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नई सरकार से पहले बड़ा संकेत! क्या यूनुस बनेंगे बांग्लादेश के नए राष्ट्रपति?

ढाका बांग्लादेश में नई सरकार की गठन की तैयारियां चल रही हैं। इसी बीच कयास लागे जा रहे हैं कि अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार रहे नोबेल विजेता मोहम्द यूनुस को भी कोई संवैधानिक पद दिया जा सकता है। हालांकि इसपर मुहर नहीं लगी है।  अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद सेना के समर्थन से नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को बांग्लादेश का शासन सौंप दिया गया था। वह अंतरिम सरकार के सलाहकार के तौर पर इतने दिनों तक कामकाज देखते रहे। वहीं अब आम चुनाव के बाद बीएनपी चीफ तारिक अहमद 17 फरवरी को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। इस बीच मोहम्मद यूनुस को लेकर भी कई चर्चाएं गर्म हैं। जानकारों का कहना है कि आगे भी उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। क्या राष्ट्रपति बनेंगे मोहम्मद यूनुस सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि मोहम्मद यूनुस को कोई बड़ा संवैधानिक पद दिया जा सकता है। रहमान के करीबी हुमायूं कबीर ने कहा, अब तक किसी की भूमिका तय नहीं की गई है। मोहम्मद यूनुस को लेकर भी आगे का कोई फैसला नहीं हुआ है। इतना जरूर हैकि उन्होंने देश को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा साथ खड़े रहने का आश्वासन दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक हुमायूंकबीर ने कहा, अभी किसी के डिपार्टमेंट को लेकर भी चर्चा नहीं हुई है। तारिक रहमान की प्राथमिकता एक समावेशी सरकार बनाना है। इस चुनी हुई सरकार में लोगों की प्रतिभा का पूरा इस्तेमाल किया जाएगा.। सांसदों के अनुभव, उनकी विशेषज्ञता के आधार पर उन्हें जिम्मेदारी दी जाएगी। बता दें कि फिलहाल मोहम्मद शहाबुद्दीन बांग्लादेश के राष्ट्रपति हैं। लेखक डेविड बर्जमैन का मानना है कि मोहम्मद यूनुस को राष्ट्रपति बनाने से उनके अनुभवा का लाभ बांग्लादेश को मिल सकता है। उन्होंने कहा, मोहम्मद यूनुस की कई मामलों में आलोचना होती है, इसके बावजूद अंतरारष्ट्रीय स्तर पर उनकी मान्यता है। अगर प्रधानमंत्री को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सोच रखने वाले व्यक्ति का साथ मिलता है तो यह सोने पर सुहागा होगा। उन्हें विदेश नीति को लेकर मोहम्मद यूनुस से काफी मदद मिल सकती है। बर्जमैन ने दावा किया कि इस मामले को लेकर तारिक रहमान और मोहम्मद यूनुस के बीच वार्ता हो चुकी है। हालांकि दोनों की टीमों की ओर से ऐसे कयासों को खारिज किया गया है। जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय नीतियों को लेकर मोहम्मद यूनुस तारिक रहमान के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। वहीं यूनुस के प्रेस सेक्रेटरी ने कहा कि उनकी राजनीति में ज्यादा कोई रुचि नही है और ना ही वह कोई संवैधानिक पद चाहते हैं। वह फिर से वापस जाना चाहते हैं और अपना महत्वपूर्ण समय खुद को देना चाहते हैं। उन्होंने बहुत सारे लक्ष्य हासिल किए हैं और अब सत्ता का हस्तांतरण कर रहे हैं। अपने बारे में मोहम्मद यूनुस ने कुछ नहीं बताया है।  

इश्क का कड़वा अंजाम: दवा से जुड़ी मोहब्बत, दारू बनी मौत की वजह

हल्द्वानी उत्तराखंड के हल्द्वानी में वेलेंटाइन वीक के दौरान एक प्रेमी जोड़े की हत्या ने पूरे शहर को दहला दिया है। अल्मोड़ा के शुभम और नैनीताल की रहने वाली लक्ष्मी की प्रेम कहानी एक मेडिकल स्टोर से शुरू हुई, लेकिन खत्म हुई गल्ला मंडी में शराब पार्टी और विवाद में हुई नृशंस हत्या के साथ। दोनों की पत्थरों से कूचकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस के मुताबिक, शवों की शिनाख्त के बाद इलाके के सीसीटीवी फुटेज, मौके से मिले सबूतों व अन्य माध्यमों के जरिए पुलिस आरोपियों तक पहुंची और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। आरोपियों की पहचान हल्द्वानी के रहने वाले गौरव नेगी उर्फ अक्कू ठाकुर (25), सौरभ भट्ट उर्फ भटिया (20), दीपू शर्मा उर्फ ध्रुव (20) और दीपेश लटवाल (25) के रूप में हुई है। आरोपियों ने पूछताछ में बताया कि वे शुभम व लक्ष्मी के साथ बैठकर शराब पी रहे थे और इसी दौरान उन्होंने युवती से छेड़छाड़ शुरू कर दी, जिसका शुभम ने विरोध किया। अधिकारी ने बताया कि आपसी झगड़े में उन्होंने शुभम की हत्या कर दी और बाद मे सबूत मिटाने के लिए उन्होंने लक्ष्मी को भी मार दिया। मेडिकल स्टोर पर पहली मुलाकात दोनों की मुलाकात किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नहीं, बल्कि उस मेडिकल स्टोर पर हुई थी, जहां लक्ष्मी काम करती थी। मुलाकात के बाद दोनों एक-दूसरे के करीब आए और सालभर के प्रेम को शादी में बदलने की तैयारी कर रहे थे। हालांकि नियति ने कुछ और ही लिखा था। शुभम और अक्कू का पुराना संबंध पुलिस ने बताया कि शुभम कुछ साल पहले नशे की गिरफ्त में था। जब वह अल्मोड़ा से हल्द्वानी आया, तब उसकी मुलाकात अक्कू से हुई। अक्कू के माध्यम से ही शुभम का संपर्क दीपू शर्मा, दीपेश लटवाल और सौरभ भट्ट से हुआ। पिछले कुछ समय से ये लोग लगातार गल्ला मंडी में मिलकर पार्टियां कर रहे थे और अन्य प्रकार के नशे भी करते थे। बुधवार रात भी यही कारण था कि वे वहां एकत्र हुए। शुभम और लक्ष्मी का साथ शुभम और लक्ष्मी पिछले डेढ़ महीने से एक साथ रह रहे थे। पुलिस के मुताबिक लक्ष्मी पहले मुखानी स्थित एक मकान में अपनी दोस्त के साथ रहती थी। इसके बाद उसने शुभम के डहरिया स्थित घर में रहना शुरू किया। हालांकि पुलिस अब भी यह जांच कर रही है कि लक्ष्मी कब-कब कहां रही और किसके साथ थी। जांच में पता चला कि हत्या शराब पार्टी के दौरान हुए विवाद के चलते हुई। यह मामला दर्शाता है कि छोटी सी अनबन और नशे की स्थिति में कितनी तेजी से स्थिति हिंसक रूप ले सकती है। पुलिस ने चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज कर दिए हैं।

ईरान का अमेरिका को बड़ा ऑफर: न्यूक्लियर समझौते पर हामी, अब गेंद ट्रंप के पाले में

ईरान ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर समझौते का रास्ता खोल दिया है। तेहरान का हना है कि वह अमेरिका के साथ समझौते की दिशा में आगे बढ़ने के लिए तैयार है। हालांकि इसके लिए उसने शर्त भी रखा है। उसका कहना है कि समझौता केवल तभी जब वाशिंगटन प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार हो। बीबीसी से बात करते हुए ईरान के उप विदेश मंत्री माजिद तख्त-रवांची ने कहा कि समझौता करने की इच्छा साबित करने की जिम्मेदारी अमेरिका पर है। उन्होंने कहा कि अगर वे ईमानदार हैं, तो मुझे यकीन है कि हम समझौते की ओर बढ़ेंगे। उन्होंने आगे कहा कि अगर प्रतिबंधों में राहत का प्रस्ताव रखा जाता है, तो तेहरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर सीमाएं लगाने पर चर्चा करने को तैयार है। यूरेनियम संवर्धन विवादास्पद मुद्दा दरअसल, यूरेनियम संवर्धन एक प्रमुख विवादास्पद मुद्दा बना हुआ है। वाशिंगटन ने पहले ईरान से संवर्धन पूरी तरह बंद करने की मांग की थी। इस पर तख्त-रवांची ने कहा कि शून्य संवर्धन अब कोई मुद्दा नहीं है और ईरान के नजरिए से यह अब चर्चा का विषय नहीं है। यह ट्रंप के हालिया बयान के विपरीत है, जिसमें उन्होंने कहा था कि हम किसी भी प्रकार का संवर्धन नहीं चाहते। दूसरी ओर ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत अपने अधिकारों के उल्लंघन के रूप में पूर्ण रोक को देखता है। तेहरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसका बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम वार्ता का हिस्सा नहीं होगा, भले ही इजरायल की ओर से दबाव हो और रुबियो सहित अमेरिकी अधिकारियों द्वारा समझौते के दायरे को व्यापक बनाने की मांग की जा रही हो। तख्त-रवांची ने कहा कि जब इजरायलियों और अमेरिकियों ने हम पर हमला किया, तो हमारी मिसाइलों ने हमारी रक्षा की, तो हम अपनी रक्षात्मक क्षमताओं से खुद को वंचित कैसे कर सकते हैं? ओमान दौर की वार्ता के बाद बातचीत फिर शुरू अमेरिका और ईरान ने फरवरी की शुरुआत में ओमान में अप्रत्यक्ष वार्ता की थी। तख्त-रवांची ने पुष्टि की कि वार्ता का दूसरा दौर मंगलवार को जिनेवा में होगा। उन्होंने कहा कि शुरुआती बातचीत कमोबेश सकारात्मक दिशा में थी, लेकिन अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। ट्रंप ने भी ओमान वार्ता को सकारात्मक बताया है। तेहरान ने अपने 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम भंडार को कम करने के प्रस्ताव को लचीलेपन के प्रमाण के रूप में पेश किया है। इस स्तर पर संवर्धित यूरेनियम हथियार-ग्रेड के करीब है, जिससे अंतरराष्ट्रीय संदेह बढ़ा है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि ईरान इसे लगातार नकारता रहा है। तख्त-रवांची ने कहा कि अगर अमेरिका प्रतिबंधों पर चर्चा करने को तैयार है, तो हम अपने कार्यक्रम से जुड़े इस और अन्य मुद्दों पर चर्चा करने को तैयार हैं। उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि ईरान सभी प्रतिबंध हटाने पर जोर देगा या आंशिक राहत स्वीकार करेगा। जब उनसे पूछा गया कि क्या ईरान 2015 के समझौते की तरह 400 किलोग्राम से अधिक उच्च संवर्धित यूरेनियम का भंडार बाहर भेजेगा, तो उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान क्या होगा, यह कहना अभी बहुत जल्दबाजी होगी। ईरान से समझौता करना बहुत मुश्किल यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी अधिकारी लगातार दावा कर रहे हैं कि ईरान लंबे समय से चल रही वार्ता में प्रगति में बाधा डाल रहा है। शनिवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समझौते को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन ईरान के साथ समझौता करना 'बहुत मुश्किल' है। ट्रंप कई बार दे चुके हैं हमले की धमकी पहली बातचीत के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को चेतावनी दी थी कि अगर कोई समझौता नहीं हुआ तो परिणाम 'बेहद गंभीर और दर्दनाक' होंगे। ट्रंप ने कई बार धमकी दी है कि अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करने पर राजी नहीं हुआ तो बल प्रयोग किया जाएगा। ईरान ने भी जवाबी हमले की चेतावनी दी है। ट्रंप ने हाल में ईरान में प्रदर्शनों पर की गई कड़ी कार्रवाई को लेकर भी धमकी दी थी।  

लंबे समय तक सहमति से संबंध के बाद शादी से मुकरना अपराध नहीं: हाई कोर्ट

उत्तराखंड उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि सहमति से लंबे समय तक संबंध बनाने के बाद शादी का वादा तोड़ना रेप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब दो व्यस्कों के बीच सहमति से संबंध नते हैं तो रेप केस के लिए यह साबित करना जरूरी है कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा है कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से लंबे समय तक संबंध में हों तो शादी के वादे को पूरा न करना आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वादा शुरू से ही झूठा था। इस मामले में मसूरी की एक महिला ने सूरज बोरा नामक आदमी पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया। बोरा ने 45 दिनों के भीतर शादी का आश्वासन देने के बाद बाद में इनकार कर दिया। जांच के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दायर किया जिसे बोरा ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि दोनों पक्ष वयस्क थे और लंबे समय से आपसी सहमति से संबंध बनाए हुए थे। एफआईआर में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह पता चले कि रिश्ते की शुरुआत में आरोपी का इरादा कपटपूर्ण था। यह केवल एक असफल रिश्ता था और आपराधिक कार्यवाही शुरू करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। दूसरी ओर, राज्य सरकार और पीड़िता का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता की सहमति पूरी तरह से शादी के आश्वासन पर आधारित थी, जिसे आरोपी बाद में पूरा करने में विफल रहा। उन्होंने आगे कहा कि क्या वादा शुरू से ही झूठा था, यह केवल मुकदमे के दौरान सबूतों के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है। इसलिए, कार्यवाही को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस आशीष नैथानी ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी वयस्क महिला द्वारा दी गई सहमति मात्र इसलिए अमान्य नहीं हो जाती क्योंकि संबंध शादी में नहीं बदला। इसे धारा 376 के तहत अपराध मानने के लिए यह सिद्ध करना आवश्यक है कि शादी का वादा केवल संबंध बनाने के लए सहमति पाने का एक साधन था और आरोपी का शादी करने का कोई इरादा नहीं था। कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्ष लंबे समय से रिश्ते में थे और उनके बीच बार-बार शारीरिक संबंध बने थे, जिससे प्रारंभिक धोखाधड़ी के बजाय आपसी सहमति का संकेत मिलता है। हाई कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि ठोस आधार के अभाव में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना आरोपी का उत्पीड़न होगा। हाई कोर्ट ने देहरादून के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक मामला और सूरज बोरा के खिलाफ 22 जुलाई 2023 की चार्जशीट को पूरी तरह रद्द कर दिया।  

आस्था बनाम सत्ता: चीन में चर्चों पर कड़ा नियंत्रण, पादरियों के लिए अनिवार्य ‘राजनीतिक वफादारी’ प्रशिक्षण

बीजिंग चीन में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा लागू किए गए नए वैचारिक और राजनीतिक कार्य नियम अब हर क्षेत्र में सख्ती से लागू किए जा रहे हैं। इन नियमों का मकसद पूरे समाज को शी जिनपिंग की विचारधारा के अनुरूप ढालना है। इस प्रक्रिया में सरकारी नियंत्रण वाला थ्री-सेल्फ पैट्रियॉटिक मूवमेंट (थ्री-सेल्फ चर्च) सबसे आगे नजर आ रहा है। जनवरी में दिए एक इंटरव्यू में थ्री-सेल्फ नेतृत्व ने इन नए नियमों को “मील का पत्थर” और “मार्गदर्शक सिद्धांत” बताया।  चर्च बैठकों में अब ‘शी जिनपिंग थॉट’ को पहला एजेंडा बनाया गया है। सेमिनरी छात्रों को केवल धर्मशास्त्र नहीं, बल्कि “राजनीतिक चेतना” भी पढ़ाई जा रही है ताकि वे पार्टी की दिशा के अनुरूप सोचें। चर्च परिसरों में राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, संविधान, समाजवादी मूल्यों और पारंपरिक चीनी कला को अनिवार्य रूप से प्रदर्शित किया जा रहा है। फुजियान जैसे इलाकों की धार्मिक सेमिनरियों में अब अलग से वैचारिक-राजनीतिक कक्षाएं चलाई जा रही हैं और राजनीतिक पाठ्यपुस्तकें तैयार की जा रही हैं। कई चर्चों को देशभक्ति शिक्षा केंद्रों में बदला जा रहा है, जहां ‘रेड थीम’ प्रदर्शनी कक्ष, सुलेख, हस्तशिल्प और कन्फ्यूशियस ग्रंथों पर व्याख्यान हो रहे हैं।

आस्था का महासंगम: महाशिवरात्रि पर पशुपतिनाथ मंदिर में उमड़ा जनसैलाब, नेपाल-भारत में शिवभक्ति की गूंज

काठमांडू नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में महाशिवरात्रि के अवसर पर हजारों हिंदू श्रद्धालु श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ पहुंचे। फल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पर्व शिवभक्ति के सबसे पावन दिनों में गिना जाता है। शिव पुराण के अनुसार, यह वही रात्रि है जब शिव तत्व का प्रकटीकरण हुआ। इसे कालरात्रि, मोहरात्रि, सुखरात्रि और शिवरात्रि इन चार महत्त्वपूर्ण रात्रियों में शामिल किया गया है। मान्यता है कि यह दिन आध्यात्मिक जागरण देता है और दुख-संताप से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। श्रद्धालु उत्सव कटुवाल ने बताया कि गौशाला से पशुपति तक दो–तीन किलोमीटर लंबी कतारें लगी थीं और लोग घंटों धैर्यपूर्वक दर्शन के लिए खड़े रहे। सुबह से ही नदी-तालाबों और मंदिरों में स्नान, पूजा, ध्यान और मंत्रोच्चार का सिलसिला जारी रहा।भक्त शांति भक्त ने कहा कि शिवरात्रि पर पूरा दिन पूजा, ध्यान और जप में बिताया जाता है। वहीं, अनीता सिंह ने बताया कि मंदिर में अनुष्ठान के बाद वे घर जाकर पूजा और उपवास रखेंगी।महाशिवरात्रि, “शिव की रात्रि”, नेपाल और भारत सहित कई देशों में व्यापक श्रद्धा से मनाई जाती है। स्कंद पुराण में भी इस पर्व के महत्व का उल्लेख है। मान्यता है कि इस अवधि में उत्तरी गोलार्ध में तारों की स्थिति आध्यात्मिक ऊर्जा को उन्नत करती है और शिव तत्व सर्वाधिक सक्रिय रहता है।

जेलेंस्की का तंज- ‘हंगरी के प्रधानमंत्री केवल पेट बढ़ा रहे हैं’

वाशिंगटन. रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को लगभग तीन साल पूरे हो गए हैं। जेलेंस्की लगातार यूरोपीय देशों को रूस के प्रति आगाह करते हुए अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए चेतावनी देते नजर आ रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने चेतावनी नजर अंदाज करने के लिए हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन पर तीखा हमला बोला है। जेलेंस्की ने कहा कि विक्टर क्षेत्रीय सुरक्षा पर ध्यान देने की बजाय घरेलू राजनीति को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं। 'वह केवल अपना पेट बढ़ा रहे हैं, सेना नहीं।' जेलेंस्की का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब हंगरी की तरफ से यूक्रेन की मदद करने की अनिच्छा व्यक्त की गई है। तीन साल से जारी यूक्रेन और रूस के युद्ध ने यूरोपीय संघ के देशों के भीतर भी कलह को बढ़ा दिया है। ज्यादातर देश रूस के खिलाफ यूक्रेन को राहत पैकेज देने और मॉस्को पर प्रतिबंध का समर्थन करते हैं, लेकिन हंगरी बार-बार इन उपायों को किसी न किसी वजह से या बातचीत के बहाने से धीमा करता हुआ नजर आता है। हंगरी लगातार इस युद्ध को आगे न बढ़ाने के लिए भी चेतावनी देता हुआ नजर आता है। दरअसल, विक्टर ओर्बन को रूसी राष्ट्रपति पुतिन का करीबी माना जाता है, जिसकी वजह से उन्हें कीव समेत कई यूरोपीय देशों से आलोचना का सामना करना पड़ता है। यूक्रेन युद्ध में किसके साथ हंगरी? हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन ने शुरुआत से ही यूरोपीय देशों द्वारा यूक्रेन को दिए जा रहे अतिरिक्त फंडिंग का विरोध किया है। इतना ही नहीं उन्होंने सीधे हथियारों की आपूर्ति का भी विरोध किया है। ओर्बान ने हंगरी के हथियारों को यूक्रेन को देने से इनकार करते हुए कहा था कि बुडापेस्ट को अपनी आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को ज्यादा प्राथमिकता देनी है। इसके अलावा उन्होंने पश्चिमी यूक्रेन में रहने वाले हंगेरियाई मूल के लोगों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को लेकर भी यूक्रेनी सरकार पर सवाल उठाया था। हालांकि, यूक्रेन और हंगरी के बीच यह खींचतान पिछले काफी समय से चली आ रही है। हालिया विवाद उस समय सामने आया, जब यूरोपीय संघ के देशों की तरफ से यूक्रेन के लिए एक दीर्घकालिक सुरक्षा गारंटी और रूस के ऊपर आर्थिक प्रतिबंधों पर विचार कर रहे हैं। हंगरी ने इन प्रस्तावों का खुले तौर पर विरोध किया है। गौरलतब है कि रूस और यूक्रेन युद्ध पिछले तीन साल से जारी है। अमेरिका समेत तमाम देश इसे खत्म करवाने के लिए कोशिश कर चुके हैं, लेकिन यह बदस्तूर जारी है। दोनों देशों की तरफ से कई लाख सैनिक इस युद्ध में अपनी जान गंवा चुके हैं। युद्ध के पहले यूक्रेन जिस नाटो की सदस्यता लेने की जिद किए बैठा था, अब वह भी उससे दूर जा चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा साफ कह दिया गया है कि यूक्रेन को नाटो की सदस्यता नहीं मिलेगी। अभी रूस और यूक्रेन के बीच में विवाद जमीन को लेकर फंसा हुआ है। रूस युद्ध में कब्जाई जमीन को छोड़ने के लिए राजी नहीं है, ऐसे में युद्ध लगातार जारी है।

ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार का एपस्टीन फाइलों में भी जिक्र

वाशिंगटन. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनका नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर दिखाया गया प्रेम दुनिया में किसी से छिपा नहीं है। ट्रंप ने हर तरीके से प्रयास करके आखिरकार वेनेजुएला की मचाडो से नोबेल शांति पुरस्कार ले ही लिया। इन सब के बीच अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी की जा रही एपस्टीन फाइल्स में भी डोनाल्ड ट्रंप के नोबेल पुरस्कार के प्रति प्रेम का जिक्र किया गया है। यहां पर एक ईमेल में एपस्टीन ट्रंप के सहयोगी को लिखता है कि डोनाल्ड को अगर इस बात का पता चलेगा कि नोबेल समिति का चेयरमैन यहां रुका हुआ है तो उसका सिर फट जाएगा। अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी की गई बदनाम फाइनेंशर जेफ्री एपस्टीन की फाइलों में सामने आया है कि उसने नोबेल शांति पुरस्कार समिति के चैयरमेन रहे थॉरबोर्न यागलैंड के साथ अपने संबंधों के जरिए बिल गेट्स और स्टीव बैनन जैसे कई प्रभावशाली लोगों के साथ दोस्ती की थी। गौरतलब है कि यागलैंड 2009 से लेकर 2015 तक नोबेल समिति के प्रमुख रहे थे। फाइल्स से मिली जानकारी के मुताबिक यागलैंड से एपस्टीन की मुलाकात करवाने वाले नॉर्वेजियन राजनयिक थे, जो कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच ओसलो अकॉर्ड साइन करवाने के लिए जाने जाते हैं। यॉगलैंड का कई बार जिक्र यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी फाइलों में यागलैंड का नाम कई हजार बार सामने आता है। हालांकि अभी तक जितनी भी फाइलें सामने आई हैं, उसमें पुरस्कार के लिए किसी के नाम पर लॉबिंग की बात सामने नहीं आई है, लेकिन इतना साफ है कि एपस्टीन ने यागलैंड से अपनी दोस्ती के चलते कई बड़े नामों से अपनी दोस्ती मजबूत की। रिपोर्ट्स के मुताबिक एपस्टीन ने एक मेल में इस बात की जानकारी दी है कि 2010 में उसने यागलैंड को न्यूयॉर्क और पेरिस स्थिति अपनी संपत्तियों में ठहरने की मदद की थी। डोनाल्ड ट्रंप के करीबी को किया मैसेज यागलैंड का जिक्र करते हुए एपस्टीन ने 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगी स्टीव बैनन को भी एक मेल किया था, जिसमें उसने ट्रंप के शांति पुरस्कार के प्रति प्रेम का जिक्र किया था। एक मेल में एपस्टीन ने लिखा, "डोनाल्ड का सिर फट जाएगा अगर उसे पता चले कि तुम अब उस व्यक्ति के दोस्त हो जो सोमवार को नोबेल शांति पुरस्कार का फैसला करेगा।” कई लोगों को नोबेल समिति के अध्यक्ष के नाम पर फंसाने की कोशिश एपस्टीन ने यागलैंड के नाम पर कई लोगों के साथ दोस्ती स्थापित करने की कोशिश की थी। एपस्टीन ने यागलैंड का नाम लेकर वाइट हाउस की पूर्व कानूनी सलाहकार कैथी रूमलर को भी एक मेल भेजा था, जिसमें उसने लिखा, "नोबेल शांति पुरस्कार के प्रमुख मिलने के लिए आ रहे हैं, क्या आप जुड़ना चाहेंगी?" इसके अलावा एपस्टीन ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी लैरी समर्स को भी मेल किया था, जिसमें उसने लिखा, “नोबेल शांति पुरस्कार के प्रमुख मेरे यहां ठहरे हुए हैं, अगर आपकी रुचि हो।”2014 में एपस्टीन ने बिल गेट्स को लिखे एक ईमेल में बताया कि यागलैंड को काउंसिल ऑफ यूरोप के प्रमुख के रूप में दोबारा चुना गया है। इसके जवाब में गेट्स ने लिखा, “मेरा ख्याल है कि उनकी शांति पुरस्कार समिति की भूमिका भी अब अनिश्चित होगी?” गौरतलब है कि यागलैंड के नोबेल पुरस्कार समिति के अध्यक्ष के तौर पर रहते 2009 में बराक ओबामा और 2012 में यूरोपीय संघ को नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। एपस्टीन फाइ्ल्स में नाम आने के बाद यागलैंड को ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं। इसके बाद नार्वे की आर्थिक अपराध इकाई इन मामलों की जांच कर रही है।

मादुरो को पकड़ने के लिए अमेरिका ने AI का किया था इस्तेमाल

वाशिंगटन. अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के लिए एआई का इस्तेमाल किया था। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है। एंथ्रॉपिक पहला एआई मॉडल डेवलपर था जो गुप्त संचालन के लिए पेंटागन में इस्तेमाल किया गया। सेना द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल, एआई कंपनियों के लिए बड़ी साख बढ़ाने वाला माना जाता है। हालांकि एंथ्रॉपिक के दिशा-निर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि हिंसा को बढ़ावा देने, हथियार विकसित करने या निगरानी करने में इसका इस्तेमाल न किया जाए। इसके बावजूद इस ऑपरेशन में उपयोग किया गया। गौरतलब है कि मादुरो और उनकी पत्नी को कराकस से गिरफ्तार किया गया था। इस ऑपरेशन कई जगहों पर बमबारी के बाद अंजाम दिया गया। एंथ्रॉपिक के प्रवक्ता ने बताया कि ‘क्लॉड का कोई भी इस्तेमाल, चाहे वह निजी क्षेत्र में हो या सरकार द्वारा हो, हमारी नीतियों के अनुसार होना चाहिए। हमारी नीतियां स्पष्ट हैं कि क्लॉड का उपयोग कैसे किया जा सकता है। हम अपने साझेदारों के साथ मिलकर अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए काम करते हैं।’ क्लॉड को तैनात किया गया क्योंकि पेंटागन द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों की डेटा कंपनी पेलान्टिर टेक्नोलॉजीज का एंथ्रॉपिक के साथ साझेदारी है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक क्लॉड के उपयोग को लेकर एंथ्रॉपिक की चिंताओं के बाद अमेरिकी अधिकारी बड़ा फैसला ले सकते हैं। एंथ्रॉपिक के बयान के बाद अमेरिकी अधिकारी 200 मिलियन डॉलर तक के अनुबंध रद्द करने पर विचार कर रहे हैं। एंथ्रॉपिक के चीफ एग्जीक्यूटिव डारिओ अमोडेई ने कहाकि एआई के इस्तेमाल में नियम-निर्देशों का सख्ती से पालन होना चाहिए। ताकि एआई से किसी तरह का नुकसान न हो। एंथ्रॉपिक कंपनी के अधिकारियों द्वारा जारी बयानों ने पेंटागन के साथ कांट्रैक्ट की राह में बाधा खड़ी कर दी है। रक्षा सचिव पीट हेगसेठ ने जनवरी में कहा था कि पेंटागन उन एआई मॉडल्स के साथ कोलैबोरेट नहीं करेगा, जो युद्ध लड़ने की अनुमति नहीं देते। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने एंथ्रॉपिक की चर्चाओं का हवाला देते हुए यह बात कही थी। एंथ्रॉपिक ने पिछली गर्मियों में 200 मिलियन डॉलर की डील साइन की थी। बता दें कि कई एआई कंपनियां अमेरिकी सेना के लिए कस्टम टूल बना रही हैं। इनमें से कई अनक्लासीफाइड नेटवर्क्स पर उपलब्ध हैं। यह आमतौर पर सैन्य प्रशासन के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। एंथ्रोपिक एकमात्र ऐसी कंपनी है जो थर्ड पार्टी के जरिए क्लासीफाइड सेटिंग्स में उपलब्ध है। लेकिन सरकार अभी भी कंपनी की यूजर पाॉलिसी के तहत बंधी हुई है।

परिवार को बिना बताए इमरान खान को अस्पताल में किया शिफ्ट

इस्लामाबाद. पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सेहत को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने आरोप लगाया कि इमरान को जेल से गुप्त रूप से अस्पताल में भेजा जा रहा है। पार्टी का दावा है कि इस कदम से उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और उनकी जान को खतरा पैदा हो सकता है। इमरान खान की फैमिली को इस ट्रांसफर के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। पीटीआई ने मांग की है कि कोई भी मेडिकल जांच या इलाज उनके निजी डॉक्टरों की मौजूदगी में और कम से कम एक परिवार के सदस्य के साथ होना चाहिए। जेल नियमों के अनुसार भी परिवार और डॉक्टरों को पहले सूचित करना जरूरी है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इमरान खान 73 वर्ष के हैं। वह अगस्त 2023 से जेल में बंद हैं। उन्हें लाहौर में उनके घर से गिरफ्तार किया गया था और भ्रष्टाचार के आरोपों में अदियाला जेल में रखा गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेल में रहते हुए उनकी सेहत बिगड़ गई है, खासकर दाहिने आंख में लगभग 85 प्रतिशत विजन लॉस हो चुका है। परिवार और लीगल टीम का आरोप है कि जेल अथॉरिटीज ने उन्हें उचित मेडिकल केयर नहीं दिया, जिससे यह स्थिति बनी। जनवरी 2026 के अंत में उन्हें आंख की समस्या के लिए अस्पताल ले जाया गया था, जहां एक छोटी प्रक्रिया हुई, लेकिन फैमिली को पहले सूचित नहीं किया गया था। पीटीआई ने लगाए गंभीर आरोप पीटीआई ने बयान जारी कर गंभीर चिंता जताई है कि इमरान खान को बिना परिवार की जानकारी के अस्पताल शिफ्ट करने की योजना बनाई जा रही है। पार्टी ने कहा, 'ऐसा कदम मौलिक मानवाधिकारों और कानूनी प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।' उन्होंने इसे इमरान खान की सेहत और जान के साथ छेड़छाड़ करार दिया और इलाज में देरी को अमानवीय बताया। पार्टी ने तत्काल इलाज शुरू करने की मांग की है, बिना किसी समझौते के। पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने भी विजन लॉस की रिपोर्ट्स पर ध्यान देते हुए मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया है, ताकि उनकी आंखों की जांच हो सके। इमरान खान की सेहत को लेकर गरमाई राजनीति इस मुद्दे पर राजनीतिक विरोध बढ़ता जा रहा है। शुक्रवार को पाकिस्तान के विपक्षी गठबंधन ने संसद के पास धरना दिया और इमरान खान को तुरंत अल-शिफा अस्पताल में भर्ती करने की मांग की। प्रदर्शनकारी तब तक प्रदर्शन जारी रखने की बात कह रहे हैं। सरकार की ओर से जानकारी मंत्री ने कहा कि इमरान खान को स्पेशलाइज्ड आंखों के इलाज के लिए ले जाया जा रहा है और स्पेकुलेशन से बचने की अपील की है। हालांकि, परिवार और पीटीआई का कहना है कि बिना उनकी सहमति के कोई कदम नहीं उठाया जाए। यह घटनाक्रम पाकिस्तान की राजनीति में तनाव को और बढ़ा रहा है।