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24 अरब डॉलर की संपत्ति पर अटका अमेरिका-ईरान शांति समझौता, बढ़ा क्षेत्रीय तनाव

नई दिल्ली  अमेरिकी प्रशासन ईरान द्वारा कुवैत और बहरीन पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों से हुए नुकसान की भरपाई और पुनर्निर्माण के लिए ईरानी संपत्तियों को खाड़ी देशों की ओर मोड़ने का प्रयास कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने अमेरिका के खाड़ी सहयोगियों को हुए नुकसान की लागत का आकलन करने के लिए टीम को निर्देश दिया है। इसके साथ ही वाशिंगटन भविष्य में इस संघर्ष से होने वाले किसी भी विनाश की मरम्मत के लिए भी ईरानी संपत्तियों के उपयोग पर विचार कर रहा है। $24 बिलियन की रिहाई पर अटका शांति समझौता यह घोषणा ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई के सैन्य सलाहकार मोहसिन रेजई के उस बयान के एक दिन बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच संभावित शांति समझौता अमेरिका द्वारा फ्रीज की गई 24 बिलियन डॉलर की ईरानी संपत्ति की रिहाई पर निर्भर करता है। शुक्रवार को सीएनएन से बात करते हुए रेजई ने इस राशि की रिहाई को विश्वास की अहम परीक्षा और किसी भी व्यापक समझौते की दिशा में एक जरूरी कदम बताया था। इस नए घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच पहले से ही नाजुक संघर्ष विराम प्रयासों के और उलझने का खतरा पैदा कर दिया है। एक अंतरिम समझौते को सुरक्षित करने के चल रहे कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद वीकेंड में फिर से लड़ाई भड़क उठी है। सैन्य तनाव में वृद्धि और ईरानी ठिकानों पर हमला इस बीच पूरे क्षेत्र में सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, समुद्री यातायात के लिए खतरा बने ड्रोनों को इंटरसेप्ट करने के बाद अमेरिकी बलों ने शनिवार तड़के होर्मुज में गोरुक और केशम द्वीप पर ईरानी तटीय रडार प्रतिष्ठानों पर हमला किया। अमेरिकी सेना ने रणनीतिक जलमार्ग के पास दो और ईरानी हमलावर ड्रोनों को मार गिराने का भी दावा किया है। इसके जवाब में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर मिसाइलें दागीं। कुवैती अधिकारियों ने बताया कि सात बैलिस्टिक मिसाइलें रिहायशी इलाकों के ऊपर से गुजरीं, जिससे संपत्ति का नुकसान हुआ लेकिन कोई जनहानि नहीं हुई। वहीं बहरीन में सायरन बजने के बाद निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने की सलाह दी गई। ईरानी मीडिया ने दावा किया कि मिसाइलों ने दोनों देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि अमेरिकी सेना ने कहा कि छह मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर लिया गया और सातवीं अपने लक्ष्य तक पहुंचने में विफल रही। क्या है ईरान की मांगें? अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत जारी है ताकि एक ऐसा अंतरिम समझौता हो सके जो शत्रुता को रोक दे और परमाणु कार्यक्रम जैसे विवादित मुद्दों पर भविष्य की बातचीत का रास्ता खोले। हालांकि, अब तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है। तेहरान अपनी तेल आय के अरबों डॉलर तक पहुंच, कच्चे तेल के निर्यात पर प्रतिबंधों से राहत, बंदरगाहों पर लगी पाबंदियां हटाने और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अधिक नियंत्रण की मांग कर रहा है। इसी बीच मध्यस्थता के प्रयासों के तहत, पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री मोहसिन नकवी शनिवार को तेहरान पहुंचे। ईरानी मीडिया के अनुसार, वे पाकिस्तान के सेना प्रमुख और प्रधानमंत्री का अयातुल्ला खामेनेई के लिए एक 'विशेष पत्र' लेकर गए हैं। नकवी की ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची सहित कई वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों के साथ बातचीत करने की उम्मीद है। ईरान की क्षमता पर राष्ट्रपति ट्रंप का बयान यह संघर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पर भी दबाव बढ़ा रहा है, जिन्हें ईंधन की बढ़ती कीमतों और युद्ध के कारण होने वाले व्यापक आर्थिक व्यवधानों पर घरेलू आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। एनबीसी न्यूज के अनुसार, ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी ऑपरेशनों ने ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं को काफी हद तक कम कर दिया है, लेकिन उन्होंने माना कि तेहरान के पास अभी भी एक बड़ा शस्त्रागार मौजूद है। ट्रंप ने कहा, "उनके पास कुछ मिसाइलें और ड्रोन बचे हैं। प्रतिशत के हिसाब से मैं कहूंगा कि शायद उनकी मिसाइलों का 21% से 22% हिस्सा। यह बहुत सारी मिसाइलें हैं, लेकिन जब हमने पहली बार हमला किया था, तब के मुकाबले यह बहुत कम है।" लेबनान में तनाव दक्षिणी लेबनान में एक सैन्य वाहन पर हुए इजरायली हमले में दो सैन्य अधिकारियों और एक सैनिक की मौत हो गई। इजरायली सेना इस घटना की जांच कर रही है। ईरान ने वाशिंगटन के साथ किसी भी व्यापक समझौते को लेबनान में इजरायल और ईरान समर्थित हिजबुल्लाह आंदोलन के बीच संघर्ष विराम से जोड़ दिया है। हालांकि, इजरायल ने साफ किया है कि उसका सैन्य अभियान जारी रहेगा। यह जटिल क्षेत्रीय विवाद शांति प्रयासों को और उलझा रहा है। बातचीत रुकी हुई है और युद्ध को तीन महीने पूरे हो चुके हैं, ऐसे में किसी स्थायी समझौते की उम्मीदें फिलहाल अनिश्चित बनी हुई हैं।

वेनेजुएला और ईरान पर बयान के बीच ट्रंप बोले—तेल कीमतें जल्द और घटेंगी

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका के पास तेल, गैस, कोयला और अन्य ऊर्जा संसाधनों की इतनी भारी मात्रा है कि कोई अन्य देश इसकी तुलना नहीं कर सकता। एयर फोर्स वन में प्रेस से बातचीत करते हुए ट्रंप ने बताया कि वेनेजुएला के साथ अच्छे संबंध बनने के कारण अमेरिका की स्थिति और मजबूत हो गई है। उन्होंने दावा किया कि वेनेजुएला को मिलाकर अमेरिका के पास लगभग 64 प्रतिशत ऊर्जा संसाधन हैं, जो विश्व के लिए अद्भुत है। ट्रंप ने कहा कि बड़े तेल कंपनियां वहां पहले से ही काम शुरू कर चुकी हैं और लाखों बैरल तेल निकाला जाएगा। उन्होंने गैसोलीन निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के सवाल पर जोर देकर कहा कि उनके पास कई विकल्प उपलब्ध हैं लेकिन अमेरिका की प्राकृतिक संपदा सबसे बड़ी ताकत है। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी तेल कंपनियों की उत्पादन क्षमता पर बोलते हुए कहा कि उनके पास सब कुछ है जो जरूरी है। उन्होंने बताया कि दुनिया को उम्मीद थी कि तेल की कीमतें 300 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएंगी, लेकिन वर्तमान में यह 96-97 डॉलर प्रति बैरल पर है। उन्होंने ईरान के साथ सफलता का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा और उसकी स्थिति कमजोर है। ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल परिवहन पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अमेरिकी नौसेना की मदद से बहुत सारा तेल लाया जा रहा है, जिसकी वजह से कीमतें नियंत्रण में हैं। ट्रंप बोले- पूरी दुनिया को फायदा होगा अमेरिका के राष्ट्रपति ने आयोवा का उदाहरण देते हुए कहा कि तीन महीने पहले गैसोलीन की कीमत 1.85 डॉलर प्रति गैलन थी, जो अब और बेहतर हो सकती है। ट्रंप की इस यात्रा के दौरान उन्होंने चिपेवा फॉल्स की ओर जाते हुए मीडिया से खुलकर बात की। उन्होंने जोर दिया कि अमेरिका की ऊर्जा नीति न सिर्फ खुद को मजबूत बनाएगी बल्कि पूरी दुनिया को फायदा पहुंचाएगी। वेनेजुएला के लोगों को अमेरिका से प्यार है और देश खुशहाल हो रहा है। ट्रंप ने कहा कि जल्द ही पूरा मुद्दा सुलझ जाएगा और तेल की कीमतें और नीचे आएंगी। उन्होंने ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों का भी जिक्र किया, जिसमें अमेरिकी बलों ने कई हमलों को नाकाम किया। फिलहाल, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जारी है। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की ओर आने वाले ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को मार गिराया। ईरान ने कुवैत और बहरीन की ओर मिसाइलें दागीं। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की ऊर्जा प्रभुसत्ता और सैन्य ताकत दोनों ही मजबूत हैं, जो भविष्य में तेल बाजार को स्थिर रखेगी। ट्रंप का ताजा बयान अमेरिका की ऊर्जा स्वतंत्रता और वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है।

‘रॉकेट वुमन’ नंदिनी की मंगलयान वाली साड़ी अब वाशिंगटन म्यूजियम की शान बनी

 नई दिल्ली भारत की 'रॉकेट वुमन' नंदिनी हरिनाथ की मंगलयान मिशन वाली साड़ी अमेरिकी म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही है। वाशिंगटन डीसी. स्थित स्मिथसोनियन नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम में इस साड़ी को प्रदर्शित किया गया है। भारत के पहले मंगल मिशन मार्स आर्बिटर मिशन (मंगलयान) की उप संचालन निदेशक रहीं नंदिनी एक दिसंबर 2013 को चमकीले लाल और नीले रंग की इस रेशमी साड़ी पहनकर कार्यालय पहुंची थीं। एक दिसंबर 2013 को मंगलयान ने पृथ्वी की कक्षा छोड़ दी उस दिन नंदिनी और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अन्य विज्ञानी अंतरिक्षयान को मंगल ग्रह की कक्षा की यात्रा पर भेजने के लिए नियंत्रण कक्ष में मौजूद थे। एक दिसंबर 2013 को मंगलयान ने पृथ्वी की कक्षा छोड़ दी और मंगल की तरफ बढ़ चला था। यह दिन नंदिनी और अन्य विज्ञानियों ने लिए बेहद खास था। नंदिनी ने बीबीसी को इंटरव्यू में बताया था, यह करो या मरो का क्षण था। मिशन की सफलता उस दिन की सफलता पर निर्भर थी। नंदिनी और अन्य महिला अंतरिक्ष विज्ञानी उस दिन पूरी दुनिया में सुर्खियों में आ गईं, जब इसरो में साड़ी पहने विज्ञानियों के जश्न मनाते हुए एक तस्वीर इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हुआ था। स्मिथसोनियन संग्रहालय में क्यूरेटर मैट शिंडेल ने बीबीसी को बताया कि उन्हें यह तस्वीर "बेहद आकर्षक" लगी। उन्होंने कहा, मुझे लगा कि यह शानदार कहानी होगी। 'रॉकेट वुमन' की कहानी जिनकी इस मिशन में महत्वपूर्ण भूमिका रही। शिंडेल ने 2020 में ईमेल के माध्यम से नंदिनी से संपर्क किया और इस बात पर चर्चा की कि कौन सी वस्तु भारत के मंगल मिशन और उसमें उनकी भूमिका का सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व कर सकती है शिंडेल ने कहा, मैंने उनसे पूछा कि वह कौन सी वस्तु देने को तैयार होंगी। वह साड़ी देने पर सहमत हुईं, जो उन्होंने मंगलयान के पृथ्वी की कक्षा छोड़ने के दिन पहनी थी। इसके बाद साड़ी और उससे मेल खाती नीली ब्लाउज संग्रहालय पहुंची। मंगलयान को 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में पहुंचा था गौरतलब है कि मंगलयान को 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में पहुंचा था। भारत पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचने वाला दुनिया का पहला और इकलौता देश बना था। नंदिनी की साड़ी दो बातों को दर्शाती है। पहला, यह भारत के पहले मंगल मिशन और देश के सफल अंतरिक्ष कार्यक्रम में राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। दूसरा, उनकी कहानी प्रेरणादायक है क्योंकि उनकी सफलता महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। साड़ी का चयन इसलिए भी किया गया क्योंकि इसका सांस्कृतिक महत्व है।

होर्मुज संकट का असर, गैस सिलेंडर की सप्लाई लागत बढ़ी, सरकार पर बढ़ा बोझ

नई दिल्ली 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलिंडर की सप्लाई की लागत बढ़कर 1,600 रुपये से ज्यादा हो गई है। इससे हर सिलेंडर पर लगभग 700 रुपये का नुकसान (अंडर-रिकवरी) हो रहा है, जिसे सरकार और पब्लिक सेक्टर की मार्केटिंग कंपनियां उठाती हैं। कीमतों में यह बढ़ोतरी इंटरनेशनल बेंचमार्क में हुई तेज वृद्धि के कारण हुई है। होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट की वजह से फरवरी से सऊदी अरामको की एलपीजी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस में लगभग 46% की बढ़ोतरी हुई है। होर्मुज में सख्ती के बाद बढ़ी कीमत पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, रुकावट से पहले फरवरी में प्रोपेन-ब्यूटेन के 50:50 मिक्स के लिए ब्लेंडेड सऊदी CP 542.50 अमेरिकी डॉलर प्रति टन था। होर्मुज में मिडिल ईस्ट गल्फ से होने वाले एक्सपोर्ट पर सख्ती के बाद अप्रैल का कॉन्ट्रैक्ट बढ़कर 775 अमेरिकी डॉलर प्रति टन हो गया और जून में यह और बढ़कर 790 अमेरिकी डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया। इसी दौरान प्रोपेन CP में 39 प्रतिशत और ब्यूटेन में 52 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसके साथ ही इम्पोर्ट किए गए मॉलिक्यूल की लैंडेड कॉस्ट भी बढ़ गई, जिससे घरेलू सिलेंडर की इम्पोर्ट-लिंक्ड सप्लाई कॉस्ट 1,600 रुपये से ज्यादा हो गई। दुनिया भर से समसे कम कीमत भारत में कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद, भारतीय घरों में खाना पकाने वाली गैस की कीमतें दुनिया भर में सबसे कम हैं। दिल्ली में आम ग्राहक प्रति सिलिंडर 942 रुपये चुकाते हैं, जो बाजार से जुड़ी कीमत से लगभग 700 रुपये कम है। PMUY उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को हर साल पहले चार रिफिल पर 300 रुपये प्रति सिलिंडर का डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर मिलता है, जिससे उन्हें असल में 642 रुपये चुकाने पड़ते हैं। यह उज्ज्वला योजना वाले परिवार की सालाना औसत खपत के बराबर है। 942 रुपये की कीमत पर भी वे अंतरराष्ट्रीय कीमत से लगभग 45% कम भुगतान करते हैं, जबकि उज्ज्वला योजना के तहत 642 रुपये की प्रभावी कीमत अंतरराष्ट्रीय कीमत से लगभग 60% कम है। एक बार फिर बढ़ीं कीमतें वेस्ट एशिया संकट की वजह से लागत बढ़ने के कारण, रविवार से घरेलू एलपीजी सिलिंडर की कीमतों में 29 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। मंत्रालय ने बताया कि घरेलू LPG पर कुल अंडर-रिकवरी (लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर) वित्त वर्ष 2025-26 के आखिर तक 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई, जो पिछले साल 41,338 करोड़ रुपये थी। केंद्रीय कैबिनेट ने इस मद में मार्केटिंग कंपनियों को 30,000 करोड़ रुपये का मुआवजा देने को मंजूरी दी है। मंत्रालय ने कहा कि उज्ज्वला ग्राहकों के लिए 300 रुपये प्रति सिलेंडर की सब्सिडी इस अंडर-रिकवरी के अलावा है और यह 10.58 करोड़ से ज्यादा कनेक्शन तक पहुंचती है। होर्मुज में रुकावट के बावजूद सप्लाई सुरक्षित बनी रही। भारत उन कुछ देशों में से एक था जिन्होंने एनर्जी कार्गो की सप्लाई जारी रखी। इम्पोर्ट में कमी की भरपाई के लिए घरेलू LPG प्रोडक्शन को 60% से ज्यादा बढ़ाकर 52 TMT कर दिया गया। सप्लाई के लिए अमेरिका, कनाडा और अल्जीरिया जैसे नए देशों को भी शामिल किया गया। साथ ही, सब्सिडी वाली घरेलू LPG की कमर्शियल मार्केट में लीकेज को रोकने के लिए OTP-आधारित डिलीवरी वेरिफिकेशन और डायवर्जन-रोधी उपायों को लगभग 90% तक बढ़ाया गया। अन्य देशों में गैस सिलिंडर के दाम नतीजतन, भारत में सिलेंडर की कीमतें पड़ोसी देशों और विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम हैं। पाकिस्तान 1,046 रुपये, नेपाल 1,207 रुपये, बांग्लादेश 1,225 रुपये, श्रीलंका 1,241 रुपये, अमेरिका 1,755 रुपये, ऑस्ट्रेलिया 1,765 रुपये, कनाडा 2,411 रुपये। मंत्रालय ने उपभोक्ताओं से सब्सिडी वाले इस संसाधन को बचाने के लिए खाना पकाने के ऐसे तरीकों को अपनाने का आग्रह किया जो ऊर्जा की बचत करते हों।  

63 लाख राशन कार्डधारकों पर लटकी तलवार, SIR में नाम कटते ही शुरू हुई बड़ी जांच

कोलकत्ता  पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार ने राज्य के खजाने पर बढ़ रहे अतिरिक्त वित्तीय बोझ को कम करने और सरकारी योजनाओं में हो रही धांधली को रोकने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया है। सरकार ने खाद्य एवं आपूर्ति विभाग की खाद्य साथी योजना के तहत मुफ्त और सस्ते अनाज का लाभ ले रहे अपात्र और फर्जी लाभार्थियों को बाहर निकालने का फैसला किया है। गुरुवार को खाद्य एवं आपूर्ति विभाग द्वारा जारी एक आधिकारिक आदेश के मुताबिक, विशेष गहन समीक्षा 2026 (SIR) के नतीजों के आधार पर उन सभी राशन कार्डों को चिह्नित कर डिलीट किया जाएगा जो नियमों के तहत अयोग्य पाए गए हैं। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से जिन 63 लाख लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनकी पहचान की जाएगी और उनके राशन कार्ड तुरंत रद्द कर दिए जाएंगे। हालांकि, सरकार ने इसमें एक मानवीय और कानूनी पहलू को भी शामिल किया है। आदेश में कहा गया है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कटे हैं, लेकिन उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत नागरिकता के लिए आवेदन किया है या ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील की है उनके राशन कार्ड तब तक एक्टिव रहेंगे जब तक कि उनकी याचिकाओं पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा कुछ दिनों पहले शुरू की गई अन्नपूर्णा योजना के लिए सरकार ने एक नया आवेदन फॉर्म भी पेश किया है। सरकार को संदेह है कि पिछली सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना के तहत लगभग 30 लाख से अधिक अपात्र महिलाएं वित्तीय सहायता ले रही थीं। नई अन्नपूर्णा योजना के तहत राज्य सरकार लगभग दो करोड़ महिलाओं को 3,000 रुपये प्रति माह की आर्थिक सहायता देगी। इस योजना पर राज्य सरकार को हर साल करीब 72,000 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। इसके विपरीत, पिछली तृणमूल कांग्रेस की सरकार लक्ष्मी भंडार योजना को चलाने के लिए सालाना लगभग 30,000 करोड़ रुपये खर्च करती थी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "राज्य का खजाना इस वक्त बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहा है और राजस्व को तुरंत बढ़ाना मुमकिन नहीं है। इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ को संभालने के लिए फंड के दुरुपयोग और लीकेज को रोकना बेहद जरूरी है।" 15,000 करोड़ की लीकेज रोकने की तैयारी अधिकारियों के मुताबिक, खाद्य साथी योजना के तहत सालाना करीब 15,000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जिसके जरिए करीब दो करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दिया जाता है और किसानों से सीधे धान की खरीद की जाती है। सरकार को अंदेशा है कि टीएमसी (TMC) शासन के दौरान इन योजनाओं में बड़े पैमाने पर धन का दुरुपयोग हुआ है, इसलिए सभी राशन कार्ड धारकों का भौतिक सत्यापन अनिवार्य कर दिया गया है। कैसे होगा सत्यापन? पश्चिम बंगाल के सभी एसडीओ और बीडीओ अपने-अपने क्षेत्रों से हटाए गए मतदाताओं की सूची खाद्य विभाग के स्थानीय निरीक्षकों को सौंपेंगे। खाद्य विभाग के अधिकारी उन सभी लोगों के घरों पर जाकर जांच करेंगे जिनके नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं। सत्यापन पूरा होने के बाद अपात्रों के राशन कार्ड बंद कर दिए जाएंगे। सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने इस पूरी प्रक्रिया को 15 जून 2026 तक पूरा करने का निर्देश दिया है। टीएमसी राज में हुए धान घोटाले की भी होगी जांच भाजपा सरकार केवल राशन कार्डों की ही जांच नहीं करेगी, बल्कि टीएमसी शासन के दौरान हुई धान खरीद प्रक्रिया की भी गहराई से जांच करेगी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "कागजों पर राज्य ने पिछले कुछ वर्षों में औसतन 55 लाख टन से अधिक धान की खरीद दिखाई है। लेकिन शुरुआती जांच से संकेत मिलते हैं कि धान से चावल निकालने के लिए राइस मिलों में भेजा गया एक बड़ा हिस्सा कभी राज्य के पास वापस ही नहीं आया। अब इसकी जांच की जाएगी कि क्या कागजों पर दिखाया गया धान वास्तव में खरीदा भी गया था या यह सिर्फ एक कागजी घोटाला था।" आपको बता दें कि वर्तमान में केंद्र सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत बंगाल में 6.01 करोड़ लोगों को सस्ता अनाज देती है। इसके अलावा, राज्य सरकार अपनी तरफ से अतिरिक्त दो करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देती है। नई सरकार अब यह पता लगाने में जुटी है कि इन दो करोड़ अतिरिक्त लाभार्थियों में से कितने वास्तव में वास्तविक और जरूरतमंद हैं। धान खरीद घोटाले की आधिकारिक जांच भी जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है।

सरकारी कर्मचारियों के लिए खुशखबरी? 8वें वेतन आयोग को लेकर नई चर्चाओं ने बढ़ाई उम्मीदें

नई दिल्ली 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) को लेकर देशभर के केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की निगाहें टिकी हुई हैं। इसी बीच जम्मू-कश्मीर के कर्मचारी संगठनों ने वेतन आयोग के सामने ऐसी मांग रखी है, जिसने लाखों सरकारी कर्मचारियों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। ऑल एम्प्लॉइज जॉइंट एसोसिएशन, जम्मू-कश्मीर और ऑल सिख माइनॉरिटी एम्प्लॉइज एसोसिएशन ने 8वें वेतन आयोग से फिटमेंट फैक्टर 2.86 से 3.68 के बीच तय करने की मांग की है। अगर यह डिमांड स्वीकार हो जाती है, तो वर्तमान में ₹18,000 का न्यूनतम बेसिक वेतन बढ़कर ₹51,480 से ₹66,240 तक पहुंच सकता है। हाल ही में 8वें वेतन आयोग की टीम जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के दौरे पर पहुंची थी। इस दौरान कर्मचारी संगठनों ने आयोग की अध्यक्ष न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और अन्य अधिकारियों को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में केवल वेतन वृद्धि ही नहीं, बल्कि पेंशन, महंगाई भत्ता (DA), हाउस रेंट अलाउंस (HRA), स्वास्थ्य सुविधाओं और टैक्स राहत से जुड़े कई महत्वपूर्ण सुझाव भी शामिल किए गए। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में महंगाई तेजी से बढ़ी है, जिससे कर्मचारियों की क्रय शक्ति प्रभावित हुई है। ऐसे में 7वें वेतन आयोग के तहत लागू 2.57 फिटमेंट फैक्टर अब पर्याप्त नहीं माना जा सकता। उनका मानना है कि कम से कम 2.86 और अधिकतम 3.68 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया जाना चाहिए, ताकि कर्मचारियों को वास्तविक राहत मिल सके। उदाहरण के तौर पर अगर 2.86 फिटमेंट फैक्टर लागू होता है, तो न्यूनतम बेसिक वेतन ₹51,480 हो जाएगा, जबकि 3.68 फिटमेंट फैक्टर लागू होने पर यह बढ़कर ₹66,240 तक पहुंच सकता है। जम्मू-कश्मीर के कर्मचारी संगठनों ने पेंशनर्स के लिए भी कई महत्वपूर्ण मांगें रखी हैं। उन्होंने सभी पेंशनर्स के लिए पूर्ण पेंशन समानता (Pension Parity) लागू करने, वेतन निर्धारण से पहले महंगाई भत्ते को मूल वेतन में मर्ज करने और कम्यूटेड पेंशन की बहाली अवधि को 15 साल से घटाकर 12 साल करने की मांग की है। इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को और मजबूत बनाने पर भी जोर दिया गया है। हाउस रेंट अलाउंस (HRA) को लेकर भी कर्मचारी संगठनों ने विशेष सुझाव दिए हैं। उनका कहना है कि जम्मू और श्रीनगर जैसे शहरी क्षेत्रों में मकानों का किराया लगातार बढ़ रहा है। इसलिए कर्मचारियों को बेहतर HRA दिया जाना चाहिए। साथ ही दूरदराज, सीमावर्ती और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए विशेष भत्ते और अतिरिक्त सुविधाएं भी प्रदान की जानी चाहिए। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के कर्मचारियों को देश के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दुर्गम पहाड़ी इलाके, खराब मौसम, ऊंची परिवहन लागत, सीमावर्ती क्षेत्रों में सेवा की जिम्मेदारी और कुछ इलाकों में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां उनके काम को और कठिन बना देती हैं। इसलिए 8वें वेतन आयोग को इन विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अलग से राहत देने पर विचार करना चाहिए। हालांकि, अभी 8वें वेतन आयोग की अंतिम सिफारिशें आना बाकी हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर के कर्मचारी संगठनों की ये मांगें चर्चा का बड़ा विषय बन गई हैं। अगर इनमें से कुछ प्रमुख मांगें भी स्वीकार हो जाती हैं, तो लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की आय में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है। अब सभी की नजर आयोग की अंतिम रिपोर्ट और केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी हुई है।

मांसाहार की बढ़ती मांग का पर्यावरण पर असर, UN की रिपोर्ट ने दुनिया को किया सतर्क

मुंबई  चिकन-मटन शौक से खाने वाले लोगों की वजह से दुनिया में एक नया संकट पैदा हो गया है, जिसके बारे में खुद संयुक्त राष्ट्र ने रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में कई डराने वाले खुलासे हुए हैं. बताया जा रहा है कि पिछले 60 सालों में ग्लोबल डाइट पूरी तरह से बदल चुकी है. लोग अब साग-सब्जी और शाकाहार को छोड़कर अंधाधुंध तरीके से नॉन-वेज की तरफ भाग रहे हैं. चिकन और मटन की इस दीवानगी ने स्वाद का चस्का तो बढ़ा दिया है, लेकिन हमारी बेचारी धरती के लिए एक ऐसा खौफनाक संकट खड़ा कर दिया है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।  यूएन के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) द्वारा जारी इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के बड़े-बड़े नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के कान खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, जहां लोगों की थाली में मीट का वजन लगातार भारी होता जा रहा है, वहीं इसके चलते हमारी धरती पर प्रदूषण, जहरीली गैसों और ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा भी एक डरावने स्तर पर पहुंच रहा है।  25 किलो से सीधे 47 किलो पर पहुंची चिकन-मटन की खपत इस रिपोर्ट में जो आंकड़े निकलकर सामने आए हैं, वे वाकई किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी हैं. अगर हम साल 1961 के दौर की बात करें तो उस समय दुनिया में प्रति व्यक्ति सालाना मांस की कुल सप्लाई औसतन सिर्फ 25 किलोग्राम हुआ करती थी लेकिन साल 2022 तक आते-आते ये आंकड़ा करीब-करीब दोगुना बढ़कर 47 किलोग्राम प्रति व्यक्ति सालाना पर पहुंच गया है. यानी हर साल इंसानी बस्तियां लाखों टन मांस डकार रही हैं।  चिकन ने तोड़े सारे रिकॉर्ड: साल 1961 में एक इंसान सालभर में औसतन 3 किलो से भी कम चिकन खाता था, लेकिन साल 2022 में यह आंकड़ा सीधे 17 किलोग्राम पर पहुंच गया. इसका मतलब ये हुआ कि चिकन की खपत में करीब 6 गुना का बंपर और ऐतिहासिक उछाल आया है. आज गली-कूचों से लेकर बड़े-बड़े रेस्टोरेंट में चिकन की डिमांड सबसे ज्यादा है।  पोर्क और बीफ का हाल: इस दौरान पोर्क खाने की आदत भी इंसानों में दोगुनी हो गई है और ये अब 15 किलो प्रति व्यक्ति पर जा पहुंची है. हालांकि, इस पूरे खेल में बीफ की खपत में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है और ये दुनिया भर में करीब 9 किलोग्राम पर स्थिर है।  मीट की मांग क्यों बढ़ी? एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे असली खेल पैसे और लाइफस्टाइल का है. जिन देशों में लोगों की आमदनी बढ़ रही है और जहां शहरीकरण बहुत तेजी से फैल रहा है, वहां लोगों का रहन-सहन और खान-पान का तरीका बिल्कुल बदल चुका है. लोग अब पारंपरिक दाल-चावल या हरी सब्जियों को छोड़कर मीट को स्टेटस सिंबल और अपनी रोजाना की डाइट का मुख्य हिस्सा बना रहे हैं. इस लजीज स्वाद की जो कीमत हमारी धरती को चुकानी पड़ रही है, वो बहुत भयानक है।  आसमान छूता प्रदूषण: आज के समय में दुनिया भर में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में एग्रीकल्चर और पशुपालन दूसरा सबसे बड़ा विलेन बनकर उभरा है. फैक्ट्रियों और गाड़ियों के बाद यही सेक्टर सबसे ज्यादा जहर उगल रहा है।  Livestock का जानलेवा खतरा: पर्यावरण में गर्मी बढ़ाने वाली और ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों में अकेले पशुपालन का हिस्सा 12% से लेकर 20% तक है. आशंका जताई जा रही है कि अगले दशक में इस सेक्टर से होने वाला प्रदूषण 7.6% तक और ज्यादा बढ़ सकता है, जिसका 80% कारण सिर्फ और सिर्फ ये पशुपालन होगा।  अमीर-गरीब का फासला इस रिपोर्ट में एक और बेहद कड़वा और परेशान करने वाला सच सामने आया है कि अमीर और गरीब देशों के बीच खाने की थाली को लेकर कितनी बड़ी खाई मौजूद है. अमीर देशों में तो लोग अपनी हैसियत के दम पर भर-भर कर मीट खा रहे हैं और वहां मांस की सप्लाई बहुत ज्यादा और स्थिर बनी हुई है।  हालांकि, कई गरीब और कम आय वाले देशों में आज भी भुखमरी का खौफनाक माहौल है. वहां लोगों के लिए पौष्टिक खाना और दूध तो बहुत दूर की बात है, दो वक्त की सूखी रोटी जुटाना भी एक बहुत बड़ी जंग जैसा बना हुआ है।  UN के सॉफ्ट स्टैंड पर भड़के वैज्ञानिक हैरान करने वाली बात ये है कि पर्यावरण के ऊपर मंडरा रहे इतने बड़े खतरे के बावजूद यूएन की संस्था एफएओ (FAO) ने अमीर देशों को मीट की खपत कम करने की कोई सीधी या सख्त सलाह नहीं दी. इसके बजाय, यूएन ने बहुत ही ‘सॉफ्ट’ स्टैंड लेते हुए गोलमोल बातें कीं. उन्होंने कहा कि खेती के तरीकों को थोड़ा बेहतर बनाया जाए, खाना बर्बाद होने से रोका जाए और नई-नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके पशुपालन से होने वाले प्रदूषण को कम किया जाए।  यूएन के इस ढुलमुल रवैए ने दुनिया भर के बड़े वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों को भड़का दिया है और वे इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का साफ और दोटूक शब्दों में कहना है कि अगर अमीर देश मांस खाना थोड़ा कम कर दें और ‘प्लांट-बेस्ड डाइट’ की तरफ वापस लौटें, तो क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग के इस बड़े खतरे को बहुत आसानी से और बहुत जल्दी टाला जा सकता है। 

RBI रिपोर्ट ने खोली पोल, बाजार में पैसा भरपूर लेकिन ATM में नहीं मिल रहा कैश; इंडस्ट्री परेशान

 नई दिल्‍ली ऑनलाइन पेमेंट आने के बाद और यूपीआई का चलन बढ़ने के बाद से ही पिछले कुछ सालों में कैश को लेकर परेशानी बढ़ गई है. भारतीय रिजर्व बैंक के नए आंकड़ों ने कई बड़े खुलासे किए हैं, जिसके अनुसार 29 मई 2026 तक चलन में कैश 42.56 लाख करोड़ रुपये से अधिक थी. यह पिछले साल की तुलना में 12 फीसदी की बढ़ोतरी है. इसके बावजूद कुछ एटीएम मशीनों में कैश की कमी होती दिख रही है. लोगों को कैश निकालने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है।    एटीएम ऑपरेटरों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था, एटीएम उद्योग परिसंघ (CATMi) ने भारतीय बैंक संघ (IBA) को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि एटीएम में कैश भरने के लिए उपलब्ध कैश  में कमी आ रही है. लेटर में कहा गया है कि नवंबर 2025 में कैश आपूति 80 प्रतिशत थी. इसका मतलब है कि 20 फीसदी की कमी थी।  यह कमी लगातार बढ़ रही है, जो मार्च 2026 में 36 फीसदी और अप्रैल में 43 फीसदी थी. आसान शब्‍दों में कहें तो ATM ऑपरेटरों को अप्रैल में अपनी कैश जरूरतों का सिर्फ 57 फीसदी ही मिला. लेटर में कहा गया है कि दिसंबर 225 के अंत से, हमारे सदस्‍यों को कई राज्‍यों में बैंक ब्रांचेज और करेंसी चेस्‍ट से ATM में कैश डालने में लगातार परेशानियां छेलनी पड़ रही है।    क्‍यों घट रहा एटीएम में कैश?  एटीएम से निकासी में गिरावट आई है. CATMi के अनुसार, मासिक एटीएम निकासी जनवरी 2023 में लगभग 57 करोड़ से घटकर सितंबर 2025 तक लगभग 44 करोड़ हो गई है. डिजिटल भुगतान, खासकर यूपीआई की बढ़ती संख्‍या इस गिरावट का मुख्‍य कारण बताया जा रहा है।    CATMi ने कहा कि वर्तमान एटीएम कॉन्‍ट्रैक्‍ट्स 2.5 प्रतिशत से 3.0 प्रतिशत प्रति साल की मामूली गिरावट पर आधारित थे, जिसे सीपीआई से जुड़ी वृद्धि द्वारा समायोजित किया जाना था. वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है. इसने यह भी बताया कि कस्‍टमर द्वारा फ्री लिमिट से अधिक एटीएम उपयोग के लिए भुगतान किया जाने वाला शुल्क बढ़ गया है, इसने अधिक लोगों को डिजिटल की ओर धकेल दिया है, जिससे गिरावट तेज हो गई है और ऑपरेटरों के राजस्व में कमी आ रही है।     एटीएम ऑपरेट करने की कॉस्‍ट बढ़ी  उद्योग के जानकारों का यह भी कहना है कि बढ़ती लागत ऑपरेटरों पर दबाव बढ़ा रही है. इसमें परिवहन की कुल लागत, ईंधन, साथ ही सुरक्षा गार्डों और अन्य कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन शामिल हैं. विनिमय लागत (यह वह राशि है जो एक बैंक दूसरे बैंक को तब देता है जब कोई ग्राहक एक बैंक के डेबिट कार्ड का उपयोग दूसरे बैंक के एटीएम में करता है) से परिचालन लागत के कुछ हिस्से की भरपाई होने की उम्मीद थी, लेकिन उनका कहना है कि 19 रुपये से 21 रुपये तक की 2 रुपये की वृद्धि बढ़ती लागतों की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं रही है।    आरबीआई गवर्नर ने क्‍या कहा?  कैश संकट के बारे में पूछे जाने पर, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने शुक्रवार को कहा कि वे हर साल करेंसी की आवश्यकता का एक प्लान बनाते हैं और आवश्यकतानुसार बैंकों को उपलब्ध कराते हैं. उन्होंने कहा कि अगर कहीं भी नकदी की कमी होती है, तो वे यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि नकदी शीघ्रता से उपलब्ध कराई जाए।    मॉनिटरी पॉलिसी की घोषणा के बाद हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि हम यह सुनिश्चित करेंगे कि नकदी की कमी होने पर हमारे पास एटीएम और बैंक शाखाओं को भरने और फिर से भरने के लिए पर्याप्त पैस हो. डिजिटल भुगतान आम होने के कारण, विशेषकर बड़े शहरों में रहने वाले लोग एटीएम में नकदी खत्म होने की स्थिति में शायद ज्यादा चिंतित न हों।  हालांकि, सरकार से डायरेक्‍ट बेनिफिट मिलने वाले लोगों को नकदी की कमी का असर महसूस हो सकता है क्योंकि उनके शहर के एटीएम में पर्याप्त नकदी न हो. कई वरिष्ठ नागरिक अभी भी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए नकदी निकालते हैं. छोटे व्यापारी भी आमतौर पर नकदी लेनदेन पर निर्भर रहते हैं. CATMi ने सदस्य बैंकों से एटीएम में नकदी की विश्वसनीय बनाए रखने और बैंकों से इस मुद्दे को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए कहा है। 

पॉलीमर नोटों पर चल रहा विचार, लेकिन अभी अंतिम फैसला नहीं; RBI गवर्नर ने साफ की स्थिति

मुंबई  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए गवर्नर संजय मल्होत्रा ने देश की मुद्रा को लेकर एक बहुत बड़ी जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि आरबीआई भारत में प्लास्टिक यानी पॉलीमर के नोट चलाने के विचार पर काम कर रहा है. हालांकि, गवर्नर ने यह साफ किया कि यह योजना अभी बिल्कुल शुरुआती दौर में है और इस पर कोई आखिरी फैसला नहीं लिया गया है. बैंक अभी इसके हर फायदे और नुकसान की अच्छे से जांच कर रहा है।  पहले क्यों नहीं चल पाए थे प्लास्टिक के नोट? भारत में प्लास्टिक के नोट चलाने की कोशिश पहले भी हो चुकी है. साल 2014 के आसपास सरकार ने देश के पांच शहरों—जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का एक छोटा सा टेस्ट (ट्रायल) किया था. लेकिन उस समय यह तरीका सफल नहीं हो पाया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि देश के ATM और बैंकों की नोट गिनने वाली मशीनें केवल कागजी नोटों के हिसाब से बनी थीं. प्लास्टिक के नोटों की वजह से मशीनें बार-बार जाम होने लगीं. साथ ही, भारत की तेज गर्मी में इन नोटों के आपस में चिपकने और सिकुड़ने का डर भी था. इसी वजह से तब इस काम को रोक दिया गया था. अब आरबीआई इन सभी पुरानी कमियों को दूर करने की तैयारी कर रहा है।  क्या होते हैं पॉलीमर नोट और इनके क्या फायदे हैं? प्लास्टिक या पॉलीमर नोट किसी कड़क प्लास्टिक कार्ड (जैसे एटीएम कार्ड) की तरह नहीं होते. ये एक खास तरह के बहुत पतले और लचीले प्लास्टिक (BOPP) से बनते हैं. इन्हें आप आम कागजी नोटों की तरह ही आसानी से मोड़कर जेब या पर्स में रख सकते हैं. इन नोटों के कई बड़े फायदे हैं:     ज्यादा मजबूती: ये नोट पानी या पसीने से गलते नहीं हैं और आसानी से फटते भी नहीं हैं. इसलिए ये बहुत लंबे समय तक चलते हैं।      गंदगी का असर नहीं: इन नोटों पर धूल, मिट्टी या पानी का असर नहीं होता, जिससे ये गंदे और काले नहीं पड़ते।      नकली नोटों पर रोक: प्लास्टिक के नोटों पर ऐसे सुरक्षा घेरे (सिक्योरिटी फीचर्स) लगाए जा सकते हैं, जिनकी नकल करना नामुमकिन होता है. इससे देश में नकली नोटों का धंधा पूरी तरह बंद हो जाएगा।      पैसों की बचत: हालांकि इन्हें छापने का शुरुआती खर्च ज्यादा होता है, लेकिन लंबे समय तक चलने के कारण बार-बार नए नोट छापने का सरकारी खर्च बच जाता है।  दुनिया के कई देशों में है यह व्यवस्था दुनिया में सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने साल 1988 में प्लास्टिक के नोटों का इस्तेमाल शुरू किया था. आज के समय में ब्रिटेन (यूके), कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया और थाईलैंड समेत दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में प्लास्टिक के नोट बहुत कामयाबी से चल रहे हैं. आरबीआई गवर्नर ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि इस नए बदलाव के दौरान देश में पैसों की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। 

सुपरफास्ट ग्रोथ के मिशन पर भारत, प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक विशेषज्ञों के साथ किया मंथन

नई दिल्‍ली  पूरी दुनिया मंदी, युद्ध की आहट और आर्थिक अनिश्चितता के चक्रव्यूह में फंसी है. वैश्विक बाजारों में हाहाकार मचा है, सप्लाई चेन टूट रही है और कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने को बेताब हैं. दुनिया की इस महा-उथल-पुथल के बीच दिल्ली के पावर कॉरिडोर में भारत को आर्थिक सुपरपावर बनाए रखने की एक बेहद महत्वपूर्ण बिसात बिछाई जा रही थी. जून की इस तपती दोपहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे बड़े आर्थिक धुरंधरों (PM-EAC) के साथ बंद कमरे में मेज पर जुटे. मकसद साफ था दुनिया भले ही मंदी की गर्त में जाए लेकिन भारत की विकास दर सुपरफास्ट रफ्तार से दौड़ती रहनी चाहिए. इस हाई-प्रोफाइल बैठक में न सिर्फ भारत की अभेद्य आर्थिक किलेबंदी का ब्लूप्रिंट तैयार हुआ बल्कि पश्चिम एशिया के बारूद की आंच से घरेलू बाजार को बचाने का फुलप्रूफ प्लान भी सामने आया।  पीएम नरेंद्र मोदी की बैठक की 5 मुख्य बातें • आर्थिक किलेबंदी की रणनीति: वैश्विक मंदी और तनाव के बीच भारत की 7.7% की रफ्तार को बरकरार रखने और इसे आगे बढ़ाने के लिए नए आर्थिक सुधारों पर गहन मंथन हुआ।  • पश्चिम एशिया संकट पर पैनी नजर: लाल सागर और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भारत के व्यापार, MSMEs और कच्चे तेल की सप्लाई पर पड़ने वाले असर का बारीकी से आकलन किया गया।  • नीति आयोग की खुफिया रिपोर्ट: नीति आयोग द्वारा पीएमओ (PMO) को सौंपी गई इम्पैक्ट एसेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर भविष्य के बड़े झटकों से निपटने की रणनीति बनाई गई।  • ईज ऑफ लिविंग पर सबसे बड़ा दांव: आम आदमी के जीवन को आसान बनाने और व्यापारिक बाधाओं को खत्म करने के लिए नियमों को और अधिक सरल बनाने पर सहमति बनी।  • घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग पर जोर: विदेशी झटकों से बेअसर रहने के लिए देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने और घरेलू उपभोग को मजबूत करने का संकल्प लिया गया।  वैश्विक तूफान, पीएम मोदी की ढाल वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है. एक तरफ पश्चिम एशिया का संकट अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों को असुरक्षित बना रहा है तो दूसरी तरफ दुनिया के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में की जा रही सख्ती ने निवेश पर ब्रेक लगा दिया है. ऐसे में भारत के लिए अपनी ग्रोथ को कायम रखना किसी चुनौती से कम नहीं है।  इस बैठक का सबसे बड़ा आर्थिक संदेश यह है कि भारत अब रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक नीति पर चल रहा है. वित्त वर्ष 2026 में 7.7% की जीडीपी ग्रोथ हासिल करके भारत ने अपनी आंतरिक मजबूती साबित की है. नीति आयोग की रिपोर्ट और PM-EAC की सलाह का कोर-पॉइंट यह है कि अगर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत अपनी घरेलू मांग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिकॉर्ड सरकारी खर्च के जरिए उसकी भरपाई करेगा. सरकार का यह कदम भारतीय बाजार को एक इंसुलेटेड शील्ड यानी सुरक्षा कवच प्रदान करेगा, जिससे दुनिया की मंदी का असर भारत के युवाओं के रोजगार और उद्योगों पर न पड़े।  सवाल-जवाब PM-EAC की इस आपात बैठक का मुख्य एजेंडा क्या था? इस बैठक का मुख्य एजेंडा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत की विकास दर को ‘सुपरफास्ट’ बनाए रखना, घरेलू उद्योगों को सुरक्षित करना और आर्थिक सुधारों को गति देना था।  पश्चिम एशिया के तनाव से भारतीय अर्थव्यवस्था को क्या खतरा है? भारत अपनी ऊर्जा (क्रूड ऑयल) जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है. पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और माल ढुलाई (शिपिंग रूट) महंगी हो सकती है, जिससे भारत के निर्यात और MSMEs पर असर पड़ सकता है।  नीति आयोग की ‘इम्पैक्ट एसेसमेंट रिपोर्ट’ में क्या खास है? इस रिपोर्ट में युद्ध के लंबे खिंचने की स्थिति में भारतीय व्यापार, किसानों, कृषि क्षेत्र और प्रमुख औद्योगिक सेक्टरों पर पड़ने वाले तात्कालिक और मध्यम अवधि के प्रभावों का पूरा खाका और उससे निपटने के उपाय सुझाए गए हैं।  सरकार ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और ‘ईज ऑफ लिविंग’ पर इतना जोर क्यों दे रही है? वैश्विक उथल-पुथल के समय अगर देश के भीतर व्यापार करना और आम नागरिक का जीवन आसान होगा, तो घरेलू निवेश बढ़ेगा. इससे नए रोजगार पैदा होंगे और विदेशी निवेशकों के लिए भारत सबसे सुरक्षित और पसंदीदा ठिकाना बना रहेगा।