बेंगलुरु फाइटर जेट ‘तेजस’ और ‘सुखोई-30 MKI’ से आसमान में अपनी ताकत का लोहा मनवाने वाली हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) अब एक नई उड़ान भरने को तैयार है. एचएएल ने रूस की कंपनी यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (UAC) के साथ बड़ी डील की है. अब भारत रूस के साथ मिलकर सुखोई की डिजाइन वाला ‘सुपरजेट-100’ बनाएगा. वही सुखोई, जिसका नाम सुनते ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते हैं, लेकिन सुपरजेट-100 से लोग सफर कर सकेंगे. यह डील भारत में हवाई सफर की तस्वीर बदलने वाली है. क्योंकि इस विमान को छोटे रनवे का ‘बाहुबली’ कहा जाता है. यह वहां भी उतर सकता है, जहां बड़े विदेशी विमानों के पहिए थम जाते हैं. इस मेगा डील पर UAC के सीईओ वादिम बादेहा और HAL के चेयरमैन डॉ. डी.के. सुनील ने हस्ताक्षर कर दिए हैं. इस समझौते के तहत एचएएल को भारत में सुपरजेट-100 बनाने का लाइसेंस मिलेगा. सिर्फ निर्माण ही नहीं, बल्कि बिक्री, मरम्मत और रखरखाव का जिम्मा भी एचएएल के पास होगा. रूसी कंपनी तकनीकी मदद और डिजाइन सर्विसेस देगी, ताकि एचएएल की फैक्ट्रियों में इस वर्ल्ड-क्लास विमान का उत्पादन हो सके. क्यों कहलाता है छोटे रनवे का ‘बाहुबली’? मुश्किल जगहों पर लैंडिंग: भारत में शिमला, कुल्लू या पूर्वोत्तर के कई हवाई अड्डे ऐसे हैं जहां रनवे छोटे हैं और बड़े बोइंग या एयरबस वहां नहीं उतर सकते. सुपरजेट-100 को खासतौर पर छोटे रनवे से उड़ान भरने और उतरने के लिए डिजाइन किया गया है. यह पहाड़ी और कठिन इलाकों का असली ‘बाहुबली’ है. फाइटर जेट वाला डीएनए: इसे उसी ‘सुखोई’ कंपनी ने डिजाइन किया है, जो दुनिया के बेहतरीन लड़ाकू विमान बनाती है. इसलिए इसकी बॉडी बेहद मजबूत और एयरोडायनामिक्स फाइटर जेट्स जैसी है. यानी हवा चीरकर आगे बढ़ने की क्षमता बिल्कुल फाइटर जेट की तरह होगी. खराब मौसम का साथी: इसमें आधुनिक एवियोनिक्स लगे हैं जो इसे घने कोहरे और खराब विजिबिलिटी में भी सुरक्षित लैंडिंग करने में मदद करते हैं. साफ है कि इसकी वजह से जो अक्सर हादसे हो जाते हैं, उनमें कमी आएगी. 100 सीटों वाले जेट की खूबियां भारत में अभी 70 सीटर वाले टर्बोप्रॉप यानी पंखे वाले विमान और 180 सीटर वाले बड़े जेट विमान चलते हैं. इनके बीच 100 सीटों वाले जेट की भारी कमी है. यह विमान अधिकतम 0.81 मैक यानी लगभग 870 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकता है. यह स्पीड इसे अपने श्रेणी के अन्य विमानों से काफी तेज बनाती है. यानी दिल्ली से पटना या मुंबई से इंदौर का सफर अब और कम समय में पूरा होगा. भारत में बनने के कारण इसकी लागत कम होगी, जिसका सीधा फायदा यात्रियों को सस्ती टिकट के रूप में मिल सकता है. इकोनॉमी क्लास में ‘लग्जरी’ का अहसास अक्सर छोटे विमानों में यात्रियों को जगह की कमी महसूस होती है, लेकिन सुपरजेट-100 में ऐसा नहीं है. इसका केबिन अपनी श्रेणी के अन्य विमानों से ज्यादा चौड़ा है. सीटें 18.3 इंच चौड़ी हैं, जो यात्रियों को खुला और आरामदायक सफर देती हैं. बड़े ओवरहेड डिब्बे हैं, ताकि भारतीय यात्री अपना सामान आसानी से रख सकें. विमान पर लिखा होगा मेड इन इंडिया यह समझौता सिर्फ एक विमान बनाने का नहीं, बल्कि तकनीक हासिल करने का है. अब तक हम पैसेंजर विमानों के लिए पूरी तरह अमेरिका की बोइंग या फ्रांस की एयरबस पर निर्भर थे. एचएएल की यह पहल भारत को सिविल एविएशन मैन्युफैक्चरिंग के ग्लोबल मैप पर खड़ा कर देगी. यानी जल्द ही वह दिन आएगा जब आप टिकट बुक करेंगे और विमान के दरवाजे पर लिखा होगा- मेड इन इंडिया. किराया सस्ता होगा या महंगा? लेग स्पेस कितना होगा? जानिए हर सवाल का जवाब सुपरजेट-100: आखिर क्यों खास है यह विमान? सुखोई सुपरजेट-100 दुनिया के सबसे आधुनिक रीजनल जेट्स में से एक है, जिसे रूस की मशहूर कंपनी ‘सुखोई’ ने डिजाइन किया है. इसे बनाने वाले इंजीनियर वही हैं जिन्होंने दुनिया के बेहतरीन फाइटर जेट्स डिजाइन किए हैं. लेकिन, सुपरजेट-100 एक सिविलियन विमान है. इस विमान की रेंज कितनी होगी? सुपरजेट-100 के दो वर्जन हैं… बेसिक और लॉन्ग रेंज. बेसिक वर्जन करीब 3,000 किलोमीटर और लॉन्ग रेंज वर्जन 4,500 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है. इसका मतलब है कि यह विमान दिल्ली से चेन्नई, मुंबई से कोलकाता या बेंगलुरु से गुवाहाटी तक बिना रुके उड़ान भर सकता है. कितनी ऊंचाई तक उड़ने में माहिर यह 40,000 फीट की ऊंचाई पर क्रूज कर सकता है, जिससे यह खराब मौसम और टर्बुलेंस के ऊपर से निकल सकता है, जो यात्रियों को एक आरामदायक सफर देता है. पैसेंजर्स के लिए इसमें नया क्या होगा? अक्सर रीजनल जेट्स यानी छोटे विमानों में यात्रियों को तंग जगह की शिकायत होती है, लेकिन सुपरजेट-100 को यात्रियों के आराम को ध्यान में रखकर बनाया गया है. इसकी केबिन की चौड़ाई 3.2 मीटर है, जो कि एम्ब्रेयर या बॉम्बार्डियर जैसे विमानों से ज्यादा है. सुपरजेट-100 में सीटिंग अरेंजमेंट कैसा है? इसमें आमतौर पर 2+3 की सीटिंग होती है. यानी एक तरफ दो सीटें और दूसरी तरफ तीन. इसका फायदा यह है कि बीच वाली सीट कम होती हैं. इसकी सीटें 18.3 इंच चौड़ी हैं, जो बड़े विमानों की इकोनॉमी क्लास के बराबर या उससे ज्यादा हैं. गलियारा इतना चौड़ा है कि केबिन क्रू और यात्री आसानी से आ-जा सकते हैं. एक साथ कितने लोग बैठ सकते हैं? हमारे पास 70 सीटर टर्बोप्रॉप विमान हैं और सीधे 180 सीटर जेट हैं. इन दोनों के बीच 100 सीटों वाले जेट की भारी कमी है. लेकिन सुपरजेट-100 में 87 से 98 यात्रियों के बैठने की जगह है. एयरलाइन कंपनियों के लिए कैसे फायदे का सौदा? कई रूट्स पर 180 सीटर विमान उड़ाना एयरलाइंस के लिए घाटे का सौदा होता है क्योंकि सीटें नहीं भरतीं. वहीं, टर्बोप्रॉप विमान धीमे होते हैं. सुपरजेट-100, 100 यात्रियों को लेकर जेट की स्पीड से उड़ सकता है. यह एयरलाइंस के मुनाफे को बढ़ा सकता है. HAL और मेक इन इंडिया के लिए इसके क्या मायने? यह समझौता सिर्फ एक विमान खरीदने का नहीं, बल्कि तकनीक हासिल करने का है. UAC, HAL को डिजाइन और निर्माण की तकनीक देगा. इससे भारत में सिविल एविशन मैन्युफैक्चरिंग का इकोसिस्टम तैयार होगा. … Read more