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अमेरिका ने कर दिया 300 अरब डॉलर का ऐलान, अब खाड़ी देशों की जेब पर नजर! जवाब देंगे मार्को रुबियो?

वाशिंगटन/तेहरान  मध्य पूर्व युद्ध को खत्म करने वाले समझौते की सबसे बड़ी शर्त रही- ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर के फंड की. ईरान को हुए नुकसान की भरपाई के लिए ये रकम काफी है लेकिन अभी तक यह साफ नहीं है कि इस भारी-भरकम राशि का खर्चा कौन उठाएगा? इस्लामाबाद MoU में लिखा है कि अमेरिका अपने खाड़ी के साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर का एक ठोस योजना तैयार करेगा. इस योजना को अंतिम समझौते के साथ 60 दिनों के अंदर लागू किया जाएगा।  इसके अलावा अमेरिका सभी जरूरी लाइसेंस, छूट और अनुमतियां भी देगा ताकि पैसे के लेन-देन में कोई रुकावट न आए. इस फंड के अलावा अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर होते ही ईरान पर लगी सभी प्रकार की पाबंदियां हटा ली जाएंगी और उसे तुरंत तेल बेचने की छूट मिल जाएगी. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कहा है कि ईरान को ये सब पाने के लिए 60 दिनों में शर्तों का पालन करना होगा. उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स का एक भी डॉलर ईरान को नहीं जाएगा. तो फिर ईरान को इतने पैसे देगा कौन? कौन देगा ईरान को 300 बिलियन डॉलर?     ईरान की इस डील को लेकर एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अमेरिका इसके पैसे अपने अमीर खाड़ी देशों से वसूलेगा. आपको बता दें कि ये वही देश हैं, जहां अमेरिका के मिलिट्री बेसेज हैं और जिन पर युद्ध के दौरान ईरान ने हजारों ड्रोन और मिसाइलें दागी थीं. युद्ध के तबाह हो चुके ईरान को इस फंड की बहुत जरूरत है, लेकिन खाड़ी देश अभी तैयार नहीं दिख रहे।      सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने पिछले हफ्ते इस फंड पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उन्होंने ये कहकर बात टाल दी कि पहले विश्वास बहाल करना होगा. ईरान के हमलों के बाद रिश्ते सुधारने की बातचीत जरूरी है, उसके बाद ही आर्थिक सहयोग और निवेश की बात हो सकती है. सऊदी अरब अपनी घरेलू परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रहा है।      वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पहले ही ईरान से युद्ध क्षतिपूर्ति मांगी थी, हालांकि समझौते से पहले उसका रुख कुछ नरम हुआ था. UAE युद्ध से पहले ईरान का प्रमुख व्यापारिक साझेदार भी था, बावजूद इसके उसे ईरान के हमलों का सामना करना पड़ा।  मार्को रुबियो देंगे इस सवाल का जवाब? अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो इन सवालों के बीच तीन दिन के खाड़ी देशों के दौरे पर आ रहे हैं, जहां वे यूएई, कुवैत और बहरीन के नेताओं से मुलाकात करने वाले हैं. उनकी इस यात्रा का मकसद ही अपने साझेदार देशों में ये विश्वास जगाना है कि तेहरान के साथ अमेरिका की डील से उनका कोई नुकसान नहीं होगा. उन्होंने इस देशों को साफ करना होगा कि 300 अरब डॉलर का इंवेस्टमेंट पैकेज आएगा कहां से और उसे कैसे इस्तेमाल किया जाएगा. अमेरिका के लिए तो ये डील है लेकिन खाड़ी देशों के सर्वाइवल का सवाल है क्योंकि तेहरान ये रकम मिलने के बाद खुद को खड़ा तो करेगा लेकिन उनकी सेना और क्षेत्रीय प्रभाव भी मजबूत होगा. कतर, बहरीन, कुवैत, यूएई और सऊदी जैसे देश खाड़ी की सुरक्षा में अहम योगदान निभाते हैं, ऐसे में ईरान का मजबूत होना उनके लिए सिरदर्द है।  क्या-क्या आ रही हैं चुनौतियां?     खाड़ी देशों को डर है कि पैसा ईरान के हथियारों और प्रॉक्सी समूहों पर खर्च न हो जाए. इसलिए उन्हें मजबूत गारंटी चाहिए. जब तक उन्हें ये विश्वास मिल नहीं जाता, तब तक वे शायद ही अपना कोष ईरान के लिए खोलें।      समझौते में ईरान के फ्रोजन असेट्स को पूरी तरह उपलब्ध कराने का वादा है. जेडी वेंस ने कहा कि कतर और जेयर्ड कुश्नर ने इसके लिए एक दिलचस्प समाधान निकाला है. अमेरिका और कतर इस प्रक्रिया पर नजर रखेंगे।      वेंस के मुताबिक अगर पैसे छोड़े गए तो वे ईरानी लोगों को खाना खिलाने और अमेरिकी किसानों को फायदा पहुंचाने में लगाए जाएंगे. ईरान इस पैसे से अमेरिका से सोयाबीन, मक्का और गेहूं खरीद सकेगा. हालांकि तेहरान के केंद्रीय बैंक ने इससे इनकार कर दिया है।  समझौते की 60 दिनों का मियाद अब शुरू हो चुकी है. अगर इस दौरान अच्छी प्रगति हुई तो 300 अरब डॉलर का फंड ईरान को नया जीवन दे सकता है, लेकिन अगर विश्वास की कमी बनी रही तो यह सिर्फ कागजी वादा बनकर रह सकता है. यह फंड मध्य पूर्व में स्थायी शांति का आधार बन सकता है, लेकिन इसके लिए सभी पक्षों को समझौता करना होगा. फिलहाल सवाल यह है कि क्या खाड़ी देश ईरान को फिर से खड़ा करने के लिए अपना खजाना खोलेंगे?

डिफेंस सेक्टर के लिए सुनहरा अवसर: इजरायल से सहयोग, UAE को ब्रह्मोस से भारत को मिल सकती है बढ़त

 नई दिल्ली हाल के वर्षों में भारत ने अपनी रक्षा नीति और निर्यात क्षमता में जबरदस्त बदलाव देखा है. UAE के साथ ब्रह्मोस मिसाइल की संभावित डील और इजरायल के साथ गहरी हथियार उत्पादन साझेदारी इसका ताजा उदाहरण है. ईरान-इजरायल संघर्ष ने मध्य पूर्व में सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है, जिससे कई देश नए और विश्वसनीय हथियार आपूर्तिकर्ताओं की तलाश में हैं. भारत ठीक इसी जगह पर मजबूती से खड़ा हुआ है. पुराना आयातक देश अब निर्यातक के रूप में उभर रहा है।  ईरान संघर्ष का असर और अवसर ईरान-इजरायल तनाव और उससे जुड़े युद्ध ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति बदल दी. यूएई और अन्य गल्फ देशों ने महसूस किया कि अमेरिकी हथियारों पर अंधाधुंध निर्भरता पर्याप्त नहीं है. उन्हें तेज, सटीक और विश्वसनीय सिस्टम चाहिए जो क्षेत्रीय खतरों का सामना कर सकें. ब्रह्मोस मिसाइल और अकाशतीर एयर डिफेंस सिस्टम ठीक इन्हीं जरूरतों को पूरा करते हैं।  भारत इन वार्ताओं में तेजी से आगे बढ़ रहा है. ब्रह्मोस मिसाइल मैक 3 की स्पीड से दुश्मन को चौंका देती है. 2025 के ऑपरेशन सिंदूर में इसकी भूमिका ने कई देशों का ध्यान खींचा. यूएई अब नई नीति अपना रहा है. भारत को विश्वसनीय पार्टनर मान रहा है. यह डील सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा है।  इजरायल के साथ गहराती साझेदारी इजरायल की रक्षा मंत्रालय की उच्च स्तरीय टीम भारत दौरे पर है. डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल (रि.) अमीर बराम ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य अधिकारियों से मुलाकात की है. दोनों पक्षों ने संयुक्त उत्पादन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, AI, साइबर सुरक्षा और सह-विकास पर चर्चा की. फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित MoU ने इस रास्ते को और मजबूत किया।  दोनों देश अब सिर्फ खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहना चाहते. वे संयुक्त हथियार बनाने, भारत में उत्पादन स्थापित करने और तीसरे देशों में निर्यात करने की दिशा में काम कर रहे हैं. इजरायल की तकनीक और भारत की निर्माण क्षमता का यह कॉम्बिनेशन गेम चेंजर साबित हो सकता है. Barak-8 मिसाइल, Heron ड्रोन और अन्य सिस्टम पहले से ही भारतीय सेना में सफल हैं. अब आगे का फोकस को-प्रोडक्शन पर है।  भारत का रक्षा निर्यात कैसे बढ़ा? पिछले दशक में भारत के रक्षा निर्यात में भारी उछाल आया है. FY 2025-26 में यह आंकड़ा 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष से 62% ज्यादा है. सरकार का लक्ष्य 2030 तक 50,000 करोड़ रुपये का है. आत्मनिर्भर भारत अभियान, नई डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी ने इस बदलाव को संभव बनाया।  ईरान संघर्ष ने दुनिया की सप्लाई लाइन को प्रभावित किया. कई देशों ने देखा कि भारत न केवल हथियार दे सकता है बल्कि समय पर और विश्वसनीय तरीके से सप्लाई भी कर सकता है. फिलीपींस पहले ही ब्रह्मोस ले चुका है. अब UAE, सऊदी अरब जैसे देश भी रुचि दिखा रहे हैं. भारत की तटस्थ विदेश नीति भी फायदेमंद साबित हो रही है. वह न तो पूर्ण रूप से किसी एक ब्लॉक का हिस्सा है और न ही दूसरे का।  रणनीतिक महत्व यह विकास भारत को ग्लोबल डिफेंस प्लेयर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. पहले भारत मुख्य रूप से रूस, इजरायल और कुछ पश्चिमी देशों से हथियार खरीदता था. अब वही भारत ब्रह्मोस जैसी स्वदेशी मिसाइल निर्यात कर रहा है. MUM-T (Manned-Unmanned Teaming) और ऑटोनॉमस सिस्टम में भी प्रगति हो रही है।  UAE और इजरायल दोनों के साथ मजबूत संबंध भारत की मध्य पूर्व नीति को संतुलित बनाते हैं. एक तरफ इजरायल के साथ तकनीकी गहराई, दूसरी तरफ अरब देशों के साथ आर्थिक और सुरक्षा साझेदारी. ईरान संघर्ष ने इन अवसरों को तेज किया है क्योंकि क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने से हर देश अपनी सुरक्षा मजबूत करना चाहता है।  हालांकि सफलता के साथ चुनौतियां भी जुड़ी हैं. ब्रह्मोस में रूस का हिस्सा होने से कुछ डील्स में उसकी मंजूरी जरूरी है. भू-राजनीतिक संवेदनशीलता को संभालना भी मुश्किल है. फिर भी, भारत की बढ़ती क्षमता और डिप्लोमेसी इन चुनौतियों से निपटने में सक्षम दिख रही है।  UAE को ब्रह्मोस देने की बातचीत और इजरायल के साथ संयुक्त उत्पादन साझेदारी भारत के रक्षा क्षेत्र की नई कहानी लिख रही है. ईरान-इजरायल युद्ध ने दुनिया को अस्थिर किया, लेकिन भारत ने इसे अवसर में बदल लिया. आज भारत न सिर्फ अपनी सेना को मजबूत कर रहा है बल्कि दुनिया को विश्वसनीय हथियार और प्रौद्योगिकी भी दे रहा है. यह बदलाव भारत को 21वीं सदी का रक्षा निर्यातक बनाने की राह पर ले जा रहा है। 

वर्ष 2025 में अब तक के सर्वाधिक 49 हजार एडमिशन हुए

भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि प्रदेश में रोजगार के क्षेत्र में सतत रूप से नवाचारों की आवश्यकता है। मध्यप्रदेश में धार्मिक, प्राकृतिक, पुराधरोहर से संबंधित पर्यटन क्षेत्र समृद्ध है। पर्यटकों को आवश्यक मार्गदर्शन के लिए गाइड की व्यवस्था को सशक्त बनाने और विभिन्न व्यंजनों का आनंद दिलवाने के लिए कार्य की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। युवाओं को बड़ी संख्या में इन कार्यों से रोजगार मिलेगा। कौशल विकास और रोजगार विभाग का पर्यटन विभाग से तालमेल स्थापित कर यह कार्य संभव है। इसी तरह के रोजगारपरक कार्य दिलवाने के लिए विभिन्न विभाग नवाचार कर सकते हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने मंगलवार को मंत्रालय में कौशल विकास और रोजगार विभाग की गतिविधियों की बैठक में समीक्षा की। बैठक में कौशल विकास और रोजगार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)  गौतम टेटवाल,मुख्य सचिव  अनुराग जैन, मुख्यमंत्री कार्यालय में अपर मुख्य सचिव  नीरज मंडलोई, तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार विभाग के प्रमुख सचिव  मनीष सिंह और विभागीय अधिकारी उपिस्थत थे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रदेश में फैक्ट्री परिसर में भी प्रशिक्षण संस्था संचालित की जा सकती है। उद्योगों की जरूरत को देखते हुए आवश्यक ट्रेड में प्रशिक्षण के प्रबंध किए जाएं। कौशल विकास और रोजगार दिलवाने के विभिन्न विभागों के कार्यों का समग्र प्रतिवेदन भी तैयार किया जाए। विभिन्न विभाग संचालित योजनाओं से दी जा रही सेवाओं और सृजित नए रोजगारों का विवरण भी संकलित करें ताकि इस क्षेत्र की उपलब्धि एक नजर में दर्शाई जा सके। शासकीय और निजी क्षेत्र द्वारा उपलब्ध करवाए जा रहे रोजगार, राज्य की ही उपलब्धि है। विभाग के प्रमुख नवाचार बैठक में विभाग स्तर पर किए गए विभिन्न नवाचारों की जानकारी दी गई। परम फाउंडेशन के अंतर्गत 10 आईटीआई का संचालन एक विशेष नवाचार है। प्रतिमाह युवा संगम के आयोजन, महिला ड्राइविंग प्रशिक्षण, प्रतिभा सम्मान, वर्ष 2025 से आईटीआई में 30 प्रतिशत के स्थान पर 35 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने, विद्यार्थियों को विदेशी भाषा प्रशिक्षण और इसके माध्यम से रोजगार की संभावना बढ़ाने का कार्य किया गया है। इसके अलावा मानव संसाधन सुदृढ़ीकरण के अंतर्गत तकनीकी और अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण का लाभ युवाओं को दिलवाया गया है। कौशल विकास क्षेत्र की प्रमुख उपलब्धियां बैठक में विभागीय उपलब्धियों की जानकारी भी दी गई। इनमें वर्ष 2025 में 490 दिव्यांग प्रशिक्षणार्थियों को संस्थाओं में प्रवेश, गत 2 वर्ष में प्लेसमेंट ड्राइव के माध्यम से 18 हजार 403 प्रशिक्षणार्थियों को रोजगार, वर्ष 2025 में आईटीआई चलो अभियान में अब तक के सर्वाधिक 49 हजार 402 प्रवेश, यूएन वूमेन के सहयोग से 12 जनजातीय बहुल जिलों की 2127 महिलाओं को प्रशिक्षण, प्रदेश के तीन प्रशिक्षण अधिकारियों को राष्ट्रीय शिक्षक अवार्ड, युवा संगम से सवा तीन लाख आवेदकों को लाभ, संत शिरोमणि रविदास ग्लोबल स्किल पार्क में वर्ष 2024 से रोबोटिक्स, मेक्ट्रोनिक्स ऑटोमोबाइल जैसे 9 आधुनिक लाँगटर्म कोर्स का संचालन, 10 संभागीय आईटीआई के लिए हब इंस्टीट्यूट के रूप में व्यवस्थाएं कर ऑन-द-ऑब ट्रेनिंग और प्लेसमेंट सहायता दिलवाई जा रही है। वर्ष 2025 में आई टी आई में 3484 सीटों की वृद्धि की गई। वर्ष 2026 में 2356 सीटों की वृद्धि हुई। इस तरह दो वर्ष में 5840 सीट्स बढ़ी हैं। आईटीआई के विभिन्न ट्रेड में इस वर्ष 10 प्रशिक्षणार्थियों ने राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए। इसके अतिरिक्त कौशल विकास और रोजगार विभाग युवाओं को अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भागीदारी का अवसर दिलवा रहा है। इस क्रम में वर्ष 2024 में फ्रांस में हुई अंतर्राष्ट्रीय वर्ल्ड स्किल स्पर्धा में मध्यप्रदेश के संस्कार शर्मा ने सायबर सिक्योरिटी स्किल में मेडालियम ऑफ एक्सीलेंस हासिल किया। क्षेत्रीय स्पर्धा में 44 पदक और राष्ट्रीय स्पर्धा में 8 पदक प्राप्त करने की उपलब्धि भी मध्यप्रदेश को मिली है। ग्लोबल पार्क, भोपाल में वर्ष 2026-27 में 3 हजार सर्टिफिकेशन का लक्ष्य तय किया गया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के प्रमुख निर्देश              प्रदेश में कौशल विकास की गतिविधियां निरंतर संचालित हों।              औद्योगिक संस्थानों की आवश्यकता के अनुरूप कोर्स डिजाइन कर युवाओं को प्रशिक्षित किया जाए।              खान-पान तैयार करने (पाक कला प्रशिक्षण) और गाइड के प्रशिक्षण को भी प्राथमिकता दी जाए।              कोसा वस्त्रों के निर्माण के लिए प्रदेश में अधोसंरचना उपलब्ध है। युवाओं को उद्यानिकी विभाग के सहयोग से शहतूत उत्पादन जैसे कार्यों से जोड़ा जाए। रेशम उत्पादन की संभावनाओं पर भी कार्य किया जाए।  गुना जिले में जैकेट बनाने का कार्य एक आदर्श मॉडल है। आर्थिक लाभ दिलवाने वाली अनेक गतिविधियां घर से ही संचालित की जा सकती हैं। लघु और कुटीर उद्योगों से युवाओं को जोड़ने के ठोस प्रयास किए जाएं।  

पीढ़ियों को प्रभावित करने वाले सिकल सेल एनीमिया रोग के नियंत्रण में आगे है प्रदेश

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के साथ जनजातीय समाज के विकास और समाज की समस्याओं के समाधान के लिए राज्य सरकार कार्य कर रही है। सिकल सेल एनीमिया नियंत्रण का कार्य वर्ष 2022 से प्रारंभ हुआ है। इसके अच्छे परिणाम मिले हैं। कई पीढ़ियां प्रभावित करने वाली बीमारी सिकल सेल एनीमिया की स्क्रीनिंग नियंत्रण और उपचार की दिशा में राज्य सरकार कार्य कर रही है। इस क्षेत्र में प्रदेश अग्रणी है। जनजातीय नायकों के सम्मान में प्रदेश में तीन विश्वविद्यालय प्रारंभ किए गए हैं। सतपुड़ा क्षेत्र में राजा भभूत सिंह, राजा शंकर शाह, रघुनाथ शाह और रानी दुर्गावती की स्मृति में विभिन्न आयोजन किए गए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव भोपाल के निकट ग्राम अचारपुरा में पांच दिवसीय शिल्पकार महोत्सव के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिज़ाइन और जनजातीय कार्य विभाग के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित महोत्सव में जनजातीय कलाकारों द्वारा तैयार शिल्प कृतियों की प्रदर्शनी का अवलोकन किया और इन कलाकृतियों को पारंपरिक शैली में आधुनिकता के साथ पेश करने के प्रयासों की सराहना की। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कलाकारों से आत्मीयता के साथ चर्चा भी की। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि जनजातीय शिल्पकारों को प्रोत्साहित करने के लिए अधिक से अधिक प्रयास किए जा रहे हैं। जनजातीय शिल्प का डंका देश-विदेश में बज रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के विरासत से विकास के अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि पूरे देश में लोक संस्कृति को बढ़ावा देते हुए प्रगति के कदम उठाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि राष्ट्रपति मती द्रौपदी मुर्मु गत सप्ताह मध्यप्रदेश भ्रमण पर रहीं और विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, जो प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि 24 जून को वीरांगना रानी दुर्गावती का बलिदान दिवस है। रानी दुर्गावती ने गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाइयाँ प्रदान की। दुनिया ने उनकी वीरता, शौर्य और पराक्रम को देखा। रानी दुर्गावती ने गौंडवाना क्षेत्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए तत्कालीन मुगल सत्ता के विरुद्ध अनेकों युद्धों में विजय प्राप्त की। उन्होंने राष्ट्र गौरव के लिये संघर्ष करते हुए प्राणों की आहूति दे दी। आज हम रानी कमलापति के पराक्रम के क्षेत्र भोपाल में वीरांगना रानी दुर्गावती के शौर्य को नमन कर रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश अनेक जनजातीय वीरों की धरती है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि आदिरंग शिल्पकार महोत्सव में जनजातीय कलाकारों ने प्रकृति के माध्यम से हमारे जीवन में उत्सव के रंग भरने का प्रयास किया है। एनआईडी ने जनजातीय परंपरागत कला को नए आयाम पर पहुंचाया है। कला-संस्कृति के माध्यम से कई लोगों के जीवन में आर्थिक समृद्धि का सूर्य उदय होगा। राज्य सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री  मोदी के नेतृत्व में भारत चहुंमुखी विकास कर रहा है। राष्ट्रीय फलक पर पहचान बना रही जनजातीय कला जनजातीय कार्य मंत्री कुंवर विजय शाह ने कहा कि नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिज़ाइन के साथ संयुक्त तत्वावधान में मनाये जा रहे इस आदिरंग शिल्पकार महोत्सव में जनजातीय समाज की प्रतिभा को देखने का अवसर मिला है। एनआईडी के समन्वय से मध्यप्रदेश की परंपरागत शिल्प को अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है। जनजातीय कार्य विभाग के प्रयासों से जनजातीय कलाकारों को प्रोत्साहन भी मिल रहा है। राज्य सरकार प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए संकल्पित है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में इस दिशा में बेहतर कार्य किये जा रहे हैं। राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (एनआईडी) की निदेशक डॉ. विद्या राकेश ने कहा कि आदिरंग सिर्फ एक शिल्पकार महोत्सव नहीं, बल्कि डिजाइन, कल्चर, कम्युनिटी और एम्पॉवरमेंट को जोड़ने का एक प्रयास है। गत कुछ वर्षों में एनआईडी ने मध्यप्रदेश जनजातीय कार्य विभाग के साथ मिलकर बैगा, गौंड, भील और अन्य जनजातीय समाज के बीच डिजाइन डेवलपमेंट कार्यशालाएं आयोजित की हैं। इनके माध्यम से शिल्पकारों को डिजाइन अवेयरनेस, प्रोडक्ट डेवलपमेंट, ब्रांडिग, पैकेजिंग और मार्केटिंग जैसे विषयों से परिचित करवाया गया है ताकि उनकी कला को वर्तमान बाजार की जरूरतों के हिसाब से लिंक किया जा सके। एनआईडी ने जनजातीय समुदायों की संस्कृति का दस्तावेजीकरण भी किया है। यह उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे रोजगार के साथ-साथ सांस्कृतिक विकास के नए अवसर भी विकसित होते हैं। एनआईडी जनजातीय समाज को वोकल फॉर लोकल से जोड़कर राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभा रहा है। जनजातीय कलाकार  गगन सिंह मरावी ने अनुभव साझा करते हुए बताया कि आदिरंग महोत्सव में गौंड चित्रकारों को नई चीजें सीखने का मौका मिला। भील चित्रकार मती गोरिया भाबोर ने बताया कि इस महोत्सव में हमें अपनी चित्रकार को आगे बढ़ाने का अवसर मिला है। आदिरंग महोत्सव में 140 से अधिक जनजातीय शिल्पकार हुए शामिल समारोह में जनजातीय कला, शिल्प और आजीविका संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी गई। पांच दिवसीय महोत्सव में मध्यप्रदेश के विभिन्न अंचलों से आए 140 से अधिक जनजातीय शिल्पकार शामिल हुए। भील, गोंड, बैगा सहित विभिन्न जनजातीय समुदायों के शिल्पकारों ने अपनी पारंपरिक कला, शिल्प और हस्तनिर्मित उत्पादों का प्रदर्शन किया। महोत्सव के दौरान आयोजित डिजाइन हस्तक्षेप कार्यशालाओं में शिल्पकारों ने एनआईडी मध्यप्रदेश के संकाय सदस्यों एवं छात्र स्वयंसेवकों के सहयोग से बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप नए उत्पाद विकसित किए। समापन समारोह में कार्यशालाओं के दौरान विकसित उत्पादों और डिजाइन अवधारणाओं की विशेष प्रदर्शनी आयोजित की गई। कार्यक्रम में विधायक  विष्णु खत्री, अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष  रामदास रौतेल, अनुसूचित जनजाति आयोग के सदस्य  भगत सिंह नेताम,  मंगल सिंह धुर्वे, प्रमुख सचिव जनजातीय विकास  गुलशन बामरा, आयुक्त  तरुण राठी और अन्य अधिकारी गण उपस्थित थे। कार्यक्रम में मती भगवती एवं साथी कलाकारों ने पारंपरिक लोक संगीत से मुख्यमंत्री डॉ. यादव और अन्य अथितियों का स्वागत किया।मुख्यमंत्री डॉ. यादव को स्मृति चिन्ह के रूप में गौंड चित्रकला से निर्मित कला-रूप भेंट किया गया। कार्यक्रम स्थल परिसर में मध्यप्रदेश के विभिन्न जनजाति अंचलों से आए कलाकारों के उल्लास पूर्ण नृत्य और संगीत से हर्ष, उल्लास का वातावरण निर्मितकर दिया।  

रविन्द्र भवन से साइबर जागरूकता रथ को करेंगे रवाना

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रदेश में नागरिकों को साइबर अपराधों से सुरक्षित रखने और जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए बुधवार, 24 जून 2026 को राजधानी भोपाल के रविन्द्र भवन में राज्य स्तरीय साइबर जागरूकता अभियान "सेफ क्लिक 2.0" का शुभारंभ करेंगे। मध्यप्रदेश पुलिस के इस विशेष अभियान का मुख्य उद्देश्य आमजन, विद्यार्थियों, युवाओं, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को साइबर ठगी तथा ऑनलाइन धोखाधड़ी के प्रति जागरूक करना है जिससे वे सुरक्षित साइबर व्यवहार अपना सकें। इस अवसर पर पुलिस महानिदेशक श्री कैलाश मकवाणा भी विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम के दौरान साइबर सुरक्षा और बाल संरक्षण के क्षेत्र में सहयोग को सुदृढ़ करने के लिए 'इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन' के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। साथ ही, स्कूली बच्चों में डिजिटल सुरक्षा के प्रति समझ विकसित करने के उद्देश्य से तैयार की गई एक विशेष साइबर जागरूकता बुकलेट और 'सेफ क्लिक 2.0' अभियान के जागरूकता वीडियो का विमोचन भी किया जाएगा। इस अवसर पर जनसामान्य को सरल एवं प्रभावी ढंग से जागरूक करने के लिए साइबर सुरक्षा पर आधारित एक नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव प्रदेश के विभिन्न जिलों में व्यापक स्तर पर जनजागरूकता गतिविधियों के संचालन के लिए 'साइबर जागरूकता रथ' को हरी झंडी दिखाकर (फ्लैग ऑफ) रवाना करेंगे। यह रथ पूरे प्रदेश का भ्रमण कर नागरिकों तक सुरक्षित डिजिटल व्यवहार और सतर्कता का संदेश पहुंचाएगा। इस अभियान के तहत मध्यप्रदेश पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधि की सूचना तत्काल राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 या आधिकारिक वेबसाइट www.cybercrime.gov.in पर दें और एक सुरक्षित डिजिटल समाज के निर्माण में सहभागी बनें।  

अब ₹32 लीटर में चलेगी गाड़ी! सस्ते ईंधन और 60 KM तक के एवरेज ने किया कमाल

 वडोदरा पेट्रोलियम उत्पादों के आयात से देश के खजाने पर पड़ने वाले बोझ को हल्का करने के लिए नए-नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं। इथेनॉल मिले हुए पेट्रोल के बाद अब एक नए तरीके का पेट्रोल-डीजल देश में तैयार किया गया है, जो ना सिर्फ बेहद सस्ता होगा बल्कि एवरेज भी सामान्य तेल जितना ही मिल रहा है। प्लास्टिक वेस्ट से तैयार किए गए इस पेट्रोल-डीजल से एक तरफ जहां ईंधन का एक नया और सस्ता विकल्प मिलेगा, बल्कि प्लास्टिक कचरे की समस्या का समाधान भी होगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वडोदरा में गति शक्ति विश्वविद्यालय (जीएसवी) के वैज्ञानिकों ने यह कमाल किया है। उन्होंने सफलतापूर्वक मिक्स्ड प्लास्टिक वेस्ट को पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधन में बदला है। ऐसा नहीं कि यह फॉर्मूला फाइलों या लैब तक सीमित है, बल्कि मोटसाइकिलों को दौड़ाकर देख लिया गया है। भारत के प्रमुख दोपहिया निर्माता कंपनी की तीन मोटसाइकिलों को इन पेस्ट्रो पेट्रोल से दौड़ाया गया। इसके लिए इसमें किसी बदलाव की जरूरत नहीं हुई। प्लास्टिक वाले पेट्रोल से बाइक में 60 का मिला एवरेज एक और अच्छी बात यह है कि माइलेज भी लगभग सामान्य पेट्रोल जितना ही है। 100 सीसी की एक बाइक जिसने सामान्य पेट्रोल से 62 का एवरेज दिया वह प्लास्टिक से तैयार एक लीटर पेट्रोल से 60 किलोमीटर दौड़ी। जब आप इस नए पेट्रोल के फायदे जानकर खुश हो रहे हैं तो एक और खुशखबरी है। इस पेट्रोल से प्रदूषण भी मानक के भीतर ही हो रहा है। प्लास्टिक वाले पेट्रोल से चल रही मोटरसाइकिलों ने पलूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया। 100 KG प्लास्टिक से निकलेगा 50 KG ईंधन, 32 रुपये कीमत रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि 100 किलोग्राम प्लास्टिक को कचरे को प्रोसेस करके करीब 50 किलोग्राम ईंधन निकाला जा सकता है। कच्चा तेल जहां 24 रुपये लीटर की कीमत पर उत्पादित किया जा सकता है तो अपग्रेड करने के बाद इसकी कीमत 32 रुपये प्रति लीटर होगी। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस टेक्नॉलजी से उत्पादित तेल 90 फीसदी तक सामान्य पेट्रोल-डीजल जैसा ही है। विमान भी उड़ सकेंगे प्लास्टिक वाले ईंधन से? पेस्ट्रो पेट्रोल में कितनी संभावना हो सकती है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एविएशन कंपनी एयरबस भी जीएसवी के साथ काम कर रही है। कोशिश की जा रही है कि प्लास्टिक कचरे से विमान को उड़ाने वाले ईंधन को भी विकसित किया जाए। कई जगहों पर हो सकती है शुरुआत प्लास्टिक वाले पेट्रोल से ईंधन बनाने की शुरुआत पहले उन जगहों पर की जा सकती है जहां प्लास्टिक का कचरा एक बड़ी समस्या है और ईंधन का पहुंचना उतना ही मुश्किल। लेह, लद्दाख, केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे स्थानों पर यूनिट लगाने पर विचार चल रहा है। इसके अलावा झांसी के रेलवे लोकोमोटिव शेड और कोलकाता की छावनी में भी ऐसा किया जा सकता है। इसको लेकर कई मंत्रालयों में विचार विमर्श चल रहा है।

सिवनी के ‘भूतबंधानी सीताफल’ को मिला GI टैग, दुनिया भर में चमकेगा मध्यप्रदेश का नाम

 सिवनी  जिले का प्रसिद्ध जम्बो सीताफल अब वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सकेगा। कई वर्षों से जम्बो सीताफल को जीआई टैग दिलाने में जिला प्रशासन और उद्यानिकी विभाग को सफलता मिल गई है। मध्य भारत सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में सिवनी का जम्बो सीताफल दीपोत्सव सहित अन्य त्योहार की प्राकृतिक मिठास व अनूठा स्वाद विशेष पहचान रखता है। औषधीय गुणों से भरपूर ’जम्बो सीताफल’ की प्राकृतिक रूप से सितंबर से नवंबर के बीच सर्वाधिक पैदावार होती है। जिले के छपारा भूतबंधानी में तैयार होने वाला जम्बो सीताफल ट्रकों से हर साल कानपुर, लखनऊ, दिल्ली जैसे महानगरों में भेजा जाता है। छपारा जंगल में प्राकृतिक रूप से उगने वाले स्वादिष्ट सीताफल की उपज का लाभ आदिवासी संग्राहकों को मिलता है। आदिवासियों की आजीविका का मुख्य जरिया 'जम्बो सीताफल’ सुदूर जंगल-पहाड़ी क्षेत्र व खेत की मेढ़ में प्राकृतिक रूप से तैयार 'जम्बो सीताफल' आदिवासियों की आजीविका का मुख्य जरिया है। 'बड़े आकार' व अनोखी 'मिठास' से विशेष पहचान बनाने वाले 'जम्बो सीताफल' की मांग साल दर साल बढ़ती जा रही है, जिससे इस पर निर्भर हजारों परिवारों की आय में वृद्धि हो रही है। लगभग 6 हजार मीट्रिक टन सीताफल का अनुमानित उत्पादन हर साल जिले में होता है, जिसके क्रय-विक्रय से 20-25 करोड़ रुपये का कारोबार दो से तीन माह में हो जाता है। जीआई टैग के मिलने से सिवनी के इस विशेष सीताफल की मार्केटिंग व बिक्री में वृद्धि होगी, सीताफल उत्पादक किसानों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। उत्पादन, विपणन में मिलेगी नई दिशा उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग की सहायक संचालक डॉ. आशा उपवंशी-वासेवार ने बताया कि भोपाल में महानियंत्रक (पेटेंट, डिजाइन एवं ट्रेड मार्क्स) व रजिस्ट्रार (भौगोलिक संकेत) से चेन्नई जीआई रजिस्ट्री में किए गए आवेदन सुनवाई के बाद विभाग ने सिवनी के सीताफल को जीआई टैग जारी कर दिया है। जीआई टैग के लिए किसान उत्पादक संगठन भूतबंधानी सीताफल क्रॉप प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के प्रतिनिधि सदम सिंह बरकडे व राजकुमार भलावी ने सुनवाई में सिवनी जम्बो सीताफल की विशिष्टता तथा इसके महत्व को अधिकारियों के समक्ष रखा था। जीआई टैग मिलने से सिवनी के सीताफल उत्पादन व विपणन में नई दिशा मिलेगी, जिससे स्थानीय सीताफल उत्पादक किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार होने की उम्मीद है। साथ ही यह सीताफल देशभर और विदेशों में अपनी विशेष पहचान बनाने में भी सक्षम होगा। सिवनी जम्बो सीताफल अपने बड़े आकार, विशिष्ट स्वाद और गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है। यह सीताफल अन्य स्थानों पर पाए जाने वाले सीताफलों से कहीं अधिक बड़ा और अधिक मीठा होता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण जम्बो सीताफल को जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग दिया गया है। विशेष पहचान मिलने से जिले के सीताफल की बाजार में मांग बढ़ेगी और मूल्य में वृद्धि होने से किसानों की आय में भी बढ़ोतरी होगी। स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ निर्यात के अवसर भी बढ़ेंगे। जम्बो सीताफल की विशिष्टता     विशाल आकारः सिवनी के सीताफल का आकार अन्य स्थानों के सीताफल की तुलना में बहुत बड़ा होता है। जिले का सीताफल 400 ग्राम से अधिक बड़ा होता है। कुछ फल एक किग्रा तक भी होता है। अन्य जिलों का सीताफल औसत रूप से 100 से 150 ग्राम का होता है जबकि सिवनी जिले का छोटा फल भी 200 ग्राम से ज्यादा वजन का होता है। विशिष्ट स्वाद: जिले के सीताफल का स्वाद सबसे हटके है। यहां का सीताफल बहुत मीठा होता है अन्य स्थानों के सीताफल पनीले पानी के स्वाद का होता है। प्राकृतिक उत्पादन: जिले का सीताफल प्राकृतिक रूप से पैदावार होने के कारण पूर्णतः जैविक होता है, किसी भी प्रकार का खाद, उर्वरक का उपयोग नहीं किया जाता है। पल्प की अधिक मात्रा: जिले के सीताफल में पल्प (गूदा) की मात्रा अधिक होती है।  

लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने की मांग, जबलपुर एयरपोर्ट को मिले मां रानी दुर्गावती का नाम

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से लोक निर्माण मंत्री  राकेश सिंह ने मंगलवार को मंत्रालय में सौजन्य भेंट की। इस दौरान मंत्री  सिंह ने जबलपुर एयरपोर्ट का नामकरण वीरांगना मां रानी दुर्गावती के नाम पर किए जाने का अनुरोध किया।  सिंह ने इस संबंध में मुख्यमंत्री को एक पत्र सौंपते हुए कहा कि वीरांगना रानी दुर्गावती भारतीय इतिहास की गौरवशाली वीरांगनाओं में से एक हैं। उन्होंने अपने साहस, पराक्रम और बलिदान से देश और समाज के लिए अमूल्य योगदान दिया है। विशेष रूप से महाकौशल क्षेत्र और जबलपुर से उनका ऐतिहासिक संबंध रहा है, जिसके कारण उनके नाम पर एयरपोर्ट का नामकरण क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा। लोक निर्माण मंत्री ने मुख्यमंत्री से इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर सकारात्मक विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि जबलपुर एयरपोर्ट को मां रानी दुर्गावती के नाम से जोड़ना उनकी वीरता और बलिदान को सम्मान देने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से प्रेरणा लेने का अवसर भी प्रदान करेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंत्री  सिंह द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर विचार करने का आश्वासन दिया। इस अवसर पर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक महापुरुषों के सम्मान से जुड़े विभिन्न विषयों पर भी चर्चा हुई।

नवा रायपुर में 2036 पौधों का रोपण: ओलंपिक मेजबानी के समर्थन में अनूठी पहल

रायपुर मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय ने अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक दिवस के अवसर पर नवा रायपुर के ग्राम पलोद में छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ द्वारा आयोजित वृक्षारोपण एवं खिलाड़ी सम्मान समारोह में शामिल होकर रुद्राक्ष का पौधा रोपित किया। इस अवसर पर उन्होंने प्रदेश के खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों एवं खेल प्रेमियों को अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक दिवस की शुभकामनाएं देते हुए खेल और पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्र निर्माण के दो महत्वपूर्ण आधार बताया। मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि भारत ने वर्ष 2036 के ओलंपिक खेलों की मेजबानी का दावा प्रस्तुत किया है। इसी राष्ट्रीय संकल्प और आकांक्षा को प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए कार्यक्रम में 2036 पौधों का रोपण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह केवल वृक्षारोपण अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ, हरित और सशक्त भारत के निर्माण का संकल्प भी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने और उन्हें राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। राज्य में खेलों के लिए बेहतर वातावरण और आधुनिक अधोसंरचना विकसित की जा रही है ताकि युवा अपनी प्रतिभा का पूरा प्रदर्शन कर सकें। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ को खेलो इंडिया नेशनल ट्राइबल गेम्स की सफल मेजबानी का गौरव प्राप्त हुआ है। वहीं बस्तर ओलंपिक जैसे अभिनव आयोजन ने दूरस्थ अंचलों की खेल प्रतिभाओं को नई पहचान दी है। इस वर्ष बस्तर ओलंपिक में लाखों युवाओं ने भाग लेकर अपनी क्षमता का परिचय दिया है, जो प्रदेश में खेलों के प्रति बढ़ते उत्साह का प्रमाण है। मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि राज्य सरकार खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए खेल क्षेत्र में विशेष बजट प्रावधान कर रही है। साथ ही उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को सम्मानजनक प्रोत्साहन राशि प्रदान करने की व्यवस्था की गई है, ताकि वे अधिक आत्मविश्वास और ऊर्जा के साथ देश एवं प्रदेश का नाम रोशन कर सकें। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने विभिन्न खेल विधाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों तथा वन विभाग के खिलाड़ियों को सम्मानित किया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। उप मुख्यमंत्री  अरुण साव ने कहा कि छत्तीसगढ़ में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार खेलों को बढ़ावा देने के लिए नई पहल कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में खेलो इंडिया जैसी योजनाओं ने देश में खेल संस्कृति को नई पहचान दी है। वन मंत्री  केदार कश्यप ने कहा कि प्रदेश के युवाओं में अपार प्रतिभा है और सरकार उन्हें आगे बढ़ाने के लिए हर संभव अवसर उपलब्ध करा रही है। उन्होंने कहा कि बस्तर ओलंपिक की सफलता के बाद अब सरगुजा ओलंपिक का आयोजन भी युवाओं को नई दिशा प्रदान कर रहा है। उन्होंने "एक पेड़ मां के नाम" अभियान का उल्लेख करते हुए अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने का आह्वान किया। कार्यक्रम में कौशल विकास मंत्री  गुरु खुशवंत साहेब, छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ के महासचिव डॉ. विक्रम सिंह सिसोदिया, प्रधान मुख्य वन संरक्षक  अरुण कुमार पाण्डेय, बीएसएफ के आईजी  संजय पंत सहित अनेक जनप्रतिनिधि, खिलाड़ी, प्रशिक्षक एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

कम बारिश और बढ़ती इथेनॉल मांग से संकट में चीनी उद्योग, निर्यात पर लंबा असर संभव

 नई दिल्ली भारत दुनिया के चीनी उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन आने वाले सालों में तस्वीर बदल सकती है. मौसम विशेषज्ञों ने इस साल अल-नीनो के असर से कम बारिश की आशंका जताई है. सरकार के इथेनॉल पर बढ़ते फोकस की वजह से गन्ने का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है. ऐसे में जानकारों का कहना है कि कम से कम तीन साल तक भारत के पास इतनी ज्यादा चीनी नहीं बच सकती कि वह बड़े पैमाने पर देशों को बेच सके।  भारत में गन्ने की खेती काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर करती है. मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक, इस साल बारिश सामान्य से कम रह सकती है. जून महीने में भी कई जगहों पर सामान्य से कम बारिश हुई है. इसी वजह से कुछ किसान गन्ने की जगह सोयाबीन, अरहर और दूसरी कम पानी वाली फसलें लगाने का फैसला कर रहें हैं. अगर ऐसा ही रहा तो आने वाले सीजन में गन्ने की खेती और उत्पादन दोनों पर असर पड़ सकता है।  चीनी की जरूरत ज्यादा, उत्पादन कम उद्योग के अनुमान के मुताबिक, 2025-26 सीजन में भारत का चीनी उत्पादन करीब 2.79 करोड़ टन रह सकता है. वहीं देश में हर साल करीब 2.85 करोड़ टन चीनी की खपत होती है. यानी देश में जितनी चीनी बन रही है, उससे ज्यादा चीनी की जरूरत है. इसी वजह से मिलों में चीनी का स्टॉक घटकर करीब 35 लाख टन रह सकता है, जो कई दशक में सबसे कम लेवल में से एक होगा।  इथेनॉल की बढ़ती मांग भी बड़ी वजह सरकार पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाने पर जोर दे रही है ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम की जा सके. इसके लिए गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में बढ़ रहा है. फिलहाल देश में इथेनॉल की मांग करीब 12 से 13 अरब लीटर है. आने वाले सालों में यह बढ़कर 30 अरब लीटर तक पहुंच सकती है. ऐसे में गन्ने का बड़ा हिस्सा चीनी की बजाय इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो सकता है।  सरकार की नजर घरेलू सप्लाई पर  भारत पहले दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी का एक्सपोर्टर था. 2022-23 तक पांच सालों में देश हर साल आमतौर पर 68 लाख टन चीनी विदेशों में बेचता था, जो वैश्विक चीनी करोबार का करीब 10% हिस्सा था. अब हालात बदल चुके हैं. सरकार की प्राथमिकता देश के भीतर चीनी की उपलब्धता बनाए रखना है. आने वाले सीजन में भी चीनी निर्यात को लेकर सख्त रुख देखने को मिल सकता है।  क्या भारत को भी चीनी खरीदनी पड़ सकती है? विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अल-नीनो का असर ज्यादा रहा और गन्ने की खेती में बड़ी गिरावट आई, तो आने वाले वर्षों में भारत को विदेशों से चीनी खरीदने की जरूरत भी पड़ सकती है. भारत ने आखिरी बार 2016-17 और 2017-18 में चीनी आयात की थी. उस समय सूखे और कम उत्पादन की वजह से ऐसी स्थिति बनी थी।  इससे पहले 2009 और 2010 में भारत की बड़ी खरीदारी ने दुनिया भर में चीनी की कीमतों को काफी ऊपर पहुंचा दिया था. कम बारिश की आशंका, गन्ने की खेती पर बढ़ता दबाव और इथेनॉल की बढ़ती मांग भारत के चीनी सेक्टर के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रहे हैं।  अगर मौसम के अनुमान सही साबित होते हैं, तो आने वाले कुछ सालों तक देश के पास विदेशों में बेचने के लिए अतिरिक्त चीनी कम बच सकती है. इतना ही नहीं, हालात ज्यादा बिगड़े तो भारत को भविष्य में चीनी आयात करने पर भी विचार करना पड़ सकता है।