमेरिकी और इजरायली हमलों के दौरान ये स‍िस्‍टम ध्‍वस्‍त हो गए. हालांकि किसी एक सिस्टम पर सवाल उठाना ठीक नहीं, लेकिन माना गया क‍ि चीन के हथ‍ियार कामयाब नहीं हुए. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह दूसरा मौका था, जब चीन के हथ‍ियारों पर सवाल उठे।  यूरोप को पसंद क्‍यों नहीं पेरिस एयर शो और यूरोसैटरी से सबसे बड़ा संदेश यही निकला कि यूरोप अभी भी चीन के बजाय अमेरिका, यूरोप और दक्षिण कोरिया की ओर ज्यादा भरोसा जता रहा है.रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में एयर डिफेंस का बाजार और बड़ा होगा. लेकिन जीत उसी की होगी जो सिर्फ मिसाइल नहीं, बल्कि रडार, सेंसर, कमांड एंड कंट्रोल और एंटी-ड्रोन तकनीक को एकीकृत समाधान के रूप में पेश करेगा।  चीन के लिए चुनौती अब सिर्फ हथियार बनाना नहीं है, बल्कि दुनिया को यह भरोसा दिलाना है कि उसके सिस्टम वास्तविक युद्ध में भी उतने ही प्रभावी हैं जितने वे रक्षा प्रदर्शनियों में दिखाई देते हैं. पाकिस्तान के अनुभव और यूरोप की हिचकिचाहट ने इस चुनौती को और कठिन बना दिया है. इसलिए पेरिस में भले चीन ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम की पूरी दुकान सजा दी हो, लेकिन सबसे बड़े और सबसे भरोसेमंद ग्राहकों का विश्वास जीतना उसके लिए अभी भी सबसे कठिन लड़ाई बना हुआ है।   

1 जुलाई से बदल जाएंगे LPG के कई नियम, गैस कनेक्शन, KYC और सिलेंडर बुकिंग पर पड़ेगा असर

 नई दिल्‍ली इंडेन गैस, भारत पेट्रोलियम और भारत गैस के LPG कस्‍टमर्स को बड़ा झटका लगने वाला है, क्‍योंकि 1 जुलाई से नया नियम लागू हो रहा है. आपको बुकिंग मे दिक्‍कत, गैस नेक्‍शन कटना और अन्‍य परेशानियां उठानी पड़ सकती है. लेकिन यह सभी एलपीजी यूजर्स के लिए नहीं होगी।  केंद्र सरकार ने हाल ही में एलपीजी नियम में संशोधन आदेश लागू किया है. नए नियम के तहत, जिनके पास पहले से ही PNG कनेक्शन है, उनका HP, Inden या भारत गैस LPG कनेक्शन एक महीने के भीतर काट दिया जाएगा, जो लोग स्वेच्छा से अपना LPG कनेक्शन छोड़ देते हैं, उन्हें पूरी तरह से नुकसान नहीं होगा. उन्हें एक कूपन मिलेगा जिससे वे जरूरत पड़ने पर बाद में अपना एलपीजी कनेक्शन फिर से एक्टिव कर सकेंगे।  मार्च में ही सरकार ने निर्देश दिया था कि जिन क्षेत्रों में पाइपलाइन के जरिए गैस पहुंचाने का बुनियादी ढांचा मौजूद है, वहां LPG यूजर्स को तीन महीने के भीतर PNG सिस्‍टम में बदलना होगा, नहीं तो उनका एलपीजी कनेक्शन काट दिया जाएगा. यह समय सीमा जून के अंत तक समाप्त हो रही है।  अगर पीएनजी सिस्‍टम वाले किसी भी क्षेत्र में रहने वाले जिन लोगों ने अभी तक स्विच नहीं किया है, उन्हें जल्द से जल्द कार्रवाई करनी चाहिए. इसके लिए आप अपने नजदीकी पीएनजी गैस कनेक्‍शन वाली कंपनी से संपर्क कर सकते हैं।  30 जून E-KYC जमा करने की लास्‍ट डेट इस नियम के अलावा, सभी एलपीजी कनेक्‍शन होल्‍डर्स के लिए ई-केवाईसी वेरिफाई करना भी जरूरी है, जिसकी लॉस्‍ट डेट 30 जून है. अगर आप इसे पूरा नहीं करते हैं, तो आपका कनेक्‍शन काटा जा सकता है. जिस कारण अगले सिलेंडर की बुकिंग करना मुश्किल हो जाएगा. जिन कस्‍टमर्स ने पहले ही अपना ई-केवाईसी पूरा कर लिया है, उन्‍हें आगे कुछ भी करने की आवश्‍यकता नहीं है।  कमर्शियल एलपीजी के पाबंदियों में छूट  सरकार ने पश्चिम एशिया में तनाव कम होने का हवाला देते हुए कमर्शियल एलपीजी सप्‍लाई पर लगे प्रतिबंधों को पहले ही हटा दिया है. इस कदम से अब घरेलू एलपीजी नियमों में भी इसी तरह की राहत मिलने की उम्मीदें बढ़ रही हैं।  दोबारा बुकिंग के नियम  फिलहाल, ग्राहकों को दोबारा बुकिंग कराने से पहले शहरों में 25 दिन और गांवों में 45 दिन का इंतजार करना पड़ता है. यह प्रतिबंध सरकार ने युद्ध के दौरान जमाखोरी रोकने और आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लागू किया था.  होर्मुज में परिचालन सामान्य होने के साथ ही, यह उम्मीद बढ़ रही है कि 1 जुलाई से यह अंतराल कम हो सकता है. हालांकि अभी तक इसकी कोई औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है।