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World Bank Report: भारत पर जताया भरोसा, कहा- वैश्विक चुनौतियों के बीच सबसे मजबूत इकोनॉमी

 नई दिल्ली अमेरिका-ईरान युद्ध से गहराया मिडिल ईस्ट संकट हो या फिर कोई और ग्लोबल टेंशन, तमाम चुनौतियों के बाद भी भारत रुकने वाला नहीं है. विश्व बैंक ने भी इंडियन इकोनॉमी का लोहा माना है और अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इन सबके बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ती हुई अर्थव्यस्थाओं में बना रहेगा. वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की विकास दर (India Growth Rate) 6.6% होने की उम्मीद जताई गई है।  इस रफ्तार से भागेगी इकोनॉमी World Bank ने गुरुवार को जारी अपनी वैश्विक आर्थिक संभावनाओं पर रिपोर्ट में ये बड़ी बात कही है. विश्व बैंक ने कहा कि भारत वित्त वर्ष 2026-27 में 6.6 फीसदी की दर से ग्रोथ करते हुए दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा. बीते साल इसकी रफ्तार 7.7 फीसदी रही थी, हालांकि ताजा अनुमान इससे काफी कम है।  ग्रोथ में बीते साल के मुकाबले कमी आने के पीछे विश्व बैंक ने कारण बताते हुए कहा है कि मिडिल ईस्ट युद्ध से ऊर्जा की कीमतों आए उछाल और अन्य इनपुट लागतों के कारण निजी डिमांड में वृद्धि धीमी पड़ सकती है और इसका असर ग्रोथ रेट पर देखने को मिल सकता है।  गिरावट के बाद उछाल की उम्मीद विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि वस्तु एवं सेवा कर यानी GST रेट कट से उपभोक्ता मांग को कुछ हद तक समर्थन मिलना चाहिए. इसके साथ ही भारतीय अर्थव्वस्था की रफ्तार को लेकर वर्ल्ड बैंक ने आगे कहा कि 2026-27 में ग्रोथ में गिरावट के बाद अगले वित्त वर्ष 2027-28 में इकोनॉमिक ग्रोथ रेट 7.2 फीसदी होने की उम्मीद है. मतलब भारत रुकने वाला नहीं है. घरेलू डिमांड में मजबूती और निर्यात वृद्धि में तेजी के चलते अगले दो वित्तीय वर्षों में विकास दर में फिर से उछाल आने की उम्मीद है।  युद्ध भी नहीं रोक पाया डिमांड विश्व बैंक के मुताबिक, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष से बढ़ती ग्लोबल अनिश्चितता के बावजूद, इस वर्ष 2026 की शुरुआत में भारत में आर्थिक गतिविधि मजबूत बनी रही, जिसे लचीली घरेलू मांग का सपोर्ट मिला था. इसमें कहा गया है कि प्राइवेट कंजंप्शन, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत रहा है, जबकि शहरी डिमांड में भी तेज सुधार देखने को मिल रहा है।  घरेलू बिक्री से टैक्स कलेक्शन भी लगातार बढ़ा है. इसके बीच ऊर्जा की बढ़ती लागत के साथ-साथ कृषि उत्पादों, उर्वरकों की कमी से पैदा हुए दबाव को कम करने के लिए, भारत में फ्यूल टैक्ट कट समेत कई बड़े कदम भी उठाए हैं. इसके साथ ही विश्व बैंक ने कहा है कि अमेरिकी टैरिफ में कटौती, तमाम देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTAs) से मिडिल ईस्ट संघर्ष के कारण कमजोर बाहरी डिमांड को कम करने में मदद मिली है।  दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा भारत मीडिया से बातचीत में वर्ल्ड बैंक के डिप्टी चीफ इकोनॉमिस्ट आयहान कोसे ने कहा कि इस दौरान भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा। भारत के आर्थिक प्रदर्शन और मध्य पूर्व संकट के असर के बारे में आईएएनएस के सवाल का जवाब देते हुए, कोसे ने कहा कि बेहतर अनुमान घरेलू मांग में "उम्मीद से अधिक मजबूत गति" को दिखाता है, जो अब तक मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष के बुरे असर की भरपाई से कहीं ज्यादा है। क्षेत्रीय विकास दर 7 प्रतिशत से घटकर 6.3 प्रतिशत होने की उम्मीद  वर्ल्ड बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र बना रहेगा। हालांकि, एनर्जी की ज्यादा कीमतों और संघर्ष के व्यापक असर के कारण 2025 में क्षेत्रीय विकास दर 7 प्रतिशत से घटकर 6.3 प्रतिशत होने की उम्मीद है। कोस ने कहा कि अनिश्चित वैश्विक माहौल के बावजूद भारत के आर्थिक आधार मजबूत बने हुए हैं। उन्होंने कहा, "भारत ने जरूरी नीतिगत उपाय लागू किए हैं। जब हम भारत की बड़ी तस्वीर को देखते हैं, तो उसमें अभी भी जबरदस्त गति दिखाई देती है।" वर्ल्ड बैंक ने दी चेतावनी वर्ल्ड बैंक ने चेतावनी दी कि मध्य पूर्व में संघर्ष के कारण 2026 में वैश्विक विकास दर 2025 के 2.9 प्रतिशत से घटकर 2.5 प्रतिशत होने की उम्मीद है, जो कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से सबसे धीमी गति होगी। तेल की ज्यादा कीमतें बढ़ती महंगाई और कड़े वित्तीय हालात का असर दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने की उम्मीद है। इसके बावजूद, भारत उन कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था जिनकी रेटिंग में सुधार हुआ। कोस ने कहा कि बेहतर आउटलुक की वजह घरेलू मांग और एक्सपोर्ट में आई तेजी थी। उन्होंने कहा, "घरेलू मांग और एक्सपोर्ट में तेजी की वजह से उम्मीद से अधिक ग्रोथ हुई," और इसी वजह से अनुमान को बढ़ाया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के लगातार विस्तार की वजह से दक्षिण एशिया दुनिया भर में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला क्षेत्र बना रहेगा। इस साल सुस्ती के बाद, 2027 में क्षेत्रीय ग्रोथ के 6.9 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। 2028 में भारत की ग्रोथ 7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। भारत-China को छोड़ बाकी का बुरा हाल विश्व बैंक का कहना है कि चीन और भारत को छोड़कर, विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति आय की धीमी रह सकती है. साउथ एशिया में विकास दर 2026 में घटकर 6.3 फीसदी रहने की उम्मीद है, जो मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट युद्ध के निगेटिव प्रभाव को दर्शाती है. इसमें एनर्जी कॉस्ट में तेजी, तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई में कमी और पर्यटन  सेक्टर में व्यवधान शामिल हैं। 

PM मोदी का नया सियासी वार! कांग्रेस ग्रोथ रेट का जिक्र कर विपक्ष पर साधा निशाना

नई दिल्ली एनडीए की मीटिंग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर बड़ा हमला बोला. पीएम मोदी ने कहा कि जिस धीमी विकास दर को दशकों तक ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ कहा गया, उसे वास्तव में ‘कांग्रेस ग्रोथ रेट’ कहा जाना चाहिए था, क्योंकि उस दौर की नीतियों, शासन शैली और आर्थिक फैसलों के लिए कांग्रेस जिम्मेदार थी, न कि देश की संस्कृति या बहुसंख्यक समाज. पीएम मोदी ने जो बातें कहीं हैं, वो कांग्रेस के ल‍िए मुसीबत के बीज की तरह हैं. क्‍योंक‍ि बीजेपी अब इस शब्‍द को लोगों के बीच ले जाएगी, उन्‍हें बताएगी क‍ि कांग्रेस राज में क‍िस तरह ह‍िन्‍दुओं के माथे पर कलंक मढ़ा गया।  पीएम मोदी ने कहा, NDA के 12 वर्षों की एक बड़ी सफलता ये भी है कि देश कांग्रेस के कुचक्र से आजाद हुआ है. कांग्रेस ने देश को लाचारगी, बेचारगी और हीन भावना के गर्त में गिरा दिया था. देश को यही एहसास कराया जाता था कि भारत में विकास धीरे-धीरे ही होता है, भारत में तेज विकास संभव ही नहीं है और बड़ी ही चतुराई से धीमी विकास को एक नाम दिया था, ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ यानी कार्यशैली कांग्रेस की, दायित्व कांग्रेस का, विफलता कांग्रेस की लेकिन कलंक देश की बड़ी हिंदू आबादी के नाम लगाया गया. जबकि असल में इस कुसंस्कृति का नाम होना चाहिए था कांग्रेस ग्रोथ रेट।  ‘कांग्रेस ग्रोथ रेट’ और ‘NDA ग्रोथ रेट’ का अंतर समझाया पीएम मोदी ने कहा- सवाल ये है कि अगर 12 साल में इतना कुछ हो सकता है तो फिर दशकों तक क्यों नहीं हुआ? ये ‘कांग्रेस ग्रोथ रेट’ और ‘NDA ग्रोथ रेट’ का अंतर है. एक व्यवस्था लोगों को इंतजार कराती थी. आज की व्यवस्था परिणाम दिखाती है. एक व्यवस्था काम अटकाती-भटकाती थी. आज की व्यवस्था कहती है, काम अभी होगा, समय पर होगा और बड़े पैमाने पर होगा. इसलिए 2014 से 2026 की कहानी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, ये उस भारत की कहानी है, जिसने पहली बार अपनी पूरी क्षमता के साथ दौड़ना तय किया है।  कहां से आया ये शब्‍द ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ शब्द मुख्य रूप से 1950 से 1980 के दशक के बीच भारत की औसत आर्थिक विकास दर के लिए इस्तेमाल किया गया था. उस दौर में भारत की जीडीपी वृद्धि दर करीब 3 से 3.5 प्रतिशत के आसपास रहती थी. जबकि आबादी तेजी से बढ़ रही थी. नतीजा यह हुआ कि प्रति व्यक्ति आय में बहुत सीमित बढ़ोतरी हुई. कहते हैं क‍ि इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले भारतीय अर्थशास्त्री राज कृष्‍णा ने किया था. उनका मकसद धीमी आर्थिक वृद्धि को व्यंग्यात्मक ढंग से बताना था. बाद में नेताओं ने इसका इस्‍तेमाल करना शुरू कर द‍िया, ज‍िसका ज‍िक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क‍िया।  पीएम मोदी ने इसे ‘कांग्रेस ग्रोथ रेट’ क्यों कहा? प्रधानमंत्री मोदी का तर्क है कि धीमी विकास दर के लिए भारत की सभ्यता, संस्कृति या समाज को जिम्मेदार ठहराना गलत था. उनके मुताबिक उस समय देश में जिस तरह की आर्थिक नीतियां लागू थीं, वे कांग्रेस सरकारों द्वारा बनाई गई थीं. स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारत में लाइसेंस-परमिट राज, सरकारी नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था और सीमित निजी निवेश का मॉडल लागू रहा. उद्योग लगाने से लेकर उत्पादन बढ़ाने तक लगभग हर काम के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत पड़ती थी. पीएम मोदी का कहना है कि विकास की धीमी गति की वजह यही नीतियां थीं. इसलिए उस दौर को हिंदू ग्रोथ रेट कहने के बजाय कांग्रेस ग्रोथ रेट कहना अधिक उचित होगा।  अटल सरकार का जिक्र क्यों किया? अपने भाषण में मोदी ने कहा कि देश ने पहली बार तेज विकास की झलक तब देखी जब अटल जी की सरकार आई. अटल सरकार के दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना, ग्रामीण सड़क योजना, दूरसंचार क्षेत्र में सुधार और बुनियादी ढांचे पर बड़े निवेश जैसे कदम उठाए गए थे. बीजेपी लंबे समय से दावा करती रही है कि आर्थिक सुधारों को गति देने और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव मजबूत करने में अटल सरकार की बड़ी भूमिका रही. मोदी ने इसी संदर्भ में अटल सरकार को तेज विकास का शुरुआती मॉडल बताया। 

रूसी तेल विवाद पर जयशंकर का पलटवार, बोले- जरूरत पड़ने पर खुद भारत के पास आए थे अमेरिका

नई दिल्ली  भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमेरिका और यूरोप को तेल के खेल पर अच्छे से धोया है. रूसी तेल की खरीद के मसले पर एस जयशंकर ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश दिया. फिनलैंड की धरती से एस जयशंकर ने अमेरिका को साफ सुनाया कि दिखावा न करो, अमेरिका का तेल वाला खेल भारत अच्छे से जानता है. उन्होंने कहा कि रूस से तेल खरीदने के मामले में भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखा है. भारत तेल की लागत और उपलब्धता के आधार पर तेल खरीदता है. भारत किसी दबाव या नैरेटिव को नहीं मानता. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जिस रूस तेल खरीद को लेकर आज सवाल उठाए जाते हैं, उसी के लिए कभी अमेरिका ने खुद भारत से आग्रह किया था कि भाई प्लीज रूसी तेल खरीद लो, वरना मार्केट की लंका लग जाएगी. वैश्विक तेल बाज़ार को स्थिर रखने के लिए ही अमेरिका ने भारत से रूसी तेल खरीद को लेकर गुहार लगाई थी।  दरअसल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका और यूरोप को दो टूक जवाब दिया है. उन्होंने कहा कि भारत ने रूस से तेल किसी राजनीतिक या वैचारिक कारण से नहीं, बल्कि अपनी जरूरतों और बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए खरीदा था. जयशंकर ने यह भी दावा किया कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मची हुई थी, तब अमेरिका ने खुद भारत से रूसी तेल खरीदने के लिए कहा था ताकि बाजार स्थिर बना रहे।  भारत क्यों और कैसे रूसी तेल खरीदने लगा विदेश मंत्री ने कहा कि 2022 से पहले भारत ने रूस से बहुत अधिक मात्रा में तेल नहीं खरीदा था, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद बनी परिस्थितियों ने भारत को नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर किया. उन्होंने बताया कि उस समय बाजार में जो तेल सबसे अधिक उपलब्ध था, वह रूसी तेल था. कारण कि यूरोपीय देश मिडिल ईस्ट से बड़े पैमाने पर तेल खरीद रहे थे, जो भारत का पारंपरिक सप्लायर रहा है. ऐसे में भारत के सामने रूस से तेल खरीदने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे।  जयशंकर ने अमेरिका की पोल खोली उन्होंने याद दिलाया कि उसी दौरान अमेरिका ने भारत से कहा था कि वह रूस से तेल खरीदे, ताकि वैश्विक तेल बादार में कीमतें और आपूर्ति संतुलित रह सके. लेकिन बाद में जब भारत ने अपने हित में निर्णय लेते हुए रूसी तेल की खरीद बढ़ाई, तो पहले उस पर टैरिफ लगाए गए और फिर प्रतिबंधों में ढील दी गई. अमेरिका के इस दोहरे रवैये पर टिप्पणी करते हुए जयशंकर ने कहा,’आइए यह दिखावा न करें कि इसमें कोई बहुत बड़ा सिद्धांत शामिल है. यह पूरा मामला ऑन-ऑफ’ जैसा है. मतलब जब सूट करे तो करो, जब न सूट करे तो मत करो. हम सब समझदार लोग हैं, हम जानते हैं खेल क्या है।  जयशंकर का पूरा बयान पढ़िए     फिनलैंड में एक पैनल चर्चा में एस जयशंकर ने कहा, ‘हमने 2022 तक ज़्यादा रूसी तेल नहीं खरीदा. रूस-यूक्रेन जंग के हालात ने हमें मार्केट में उतरने पर मजबूर किया. रशियन हमारे लगातार सप्लायर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि लोग यह याद रखें कि उस समय अमेरिका ने खास तौर पर भारत से रूसी तेल खरीदने के लिए कहा था ताकि ऑयल मार्केट स्टेबल हो सके. अगर आप देखें तो पहले पिछले साल रूसी तेल खरीदने पर हम पर टैरिफ लगाया, फिर अमेरिका ने रूसी तेल पर सैंक्शन हटा दिए. इसलिए यह दिखावा न करें कि इसमें कोई बड़ा प्रिंसिपल शामिल है. कुल मिलाकर बात यह है कि आपका सिद्धांत यह है कि जब हमें सूट करे तब सब ठीक और जब सूट न करे तब सब खराब. यहां हम सब समझदार हैं. हम जानते हैं कि खेल क्या है।  फिनलैंड में आयोजित एक टॉक में फिनलैंड की विदेश मंत्री एलीना वाल्टोनेन और यूएई की असिस्टेंट विदेश मंत्री लाना नुसेबेह के साथ एक पैनल चर्चा में भाग लेते हुए जयशंकर से रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की स्थिति पर सवाल पूछा गया।  सवाल: रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर यूरोप में ऐसा माना जा रहा है कि भारत दोनों पक्षों के बीच एक नैतिक समानता (Moral Equivalence) बनाने की कोशिश कर रहा है. जैसे कि आप कह रहे हों कि ‘यह बहुत बुरा हुआ और इसे रुकना चाहिए’ लेकिन आप रूस के प्रति अधिक सहानुभूति रख रहे हैं और उससे तेल खरीदने को तैयार हैं. आप यहां मौजूद लोगों को अपना यह रुख कैसे समझाएंगे? डॉ. एस. जयशंकर का जवाब: ‘मैं यहां दो बातें कहना चाहूंगा. पहली यह कि मैं तेल खरीदता हूं. मैं तेल की कीमत (Cost) और उसकी उपलब्धता (Availability) के आधार पर इसे खरीदता हूं. उस समय बाज़ार में उपलब्ध ज़्यादातर तेल रूसी था, क्योंकि यूरोपीय देश मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट का तेल खरीद रहे थे, जो कि हमारा पारंपरिक सप्लायर था. ऐसे में परिस्थितियों ने हमें एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया. दूसरी बात चूंकि आपने ‘नैतिक अस्पष्टता’ (Moral Ambiguity) की बात की है, तो मैं यह कहना चाहूंगा कि किसी भी यूरोपीय देश पर कभी भारतीय हथियारों से हमला नहीं हुआ है. काश, मैं यही बात भारत के संदर्भ में यूरोपीय हथियारों के लिए भी कह पाता.’ यूरोपीय देश उन हथियारों को बेचते हैं जिनका इस्तेमाल भारत पर हमला करने के लिए किया जाता है. ऐसा आज से नहीं, बल्कि पिछले कई सालों से हो रहा है. इसके विपरीत, हम भारतीयों ने कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे यूरोप की सुरक्षा खतरे में पड़े. मुझे लगता है कि यह एक बेहद वाजिब और सही तर्क है। 

चौंकाने वाली रिपोर्ट: 2013 के मुकाबले अब भारत में दोगुने दिनों तक पड़ रही हीटवेव

नई दिल्ली जलवायु परिवर्तन का असर अब भारत में साफ और बेहद खतरनाक रूप में दिखने लगा है. देश में पर्यावरण, वन्यजीव और मौसम के पैटर्न में बड़े बदलाव आ रहे हैं. सबसे चिंताजनक स्थिति हीटवेव की है, जिसके दिनों में पिछले कुछ वर्षों में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इन आंकड़ों से साफ है कि भारत एक तरफ जहां गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ तकनीक और संरक्षण के जरिए इनसे निपटने की कोशिशें भी की जा रही हैं।  हीटवेव का कहर: 13 साल में दोगुने हुए लू के दिन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में क्लाइमेट चेंज के कारण हीटवेव की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. अगर पिछले 13 सालों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो भारत में हीटवेव के दिनों की संख्या दोगुनी हो चुकी है. साल 2013 में जहां देश में लगभग 100 दिन हीटवेव के दर्ज किए गए थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 200 दिनों के पार पहुंच चुका है।  सरकार द्वारा संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में भारतीय क्षेत्र में रिकॉर्ड 554 हीटवेव दिन देखे गए, जबकि साल 2023 में यह संख्या 230 दिन थी. यानी सिर्फ एक साल के भीतर ही हीटवेव के दिनों में दोगुने से भी ज्यादा का उछाल आया है, जो यह दर्शाता है कि ग्लोबल वार्मिंग और स्थानीय मौसमी बदलाव कितनी तेजी से भारत को अपनी चपेट में ले रहे हैं।  भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, जब किसी क्षेत्र में अधिकतम तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा हो जाए और यह स्थिति कम से कम दो दिन तक बनी रहे, तो उसे हीटवेव कहा जाता है. मैदानी इलाकों में 40 डिग्री सेल्सियस और पहाड़ी क्षेत्रों में 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान हीटवेव की श्रेणी में आता है।  हीटवेव सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि लू का रूप ले लेती है, जो इंसानी शरीर के लिए बेहद खतरनाक होती है. विशेष रूप से गरीब, मजदूर वर्ग, बुजुर्ग और बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।  13 सालों में दोगुनी हुई हीटवेव की संख्या पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के आंकड़ों से साफ पता चलता है कि 2013 के मुकाबले अब हीटवेव के दिन दोगुने हो गए हैं. पहले जहां हीटवेव मुख्य रूप से अप्रैल-मई तक सीमित रहती थी, अब मार्च से जून तक और कभी-कभी जुलाई में भी इसका असर दिखने लगा है।   उत्तर भारत, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में हीटवेव की अवधि और तीव्रता बढ़ गई है. 2024-2025 के ग्रीष्मकाल में कई राज्यों में 40-45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान कई हफ्तों तक बना रहा, जिसने रिकॉर्ड तोड़ दिए।  जलवायु परिवर्तन क्यों जिम्मेदार? जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान बढ़ रहा है. भारत में औसत तापमान 0.6 से 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन आदि) की बढ़ती मात्रा वायुमंडल को गर्म कर रही है. मानवीय गतिविधियां जैसे जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल, जंगलों की कटाई, शहरीकरण और औद्योगीकरण इस वृद्धि के मुख्य कारण हैं. जलवायु मॉडल बताते हैं कि अगर ग्लोबल वार्मिंग यूं ही जारी रही, तो 2050 तक हीटवेव की संख्या और अवधि और भी ज्यादा बढ़ जाएगी।  क्षेत्रीय प्रभाव और हॉटस्पॉट     उत्तर भारत और इंडो-गंगा प्लेन: दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं.     पश्चिम भारत: राजस्थान और गुजरात में लंबे समय तक 45-48 डिग्री तापमान रहता है.     मध्य और दक्षिण भारत: महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में भी नई हीटवेव हॉटस्पॉट बन रहे हैं. शहरों में शहरी हीट आइलैंड इफेक्ट के कारण रात का तापमान भी नहीं गिरता, जिससे शरीर को आराम नहीं मिल पाता. इंसानी सेहत पर असर हीटवेव से हर साल हजारों लोग प्रभावित होते हैं. हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हार्ट अटैक और किडनी फेलियर के मामले बढ़ रहे हैं. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ता है. एक लंबा हीटवेव हजारों अतिरिक्त मौतें का कारण बन सकती है. 2015 की हीटवेव में 2000 से ज्यादा मौतें हुई थीं. अब स्थिति और बदतर हो रही है।  कृषि, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर असर     कृषि: गेहूं, चावल, फल और सब्जियों की पैदावार घट रही है. पशुधन भी प्रभावित हो रहा है.     पानी: भूजल स्तर गिर रहा है और जल संकट बढ़ रहा है.     अर्थव्यवस्था: मजदूरों की उत्पादकता घटती है. बिजली की मांग बढ़ती है. अर्थव्यवस्था को अरबों का नुकसान होता है. भारत में हीटवेव का दोगुना होना जलवायु संकट की घंटी है. 13 साल में 100 से 200 दिनों तक की बढ़ोतरी सिर्फ शुरुआत है. अगर हम अभी गंभीर कदम नहीं उठाए, तो आने वाले दशकों में यह संकट और भयावह रूप ले लेगा. हीटवेव अब कोई मौसमी घटना नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की स्थायी सच्चाई बन चुकी है। 

आखिर क्यों इस छोटे से देश में तीन दिन बिताएंगे प्रधानमंत्री मोदी? रणनीतिक वजहें आईं सामने

नई दिल्ली स्‍लोवाक‍िया, ज‍िसकी आबादी तकरीबन 55 लाख है, यानी जयपुर से भी कम. फ‍िर इस देश में ऐसा क्‍या है क‍ि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन द‍िन के दौरे पर जा रहे हैं. 1993 में स्लोवाकिया की आजादी के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली यात्रा होगी. पीएम मोदी वहां 14 से 16 जून तक रहेंगे. लगातार मीटिंग फ‍िक्‍स है. आपके मन में भी सवाल होगा क‍ि पीएम मोदी वहां इतना टाइम क्‍यों दे रहे हैं? वहां से क्‍या हास‍िल होने वाला है? स्लोवाकिया आकार में भले छोटा देश हो, लेकिन भारत के लिए उसकी रणनीतिक, आर्थिक और ज‍ियोपाल‍िट‍िकल अहमियत लगातार बढ़ रही है. यही वजह है कि पीएम मोदी का दौरा केवल एक औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि मध्य यूरोप में भारत की बढ़ती मौजूदगी का संकेत माना जा रहा है।  स्‍लोवाक‍िया क्‍यों है खास?     लगभग 55 लाख आबादी वाला स्लोवाकिया दुनिया के सबसे बड़े कार मैन्‍यूफैक्‍चर‍िंग सेंटर में गिना जाता है. यहां Volkswagen, Kia, Jaguar Land Rover और Stellantis जैसी कंपनियों के बड़े प्लांट हैं. भारत मैन्युफैक्चरिंग, ऑटो पार्ट्स और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में सहयोग बढ़ाना चाहता है।      स्लोवाकिया European Union का सदस्य है. ऐसे में उसके साथ मजबूत रिश्ते भारत को मध्य और पूर्वी यूरोप के बाजारों तक बेहतर पहुंच दिला सकते हैं. भारत और यूरोपीय यून‍ियन के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के दौर में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है।      रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप के कई देश अपने ड‍िफेंस इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को मॉडर्न बना रहे हैं. स्लोवाकिया भी उनमें शामिल है. भारत अपनी डिफेंस कंपनियों और स्वदेशी वेपन स‍िस्‍टम का एक्‍सपोर्ट बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में ड‍िफ‍ेंस पार्टनरश‍िप दोनों देशों के रिश्तों का बड़ा आधार बन सकता है।      स्लोवाकिया अपनी बिजली का बड़ा हिस्सा परमाणु ऊर्जा से पैदा करता है. भारत भी स्वच्छ ऊर्जा और न्यूक्लियर पावर क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है. इसलिए परमाणु तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं हैं।      मध्य यूरोप में भारत अपनी मौजूदगी बढ़ाकर रणनीतिक संतुलन बनाना चाहता है. स्लोवाकिया NATO और EU दोनों का सदस्य है. ऐसे में उसके साथ मजबूत संबंध भारत को यूरोपीय राजनीति और सुरक्षा ढांचे में अधिक प्रभावशाली साझेदार बनने में मदद कर सकते हैं।  दुन‍िया के ल‍िए मैसेज पीएम मोदी यह दौरा दिखाता है कि भारत की विदेश नीति अब केवल अमेरिका, रूस, ब्रिटेन या फ्रांस जैसे बड़े देशों तक सीमित नहीं है. मोदी सरकार छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों के साथ भी रिश्ते मजबूत कर रही है। 

होममेकर महिलाओं को मिला बड़ा सम्मान, मौत के मामलों में मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

नई दिल्ली एक्सीडेंट में जब किसी इंसान की मौत होती है, तब उसकी कमाई या सैलरी के हिसाब से मुआवजा तय होता है. लेकिन होम मेकर महिलाओं से जुड़े केस में यह मामला उलझ जाता है, क्योंकि होम मेकर महिलाओं की कोई तय कमाई नहीं होती. अब सुप्रीम कोर्ट ने होम मेकर (गृहिणियों) के मुआवजे को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है. अदालत ने कहा कि जब किसी दुर्घटना के कारण गृहिणी की मौत हो जाती है, तब उसका मुआवजा तय करते हुए उनके योगदान का आकलन आवश्यक है. अदालत ने कहा कि गृहिणियों का योगदान केवल परिवार तक सीमित नहीं होता, बल्कि वो मानव संसाधन और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.  ऐसे में उन्हें केवल “होममेकर” कहने के बजाय “नेशन बिल्डर” कहा जाना चाहिए।  होम मेकर की मौत पर 30 हजार रुपए मंथली के हिसाब से तय हो मुआवजा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गृहिणी द्वारा किए जाने वाले घरेलू काम और देखभाल की सेवाओं का आर्थिक मूल्य है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दुर्घटना की शिकार गृहणियों के मामले में मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए होम मेकर महिलाओं की मौत पर 30 हजार रुपए महीना के हिसाब से मुआवजा तय करने की बात कही।  एक्सीडेंट से जुड़े एक दावे की अपील पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला  वाहन दुर्घटना के दावों से जुड़ी एक अपील पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने कहा कि घर संभालने वाली महिला (होममेकर) का योगदान सिर्फ घर तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि देश के निर्माण में भी उनकी अहम भूमिका होती है. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा तय करते समय घर संभालने वाली महिला की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को घरेलू देखभाल के मामले में जो नुकसान होता है, उसे अलग से मान्यता दी जानी चाहिए।  जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसी उद्देश्य से घरेलू देखभाल के नुकसान (Loss of Domestic Care) का मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित किया है. पीठ ने यह भी कहा कि यह सिद्धांत पहले दिए गए फैसले में निर्धारित मानकों के अतिरिक्त है।  मुआवजा निर्धारण के लिए एक नया मार्गदर्शक सिद्धांत प्रदान करता है।  2001 में पंजाब की महिला की हादसे में मौत पर आया फैसला यह फैसला पंजाब में एक मोटर एक्सीडेंट दावे से जुड़ी अपील पर आया, जिसमें नवंबर 2001 में रेशमा नाम की एक महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. उसके पति और तीन बच्चों ने मुआवज़े के लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल का दरवाज़ा खटखटाया था. ट्रिब्यूनल ने 2003 में मुआवजा दिया, लेकिन यह मामला सालों तक मुकदमे में उलझा रहा, और पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अपील पर दिसंबर 2024 में जाकर फैसला सुनाया।  दुर्घटना के दो दशक से भी ज्यादा समय बाद इस तरह की देरी पर चिंता जताते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट मुआवजे के दाले पर आम तौर पर एक साल के अंदर फैसला हो जाना चाहिए. बेंच ने कहा ऐसे मामलों का फैसला आम तौर पर एक साल के अंदर हो जाना चाहिए।      कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से मोटर एक्सीडेंट क्लेम मामलों की मॉनिटरिंग करने और यह पक्का करने के लिए सही एडमिनिस्ट्रेटिव निर्देश जारी करने को कहा कि ऐसे मामलों का निपटारा तय समय में हो जाए।      इस फैसले के दूरगामी असर होने की उम्मीद है क्योंकि पूरे भारत में कोर्ट आम तौर पर मृतक होममेकर्स के लिए मौजूदा न्यूनतम वेतन के आधार पर उन्हें एक काल्पनिक इनकम देकर मुआवजा तय करते हैं, और अक्सर उन्हें स्किल्ड या अनस्किल्ड वर्कर्स के बराबर मानते हैं।      सुप्रीम कोर्ट का फैसला उस तरीके से अलग है, यह मानते हुए कि घरेलू देखभाल के काम को पारंपरिक लेबर-मार्केट बेंचमार्क तक कम नहीं किया जा सकता।      कोर्ट की ये बातें उन मिसालों पर आधारित हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि होममेकर्स के योगदान की, बिना पेमेंट के भी, मापने लायक आर्थिक वैल्यू है।      कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2021) और अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2010) सहित कई पिछले फैसलों में, सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने होममेकर्स द्वारा दी जाने वाली सेवाओं को गैर-कानूनी मानने के खिलाफ चेतावनी दी थी।      अदालत का यह ताजा फैसला एक कदम और आगे बढ़कर घरेलू देखभाल के नुकसान का आकलन करने के लिए हर महीने ₹30,000 का एक ठोस न्यूनतम बेंचमार्क तय करता है।      यह बेंचमार्क नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी (2017) में संविधान बेंच द्वारा तय किए गए सिद्धांतों के साथ काम करेगा, जो मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मुआवजा तय करने के लिए एक मिसाल है। 

पेट्रोल-डीजल से लेकर LPG तक असर! स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव ने बढ़ाई भारत की चिंता

नई दिल्ली  भारत पर एक बार फिर तेल-एलपीजी वाला नया खतरा मंडराने लगा है. भारत से कोसों दूर हुई घटना ने एक बार फिर सबके कान खड़े कर दिए हैं. जी हां, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा हो गई है. ईरान ने एक बार फिर दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने का ऐलान किया है. ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने होर्मुज को बंद कर दिया है. ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों को चेतावनी दी है. इससे भारत की एलपीजी और तेल सप्लाई पर एक बार फिर असर पड़ सकता है।  दरअसल, अपाचे हेलिकॉप्टर के गिराए जाने से अमेरिका गुस्से में है. अमेरिका दो दिनों से ईरान पर लगातार अटैक कर रहा है. इसके जवाब में ईरान ने अब होर्मुज को बंद करने का फैसला लिया है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन माना जाता है. होर्मुज के रास्ते भारत का करीब 60 फीसदी से अधिक एलपीजी और तेल आता है. इतना ही नहीं, वैश्विक स्तर पर करीब 20% तेल और बड़ी मात्रा में LNG इसी होर्मुज के रास्ते से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचती है. ऐसे में यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे तेल और गैस की कीमतों पर पड़ता है।  होर्मुज बंद होने से मचेगा हाहाकार होर्मुज के बंद होने से पूरी दुनिया में हाहाकार मचेगा. इसकी झलक पूरी दुनिया पिछले कुछ समय में देख चुकी है. ईरान ने जब पहली बार होर्मुज बंद किया तो पूरी दुनिया में एलपीजी से लेकर तेल की किल्लत हो गई. मगर बात में अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर होने के बाद होर्मुज खुल गया था. मगर अब अमेरिकी हमलों के कारण ईरान ने फिर इसे बंद करने का फैसला किया है. अगर होर्मुज फिर से लंबे वक्त तक बंद रहता है तो इसका असर सभी देशों पर पड़ेगा. भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा।  भारत के लिए कितनी चिंता की बात भारत के लिए यह स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करते हैं. एक अनुमान के मुताबिक, भारत के कच्चे तेल का करीब 40-50% हिस्सा, LNG का करीब 60% हिस्सा और LPG की बड़ी मात्रा इसी समुद्री मार्ग से होकर आती है. सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और कतर जैसे प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता देश इसी रास्ते पर निर्भर हैं. भारत क्योंकि एलपीजी और तेल का आयातक देश है, तो इसकी भी निर्भरता होर्मुज पर ही है।  एलपीजी सप्लाई पर बढ़ेगा दबाव अगर होर्मुज में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो भारत में सबसे पहले LPG सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है. भारत में करोड़ों परिवार रसोई गैस पर निर्भर हैं और LPG का बड़ा हिस्सा आयात किया जाता है.  ऐसे में सप्लाई प्रभावित होने पर गैस सिलेंडर की उपलब्धता और कीमत दोनों पर असर पड़ सकता है. वैसे भी अब भी भारत में एलपीजी सप्लाई पहले की तरह नॉर्मल नहीं हो पाया है।  तेल के भी बढ़ेंगे दाम? इसके अलावा पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है. होर्मुज संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है. गुरुवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई. अगर तनाव और बढ़ता है तो तेल और महंगा हो सकता है, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा और घरेलू ईंधन कीमतों पर असर पड़ सकता है. हालांकि, भारत के पास अब भी तेल और गैस का भंडार है।  फर्टिलाइजर की आपूर्ति भी होगी प्रभावित इतना ही नहीं, होर्मुज के बंद होने से सिर्फ तेल और गैस ही नहीं, बल्कि उर्वरक (फर्टिलाइजर) की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है. भारत यूरिया और अन्य उर्वरकों के लिए भी खाड़ी क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर है. ऐसे में लंबे समय तक संकट रहने पर कृषि क्षेत्र पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि, सरकार और तेल कंपनियों के पास कुछ समय के लिए रणनीतिक और वाणिज्यिक भंडार मौजूद हैं, जिससे तत्काल संकट की संभावना कम मानी जा रही है। 

अपराधियों को सख्त संदेश! जहांगीर खान के गढ़ में पुलिस की अनोखी हाफ पैंट परेड

कलकत्ता एक समय जिस इलाके में तृणमूल कांग्रेस नेता जहांगीर खान का दबदबा और खौफ माना जाता था, वहीं अब एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आई है. गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने जहागीर खान को हाफ पैंट पहनाकर सड़कों पर पैदल घुमाया, जिसका वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है. वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि पुलिसकर्मियों के बीच जहागीर खान सड़क पर चलते नजर आ रहे हैं. यह तस्वीर उस छवि से बिल्कुल उलट है, जिसमें कभी उनका रसूख और दबदबा चर्चा में रहता था और अब वही शख्स सरेआम इस तरह पेश किया जा रहा है।  भारत-नेपाल सीमा के पास से गिरफ्तार हुआ था जहांगीर खान जहांगीर खान को उत्तरी बंगाल के पानीटंकी इलाके में भारत-नेपाल सीमा के पास से गिरफ़्तार किया गया था. खान ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में फाल्टा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन सफलता नहीं मिली. इस सीट पर 21 मई को दोबारा मतदान होने से कुछ दिन पहले से ही खान को दक्षिण 24 परगना ज़िले के उनके निर्वाचन क्षेत्र में नहीं देखा गया था।  डायमंड हार्बर की एक अदालत ने सरकारी पक्ष की अपील पर, फाल्टा पुलिस थाने में खान के खिलाफ दर्ज सात प्राथमिकियों के सिलसिले में उन्हें पांच दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया. कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 26 मई को खान को मिला अंतरिम संरक्षण हटा दिया था. खान के खिलाफ दक्षिण 24 परगना ज़िले के फाल्टा पुलिस थाने में सात प्राथमिकी दर्ज की गई थीं।  जहांगीर के ब्लॉकबस्टर फिल्म 'पुष्पा: द राइज़' के 'झुकेगा नहीं' मशहूर डॉयलॉग को लेकर राज्य की राजनीति गरमा गई थी. उपचुनाव से पहले केंद्रीय बलों और पुलिस ने जहांगीर के घर पर छापा मारा था. इस कार्रवाई का नेतृत्व उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त और पश्चिम बंगाल में पुलिस पर्यवेक्षकों में से एक अजय पाल शर्मा ने किया था. इस घटना के बाद तृणमूल ने पुलिस पर्यवेक्षक के अधिकार पर सवाल उठाए थे. जहांगीर ने कहा था कि यदि वह पुलिस अधिकारी 'शेर' है, तो वह भी 'पुष्पा' है. वे चुनाव आयोग के कथित पक्षपाती व्यवहार के आगे नहीं झुकेंगे। 

Nipah Virus Alert: केरल में मिला नया मामला, 43 साल के शख्स के संक्रमित होने से बढ़ी चिंता

कोझिकोड केरल में निपाह वायरस के एक मामले की पुष्टि हो गई है. शुरुआती जांच में 43 साल के व्यक्ति की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है. कोझिकोड के फेरोक के रहने वाले संदिग्ध मरीज की शुरुआती जांच में निपाह वायरस की पुष्टि हुई है. यह जांच कोझिकोड के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में की गई थी.स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि मरीज़ अस्पताल के आउटपेशेंट डिपार्टमेंट (OPD) में आया था और माना जा रहा है कि निपाह का संदिग्ध मरीज़ माने जाने से पहले वह कई लोगों के संपर्क में आया था।  अधिकारियों को शक है कि यह संक्रमण किसी गोदाम की सफाई के दौरान हुआ हो सकता है, हालांकि इसके सही स्रोत की अभी पुष्टि नहीं हुई है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी (NIV) से अंतिम पुष्टि गुरुवार को होने की उम्मीद है। अधिकारियों ने बताया कि मरीज़ की हालत अभी स्थिर है. हालात का जायज़ा लेने और आगे के कदमों पर फ़ैसला करने के लिए गुरुवार सुबह मेडिकल बोर्ड की बैठक बुलाई गई है. कोझिकोड ज़िला कलेक्टर की अध्यक्षता में एक अलग समीक्षा बैठक भी होगी. कंटेनमेंट ज़ोन घोषित करने और पाबंदियां लगाने का फ़ैसला समीक्षा बैठकों और NIV टेस्ट के नतीजों के आधार पर लिया जाएगा.स्वास्थ्य अधिकारियों ने मरीज़ के कई लोगों के संपर्क में आने की वजह से कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग शुरू कर दी है।  घबराने की जरूरत नहीं: केरल के स्वास्थ्य मंत्री केरल के स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने बुधवार को कहा कि कोझिकोड के जिस व्यक्ति की शुरुआती जांच में निपाह की पुष्टि हुई है, वह कई लोगों के संपर्क में आया था, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि इस समय घबराने की कोई वजह नहीं है.मंत्री ने कहा कि 43 साल के मरीज़ ने उस प्राइवेट अस्पताल के कई विभागों का दौरा किया था जहां उसने शुरू में इलाज कराया था, जिससे दूसरों के भी संक्रमित होने की चिंता बढ़ गई है.मंत्री ने बताया कि एहतियात के तौर पर, अस्पताल के जिन कर्मचारियों के मरीज़ के संपर्क में आने की संभावना है, उन्हें क्वारंटीन में रहने के लिए कहा गया है।  मंत्री ने आगे कहा कि स्वास्थ्य अधिकारियों ने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग शुरू कर दी है और वे हालात पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं. हालात का जायज़ा लेने और आगे के कदमों पर फ़ैसला करने के लिए गुरुवार को तिरुवनंतपुरम में स्वास्थ्य मंत्री के ऑफ़िस में स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की एक उच्च-स्तरीय बैठक बुलाई गई है. मरीज़ का सैंपल पुष्टि के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी भेजा गया है, जबकि ज़िला और राज्य स्तर के स्वास्थ्य अधिकारी तैयारी के उपाय कर रहे हैं। अधिकारियों ने कहा है कि मरीज़ की हालत स्थिर बनी हुई है।   

वाहन चालकों के लिए खुशखबरी! ज्यादा एथेनॉल वाले पेट्रोल पर अब नहीं देनी होगी एक्साइज ड्यूटी

  नई दिल्ली पश्चिम एशिया में जारी जंग के कारण सप्लाई लाइन प्रभावित हुई है. पेट्रोल-डीजल की सप्लाई प्रभावित होने का असर कीमतों पर नजर भी आ रहा है. पेट्रोल-डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. इस बीच अब भारत सरकार ने ईंधन को लेकर बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने एथेनॉल के अधिक मिश्रण वाले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी समाप्त कर दी है. अब अधिक एथेनॉल वाले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी नहीं लगेगी।  भारत सरकार ने इस संबंध में अधिसूचना भी जारी कर दी है. सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक 22 से 30 फीसदी तक एथेनॉल के मिश्रण वाला पेट्रोल अब एक्साइज ड्यूटी के दायरे से बाहर कर दिया गया है. यानी अब ई-22, ई-25, ई-27 और ई-30 श्रेणी के पेट्रोल पर कोई एक्साइज ड्यूटी नहीं देनी होगी।  सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि इस फैसले का तेल कंपनियों से लेकर आम किसान और उपभोक्ता तक, सभी को फायदा होगा. सरकार के इस कदम को पेट्रोल की कीमतें स्थिर रखने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. एथेनॉल के ज्यादा मिश्रण से पेट्रोल की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने में भी सहायता मिल सकेगी।  एथेनॉल का मिश्रण अधिक होने को किसानों के लिए भी लाभदायक बताया जा रहा है. एथेनॉल का कनेक्शन कृषि क्षेत्र से है. सरकार के इस फैसले का तत्कालिक प्रभाव जो भी रहे, इसके पीछे दीर्घकालिक रणनीति बताई जा रही है. ज्यादा एथेनॉल के मिश्रण वाले पेट्रोल एक्साइज ड्यूटी शून्य हो जाने के बाद ई-20 या प्रीमियम पेट्रोल के मुकाबले कहीं सस्ते होंगे।  इससे इसकी मांग बढ़ेगी. हालांकि, ये पेट्रोल सभी वाहनों में अभी से ही इस्तेमाल नहीं किए जा सकेंगे, लेकिन वाहन बनाने वाली कंपनियां ऐसे इंजन विकसित करने के लिए प्रोत्साहित होंगी जो ज्यादा एथेनॉल वाले पेट्रोल पर चल सकें. बता दें कि हाल ही में ई-85 पेट्रोल भी लॉन्च कर दिया गया था. हालांकि, यह पेट्रोल केवल फ्लेक्स फ्यूल वाहनों में ही इस्तेमाल हो सकेगा।