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समंदर किनारे नायरा बनर्जी का बोल्ड अवतार, बिकिनी में शेयर की तस्वीरें; फैंस बोले- ‘कमाल कर दिया’

मुंबई  मशहूर टीवी एक्ट्रेस और बिग बॉस फेम नायरा बनर्जी स्क्रीन पर भले ही कई संस्कारी रोल में नजर आ चुकी हैं. मगर रियल लाइफ में वो काफी बोल्ड और बिंदास हैं। नायरा बनर्जी ने अब बिकिनी में अपनी सुपर सिजलिंग तस्वीरें शेयर की हैं, जिन्हें देखकर किसी की भी धड़कनें तेज हो सकती हैं। ब्लैक प्लोरल प्रिंटेड बिकिनी में एक्ट्रेस समंदर में नहाती हुई दिखाई दे रही हैं. उन्होंने भीगी जुल्फें लहराकर कई किलर पोज दिए।                बिकिनी पहने बीच पर नायरा जलवे बिखेरती नजर आईं. ओपन हेयर और सटल मेकअप में वो डीवा लग रही हैं। नायरा ने अपनी बिकिनी फोटोज के साथ कैप्शन में लिखा- संभालना मुश्किल नहीं, पर भूलना नामुमकिन है. रेड फ्लैग या रिलेशनशिप गोल? नायरा का फैशन सेंस हमेशा ऑन पॉइंट रहता है. एक्ट्रेस के एक्सप्रेशन्स, अदाएं और बिंदास एटीट्यूड देखते ही बनता है। नायरा बनर्जी सोशल मीडिया पर अक्सर अपनी ग्लैमरस तस्वीरें शेयर करती रहती हैं और उनकी लेटेस्ट बिकिनी फोटोज इंटरनेट पर जमकर वायरल हो रही हैं।          नायरा के बोल्ड बिकिनी लुक पर फैंस दिल हार रहे हैं. कमेंट सेक्शन में फैंस उनकी तारीफ करते थक नहीं रहे हैं।नायरा की बात करें तो वो टीवी की जानी-मानी एक्ट्रेस हैं. वो 'दिव्य दृष्टि', 'पिशाचिनी' में नजर आ चुकी हैं. नायरा ने रियलिटी शोज खतरों के खिलाड़ी और बिग बॉस भी किया है।  अब नायरा ने अपने बोल्ड बिकिनी लुक से हर किसी को अपना दीवाना बना दिया है. एक्ट्रेस का बिकिनी लुक आपको कैसा लगा?  

रेत माफियाओं पर प्रशासन का सख्त प्रहार अवैध उत्खनन में लगी पोकलेन मशीन जब्त, प्रदेशभर में निगरानी तेज

रायपुर  रेत माफियाओं के खिलाफ छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में प्रशासन का रुख बेहद सख्त हो गया है। अवैध उत्खनन, परिवहन और राजस्व की चोरी पर  अंकुश लगाने के लिए जिला प्रशासन, पुलिस और खनिज विभाग द्वारा लगातार ताबड़तोड़ छापेमार कार्रवाई की जा रही है। इसी कड़ी में रायगढ़ जिले के खरसिया विकासखंड अंतर्गत ग्राम बड़े डूमरपाली में अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई की गई है। कलेक्टर के निर्देश पर खनिज विभाग ने मौके से एक चौन माउंटेड पोकलेन मशीन को जब्त कर सील कर दिया है।  शिकायत पर त्वरित एक्शनः मौके पर पकड़ाया अवैध खनन             खनिज विभाग के अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार रायगढ़ जिले के बड़े डूमरपाली निवासी यशवंत डडसेना द्वारा नदी क्षेत्र में पोकलेन मशीन लगाकर अवैध रूप से रेत निकालने और उसके परिवहन की लगातार शिकायतें मिल रही थीं। शिकायत की सत्यता जांचने के लिए खनि निरीक्षक और खनिज उड़नदस्ता दल ने संयुक्त रूप से औचक छापा मारा। मौके पर अवैध खनन में संलिप्त पोकलेन मशीन को जब्त किया गया और कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर उसे ग्राम सरपंच की सुपुर्दगी में सौंप दिया गया। कड़े कानूनों के तहत मामला दर्ज            प्रशासन ने पर्यावरण और राजस्व को नुकसान पहुंचाने वाले वाहन मालिक के खिलाफ सख्त कानूनी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियम, 2015 के नियम 71, खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 21 एवं 23(क) की इन धाराओं के तहत वाहन मालिक के विरुद्ध प्रकरण दर्ज कर आगे की दंडात्मक कार्रवाई की जा रही है। आधुनिक तकनीक और उड़नदस्ता दलों से प्रदेशव्यापी निगरानी            खनिज विभाग ने साफ किया है कि यह कार्रवाई किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। राज्य सरकार के निर्देशानुसार पूरे प्रदेश में अवैध उत्खनन, अवैध परिवहन और अवैध भंडारण के खिलाफ एक व्यापक अभियान चलाया जा रहा है।  खनजिों के अवैध उत्खनन, परिवहन और राजस्व की चोरी को रोकने के लिए प्रशासन द्वारा अब आधुनिक तकनीक, स्थानीय खुफिया इनपुट और मुस्तैद उड़नदस्ता दलों का सहारा लिया जा रहा है।  पर्यावरण संरक्षण और राजस्व की सुरक्षा सर्वाेपरि          अधिकारियों ने बताया कि अनियंत्रित और अवैध रेत उत्खनन से न केवल नदियों का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होता है, बल्कि भूजल स्तर गिरने से पर्यावरणीय संतुलन भी बिगड़ता है। ऐसे में प्रशासन की यह कार्रवाई खनिज संपदा की रक्षा के साथ-साथ प्रकृति और सरकारी राजस्व को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है। खनिज विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि प्रदेश में कहीं भी खनिजों के अवैध दोहन, परिवहन या भंडारण में संलिप्त पाए जाने वाले लोगों को कतई बख्शा नहीं जाएगा। आने वाले दिनों में यह जांच अभियान और अधिक आक्रामक और प्रभावी ढंग से जारी रहेगा।

RBI रिपोर्ट ने खोली पोल, बाजार में पैसा भरपूर लेकिन ATM में नहीं मिल रहा कैश; इंडस्ट्री परेशान

 नई दिल्‍ली ऑनलाइन पेमेंट आने के बाद और यूपीआई का चलन बढ़ने के बाद से ही पिछले कुछ सालों में कैश को लेकर परेशानी बढ़ गई है. भारतीय रिजर्व बैंक के नए आंकड़ों ने कई बड़े खुलासे किए हैं, जिसके अनुसार 29 मई 2026 तक चलन में कैश 42.56 लाख करोड़ रुपये से अधिक थी. यह पिछले साल की तुलना में 12 फीसदी की बढ़ोतरी है. इसके बावजूद कुछ एटीएम मशीनों में कैश की कमी होती दिख रही है. लोगों को कैश निकालने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है।    एटीएम ऑपरेटरों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था, एटीएम उद्योग परिसंघ (CATMi) ने भारतीय बैंक संघ (IBA) को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि एटीएम में कैश भरने के लिए उपलब्ध कैश  में कमी आ रही है. लेटर में कहा गया है कि नवंबर 2025 में कैश आपूति 80 प्रतिशत थी. इसका मतलब है कि 20 फीसदी की कमी थी।  यह कमी लगातार बढ़ रही है, जो मार्च 2026 में 36 फीसदी और अप्रैल में 43 फीसदी थी. आसान शब्‍दों में कहें तो ATM ऑपरेटरों को अप्रैल में अपनी कैश जरूरतों का सिर्फ 57 फीसदी ही मिला. लेटर में कहा गया है कि दिसंबर 225 के अंत से, हमारे सदस्‍यों को कई राज्‍यों में बैंक ब्रांचेज और करेंसी चेस्‍ट से ATM में कैश डालने में लगातार परेशानियां छेलनी पड़ रही है।    क्‍यों घट रहा एटीएम में कैश?  एटीएम से निकासी में गिरावट आई है. CATMi के अनुसार, मासिक एटीएम निकासी जनवरी 2023 में लगभग 57 करोड़ से घटकर सितंबर 2025 तक लगभग 44 करोड़ हो गई है. डिजिटल भुगतान, खासकर यूपीआई की बढ़ती संख्‍या इस गिरावट का मुख्‍य कारण बताया जा रहा है।    CATMi ने कहा कि वर्तमान एटीएम कॉन्‍ट्रैक्‍ट्स 2.5 प्रतिशत से 3.0 प्रतिशत प्रति साल की मामूली गिरावट पर आधारित थे, जिसे सीपीआई से जुड़ी वृद्धि द्वारा समायोजित किया जाना था. वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है. इसने यह भी बताया कि कस्‍टमर द्वारा फ्री लिमिट से अधिक एटीएम उपयोग के लिए भुगतान किया जाने वाला शुल्क बढ़ गया है, इसने अधिक लोगों को डिजिटल की ओर धकेल दिया है, जिससे गिरावट तेज हो गई है और ऑपरेटरों के राजस्व में कमी आ रही है।     एटीएम ऑपरेट करने की कॉस्‍ट बढ़ी  उद्योग के जानकारों का यह भी कहना है कि बढ़ती लागत ऑपरेटरों पर दबाव बढ़ा रही है. इसमें परिवहन की कुल लागत, ईंधन, साथ ही सुरक्षा गार्डों और अन्य कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन शामिल हैं. विनिमय लागत (यह वह राशि है जो एक बैंक दूसरे बैंक को तब देता है जब कोई ग्राहक एक बैंक के डेबिट कार्ड का उपयोग दूसरे बैंक के एटीएम में करता है) से परिचालन लागत के कुछ हिस्से की भरपाई होने की उम्मीद थी, लेकिन उनका कहना है कि 19 रुपये से 21 रुपये तक की 2 रुपये की वृद्धि बढ़ती लागतों की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं रही है।    आरबीआई गवर्नर ने क्‍या कहा?  कैश संकट के बारे में पूछे जाने पर, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने शुक्रवार को कहा कि वे हर साल करेंसी की आवश्यकता का एक प्लान बनाते हैं और आवश्यकतानुसार बैंकों को उपलब्ध कराते हैं. उन्होंने कहा कि अगर कहीं भी नकदी की कमी होती है, तो वे यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि नकदी शीघ्रता से उपलब्ध कराई जाए।    मॉनिटरी पॉलिसी की घोषणा के बाद हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि हम यह सुनिश्चित करेंगे कि नकदी की कमी होने पर हमारे पास एटीएम और बैंक शाखाओं को भरने और फिर से भरने के लिए पर्याप्त पैस हो. डिजिटल भुगतान आम होने के कारण, विशेषकर बड़े शहरों में रहने वाले लोग एटीएम में नकदी खत्म होने की स्थिति में शायद ज्यादा चिंतित न हों।  हालांकि, सरकार से डायरेक्‍ट बेनिफिट मिलने वाले लोगों को नकदी की कमी का असर महसूस हो सकता है क्योंकि उनके शहर के एटीएम में पर्याप्त नकदी न हो. कई वरिष्ठ नागरिक अभी भी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए नकदी निकालते हैं. छोटे व्यापारी भी आमतौर पर नकदी लेनदेन पर निर्भर रहते हैं. CATMi ने सदस्य बैंकों से एटीएम में नकदी की विश्वसनीय बनाए रखने और बैंकों से इस मुद्दे को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए कहा है। 

पॉलीमर नोटों पर चल रहा विचार, लेकिन अभी अंतिम फैसला नहीं; RBI गवर्नर ने साफ की स्थिति

मुंबई  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए गवर्नर संजय मल्होत्रा ने देश की मुद्रा को लेकर एक बहुत बड़ी जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि आरबीआई भारत में प्लास्टिक यानी पॉलीमर के नोट चलाने के विचार पर काम कर रहा है. हालांकि, गवर्नर ने यह साफ किया कि यह योजना अभी बिल्कुल शुरुआती दौर में है और इस पर कोई आखिरी फैसला नहीं लिया गया है. बैंक अभी इसके हर फायदे और नुकसान की अच्छे से जांच कर रहा है।  पहले क्यों नहीं चल पाए थे प्लास्टिक के नोट? भारत में प्लास्टिक के नोट चलाने की कोशिश पहले भी हो चुकी है. साल 2014 के आसपास सरकार ने देश के पांच शहरों—जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का एक छोटा सा टेस्ट (ट्रायल) किया था. लेकिन उस समय यह तरीका सफल नहीं हो पाया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि देश के ATM और बैंकों की नोट गिनने वाली मशीनें केवल कागजी नोटों के हिसाब से बनी थीं. प्लास्टिक के नोटों की वजह से मशीनें बार-बार जाम होने लगीं. साथ ही, भारत की तेज गर्मी में इन नोटों के आपस में चिपकने और सिकुड़ने का डर भी था. इसी वजह से तब इस काम को रोक दिया गया था. अब आरबीआई इन सभी पुरानी कमियों को दूर करने की तैयारी कर रहा है।  क्या होते हैं पॉलीमर नोट और इनके क्या फायदे हैं? प्लास्टिक या पॉलीमर नोट किसी कड़क प्लास्टिक कार्ड (जैसे एटीएम कार्ड) की तरह नहीं होते. ये एक खास तरह के बहुत पतले और लचीले प्लास्टिक (BOPP) से बनते हैं. इन्हें आप आम कागजी नोटों की तरह ही आसानी से मोड़कर जेब या पर्स में रख सकते हैं. इन नोटों के कई बड़े फायदे हैं:     ज्यादा मजबूती: ये नोट पानी या पसीने से गलते नहीं हैं और आसानी से फटते भी नहीं हैं. इसलिए ये बहुत लंबे समय तक चलते हैं।      गंदगी का असर नहीं: इन नोटों पर धूल, मिट्टी या पानी का असर नहीं होता, जिससे ये गंदे और काले नहीं पड़ते।      नकली नोटों पर रोक: प्लास्टिक के नोटों पर ऐसे सुरक्षा घेरे (सिक्योरिटी फीचर्स) लगाए जा सकते हैं, जिनकी नकल करना नामुमकिन होता है. इससे देश में नकली नोटों का धंधा पूरी तरह बंद हो जाएगा।      पैसों की बचत: हालांकि इन्हें छापने का शुरुआती खर्च ज्यादा होता है, लेकिन लंबे समय तक चलने के कारण बार-बार नए नोट छापने का सरकारी खर्च बच जाता है।  दुनिया के कई देशों में है यह व्यवस्था दुनिया में सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने साल 1988 में प्लास्टिक के नोटों का इस्तेमाल शुरू किया था. आज के समय में ब्रिटेन (यूके), कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया और थाईलैंड समेत दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में प्लास्टिक के नोट बहुत कामयाबी से चल रहे हैं. आरबीआई गवर्नर ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि इस नए बदलाव के दौरान देश में पैसों की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। 

पंजाब भाजपा में बदलाव की बयार, नए चेहरे के साथ बदला 2027 चुनाव का पूरा गेमप्लान

चंडीगढ़  पंजाब भाजपा में प्रदेशाध्यक्ष बदलने का फैसला केवल संगठनात्मक फेरबदल नहीं माना जा रहा। सुनील जाखड़ की जगह केवल सिंह ढिल्लों को कमान सौंपने को पार्टी की चुनावी दिशा में बदलाव और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक पुनर्संतुलन की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक रूप से यह फैसला ऐसे समय आया है जब पंजाब की राजनीति अपने सबसे दिलचस्प दौर में प्रवेश कर रही है।सत्ता में आम आदमी पार्टी (आप) सरकार अब शासन के मूल्यांकन के दौर में है। कांग्रेस नेतृत्व और संगठन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में है। शिरोमणि अकाली दल (शिअद) अपने पुराने प्रभाव को फिर से खड़ा करने की लड़ाई लड़ रहा है। इसी बीच भाजपा ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने साफ कर दिया कि वह अब पंजाब में केवल उपस्थिति नहीं, हिस्सेदारी बढ़ाने की राजनीति करना चाहती है। प्रदेशाध्यक्ष बदलने के इस फैसले को समझने के लिए केवल व्यक्तियों को नहीं, बल्कि पंजाब की बदलती राजनीति को पढ़ना होगा। प्रदेशाध्यक्ष बदलकर भाजपा ने केवल अपने कार्यकर्ताओं को संदेश नहीं दिया है। यह कदम विपक्षी दलों के लिए भी संकेत माना जा रहा है। कांग्रेस के सामने अब अपना पारंपरिक सामाजिक आधार बचाए रखने की चुनौती होगी। आप को सत्ता विरोधी माहौल को संभालना होगा। वहीं अकाली दल के लिए यह संकेत है कि भाजपा अब पुराने गठबंधन वाले ढांचे में लौटने के बजाय स्वतंत्र विस्तार की राह पर भी आगे बढ़ रही है। फिलहाल इतना साफ दिखाई देता है कि पंजाब भाजपा ने प्रदेशाध्यक्ष बदलकर केवल नया चेहरा नहीं चुना। उसने 2027 की लड़ाई के लिए अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं तय कर दी हैं। अब असली सवाल यह नहीं कि ढिल्लों अध्यक्ष के तौर पर कितने सफल होंगे। सवाल यह भी है कि क्या भाजपा पंजाब में अपनी राजनीतिक पहचान की नई परिभाषा को गढ़ पाएगी। केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेशाध्यक्ष बनाना पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती से निपटने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा को पहली बार यह समझ आया कि पंजाब में स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनने के लिए उसे अपने सामाजिक आधार का विस्तार करना होगा। –-राजनीतिक खालीपन को पढ़ रही भाजपा पंजाब की राजनीति में लंबे समय तक अकाली दल सिख नेतृत्व और ग्रामीण सामाजिक आधार का सबसे बड़ा केंद्र रहा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसकी राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई है और भाजपा शायद इसी बदलते परिदृश्य को अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी चाहती है कि सिख समाज का एक हिस्सा उसे भी राजनीतिक विकल्प के रूप में देखना शुरू करे। इसी वजह से ढिल्लों का चयन केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और प्रतीकात्मक राजनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है। –भाजपा के लिए अस्तित्व नहीं, विस्तार की परीक्षा आने वाला विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए केवल सीटों का मुकाबला नहीं होगा। यह चुनाव तय करेगा कि पार्टी पंजाब में गठबंधन आधारित राजनीति से आगे निकलकर स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बन पाती है या नहीं। भाजपा के सामने चुनौती कई स्तरों पर है। उसे अपना शहरी आधार बनाए रखना होगा। सिख मतदाताओं में भरोसा बनाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन खड़ा करना होगा और राज्य के वास्तविक मुद्दों को अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाना होगा।

बंदूक छोड़ विकास की राह पर बढ़े युवा, सुकमा में आत्मसमर्पण के बाद बदल रही जिंदगी की तस्वीर

जब बंदूक छूटी, तो हाथों में आया सुनहरा भविष्य :  सुकमा में आत्मसमर्पित युवाओं की जिंदगी लिख रही विकास की नई कहानी जिन हाथों में कभी हथियार थे, अब वे बनाएंगे गरीबों के आशियाने सोड़ी हूंगी और पदम रैनू जैसे युवाओं के जीवन में लौटी उम्मीद, हुनर ने दिया सम्मान से जीने का नया आधार सुकमा में पुनर्वास की अनूठी पहल बनी राष्ट्रीय मिसाल, 280 से अधिक आत्मसमर्पित युवाओं को मिला रोजगार का रास्ता रायपुर, बस्तर की पहचान लंबे समय तक संघर्ष, भय और नक्सल हिंसा के साये से जुड़ी रही है। सुकमा जैसे जिले के घने जंगलों में ऐसी कई पीढ़ियां बड़ी हुईं, जिन्होंने विकास से ज्यादा बंदूक की आवाज सुनी, स्कूल से ज्यादा भय देखा और सपनों से ज्यादा संघर्षों का सामना किया। लेकिन आज उसी सुकमा से एक ऐसी कहानी निकलकर सामने आ रही है, जो केवल बदलाव की नहीं, बल्कि उम्मीद और विश्वास की कहानी है। यह कहानी उन युवाओं की है, जिन्होंने कभी हिंसा का रास्ता चुना था, लेकिन आज वे अपने हाथों में निर्माण के औजार लेकर समाज के विकास में भागीदार बनने की तैयारी कर रहे हैं। यह कहानी उन बेटियों की है, जिन्होंने जंगलों की अनिश्चित जिंदगी छोड़कर आत्मनिर्भरता का रास्ता चुना है। यह कहानी उस प्रशासनिक संवेदनशीलता की है, जिसने आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं को केवल मुख्यधारा में लौटने का अवसर नहीं दिया, बल्कि उन्हें सम्मान के साथ जीने का नया आधार भी दिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा संचालित पुनर्वास और कौशल विकास कार्यक्रम के तहत जिला प्रशासन सुकमा और एसबीआई आरसेटी के संयुक्त प्रयासों से 25 आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें 13 महिलाएं और 12 पुरुष शामिल हैं। यह प्रशिक्षण केवल रोजगार देने का माध्यम नहीं, बल्कि जिंदगी को नए सिरे से गढ़ने का अवसर बन गया है। जंगलों की खामोशी से निर्माण स्थलों की रौनक तक इन युवाओं का अतीत संघर्षों से भरा रहा है। जंगलों में बिताए वर्षों ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में जीना सिखाया, लेकिन भविष्य के सपने देखने का अवसर नहीं दिया। आज जब वे प्रशिक्षण केंद्र में ईंट जोड़ना, दीवार खड़ी करना और मकान बनाना सीख रहे हैं, तब वे केवल भवन निर्माण नहीं सीख रहे, बल्कि अपनी टूटी हुई उम्मीदों को भी फिर से जोड़ रहे हैं। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें आधुनिक निर्माण तकनीक, माप-जोख, चिनाई, प्लास्टर और भवन निर्माण के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी जा रही है। आने वाले समय में यही युवा प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) सहित विभिन्न निर्माण कार्यों में अपनी भूमिका निभाएंगे। जिन हाथों में कभी हथियार थे, वही हाथ अब किसी गरीब परिवार के सपनों का घर खड़ा करेंगे। सोड़ी हूंगी : अब जिंदगी में डर नहीं, सपनों की जगह है कोंटा क्षेत्र के अरलमपल्ली गांव की रहने वाली सोड़ी हूंगी उन महिलाओं में शामिल हैं, जिनके जीवन ने यह साबित किया है कि अवसर मिले तो परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, बदलाव संभव है। हूंगी बताती हैं कि एक समय ऐसा था जब जीवन में हर दिन अनिश्चितता थी। लेकिन आत्मसमर्पण के बाद प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा, सम्मान और सीखने का अवसर दिया। आज वे राजमिस्त्री का प्रशिक्षण ले रही हैं और अपने भविष्य को लेकर उत्साहित हैं। उनकी आंखों में आत्मविश्वास झलकता है जब वे कहती हैं, अब हम किसी पर बोझ नहीं रहेंगे। अपने हाथों की मेहनत से कमाएंगे और परिवार का सहारा बनेंगे। हूंगी जैसी कई महिलाओं के लिए यह प्रशिक्षण केवल रोजगार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वतंत्र पहचान का माध्यम बन गया है। ’पदम रैनू: ‘सरकार ने हमें भटकने से बचाया’ जगरगुंडा के मंडीमरका गांव के निवासी ’पदम रैनू’ की कहानी भी उतनी ही भावुक और प्रेरणादायक है। जंगलों में बीते वर्षों को याद करते हुए वे कहते हैं कि वहां जीवन केवल संघर्ष और अनिश्चितता का पर्याय था। न रहने का ठिकाना, न भविष्य की कोई गारंटी। हर दिन नई चिंता होती थी। लेकिन आज हमें रहने की सुविधा मिली है, सीखने का अवसर मिला है और सबसे बड़ी बात यह कि सम्मान मिला है। सरकार ने हमें भटकने से बचाया और जीने का नया रास्ता दिखाया। पदम की यह बात केवल उनकी व्यक्तिगत भावना नहीं, बल्कि उन सैकड़ों युवाओं की आवाज है, जिनके जीवन में पुनर्वास योजनाओं ने नया विश्वास पैदा किया है। एक पहल जिसने बदल दी दो तस्वीरें जिला प्रशासन की यह पहल केवल आत्मसमर्पित युवाओं के पुनर्वास तक सीमित नहीं है। इसका सकारात्मक प्रभाव जिले के विकास पर भी दिखाई दे रहा है। सुकमा के अनेक दूरस्थ क्षेत्रों में लंबे समय से कुशल राजमिस्त्रियों की कमी महसूस की जाती रही है। इससे प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य निर्माण कार्यों की गति प्रभावित होती थी। अब प्रशिक्षित युवा न केवल अपने लिए रोजगार का रास्ता बना रहे हैं, बल्कि जिले के विकास कार्यों को भी नई गति देने वाले हैं। इस प्रकार एक ही पहल ने दो बड़े लक्ष्य साध लिए हैं, एक ओर युवाओं को सम्मानजनक जीवन का अवसर मिला, दूसरी ओर विकास कार्यों को स्थानीय स्तर पर कुशल मानव संसाधन प्राप्त हुआ। 280 से अधिक युवाओं की जिंदगी में आया बदलाव कलेक्टर अमित कुमार बताते हैं कि आत्मसमर्पण केवल हथियार छोड़ने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि व्यक्ति को समाज का जिम्मेदार और आत्मनिर्भर नागरिक बनाने की यात्रा है। इसी सोच के साथ अब तक लगभग 280 आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। प्रशासन का लक्ष्य है कि पुनर्वासित युवाओं को ऐसा कौशल मिले, जिससे वे स्थायी रोजगार प्राप्त कर सकें और समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। यही कारण है कि प्रशिक्षण के साथ-साथ उनके सामाजिक और आर्थिक पुनर्स्थापन पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बदलते बस्तर की नई पहचान आज सुकमा की यह कहानी केवल सरकारी योजना की सफलता नहीं है। यह उस विश्वास की जीत है, जो कहता है कि हर व्यक्ति को दूसरा अवसर मिलना चाहिए। यह उस संवेदनशील शासन व्यवस्था की कहानी है, जिसने भटके हुए युवाओं में भी संभावनाएं देखीं। यह उस बदलते बस्तर की कहानी है, जहां अब विकास की चर्चा होती है, रोजगार की बात होती है और सपनों को सच करने की कोशिश होती है। कभी जिन पगडंडियों पर भय … Read more

गोल्ड वैल्यू में बड़ी गिरावट से बढ़ी चर्चा, RBI ने साफ किया- रिजर्व का सोना सुरक्षित है

नई दिल्‍ली भारतीय रिजर्व बैंक के गोल्‍ड रिजर्व वैल्‍यू में गिरावट आई है. यह वैल्‍यू 2 अरब डॉलर से ज्‍यादा कम हो चुका है. RBI के नए वीकली रिपोर्ट में 29 मई, 2026 को समाप्त सप्ताह के दौरान उसके सोने के भंडार की वैल्‍यू में 2.19 अरब डॉलर की गिरावट आई है।  इस गिरावट से बाजार में यह अटकलें लगने लगीं कि RBI ने अपने सोने के भंडार का कुछ हिस्‍सा बेच दिया होगा, लेकिन गवर्नर संजय मल्‍होत्रा ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि केंद्रीय बैंक का गोल्‍ड रिजर्व बरकरार है, बल्कि इसमें मामूली बढ़ोतरी हुई है।  RBI के आंकड़ों के अनुसार, 29 मई तक गोल्‍ड रिजर्व की वैल्‍यू 112.60 अरब डॉलर थी. इसी सप्ताह के दौरान, फॉरेन करेंसी असेट (भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा घटक) में 3.12 अरब डॉलर की बढ़ोतरी देखी गई और यह बढ़कर 546.15 अरब डॉलर हो गया. गोल्‍ड रिजर्व की रिपोर्ट किए गए वैल्‍यू में गिरावट के बावजूद, विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति में बढ़ोतरी ने देश की पूरी रिजर्व स्थिति को मजबूत करने में मदद की।  सोने के भंडार में गिरावट?  RBI ने स्पष्ट किया कि सोने के भंडार में गिरावट खासतौर पर वैल्‍यू में बदलाव के कारण हुई है, न कि कीमती धातु की बिक्री के कारण. सोने के भंडार अमेरिकी डॉलर में दर्ज किए जाते हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार प्राइस के आधार पर हर सप्ताह इनका वैल्‍यूवेशन किया जाता है. इसी कारण, वैश्विक सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव और मुद्रा के परिवर्तन भंडार के रिपोर्ट किए गए प्राइस को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं, चाहे केंद्रीय बैंक के पास मौजूद सोने की मात्रा अनचेंज रहे।  शुक्रवार को मॉनेटरी पॉलिसी के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए मल्होत्रा ​​ने कहा कि ऐसी खबरों का कोई आधार नहीं है जिनमें यह सुझाव दिया गया है कि आरबीआई ने सोना बेचा है. उन्‍होंने  कहा कि नहीं, RBI ने सोना नहीं बेचा है. हमारे सोने के भंडार में मामूली बढ़ोतरी हुई है।  RBI ने ब्लूमबर्ग की रिपोर्टों का खंडन किया यह स्पष्टीकरण ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के एक विश्लेषण के बाद आया है जिसमें सुझाव दिया गया था कि भंडार के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि 22 मई को समाप्त होने वाले दो सप्ताह की अवधि के दौरान लगभग 12 अरब डॉलर वैल्‍यू के सोने की बिक्री हुई, जबकि इसी अवधि में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में वृद्धि हुई. इस विश्लेषण के कारण यह अटकलें लगाई गईं कि वैश्विक बाजार की अनिश्चितता के बीच केंद्रीय बैंक ने रुपये को सहारा देने या अपनी विदेशी मुद्रा स्थिति को मजबूत करने के लिए सोने के भंडार का उपयोग किया होगा।  हालांकि, आरबीआई ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उसके पास मौजूद सोने का फिजिकल रिजर्व 880.52 टन पर अनचेंज है. केंद्रीय बैंक ने इस बात पर जोर दिया कि सोने के भंडार के प्राइस में होने वाले उतार-चढ़ाव को वास्तविक भंडार में होने वाले बदलाव से भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इसमें लाभ और नुकसान भंडार प्रबंधन की एक नियमित प्रक्रिया है।  पीआईबी ने भी खबरों का किया खंडन  सरकार की सूचना जांच एजेंसी, प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) ने भी सोने की बिक्री से जुड़ी खबरों को 'फर्जी' बताया. आरबीआई के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए, पीआईबी ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है. सितंबर 2025 के अंत में कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 13.92% थी, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 16.70% हो गई और 22 मई 2026 तक और बढ़कर 16.85% हो गई। 

TMC में फिर उठे असंतोष के सुर, दिल्ली तक पहुंचा विवाद; ममता बनर्जी की बढ़ सकती है मुश्किल

कलकत्ता ममता बनर्जी के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के भीतर हुई बड़ी टूट के बाद अब पार्टी के सांसदों को लेकर भी हलचल तेज हो गई है. चर्चा यह है कि विधानसभा के बाद अब लोकसभा-राज्यसभा में भी बगावत की आहट सुनाई दे सकती है. यही वजह है कि डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी नेतृत्व पूरी तरह एक्टिव हो गया है।  दरअसल, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में करीब 60 विधायकों के अलग होने के बाद TMC पहली बार इतने बड़े अंदरूनी संकट से जूझती दिख रही है. विधानसभा में यह बगावत इतनी बड़ी रही कि स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता भी मान्यता दे दी. अब सवाल उठ रहा है कि क्या यही सियासी हलचल संसद तक भी पहुंचेगी? न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने भी इस आशंका को खुलकर सामने रखा है. उन्होंने कहा कि जिस तरह इतने कम समय में बड़ी संख्या में विधायक अलग हुए हैं, वैसी प्रतिक्रिया लोकसभा में भी देखने को मिल सकती है. हालांकि, उन्होंने राज्यसभा को लेकर साफ भविष्यवाणी नहीं की, लेकिन यह जरूर कहा कि ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।  दूसरी तरफ, सीनियर टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने पार्टी में किसी भी बड़ी टूट के दावे को सिरे से खारिज किया है. उनका आरोप है कि बीजेपी संसद के भीतर भी वही खेल दोहराने की फिराक में है जो उसने बंगाल विधानसभा में किया. हालांकि, उन्हें पूरा भरोसा है कि ममता बनर्जी पहले भी ऐसे कई मुश्किल हालात से बखूबी निकली हैं व इस बार भी शानदार वापसी करेंगी।  सबसे ज्यादा चर्चा बारासात सांसद काकोली घोष दस्तीदार को लेकर हो रही है. पार्टी के भीतर उनकी नाराजगी पहले से चर्चा में रही है. लोकसभा में चीफ व्हिप पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने कई बार नेतृत्व को लेकर नाराजगी जाहिर की. यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में उनके नाम की चर्चा तेज है, हालांकि उन्होंने खुद किसी बगावत की पुष्टि नहीं की है. सूत्रों की मानें तो हालात संभालने के लिए ममता बनर्जी ने पिछले दो दिनों में कई नाराज विधायकों और सांसदों से खुद बात की. पार्टी की कोशिश है कि मामला आगे बढ़ने से पहले ही सुलझा लिया जाए. संसद में भी दो सबसे भरोसेमंद सांसदों को बाकी सहयोगियों से लगातार संपर्क बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।  फिलहाल TMC के पास लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं. दलबदल कानून के तहत अगर दो-तिहाई सांसद किसी अलग गुट के साथ जाते हैं, तो उनकी सदस्यता बच सकती है. इसी वजह से दो तरह की चर्चाएं चल रही हैं. पहली, 'ऋतब्रत मॉडल', जिसमें सांसद अलग गुट बनाकर खुद को असली TMC बताने की कोशिश करें. दूसरी, किसी दूसरी पार्टी के साथ विलय का रास्ता।  हालांकि, पार्टी का चुनाव चिह्न और संगठन पर दावा सिर्फ सांसदों या विधायकों की संख्या से तय नहीं होगा. इसके लिए चुनाव आयोग के सामने यह साबित करना होगा कि संगठन के भीतर असली बहुमत किसके साथ है. अभी के लिए इतना साफ है कि बंगाल की लड़ाई अब सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं दिख रही।   

सुपरफास्ट ग्रोथ के मिशन पर भारत, प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक विशेषज्ञों के साथ किया मंथन

नई दिल्‍ली  पूरी दुनिया मंदी, युद्ध की आहट और आर्थिक अनिश्चितता के चक्रव्यूह में फंसी है. वैश्विक बाजारों में हाहाकार मचा है, सप्लाई चेन टूट रही है और कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने को बेताब हैं. दुनिया की इस महा-उथल-पुथल के बीच दिल्ली के पावर कॉरिडोर में भारत को आर्थिक सुपरपावर बनाए रखने की एक बेहद महत्वपूर्ण बिसात बिछाई जा रही थी. जून की इस तपती दोपहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे बड़े आर्थिक धुरंधरों (PM-EAC) के साथ बंद कमरे में मेज पर जुटे. मकसद साफ था दुनिया भले ही मंदी की गर्त में जाए लेकिन भारत की विकास दर सुपरफास्ट रफ्तार से दौड़ती रहनी चाहिए. इस हाई-प्रोफाइल बैठक में न सिर्फ भारत की अभेद्य आर्थिक किलेबंदी का ब्लूप्रिंट तैयार हुआ बल्कि पश्चिम एशिया के बारूद की आंच से घरेलू बाजार को बचाने का फुलप्रूफ प्लान भी सामने आया।  पीएम नरेंद्र मोदी की बैठक की 5 मुख्य बातें • आर्थिक किलेबंदी की रणनीति: वैश्विक मंदी और तनाव के बीच भारत की 7.7% की रफ्तार को बरकरार रखने और इसे आगे बढ़ाने के लिए नए आर्थिक सुधारों पर गहन मंथन हुआ।  • पश्चिम एशिया संकट पर पैनी नजर: लाल सागर और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भारत के व्यापार, MSMEs और कच्चे तेल की सप्लाई पर पड़ने वाले असर का बारीकी से आकलन किया गया।  • नीति आयोग की खुफिया रिपोर्ट: नीति आयोग द्वारा पीएमओ (PMO) को सौंपी गई इम्पैक्ट एसेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर भविष्य के बड़े झटकों से निपटने की रणनीति बनाई गई।  • ईज ऑफ लिविंग पर सबसे बड़ा दांव: आम आदमी के जीवन को आसान बनाने और व्यापारिक बाधाओं को खत्म करने के लिए नियमों को और अधिक सरल बनाने पर सहमति बनी।  • घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग पर जोर: विदेशी झटकों से बेअसर रहने के लिए देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने और घरेलू उपभोग को मजबूत करने का संकल्प लिया गया।  वैश्विक तूफान, पीएम मोदी की ढाल वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है. एक तरफ पश्चिम एशिया का संकट अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों को असुरक्षित बना रहा है तो दूसरी तरफ दुनिया के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में की जा रही सख्ती ने निवेश पर ब्रेक लगा दिया है. ऐसे में भारत के लिए अपनी ग्रोथ को कायम रखना किसी चुनौती से कम नहीं है।  इस बैठक का सबसे बड़ा आर्थिक संदेश यह है कि भारत अब रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक नीति पर चल रहा है. वित्त वर्ष 2026 में 7.7% की जीडीपी ग्रोथ हासिल करके भारत ने अपनी आंतरिक मजबूती साबित की है. नीति आयोग की रिपोर्ट और PM-EAC की सलाह का कोर-पॉइंट यह है कि अगर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत अपनी घरेलू मांग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिकॉर्ड सरकारी खर्च के जरिए उसकी भरपाई करेगा. सरकार का यह कदम भारतीय बाजार को एक इंसुलेटेड शील्ड यानी सुरक्षा कवच प्रदान करेगा, जिससे दुनिया की मंदी का असर भारत के युवाओं के रोजगार और उद्योगों पर न पड़े।  सवाल-जवाब PM-EAC की इस आपात बैठक का मुख्य एजेंडा क्या था? इस बैठक का मुख्य एजेंडा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत की विकास दर को ‘सुपरफास्ट’ बनाए रखना, घरेलू उद्योगों को सुरक्षित करना और आर्थिक सुधारों को गति देना था।  पश्चिम एशिया के तनाव से भारतीय अर्थव्यवस्था को क्या खतरा है? भारत अपनी ऊर्जा (क्रूड ऑयल) जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है. पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और माल ढुलाई (शिपिंग रूट) महंगी हो सकती है, जिससे भारत के निर्यात और MSMEs पर असर पड़ सकता है।  नीति आयोग की ‘इम्पैक्ट एसेसमेंट रिपोर्ट’ में क्या खास है? इस रिपोर्ट में युद्ध के लंबे खिंचने की स्थिति में भारतीय व्यापार, किसानों, कृषि क्षेत्र और प्रमुख औद्योगिक सेक्टरों पर पड़ने वाले तात्कालिक और मध्यम अवधि के प्रभावों का पूरा खाका और उससे निपटने के उपाय सुझाए गए हैं।  सरकार ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और ‘ईज ऑफ लिविंग’ पर इतना जोर क्यों दे रही है? वैश्विक उथल-पुथल के समय अगर देश के भीतर व्यापार करना और आम नागरिक का जीवन आसान होगा, तो घरेलू निवेश बढ़ेगा. इससे नए रोजगार पैदा होंगे और विदेशी निवेशकों के लिए भारत सबसे सुरक्षित और पसंदीदा ठिकाना बना रहेगा। 

2030 तक AI बनेगा सबसे बड़ा संसाधन उपभोक्ता? UN रिपोर्ट में पानी-बिजली को लेकर बड़ा खुलासा

नई दिल्ली  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर अक्सर एक तर्क दिया जाता है. लोग कहते हैं कि फ्यूचर में तकनीक सुधरेगी तो एआई मॉडल्स कम एनर्जी और रिसोर्सेज का इस्तेमाल करेंगे. यूनाइटेड नेशन्स की एक नई रिपोर्ट ने इस सोच को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है. यूएन की इस रिपोर्ट में एआई के कारण पर्यावरण को होने वाले भारी नुकसान का डेटा दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2030 तक एआई की बिजली खपत दोगुनी हो सकती है. तब यह पूरी दुनिया की कुल बिजली का 3 प्रतिशत हिस्सा अकेले खा जाएगा. इतना ही नहीं, एआई से होने वाला कार्बन उत्सर्जन ब्रिटेन जैसे देश के बराबर पहुंच जाएगा।  सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एआई डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए इतना पानी लगेगा, जितना पूरी दुनिया की आबादी सालभर में भी नहीं पीती है. यह स्थिति पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है।  जेवंस पैराडॉक्स का वह जाल क्या है जिसमें फंसकर एआई बढ़ा रहा है पर्यावरण की मुसीबत? यूएन की रिपोर्ट में एक बेहद जरूरी आर्थिक सिद्धांत का जिक्र किया गया है. इसे ‘जेवंस पैराडॉक्स’ कहा जाता है. यह सिद्धांत बताता है कि जब कोई नई टेक्नोलॉजी किसी रिसोर्स के इस्तेमाल को ज्यादा एफिशिएंट बनाती है, तो कुल खपत घटती नहीं है. इसके उलट उस रिसोर्स का कुल कंजम्पशन और ज्यादा बढ़ जाता है।  इस सिद्धांत का नाम मशहूर इकोनॉमिस्ट विलियम स्टेनली जेवंस के नाम पर रखा गया था. उन्होंने 19वीं सदी के इंग्लैंड में कोयले के इस्तेमाल के दौरान इस पैटर्न को देखा था. तब कोयले के इंजन ज्यादा एफिशिएंट हो गए थे. इसके बाद भी कोयले की कुल खपत कम नहीं हुई थी  असल में एफिशिएंसी बढ़ने से कोयले की लागत कम हो गई थी. कम लागत के कारण लोगों ने इसका इस्तेमाल बहुत ज्यादा बढ़ा दिया था. इससे कुल डिमांड में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. एआई के मामले में भी बिल्कुल ऐसा ही होने की आशंका है।  जैसे-जैसे एआई मॉडल्स ज्यादा सस्ते और बेहतर होते जाएंगे, वैसे-वैसे इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा. लोग नए-नए कामों के लिए एआई का उपयोग शुरू कर देंगे. इससे एफिशिएंसी से होने वाली कोई भी बचत पूरी तरह खत्म हो जाएगी।  डेटा सेंटर्स दुनिया की कितनी बिजली और पानी सोख रहे हैं और इसके पीछे का सच क्या है?     इस संकट के बड़े पैमाने को समझने के लिए डेटा सेंटर्स की मौजूदा स्थिति को देखना होगा. पिछले साल दुनिया के डेटा सेंटर्स ने मिलकर उतनी ही बिजली खर्च की, जितनी सऊदी अरब जैसा देश करता है. सऊदी अरब दुनिया का 11वां सबसे बड़ा बिजली कंज्यूमर देश है।      अगर साल 2030 तक एआई की बिजली डिमांड दोगुनी हो जाती है, तो इससे पर्यावरण पर भारी असर पड़ेगा. इस बढ़े हुए कार्बन फुटप्रिंट की भरपाई करने के लिए इंसान को बहुत बड़े कदम उठाने होंगे. इसके लिए करीब 10 सालों तक 6.7 बिलियन पेड़ उगाने होंगे।      इतना ही नहीं, साल 2030 तक इन डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की जरूरत होगी. यह पानी डेटा सेंटर्स के भारी-भरकम सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. इसके साथ ही इन सेंटर्स के लिए मेक्सिको सिटी के साइज से दस गुना ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ेगी।  ग्लोबल लेवल पर एआई की ताकत का बंटवारा कैसे पर्यावरण के लिए नई असमानता पैदा कर रहा है? यूएन की रिपोर्ट केवल रिसोर्स के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है. यह एआई बूम के पीछे छिपी गहरी असमानता को भी सामने लाती है. दुनिया में केवल 32 देश ऐसे हैं, जिनके पास एआई के लिए जरूरी क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।  हैरानी की बात यह है कि इस पूरी क्षमता का 90 प्रतिशत हिस्सा केवल अमेरिका और चीन के पास है. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि इससे दुनिया में एक बड़ा डिजिटल डिवाइड पैदा हो रहा है. एक तरफ वे देश हैं जो एआई सिस्टम को पूरी तरह कंट्रोल करते हैं।  दूसरी तरफ वे देश हैं जो केवल इन सिस्टम्स का इस्तेमाल करते हैं. इन कमजोर देशों को पर्यावरण का बहुत बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है. एआई के लिए जरूरी मिनरल्स का एक्सट्रैक्शन और खतरनाक ई-वेस्ट का बोझ अक्सर इन्हीं गरीब देशों पर पड़ता है।  एआई मॉडल्स के अलग-अलग टास्क पर्यावरण पर कितना और किस तरह का असर डालते हैं?     एआई के काम करने के तरीके को दो मुख्य ताकतें तय करती हैं. पहला यह कि हम इसका कितना इस्तेमाल करते हैं. दूसरा यह कि हम इसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं. एआई कई तरह के टास्क पूरे करता है।  .     इसमें टेक्स्ट लिखना, कोड जेनरेट करना, इमेज बनाना और वीडियो बनाना शामिल है. इन सभी कामों को पूरा करने के लिए अलग-अलग कंप्यूटर पावर की जरूरत होती है. इमेज और वीडियो बनाने में टेक्स्ट के मुकाबले कहीं ज्यादा एनर्जी खर्च होती है।      सही मॉडल का चुनाव करना भी बेहद जरूरी है. हर एआई सिस्टम के काम करने की एनर्जी कॉस्ट अलग होती है. इसलिए रिस्पॉन्सिबल एआई के लिए पूरी वैल्यू चेन को संभालना होगा. इसमें मिनरल्स की माइनिंग से लेकर रीसाइक्लिंग और ई-वेस्ट का सही डिस्पोजल शामिल होना चाहिए।  दुनिया के बड़े देश इस संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं और कहां चूक हो रही है? आजकल दुनिया भर की सरकारें अपने पब्लिक सेक्टर में एआई को तेजी से अपना रही हैं. उदाहरण के लिए न्यूजीलैंड की सरकार ने एक नेशनल एआई स्ट्रेटजी तैयार की है. उन्होंने एक पब्लिक सर्विस एआई फ्रेमवर्क भी बनाया है।  यह फ्रेमवर्क सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बात तो करता है, लेकिन इसमें एनवायरमेंटल डिस्क्लोजर की कोई शर्त नहीं है. वहां कोई भी रेगुलेटर एआई की बिजली खपत या एमिशन का डेटा इकट्ठा नहीं कर रहा है. ऑस्ट्रेलिया का भी ऐसा ही हाल है।  ऑस्ट्रेलिया के नेशनल फिल्म एंड साउंड आर्काइव ने ‘बॉवरबर्ड’ नाम का एक टूल बनाया है. यह टूल ऑडियो और वीडियो को ट्रांसक्राइब करने का काम करता है. वहीं वहां का वेटरन्स अफेयर्स डिपार्टमेंट दावों के निपटारे को तेज करने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहा है।  ये दोनों देश एआई रेगुलेशन के मामले में बहुत हल्का रुख अपना … Read more