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2030 तक AI बनेगा सबसे बड़ा संसाधन उपभोक्ता? UN रिपोर्ट में पानी-बिजली को लेकर बड़ा खुलासा

नई दिल्ली  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर अक्सर एक तर्क दिया जाता है. लोग कहते हैं कि फ्यूचर में तकनीक सुधरेगी तो एआई मॉडल्स कम एनर्जी और रिसोर्सेज का इस्तेमाल करेंगे. यूनाइटेड नेशन्स की एक नई रिपोर्ट ने इस सोच को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है. यूएन की इस रिपोर्ट में एआई के कारण पर्यावरण को होने वाले भारी नुकसान का डेटा दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2030 तक एआई की बिजली खपत दोगुनी हो सकती है. तब यह पूरी दुनिया की कुल बिजली का 3 प्रतिशत हिस्सा अकेले खा जाएगा. इतना ही नहीं, एआई से होने वाला कार्बन उत्सर्जन ब्रिटेन जैसे देश के बराबर पहुंच जाएगा।  सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एआई डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए इतना पानी लगेगा, जितना पूरी दुनिया की आबादी सालभर में भी नहीं पीती है. यह स्थिति पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है।  जेवंस पैराडॉक्स का वह जाल क्या है जिसमें फंसकर एआई बढ़ा रहा है पर्यावरण की मुसीबत? यूएन की रिपोर्ट में एक बेहद जरूरी आर्थिक सिद्धांत का जिक्र किया गया है. इसे ‘जेवंस पैराडॉक्स’ कहा जाता है. यह सिद्धांत बताता है कि जब कोई नई टेक्नोलॉजी किसी रिसोर्स के इस्तेमाल को ज्यादा एफिशिएंट बनाती है, तो कुल खपत घटती नहीं है. इसके उलट उस रिसोर्स का कुल कंजम्पशन और ज्यादा बढ़ जाता है।  इस सिद्धांत का नाम मशहूर इकोनॉमिस्ट विलियम स्टेनली जेवंस के नाम पर रखा गया था. उन्होंने 19वीं सदी के इंग्लैंड में कोयले के इस्तेमाल के दौरान इस पैटर्न को देखा था. तब कोयले के इंजन ज्यादा एफिशिएंट हो गए थे. इसके बाद भी कोयले की कुल खपत कम नहीं हुई थी  असल में एफिशिएंसी बढ़ने से कोयले की लागत कम हो गई थी. कम लागत के कारण लोगों ने इसका इस्तेमाल बहुत ज्यादा बढ़ा दिया था. इससे कुल डिमांड में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. एआई के मामले में भी बिल्कुल ऐसा ही होने की आशंका है।  जैसे-जैसे एआई मॉडल्स ज्यादा सस्ते और बेहतर होते जाएंगे, वैसे-वैसे इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा. लोग नए-नए कामों के लिए एआई का उपयोग शुरू कर देंगे. इससे एफिशिएंसी से होने वाली कोई भी बचत पूरी तरह खत्म हो जाएगी।  डेटा सेंटर्स दुनिया की कितनी बिजली और पानी सोख रहे हैं और इसके पीछे का सच क्या है?     इस संकट के बड़े पैमाने को समझने के लिए डेटा सेंटर्स की मौजूदा स्थिति को देखना होगा. पिछले साल दुनिया के डेटा सेंटर्स ने मिलकर उतनी ही बिजली खर्च की, जितनी सऊदी अरब जैसा देश करता है. सऊदी अरब दुनिया का 11वां सबसे बड़ा बिजली कंज्यूमर देश है।      अगर साल 2030 तक एआई की बिजली डिमांड दोगुनी हो जाती है, तो इससे पर्यावरण पर भारी असर पड़ेगा. इस बढ़े हुए कार्बन फुटप्रिंट की भरपाई करने के लिए इंसान को बहुत बड़े कदम उठाने होंगे. इसके लिए करीब 10 सालों तक 6.7 बिलियन पेड़ उगाने होंगे।      इतना ही नहीं, साल 2030 तक इन डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की जरूरत होगी. यह पानी डेटा सेंटर्स के भारी-भरकम सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. इसके साथ ही इन सेंटर्स के लिए मेक्सिको सिटी के साइज से दस गुना ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ेगी।  ग्लोबल लेवल पर एआई की ताकत का बंटवारा कैसे पर्यावरण के लिए नई असमानता पैदा कर रहा है? यूएन की रिपोर्ट केवल रिसोर्स के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है. यह एआई बूम के पीछे छिपी गहरी असमानता को भी सामने लाती है. दुनिया में केवल 32 देश ऐसे हैं, जिनके पास एआई के लिए जरूरी क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।  हैरानी की बात यह है कि इस पूरी क्षमता का 90 प्रतिशत हिस्सा केवल अमेरिका और चीन के पास है. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि इससे दुनिया में एक बड़ा डिजिटल डिवाइड पैदा हो रहा है. एक तरफ वे देश हैं जो एआई सिस्टम को पूरी तरह कंट्रोल करते हैं।  दूसरी तरफ वे देश हैं जो केवल इन सिस्टम्स का इस्तेमाल करते हैं. इन कमजोर देशों को पर्यावरण का बहुत बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है. एआई के लिए जरूरी मिनरल्स का एक्सट्रैक्शन और खतरनाक ई-वेस्ट का बोझ अक्सर इन्हीं गरीब देशों पर पड़ता है।  एआई मॉडल्स के अलग-अलग टास्क पर्यावरण पर कितना और किस तरह का असर डालते हैं?     एआई के काम करने के तरीके को दो मुख्य ताकतें तय करती हैं. पहला यह कि हम इसका कितना इस्तेमाल करते हैं. दूसरा यह कि हम इसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं. एआई कई तरह के टास्क पूरे करता है।  .     इसमें टेक्स्ट लिखना, कोड जेनरेट करना, इमेज बनाना और वीडियो बनाना शामिल है. इन सभी कामों को पूरा करने के लिए अलग-अलग कंप्यूटर पावर की जरूरत होती है. इमेज और वीडियो बनाने में टेक्स्ट के मुकाबले कहीं ज्यादा एनर्जी खर्च होती है।      सही मॉडल का चुनाव करना भी बेहद जरूरी है. हर एआई सिस्टम के काम करने की एनर्जी कॉस्ट अलग होती है. इसलिए रिस्पॉन्सिबल एआई के लिए पूरी वैल्यू चेन को संभालना होगा. इसमें मिनरल्स की माइनिंग से लेकर रीसाइक्लिंग और ई-वेस्ट का सही डिस्पोजल शामिल होना चाहिए।  दुनिया के बड़े देश इस संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं और कहां चूक हो रही है? आजकल दुनिया भर की सरकारें अपने पब्लिक सेक्टर में एआई को तेजी से अपना रही हैं. उदाहरण के लिए न्यूजीलैंड की सरकार ने एक नेशनल एआई स्ट्रेटजी तैयार की है. उन्होंने एक पब्लिक सर्विस एआई फ्रेमवर्क भी बनाया है।  यह फ्रेमवर्क सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बात तो करता है, लेकिन इसमें एनवायरमेंटल डिस्क्लोजर की कोई शर्त नहीं है. वहां कोई भी रेगुलेटर एआई की बिजली खपत या एमिशन का डेटा इकट्ठा नहीं कर रहा है. ऑस्ट्रेलिया का भी ऐसा ही हाल है।  ऑस्ट्रेलिया के नेशनल फिल्म एंड साउंड आर्काइव ने ‘बॉवरबर्ड’ नाम का एक टूल बनाया है. यह टूल ऑडियो और वीडियो को ट्रांसक्राइब करने का काम करता है. वहीं वहां का वेटरन्स अफेयर्स डिपार्टमेंट दावों के निपटारे को तेज करने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहा है।  ये दोनों देश एआई रेगुलेशन के मामले में बहुत हल्का रुख अपना … Read more

ईंधन संकट की चिंता खत्म! LPG और पेट्रोल-डीजल की भरपूर आपूर्ति के लिए तैयार हुआ बड़ा रोडमैप

नई दिल्ली  भारत लंबे समय से कच्चे तेल और गैस के लिए विदेशों पर निर्भर रहा है. हर साल अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ पेट्रोल, डीजल और एलपीजी खरीदने में खर्च हो जाता है. लेकिन अब तस्वीर बदलने की तैयारी शुरू हो चुकी है. अंडमान सागर में प्राकृतिक गैस मिलने के बाद मोदी सरकार ने पूर्वी तट पर ऐसा मेगाप्लान शुरू किया है, जो आने वाले सालों में देश की ऊर्जा कहानी बदल सकता है. सरकार अब समुद्र की गहराई में छिपे तेल और गैस भंडार खोजने के लिए बड़े स्तर पर सर्वे करा रही है. अगर यह मिशन सफल हुआ तो भारत को न सिर्फ एलपीजी, पेट्रोल और डीजल की सप्लाई में मजबूती मिलेगी, बल्कि विदेशी तेल कंपनियों पर निर्भरता भी कम होगी. यही वजह है कि ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ इसे भारत का ‘एनर्जी फ्रीडम मिशन’ बता रहे हैं. सरकार की नजर अब उन इलाकों पर है जहां पहले तकनीक की कमी के कारण पूरी तरह खोज नहीं हो पाई थी. अब एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग टेक्नोलॉजी के जरिए समुद्र के नीचे छिपे बड़े हाइड्रोकार्बन भंडार तलाशे जाएंगे।   जानकारी के अनुसार सरकार की यह पूरी योजना सिर्फ तेल खोजने तक सीमित नहीं है. इसके पीछे आर्थिक और रणनीतिक दोनों सोच काम कर रही है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है. घरेलू उत्पादन कम होने के कारण देश को अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है. इससे वैश्विक संकट का असर सीधे भारतीय बाजार पर दिखता है. रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट तनाव के दौरान इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में साफ दिखा था. अब सरकार चाहती है कि देश के भीतर ही ऐसे बड़े भंडार खोजे जाएं, जिससे आने वाले दशकों तक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सके. इसी दिशा में महानदी, बंगाल-पुर्णिया, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी बेसिन जैसे क्षेत्रों में बड़े स्तर पर सर्वे शुरू किए जा रहे हैं. माना जा रहा है कि इन इलाकों में भारी मात्रा में तेल और गैस छिपी हो सकती है।  पूर्वी तट पर शुरू हुआ भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा मिशन     अंडमान सागर में ऑयल इंडिया को प्राकृतिक गैस मिलने के बाद सरकार का फोकस अब पूरी तरह पूर्वी तट पर आ गया है. सरकार ने वैश्विक जियोफिजिकल कंपनियों से निविदाएं मांगी हैं ताकि पुराने सिस्मिक डेटा को दोबारा प्रोसेस किया जा सके और नए ब्रॉडबैंड 3D सर्वे किए जा सकें. यह मिशन करीब 36 महीने तक चलेगा. इसके तहत समुद्र के नीचे की चट्टानों और संरचनाओं का हाई-टेक नक्शा तैयार किया जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे उन क्षेत्रों की पहचान हो सकेगी जिन्हें पहले नजरअंदाज कर दिया गया था।      सरकार इस बार सिर्फ पुराने तरीकों पर भरोसा नहीं कर रही. नई तकनीकों का इस्तेमाल करके समुद्र के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक की स्पष्ट तस्वीर बनाई जाएगी. सर्वेक्षण जहाज समुद्र में लंबी केबल यानी स्ट्रीमर छोड़ेंगे. ये उपकरण साउंड वेव भेजकर नीचे की चट्टानों से लौटने वाली गूंज रिकॉर्ड करेंगे. वैज्ञानिक इस डेटा को प्रोसेस करके पता लगाएंगे कि कहां तेल और गैस फंसी हो सकती है. यही तकनीक दुनिया के बड़े ऑफशोर तेल क्षेत्रों की खोज में इस्तेमाल होती है।      भारत का सबसे बड़ा दांव कृष्णा-गोदावरी यानी KG बेसिन पर माना जा रहा है. यह क्षेत्र पहले से ही देश का प्रमुख गैस उत्पादन केंद्र है. यहां कई बड़े गैस फील्ड मौजूद हैं. लेकिन सरकार का मानना है कि एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग से यहां और गहरे हिस्सों में नए भंडार मिल सकते हैं. KG बेसिन में गैस हाइड्रेट्स, डीप वॉटर रिजर्वायर और जटिल पेट्रोलियम सिस्टम मौजूद हैं. अगर यहां नई खोज होती है तो भारत की गैस सप्लाई में बड़ा उछाल आ सकता है।  महानदी बेसिन में छिपा बड़ा खजाना? ओडिशा तट के पास मौजूद महानदी बेसिन को भारत के सबसे संभावित डीप-वॉटर क्षेत्रों में माना जा रहा है. यहां पहले भी हाइड्रोकार्बन मिलने के संकेत मिल चुके हैं, लेकिन व्यावसायिक उत्पादन सीमित रहा. अब नई तकनीक के जरिए यहां की गहरी सिडिमेंटरी परतों की जांच होगी. वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां 8 किलोमीटर से ज्यादा गहराई तक तेल और गैस मौजूद हो सकते हैं।  बंगाल-पुर्णिया बेसिन पर क्यों टिकी नजर? बंगाल-पुर्णिया बेसिन को भी सरकार बड़ा फ्रंटियर अवसर मान रही है. यहां 10 किलोमीटर तक मोटी सिडिमेंटरी परतें मौजूद हैं. भूवैज्ञानिक अध्ययनों में संकेत मिले हैं कि यहां मियोसीन युग के हाइड्रोकार्बन भंडार हो सकते हैं. पहले यहां बायोजेनिक गैस के संकेत भी मिल चुके हैं. अगर यह क्षेत्र सफल रहा तो पूर्वी भारत की ऊर्जा तस्वीर बदल सकती है।  कावेरी बेसिन से मिल सकती है नई ताकत तमिलनाडु से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैला कावेरी बेसिन पहले से तेल उत्पादन क्षेत्र रहा है. लेकिन सरकार का मानना है कि यहां अभी भी बड़े भंडार छिपे हुए हैं. खासकर ऑफशोर कार्बोनेट सिस्टम और जुरासिक सिं-रिफ्ट प्ले में भारी संभावनाएं बताई जा रही हैं. इस क्षेत्र में सिडिमेंटरी परतें करीब 8 किलोमीटर तक गहरी हैं. यानी यहां भविष्य में बड़े स्तर पर ड्रिलिंग की संभावना है।  विदेशी तेल पर निर्भरता घटाने की तैयारी भारत अभी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है. कच्चे तेल का आयात बिल हर साल लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है. अगर घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो विदेशी मुद्रा की बचत होगी. साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का असर भी कम होगा. यही वजह है कि सरकार इसे सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक मिशन मान रही है।  मल्टी-क्लाइंट मॉडल से कैसे बदलेगा खेल? सरकार इस मिशन में मल्टी-क्लाइंट मॉडल का इस्तेमाल कर रही है. इसका मतलब है कि जियोफिजिकल कंपनियां खुद डेटा जुटाएंगी और बाद में उसे कई ऊर्जा कंपनियों को बेच सकेंगी. इससे सरकार पर शुरुआती आर्थिक बोझ कम होगा. साथ ही निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ेगी. इससे खोज का काम तेजी से आगे बढ़ सकता है।  सरकार पूर्वी तट पर नया सर्वे क्यों करा रही है? सरकार का उद्देश्य समुद्र के नीचे छिपे तेल और प्राकृतिक गैस भंडार की खोज करना है. भारत अभी बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है. अगर घरेलू भंडार मिलते हैं तो एलपीजी, पेट्रोल और डीजल की सप्लाई मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता … Read more

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का बड़ा ऐलान, दिल्ली-सिलीगुड़ी बुलेट ट्रेन कॉरिडोर से जुड़ेंगे कई प्रमुख शहर

कोलकाता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में बुलेट ट्रेन लाने का वादा किया है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्य सचिवालय 'नबन्ना' में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के साथ बैठक के दौरान यह जानकारी दी. रेल मंत्री ने बताया कि 42 वर्षों में कोलकाता मेट्रो नेटवर्क का केवल 28 किलोमीटर हिस्सा ही पूरा हो पाया था, जबकि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से 45 किलोमीटर मेट्रो लाइनें जोड़ी गई हैं।  रेल मंत्री ने शनिवार को कहा कि राज्य के लिए बुलेट ट्रेन शुरू करने का फैसला किया गया है. यह ट्रेन दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी और पटना होते हुए सिलीगुड़ी को जोड़ेगी. इस सफर में सिर्फ छह घंटे लगेंगे और यह आरामदायक होगा. अगले पांच सालों में कोलकाता मेट्रो के लिए 60 नई पीढ़ी की ट्रेनें शुरू की जाएंगी और उम्मीद है कि 'डबल-इंजन' सरकार के तहत पश्चिम बंगाल में रेलवे प्रोजेक्ट्स को नई रफ्तार मिलेगी।  अश्विनी वैष्णव ने कहा, 'अगले पाँच सालों में कोलकाता मेट्रो के लिए 60 नई पीढ़ी की ट्रेनें शुरू की जाएंगी. आज मैंने कोलकाता मेट्रो में सफर किया. हम कोलकाता मेट्रो को नया रूप देंगे.' मंत्री ने यह भी कहा कि दिल्ली-वाराणसी और वाराणसी-सिलीगुड़ी के बीच प्रस्तावित बुलेट ट्रेन सेवाओं का उद्देश्य यात्रा के समय को तेजी से कम करना है. उन्होंने कहा, 'ये हाई-स्पीड कॉरिडोर छह घंटे में सिलीगुड़ी को नई दिल्ली से जोड़ देंगे।  बैठक में शामिल होने के लिए वह शनिवार को  दमदम हवाईअड्डे पर पहुंचे. हवाईअड्डे से निकलने के तुरंत बाद रेल मंत्री मेट्रो में चढ़े और यात्रियों से बातचीत की. उन्होंने ऑटो रिक्शा में भी सवारी की. उनके साथ राज्य के मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय और पुरुलिया के सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो भी थे।  इसके बाद मुख्यमंत्री और रेल मंत्री ने मीडिया को संबोधित किया और राज्य के लिए कई रेल परियोजनाओं को शुरू करने की घोषणा की. बुलेट ट्रेन के बारे में बात करते हुए रेल मंत्री ने कहा, 'इस पर काम जल्द ही शुरू होगा. रेल परियोजना का रास्ता साफ हो गया है और सभी विधायकों ने सहयोग का भरोसा दिया है.' उन्होंने नए स्टेशनों और अतिरिक्त ट्रेनों को शुरू करने का भी वादा किया. साथ ही, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने केंद्रीय मंत्री से राज्य में सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र पर ध्यान देने का आग्रह किया। 

एक पेड़ मां के नाम 3.0’ अंतर्गत राज्यभर में पहले ही दिन 6 लाख पौधों का रोपण किया जाएगा

अहमदाबाद विश्व पर्यावरण दिवस’ पर प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी से प्रेरित ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तीसरे चरण का शुभारंभ होगया। गांधीनगर से मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के करकमलों से राज्यव्यापी अभियान का आरंभ किया गया । गांधीनगर के ‘ज’ रोड पर लोकभवन स्टाफ क्वार्टर्स के पास 0.5 हेक्टेयर क्षेत्र में ‘वन कवच’ पद्धति से लगभग 5,000 पौधों का रोपण कर यह राज्यव्यापी अभियान शुरू किया गया । उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2024 में नई दिल्ली के बुद्ध जयंती पार्क से ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का शुभारंभ किया गया था। वन विभाग के अनुसार वन एवं पर्यावरण मंत्री  अर्जुन मोढवाडिया तथा राज्य मंत्री  प्रवीण माळी के मार्गदर्शन में समग्र राज्य में इस अभियान को गतिमान बनाया जाएगा। पर्यावरणीय संतुलन और जैव विविधता बायोडायवर्सिटी के संरक्षण के लिए गांधीनगर में 57 स्थानीय प्रजातियों के पौधों का रोपण किया जाएगा। जो कि त्रि- स्तरीय होगा। जिसमें 16 प्रजातियों के 20 प्रतिशत उच्च स्तरीय पौधें, 25 प्रजातियों के 50 प्रतिशत मध्यम स्तरीय तथा विभिन्न 16 प्रजातियों के 30 प्रतिशत निम्न स्तरीय पौधों का समावेश होगा। इस वन कवच माइक्रो फॉरेस्ट की विशेषता यह है कि यह बहुत कम स्थान में अत्यंत सघन तथा तेजी से विकसित होने वाला शहरी जंगल तैयार करता है। इसके अतिरिक्त; वन विभाग के अनुसार इस अभियान अंतर्गत केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री तथा गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र के सांसद श् अमित शाह के लोकसभा क्षेत्र को ‘हरियाली लोकसभा’ बनाने के लिए वन विभाग द्वारा लगभग 500 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में 50 लाख से अधिक पौधे लगाकर ‘वन कवच – माइक्रो फॉरेस्ट’ तैयार किया जाएगा। ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ से शुरू कर आगामी सप्ताह तक वन विभाग द्वारा पूरे गुजरात को कवर करने वाले विभिन्न जन कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है, जो कि इस प्रकार हैं : राज्यभर में ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर कुल 50 हजार ‘समूह स्तर’ निर्धारित किए गए हैं। प्रत्येक समूह द्वारा 12 पौधों का रोपण किया जाएगा और एक ही दिन में पूरे राज्य में 6 लाख पौधों का रोपण किया जाएगा। इस सप्ताह के दौरान प्रत्येक जिला स्तर पर मुख्य चार कार्यक्रम तथा सभी 265 तहसीलों को विधानसभा क्षेत्र में महानुभावों की अध्यक्षता में सघन पौधो का रोपण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त सप्ताह के दौरान 265 तहसील स्तरीय कार्यक्रमों के माध्यम से 1.53 लाख से अधिक पौधों का रोपण किया जाएगा तथा 1.87 लाख से अधिक पौधे निःशुल्क वितरित किए जाएंगे। साथ ही तहसीलों में 861 निर्धारित स्थलों पर वन विभाग के मार्गदर्शन में अतिरिक्त 4.15 लाख से अधिक पौधे लगाए जाएंगे। वन विभाग ने राज्य के प्रत्येक नागरिक, सामाजिक संस्थाओं तथा युवाओं से अपनी माता के नाम पर कम से कम एक वृक्ष लगाने और उसके संरक्षण करने के लिए अनुरोध किया है।

शाला प्रवेशोत्सव से पहले प्राथमिक विद्यालयों में पुस्तकें पहुँचाने के लिए प्रशासन सजग: पावरा

अहमदाबाद  गुजरात राज्य शाला पाठ्यपुस्तक मंडल के कार्यवाहक अध्यक्ष  मनुभाई पावरा ने कहा है कि मुख्यमंत्री  भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन औरे शिक्षा मंत्री  प्रद्युमन वाजा तथा शिक्षा राज्य मंत्री मती रिवाबा जाडेजा के नेतृत्व में पाठ्यपुस्तक वितरण का कार्य चल रहा है। गुजरात बोर्ड से संबद्ध प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों तक के सभी माध्यमों की पाठ्यपुस्तकों को निर्धारित समयसीमा में विद्यार्थियों तक पहुँचाने के लिए मंडल द्वारा युद्धस्तर पर एवं सुदृढ़ आयोजन के साथ कार्य शुरू किया गया है।  मनुभाई ने अधिक विस्तार से जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि चालू शैक्षणिक वर्ष में विद्यार्थियों के हित में कुछ नूतन विषयों को जोड़कर पाठ्यपुस्तक निर्माण की प्रक्रिया समय पर प्रारंभ कर दी गई थी, लेकिन कुछ अनिवार्य न्यायिक प्रक्रियाओं – कोर्ट केस तथा ईरान सहित अन्य देशों के बीच उत्पन्न हुई वैश्विक युद्ध की विषम स्थिति के कारण कागज के आयात में लगभग ढाई से तीन महीनों का आकस्मिक विलंब हुआ था। हालाँकि; मंडल की समग्र टीम सभी अंतरराष्ट्रीय एवं कानूनी अवरोधों को पार कर विद्यार्थियों का शैक्षणिक कार्य जरा भी प्रभावित न हो; इसके लिए हाल में दिन-रात पुरजोर तरीके से प्रिंटिंग कार्य कर रही है। अध्यक्ष  पावरा ने राज्य के नागरिकों तथा अभिभावकों को विश्वास दिलाया कि इन सभी आकस्मिक वैश्विक चुनौतियों के बावजूद पुस्तकों के मूल्य में किसी भी प्रकार की वृद्धि नहीं की गई है और अभिभावकों पर एक भी रुपए का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने नहीं दिया जाएगा। पुस्तक वितरण की वर्तमान स्थिति तथा आगामी सुदृढ़ आयोजन की रूपरेखा देते हुए अध्यक्ष  मनुभाई ने जोड़ा कि राज्य के निजी एवं नॉन-ग्रांटेड विद्यालयों के लिए शुल्कयुक्त पुस्तकें वितरकों तक समय पर पहुँचा दी गई हैं, जो वर्तमान में विद्यार्थियों को उपलब्ध भी हो चुकी हैं, जबकि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के सभी विद्यार्थियों को आगामी 'शाला प्रवेशोत्सव' से पूर्व ही सभी पाठ्यपुस्तकें तहसील स्तर तक पूर्ण रूप से निःशुल्क मिल जाएँ; ऐसी माइक्रो-प्लानिंग प्रशासन द्वारा सुनिश्चित की गई है। इसके अतिरिक्त; सरकारी तथा ग्रांटेड माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में भी पुस्तकें अत्यंत तेजी से पहुँचाने के लिए विभिन्न सरकारी एजेंसियाँ तत्परता से कार्य कर रही हैं। अभिभावकों और विद्यार्थियों को पूर्ण रूप से आश्वस्त करते हुए अध्यक्ष  मनुभाई ने कहा कि भौगोलिक चुनौतियों अथवा सुदूरवर्ती-रिमोट क्षेत्रों में आकस्मिक परिस्थितिवश यदि भौतिक रूप से (फिजिकली) पुस्तक पहुँचने में थोड़ा भी विलंब हो, तो भी विद्यार्थियों का शैक्षणिक कार्य कहीं अवरुद्ध न हो; इसके लिए मंडल ने अत्याधुनिक 'डिजिटल बैकअप' की अग्रिम व्यवस्था की है। मंडल की आधिकारिक वेबसाइट  https://gsstb.gujarat.gov.in/gsstb/Textbook पर सभी माध्यमों की पाठ्यपुस्तकें डिजिटल रूप में – ई-पुस्तकों (e-Books) के रूप में अपलोड कर दी गई हैं। शैक्षणिक सत्र के प्रारंभिक चरण में शिक्षक तथा विद्यार्थी बिना किसी कठिनाई के वेबसाइट से सीधे ही प्रकरणों को डाउनलोड कर सकेंगे। इसके साथ ही; शिक्षक भी इनका संदर्भ के रूप में उपयोग कर बच्चों को पढ़ा सकेंगे। पाठ्यपुस्तक मंडल के अध्यक्ष  मनुभाई पावरा ने कहा कि राज्य सरकार तथा पाठ्यपुस्तक मंडल हर विद्यार्थी के उज्ज्वल भविष्य और शैक्षणिक हित के प्रति अत्यंत संवेदनशील एवं गंभीर है और किसी भी विषम स्थिति में भी अंतिम छोर के बच्चे तक शिक्षा की सुविधा पहुँचाने के लिए हम कटिबद्ध हैं।

गुजरात के मोरबी में तेज रफ्तार का कहर, भीषण टक्कर में पांच की गई जान

 मोरबी मोरबी में हलवद क्षेत्र के चराडवा गांव के पास एक दर्दनाक हादसे में पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि एक बाइक सवार गंभीर रूप से घायल हो गया. यह घटना उस समय हुई, जब एक कार वाहन से टकरा गई. हादसा इतना भीषण था कि मौके पर ही चीख-पुकार मच गई। जानकारी के अनुसार, कार में कुल सात लोग सवार थे, जो सभी हलवद के रणछोड़गढ़ गांव के रहने वाले थे. यह सभी किसी काम से जा रहे थे, तभी चराडवा गांव के पास उनकी कार आगे चल रही एक अज्ञात गाड़ी के पिछले हिस्से से जा टकराई. टक्कर इतनी जोरदार थी कि कार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई।  इस हादसे में तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो अन्य ने अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. बाकी घायलों का इलाज स्थानीय अस्पताल में जारी है. सूचना के बाद पुलिस टीम मौके पर पहुंची और जायजा लिया. पुलिस ने शव कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए हैं. वहीं मामले की जांच शुरू कर दी है।  इसी बीच एक और दर्दनाक घटना भी सामने आई, जिसमें परेश नाम का एक युवक बाइक से हलवद की ओर जा रहा था. मानसर गांव के पास उसकी बाइक फिसल गई, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया. घायल हालत में उसे अस्पताल ले जाया जा रहा था, तभी वही कार, जो पहले से हादसे में शामिल थी, एक अज्ञात वाहन के पीछे से टकरा गई। लगातार हुए इन हादसों ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क पर तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाना अक्सर ऐसे हादसों की वजह बनता है. पुलिस ने दोनों घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है. गांव में मातम का माहौल है और हर तरफ गम का सन्नाटा पसरा हुआ है। 

अटल पेंशन योजना को बड़ा झटका? RTI रिपोर्ट में सामने आया 1.49 करोड़ एग्जिट का आंकड़ा

नई दिल्ली सरकारी पेंशन स्कीम 'अटल पेंशन योजना' की खूब चर्चा होती है. अटल पेंशन योजना (APY) की शुरुआत साल 2015 में हुई थी. दरअसल, देश के असंगठित क्षेत्र के कामगारों को बुढ़ापे में वित्तीय सुरक्षा देने के उद्देश्य से इस स्कीम की शुरुआत की गई है. RTI के जरिये APY को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है।   सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में पता चला है कि साल 2015 में योजना की शुरुआत से लेकर अब तक लगभग 1.49 करोड़ लोग इस स्कीम से बाहर हो चुके हैं. पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) के आंकड़ों के मुताबिक योजना में हर साल रिकॉर्ड रजिस्ट्रेशन हो रहे हैं. लेकिन साथ ही समय से पहले खाता बंद करने या मृत्यु के कारण स्कीम से बाहर होने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।  RTI से मिले आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2026 तक अटल पेंशन योजना के तहत कुल रजिस्ट्रेशन 8.96 करोड़ तक पहुंच चुका था. लेकिन इनमें से केवल 7.45 करोड़ सब्सक्राइबर ही फिलहाल एक्टिव हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि एक बहुत बड़ा हिस्सा अब इस योजना का सक्रिय रूप से लाभ नहीं उठा रहा है।  साल-दर-साल बढ़ता एग्जिट का ग्राफ योजना के शुरुआती साल 2015-16 के दौरान केवल 2 लोगों ने स्कीम छोड़ी थी. लेकिन हालिया वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा सालाना 30.24 लाख से अधिक को पार कर गया. एक तरफ जहां एग्जिट करने वालों की संख्या बढ़ी है, वहीं दूसरी तरफ नए रजिस्ट्रेशन के मामले में योजना ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. अकेले वित्तीय वर्ष 2025-26 में 1.35 करोड़ से अधिक नए सब्सक्राइबर्स इस योजना से जुड़े, जो इसके लॉन्च के बाद से किसी भी एक साल में सबसे बड़ी संख्या है।  जब RTI के जरिए यह पूछा गया कि कितने सब्सक्राइबर्स ने रजिस्ट्रेशन के 1 साल, 3 साल या 5 साल के भीतर योगदान देना बंद कर दिया, तो PFRDA ने साफ कर दिया कि अटल पेंशन योजना के तहत 'डिसकंटिन्यूएशन' जैसी कोई अवधारणा नहीं है. इसलिए अगर किसी कारणवश कोई सब्सक्राइबर योगदान देना बंद कर देता है, तो वह बाद में बकाया ब्याज और देरी से किए गए योगदान का भुगतान करके अपने खाते को फिर से चालू कर सकता है।  क्या है अटल पेंशन योजना? अटल पेंशन योजना (APY) की शुरुआत साल 2015 में विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों जैसे रेहड़ी-पटरी वाले, मजदूर, कारपेंटर, घरेलू सहायक   के लिए की गई थी. इसके तहत 18 से 40 वर्ष की आयु के भारतीय नागरिक निवेश कर सकते हैं. 60 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद सब्सक्राइबर्स को उनके योगदान के आधार पर 1,000 रुपये से लेकर 5,000 रुपये प्रति माह तक पेंशन मिलती है। 

रक्षा सौदे में नया मोड़: भारत के रुख से फ्रांस को लग सकता है झटका, मित्र देश ने दिया नया ऑफर

नई दिल्ली भारत फाइटर जेट स्क्वाड्रन की घटती संख्या को मेंटेन करने के लिए फ्रांस के साथ 114 राफेल जेट की डील पर बातचीत कर रहा है. यह करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की डील है. इसको लेकर इंडियन एयर फोर्स चीफ एपी सिंह एक दिन पहले तक फ्रांस में थे. लेकिन, अभी तक इस डील का सबसे बड़ा पेच नहीं सुलझा है. भारत चाहता है कि फ्रांस इस जेट का सोर्स कोड नहीं तो कम से कम इंटरफेस डॉक्यूमेंट साझा करे जिससे कि भारत इस जेट में देसी ब्रह्मोस जैसी घातक मिसाइलें लगा सके. लेकिन, फ्रांस इंटरफेस डॉक्यूमेंट भी नहीं देना चाहता है. उसकी चिंता है कि अगर वह भारत के साथ यह डॉक्यूमेंट साझा करेगा तो उसकी पूरी गोपनीयता भारत के हाथ लग जाएगी. फिर ये गोपनीय जानकारी भारत के जरिए उसके दुश्मन देश यानी रूस तक पहुंच जाएगी. इसी कारण वह फिलहाल राफेल का इंटरफेस डॉक्यूमेंट नहीं देना चाहता है।  भारत के लिए सुखद ऑफर इस बीच भारत के लिए एक सुखद खबर आई है. राफेल को लेकर बनी भ्रम की स्थिति के बीच पुराने दोस्त रूस ने बड़ा ऑफर दिया है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुद एक बड़ी पेशकश कर दी है. उन्होंने इंटरनेशनल प्रेस मीट में कहा कि रूस पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट Su-57 से लेकर एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम तक हर स्तर पर भारत का सहयोग करने के लिए तैयार है. पुतिन का स्पष्ट रूप से यह कहना दुनिया खासकर फ्रांस के लिए एक बड़ा संदेश है. भारत रूस से एसयू-57 खरीदने की भी योजना पर काम कर रहा है. ऐसे में भारत कितनी संख्या में यह जेट खरीदेगा यह काफी हद तक राफेल डील पर निर्भर करेगा।  दरअसल, एसयू-57 पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट है. अभी तक दुनिया में केवल तीन देश ही पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स इस्तेमाल कर रहे हैं. इसमें एक अमेरिका, दूसरा चीन और तीसरा देश रूस है. हालांकि रूसी पांचवीं पीढ़ी के जेट एसयू-57 को लेकर एक्सपर्ट कई सवाल भी उठाते रहे हैं लेकिन, रूस की ओर से पूरा सोर्स कोड़ साझा करने, भारत में इस जेट को बनाने और भारत की जरूरत के हिसाब से इस जेट में बदलाव करने जैसे ऑफर को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है. सामरिक मामलों के एक्सपर्ट यहां तक कह रहे हैं कि भारत की योजना राफेल के साथ-साथ सुखोई-57 के कम से कम तीन स्क्वाड्रन लेने की है. इससे भारत पांचवीं पीढ़ी की अपनी तात्कालिक जरूरत को पूरा कर लेगा. इसके बाद 2035 तक भारत का अपना 5+ पीढ़ी का जेट एम्का तैयार हो जाएगा. भारत एम्का प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहा है।  फ्रांस को संदेश रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का ऑफर भारत के नजरिए से काफी अहम है. पुतिन इंटरनेशनल प्रेस के सामने यह बात कही है. ऐसे में पुतिन का यह बयान काफी कुछ कहता है. इसमें यह संदेश छिपा है कि अगर फ्रांस भारत के साथ इंटरफेर डॉक्यूमेंट नहीं साझा करता है तो भारत के विकल्प खुले हैं. भारत पहले ही से रूस का एक बड़ा सैन्य पार्टनर रहा है. इस वक्त भी भारतीय एयरफोर्स की रीढ़ सुखोई-30 एमके जेट हैं. ये चौथी पीढ़ी के जेट हैं और भारत के पास इसके 250 से अधिक यूनिट हैं. इनको भारत में ही असेंबल किया गया है. रूस ने सुखोई-30एमकेई के प्लांट में ही सुखोई-57 को असेंबल करने का ऑफर दिया है. इससे भारत के लिए खर्च में काफी कमी आ जाएगी. इसके साथ ही रूसी विमानों में किसी भी भारतीय मिसाइल को जोड़ना आसान रहेगा. ऐसे में पुतिन का संदेश केवल भारत के लिए नहीं है बल्कि फ्रांस के लिए भी है। 

EPF का ब्याज कब आएगा खाते में? लाखों कर्मचारियों के लिए अहम अपडेट

 नई दिल्‍ली देश के करोड़ों ईपीएफ सदस्‍य इन दिनों अपने अकाउंट में ब्‍याज आने का इंतजार कर रहे हैं. कर्मचारी भविष्‍य निधि संगठन (EPFO) ने मार्च 2026 में फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए 8.25 फीसदी ब्‍याज का ऐलान किया था, लेकिन नया फाइनेंशियल ईयर शुरू होने के 2 महीने से ज्‍यादा समय होने के बाद भी अभी तक सदस्‍यों के अकाउंट में ब्‍याज का पैसा ट्रांसफर नहीं हुआ है।  ऐसे में पीएफ अकाउंट होल्‍डर्स को इस बात की टेंशन हो रही है कि उनके पीएफ का पैसा कब खाते में भेजा जाएगा? हालांकि, ईपीएफओ ने कहा है कि घबराने की जरूरत नहीं है. जल्‍द ही पीएफ अकाउंट के तहत पैसा सदस्‍यों के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाएगा।  EPFO के केंद्रीय न्यासी बोर्ड (CBT) ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए मार्च 2026 में EPF पर 8.25% सालाना ब्याज दर की सिफारिश की थी. इसके बाद से सरकार की मंजूरी और नोटिफिकेशन जारी होने का इंतजार किया जा रहा है. यह अपडेट आने के बाद कर्मचारियों के खाते में ब्‍याज का पैसा जमा कर दिया जाएगा. फिलहाल, सरकार की मंजूरी का इंतजार किया जा रहा है। क्‍यों हो रही है देरी? फाइनेंशियल ईयर खत्म होते ही EPFO ब्याज कर्मचायों के पीएफ अकाउंट में ट्रांसफर नहीं कर देता है, बल्कि इसके पीछे कई प्रॉसेस होते हैं. पहले सरकार की मंजूरी ली जाती है, फिर करोड़ों अकाउंट के आंकड़ों को चेक किया जाता है और रिकॉर्ड अपडेट किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में कुछ महीने लग जाते हैं. पिछले कुछ सालों में भी ब्याज जून और जुलाई के दौरान खातों में जमा किया गया था. इस कारण, इस बार भी ब्‍याज जमा होने में देरी हो रही है।  देरी से क्‍या होगा नुकसान?  ब्‍याज का पैसा लेट से आने का मतलब ये नहीं होता है कि सदस्‍यों को ब्‍याज में नुकसान होगा. EPFO के नियमों के अनुसार, अकाउंट होल्‍डर्स को किसी तरह का नुकसान नहीं होगा. ब्‍याज का कैलकुलेशन अकाउंट में मौजूदा बैलेंस के आधार पर की जाती है, यानी भले ही ब्‍याज की एंट्री बाद में दिखाई दे, लेकिन पूरे साल का ब्‍याज दर से जोड़ा जाएगा. EPFO कई बार यह कह चुका है कि ब्‍याज जमा होने में देरी का अस सदस्‍यों को मिलने वाले अमाउंट पर नहीं पड़ता है. पूरा ब्‍याज उनके अकाउंट में जमा किया जाता है।  कैसे करें चेक अकाउंट में ब्‍याज आया कि नहीं?      EPF मेंबर अपने अकाउंट की जानकारी कई तरह से देख सकते हैं.     UMANG ऐप पर लॉगिन कर View Passbook विकल्प चुन सकते हैं.      इसके साथ ही EPFO की Member Passbook सेवा के जरिए भी बैलेंस और ब्याज की जानकारी देखी जा सकती है.      सदस्य अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से 9966044425 पर मिस्ड कॉल देकर या 7738299899 पर SMS भेजकर भी PF बैलेंस की जानकारी ले सकते हैं.     अगर पासबुक में Int. Updated up to 31/03/2026 लिखा दिखाई देता है, तो समझिए कि ब्याज अपडेट किया जा चुका है.     

सरकारी कर्मचारियों के लिए खुशखबरी या इंतजार? 8वें वेतन आयोग को लेकर नई चर्चा

नई दिल्ली केंद्रीय कर्मचारियों के लिए गठित आठवां वेतन आयोग एक्शन मोड में आ चुका है। वेतन आयोग अलग-अलग कर्मचारी संगठनों के साथ बैठक भी कर रहा है। इस दौरान वेतन आयोग कर्मचारी संगठनों की सुझाव और सिफारिशों पर मंथन भी कर रहा है। वेतन आयोग ने केंद्रीय कर्मचारियों और कर्मचारी संगठनों को राहत देते हुए सुझाव और मेमोरेंडम जमा करने की अंतिम तिथि को भी बढ़ा दिया है। आयोग ने अब यह समयसीमा 15 जून 2026 तक कर दी है। यह तीसरी बार है जब मेमोरेंडम जमा करने की तारीख बढ़ाई गई है। इस फैसले के बाद एक बार फिर से ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने में देरी होगी। बता दें कि वेतन आयोग को उसके गठन के बाद सिफारिशों को सौंपने के लिए 18 महीने का समय मिला है। बैकडेट से लागू होने की उम्मीद वेतन आयोग की सिफारिशों में देरी का असर कर्मचारियों और सरकार दोनों पर पड़ सकता है। दरअसल, वेतन आयोग की सिफारिशें बैकडेट यानी 1 जनवरी 2026 से लागू होने की उम्मीद है। अगर सिफारिशों के लागू होने में देरी होती है तो कर्मचारियों का एरियर बढ़ जाएगा। वहीं, नई वेतन संरचना लागू होने पर सरकार को एकमुश्त भुगतान करना होगा। इससे सरकारी खजाने का बोझ बढ़ जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार केंद्रीय कर्मचारियों का बेसिक सैलरी का एरियर मिल सकता है लेकिन हाउस रेंट अलाउंस (HRA) जैसे कुछ भत्तों का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा। बता दें कि HRA का भुगतान आमतौर पर पूर्व प्रभाव से नहीं किया जाता। ऐसे में वेतन आयोग की रिपोर्ट जितनी देर से आएगी, कर्मचारियों की कुछ संभावित वित्तीय लाभों पर उतना ही असर पड़ सकता है। वेतन आयोग ने मेमोरेंडम जमा करने की प्रक्रिया 5 मार्च 2026 को शुरू हुई थी। शुरुआत में इसकी अंतिम तिथि 30 अप्रैल तय की गई थी, जिसे बाद में 31 मई तक बढ़ाया गया। अब इसे 15 जून तक बढ़ा दिया गया है। मेमोरेंडम केवल वेतन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट 8cpc.gov.in के माध्यम से ही स्वीकार किए जाएंगे। ईमेल, पीडीएफ या हार्ड कॉपी के रूप में भेजे गए सुझावों पर विचार नहीं किया जाएगा। बता दें कि पिछले साल जनवरी महीने में सरकार ने पहली बार आठवें वेतन आयोग के गठन का ऐलान किया था। हालांकि, इसकी घोषणा नवंबर महीने में की गई। वेतन आयोग के गठन के बाद फरवरी 2026 में वेबसाइट को लॉन्च किया गया। वेतन आयोग की इस वेबसाइट पर सुझाव दिए जा सकते हैं।