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भाजपा प्रदेश कार्यसमिति होगी अपडेट, 75% नए सदस्य और कुल 106 सदस्य होंगे शामिल

भोपाल   भाजपा प्रदेश संगठन में बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में संगठन को अधिक प्रभावी और चुस्त बनाने के लिए प्रदेश कार्यसमिति के आकार में कटौती का प्रस्ताव तेजी से आगे बढ़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, लंबे समय बाद कार्यसमिति के सदस्यों की संख्या को करीब 50 प्रतिशत तक कम करने पर गंभीरता से काम किया जा रहा है। वर्तमान में 62 संगठनात्मक जिलों में कुल 463 सदस्य हैं, जिनमें 187 प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, 52 स्थायी आमंत्रित और 224 विशेष आमंत्रित सदस्य शामिल हैं। नए प्रस्ताव के तहत इस संख्या को घटाकर सिर्फ 106 तक सीमित करने की योजना है। इसके साथ ही विशेष आमंत्रित सदस्यों की संख्या को भी नियंत्रित करने का फार्मूला तैयार किया गया है। नई व्यवस्था के अनुसार, विशेष आमंत्रित सदस्य कुल संख्या के अधिकतम 30 प्रतिशत तक ही रखे जाएंगे, जिससे संगठन में संतुलन और कार्यक्षमता दोनों बढ़ाई जा सके। ओरछा में प्रस्तावित प्रदेश कार्यसमिति बैठक से पहले ही इस नए ढांचे को लागू करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। खास बात यह भी सामने आ रही है कि इस बार कार्यसमिति में करीब 75 प्रतिशत नए चेहरों को मौका मिल सकता है, जिससे संगठन में नई ऊर्जा और ताजगी आने की उम्मीद है।

चुनावी जीत के बाद MP में सियासी गतिविधियां बढ़ीं, जल्द होगा कैबिनेट विस्तार

 भोपाल बंगाल समेत पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद अब मध्य प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है. बंगाल, असम और पुडुचेरी में बीजेपी के पक्ष में आए चुनाव परिणामों ने उस प्रक्रिया को फिर से गति देने के संकेत दिए हैं, जो चुनावों के चलते कुछ समय के लिए थम गई थी. सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री मोहन यादव की अगुवाई वाली सरकार में इस साल कैबिनेट विस्तार और फेरबदल संभव है।  पिछले कुछ महीनों में कई मंत्रियों के बयानों और बॉडी लैंग्वेज ने संगठन को असहज किया है. सार्वजनिक मतभेद और बयानबाजी ने इन संकेतों को और स्पष्ट किया. इसी को देखते हुए मंत्रियों का परफॉर्मेंस ऑडिट कराया गया, जिसकी रिपोर्ट अब पार्टी हाईकमान के पास है. मंत्रियों के कामकाज और संगठन के साथ समन्वय की समीक्षा की गई है, और माना जा रहा है कि इन्हीं आधारों पर मंत्रिमंडल में फेरबदल के फैसले लिए जा सकते हैं।  राजनीतिक दृष्टि से यह फेरबदल अहम माना जा रहा है, क्योंकि राज्य सरकार अपने कार्यकाल के मध्य चरण में पहुंच चुकी है. मोहन सरकार के करीब ढाई साल पूरे हो चुके हैं और अगले ढाई साल चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होंगे. ऐसे में पार्टी किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं है और समय रहते संगठन और सरकार के बीच तालमेल मजबूत करना चाहती है।  कराया गया है मंत्रियों के कामकाज का मूल्यांकन दरअसल, पिछले कुछ महीनों में कई मंत्रियों के बयानों और बॉडी लैंग्वेज ने संगठन को असहज किया है. सार्वजनिक मतभेद और बयानबाजी ने इन संकेतों को और स्पष्ट कर दिया था. यही वजह है कि मंत्रियों का परफॉर्मेंस ऑडिट कराया गया, जिसकी रिपोर्ट अब हाईकमान के पास है. मंत्रियों के कामकाज का मूल्यांकन कराया गया है. संगठन ने जो समन्वय बढ़ाने के निर्देश दिए थे, उनकी भी परीक्षा अब इस फेरबदल में होगी. राजनीतिक तौर पर यह फेरबदल बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि राज्य सरकार अपने कार्यकाल के मध्य बिंदु पर लगभग पहुंच चुकी है यानी मोहन सरकार के ढाई साल पूरे हो चुके हैं. अगले ढाई साल पूरी तरह चुनावी मोड में होंगे. ऐसे में पार्टी कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रही और मान कर चल रही है कि कैबिनेट में फेरबदल या विस्तार का यही सही समय है।  कैबिनेट में विस्तार करने की गुंजाइश अभी बाकी संख्या के लिहाज से भी देखा जाए तो कैबिनेट में विस्तार करने की गुंजाइश अभी बाकी है. फिलहाल मोहन कैबिनेट में 31 मंत्री हैं, जबकि अधिकतम संख्या 35 हो सकती है यानी चार नए चेहरों की एंट्री करने की संभावना बाकी है. लेकिन सवाल यह है कि इसके साथ ही क्या मौजूदा मंत्रियों की विदाई होगी या बचे हुए चार खाली मंत्री पदों पर नियुक्तियां होंगी. सवाल इस बात का भी है कि क्या गुजरात की ही तर्ज पर यहां भी तो कहीं पूरी कैबिनेट को नहीं बदल दिया जाएगा? हालांकि इसकी संभावना यहां इसलिए कम है क्योंकि गुजरात के अलावा अन्य किसी राज्य में बीजेपी ने पूरी कैबिनेट को नहीं बदला. इसी साल मार्च में बीजेपी शासित उत्तराखंड में  पूरी कैबिनेट बदलने के बजाय, धामी सरकार ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए 5 नए चेहरों को मंत्री पद की शपथ दिलाई थी।  संख्या के लिहाज से भी कैबिनेट विस्तार की गुंजाइश बनी हुई है. फिलहाल मंत्रिमंडल में 31 मंत्री हैं, जबकि अधिकतम संख्या 35 हो सकती है. यानी चार नए चेहरों को शामिल किए जाने की संभावना है. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि नए मंत्रियों की एंट्री के साथ कुछ मौजूदा मंत्रियों की छुट्टी होगी या सिर्फ खाली पदों को भरा जाएगा. एक सवाल यह भी है कि क्या गुजरात की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी पूरी कैबिनेट बदली जा सकती है।  हालांकि इसकी संभावना कम मानी जा रही है, क्योंकि बीजेपी ने गुजरात के अलावा अन्य राज्यों में ऐसा कदम नहीं उठाया है. हाल ही में उत्तराखंड में भी कैबिनेट विस्तार के तहत नए चेहरों को शामिल किया गया, लेकिन पूरी कैबिनेट नहीं बदली गई. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए 5 नए चेहरों को मंत्री पद की शपथ दिलाई थी।  मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें तेज हालांकि राजनीतिक गलियारों में इस भेंट को मंत्रिमंडल विस्तार और संभावित बदलावों से जोड़कर देखा जा रहा है। चुनावी नतीजों के बाद संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर संतुलन साधने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। ‘गुजरात मॉडल’ की तर्ज पर बदलाव की चर्चा सूत्रों के अनुसार, मॉडल की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी बड़ा कदम उठाया जा सकता है। गुजरात में पूर्व में सभी मंत्रियों से इस्तीफा लेकर पूरी तरह नया मंत्रिमंडल गठित किया गया था। इसी तरह का प्रयोग मध्यप्रदेश में भी संभव माना जा रहा है, हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। आधिकारिक ऐलान का इंतजार फिलहाल सरकार की ओर से मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। लेकिन हालिया राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए आने वाले दिनों में बड़ा फैसला सामने आ सकता है।

कांग्रेस ने किया ऐलान: किसानों के समर्थन में कल 7 स्थानों पर हाईवे जाम, दिग्गज नेता रहेंगे मौजूद

भोपाल  मप्र में कल गुरुवार 7 मई को कांग्रेस बड़े आंदोलन की तैयारी में है। पार्टी प्रदेशभर में 7 अलग-अलग स्थानों पर नेशनल हाईवे जाम करेगी। आंदोलन का नेतृत्व वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने घोषित किया। बुधवार को भोपाल में पीसी शर्मा ने बताया कि सरकार की खरीदी व्यवस्था पूरी तरह विफल हो चुकी है। बार-बार खरीदी और स्लॉट बुकिंग की तारीख बढ़ाने से सिस्टम की कमजोरी उजागर हो गई है। उन्होंने कहा कि खरीदी के शुरुआती 14 दिनों में सिर्फ 9.30 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी हुई है, जिससे किसानों को भारी नुकसान हो रहा है। किसान स्लॉट बुकिंग, पंजीयन पर्ची अपलोड और भुगतान में देरी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। कांग्रेस के इस आंदोलन से 11 जिलों के करीब 747 किलोमीटर क्षेत्र में यातायात प्रभावित होने की आशंका है। पार्टी ने इसे किसानों के हित में बड़ा आंदोलन बताया है, जबकि प्रशासन ने भी सुरक्षा और ट्रैफिक मैनेजमेंट की तैयारियां शुरू कर दी हैं। किसानों को नहीं मिल रहीं मूलभूत सुविधाएं कांग्रेस का आरोप है कि खरीदी केंद्रों पर पेयजल, छाया, बैठने और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। किसानों को कई दिनों तक ट्रैक्टर-ट्रॉली के साथ सड़कों पर इंतजार करना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि किसान मजबूरी में 1800 से 2022 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर व्यापारियों को गेहूं बेच रहे हैं। कांग्रेस की मांगें पार्टी ने सरकार से मांग की है कि किसानों को 2625 रुपए प्रति क्विंटल का भाव दिया जाए और कम कीमत पर बेचे गए गेहूं का अंतर भावांतर योजना के तहत सीधे खातों में डाला जाए। साथ ही मूंग और सोयाबीन के दामों को लेकर भी जवाब मांगा गया है। मंत्री बोले- वेयरहाउस की क्षमता में 20% बढ़ाई मध्यप्रदेश के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री गोविंदसिंह राजपूत ने कहा कि मुख्यमंत्री और विभाग द्वारा गेहूं खरीदी के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदी की अनुमति थी, लेकिन किसानों के अधिक पंजीयन को देखते हुए केंद्र सरकार से इसे बढ़ाकर 100 लाख मीट्रिक टन करा लिया गया है। मंत्री ने कहा कि खरीदी प्रक्रिया सुचारू रूप से चल रही है और अब तक करीब 15 लाख स्लॉट बुक हो चुके हैं। 50 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूं की खरीदी भी हो चुकी है। राजपूत ने कहा कि किसानों की सुविधा के लिए तौल कांटे बढ़ाए गए हैं और वेयरहाउस की क्षमता में 20% तक की बढ़ोतरी की गई है, ताकि भंडारण में दिक्कत न आए। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री खुद औचक निरीक्षण कर रहे हैं और वे स्वयं भी विभिन्न केंद्रों का दौरा कर रहे हैं। भाजपा ने कांग्रेस पर साधा निशाना- कांग्रेसी किसी किसान को एक गिलास पानी तक नहीं पिलाते मंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेसी किसी किसान को एक गिलास पानी तक नहीं पिलाते और आंदोलन का ढोंग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष में होने के कारण कांग्रेस इस तरह के कदम उठा रही है, लेकिन हाईवे जाम से आम जनता को परेशानी होगी। राजपूत ने कहा कि सड़कों को जाम करने से लोगों की आवाजाही प्रभावित होगी और इससे आम नागरिकों को अनावश्यक दिक्कतें झेलनी पड़ेंगी। उन्होंने कांग्रेस से इस पर पुनर्विचार करने की अपील की। मंत्री ने यह भी कहा कि अन्य राज्यों में कांग्रेस की स्थिति कमजोर है और पार्टी को आंदोलन करने के बजाय आत्ममंथन करने की जरूरत है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बोले कांग्रेस ने आज तक अन्नदाता की चिंता नही की कांग्रेस को तो यह बात कहने का भी अधिकार नहीं हैं। हमारी सरकार बनने के बाद हम अन्नदाता को किसान सम्मान निधि दे रहे हैं। समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीदी की जा रही हैं, जबकि बारदाने का संकट था। जीतू पटवारी को किसानों से माफी मांगना चाहिए। वो बताएं कि 2003-04 के पहले उन्होंने अन्नदाता के लिए क्या किया? जीतू पटवारी को आत्ममंथन और आत्मचिंतन करने की जरुरत है।

फारूक अब्दुल्ला बोले, पंजाब के डबल ब्लास्ट में नया क्या है, भारत में धमाके आम हैं

श्रीनगर  पंजाब में एक दिन में हुए दो धमाकों के बाद तनाव बना हुआ है। पुलिस का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े एजेंट्स राज्य में माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला का कहना है कि देश में धमाके होना कोई नई बात नहीं है। फिलहाल, इन घटनाओं की जांच जारी है। राहत की बात है कि किसी के घायल होने की कोई खबर नहीं है। बुधवार को पत्रकारों ने अब्दुल्ला से पंजाब में हुई घटना को लेकर सवाल किया था। इसपर उन्होंने जवाब दिया, 'हिन्दुस्तान में ब्लास्ट होते रहते हैं। कौन सी नई बात है। आगे।' पंजाब में ब्लास्ट पंजाब के जालंधर में हुए विस्फोट के करीब तीन घंटे बाद अमृतसर में खासा के सेना छावनी क्षेत्र के पास मंगलवार देर रात एक और विस्फोट हुआ। जालंधर में मंगलवार को सीमा सुरक्षा बल (BSF) के पंजाब फ्रंटियर के मुख्यालय के बाहर विस्फोट हुआ था। पहला विस्फोट जालंधर में रात करीब आठ बजे हुआ, जबकि दूसरा धमाका रात करीब 11 बजे अमृतसर में हुआ। स्कूटर में हुआ ब्लास्ट एसएसपी ने बताया कि शुरुआती जांच से पता चला है कि किसी व्यक्ति ने चारदीवारी की ओर कुछ फेंका और उससे विस्फोट हो गया। विस्फोट के बाद टिन की शीट का एक टुकड़ा और चारदीवारी गिर गई। विस्फोट से एक स्कूटर और एक 'ट्रैफिक सिग्नल' का खंभा क्षतिग्रस्त हो तथा पास की एक दुकान के शीशे टूट गए। स्थानीय लोगों ने बताया कि पंजाब फ्रंटियर स्थित बीएसएफ मुख्यालय के बाहर खड़े स्कूटर में आग लग गई। यह स्कूटर गुरप्रीत सिंह का था, जो नियमित रूप से इलाके में पार्सल पहुंचाते हैं। पाकिस्तान का हाथ? पंजाब के डीजीपी गौरव यादव ने कहा, 'आज मैंने अमृतसर का दौरा किया। कल आर्मी एरिया में एक कम तीव्रता वाला विस्फोट हुआ था। मैंने उस घटनास्थल का मुआयना किया… खासा छावनी में स्थित सैन्य शिविर की बाहरी दीवार के पास धमाके की सूचना मिली थी। इसके तुरंत बाद पंजाब बम निरोधक दस्ते, पंजाब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों और फोरेंसिक विशेषज्ञों को मौके पर बुलाया गया। पूरे इलाके की अच्छी तरह से जांच करने के बाद, वैज्ञानिक परीक्षण के लिए वहां से नमूने इकट्ठा किए गए हैं। इस मामले में कानून की संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर ली गई है।' उन्होंने कहा, 'सेना और अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर इस मामले की जांच की जा रही है। कई टीमें इस पर काम कर रही हैं। वे मानवीय इंटेलिजेंस, तकनीकी इंटेलिजेंस और फोरेंसिक इनपुट्स की मदद से जांच को आगे बढ़ा रही हैं… हमें संदेह है कि चूंकि ऑपरेशन सिंदूर की बरसी आने वाली है, इसलिए यह पंजाब में अशांति फैलाने की पाकिस्तान की आईएसआई (ISI) की साजिश का हिस्सा हो सकता है।' डीजीपी ने कहा, 'इस घटना को लेकर अभी तक किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली है, इसलिए हम जांच कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि यह एक देशी बम था जिसे असेंबल किया गया था। चूंकि मौके पर कोई तार नहीं मिले हैं, इसलिए पूरी संभावना है कि या तो यह टाइम्ड एक्सप्लोजन था या इसे रिमोट के जरिए अंजाम दिया गया है।' पंजाब में अशांति फैलाने की साजिश पुलिस अधिकारी ने कहा, 'हम सीसीटीवी फुटेज की जांच से मिले सुरागों पर काम कर रहे हैं। मैं आपको बताना चाहता हूं कि यह आईएसआई की एक कोशिश है। वे एक झूठा नैरेटिव बना रहे हैं और यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि पंजाब में अशांति है। मैं यह कहना चाहता हूं कि पंजाब देश का सबसे शांतिपूर्ण राज्य है। पाकिस्तान की आईएसआई के मुट्ठी भर तत्व पंजाब की स्थिति को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं…।'

ममता के इस्तीफा न देने वाले स्टंट की सीमा केवल कल तक

कलकत्ता पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे चार मई को आ गए. इस बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने परचम लहराया और इस तरह बीते 15 सालों से टीएमसी की सत्ता का सूपड़ा साफ हो गया. चुनाव नतीजे आने के बाद से ही अब तक सीएम रहीं ममता बनर्जी आक्रामक मोड में हैं. उन्होंने पहले तो यह आरोप लगाया कि मतगणना केंद्रों पर वोटों की हेरफेर हुई है. यहां तक कि उन्होंने कहा कि कुछ गुंडों ने उन्हें भवानीपुर के मतगणना केंद्र पर पीटा भी।  ममता बनर्जी ने कहा- वह हारी नहीं, उन्हें हराया गया मंगलवार शाम को ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बीजेपी पर तमाम आरोप लगाते हुए कहा कि, उनके सीएम पद से इस्तीफा देने का सवाल नहीं. ममता बनर्जी के इस बयान से राज्य में एक तरह का संवैधानिक संकट खड़ा होने की आशंका जताई जा रही है. सवाल उठ रहे हैं कि ममता ने इस्तीफा नहीं दिया तो क्या होगा? असल में बीजेपी 10 मई से पहले-पहले शपथ ग्रहण की तैयारी में जुटी है।  बुधवार को छह तारीख हो चुकी है. सात मई 2026 को पश्चिम बंगाल की 17वीं विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. ऐसा होने पर सभी पद संवैधानिक रूप से खुद ही समाप्त हो जाएंगे. ऐसे में ममता बनर्जी खुद-ब-खुद सीएम नहीं रहेंगी. यानी वह इस्तीफा दें या न दें, विधानसभा भंग होने के बाद वह वैसे भी सीएम नहीं रहने वाली हैं।  सिर्फ आज तक ही है उनके इस बयान का मतलब? यानी ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने की मियाद सिर्फ एक दिन यानी आज ही के दिन तक है.  इसके बाद उनके इस बयान कि मैं 'इस्तीफा नहीं दूंगी.' इसका भी कोई मतलब नहीं रह जाएगा. चुनाव आयोग (ECI) ने चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद नई विधानसभा के गठन के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है और इसे राज्यपाल को भेज भी दिया है तो ममता बनर्जी के इस्तीफा देने या न देने के लिए भी सिर्फ आज ही का दिन है।  वैसे भी ममता बनर्जी बीते तीन महीने से औपचारिक तौर पर सीएम नहीं हैं. इस बात को बताया है टीएमसी सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने. उन्होंने ममता बनर्जी का बचाव करते हुए कहा कि ममता व्यावहारिक रूप से सीएम के तौर पर काम नहीं कर रही थीं. उन्होंने कहा कि 'पिछले तीन महीनों से राज्य में आचार संहिता लागू थी, इसलिए ममता बनर्जी व्यावहारिक रूप से मुख्यमंत्री के तौर पर काम नहीं कर रही थीं. ऐसे में इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता।  कल्याण बनर्जी ने कहा, 'पिछले 3 महीनों से मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू है. सरकार कौन चला रहा था? मुख्य सचिव. इसलिए पिछले 3 महीनों से ममता बनर्जी मुख्यमंत्री के तौर पर काम नहीं कर रही थीं. फिर इस्तीफे का सवाल कहां है?' हालांकि ममता बनर्जी के बयान ने ये एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि क्या कोई मुख्यमंत्री चुनाव हारने के बाद भी पद पर बना रह सकता है? संविधान क्या कहता है? दो बड़े कानून के जानकारों ने इस पर अपनी राय दी है।  क्या कहते हैं एक्सपर्ट? वकील और संविधान के जानकार ज्ञानंत सिंह कहते हैं कि ममता का यह बयान संविधान से ज्यादा एक राजनीतिक चाल है. यानी इसका असर कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा होगा. उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 164 के मुताबिक मुख्यमंत्री और बाकी मंत्री राज्यपाल की मर्जी तक अपने पद पर रहते हैं. इसका मतलब यह है कि राज्यपाल चाहें तो ममता को हटा सकते हैं.लेकिन एक पेच है।  अगर राज्यपाल अभी ममता को हटाते हैं और नई सरकार नहीं बनती तो राज्य में एक खालीपन आ जाएगा यानी राज्य चलाने वाला कोई नहीं होगा. यह संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा. इसके अलावा उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 356 के तहत अगर ममता खुद को मुख्यमंत्री मानते हुए बड़े फैसले लेने लगें तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं।  एक और अहम बात उन्होंने यह बताई कि अगर कोई मुख्यमंत्री विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाता तो राज्यपाल किसी नए मुख्यमंत्री को नियुक्त कर सकते हैं. भले ही हारने वाला मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से मना कर दे. एक और जरूरी बात यह है कि पुरानी विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है और नई विधानसभा के लिए चुनाव हो चुके हैं. इसलिए SR बोमई वाला फ्लोर टेस्ट का नियम यहां लागू नहीं होगा. पुरानी विधानसभा में ममता को बिना फ्लोर टेस्ट के भी हटाया जा सकता है।  ममता न दें इस्तीफा तो राज्यपाल कर सकते हैं बर्खास्त वहीं, सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान के जानकार आर के सिंह और भी सीधी बात करते हैं. वो कहते हैं कि अगर ममता इस्तीफा नहीं देतीं तो राज्यपाल सीधे उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं. उन्होंने एक बहुत दिलचस्प बात कही. उन्होंने कहा कि जिस दिन विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो जाता है, उस दिन से मौजूदा मुख्यमंत्री संविधान की भाषा में 'संवैधानिक रूप से मृत' हो जाते हैं. यानी कानूनी तौर पर उनका अस्तित्व खत्म हो जाता है. और हमारे संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि कोई 'संवैधानिक रूप से मृत' नेता देश या राज्य चला सके. उन्होंने संविधान के चार अनुच्छेदों का हवाला दिया।  क्या कहते हैं संविधान के अनुच्छेद 164 और 172 अनुच्छेद 164 कहता है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं और मंत्री राज्यपाल की मर्जी तक पद पर रहते हैं. सरकार तभी तक चलती है जब तक उसे विधानसभा का भरोसा मिला हुआ है. जैसे ही बहुमत जाता है, मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना चाहिए. अनुच्छेद 163 कहता है कि राज्यपाल आमतौर पर मंत्रिपरिषद की सलाह पर चलते हैं. लेकिन जब नई सरकार बनानी हो या बहुमत खो जाए तो राज्यपाल अपनी मर्जी से फैसला ले सकते हैं।  अनुच्छेद 172 कहता है कि विधानसभा का कार्यकाल 5 साल का होता है. जब यह खत्म होता है तो नई विधानसभा को सत्ता में आना ज़रूरी हो जाता है. अनुच्छेद 174 राज्यपाल को विधानसभा बुलाने, बंद करने और भंग करने का अधिकार देता है. चुनाव में जब किसी पार्टी को साफ बहुमत मिलता है तो राज्यपाल उस बहुमत वाले नेता को सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं।  उन्होंने SR बोमई केस … Read more

राहुल गांधी बोले, बीजेपी के सांसदों में है मतदाता धोखाधड़ी, हरियाणा की पूरी सरकार घुसपैठियों की

  नई दिल्ली कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक हमलावर पोस्ट साझा करते हुए बीजेपी पर एक बार फिर से 'वोट चोरी' का आरोप लगाया है. राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में लिखा कि वोट चोरी के जरिए कभी सीटें चुराई जाती हैं, तो कभी पूरी की पूरी सरकार ही हड़प ली जाती है. उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि लोकसभा में बीजेपी के जो 240 सांसद हैं, उनमें से मोटे तौर पर हर छठा सांसद वोट चोरी से जीता है।  राहुल ने तंज कसते हुए सवाल किया कि क्या इन सांसदों को बीजेपी की ही भाषा में 'घुसपैठिया' कहा जाना चाहिए?  उन्होंने वोटर लिस्ट और चुनाव प्रक्रिया को लेकर तीखा हमला बोला है।  'असली डर सच्चा का…' राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, "वोट चोरी से कभी सीटें चुराई जाती हैं, कभी पूरी सरकार. लोकसभा के 240 बीजेपी सांसदों में से मोटे तौर पर हर छठा सांसद वोट चोरी से जीता है. पहचानना मुश्किल नहीं- क्या उन्हें बीजेपी की भाषा में 'घुसपैठिए' कहें?" उन्होंने हरियाणा का जिक्र करते हुए कहा कि वहां तो पूरी सरकार ही 'घुसपैठिया' है।  राहुल गांधी ने कहा, "जो संस्थाएं अपनी जेब में रखते हैं, जो मतदाता सूचियों और चुनावी प्रक्रिया को तोड़-मरोड़ देते हैं- वो ख़ुद 'रिमोट कंट्रोल्ड' हैं. उन्हें असली डर सच्चाई का है, क्योंकि निष्पक्ष चुनाव हो जाएं, तो आज ये 140 के पास भी नहीं जीत सकते।  इससे पहले राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजे आने के बाद चुनाव आयोग और बीजेपी पर हमला बोला था। 

बंगाल के रिजल्ट से पहले यूपी में BJP की सक्रियता, PM मोदी समेत नेता जुटे मोर्चे पर

लखनऊ  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे भी नहीं आए थे और भारतीय जनता पार्टी ने साल 2027 में होने वाले चुनावों की तैयारियां शुरू कर दी थीं। इसके संकेत भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन समेत कई पार्टी दिग्गजों के दौरों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों से मिल रहे हैं। बंगाल में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है। वहीं, अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं। भाजपा को यूपी में भी असम की तरह हैट्रिक की उम्मीद है। UP में जुटे भाजपा के टॉप नेता 29 अप्रैल को बंगाल में दूसरे चरण का मतदान हुआ है। इससे एक दिन पहले ही भाजपा चीफ और पीएम मोदी 28 अप्रैल को उत्तर प्रदेश पहुंच गए थे। वहीं, जब पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने दल बदल किया, तो बंगाल में चुनावी ड्यूटी निभा रहे कई भाजपा नेता दिल्ली पहुंच गए थे। बंगाल के नतीजों के बाद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि नारी शक्ति वंदन (संशोधन) विधेयक का विरोध की कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य दलों को कड़ी सजा मिली है। उन्होंने दावा किया कि सपा को भी जल्द ही महिलाओं के गुस्से का सामना करना पड़ेगा। उनका इशारा उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की ओर था। क्यों अहम है उत्तर प्रदेश साल 2014 में जब भाजपा ने कुल 282 लोकसभा सीटें जीती थीं, तो इसमें यूपी की 71 सीटें भी शामिल थीं। खास बात है कि 80 सीटों वाला यूपी लोकसभा सीटों के लिहाज से सबसे बड़ा राज्य है। वहीं, 2024 के चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका लगा था और पार्टी घटकर महज 33 सीटों पर आ गई थी। इससे पहले 2019 में भाजपा को यूपी में 62 लोकसभा सीटें मिली थीं। एक ओर जहां समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव PDA यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक को मजबूत करने पर काम कर रहे हैं। वहीं, भाजपा गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वर्गों को वापस जोड़ने की कोशिश कर रही है जो लोकसभा चुनाव में उनसे छिटक गए थे। अब बीजेपी अपने पुराने वोट बैंक को फिर से हासिल करने के लिए कई बड़े कदम उठा सकती है ताकि यादव और जाटव वोटों के अलावा अन्य जातियों में अपनी पकड़ फिर से बनाई जा सके। बंगाल का जीत बनेगी भाजपा का इंश्योरेंस बंगाल में जीत के साथ ही भाजपा ने उत्तर और पश्चिम की तरह पूर्व में भी मजबूती हासिल कर ली है। हालांकि, दक्षिण में कर्नाटक को छोड़ दिया जाए, तो भाजपा को लोकसभा में खास समर्थन नहीं मिलता है। साथ ही बंगाल की जीत को भाजपा इंश्योरेंस की तरह भी देख सकती है, जहां अगर उसे किसी मजबूत राज्य में लोकसभा चुनाव में झटका लगता है, तो बंगाल से भरपाई की जा सके। यहां कुल 42 लोकसभा सीटें हैं। पंजाब पर भी नजरें कहा जा रहा है कि पंजाब को हमेशा से प्रधानमंत्री मोदी सरकार चुनावी रूप से अहम मानती रही है। सिख बहुल राज्य में भाजपा लगातार समुदाय को अपनी ओर लाने के प्रयास करती रही है। वही, दल सत्तारूढ़ आप को भी कुर्सी से बेदखल करने की कोशिश में है। 7 राज्यसभा सांसदों का आना भाजपा को कुछ हद तक चुनावी रूप से मददगार साबित हो सकता है। चुनाव के नतीजे बंगाल में भाजपा ने ऐतिहासिक 206 सीटों पर जीत हासिल की। वहीं, असम में शतक लगाकर चुनावी जीत की हैट्रिक पूरी की। इधर, केरल में भी भाजपा की सीटों का ग्राफ बढ़ा है। जबकि, तमिलनाडु में एक्टर विजय की टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनी। पुडुचेरी में एनडीए ने जीत हासिल की।

थलापति के विजय रथ के सामने खड़ी हो सकती हैं पिता की दो संतानें: DMK और AIADMK

चेन्नई  तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में थलापति विजय की टीवीके पार्टी ने जबर्दस्त जीत हासिल कर पूरे देश में कोहराम मचा दिया है. राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा में टीवीके को 108 सीटों पर जीत मिली है. देश के इतिहास में यह अपने तरह की अभूतपूर्व घटना है. महज दो साल पुरानी पार्टी अपने दम पर एक बड़े राज्य में इतनी बड़ी जीत हासिल कर सकती है. इस बात का भरोसा अच्छे-अच्छे चुनावी पंडितों को भी नहीं था. टीवीके की स्थापना दो मार्च 2024 को हुई थी. लेकिन, इतनी शानदार जीत हासिल करने के बावजूद टीवीके बहुमत से थोड़ी दूर रह गई है. राज्य में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए. उसको कम से कम 10 और विधायकों की जरूरत है. लेकिन, उसके लिए यह 10 का नंबर अब भारी पड़ता दिख रहा है।  एक संभावना यह बन रही है कि टीवीके के विजय रथ को रोकने के लिए राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियां डीएमके और एआईएडीएमके पुरानी दुश्मनी भूलकर साथ आ सकती हैं. ऐसा इसलिए भी संभव है कि ये दोनों एक ही पिता की संतानें हैं. इनके बीच एक तरह से खून का रिश्ता है. दरअसल, तमिलनाडु की राजनीति में DMK और AIADMK लंबे समय से दुश्मन के रूप में जानी जाती हैं. लेकिन दोनों का जन्म द्रविड़ आंदोलन से हुआ है. दोनों की विचारधारा लगभग एक समान है. दोनों द्रविड़ संस्कृति, सामाजिक न्याय, भाषाई गौरव और हिंदुत्व की विरोधी रही हैं।  डीएमके के बंटवारे की कहानी इस कहानी की शुरुआत 1972 में डीएमके के टूटने से होती है. दरअसल, DMK के संस्थापक सीएन अन्नादुरै की मृत्यु के बाद पार्टी में दो बड़े नेता एम. करुणानिधि और एम.जी. रामचंद्रन (MGR) चेहरा बने. करुणानिधि पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री थे, जबकि MGR पार्टी के सबसे बड़े चेहरे, कोषाध्यक्ष और जनप्रिय अभिनेता थे. सबसे बड़ा विवाद पैसे और पारदर्शिता को लेकर हुआ. MGR ने पार्टी नेताओं से अपनी संपत्ति घोषित करने की मांग की. उन्होंने 1972 के मदुरै सम्मेलन के हिसाब-किताब पर सवाल उठाए और पार्टी में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया. करुणानिधि इसे अपनी सत्ता पर चुनौती मान बैठे. तनाव पहले से बढ़ रहा था. 1971 में करुणानिधि ने MGR को कैबिनेट में जगह देने से मना कर दिया था. इसके अलावा करुणानिधि ने बेटे एमके मुथु को फिल्मों में MGR का मुकाबला करने के लिए तैयार किया, जो MGR को नागवार गुजरा. यही आग अक्टूबर 1972 में सुलग गई. 10-11 अक्तूबर को MGR को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निलंबित कर दिया गया।      14 अक्टूबर: DMK की आम परिषद ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।      17 अक्टूबर: MGR ने नई पार्टी अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (ADMK) का ऐलान कर दिया. 1976 में इमरजेंसी के दौरान उन्होंने ऑल इंडिया जोड़कर इसे AIADMK बना दिया।  एक ही पिता की संतानें DMK और AIADMK में वैचारिक रूप से कोई बड़ी दूरी नहीं है. दोनों ही पेरियार के द्रविड़ आंदोलन की विरासत का दावा करती हैं. दोनों समाज के पिछड़े वर्गों, मंदिर प्रबंधन, जाति विरोध और तमिल गौरव की बात करती हैं. उनका झगड़ा व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, सत्ता और करुणानिधि-MGR के बीच व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता का था, न कि विचारधारा का।  जब एमजीआर बने सीएम वर्ष 1972 नई पार्टी बनने के महज दो महीने में AIADMK में करीब दस लाख सदस्य जुड़ गए, ज्यादातर MGR के फैन क्लबों के जरिए. 1977 के चुनाव में AIADMK ने भारी जीत हासिल की और MGR भारत के पहले अभिनेता मुख्यमंत्री बने. उसके बाद पांच दशक तक तमिलनाडु में DMK और AIADMK के बीच सत्ता की अदला-बदली चलती रही।  2026 में नया मोड़ 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इस लंबे द्वंद्व को नई चुनौती मिली है. थलापति विजय की पार्टी टीवीके ने शानदार प्रदर्शन किया है. विजय की लोकप्रियता, युवाओं का समर्थन और सिनेमा की ताकत ने पुरानी दो-दलीय व्यवस्था को हिला दिया है. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या DMK और AIADMK जो पिछले 50 साल से एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे, थलापति विजय के बढ़ते विजय रथ को रोकने के लिए एक साथ आ सकती हैं? कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह संभव है. दोनों पार्टियां जानती हैं कि अगर वे अलग-अलग रहीं तो विजय की TVK तमिलनाडु की राजनीति को नया आकार दे सकती है।  एक ही गठबंधन में डीएमके-एआईएडीएमके ऐतिहासिक रूप से देखें तो दोनों पार्टियों ने राज्य में आपस में कभी गठबंधन नहीं किया. लेकिन, ये दोनों दल एक ही समय में राष्ट्रीय स्तर पर एक ही गठबंधन में साझेदार रह चुके हैं. दिवंगत अटल बिहार वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए में 1999 में ये दोनों दल एक ही समय में गठबंधन में साझेदार थे. इसी तरह इन दोनों दलों ने एक समय केंद्र की यूपीए सरकार को समर्थन दिया था. ऐसे में बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में कुछ भी असंभव नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस वक्त टीवीके ने डीएमके और एआईएडीएमके के अस्तित्व को सीधी चुनौती दी है। 

राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद राघव चड्ढा ने किया खुलासा, कहा – ‘AAP मुझे भी टारगेट कर सकती है’

नई दिल्ली आम आदमी पार्टी से बीजेपी में शामिल होने वाले सांसदों ने आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की और आप सरकार द्वारा उनके खिलाफ की जा रही कार्रवाई पर चर्चा की। मुलाकात के बाद राज्यसभा सांसद ने आम आदमी पार्टी पर खूब निशाना साधा। उन्होंने कहा, आज हमने राष्ट्रपति को बताया कि पंजाब सरकार किस तरह आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सांसदों के खिलाफ बदले की राजनीति के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल कर रही है। पंजाब पुलिस की मदद से आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने विश्व कप विजेता हरभजन सिंह के आवास के बाहर 'देशद्रोही' लिखा। इसके बाद पंजाब में पद्म श्री राजेंद्र गुप्ता की फैक्ट्री का पानी का कनेक्शन काट दिया गया। राघव चड्ढा ने दावा किया है कि इनका अगला टारगेट मैं बनूंगा। मीडिया से बात करते हुए राघव चड्ढा ने कहा , आम आदमी पार्टी ने संदीप पाठक के खिलाफ झूठे और मनगढ़ंत एफआईआर दर्ज कराईं और मीडिया के जरिए यह अफवाह फैलाई कि उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा। मैं आम आदमी पार्टी को बताना चाहता हूं कि उन्होंने सतर्कता बोर्ड और प्रदूषण बोर्ड की मदद से बदले का एक खतरनाक खेल शुरू किया है, जिसका अंजाम बेहद बुरा होगा। आप का अगला टारगेट मैं- राघव चड्ढा उन्होंने सूत्रों के हवाले से दावा करते हुए कहा कि , मैं उनका अगला निशाना बनूंगा। ये मेरे ऊपर भी कोई कार्रवाई करने जा रहे हैं। इन्होंने हम सब की छवि खराब करने की पूरी कोशि्श की है। पंजाब सरकार ने सोशल मीडिया पर हमें धमकाने के लिए एजेंसियों को काम पर रखा है। आम आदमी पार्टी यह सब पंजाब सरकार के फंड से कर रही है। यही कारण है कि मैंने कहा कि आम आदमी पार्टी भ्रष्ट और समझौतावादी लोगों के हाथों में फंसी हुई है। बता दें, आम आदमी पार्टी (आप) को 24 अप्रैल को उस समय बड़ा झटका लगा जब उसके राज्यसभा के 10 सदस्यों में से सात- राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत साहनी और स्वाति मालीवाल ने यह आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी कि 'आप' अपने मूल्यों और मूल सिद्धांतों से भटक गई है। इसके बाद इन सभी ने भाजपा में विलय कर लिया था। 'आप' छोड़ने वाले सात सांसदों में से छह पंजाब से थे। 

तीन दिग्गज परिवारों के वारिस हारे: असम चुनाव में कांग्रेस का नया रिकॉर्ड, बदला सियासी मूड

असम असम में बीजेपी ने जीत की हैट्रिक लगाई है। बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए ने 102 सीटों पर जीत हासिल की। जबकि कांग्रेस सिर्फ 19 सीट पर सिमट गई है। असम में ऐसा देश में पहली बार हुआ कि भाजपा सरकार का कोई भी मंत्री चुनाव नहीं हारा। असम में लगातार तीसरी बार सत्ता से महरूम रहने वाली कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। असम के तीन पूर्व सीएम के बोटों को भी करारी हार का सामना करना पड़ा। इनमें से एक तो वर्तमान में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद भी हैं। असम के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटों की हार के साथ ही कांग्रेस ने नया रिकॉर्ड भी बना डाला है। असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने 15 साल तक कांग्रेस की सरकार चलाई। पूर्व सीएम तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई को असम चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। गौरव असम कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं और जोरहाट से तीन बार के सांसद हैं। असम विधानसभा चुनाव में गौरव गोगोई जोरहाट सीट से लड़े। हालांकि उन्हें बीजेपी के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। भाजपा कैंडिडेट हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने गौरव गोगोई को 23,182 वोटों से मात दी। वहीं पूर्व सीएम हितेश्वर सैकिया दो बार असम के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। हितेश्वर सैकिया के बेटे देबब्रत सैकिया को भी असम विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। अपने पिता के परंपरागत सीट नजीरा विधानसभा सीट से खड़े देबब्रत सैकिया को बीजेपी प्रत्याशी मयूर बोरगोहाईं ने 46,000 से ज्यादा वोटों से करारी शिकस्त दी। देबब्रत खुद 2011 से लगातार इसी सीट से जीतते आ रहे थे। 2016 से विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रह चुके हैं। असम के कार्यवाहक मुख्यमंत्री रह चुके दिवंगत भूमिधर बर्मन के बेटे दिगंता बर्मन (Diganta Barman) को भी असम चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा है। हितेश्वर सैकिया पद पर रहते हुए गुजर गए थे। तब भूमिधर बर्मन ने थोड़े समय के लिए मुख्यमंत्री का काम संभाला था। दिगंता बारखेत्री सीट से लड़े लेकिन BJP के नारायण डेका से 84,000 से ज्यादा वोटों से करारी शिकस्त देकर कांग्रेस के गहरी चोट दी। CM हिमंता बिस्वा सरमा बोले- जनता ने वंशवादी राजनीति को नकारा असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इन तीनों की हार पर कहा कि किसी की हार में खुश होना ठीक नहीं, खासकर जब वो हितेश्वर सैकिया के बेटे हों। उन्होंने साफ कहा कि जनता ने ‘खानदानी राजनीति’ यानी सिर्फ बाप-दादा के नाम पर चुनाव लड़ने की सोच को नकार दिया है। उन्होंने कहा कि इन लोगों ने तीन-चार बार चुनाव जीते, उनके पास अपनी अलग पहचान बनाने का पूरा मौका था, लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए। यहां एक दिलचस्प बात यह है कि हिमंत सरमा खुद लगभग 20 साल तक कांग्रेस में रहे और उन्हें पार्टी में लाने वाले हितेश्वर सैकिया ही थे. 2014 में वो BJP में आ गए।