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ठंड के मौसम में बढ़ेगा पारा? अल-नीनो के असर से मौसम में बड़ा बदलाव

 नई दिल्ली ठंड का मौसम आने वाला है, लेकिन इस बार सर्दी कुछ कम पड़ सकती है. इसकी एक बड़ी वजह तेजी से मजबूत हो रहा अल-नीनो है. मौसम एजेंसियों के मुताबिक, प्रशांत महासागर के बीच और पूर्वी हिस्से में समुद्र का पानी सामान्य से 1 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा गर्म हो चुका है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर अल-नीनो और मजबूत हुआ तो 2026-27 की सर्दी कई जगह सामान्य से ज्यादा गर्म रह सकती है. इसका असर 2027 की गर्मी पर भी पड़ सकता है।  अल-नीनो में प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इससे दुनिया के कई हिस्सों के मौसम में बदलाव आता है. भारत में इसका असर बारिश, मॉनसून और तापमान पर पड़ सकता है. इस बार चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि अल-नीनो ऐसे समय मजबूत हो रहा है, जब क्लाइमेट चेंज के कारण दुनिया का तापमान पहले ही बढ़ा हुआ है।  सर्दी में तापमान कितना बढ़ सकता है? अल-नीनो का मतलब यह नहीं है कि हर शहर का तापमान एक तय संख्या से बढ़ेगा. तापमान पर कई दूसरी चीजों का भी असर होता है. इसे आसान उदाहरण से समझिए. अगर दिल्ली में सर्दियों में किसी समय सामान्य तापमान 10 डिग्री सेल्सियस रहता है और मौसम 2 डिग्री ज्यादा गर्म रहता है, तो तापमान करीब 12 डिग्री हो सकता है।  इसी तरह जहां तापमान -3 डिग्री रहता है, वहां यह -1 डिग्री के आसपास पहुंच सकता है. लेकिन ये सिर्फ उदाहरण हैं. अभी यह कहना मुश्किल है कि दिल्ली, चूरू, पटना, श्रीनगर या लद्दाख में तापमान कितने डिग्री तक बढ़ेगा. ठंडी हवाएं, बादल और दूसरे मौसम सिस्टम भी तापमान को प्रभावित करते हैं।  दिल्ली, चूरू और पटना में क्या असर होगा? दिल्ली और पटना जैसे मैदानी इलाकों में अगर तापमान सामान्य से ऊपर रहा तो ठंड कम महसूस हो सकती है. खासकर रात का तापमान सामान्य से ज्यादा रह सकता है. राजस्थान के चूरू जैसे इलाकों में भी कुछ रातें सामान्य से कम ठंडी हो सकती हैं, जहां सर्दियों में तापमान काफी नीचे चला जाता है।  श्रीनगर और लद्दाख में क्या होगा? श्रीनगर और लद्दाख जैसे ठंडे इलाकों में भी तापमान सामान्य से ऊपर रह सकता है. हालांकि वहां कितना बदलाव होगा, यह अभी साफ नहीं है. लद्दाख में ऊंचाई और जगह के हिसाब से तापमान काफी बदलता है. इसलिए अभी वहां किसी एक तय तापमान का अनुमान लगाना सही नहीं होगा।  2027 की गर्मी ज्यादा परेशान कर सकती है अल-नीनो का असर सिर्फ सर्दी तक नहीं रहेगा. वैज्ञानिकों के मुताबिक मार्च से मई 2027 के बीच गर्मी ज्यादा तेज हो सकती है. मजबूत अल-नीनो से भारत में मॉनसून कमजोर हो सकता है और बारिश भी कम या असमान हो सकती है. इससे पानी की कमी और फसलों पर असर का खतरा बढ़ सकता है. ज्यादा तापमान के कारण लू भी ज्यादा परेशान कर सकती है।  अभी अल-नीनो के और मजबूत होने की संभावना है. इसका सबसे ज्यादा असर अक्टूबर से दिसंबर 2026 के बीच दिख सकता है. इसके बाद 2027 में यह धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है. हालांकि इसका भारत के मौसम पर कितना असर होगा, यह आने वाले महीनों में साफ होगा।  क्या रिकॉर्ड बढ़ाएगा खतरा? प्रशांत महासागर के निनो 3.4 इलाके में तापमान मापा जाता है और अल-नीनो की तीव्रता का आकलन किया जाता है। 3.05 डिग्री सेल्सियस तापमान आधुनिक रिकॉर्ड में सबसे ज्यादा है। यह 1982, 1997 और 2015 जैसी मजबूत घटनाओं से आगे जा चुकी है। कुछ आंकड़ों में इसकी 1877 की ऐतिहासिक घटना से भी तुलना हो रही है। इस दौरान बड़े पैमाने पर सूखा और अकाल पड़ा था। मॉडल के मुताबिक, मासिक औसत और भी ऊपर पहुंच सकता है। कुछ अनुमानों में 4 डिग्री के करीब पहुंचने की संभावना जताई गई है, लेकिन यह अभी निश्चित नहीं है।  यह रिकाॅर्ड इसलिए अहम है, क्योंकि अल-नीनो जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर प्रभाव को बढ़ा सकता है। गर्म हो रही दुनिया में समुद्र का तापमान पहले से बढ़ा हुआ है। इसके कारण नई घटनाओं की तीव्रता बढ़ सकती है। वैज्ञानिक हर दिन डेटा पर नजर रख रह हैं,  क्योंकि हर दिन डेटा में उतार-चढ़ाव होता है।  क्या होगा दुनिया पर प्रभाव? दुनिया में अल-नीनो का प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है। अमेरिका में इस सर्दी में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ सकता है। उत्तरी इलाके में सामान्य से ज्यादा गर्मी, पश्चिमी-मध्य हिस्सों में ज्यादा बर्फबारी हो सकती है।दक्षिण अमेरिका में पेरू और चिली में भारी बारिश और बाढ़ की घटनाएं पहले से देखी जा रही है। मध्य अमेरिका और कैरेबियन में सूखा पड़ने की संभावना है।  भारत पर क्या होगा असर? एशिया में भारत समेत कई देशों में मॉनसून कमजोर हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ सकता है। अफ्रीका के कुछ इलाकों में भी बारिश के पैटर्न में बदलाव हो सकता है। कुल मिलाकर बाढ़, सूखा, गर्मी की लहरें और तूफान जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं। 

उत्तराखंड में बढ़ा ग्लेशियल झीलों का खतरा, 30 साल में 24 झीलों का क्षेत्रफल 67% बढ़ा

देहरादून  हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. वे केवल बर्फ ही नहीं खो रहे बल्कि अपने पीछे बड़ी-बड़ी झीलें छोड़ रहे हैं. इन झीलों का बढ़ता आकार पहाड़ी क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. अलकनंदा बेसिन पर की गई एक नई स्टडी ने इस बदलते जल परिदृश्य की डरावनी तस्वीर पेश की है।  स्टडी के अनुसार 1994 से 2023 के बीच 24 ग्लेशियल झीलों का कुल क्षेत्रफल 0.97 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 1.62 वर्ग किलोमीटर हो गया. यानी तीन दशकों में करीब 67% की वृद्धि हुई. इतना ही नहीं, इस दौरान 57 नई ग्लेशियल झीलें भी बनीं. इनमें 18 झीलें ऐसी हैं जिनका क्षेत्रफल 0.01 वर्ग KM से अधिक है।  कुछ झीलों का विस्तार बेहद तेज रहा. वसुंधरा झील का क्षेत्रफल 261 प्रतिशत और बलबाला झील का 119 प्रतिशत बढ़ा. शोधकर्ताओं ने 27 ऐसी झीलों की पहचान की है जिनके आकार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. इनमें बद्रीनाथ मंदिर जैसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के ऊपर स्थित एक झील भी शामिल है।  यह स्टडी 'अलार्मिंग ट्रेंड्स: रैपिडली ग्रोइंग एंड रिसेंटली फॉर्म्ड ग्लेशियल लेक्स इन द अलकनंदा बेसिन, नॉर्दर्न इंडियन हिमालयाज' शीर्षक से ओपन जियोसाइंसेज जर्नल में प्रकाशित हुआ है. प्राग स्थित चार्ल्स यूनिवर्सिटी से जुड़ी शोधकर्ता डॉक्टर आयुषी पांडेय के नेतृत्व में यह शोध किया गया।  इसमें लैंडसेट और सेंटिनल-2 सैटेलाइटों के आंकड़ों की मदद से 74 ग्लेशियल झीलों में हुए बदलावों का एनालिसिस किया गया. नतीजे बताते हैं कि अलकनंदा बेसिन में झीलों की कुल संख्या बढ़कर 131 हो गई है।  ग्लेशियल झीलें क्यों खतरनाक हैं? ग्लेशियल झीलें पिघलते ग्लेशियरों से आने वाले पानी से बनती और बढ़ती हैं. इन्हें बर्फ, चट्टान या मलबे से बनी प्राकृतिक संरचनाएं रोककर रखती हैं. जब ये कमजोर पड़ते हैं या अचानक टूट जाते हैं तो झील में जमा भारी मात्रा में पानी तेज गति से नीचे की ओर बह निकलता है।  इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है. यह बहाव अपने साथ चट्टानें, मिट्टी और मलबा लेकर आता है. इससे सड़कें, पुल, घर, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स और अन्य बुनियादी सुविधाएं कुछ ही समय में तबाह हो सकती हैं।  नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ ने दिखाया कि हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ कितनी बड़ी तबाही ला सकती है. हालांकि वह घटना पारंपरिक GLOF नहीं थी लेकिन उसने जोखिम की गंभीरता साफ कर दी।  स्टडी में जिन झीलों का तेजी से विस्तार हुआ है वे इसलिए चिंता का विषय हैं क्योंकि उनके किनारे या रोकने वाली संरचनाएं अस्थिर हो सकती हैं. बद्रीनाथ के ऊपर स्थित झील का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नीचे तीर्थस्थल और आबादी वाले क्षेत्र हैं. किसी भी अचानक बहाव का असर दूर तक पड़ सकता है।  सैटेलाइट निगरानी की भूमिका और सीमाएं शोधकर्ताओं का कहना है कि सैटेलाइट निगरानी से खतरे वाली झीलों की पहचान में मदद मिलती है. लैंडसेट और सेंटिनल-2 जैसे सैटेलाइटों से नई झीलों का पता लगाना. उनके आकार में बदलाव ट्रैक करना. तेजी से बढ़ रही झीलों को चिन्हित करना संभव है. इससे उन झीलों की सूची बनाई जा सकती है जिनकी जमीन पर विस्तृत जांच जरूरी है. लेकिन केवल सैटेलाइट डेटा पर्याप्त नहीं है।  झील की गहराई, उसमें मौजूद पानी की मात्रा, आसपास की ढलानों की स्थिरता, संभावित बहाव का रास्ता और ग्लेशियर-झील संबंधों का स्टडी करने के लिए मैदानी जांच बेहद जरूरी है. दुर्गम हिमालयी इलाकों में यह काम चुनौतीपूर्ण है लेकिन जोखिम आकलन के लिए अपरिहार्य है।  डॉक्टर आयुषी पांडेय के अनुसार हाल की बाढ़ ने याद दिलाया कि ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में लगातार निगरानी कितनी आवश्यक है. भारी बारिश, ग्लेशियल झीलों का विस्तार, पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता और भूकंपीय गतिविधियां एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं. निचले इलाकों में खतरा और गंभीर हो सकता है।  यह समस्या केवल अलकनंदा बेसिन तक सीमित नहीं है. पर्यावरण मंत्रालय ने भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में जानकारी दी है कि हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियल झीलें बढ़ रही हैं. GBPNIHE के एक स्टडी में पश्चिमी हिमालय की 25 ग्लेशियरों और आसपास की झीलों का 1990-2015 विश्लेषण किया गया था।  उसमें भी संख्या और क्षेत्रफल में भारी वृद्धि दिखी. पॉट्सडैम यूनिवर्सिटी के स्टडी में हिमालय की करीब पांच हजार झीलों पर बाढ़ का खतरा बताया गया क्योंकि उनके किनारे कमजोर हैं. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने अप्रैल 2024 की रिपोर्ट में कहा था कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और झीलों का आकार बढ़ रहा है।   इसरो के अनुसार 2016-17 में 10 हेक्टेयर से बड़ी करीब 2431 ग्लेशियर झीलें दर्ज हुईं. इनमें से 676 झीलों के क्षेत्रफल में पिछले तीन दशकों में दोगुना इजाफा हुआ. ये आंकड़े साफ करते हैं कि समस्या क्षेत्रीय स्तर की है. तापमान वृद्धि ग्लेशियरों के पिघलने की मुख्य वजह है. इससे झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलें फैल रही हैं।  क्षेत्रीय सहयोग और भविष्य की रणनीति हिमालय कई देशों में फैला है. ग्लेशियरों का पिघलना, झीलों का बढ़ना और बाढ़ का पानी राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानता. इसलिए बदलती ग्लेशियल झीलों की निगरानी, वैज्ञानिक आंकड़ों को साझा करना और समय रहते चेतावनी व्यवस्था पूरे हिमालयी क्षेत्र की साझा जरूरत है. पर्याप्त आर्थिक और तकनीकी संसाधनों के साथ-साथ देशों के बीच मजबूत वैज्ञानिक सहयोग जरूरी है।  स्टडी सुझाव देता है कि केवल कुल बारिश या ग्लेशियर पिघलने पर ध्यान देना काफी नहीं. झीलों की तीव्रता, वितरण, गहराई और स्थिरता पर भी नजर रखनी होगी. स्थानीय समुदायों को जागरूक करना, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली लगाना और जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्माण पर नियंत्रण रखना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं. जलविद्युत परियोजनाओं और सड़कों की योजना बनाते समय इन खतरों को ध्यान में रखना होगा।  अलकनंदा बेसिन का यह स्टडी भविष्य के लिए चेतावनी है. तेजी से बदलता हिमालयी जल परिदृश्य तैयारियों की मांग करता है. सैटेलाइट और मैदानी दोनों स्तरों पर निगरानी बढ़ाकर, आंकड़े साझा करके और सहयोग मजबूत करके जोखिम को कम किया जा सकता है. पहाड़ों में जमा पानी अचानक तबाही मचा सकता है. इसलिए समय रहते कदम उठाना पूरे क्षेत्र की जिम्मेदारी है. वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और स्थानीय लोगों के संयुक्त प्रयास से ही इस चुनौती का सामना संभव है। 

सुपर अल-नीनो की दस्तक से बढ़ेगा गर्मी का कहर? रिपोर्ट ने भारत को लेकर चेताया

नई दिल्ली भारत में आने वाले महीनों में गर्मी का असर और गंभीर हो सकता है। शिकागो यूनिवर्सिटी के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच देश में सामान्य साल की तुलना में करीब 15800 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। रिपोर्ट में इसकी बड़ी वजह सुपर अल नीनो को बताया गया है। यूनिवर्सिटी की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब (CIL) की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इसके चलते तापमान में तेज बढ़ोतरी होगी। वैश्विक स्तर पर जमीन का तापमान सामान्य से 1.2 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रह सकता है। इससे लोगों को ऐसी गर्म परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा-जैसी जलवायु परिवर्तन के कारण करीब 20 साल बाद देखने का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य साल की तुलना में बेहद गर्म दिनों की संख्या 44 फीसदी अधिक हो सकती है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि दुनियाभर में जून से शुरू हुए मौजूदा अल नीनो के दौरान अब तक गर्मी से जुड़ी करीब 4.51 लाख अतिरिकत मौतें हुई हैं। इनमें से 2.39 लाख मौतें सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच के छह महीनों में होने का अनुमान है। सितंबर 2026 से मौसम को लेकर एक ऐसी चेतावनी सामने आई है, जिसका असर सिर्फ तापमान के रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रह सकता. एक नए आकलन के मुताबिक, मौजूदा El Nino के दौरान दुनिया में सामान्य वर्षों की तुलना में करीब 4.51 लाख अतिरिक्त गर्मी से जुड़ी मौतें हो सकती हैं. भारत भी उन देशों में है जहां इसका असर खास तौर पर गंभीर रहने का अनुमान है।  भारत के लिए दिसंबर से फरवरी अहम ‘क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब’ (Climate Impact Lab) के अनुमान के मुताबिक सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में करीब 15,800 अतिरिक्त हीट रिलेटेड डेथ का अनुमान है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इसका बड़ा हिस्सा दिसंबर से फरवरी के तीन महीनों में सामने आ सकता है. और खतरा यहीं खत्म नहीं होता. शोधकर्ताओं ने संकेत दिया है कि भारत और पाकिस्तान जैसे उत्तरी गोलार्ध के इलाकों में अगले साल गर्मियों के दौरान ‘तेज गर्मी के चलते होने वाली मौतें’ और बढ़ सकती हैं।  दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी आंकड़े काफी बड़े हैं. अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में करीब 66,800 अतिरिक्त मौतों का अनुमान है, जिनमें अकेले नाइजीरिया में 31,400 शामिल हैं. साउथ ईस्ट एशिया के फिलीपिंस, वियतनाम, थाईलैंड और कंबोडिया में मिलाकर करीब 19,400 और इंडोनेशिया में 19,300 अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया है. ब्राजील के लिए ये आंकड़ा 13,300 बताया गया है।  नेपाल की बाढ़ त्रासदी से तुलना शोधकर्ताओं ने इस अनुमानित मौतों की संख्या की तुलना हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ में मारे गए या लापता लोगों से की है। उनके मुताबिक, अल नीनो से जुड़ी अनुमानित मौतों की संख्या नेपाल की उस बाढ़ में मारे गए या लापता लोगों की संख्या से करीब 65 गुना ज्यादा है। आपको बता दें कि अल नीनो एक मौसमी घटना है जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पानी का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। इसका असर भारतीय मानसून पर भी पड़ता है और इससे तापमान सामान्य से ज्यादा रहने की स्थिति बन सकती है। रिपोर्ट की सह-लेखिका एमिली ग्रोवर-कोपेक ने बताया कि मौतों का यह अनुमान क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब (CIL) की उस रिसर्च पर आधारित है। इसमें तापमान और गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों के बीच संबंध का अध्ययन किया गया है। इसके लिए दुनियाभर के 24378 क्षेत्रों के अलग-अलग आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया ताकि स्थानीय जलवायु, लोगों की संवेदनशीलता और बदलते मौसम के अनुकूल ढलने की क्षमता को ध्यान में रखा जा सके। इसके बाद इन आंकड़ों को यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स (ECMWF) के मौसमी मौसम पूर्वानुमान पर लागू किया गया। इससे 1996 से 2025 के औसत की तुलना में संभावित अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया। रिपोर्ट में दिए गए अनुमान की अनिश्चितता दो मुख्य वजहों से जुड़ी है- इससे 1996 से 2025 के औसत की तुलना में संभावित अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया। रिपोर्ट में दिए गए अनुमान की अनिश्चितता दो मुख्य वजहों से जुड़ी है- 51 अलग-अलग पूर्वानुमानों वाले मॉडल समूह (ensemble) में अंतर और तापमान व मौतों के बीच संबंध को लेकर मौजूद अनिश्चितता। ग्रोवर-कोपेक रोडियम ग्रुप में क्लाइमेट एंड एनर्जी प्रैक्टिस की निदेशक भी हैं और क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के साथ कंपनी के काम का नेतृत्व करती हैं। उन्होंने कहा कि यह मॉडल सख्त वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया है और लगातार विकसित हो रहा है। जैसे-जैसे नए सबूत और आंकड़े सामने आएंगे, मॉडल को और बेहतर बनाया जा सकेगा। भारत पर कितना असर पड़ेगा? रिपोर्ट के मुताबिक, नाइजीरिया, सूडान, नाइजर और चाड के साहेल इलाकों में गर्मी का सबसे ज्यादा असर देखने को मिल सकता है। यहां करीब 66800 अतिरिक्त मौतों का अनुमान है। भारत के दुनिया के सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में चौथे स्थान पर रहने का अनुमान है। इससे आगे नाइजीरिया, इंडोनेशिया और सूडान हैं। वहीं फिलीपींस, वियतनाम, थाईलैंड और कंबोडिया में कुल मिलाकर करीब 19400 अतिरिक्त मौतें होने का अनुमान है। रिपोर्ट के लेखकों माइकल ग्रीनस्टोन, टैमा कार्लटन, जेनेवीव मैरिकल और ग्रोवर-कोपेक के मुताबिक, भारत में गर्मी से होने वाली मौतें अचानक बढ़ने के बजाय धीरे-धीरे बढ़ सकती हैं। अकेले दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में करीब 7400 अतिरिक्त मौतों का अनुमान है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में फरवरी के बाद भी गर्मी का खतरा कम होने की संभावना नहीं है। भारत और पाकिस्तान को ऐसे उत्तरी गोलार्ध के देशों के तौर पर चिन्हित किया गया है जहां गर्मियों के दौरान गर्मी से होने वाली मौतों का आंकड़ा और बढ़ सकता है। भारत में सर्दियों के दौरान गर्मी से होने वाली मौतों के अनुमान को लेकर ग्रोवर-कोपेक ने कहा कि उत्तर भारत में सर्दियां आमतौर पर इतनी ठंडी होती हैं कि वहां गर्मी से मौतें कम होती हैं। इसलिए सर्दियों में सामान्य से थोड़ा ज्यादा तापमान होने पर भी मौतों के आंकड़े में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आता। वहीं दक्षिण भारत की स्थिति अलग है। वहां सर्दियों में भी तापमान इतना ज्यादा रहता है कि गर्मी से मौतें हो सकती हैं। ऐसे में सामान्य से ज्यादा तापमान … Read more

Israel Cockroach Drone: रोबोटिक कीड़ों की फौज बनाने की तैयारी, AI और ड्रोन स्वॉर्म पर रिसर्च

तेल अवीव  भविष्य में लड़ी जाने वाली लड़ाइयों में जीत उसी की होगी जो टेक्नोलॉजी का अत्यधिक इस्तेमाल करे। शायद फायटर जेट या भारी भरकम हथियार जंग का रूख ना बदलें और छोटे छोटे हथियार दुश्मन के खेमे में तबाही मचा दे। नये युद्ध की शुरूआत ऐसी छोटी मशीनों से हो सकती है जो देखने में कीड़ों जैसी लगती हैं। इजरायल की बायो-इंस्पायर्ड रोबोटिक्स, माइक्रो-ड्रोन, ऑटोनॉमस सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में बढ़ती दिलचस्पी एक ऐसे युद्धक्षेत्र की ओर इशारा करती है जहां जानकारी जुटाने का काम सिर्फ ऊपर उड़ने वाले विमानों तक ही सीमित नहीं रहेगा। भविष्य के मिलिट्री ऑपरेशन में ऐसी छोटी मशीनें शामिल हो सकती हैं जो तंग जगहों से उड़ सकती हैं, मलबे पर रेंग सकती हैं, सुरंगों में जा सकती हैं और ऐसी जगहों पर काम कर सकती हैं जहां आम मशीनें नहीं पहुंच सकतीं। 'कॉकरोच ड्रोन' का आइडिया भले ही काल्पनिक लगे लेकिन कॉकरोच जैसे रोबोट पर सैन्य रिसर्च शुरू हो चुका है। ये रिसर्च मिलिट्री रिसर्च के एक बहुत बड़े इकोसिस्टम का हिस्सा है जिसमें इजराइल का रक्षा मंत्रालय, अमेरिकी यूनिवर्सिटीज और रक्षा-तकनीक संस्थान शामिल हैं। इजरायल कर रहा है कॉकरोच ड्रोन बनाने की कोशिश 2009 से अब तक इजरायली रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर कम से कम 30 अमेरिकी विश्वविद्यालयों के साथ कम से कम 70 रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू किया गया है। इन प्रोजेक्ट्स में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन झुंड जैसी चीजें शामिल हैं। मिसाइल गाइडेंस, क्वांटम सेंसिंग, ऑटोनॉमस सिस्टम और बायो-इंस्पायर्ड रोबोटिक्स। सबसे दिलचस्प क्षेत्रों में से एक है कीड़ों से प्रेरित रोबोटिक सिस्टम का विकास। कॉकरोच का आकर्षण उसके रूप-रंग में नहीं बल्कि उसकी बायोलॉजी में है। कॉकरोच बहुत तंग जगहों से निकल सकते हैं, ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चल सकते हैं और ऐसे माहौल में भी काम करते रह सकते हैं जो पारंपरिक रोबोटिक सिस्टम के लिए मुश्किल साबित हो सकते हैं। इजरायल कर रहा है 'माइक्रो-ड्रोन स्वार्म' पर काम यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के रिसर्चर्स ने इजरायली रक्षा मंत्रालय के एक वैज्ञानिक के साथ मिलकर इंचवर्म यानि एक तरह का कीड़ा से प्रेरित रेंगने वाले रोबोट पर भी काम किया है। इनके इस्तेमाल के कई और तरीके हो सकते हैं जो सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं हैं। ऐसे रोबोट का इस्तेमाल जासूसी, आपदा के समय मदद, खोज और बचाव, सुरंगों की जांच और गिरी हुई इमारतों के निरीक्षण के लिए किया जा सकता है। लेकिन शहरी इलाकों में होने वाली लड़ाई में इनकी सैन्य अहमियत बहुत बढ़ जाएगी क्योंकि वहां इमारतें, जमीन के नीचे बने रास्ते, गुफाएं और मलबे ऐसे हालात पैदा करते हैं जिनमें आम गाड़ियां और बड़े ड्रोन ज्यादा काम नहीं आते। इजरायल के लिए ये अहम इसलिए भी होंगे क्योंकि हमास ने गाजा में सुरंगों का जो नेटवर्क तैयार कर रखा है उसे भेदना अत्यंत मुश्किल है। इजरायल के कॉकरोच ड्रोन युद्ध का मैदान बदल देंगे? यानि असली इनोवेशन ऐसा रोबोट नहीं है जो कॉकरोच जैसा दिखता हो। बल्कि यह युद्ध की एक नई सोच है जिसमें छोटा आकार, ऑटोनॉमी, नेटवर्किंग, कम लागत और संख्या उतनी ही जरूरी हो जाती है जितनी रफ्तार, रेंज और पेलोड। पारंपरिक ड्रोन ने युद्ध का तरीका बदल दिया था इसने सेनाओं को दुश्मन के इलाके के ऊपर सीधे पायलट भेजे बिना निगरानी करने और हमला करने की क्षमता दी है। माइक्रो-ड्रोन इस बदलाव को ऐसी जगहों तक ले जा सकते हैं जहाँ पारंपरिक ड्रोन काम नहीं कर सकते।     एर्दोगन की वीटो पावर खत्म करने की मांग खारिज, UNSC सुधार पर रूस का बड़ा बयान, भारत को करता है समर्थन     तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और वीटो की व्यवस्था खत्म करने की मांग की है। एर्दोगन की इस मांग को रूस से झटका मिला है। क्रेमलिन UNSC में सुधारों पर बड़ा बयान दिया है।

एनएमडीसी द्वारा सरकारी विद्यालयों के विद्याथियों के लिए हिंदी निबंध लेखन एवं हिंदी वाक् प्रतियोगिताओं का आयोजन

हैदराबाद एनएमडीसी लिमिटेड, हैदराबाद में दिनांक 14 सितंबर, 2026 से 13 अक्‍तूबर, 2026 तक मनाए जा रहे ‘राजभाषा माह, 2026’ के अवसर पर विभिन्‍न प्रतियोगिताओं एवं कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इसी के अंतर्गत विद्यार्थियों में राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार व महत्‍व के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्‍य को ध्‍यान में रखकर एनएमडीसी द्वारा आज दिनांक 24 सितंबर, 2026 को (1) नामपल्‍ली व्‍यायाम शाला उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय,  (2) हनुमान व्‍यायाम शाला उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय, (3) तेलंगाना मॉइनारिटी गुरूकुल आसिफ नगर बालक विद्यालय एवं (4) इंडो ग्रामर उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय तथा (5) शंकरजी मेमोरियल कन्‍या उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय आदि पाँच विद्यालयों के छात्र-छात्राओं के लिए “हिंदी निबंध लेखन एवं हिंदी वाक् प्रतियोगिताओं” का आयोजन किया गया। दोनों प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने बड़ी संख्‍या में भाग लिया।   हिंदी निबंध लेखन प्रतियोगिता (1) जलवायु परिवर्तन: भावी पीढ़ियों पर प्रभाव, (2) छात्रों के समग्र विकास में खेलकूद की भूमिका एवं (3) समय प्रबंधन: सफलता की कुंजी आदि विषयों पर कक्षा 6वीं से 8वीं के विद्यार्थियों के लिए आयोजित की गई तथा हिंदी वाक् प्रतियोगिता (1) वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में युवा पीढ़ी की भूमिका एवं (2) कृत्रिम बुद्धिमत्ता: रोजगार पर प्रभाव आदि विषयों पर कक्षा 9वीं से 12वीं के विद्यार्थियों के लिए आयोजित की गई। इस अवसर पर निर्णायक के रूप में श्री जयशंकर प्रसाद, सहायक निदेशक (सेवानिवृत्‍त), हिंदी शिक्षण योजना एवं श्रीमती नीलिभा तिवारी, सहायक निदेशक (सेवानिवृत्‍त), हिंदी शिक्षण योजना उपस्थित थे। प्रतियोगिता के प्रारंभ में श्री चे. श्रीनिवास राव, उप महाप्रबंधक (राजभाषा),  एनएमडीसी ने  निर्णायक गण, विद्यालय समिति के प्रतिनिधि, प्राचार्य एवं अन्‍य शिक्षकगण तथा प्रतिभागी विद्यार्थियों का स्‍वागत किया तथा विद्यार्थियों को शुभकामनाएं दीं। उन्‍होंने बताया कि इन प्रतियोगिताओें के आयोजन का उद्देश्‍य सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों में हिंदी में लेखन प्रतिभा को निखारना तथा राजभाषा हिंदी बोलने में होने वाली झिझक को दूर करना है। डॉ. रजिंदर कौर, वरिष्‍ठ प्रबंधक (रा.भा.) ने प्रतियोगिताओं के संबंध में संक्षिप्‍त जानकारी दी। प्रतियोगिता के आयोजन में श्री एस.के. सनोडिया, उप प्रबंधक (सचि.) की सक्रिय भागीदारी रही। इस अवसर पर नामपल्‍ली व्‍यायाम शाला उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय के मानद अध्‍यक्ष श्री बी. दुर्गा प्रसाद और विद्यालय समिति के सदस्‍य, प्राचार्य और विभिन्‍न विद्यालयों के शिक्षकों ने उपस्थित होकर प्रतिभागियों का उत्‍साहवर्धन किया। प्रतियोगिताओं के पश्‍चात विद्यार्थियों को एनएमडीसी लि‍मिटेड, हैदराबाद की ओर से  शिक्षण सामग्री से संबंधित किट भी प्रदान की गई। धन्‍यवाद ज्ञापन के साथ दोनों प्रतियोगिताएं सम्‍पन्‍न हुई।      (चे. श्रीनिवास राव)              उप महाप्रबंधक (राजभाषा)

तुर्की में भूकंप से कांपी धरती, 5.8 तीव्रता के झटकों से दियारबाकिर समेत कई शहर हिले

अदियामान  तुर्की में गुरुवार को भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए. शुरुआती अनुमान के मुताबिक भूकंप की तीव्रता 5.8 थी. दियारबाकिर, अदियामान और सानलिउर्फा समेत आसपास के कई प्रांतों में लोगों ने झटके महसूस किए. शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक दियारबाकिर में भूकंप का असर ज्यादा महसूस हुआ।  शुरुआती रिपोर्टों में भूकंप की तीव्रता 5.5 बताई गई थी, जिसे बाद में 5.8 बताया गया. फिलहाल भूकंप से हुए नुकसान या किसी के हताहत होने की जानकारी सामने नहीं आई है. भूकंप से जुड़ी ज्यादा जानकारी का इंतजार किया जा रहा है।  एजेंसी के मुताबिक इसके झटके शानलिउर्फा के साथ अदियामान, मालट्या, दियारबाकिर और गाजियांटेप में भी महसूस किए गए. AFAD ने कहा कि फिलहाल किसी तरह की नकारात्मक स्थिति की जानकारी नहीं है और प्रभावित इलाकों में फील्ड स्कैनिंग जारी है।  अधिकारियों के मुताबिक फिलहाल किसी के मारे जाने या घायल होने की जानकारी सामने नहीं आई है. प्रशासन की टीमें अलग-अलग इलाकों में जाकर हालात का जायजा ले रही हैं. भूकंप के बाद किसी बड़े नुकसान की जानकारी सामने आती है या नहीं, इसे लेकर निगरानी जारी है।  संवेदनशील इलाकों में से एक पूर्वी तुर्किए दुनिया के सबसे ज्यादा भूकंप-संवेदनशील इलाकों में से एक है। यहां से ईस्ट एनाटोलियन फॉल्ट गुजरती है और यह एनाटोलियन, अरेबियन और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों की सीमा के पास स्थित है। विनाशकारी भूकंपों का इतिहास इस इलाके में विनाशकारी भूकंपों का लंबा इतिहास रहा है। इनमें सबसे प्रमुख फरवरी 2023 में कहरामनमारस प्रांत में आया भूकंप था, जिसमें अकेले तुर्किए में 53,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और यह सदी के सबसे घातक भूकंपों में से एक माना जाता है।

वाइट हाउस में मीडिया बैन पर कोर्ट का फैसला, जज ने चैनलों के दरवाजे खोले

वाशिंगटन  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीएनएन, एमएस नाउ और पॉलिटिको जैसे मीडिया घरानों के पत्रकारों का राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास वाइट हाउस में प्रवेश से वर्जित कर दिया था। उन्होंने इन मीडिया हाउस पर झूठी खबरें प्रकाशित करने का आरोप लगाया था। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ इन मीडिया संस्थानों ने कोर्ट का रुख किया था। कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश पर रोक लगाते हुए यह बैन हटा दिया है। आपको बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ सीएनएन, एमएस नाउ और पोलिटिको ने बीते सोमवार को मुकदमा दायर किया था। इन मीडाय संस्थानों ने आरोप लगाया कि चुनिंदा तरीके से यह प्रतिबंध लगाया जाना कानून का स्पष्ट उल्लंघन है। इन समाचार संस्थानों ने अपनी याचिका में कहा कि संविधान राष्ट्रपति या किसी अन्य सरकारी अधिकारी को यह अधिकार नहीं देता कि वह केवल खबरें पसंद नहीं आने पर बिना बैन कर दे। उन्होंने कहा कि किसी सूचना या प्रक्रिया का पालन किए बिना प्रेस के प्रथम संशोधन से जुड़े अधिकारों, स्वतंत्रता और संपत्ति संबंधी हितों से वंचित करना गलत है। अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज टिम केली ने वाइट हाउस में इन मीडिया संस्थानों पर लगे बैन को गलत बताते हुए इसे हटा दिया। आपको बता दें कि अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट के वकीलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर इस प्रतिबंध को सही ठहराने की कोशिश की थी। CNN की पत्रकार को देख UN में भड़के ट्रंप संयुक्त राष्ट्र महासभा में डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को सीएनएन की प्रतिष्ठित पत्रकार कैटलिन कॉलिन्स पर निशाना साधा और उनसे कहा, ''आपको यहां नहीं होना चाहिए।'' ट्रंप मंगलवार को महासभा में अपने संबोधन से पहले संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचे और कॉलिन्स से कहा, ''मुझे हैरानी है कि सीएनएन यहां मेरी कवरेज कर रहा है। आपको यहां मेरी कवरेज के लिए नहीं होना चाहिए। आपने कहा था कि आप मेरी कवरेज नहीं करेंगे।'' हालांकि, कॉलिन्स ने बाद में प्रसारण में कहा कि सीएनएन ने ऐसा कभी नहीं कहा।

बुलेट ट्रेन की तैयारी पूरी, अगले साल पटरियों पर दौड़ने की रेलवे ने दी पुष्टि

अहमदाबाद देश की पहली बुलेट ट्रेन (India's First Bullet Train) को चलाने की तैयारियां जोर-शोर पर चल रही है. हाई स्पीड रेल ट्रैक से लेकर स्टेशनों, ब्रिज और सुरंगों का काम युद्धस्तर पर जारी है. बुलेट ट्रेन जब फुल स्पीड में होगी, तो 320 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ेगी और अगले साल यानी 2027 से इसकी शुरुआत होने वाली है. रेलवे मिनिस्ट्री की ओर से इसे कन्फर्म कर दिया गया है।  Railway Ministry की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर (अब X) पर वीडियो शेयर किया गया है, जो तेजी से वायरल हो रहा है. इस वीडियो के कैप्शन में मिनिस्ट्री की ओर से लिखा गया है, 'बुलेट ट्रेन अगले साल पटरियों पर दौड़ने के लिए तैयार!' इसमें रेलवे की ओर से बुलेट ट्रेन ट्रैक से लेकर स्टेशनों तक पर जारी काम की झलक दिखाई गई है।  वायरल वीडियो में क्या-क्या?  बात करें रेलवे मिनिस्ट्री की ओर से Social Media पर शेयर किए वीडियो की, तो इसमें भारतीय रेलवे द्वारा Bullet Train Project में किए जा रहे कामों की झलक देखने को मिल रही थी. सूरत-वापी ट्रैक पर रेलवे ब्रिज, स्टेशन, सुरंगों में काम करते हुए रेलवे के कर्मचारी नजर आ रहे हैं, जो इस बात को साफ कर रहे हैं, कि अगले साल 2027 में बुलेट ट्रेन को पटरियों पर दौड़ाने के लिए किस स्तर पर काम पूरा किया जा रहा है।   सूरत-वापी बुलेट ट्रेन सेक्शन कितना लंबा? भारत की पहली बुलेट ट्रेन अगले साल संभावित 15 अगस्त 2027 (First Bullet Train From 15t August 2027) से ट्रैक पर तेज रफ्तार से दौड़ती हुई नजर आएगी. रेलवे मिनिस्ट्री की ओर से किए गए एक्स पोस्ट से पहले रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव भी इसके संकेत दे चुके हैं. बता दें कि देश की अपनी पहली Bullet Train के पहले चरण की शुरुआत 508 किलोमीटर लंबे मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर पर होगी. इसका 348 किलोमीटर का हिस्सा गुजरात में आता है और जिस वापी-सूरत सेक्शन का वीडियो रेलवे मिनिस्ट्री ने शेयर किया है, वो करीब 100 किलोमीटर का है।     2 घंटे में मुंबई से अहमदाबाद, 12 स्टॉपेज बुलेट ट्रेन जब फुल स्पीड में होगी, तो 320 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलेगी, जबकि अहमदाबाद से मुंबई के बीच औसतन 300 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से बुलेट ट्रेन अगले साल से दौड़ेगी. इस हिसाब से देखें, तो अभी तक सबसे हाई स्पीड ट्रेनों के जरिये मुंबई से अहमदाबाद का सफर करीब 6 घंटे में पूरा होता है, लेकिन बुलेट ट्रेन के जरिए ये महज 2 घंटे के आसपास में पूरा होगा।  अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन कॉरिडोर में रेलवे की ओर से बुलेट ट्रेन के 12 स्टॉपेज तय किए गए हैं. पहला Bullet Train स्टेशन साबरमती रखा गया है, तो वहीं आखिरी मुंबई है. इनमें साबरमती-मुंबई (BKC) के अलावा ठाणे, विरार, बोइसर, वापी, बिलिमोरा, सूरत, भरूच, वडोदरा, आनंद, अहमदाबाद शामिल हैं। 

भारत पर 100% टैरिफ को लेकर जेपी मॉर्गन CEO ने US को चेताया, सप्लाई चेन पर असर का डर

मुंबई अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़े कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. इस कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी प्रशासन को मिला है. भारत और चीन भी इसकी जद में आ सकते हैं. इसी बीच जेपी मॉर्गन के CEO जेमी डिमोन ने अमेरिका से भारत को लेकर सावधानी बरतने की अपील की है।  मुंबई में जेपी मॉर्गन इंडिया इन्वेस्टर कॉन्फ्रेंस के दौरान बातचीत में डिमोन ने कहा कि अमेरिका को पहले यह समझना चाहिए कि भारतीय रिफाइनरियां रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल किस तरह करती हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले लेने से पहले भारत और दुनिया के ऑयल मार्केट पर पड़ने वाले असर को समझना जरूरी है।  डिमोन बोले- तेल पर टैरिफ लगाना सही तरीका नहीं जेमी डिमोन ने रूसी तेल पर टैरिफ लगाने के तरीके पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि तेल पर किसी तरह का टैरिफ लगाया जाना चाहिए. उनके मुताबिक, रूस पर दबाव बनाने के लिए उठाए जा रहे कदमों के बीच अमेरिका को यह देखना चाहिए कि कहीं इसका नुकसान भारत और दुनिया के ऑयल मार्केट को तो नहीं हो रहा।  डिमोन ने कहा कि अगर भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा तो उसे कहीं और से तेल खरीदना पड़ेगा. लेकिन हर तरह का कच्चा तेल एक जैसा नहीं होता. अलग-अलग रिफाइनरियां खास तरह के क्रूड को प्रोसेस करने के हिसाब से डिजाइन की जाती हैं. ऐसे में रूसी तेल की जगह किसी दूसरे देश से आने वाला क्रूड हर रिफाइनरी के लिए सही हो, यह जरूरी नहीं है।  भारत के लिए रूसी तेल बदलना आसान नहीं भारत दुनिया के बड़े क्रूड ऑयल इंपोर्टर्स में शामिल है और रूसी तेल उसकी सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा है. डिमोन के मुताबिक, रूसी सप्लाई में किसी तरह की रुकावट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगी. इससे इंटरनेशनल ऑयल मार्केट में सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतें बढ़ने का दबाव बन सकता है।  डिमोन ने कहा कि अमेरिका को यूक्रेन की मदद के लिए और कदम उठाने चाहिए, लेकिन रूस के ऊर्जा कारोबार पर कार्रवाई करते समय इसके व्यापक असर को भी ध्यान में रखना चाहिए. उन्होंने अमेरिका और भारत के बीच इस मुद्दे पर बातचीत की जरूरत पर भी जोर दिया।  भारत बोला- लोगों की एनर्जी सिक्योरिटी सबसे पहले भारत ने रूसी तेल खरीद को अपनी एनर्जी सिक्योरिटी से जोड़कर इसका बचाव किया है. अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कहा है कि भारत की एनर्जी पॉलिसी 'पीपल फर्स्ट' के नजरिए पर आधारित है. उन्होंने कहा कि भारत के फैसले तेल की उपलब्धता, कीमत, बाजार की हालत और कारोबारी व्यवहार्यता को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।  भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में ग्लोबल ऑयल मार्केट में कीमत और सप्लाई में बदलाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।  अगस्त में 16.5 फीसदी घटा रूसी तेल आयात रॉयटर्स के टैंकर डेटा के मुताबिक, भारत ने अगस्त में करीब 21 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी कच्चा तेल आयात किया. यह जुलाई के मुकाबले 16.5 फीसदी कम था. अगस्त में भारत के कुल क्रूड इंपोर्ट में रूसी तेल की हिस्सेदारी करीब 47 फीसदी रही।  भारत ने अगस्त में कुल करीब 44.4 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया, जो जुलाई से करीब 8.8 फीसदी कम था. ऐसे में रूसी तेल पर संभावित अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा अब भारत-अमेरिका आर्थिक रिश्तों के लिए भी अहम हो गया है।  डिमोन ने दोनों देशों से रुके हुए ट्रेड एग्रीमेंट को पूरा करने के लिए बातचीत जारी रखने की अपील की. उन्होंने कहा कि कारोबार के लिए स्थिरता और नियमों में भरोसा बेहद जरूरी है।   

बैंक ग्राहकों के लिए जरूरी खबर, इस रविवार भी खुले रहेंगे बैंक

नई दिल्ली वैसे तो रविवार को साप्ताहिक अवकाश की वजह से बैंक बंद रहते हैं लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। दरअसल, 28 से 30 सितंबर तक प्रस्तावित तीन दिन की देशव्यापी हड़ताल से पहले रविवार को बैंक खुले रहेंगे। सरकार ने बैंकिंग सेवाओं में रुकावट को कम करने के लिए यह कदम उठाया है। इसके तहत, सभी सरकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रविवार, 27 सितंबर को खुले रहेंगे और सामान्य रूप से काम करेंगे। वित्त मंत्रालय का बयान वित्त मंत्रालय ने 23 सितंबर को एक बयान में कहा कि यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) की प्रस्तावित हड़ताल 26 और 27 सितंबर के वीकेंड के बाद हो रही है, जिससे ग्राहकों को लंबे समय तक परेशानी हो सकती थी। इसी को ध्यान में रखकर फैसला लिय गया है। मंत्रालय ने बयान में कहा, " आम लोगों की बैंकिंग से जुड़ी जरूरी जरूरतें लंबे समय तक प्रभावित न हों इसलिए सभी सरकारी और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रविवार, 27 सितंबर, 2026 को सामान्य रूप से काम करेंगे।" UFBU और सरकार के बीच नहीं हुई सुलह बीते मंगलवार को यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस और सरकार के बीच बैठक हुई थी लेकिन पॉजिटिव नतीजे नहीं आए। मंगलवार को उप-मुख्य श्रम आयुक्त के सामने हुई सुलह बैठक के बाद यूएफबीयू ने एक बयान में कहा, ''वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस), इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) और बैंक प्रबंधन की हड़ताल टालने की अपील का जवाब देते हुए, हमने उन्हें बताया कि अगर पांच-दिन के कामकाज की हमारी मांग को लागू करने की दिशा में कोई ठोस और सकारात्मक प्रगति होती है, तो यूएफबीयू उस पर विचार करेगा।'' बयान में कहा गया कि ऐसा न होने पर यह संगठन 28, 29 और 30 सितंबर को प्रस्तावित हड़ताल पर आगे बढ़ने के लिए मजबूर होगा। UFBU की बात करें तो यह यूनियन बैंकिंग कर्मचारियों के 90 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है। यह 5-दिन की बैंकिंग सेवा के साथ कई अन्य मांग भी कर रहा है। इस बीच, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, केनरा बैंक, यूनियन बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और दूसरे सार्वजनिक बैंकों ने अपने-अपने कर्मचारियों से हड़ताल से दूर रहने की अपील की है। वहीं, ग्राहकों के लिए सोशल मीडिया या मैसेज और मेल के माध्यम से एडवाइजरी जारी की गई है। इसमें कहा गया है कि हड़ताल की आशंका के मद्देनजर ग्राहकों को अपने कामकाज उससे पहले ही निपटा लेने चाहिए। साथ ही, उन्हें एटीएम, यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग और इंटरनेट बैंकिंग के इस्तेमाल के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है। 11 सितंबर को भी थी हड़ताल इससे पहले 11 सितंबर को इन्हीं मांगों को लेकर यूएफबीयू के बैनर तले 7 संगठनों ने एक दिन की हड़ताल की थी। हड़ताल की वजह से सरकारी बैंकों में कामकाज पूरी तरह ठप हो गया था जबकि निजी बैंकों में कम असर देखने को मिला था। निजी बैंकों के कर्मचारियों में कर्मचारी संघों के सदस्यों की संख्या कम होने के कारण उन पर हड़ताल का प्रभाव कम दिखा। यूएफबीयू संगठन में एआईबीईए (अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ), एआईबीओसी (अखिल भारतीय बैंक अधिकारी परिसंघ), एनसीबीई (राष्ट्रीय बैंक कर्मचारी परिसंघ), एआईबीओए (अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ), बीईएफआई (भारतीय बैंक कर्मचारी महासंघ), आईएनबीईएफ (भारतीय राष्ट्रीय बैंक कर्मचारी महासंघ) और आईएनबीओसी (भारतीय राष्ट्रीय बैंक अधिकारी कांग्रेस) शामिल हैं।