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रूस की पुतिन सरकार ने भारतीय छात्रों के लिए की बड़ी घोषणा, बिना परीक्षा मिलेगा विश्वविद्यालय में दाखिला

नई दिल्ली  भारतीय छात्रों के लिए रूस से एक बड़ी और सुखद खबर सामने आई है। रूसी सरकार ने शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए अपने प्रतिष्ठित सरकारी छात्रवृत्ति कार्यक्रम (Government Scholarship Program) की घोषणा कर दी है। इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब भारतीय छात्रों को रूस में उच्च शिक्षा पाने के लिए किसी भी प्रवेश परीक्षा से नहीं गुजरना होगा। चयन का आधार और पाठ्यक्रम यह छात्रवृत्ति स्नातक (UG), स्नातकोत्तर (PG), पीएचडी और उन्नत प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के लिए प्रदान की जा रही है। उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड और पोर्टफोलियो के आधार पर किया जाएगा। पोर्टफोलियो में शोध पत्र, अनुशंसा पत्र (LOR), और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के प्रमाणपत्रों को वरीयता दी जाएगी। इस कार्यक्रम के तहत मेडिसिन, इंजीनियरिंग, फार्मेसी और स्पेस स्टडीज जैसे महत्वपूर्ण विषयों की पढ़ाई की जा सकेगी। रूस ने भाषा की बाधा को दूर करने के लिए कई कोर्स अंग्रेजी माध्यम में उपलब्ध कराए हैं। जो छात्र रूसी भाषा सीखना चाहते हैं, उनके लिए मुख्य पाठ्यक्रम शुरू होने से पहले एक वर्षीय प्रारंभिक भाषा पाठ्यक्रम (Preparatory Language Course) का विकल्प भी रखा गया है। आवेदन प्रक्रिया और समय सीमा एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, छात्रवृत्ति की चयन प्रक्रिया दो चरणों में संपन्न होगी। पहले चरण में उम्मीदवारों के दस्तावेजों का सत्यापन और प्रारंभिक चयन किया जाएगा और यह प्रक्रिया 15 जनवरी तक चलेगी। दूसरे चरण में रूसी विज्ञान और उच्च शिक्षा मंत्रालय चयनित छात्रों को उनकी योग्यता के अनुसार विश्वविद्यालय आवंटित करेगा और वीजा संबंधी प्रक्रिया पूरी करेगा। भारतीय छात्र मॉस्को, सेंट पीटर्सबर्ग, कजान और व्लादिवोस्तोक जैसे प्रमुख शहरों के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। इच्छुक उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट education-in-russia.com पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। यह पहल न केवल छात्रों का भविष्य संवारेगी, बल्कि भारत-रूस के शैक्षिक संबंधों को भी नई मजबूती प्रदान करेगी।

सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश: नियम तोड़ने वालों को कोई राहत नहीं, अवैध निर्माण गिराने के आदेश में नहीं होगा हस्तक्षेप

 नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने हाल में कर्ज वसूली और अवैध निर्माण से जुड़े दो मामलों में सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि नियम तोड़ने वालों को कैसी भी राहत नहीं दी जा सकती. पहले मामले में कर्ज वसूली से जुड़े एक आरोपी को राहत देने से कोर्ट ने इनकार कर दिया. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत में ऐसे कई मामले आ रहे हैं, जहां बेईमान लोग आखिरी तारीख तक इंतजार करते हैं और फिर याचिका दायर कर राहत मांगने लगते हैं. CJI ने साफ शब्दों में कहा कि आपने पैसा हड़प लिया और फिर वापस नहीं किया. ऐसे मामलों में किसी तरह की राहत नहीं दी जा सकती. दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कैंटोनमेंट इलाके में बिना अनुमति बनाए गए निर्माण को गिराने के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया. इस मामले में भी CJI ने कड़ी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि लोग क्रेजी हो गए हैं, दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कोर्ट का तात्पर्य ये रहा कि लोग अब हद से ज्यादा चालाक हो गए हैं. अगर उन्हें एक कमरा कंपाउंड करने की अनुमति दी जाती है, तो वे सीढ़ी बना लेते हैं, फिर छत पर कब्जा कर लेते हैं. इसके बाद 30 साल तक अदालतों में अधिकारियों को घसीटते रहते हैं और कहते हैं कि यह कंपाउंडेबल है, वह कंपाउंडेबल है. CJI ने सीधे सवाल किया जब आपको पता था कि निर्माण की अनुमति नहीं है, तो आपने बिना इजाजत कमरा क्यों बनाया? कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में वह हस्तक्षेप नहीं करेगा. सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों से साफ संकेत मिलता है कि चाहे कर्ज न चुकाने का मामला हो या अवैध निर्माण का, नियम तोड़ने वालों के प्रति अदालत अब कोई नरमी दिखाने के मूड में नहीं है.    

सुप्रीम कोर्ट की मुहर के बाद विवाद: अरावली की पहचान के लिए 100 मीटर ऊंचाई का नियम कैसे बना?

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा को मंजूरी दे दी है. इसके अनुसार, आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंची कोई भी भू-आकृति ही अरावली पहाड़ी मानी जाएगी. ऐसी दो या ज्यादा पहाड़ियां अगर एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हैं, तो वे अरावली रेंज कहलाएंगी. यह परिभाषा केंद्र सरकार की समिति की सिफारिश पर आधारित है, लेकिन इससे विवाद खड़ा हो गया है. पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे अरावली का 90% से ज्यादा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है, जबकि सरकार इसे पुरानी व्यवस्था का विस्तार बता रही है. मई 2024 में बनी थी कमेटी सरकार ने ‘100 मीटर’ के मापदंड को लेकर चल रहे विवाद के बीच जारी स्पष्टीकरण में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखला की परिभाषा को सभी राज्यों में मानकीकृत किया गया है ताकि अस्पष्टता को दूर किया जा सके और दुरुपयोग को रोका जा सके। विशेष रूप से वे प्रथाएं जिनके कारण पहाड़ियों के आधार के बेहद करीब खनन जारी रखना संभव हुआ। पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अरावली में अवैध खनन से संबंधित काफी समय से लंबित मामलों की सुनवाई करते हुए मई 2024 में एक ‘समान परिभाषा’ की सिफारिश करने के लिए एक समिति का गठन किया था। पर्यावरण मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में गठित इस समिति में राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली के प्रतिनिधियों के साथ-साथ तकनीकी निकायों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। समिति ने पाया कि केवल राजस्थान में ही एक औपचारिक रूप से स्थापित परिभाषा है, जिसका वह 2006 से पालन कर रहा है। क्या है 100 मीटर वाली परिभाषा इस परिभाषा के अनुसार, स्थानीय भू-भाग से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियों को पहाड़ियां माना जाता है। ऐसी पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली सीमा रेखा के भीतर खनन निषिद्ध है, चाहे उस रेखा के भीतर की भू-आकृतियों की ऊंचाई या ढलान कुछ भी हो। सूत्रों ने बताया कि चारों राज्य इस लंबे समय से चली आ रही राजस्थान की परिभाषा को अपनाने पर सहमत हो गए हैं। साथ ही इसे वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी बनाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपायों को भी शामिल किया गया है। इन उपायों में एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी पर स्थित पहाड़ियों को एक ही पर्वत श्रृंखला मानना, किसी भी खनन निर्णय से पहले भारतीय सर्वेक्षण विभाग के मानचित्रों पर पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं का अनिवार्य मानचित्रण और खनन निषिद्ध मुख्य और संरक्षित क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान करना शामिल है। निष्कर्ष निकालना गलत सरकार ने 100 मीटर से नीचे के क्षेत्रों में खनन की अनुमति दिए जाने के दावों को खारिज कर दिया और कहा कि यह प्रतिबंध संपूर्ण पहाड़ी प्रणालियों और उनके भीतर स्थित भू-आकृतियों पर लागू होता है, न कि केवल पहाड़ी के शिखर या ढलान पर। सरकार की ओर से कहा गया कि यह निष्कर्ष निकालना ‘गलत है’ कि 100 मीटर से नीचे की सभी भू-आकृतियां खनन के लिए खुली हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत गठित एक समिति की अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा संबंधी सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था। विवाद की जड़ें 2002 में यह कहानी अप्रैल 2002 से शुरू होती है. सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (सीईसी) को हरियाणा के कोट और आलमपुर में अरावली में अवैध खनन की शिकायत मिली. अक्टूबर 2002 में सीईसी ने खनन रोकने का आदेश दिया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां कहा गया कि ऐसे खनन से अरावली का अस्तित्व खत्म हो जाएगा. 30 अक्टूबर 2002 को कोर्ट ने हरियाणा और राजस्थान समेत पूरे अरावली क्षेत्र में सभी तरह के खनन पर रोक लगा दी. राजस्थान में इससे बड़ा संकट खड़ा हो गया. मार्बल, ग्रेनाइट और अन्य खनन उद्योग से जुड़े लाखों लोग बेरोजगार हो गए. तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने कोर्ट से अपील की कि चल रहे खनन को बंद न किया जाए, क्योंकि यह लोगों की आजीविका से जुड़ा है. दिसंबर 2002 में कोर्ट ने चल रहे खनन को फिर शुरू करने की अनुमति दे दी, लेकिन नई इकाइयों पर रोक लगा दी. 100 मीटर फॉर्मूला की शुरुआत स्थायी हल के लिए गहलोत सरकार ने एक कमेटी बनाई. मई 2003 में कमिटी ने अमेरिकी भू-आकृति विशेषज्ञ रिचर्ड मर्फी के सिद्धांत को अपनाया, जिसमें समुद्र तल से 100 मीटर ऊंची पहाड़ी को ही पहाड़ माना जाता है. कमेटी ने मर्फी के अन्य सिद्धांतों (संरचनात्मक और क्षरण आधारित) को नजरअंदाज कर दिया. अगस्त 2003 में गहलोत सरकार ने सभी जिलों को निर्देश दिया कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली जगहों पर खनन की संभावनाएं तलाशें. 2003 में वसुंधरा राजे सरकार आने के बाद इस फॉर्मूले को आगे बढ़ाया गया और खनन आवंटन शुरू हो गए. इसे कोर्ट के 2002 आदेश की अवमानना मानते हुए बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने याचिका दायर की. अप्रैल 2005 में कोर्ट ने नए आवंटनों को बंद करने का आदेश दिया. राजस्थान में दुरुपयोग और कोर्ट की चिंता बाद में गहलोत सरकार के समय फिर खनन शुरू हुए. कुछ जगहों पर ऊंचाई मापने में गड़बड़ी हुई – अल्टीमीटर से जमीन से चोटी की ऊंचाई नापकर 160 मीटर की पहाड़ी को 80-90 मीटर दिखाया गया. इससे अलवर, सिरोही और उदयपुर में बड़े पैमाने पर खनन हुआ. 2010 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) और सीईसी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि राजस्थान में अवैध खनन जोरों पर है. अलवर में 2269 पहाड़ियों में से 25% गायब हो चुकी थीं. कई पहाड़ियां पूरी तरह खत्म हो गईं. कोर्ट ने केंद्र से अरावली की स्पष्ट परिभाषा मांगी. केंद्र की 2025 सिफारिश और सुप्रीम कोर्ट का फैसला नवंबर 2025 में केंद्र सरकार ने मर्फी फॉर्मूले को आगे बढ़ाते हुए कहा कि 100 मीटर ऊंचाई (लोकल रिलीफ से) वाली पहाड़ियां ही अरावली मानी जाएंगी. साथ ही, सबसे निचली कंटूर लाइन के अंदर का पूरा क्षेत्र (ढलान सहित) संरक्षित होगा. सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को इस परिभाषा को सभी राज्यों (राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली) के लिए समान रूप से लागू कर दिया. कोर्ट ने नए खनन पट्टे देने पर भी रोक लगा दी, जब तक पूरी अरावली के लिए सस्टेनेबल माइनिंग … Read more

ट्रेन से सफर हुआ महंगा: लंबी दूरी का किराया बढ़ा, ज्यादा सामान ले जाना पड़ेगा भारी

नई दिल्‍ली.  भारतीय रेलवे ने यात्रियों को दोहरा झटका दिया है. एक तरफ लंबी दूरी की ट्रेनों में किराया बढ़ाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ तय वजन से ज्यादा सामान ले जाने पर एक्‍शन की तैयारी कर ली गयी है. यानी इस साल के अंत में सफर करना और तय वजन से ज्‍यादा सामान ले जाना दोनों भारी पड़ने जा रहा है. हालांकि 215 किमी. से कम दूरी की जनरल टिकट से यात्रा और एमएसटी में कोई बढ़ोत्‍तरी नहीं हुई है. दोनों ही तरह से भारतीय रेलवे को राजस्‍व में इजाफा होगा. भारतीय रेलवे ने 26 दिसंबर से किराए में बढ़ोतरी का फैसला किया है. जनरल क्लास में 215 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर 1 पैसा प्रति किलोमीटर अतिरिक्त लगेगा, जबकि मेल या एक्सप्रेस की स्लीपर और सभी एसी क्लास में 2 पैसे प्रति किलोमीटर इजाफा होगा. उदाहरण के लिए, 500 किमी की स्लीपर यात्रा पर करीब 10 रुपये ज्यादा देने होंगे. रेलवे अतिरिक्‍त राजस्‍व से क्‍या करेगा रेल मंत्रालय के कार्यकारी निदेशक (सूचना एवं प्रसार) दिलीप कुमार ने कहा कि 215 किमी से कम दूरी की जनरल क्लास, सबअर्बन ट्रेनें और मासिक सीजन टिकट पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इस बढ़ोतरी से रेलवे को करीब 600 करोड़ रुपये अतिरिक्त आएंगे, जो स्टेशनों और ट्रेनों में सुविधाएं और सुरक्षा बढ़ाने पर खर्च होंगे. रेलवे का मकसद है कि रोजाना सफर करने वाले यात्रियों और कम व मध्यम आय वाले परिवारों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े और उनकी यात्रा सस्ती बनी रहे. तय सामान से ज्‍यादा ले जाने पर छह गुना अधिक जुर्माना देना होगा. क्यों करनी पड़ी बढ़ोत्‍तरी रेल मंत्रालय के अनुसार पिछले दस वर्षों में रेलवे नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ है और अब सेवाएं दूर-दराज इलाकों तक पहुंच रही हैं. यात्रियों की सुरक्षा और सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई गई है. इससे कर्मचारियों पर खर्च बढ़कर 1.15 लाख करोड़ रुपये और पेंशन पर खर्च करीब 60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. वित्त वर्ष 2024-25 में रेलवे का कुल खर्च 2.63 लाख करोड़ रुपये हो गया है. ज्‍यादा लगेज में क्‍या होगी सख्‍ती ट्रेनों में तय लगेज से ज्‍यादा सामान ले जाने पर एक्‍शन की तैयारी की रही है. यहां पर फ्लाइट जैसा एक्‍स्‍ट्रा सामान ले जाने पर ज्‍यादा चार्ज देना पड़ेगा. रेलवे के अनुसार अभी ट्रेन में तय वजन से ज्‍यादा सामान ले जाने पर आपके सहयात्री को परेशानी हो सकती है. इसी को ध्‍यान में रखते हुए ऐसे यात्रियों पर एक्‍शन लिया जा सकता है, जो तय वजन से ज्‍यादा सामान लेकर सफर कर रहे हैं. इस तरह यह फैसला यात्रियों की सुविधाजनक सफर के लिए लिया जा रहा है. रेल मंत्रालय के एडीजी धर्मेन्‍द्र तिवारी के अनुसार रेलवे के अनुसार एक्‍स्‍ट्रा चार्ज को लेकर कोई नया आदेश नहीं है, पुराना आदेश ही है. इसी को ओर प्रभावी बनाया जा रहा है. हर क्‍लास के लिए क्‍या है नियम ट्रेनों हर क्‍लास के लिए अलग वजह का नियम है, जनरल, स्‍लीपर और एसी के लिए वजन तय है. अगर आप ऐसी फर्स्‍ट क्‍लास से सफर कर रहे हैं तो एक यात्री 70 किलो तक वजह ले जा सकता है. इसके साथ ही 15 किलो अतिरिक्‍त सामान की छूट होती है. इसके अलावा अधिकतम बुकिंग कराकर 65 किलो लगेज पार्सल वैन में ले जा सकता है. इसी तरह सेंकेड ऐसी में 50 किलो के साथ 10 किलो की एक्‍स्‍ट्रा की छूट रहती है और 30 किलो बुक कराकर पार्सल वैन से ले जाया जा सकता है. थर्ड ऐसी या एसी चेयरकार में 40 किलो लगेज के साथ 10 किलो की छूट रहती है. पार्सल वैन में 30 किग्रा. बुकिंग कराकर साथ ले जा सकते हैं. स्‍लीपर क्‍लास के लिए क्‍या है नियम स्‍लीपर क्‍लास में 40 किग्रा. के साथ 10 किलो और लगेज ले जाने की छूट होती है. बुकिंग कराकर अतिरिक्‍त 70 किलो वजन तक ले जा सकते हैं. वहीं सेकेंड क्‍लास में 35 किग्रा. के साथ 10 किग्रा तक ले जा सकते हैं. वहीं बुक कराकर 60 किग्रा. अतिरिक्‍त लगेज पार्सल वैन से ले जा सकते हैं. रेलवे की नई गाइडलाइंस के अनुसार यात्री तय सीमा से अधिक और बिना बुक किया गया सामान ले जाते हुए कोई पकड़ा जाता है तो उसे सामान की बुकिंग का छह गुना भुगतान करना होगा.

भारत-न्यूजीलैंड में ऐतिहासिक समझौता, निवेश के नए रास्ते खुले

नई दिल्ली वैश्विक व्यापार मोर्चे पर भारत ने बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल की है. भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच बड़ा व्यापारिक समझौता हुआ है. दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के बीच टेलीफोन बातचीत हुई थी, जिसके दौरान भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की संयुक्त घोषणा की गई. यह समझौता न सिर्फ दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई ऊंचाई देगा, बल्कि अमेरिका की संरक्षणवादी व्यापार नीतियों के दौर में भारत की वैकल्पिक वैश्विक साझेदारियों को भी मजबूत करता है. मात्र 9 महीनों में पूरा हुआ ऐतिहासिक समझौता भारत और न्यूजीलैंड के बीच एफटीए पर बातचीत की शुरुआत मार्च 2025 में हुई थी, जब प्रधानमंत्री लक्सन भारत दौरे पर आए थे. महज 9 महीनों के रिकॉर्ड समय में इस मुक्त व्यापार समझौते का पूरा होना दोनों देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति और रणनीतिक समझ को दर्शाता है. पांच साल में व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि एफटीए के लागू होने के बाद अगले पांच वर्षों में मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना किया जाएगा. इससे भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापार, निवेश, नवाचार और सप्लाई चेन सहयोग को नई गति मिलेगी. 15 साल में भारत में 20 मिलियन डॉलर का निवेश इस समझौते के तहत न्यूजीलैंड अगले 15 वर्षों में भारत में 20 मिलियन डॉलर का निवेश करेगा. यह निवेश कृषि, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग, शिक्षा, टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में अवसर पैदा करेगा. भारत का सातवां बड़ा FTA, वैश्विक नेटवर्क मजबूत न्यूजीलैंड के साथ यह समझौता पिछले कुछ वर्षों में भारत का सातवां प्रमुख FTA है. इससे पहले भारत ओमान, UAE, यूके, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस और EFTA देशों (यूरोपीय फ्री ट्रेड ब्लॉक) के साथ ऐसे समझौते कर चुका है. यह श्रृंखला दिखाती है कि भारत तेजी से एक भरोसेमंद वैश्विक व्यापार केंद्र के रूप में उभर रहा है.

रेल किराया 107% बढ़ा, खाने-पीने की कीमतें उछलीं, कांग्रेस ने किया मोदी सरकार पर हमला

 नई दिल्ली कांग्रेस नेता अजय कुमार ने केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि मोदी सरकार इस देश के लोगों को तोहफ़े दे रही है। पहले AQI 1000 के निशान तक पहुंचा और अब रेलवे किराए में बढ़ोतरी। वह भी सरकार की तरफ से कोई घोषणा किए बिना, सिर्फ़ एक सर्कुलर जारी करके। निचले और मध्यम वर्ग के लोगों की जेब पर लगातार हमला हो रहा है। उन्होंने आगे कहा कि मोदी सरकार के इस कार्यकाल में यह दूसरी बार है जब उन्होंने रेल किराया बढ़ाया है। 2013 से अब तक 107% की बढ़ोतरी हुई है। AC 2-टियर का किराया हवाई किराए के बराबर हो गया है। अजय कुमार ने कहा, “ट्रेनें लेट हो रही हैं. शहरों में कार पार्किंग की कीमतें बढ़ गई हैं। कांग्रेस ने रेलवे में सीनियर सिटिजन को 8600 करोड़ की जो छूट दी थी, उसे उनसे छीन लिया गया है. हालांकि, WhatsApp वाले अंकल-आंटी यह कभी नहीं समझेंगे। ‘107% तक बढ़ा रेलवे का किराया’ अजय कुमार ने रेल मंत्री को ‘रील मंत्री’ बताते हुए कहा कि अश्विनी वैष्णव 2024 में सरकार बनने के बाद से दो बार रेल का किराया बढ़ा चुके हैं। ये इतने शातिर हैं कि बताते हैं, हमने 1 पैसा या 2 पैसा प्रति किलोमीटर के हिसाब से किराया बढ़ाया है, लेकिन आम जनता के ऊपर 100-200 तक का भार पड़ता है। उन्होंने कहा कि पिछले 10 साल में रेलवे का किराया 107% तक बढ़ चुका है। नरेंद्र मोदी ने लोगों का ट्रेन से चलना भी मुश्किल कर दिया है। 30 रुपए की थाली 120 की अजय कुमार ने कहा कि रेल मंत्री का कहना है कि किराया बढ़ाने से रेलवे को 600 करोड़ रुपए का मुनाफा होगा। रेलवे में खाने की थाली 120 रुपए की हो चुकी है, जो 2014 में 30 रुपए की थी. स्टेशनों की पार्किंग में कार पार्किंग का चार्ज 30 मिनट के बाद 500 रुपए लिया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि मोदी सरकार ने सीनियर सिटिजन को दी गई छूट को खत्म कर दिया है। फरवरी में रेलवे में भगदड़ मची थी, उसका कारण था कि रेलवे ने जनरल क्लास के सिर्फ 17 डिब्बे लगाए थे, जिसकी कैपेसिटी सिर्फ 1,700 थी वहीं, सरकार ने 9,600 टिकट बेचे थे।

बांग्लादेश में युवा नेता को गोली लगी, अस्पताल में गंभीर हालत

 ढाका      बांग्लादेश में राजनीतिक हिंसा की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं. शरीफ उस्मान हादी के बाद अब खुलना में एक और छात्र नेता को अज्ञात हमलावरों में गोली मार दी. घायल अवस्था में छात्र नेता को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां डॉक्टरों की एक टीम उनका इलाज कर रही है.  पुलिस ने बताया कि खुलना में सोमवार को नेशनल सिटिजन्स पार्टी के केंद्रीय श्रमिक संगठन के नेता मोहम्मद मोतालेब सिकदर को अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी. गोली उनके कान के पास से निकल गई, जिससे वह घायल हो गए हैं. कान के पास से निकली गोली द डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार, सोनडांगा मॉडल पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी अनिमेष मंडल ने बताया कि बदमाशों ने सुबह करीब 11:45 बजे शहर के गाजी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पास मोहम्मद मोतालेब के सिर को निशाना बनाकर गोली चलाई. उन्हें गंभीर हालत में खुलना मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया था. वहीं, डॉक्टरों के हवाले से पुलिस अधिकारी ने बताया कि मोतालेब खतरे से बाहर हैं. गोली उसके कान के एक तरफ से अंदर गई, स्किन को भेदते हुए दूसरी तरफ से निकल गई. रैली की कर रहे थे तैयारी एनसीपी के खुलना महानगर पालिका के आयोजक सैफ नवाज ने प्रोथोम आलो को बताया कि मोतलेब सिकदर एनसीपी के श्रमिक संगठन जातीय श्रमिक शक्ति के केंद्रीय आयोजक और खुलना मंडल संयोजक थे. पार्टी कुछ दिनों में खुलना में एक संभागीय श्रमिक रैली आयोजित करने वाली थी और मोतालेब सिकदर उसी की तैयारियों में जुट हुए थे. बता दें कि इससे पहले ढाका-8 से सांसद पद के उम्मीदवार शरीफ उस्मान हादी को 12 दिसंबर को ढाका के पलटन इलाके में हमलावरों ने गोली मार दी थी, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई थी. ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल और एवरकेयर अस्पताल में प्रारंभिक उपचार के बाद, उसे बेहतर चिकित्सा देखभाल के लिए 15 दिसंबर को सिंगापुर रेफर कर दिया गया था. गुरुवार रात (18 दिसंबर) को सिंगापुर जनरल अस्पताल में हादी मौत हो गई. इसके बाद पूरे बांग्लादेश में हिंसा भड़क गई.   

बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू की खौफनाक मौत, फैक्ट्री में साथी वर्कर बने दुश्मन

ढाका     बांग्लादेश में कट्टरपंथियों के मॉब लिंचिंग का शिकार हुए हिन्दू युवक दीपू चंद्र दास की पूरी कहानी मीडिया में आई है. बांग्लादेश के मेयमनसिंह जिले एसपी (इंडस्ट्रियल) मोहम्मद फरहाद हुसैन खान ने कहा है कि उन्हें घटना की जानकारी उनके एक एसआई ने रात आठ बजे को दी.  बांग्लादेश के अखबार द डेली स्टार ने अपनी एक रिपोर्ट में एसपी के हवाले से कहा है कि, "हम तुरंत उस जगह की ओर दौड़ पड़े, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. सड़क पर सैकड़ों लोग थे और इतनी बड़ी भीड़ में से उस जगह तक पहुंचना बहुत मुश्किल था. जब हम फैक्ट्री के गेट पर पहुंचे, तो हमने देखा कि एक गुस्साई भीड़ लाश को ढाका-मयमनसिंह हाईवे की ओर ले जा रही थी, जो लगभग दो किलोमीटर दूर था. करीब तीन घंटे तक 10 किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम लग गया, जिससे पुलिस और दूसरी एजेंसियों की आवाजाही में गंभीर रुकावट आई." एसपी फरहाद हुसैन खान ने कहा कि उनका दफ्तर घटना से 15 किलोमीटर दूर है जबकि भालुका पुलिस स्टेशन अपेक्षाकृत नजदीक है.  एसपी ने कहा कि अगर समय पर उन्हें कॉल किया जाता तो दीपू की जान बच सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.  एसपी फरहाद हुसैन खान ने बताया कि हालांकि पुलिस फैक्ट्री प्रबंधन से संपर्क स्थापित कर रही है, लेकिन फैक्ट्री के किसी पदाधिकारी ने उनसे संपर्क नहीं किया है.  फैक्ट्री प्रबंधन ने क्या कहा? द डेली स्टार से बात करते हुए पॉयनियर निटवेयर बांग्लादेश के सीनियर मैनेजर (प्रशासन) साकिब महमूद ने कहा कि लगभग पांच बजे शाम कुछ मजदूर फैक्ट्री में हंगामा करने लगे, ये लोग दीपू पर 'मजहबी भावना को ठेस पहुंचाने' का आरोप लगा रहे थे.  इसकी जानकारी मिलने पर फैक्ट्री के अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे और स्थिति को नियंत्रण में लेने की कोशिश करने लगे. तब यहां सैकड़ों लोग जमा हो चुके थे और प्रदर्शन कर रहे थे.  फैक्ट्री के सीनियर मैनेजर ने साफ कहा कि दीपू दास पर जो भी आरोप लगाया गया था उसे साबित करने के लिए कोई प्रूफ नहीं था. लेकिन वर्करों का हंगामा रुक नहीं रहा था.  फैक्ट्री के सीनियर मैनेजर आलमगीर हुसैन ने शाम 7.30 बजे के करीब दीपू से 'नकली इस्तीफा' भी दिलवा दिया ताकि लोग शांत हो जाएं, लेकिन फैक्ट्री के मजदूर शांत होने का नाम नहीं ले रहे थे. इस बीच दीपू चंद्र दास को फैक्ट्री के सिक्योरिटी रूम में रखा गया और रात 8 बजे पुलिस को सूचना दे दी गई.  जब फैक्ट्री मैनेजमेंट से पूछा गया कि उन्होंने पुलिस को सूचना देने में देरी क्यों कर दी तो फैक्ट्री के सीनियर मैनेजर ने कहा कि उन्होंने फैक्ट्री के अंदर ही अपने तरीकों से मामले को सुलझाने की पूरी कोशिश की.  तब तक फैक्ट्री में शिफ्ट चेंज का समय हो चुका था. दूसरी शिफ्ट के वर्कर भी वहां पहुंच चुके थे. साथ ही जब ये खबर बाहर फैली तो स्थानीय लोगों का भी वहां जमावड़ा हो गया था.   फैक्ट्री का दरवाजा तोड़ अंदर घुसी भीड़ सीनियर मैनेजर के अनुसार, "रात पौने नौ बजे, हंगामा कर रही भीड़ फैक्ट्री में घुस गई, भीड़ ने फैक्ट्री का दरवाजा तोड़ दिया और दीपू को सिक्योरिटी रूम से अपने कब्जे में ले लिया."   फैक्ट्री सूत्रों ने दावा किया कि हमलावर बाद में दीपू को फैक्ट्री से बाहर खींचकर ले गए, जिसके बाद स्थानीय लोग भी हमले में शामिल हो गए और उसे मौके पर ही मार डाला. इसके बाद उन्होंने उसकी लाश को आग लगा दी. मयमनसिंह में RAB-14 के कंपनी कमांडर मोहम्मद शम्सुज्जमां ने कल द डेली स्टार को बताया कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि मृतक ने फेसबुक पर कुछ ऐसा लिखा था जिससे महजबीी भावनाएं आहत हुई हों.  उन्होंने आगे कहा, "जब हालात खराब हो गए, तो फैक्ट्री को बचाने के लिए उसे जबरदस्ती फैक्ट्री से बाहर निकाल दिया गया." इस आरोप पर कि दीपू को फैक्ट्री की सुरक्षा के लिए लोगों के हवाले कर दिया गया था, सीनियर मैनेजर साकिब महमूद ने कहा कि वे ऐसा कभी नहीं कर सकते.  बता दें कि बांग्लादेश के मैमनसिंह जिले के भालुका उपजिला में 18 दिसंबर 2025 की रात को हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की उग्र भीड़ ने बेरहमी से हत्या कर दी. दीपू एक गारमेंट फैक्ट्री में मजदूर था और किराए के मकान में रहता था. भीड़ ने उस पर कुफ्र का आरोप लगाया था. हालांकि पुलिस ने इस आरोप को गलत करार दिया था. इसके बाद कट्टरपंथियों की भीड़ ने उसे पीट-पीटकर मार डाला, शव को पेड़ से लटकाया और आग लगा दी. अबतक 12 लोग गिरफ्तार  बांग्लादेश पुलिस ने दीपू चंद्र दास की हत्या के मामले में अबतक 12 लोगों को गिरफ्तार किया है. पीड़ित के भाई अपू चंद्र दास ने शुक्रवार को भालुका पुलिस स्टेशन में 140-150 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया है. 

मोहन भागवत ने मणिपुर में जातीय संघर्ष पर कहा- समाधान में वक्त लगेगा, बीजेपी नेताओं से दूर रहने का दिया बयान

कोलकाता  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि जातीय संघर्ष से जूझ रहे मणिपुर में लड़ने वाले पक्षों के बीच मतभेदों को सुलझाने में समय लगेगा. उन्होंने भरोसा जताया कि आखिरकार पूर्वोत्तर राज्य में शांति कायम होगी. हाल ही में मणिपुर के दौरे पर गए भागवत ने कहा कि उन्होंने राज्य के सभी आदिवासी और सामाजिक नेताओं के साथ-साथ युवा प्रतिनिधियों से भी बातचीत की है. उन्होंने कहा कि गड़बड़ी, खासकर कानून और व्यवस्था की समस्याएं, धीरे-धीरे कम हो रही हैं और लगभग एक साल में खत्म हो जाएंगी. उन्होंने कहा, 'लेकिन लोगों के मन को जोड़ना एक बड़ा काम है और इसमें समय लगेगा.' उन्होंने जोर देकर कहा कि इसका एकमात्र तरीका बातचीत करना और लड़ने वाले पक्षों को एक पेज पर लाना है. संघ की सौवीं सालगिरह मनाने के लिए यहां हुए एक कार्यक्रम में आरएसएस चीफ ने कहा, 'ऐसा किया जा सकता है, क्योंकि असल में जोश पहले से ही है.' उन्होंने कहा, 'हम अरुणाचल, मेघालय में ऐसा कर सकते हैं. हम नागालैंड और दूसरी जगहों पर भी ऐसा कर रहे हैं.' भागवत ने कहा कि मणिपुर में आरएसएस की करीब 100 शाखाएं हैं. उन्होंने कहा कि मणिपुर में आखिरकार शांति आएगी, लेकिन इसमें निश्चित रूप से समय लगेगा. लेक्चर और बातचीत कार्यक्रम में शामिल एक व्यक्ति ने पूछा कि संघ बीजेपी के टॉप लीडरशिप से दूरी क्यों बनाए हुए है तो आरएसएस चीफ ने कहा कि संघ ने हमेशा भगवा पार्टी से दूरी बनाए रखी है. उन्होंने कहा, 'हम सभी बीजेपी नेताओं से बहुत दूर रहते हैं.' साथ ही जल्दी से यह भी कहा, 'हम हमेशा नरेंद्र भाई (PM मोदी), अमित भाई (केंद्रीय गृह मंत्री शाह) के करीब रहे हैं. दोनों नेताओं को संघ के करीबी माने जाते हैं और पीएम मोदी पहले संगठन के प्रचारक थे. उन्होंने कहा कि आरएसएस और बीजेपी लीडरशिप के बीच रिश्तों के बारे में ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए और कहा कि संघ किसी के साथ भी अपने रिश्ते नहीं छिपाता, चाहे वह कोई भी राजनीतिक संगठन हो.

पूर्व पीएम शेख हसीना ने कही चौंकाने वाली बात, अपनी सुरक्षा के चलते बांग्लादेश नहीं जाएंगी

नई दिल्ली ई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सोमवार को चल रही कानूनी कार्रवाई के बीच देश लौटने की मांग को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई पॉलिटिक्स से प्रेरित है और उन्होंने जोर देकर कहा कि वह मौजूदा हालात में वापस नहीं जाएंगी, जबकि पिछले हफ्ते बांग्लादेश में एक हिंदू व्यक्ति की हत्या समेत नई अशांति देखी गई.     हसीना ने कहा, "आप मेरी पॉलिटिकल हत्या का सामना करने के लिए मेरी वापसी की मांग नहीं कर सकते."  उन्होंने दोहराया कि उन्होंने चीफ एडवाइजर मुहम्मद यूनुस को यह मामला हेग ले जाने की चुनौती दी है, और भरोसा जताया कि एक इंडिपेंडेंट कोर्ट उन्हें बरी कर देगा. उन्होंने कहा कि वह तभी लौटेंगी, जब बांग्लादेश में एक कानूनी सरकार और एक इंडिपेंडेंट ज्यूडिशियरी होगी. ANI के साथ एक ईमेल इंटरव्यू में अपनी बात बताते हुए, हसीना ने कहा कि इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) का फैसला कोई कानूनी काम नहीं था, बल्कि एक पॉलिटिकल काम था, और इसे "न्यायालय की आड़ में पॉलिटिकल हत्या" बताया. उन्होंने कहा कि उन्हें अपना बचाव करने और अपनी पसंद के वकील अपॉइंट करने के अधिकार से वंचित किया गया, और आरोप लगाया कि ट्रिब्यूनल का इस्तेमाल "अवामी लीग का विच हंट" करने के लिए किया गया था. इन आरोपों के बावजूद, हसीना ने कहा कि बांग्लादेश के संवैधानिक ढांचे पर उनका भरोसा कायम है. उन्होंने कहा, "हमारी संवैधानिक परंपरा मजबूत है, और जब कानूनी शासन बहाल होगा और हमारी ज्यूडिशियरी अपनी आजादी वापस पा लेगी, तो न्याय की जीत होगी." उनकी यह टिप्पणी नवंबर में बांग्लादेश की एक अदालत के उस फैसले के बाद आई है, जिसमें हसीना को जुलाई-अगस्त 2024 के विद्रोह के संबंध में "मानवता के खिलाफ अपराधों" का दोषी पाया गया था. स्थानीय मीडिया ने बताया कि इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल-1 ने मौत की सजा दी थी. ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, ट्रिब्यूनल ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों के सभी पांच आरोपों में दोषी ठहराया. रिपोर्ट में कहा गया है कि फैसले का निष्कर्ष यह था कि हसीना ने पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून और पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल के साथ मिलकर जुलाई-अगस्त आंदोलन के दौरान अत्याचारों को अंजाम दिया और उन्हें होने दिया. कानूनी कार्रवाई और हाल की हिंसा के इस बैकग्राउंड में, हसीना ने मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाले अंतरिम प्रशासन पर लोकतांत्रिक वैधता की कमी और संस्थाओं को कमजोर करके और चरमपंथी तत्वों को मजबूत बनाकर देश को अस्थिरता की ओर ले जाने का आरोप लगाया. उन्होंने फरवरी में होने वाले चुनावों की क्रेडिबिलिटी पर भी सवाल उठाया, और अवामी लीग पर लगातार बैन का जिक्र किया. उन्होंने कहा, "अवामी लीग के बिना चुनाव, चुनाव नहीं, बल्कि ताजपोशी है." उन्होंने आरोप लगाया कि यूनुस "बांग्लादेशी लोगों के एक भी वोट के बिना" सरकार चला रहे हैं, जबकि वे एक ऐसी पार्टी को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, जिसने 9 नेशनल जनादेश जीते हैं. हसीना ने चेतावनी दी कि जब लोगों को अपनी पसंदीदा पार्टी को वोट देने का ऑप्शन नहीं दिया जाता, तो वोटर पार्टिसिपेशन हमेशा खत्म हो जाता है, जिससे बड़े पैमाने पर वोटिंग से वंचित होना पड़ता है. उन्होंने कहा कि ऐसे हालात में बनने वाला कोई भी एडमिनिस्ट्रेशन, मोरल अथॉरिटी की कमी महसूस करेगा और असली नेशनल मेल-मिलाप का मौका गंवा देगा. उन्होंने कहा कि ICT के फैसले ने उनके एक्सट्रैडिशन की मांग भी शुरू कर दी है, जिसे उन्होंने "तेजी से हताश और भटकते हुए यूनुस एडमिनिस्ट्रेशन" की तरफ से आने वाला बताकर खारिज कर दिया, जबकि दूसरे लोग इस कार्रवाई को पॉलिटिक्स से चलाया जा रहा "कंगारू ट्रिब्यूनल" मानते हैं. उन्होंने भारत की लगातार मेहमाननवाजी और पूरे भारत में राजनीतिक पार्टियों से मिले सपोर्ट के लिए शुक्रिया अदा किया. बांग्लादेश से निकलने के बारे में बताते हुए, हसीना ने कहा कि वह और खून-खराबा रोकने के लिए निकलीं, न कि इसलिए कि उन्हें जवाबदेही का डर था. इलाके के हालात को ध्यान में रखते हुए, हसीना ने भारत-बांग्लादेश के बिगड़ते रिश्तों पर बात की, जिसमें ढाका का भारतीय राजदूत को बुलाने का फैसला भी शामिल है. उन्होंने अंतरिम सरकार पर भारत के खिलाफ दुश्मनी भरे बयान जारी करने, धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में नाकाम रहने और कट्टरपंथियों को विदेश नीति पर असर डालने देने का आरोप लगाया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत दशकों से बांग्लादेश का सबसे भरोसेमंद पार्टनर रहा है और कहा कि दोनों देशों के रिश्ते गहरे और टिकाऊ हैं. उन्होंने भरोसा जताया कि एक बार सही सरकार बहाल हो जाने पर रिश्ते स्थिर हो जाएंगे. भारत के खिलाफ बढ़ती भावना और भारतीय डिप्लोमैट्स की सुरक्षा को लेकर चिंताओं पर बात करते हुए, हसीना ने कहा कि यह दुश्मनी यूनुस राज में हिम्मत बढ़ाए गए कट्टरपंथियों की वजह से है. उन्होंने आरोप लगाया कि इन ग्रुप्स ने भारतीय दूतावास, मीडिया ऑर्गनाइज़ेशन और अल्पसंख्यकों पर हमला किया था, और यूनुस ने दोषी आतंकवादियों को रिहा करते हुए ऐसे लोगों को बड़े पदों पर बिठाया था. उन्होंने कहा कि अपने लोगों की सुरक्षा को लेकर भारत की चिंताएं सही हैं, और कहा कि एक जिम्मेदार सरकार डिप्लोमैटिक मिशनों की सुरक्षा करेगी और धमकी देने वालों पर केस चलाएगी, न कि उन लोगों को बचाएगी जिन्हें उन्होंने गुंडे बताया. शरीफ उस्मान हादी की हत्या का जिक्र करते हुए, हसीना ने कहा कि इस घटना से पता चलता है कि उन्हें हटाने के बाद कानून-व्यवस्था बिगड़ गई है, और उन्होंने कहा कि अंतरिम सरकार के तहत स्थिति और खराब हो गई है. उन्होंने आगे कहा कि हिंसा आम बात हो गई है, जिससे बांग्लादेश अंदर से अस्थिर हो रहा है और पड़ोसी देश परेशान हैं.     उन्होंने कहा, "जब आप अपनी सीमाओं के अंदर बेसिक व्यवस्था बनाए नहीं रख सकते, तो इंटरनेशनल लेवल पर आपकी क्रेडिबिलिटी खत्म हो जाती है." और इसे "यूनुस के बांग्लादेश की सच्चाई" बताया. हसीना ने कट्टरपंथी इस्लामी ग्रुप्स के बढ़ते असर पर भी चिंता जताई, आरोप लगाया कि यूनुस ने कैबिनेट में कट्टरपंथियों को अपॉइंट किया है. दोषी आतंकवादियों को रिहा किया है और इंटरनेशनल टेरर नेटवर्क से जुड़े संगठनों को पब्लिक लाइफ में काम करने दिया है. … Read more