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अप्रैल में GST कलेक्शन 2.43 लाख करोड़ पर पहुंचा, अब तक का सबसे बड़ा उछाल

नई दिल्ली  ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमत में भारी इजाफा हुआ है। इससे भारत में आर्थिक गतिविधियों पर तत्काल कोई असर नहीं पड़ा है। देश में अप्रैल में जीएसटी कलेक्शन 2.42 लाख करोड़ रुपये के रेकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। नए वित्त वर्ष के पहले महीने जीएसटी कलेक्शन में भारी उछाल इस बात का संकेत है कि देश की इकॉनमी तेजी से आगे बढ़ रही है। अप्रैल में जीएसटी कलेक्शन में पिछले साल के मुकाबले 8.7 फीसदी की तेजी आई है। इससे पहले एक महीने में सबसे अधिक जीएसटी कलेक्शन का रेकॉर्ड पिछले साल अप्रैल में बना था। उस महीने यह 2.37 लाख करोड़ रहा था। इस बार नेट जीएसटी कलेक्शन 2.11 लाख करोड़ रुपये रहा जो पिछले साल की तुलना में 7.3 फीसदी अधिक है। अप्रैल में टोटल रिफंड भी 19.3 फीसदी बढ़कर 31,793 करोड़ रुपये रहा। इस तरह नेट जीएसटी रेवेन्यू 2,10,909 करोड़ रुपये रहा। इसमें इम्पोर्ट लिंक्ड रेवेन्यू की मजबूत भूमिका रही। रेकॉर्ड पर जीएसटी कलेक्शन     अप्रैल में GST कलेक्शन 2.42 लाख करोड़ के रेकॉर्ड स्तर पर पहुंचा     यह कलेक्शन पिछले साल अप्रैल की तुलना में 8.7 फीसदी अधिक है     पिछले साल अप्रैल में जीएसटी कलेक्शन ₹2.37 लाख करोड़ रहा था     नेट जीएसटी कलेक्शन भी 7.3% बढ़कर 2.11 लाख करोड़ रुपये रहा     महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु और यूपी सबसे आगे आयात से होने वाली कमाई में क्या रही खास बात? अप्रैल के जीएसटी कलेक्शन में एक खास बात आयात से जुड़ी जीएसटी रेवेन्यू के दबदबे का कायम रहना रहा। आयात पर आईजीएसटी कलेक्शन सालाना आधार पर लगभग 26% तो नेट कस्टम जीएसटी रेवेन्यू 42.9% की रफ्तार से बढ़ा, जो वैश्विक अस्थिरता के बावजूद कारोबार की मजबूती को दिखा रहा है। डेलाइट इंडिया के इनडायरेक्ट टैक्स पार्टनर एमएस मणि के मुताबिक इससे आयात में तेजी का पता चलता है, लेकिन उनका यह भी कहना है कि कस्टम कलेक्शंस के आंकड़े नहीं होने के चलते इस तेज उछाल के कारणों का सटीक पता लगाना मुश्किल है। घरेलू खपत स्थिर लेकिन ग्रोथ धीमी आयात ने ओवरऑस ग्रोथ को तगड़ा सपोर्ट मिला लेकिन घरेलू जीएसटी कलेक्शन इसकी तुलना में सुस्त रही। ग्रास डोमेस्टिक रेवेन्यू अप्रैल महीने में सालाना आधार पर 4.3% की रफ्तार से बढ़कर ₹1.85 लाख करोड़ पर पहुंचा जिससे सितंबर 2025 में जीएसटी दरों में कटौती के बाद भी खपत में स्थिर रुझान का संकेत मिला है। एमएस मणि का कहना है कि दरों में तेज कटौती के बावजूद घरेलू खपत पर जीएसटी कलेक्शन का बढ़ना खपत में अच्छी बढ़ोतरी का संकेत है। हालांकि एक अहम बात ये है कि यह ग्रोथ सभी राज्यों में एक जैसी नहीं रही। कुछ बड़ी मैन्युफैक्चरिंग और कंज्यूमिंग स्टेट्स में लो-सिंगल-डिजिट ग्रोथ रही जैसे कि गुजरात में 3% और महाराष्ट्र, कर्नाटक और हरियाणा में करीब 5% की ग्रोथ रही। ग्रास कलेक्शन में तेज उछाल लेकिन नेट रेवेन्यू की रफ्तार सुस्त मजबूत ग्रास के बावजूद नेट जीएसटी रेवेन्यू ग्रोथ सुस्त रही और यह सालाना आधार पर 7.3% बढ़कर ₹2.11 लाख करोड़ तक पहुंचा। इसकी मुख्य वजह रिफंड की अधिक स्पीड रही। अप्रैल में सालाना आधार पर टोटल रिफंड 19.3% की रफ्तार से बढ़ा तो घरेलू रिफंड 54% से अधिक बढ़ गया। टैक्स कनेक्ट एडवायजरी सर्विसेज एलएलपी के विवेक जालान का कहना है कि नेट डोमेस्टिक कलेक्शंस में कोई खास बदलाव नहीं हुआ, क्योंकि रिफंड में तेज बढ़ोतरी हुई। टॉप 5 राज्य अप्रैल में ग्रॉस इम्पोर्ट रेवेन्यू 25.8 फीसदी उछलकर 57,580 करोड़ रुपये पहुंच गया जबकि ग्रॉस डोमेस्टिक रेवेन्यू 4.3 फीसदी तेजी के साथ 1.85 लाख करोड़ रुपये रहा। कस्टम से नेट रेवेन्यू यानी आयात पर जीएसटी में 42.9 फीसदी तेजी आई जबकि नेट डोमेस्टिक रेवेन्यू में केवल 0.3 फीसदी तेजी रही। इससे साफ है कि अप्रैल में जीएसटी कलेक्शन में तेजी में एक्सटरनल ट्रेड की अहम भूमिका रही। जीएसटी कलेक्शन में टॉप पांच राज्यों में महाराष्ट्र (13,793 करोड़ रुपये), कर्नाटक (5,829 करोड़ रुपये), गुजरात (5,455 करोड़ रुपये), तमिलनाडु (4,724 करोड़ रुपये) और उत्तर प्रदेश (4,399 करोड़ रुपये) शामिल हैं। पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए, ग्रॉस जीएसटी कलेक्शन 8.3 प्रतिशत बढ़कर 22.27 लाख करोड़ रुपए हो गया। पिछले वित्त वर्ष (2025) में यह 20.55 लाख करोड़ रुपये था। नेट जीएसटी कलेक्शन 19.34 लाख करोड़ रुपये रहा जो वित्त वर्ष 2024-25 की तुलना में 7.1% अधिक है। यह वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद मजबूत आर्थिक गतिविधि का संकेत देता है।

डोनाल्ड ट्रंप का बयान: ईरान के मामले को युद्ध नहीं कहूंगा, फिर खुद की सराहना की

वाशिंगटन दुनियाभर में आठ युद्ध रुकवाने का दावा करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान मामले को युद्ध मानने से ही इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका के अभियान के बाद ईरान की नौसेना और थल सेना कमजोर हो गई है और अब वे समझौता करने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। ईरान की सैन्य क्षमता पर बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि उनकी ड्रोन फैक्ट्रियों को भारी नुकसान हुआ है। इसके अलावा ईरान की परमाणु क्षमता को भी धराशायी कर दिया गया है। बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाने का भी दावा किया था। उन्होंने कहा था कि टैरिफ का दबाव बनाकर उन्होंने युद्ध रुकवाया था। युद्ध रुकवाने के दावे करके वह कई बार नोबेल पुरस्कार की भी इच्छा जता चुके हैं। इस बार का शांति का नोबेल पुरस्कार उन्हें नहीं मिला तो वह काफी भड़के हुए थे। युद्ध को लेकर क्या कह रहे डोनाल्ड ट्रंप डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि जब तक ईरान परमाणु समझौते की शर्तें मानने को तैयार नहीं होता तब तक नाकेबंदी जारी रहेगी। ट्रंप ने कहा कि यदि ईरान परमाणु हथियार बनाना जारी रखता है, तो उसके साथ 'कभी कोई समझौता नहीं' होगा। दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल नागरिक उद्देश्यों के लिए है। अमेरिकी राष्ट्रपति और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम ईरान के ताजा प्रस्ताव पर चर्चा कर रही है, जिसमें ईरान ने पहले होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और नाकेबंदी हटाने का सुझाव दिया है, जबकि परमाणु वार्ता को स्थगित करने की बात कही है। नाकेबंदी जारी रखने के श्री ट्रंप के फैसले से वैश्विक तेल बेंचमार्क 'ब्रेंट क्रूड' की कीमतें गुरुवार को 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गईं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस रणनीति का बचाव करते हुए कहा कि नाकेबंदी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई से अधिक प्रभावी हो सकती है। उन्होंने ईरान से जल्द कार्रवाई करने का आग्रह किया और कहा कि अधिकारी जरूरत पड़ने पर महीनों तक नाकेबंदी जारी रखने के तरीके खोज रहे हैं। अमेरिकी नीति निर्माताओं का मानना है कि लंबे समय तक लगे प्रतिबंध अंततः ईरान को तेल उत्पादन रोकने के लिए मजबूर कर सकते हैं। यह संघर्ष अब दसवें सप्ताह में प्रवेश कर चुका है, जबकि इसके चार से छह सप्ताह में सुलझने की उम्मीद थी। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रतिबंधित रहने से वैश्विक आपूर्ति से प्रतिदिन लगभग दो करोड़ बैरल तेल कम हो रहा है। अमेरिका की इस लंबी नाकेबंदी की तैयारी से एशियाई अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं। क्षेत्र के कई देश ऊर्जा आपूर्ति के लिए इस जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं और कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, प्लास्टिक तथा उर्वरकों की आपूर्ति में कमी महसूस की जा रही है।

पाकिस्तान की हालत हुई दयनीय, सऊदी मदद भी नाकाम, ईरान युद्ध ने किया बर्बाद

करांची  अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से पाकिस्तान पर बड़ा असर दिखाई दे रहा है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कैबिनेट बैठक में खुद ये बात कही है और चेतावनी दी है कि महंगे होते तेल और क्षेत्रीय अस्थिरता ने देश की आर्थिक हालत पतली कर दी है. कैबिनेट बैठक में उन्होंने बताया कि युद्ध से पहले पाकिस्तान का साप्ताहिक तेल बिल करीब 300 मिलियन डॉलर था, जो अब बढ़कर 800 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. ऐसे में हालात पर नजर रखने के लिए सरकार ने एक टास्क फोर्स भी बनाई है. आपको बता दें कि पाकिस्तान इस वक्त महंगाई का सबसे ऊंचा स्तर देख रहा है और तेल-गैस के लिए यहां त्राहिमाम मचा हुआ है।  शहबाज शरीफ ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान की आर्थिक प्रगति को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.पाकिस्तान महंगाई की मार तो झेल ही रहा है, लेकिन शांति बनाने में भी वो सक्रिय है. शहबाज शरीफ ने बताया कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराई गई, जो 21 घंटे तक चली. इसके बाद दूसरे दौर की वार्ता हो ही नहीं पाई. फिलहाल संघर्ष विराम बना हुआ है और पाकिस्तान किसी भी तरह से वार्ता को फिर से शुरू करना चाहता है।  तेल के बढ़ते दाम ने रुलाया प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि इस समय कच्चे तेल की कीमतें फिर आसमान छू रही हैं, इसलिए नए दाम तय करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन सामूहिक प्रयासों से हालात पर काबू पाने की कोशिश जारी है. इस बीच उन्होंने पेट्रोलियम मंत्री के काम की सराहना करते हुए कहा कि उनकी ओर से उठाए गए कदमों के कारण पाकिस्तान में स्थिति अन्य देशों की तुलना में संतोषजनक है और कहीं भी लंबी कतारें नहीं हैं. हालांकि युद्ध से पहले और बाद की तुलना में 500 मिलियन डॉलर का उछाल आया है, जो अर्थव्यवस्था को की रीढ़ तोड़ रहा है. सरकार मितव्ययिता और बचत के जरिए हालात संभालने की कोशिश कर रही है, इसके लिए एक टास्क फोर्स भी बनाई गई है. सरकारी उपायों के चलते ईंधन की खपत में काफी कमी आई है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही थी, लेकिन युद्ध के कारण प्रगति को नुकसान पहुंचा है।  ईरान-अमेरिका युद्ध में पाकिस्तान कर रहा मध्यस्थता     पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और तेल संकट के बीच इस पहल को काफी अहम माना जा रहा है, हालांकि ये कुछ खास परिणाम नहीं दे पाई है।      पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू कराने की कोशिश की है. जानकारी के मुताबिक दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच लंबी बातचीत हुई, जिसमें युद्धविराम और तनाव कम करने के उपायों पर चर्चा की गई. फिलहाल एक अस्थायी संघर्ष विराम बना हुआ है, जिसे बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।      पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था से परेशान है और शांति चाहता है और दोनों देशों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने के लिए खूब उठापटक कर रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि ईरान के विदेश मंत्री के साथ संपर्क में रहकर आगे की रणनीति पर काम किया जा रहा है।   

UAE का OPEC से अलगााव, पश्चिमी एशिया की जियोपॉलिटिक्स में आया बड़ा बदलाव

नई दिल्ली फारस की खाड़ी की चमकती सतह पर सब कुछ हमेशा शांत दिखता है- ऊपर से. लेकिन उसी पानी के नीचे कई परतों में तनाव, शक और रणनीतिक करंट बहते रहते हैं. संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. बाहर से यह दुनिया का सबसे चमकदार बिजनेस हब लगता है, लेकिन इसके भीतर एक बड़ा फैसला पक रहा था- OPEC (तेल निर्यातक देशों का संगठन) से बाहर निकलने का।  पहली नजर में यह फैसला एक छोटे से विवाद जैसा लगता है कि, UAE पांच मिलियन बैरल रोज़ तेल बेचना चाहता था, जबकि उसे करीब साढ़े तीन मिलियन बैरल का कोटा दिया गया था. लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है, खत्म नहीं. यह डेढ़ मिलियन बैरल का झगड़ा नहीं, बल्कि दशकों पुरानी रीजनल लीडरशिप को चुनौती देने का एलान है. जिसमें बताया गया है कि यूएई महज कोई छोटा-सा खाड़ी देश नहीं, बल्कि ग्लोबल पावर सेंटर है।  UAE का फैसला, अमेरिकी चाहत भी! अबू धाबी में जब OPEC से बाहर होने का फैसला लिया जा रहा था, तब इसकी गूंज सिर्फ खाड़ी तक सीमित नहीं थी. वॉशिंगटन भी इसे ध्यान से देख रहा था. अमेरिका लंबे समय से OPEC को एक “कार्टेल” मानता रहा है. एक ऐसा समूह जो तेल की कीमतों को अपने हिसाब से नियंत्रित करता है और कई बार रूस जैसे देशों के साथ मिलकर ग्लोबल ऑयल मार्केट को प्रभावित करता है।  ऐसे में UAE का OPEC से बाहर निकलना अमेरिका के लिए एक रणनीतिक मौका है. इससे OPEC की सामूहिक ताकत कमजोर होगी, अरब-रूस की तेल साझेदारी में दरार आएगी और तेल को “पॉलिटिकल वेपन” की तरह इस्तेमाल करने की क्षमता घटेगी. इसलिए भले ही यह फैसला UAE का हो, लेकिन इसकी गूंज अमेरिकी विदेश नीति की जीत के तौर पर भी सुनाई देती है।  विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई के इस बड़े कदम के पीछे अमेरिका के साथ हुआ एक खास समझौता भी है, जिसे 'डॉलर-दिरहम स्वैप एग्रीमेंट' कहा जा रहा है. आसान शब्दों में कहें तो इस समझौते के तहत अमेरिका ने यूएई को जरूरत पड़ने पर सीधे और तुरंत अमेरिकी डॉलर मुहैया कराने की गारंटी दी है. जब ईरान के साथ युद्ध जैसे हालात बने, तो यूएई की मुद्रा 'दिरहम' पर खतरा मंडराने लगा था. ऐसे में अमेरिका के साथ हुए इस स्वैप डील ने यूएई की तिजोरी को एक सुरक्षा कवच दे दिया. अभी तक यूएई ओपेक के कड़े नियमों से बंधा था, जिसकी वजह से वह अपनी मर्जी से तेल उत्पादन नहीं बढ़ा पा रहा था. अमेरिका से मिली 'डॉलर की गारंटी' ने यूएई को यह भरोसा दिलाया कि अगर वह ओपेक से अलग होता है और तेल बाजार में कोई उतार-चढ़ाव आता है, तो भी उसकी अर्थव्यवस्था नहीं डगमगाएगी. यदि यूएई की करेंसी डॉलर के समकक्ष रहती है, तो इससे वहां बिजनेस करने वालों को भी भरोसा रहेगा. इसी भरोसे के दम पर यूएई ने ओपेक की बंदिशों को अलविदा कह दिया और अपनी स्वतंत्र आर्थिक राह चुन ली।  ’UAE एप’ का हैंग होना UAE को अगर आप सिर्फ एक देश समझते हैं, तो आप उसकी असली ताकत को मिस कर रहे हैं. यह एक “एप” है- एक ऐसा प्लेटफॉर्म, जहां दुनिया के कारोबार बिना ज्यादा सवालों के चलते हैं।  ईरान पर प्रतिबंध लगे, तो उसका व्यापार यहीं से घूमकर दुनिया तक पहुंचा. भारत और पाकिस्तान के बीच कई बिजनेस डील्स UAE के रास्ते पूरी होती रहीं. यहां तक कि प्रतिबंधित रूसी तेल भी “शैडो टैंकर” के जरिए यहीं से बाजार तक पहुंचा।  दुबई और अबू धाबी ने खुद को न्यूट्रल, स्थिर और सुरक्षित हब के रूप में स्थापित किया था. यही वजह थी कि यूरोप और अमेरिका की बड़ी कंपनियां यहां से ऑपरेट करती थीं. रियल एस्टेट बूम पर था, टूरिज्म चरम पर था और UAE एक “परफेक्ट बिजनेस मशीन” बन चुका था।  लेकिन फिर ईरान के साथ संघर्ष ने इस मशीन में झटका दे दिया. हमलों ने सिर्फ तेल ठिकानों को नहीं, बल्कि उस भरोसे को भी चोट पहुंचाई जिस पर UAE की पूरी ब्रांडिंग टिकी थी. अचानक कॉर्पोरेट्स ने अपने विकल्प तलाशने शुरू कर दिए-सिंगापुर, हांगकांग और कुछ मामलों में यूरोप वापसी।  जो UAE खुद को न्यूट्रल बताता था, वह अब अमेरिकी-इजरायली खेमे में दिखने लगा. और यहीं से उसकी सबसे बड़ी चुनौती शुरू हुई-“क्या वह अब भी उतना ही सुरक्षित और स्थिर है?” सऊदी विजन 2030 का पिछड़ना इस कहानी में एक और किरदार है- सऊदी अरब. कभी UAE का सबसे करीबी सहयोगी, अब उसका सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी।  सऊदी अरब का पूरा दांव उसके महत्वाकांक्षी ‘विजन 2030’ पर लगा है. इस प्रोजेक्ट को फंड करने के लिए उसे तेल की ऊंची कीमतें चाहिए. इसलिए वह उत्पादन कम रखकर कीमतें ऊपर बनाए रखने की रणनीति पर चलता है।  दूसरी ओर UAE का मॉडल अलग है. उसने अपनी इकोनॉमी को डायवर्सिफाई किया हुआ है. प्रोडक्शन कॉस्ट यहां बेहद कम है, और उसने 2030 तक 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन क्षमता हासिल करने के लिए 122 बिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश किया है. लेकिन OPEC के कोटे उसे 2.6 से 3.1 मिलियन बैरल के बीच सीमित रखते रहे।  अबू धाबी के लिए यह “अंडरग्राउंड पड़ा तेल” एक जोखिम है-क्योंकि 2040 तक फॉसिल फ्यूल की डिमांड घटने की आशंका है. यानी अगर अभी नहीं बेचा, तो बाद में शायद बेचना ही संभव न हो. यही सोच सऊदी और UAE के बीच की दूरी को टकराव में बदल देती है।  यमन, सोमालीलैंड में बिल्डअप तेल का विवाद तो सिर्फ एक हिस्सा है. असली दरार कई मोर्चों पर एक साथ बनी. यमन में UAE ने सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल का समर्थन किया-एक अलगाववादी गुट, जो सऊदी के सहयोगियों के खिलाफ खड़ा था. हालात इतने बिगड़े कि सऊदी अरब ने UAE समर्थित ठिकानों और सैन्य संसाधनों पर एयरस्ट्राइक तक कर दी, खासकर मुकल्ला पोर्ट के आसपास।  उधर सोमालीलैंड को लेकर भी तनाव बढ़ा. जब इजरायल ने उसे मान्यता दी, तो सऊदी को यह कदम अस्थिरता फैलाने वाला लगा-और उसे UAE की भूमिका पर भी शक हुआ।  इसके बाद दोनों देशों के बीच दो महीने तक सोशल मीडिया, कूटनीतिक चैनलों और वॉशिंगटन में लॉबिंग के जरिए आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला।  ईरान वॉर में सऊदी ‘मांडवाली’ फिर … Read more

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: सरकार को कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते

नईदिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने  हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कुछ बेहद अहम टिप्पणियां की हैं। SC ने कहा है कि कोर्ट सरकार को इस मामले में कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। उच्चतम न्यायालय ने इस दौरान देश भर में नफरती भाषण पर रोक लगाने के लिए कोई भी नई दिशा-निर्देश जारी करने से मना कर दिया। SC ने कहा कि अदालतें संसद या राज्य विधानसभाओं को नए कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकतीं। वे ज्यादा से ज्यादा सुधार की जरूरत की ओर ध्यान आकर्षित कर सकती हैं, लेकिन कानून बनाने का फैसला सरकार का ही होगा। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई चल रही थी। इनमें केंद्र सरकार को हेट स्पीच के लिए लागू मौजूदा कानून की जांच करने और इन्हें और ज्यादा असरदार बनाने का निर्देश देने की मांग वाली याचिकाएं भी थीं। याचिका खारिज करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा, "हालांकि अदालत कार्रवाई की जरूरत की ओर ध्यान दिला सकती है, लेकिन वह विधायिका को कानून बनाने का काम करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।” पीठ ने आगे इस बात पर जोर दिया कि कानून बनाना और उसे लागू करना पूरी तरह से लेजिस्लेचर के अधिकार क्षेत्र में आता है। बेंच ने कहा, “ज्यादा से ज्यादा, कोर्ट विधायिका का ध्यान बढ़ती हुई चिंता की ओर दिला सकती है और यह सिफारिश कर सकती है कि उचित उपायों पर विचार किया जाए। लेकिन सरकार इन टिप्पणियों पर कार्रवाई करती है या नहीं, और किस तरीके से करती है, यह पूरी तरह से उनके विवेक पर निर्भर करता है।” हेट स्पीच पर पहले से कानून कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि हेट स्पीच की समस्या से निपटने के लिए कोई कानून नहीं है या मौजूदा कानूनी ढांचे में ऐसे अपराधों से निपटने के लिए कोई सिस्टम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असली चिंता कानून का अभाव नहीं, बल्कि उसे लागू करने को लेकर है। पीठ ने कहा कि कई स्तरों पर कानन बनाए गए हैं। अगर पुलिस एफआईआर नहीं दर्ज करती है, तो पीड़ित व्यक्ति वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर सकता है और उसके बाद मजिस्ट्रेट के पास गुहार लगा सकता है। पीठ ने आगे कहा कि समस्या कानूनी प्रावधानों की कमी से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर उनके लागू न होने से पैदा होती है।

सुपर अल नीनो’ के कारण 140 साल का गर्मी का रिकॉर्ड टूटेगा! क्या होगा इस बार अलग?

नई दिल्ली गर्मियों का मौसम आते ही हम सभी चिलचिलाती धूप और पसीने से परेशान होने लगते हैं। लेकिन, इस बार की गर्मी कोई आम गर्मी नहीं होने वाली है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस बार 'सुपर अल नीनो' के कारण गर्मी अपने पिछले 140 सालों के सभी रिकॉर्ड तोड़ सकती है। वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है और दुनिया के कई हिस्सों में चरम मौसम की घटनाएं देखने को मिल सकती हैं। आखिर यह 'सुपर अल नीनो' कैसे असर करता है? यह इतना खतरनाक क्यों माना जा रहा है? और भारत सहित पूरी दुनिया पर इसका क्या असर पड़ने वाला है? आइए समझते हैं। अल नीनो (El Niño) क्या है?     स्पेनिश भाषा में 'अल नीनो' का मतलब 'छोटा लड़का' होता है, लेकिन मौसम विज्ञान में इसका असर बहुत विशाल है।     यह प्रशांत महासागर से जुड़ी एक मौसमी घटना है।     सामान्य परिस्थितियों में, समुद्र की सतह का गर्म पानी एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ बहता है।     लेकिन, अल नीनो के दौरान यह चक्र उलटा या कमजोर पड़ जाता है। भूमध्य रेखा के पास प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है और यह गर्म पानी दक्षिण अमेरिका की तरफ बहने लगता है।     समुद्र के इस बढ़ते तापमान का असर पूरी दुनिया के मौसम चक्र (हवाओं, बारिश और तापमान) पर पड़ता है। फिर यह 'सुपर अल नीनो' क्या है? जब प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से थोड़ा बढ़ता है, तो उसे 'अल नीनो' कहते हैं। लेकिन जब यह तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे भी ज्यादा बढ़ जाता है, तो यह घटना बेहद उग्र हो जाती है। इसे ही वैज्ञानिकों ने 'सुपर अल नीनो' का नाम दिया है। मुख्य कारण: जब ग्लोबल वार्मिंग (ग्रीनहाउस गैसों के कारण लगातार बढ़ती पृथ्वी की गर्मी) और अल नीनो दोनों आपस में मिल जाते हैं, तो यह एक 'डबल अटैक' बन जाता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक 140 साल से भी ज्यादा समय के बाद ऐसी भयंकर गर्मी की भविष्यवाणी कर रहे हैं। यह स्थिति बेहद दुर्लभ होती है- 1950 के बाद केवल कुछ बार ही ऐसा हुआ है। जैसे 1982-83, 1997-98 और 2015-16 में भी कुछ असर देखने को मिला था। इस बार वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नीनो 3.4 क्षेत्र में तापमान वृद्धि 2°C से ज्यादा पहुंच सकती है। न्यूयॉर्क के एट अल्बानी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पॉल राउंडी का कहना है कि 'पिछले 140 साल में सबसे मजबूत एल नीनो बनने की वास्तविक संभावना है।' 140 साल पुराना खतरा? तापमान जितना ज्यादा बढ़ता है, अल नीनो के असर के और भी ज्यादा तेज होने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। अल्बानी में स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क में वायुमंडलीय और पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. पॉल राउंडी ने लिखा कि '140 सालों में सबसे मजबूत अल नीनो घटना होने की वास्तविक संभावना है।' मियामी विश्वविद्यालय के एसोसिएट वैज्ञानिक डॉ. एंडी हेजल्टन ने लिखा कि सभी मॉडल और अवलोकन एक ही दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं: इस साल एक बहुत मजबूत अल नीनो आएगा, जिसका वैश्विक जलवायु पर काफी असर पड़ेगा। इस बार ऐसा क्या होने वाला है? सुपर अल नीनो का असर सिर्फ गर्मी तक सीमित नहीं है; यह एक चेन रिएक्शन की तरह काम करता है। इसके मुख्य प्रभाव इस प्रकार होंगे- रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और भीषण लू ग्लोबल वार्मिंग पहले से ही धरती को गर्म कर रही है। 'सुपर अल नीनो' इस आग में घी का काम करेगा। भारत के कई हिस्सों, खासकर उत्तर और मध्य भारत में, दिन का तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर जा सकता है। भीषण लू (हीटवेव) का दौर लंबा और ज्यादा जानलेवा हो सकता है। मॉनसून पर ब्रेक- सूखे का खतरा भारत की पूरी कृषि व्यवस्था मॉनसून पर निर्भर है। अल नीनो का भारतीय मानसून से सीधा और उल्टा रिश्ता है।     जब भी अल नीनो मजबूत होता है, भारत में मॉनसून कमजोर पड़ जाता है।     इस साल बारिश कम होने और कई राज्यों में सूखे जैसे हालात पैदा होने की गहरी आशंका है। खेती और महंगाई पर सीधा असर बारिश कम होने और भयंकर गर्मी पड़ने से:     धान और गन्ने जैसी फसलों की पैदावार गिर सकती है।     खाद्य पदार्थों की कमी के कारण महंगाई आसमान छू सकती है।     पीने के पानी का संकट गहरा सकता है क्योंकि नदियां और डैम सूखने लगेंगे। दुनिया भर में चरम मौसम अल नीनो सिर्फ भारत को नहीं रुलाएगा। इसके कारण:     दक्षिण अमेरिका में भारी बारिश और विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।     ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में भयंकर सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ने की आशंका है। क्यों इस बार ‘सुपर’ एल नीनो की बात हो रही है? अप्रैल 2026 तक स्थिति ENSO-neutral यानी न तो एल नीनो, न ला नीना वाली है, लेकिन प्रशांत महासागर के नीचे के पानी में गर्मी तेजी से बढ़ रही है। यूरोपीय मॉडल NOAA, ECMWF और अन्य संस्थानों के पूर्वानुमान बताते हैं कि मई-जुलाई 2026 से एल नीनो उभर सकता है और सर्दियों (2026-27) तक मजबूत रहेगा। कुछ मॉडल बहुत मजबूत या सुपर स्तर का संकेत दे रहे हैं। 2024 पहले ही रिकॉर्ड गर्म साल था। मजबूत एल नीनो के साथ 2026 या 2027 नए रिकॉर्ड बना सकते हैं। कुछ अनुमान कहते हैं कि तापमान अस्थायी रूप से 1.5°C या उससे भी ज्यादा (कुछ मामलों में 2°C तक) पूर्व-औद्योगिक स्तर से ऊपर जा सकता है।

1 मई से देश में लागू होंगे 5 बड़े बदलाव, LPG से लेकर Credit Card तक के नियम बदलेंगे!

नई दिल्ली  शुक्रवार 1 मई से नए महीने की शुरुआत हो रही है. नई तारीख के साथ ही देश में तमाम नए फायनेंशियल बदलाव (New Rule Changes From 1st May 2026) भी लागू होते हैं. ये बदलाव आमजन के जीवन और जेब दोनों पर असर डालते हैं. जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक जो 5 नए नियम लागू हो रहे हैं, उनमें एलपीजी सिलेंडर के दाम, क्रेडिट कार्ड से जुड़े नियम भी शामिल हैं. आइये नए नियमों पर डालते हैं एक नजर।  पहला नियम: एलपीजी सिलेंडर के नए रेट होंगे लागू सरकारी तेल कंपनियां हर महीने की पहली तारीख को गैस सिलेंडर के दाम अपडेट करती हैं. इस बार भी 1 मई को ऑयल कंपनियां गैस सिलेंडर के रेट्स में संशोधन करेंगी. अगर दाम बदलते हैं तो उसका साफ असर घर की रसोई से लेकर रेस्टोरेंट-होटलों तक दिखाई देगा. बता दें, इस महीने घरेलू और कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम में वृद्धि की गई थी. जानकारी मिली है कि सरकार अब OTP बेस्ड एलपीजी सिलेंडर की डिलीवरी का फैसला ले सकती है।  दूसरा नियम: क्रेडिट कार्ड से संबंधित देश का सबसे बड़े भारतीय स्टेट बैंक ने क्रेडिट कार्ड से जुड़े नियमों में कुछ बदलाव करने जा रहा है. नए नियम शुक्रवार 1 मई से लागू हैं. बैंक की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार बैंक ने लेट पेमेंट चार्ज से लेकर सालाना फीस में बदलाव किया है. शुक्रवार 1 मई से बैंक 100 रुपये से ज्यादा और 500 रुपये तके की बकाए राशि को पर लेट पेमेंट चार्ज को 100 रुपये करने जा रहा है. वहीं, 500 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक की बकाए राशि पर यह चार्ज करीब 500 रुपये हो जाएगा. इसके साथ-साथ कुछ कार्डों पर 499 रुपये की सालाना फीस, जो अभी तक 50 हजार रुपये है, उसे 1 लाख रुपये के सालाना खर्च पर वापस किया जाएगा।  तीसरा नियम: CNG-PNG के दामों में भी बदलाव एलपीजी सिलेंडर के दाम सीएनजी-पीएनजी के दामों में संशोधन किया जाता है. तेल कंपनियां महीने की पहली तारीख को नए रेट्स जारी करती हैं. इस महीने की शुरुआत में इनके दाम दोगुने कर दिए गए थे, लेकिन बाद में इन्हें वापस लेना पड़ा. अगर दाम बढ़ते हैं तो वाहन स्वामियों की जेब को झटका लग सकता है।  चौथा नियम: बैंकों की छुट्टियां भारतीय रिजर्व बैंक की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक आने वाले नए महीने मई में बंपर हॉलिडे हैं. दूसरे और चौथे शनिवार के साथ-साथ हर रविवार को साप्ताहिक अवकाश रहता है. इनके अलावा 1 मई शुक्रवार को लेबर-डे/ महाराष्ट्र दिवस, बकरीद की छुट्टियां रहेंगी. हालांकि अलग-अलग राज्यों में ये छुट्टियां अलग-अलग हो सकती हैं. अगर बैंक किसी काम से जाना है को पहले वेबसाइट पर एक नजर जरूर डाल लें, वैसे, सभी बैंकों की ऑनलाइन सेवाएं 24 घंटों चालू रहती हैं।  पांचवा नियम: ऑनलाइन गेम से संबंधित बदलाव मई महीने की पहली तारीख से ऑनलाइन गेम से जुड़े नियम भी बदल जाएंगे. सरकार Online Gaming Rules 2026 को लागू करने जा रही है. इन नए नियमों के तहत ऑनलाइन गेमिंग अथॉरिटी ऑफ इंडिया का गठन किया जाएगा. जानकारी के मुताबिक ऑनलाइन गेम्स को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा, इनमें Online Money Games, Online Social Games और E-Sports शामिल हैं. इनके लिए रजिस्ट्रेशन कराना होगा. जो गेम खेलेगा उसके लेनदेन पर सख्ती से नजर रखी जाएगी।  ATM से कैश निकालना अब महंगा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ATM इंटरचेंज फीस बढ़ाने की मंजूरी दे दी है. अब फ्री ट्रांजैक्शन लिमिट खत्म होने के बाद हर बार कैश निकालने पर 23 रुपये देने होंगे, जो पहले 21 रुपये था. फ्री लिमिट की बात करें तो-      अपने बैंक के ATM पर हर महीने 5 फ्री ट्रांजैक्शन मिलते हैं.     दूसरे बैंक के ATM पर मेट्रो शहरों में 3 और नॉन-मेट्रो में 5 फ्री ट्रांजैक्शन मिलते हैं।  इसके बाद हर ट्रांजैक्शन पर चार्ज देना होगा. SBI Credit Card के नए नियम SBI Card से जुड़े ग्राहकों के लिए भी 1 मई से नए नियम लागू होंगे. लेट पेमेंट चार्ज में बदलाव किया गया है।      100 से 500 रुपये तक के बकाया पर 100 रुपये चार्ज लगेगा.     500 से 1000 रुपये तक के बकाया पर 500 रुपये शुल्क देना होगा. इसके अलावा BPCL SBI Credit Card की एनुअल फीस से जुड़ा नियम भी बदला है. अब 1 लाख रुपये सालाना खर्च करने पर फीस रिवर्स होगी, जो पहले 50,000 रुपये पर मिलती थी।  ऑनलाइन गेमिंग के नियम हुए सख्त सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग सेक्टर के लिए नए नियम लागू किए हैं. इसके तहत एक नई संस्था बनाई जाएगी, जो इस सेक्टर की निगरानी करेगी. अब गेम्स को तीन हिस्सों में बांटा गया है- मनी गेम्स, सोशल गेम्स और ई-स्पोर्ट्स. खासकर पैसे से जुड़े गेम्स के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी होगा और यूजर्स के लेनदेन पर नजर रखी जाएगी। 

EVM में गड़बड़ी के आरोपों से सियासत गरम, चुनाव आयोग ने शुरू की पड़ताल

कोलकाता बंगाल में दूसरे चरण के मतदान दौरान डायमंड हार्बर समेत कई केंद्रों पर ईवीएम की सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों के बीच चुनाव आयोग अब एक्शन मोड में आ गया है। चुनाव प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने के लिए आयोग ने 'हाई-लेवल' जांच शुरू कर दी है। विशेष रूप से डायमंड हार्बर निर्वाचन क्षेत्र की स्थिति पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं, जहां स्पेशल रोल आब्जर्वर सुब्रत गुप्ता स्वयं स्ट्रांग रूम का मुआयना किया। स्ट्रांग रूम में 'स्पेशल स्क्रूटनी' डायमंड हार्बर विमेंस कालेज स्थित स्ट्रांग रूम, जहां ईवीएम मशीनों को कड़ी सुरक्षा में रखा गया है, वहां सुब्रत गुप्ता की मौजूदगी ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। जानकारी के अनुसार, वे मशीनों की सीलिंग, सुरक्षा मानकों और संरक्षण पद्धति की गहन जांच कर रहे हैं। आयोग का स्पष्ट निर्देश है कि इस जमीनी जांच की रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय किया जाएगा कि क्षेत्र में पुनर्मतदान की आवश्यकता है या नहीं। 77 शिकायतों ने बढ़ाई आयोग की सख्ती केवल डायमंड हार्बर ही नहीं, बल्कि दूसरे चरण के मतदान के दौरान राज्य के विभिन्न हिस्सों से ईवीएम से छेड़छाड़ और गड़बड़ी की कुल 77 गंभीर शिकायतें दर्ज की गई हैं। इन शिकायतों पर कड़ा रुख अपनाते हुए चुनाव आयोग ने वेबकास्ट फुटेज और संबंधित बूथ अधिकारियों की रिपोर्ट खंगालना शुरू कर दिया है। बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल ने इस मामले पर स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि आयोग "जीरो टालरेंस" की नीति पर काम कर रहा है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जहां भी ईवीएम के साथ छेड़छाड़ या तकनीकी धांधली की पुष्टि होगी, वहां बिना किसी देरी के पुनर्मतदान कराया जाएगा। राजनीतिक आरोप और प्रशासनिक सक्रियता मतदान के बाद से ही भाजपा ने ईवीएम के बटन पर टेप लगाने समेत कई गंभीर आरोप लगाए हैं। विपक्ष का दावा है कि दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर क्षेत्र में कई बूथों पर पारदर्शिता के साथ समझौता किया गया। इन आरोपों के बीच, एक विशेष पर्यवेक्षक को भेजने का निर्णय चुनाव आयोग की सक्रियता और निष्पक्षता के प्रमाण के रूप में देखा जा रहा है। प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा आम है कि सुब्रत गुप्ता की रिपोर्ट ही अब इस चुनावी भविष्य का फैसला करेगी। जब तक स्क्रूटनी की यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती और रिपोर्ट जमा नहीं होती, तब तक आयोग किसी भी अंतिम निर्णय पर मुहर नहीं लगाएगा। फिलहाल, पूरी सतर्कता के साथ साक्ष्यों की जांच जारी है।  

अमेरिका ने भारत को दी 657 प्राचीन मूर्तियां, इनकी कुल कीमत 120 करोड़ रुपये से अधिक

 नई दिल्ली अमेरिका ने करीब 120 करोड़ रुपये से भी ज्यादा कीमत की 657 दुर्लभ और प्राचीन कलाकृतियां भारत को लौटाई है. ये सभी आर्टफेक्ट इंटरनेशल तस्कर गिरोह कई सालों तक स्मगल कर अमेरिका ले गए थे. अमेरिका के मैनहट्टन जिला अटॉर्नी कार्यालय ने तस्करी की जांच के बाद इन कलाकृतियों को भारत को वापस करने की घोषणा की थी।   लगभग 14 मिलियन डॉलर मूल्य की 657 चोरी की कलाकृतियां भारत को लौटा दी गई हैं. इन मूर्तियों की वापसी इंटरनेशनल स्मगलिंग नेटवर्क से जुड़ी एक बड़ी सांस्कृतिक चोरी का खुलासा करती है. मैनहट्टन के जिला अटॉर्नी एल्विन एल ब्रैग जूनियर ने न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास की काउंसल राजलक्ष्मी कदम की मौजूदगी में आयोजित एक समारोह में इस वापसी की घोषणा की।  अमेरिकी अधिकारियों ने  तस्कर सुभाष कपूर और नैन्सी वीनर से जुड़े आपराधिक गिरोहों की चल रही जांच के दौरान इन कलाकृतियों को बरामद किया था. अधिकारियों ने भारत को निशाना बनाकर की जा रही सांस्कृतिक चोरी की भयावहता का खुलासा करते हुए बताया कि इस एक ही अभियान में 600 से अधिक प्राचीन और दुर्लभ आर्टफैक्ट वापस की गईं।  एक बड़े इंटरनेशनल स्मगलिंग नेटवर्क का खुलासा जिला अटॉर्नी ब्रैग ने कहा कि भारत में सांस्कृतिक धरोहरों को निशाना बनाने वाले तस्करी नेटवर्क बहुत बड़ा है. आज 600 से अधिक कलाकृतियों की वापसी से यह साफ हो गया है. वहीं काउंसल जनरल  बिनय प्रधान ने कहा कि मैं मैनहट्टन जिला अटॉर्नी कार्यालय, अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के निरंतर सहयोग की प्रशंसा करता हूं।  लौटाई गई कलाकृतियों में अवलोकितेश्वर की एक कांस्य प्रतिमा भी शामिल है, जिसकी कीमत 20 लाख डॉलर है.यह प्रतिमा मूल रूप से रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में रखी थी. इसे 1982 में चोरी करके अमेरिका ले जाया गया था. इसे 2025 में न्यूयॉर्क के एक निजी संग्रह से जब्त किया गया था।  भारत में इन मूर्तियों की हुई थी चोरी एक अन्य महत्वपूर्ण बरामदगी में 75 लाख डॉलर मूल्य की लाल बलुआ पत्थर की बुद्ध प्रतिमा शामिल है. तस्कर सुभाष कपूर के नेटवर्क के माध्यम से क्षतिग्रस्त प्रतिमा को न्यूयॉर्क ले गए थे, जहां अधिकारियों ने बाद में इसे एक स्टोर से जब्त कर लिया।  अधिकारियों ने मध्य प्रदेश के एक मंदिर से 2000 में लूटी गई नृत्य करते गणेश की बलुआ पत्थर की प्रतिमा भी लौटा दी. तस्करों ने फर्जी प्रमाण पत्रों के माध्यम से इस प्रतिमा को बेच दिया था और 2012 में क्रिस्टीज न्यूयॉर्क में इसकी नीलामी की गई थी. बाद में इस साल की शुरुआत में एक निजी संग्राहक ने इस कलाकृति को वापस कर दिया था।  एक दशक से अधिक समय से, पुरातत्व तस्करी इकाई (एटीयू), गृह सुरक्षा जांच विभाग के साथ मिलकर, कपूर और उसके सहयोगियों पर दक्षिण और दक्षिणपूर्व एशिया में कलाकृतियों की कथित लूट और तस्करी के आरोप में कार्रवाई कर रही है. अधिकारियों ने 2012 में कपूर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया और 2019 में उस पर और सात सहयोगियों पर आरोप लगाया गया था।  महावाणिज्यदूत ने कहा कि चोरी की गई कलाकृतियों को भारत वापस लाने के लिए अभी और काम करना बाकी है. अमेरिका की ओर से भारत को वापस की गई इन कलाकृतियों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट किया है। 

CJI सूर्यकांत का गहरा दर्द, 15 साल की बच्ची के संघर्ष पर भावुक होकर कहा- ‘नागरिकों का सम्मान करिए’

15 साल की बच्ची ने झेला असहनीय दर्द, CJI सूर्यकांत हुए भावुक, बोले- 'मैडम, नागरिकों का सम्मान करिए' CJI सूर्यकांत का गहरा दर्द, 15 साल की बच्ची के संघर्ष पर भावुक होकर कहा- 'नागरिकों का सम्मान करिए' 15 साल की बच्ची ने कितना दर्द झेला', CJI सूर्यकांत ने किया भावुक बयान, 'मैडम, नागरिकों का सम्मान जरूरी है' नईदिल्ली   नाबालिग के गर्भपात मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई है. नाबालिग के गर्भपात मामले में में एम्स दोबारा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और अपील पर विचार करने की गुहार लगाई थी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी गुरुवार को कहा कि 15 साल की रेप पीड़िता की प्रेग्नेंसी खत्म करने का फैसला पीड़िता और उसके माता-पिता का होना चाहिए, जिसमें मेडिकल एक्सपर्ट उन्हें सही फैसला लेने में मदद करें. सीजेआई सूर्यकांत ने बच्ची की पीड़ा को समझते हुए साफ-साफ कहा कि अनचाही प्रेग्नेंसी नहीं थोपी जा सकती है. उन्होंने सरकारी वकील से कहा कि जरा सोचिए इस बच्ची ने कितनी पीड़ा झेली होगी।  मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एम्स (AIIMS) जैसी संस्थाएं परिवार को गाइड कर सकती हैं, ताकि वे सोच-समझकर फैसला ले सकें. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी पीड़िता पर अनचाही प्रेग्नेंसी थोपी नहीं जा सकती और इसमें होने वाले इमोशनल और फिजिकल ट्रॉमा को भी हाईलाइट किया. दरअसल, सरकार ने एक 15 साल की बच्ची की 31 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को खत्म करने के पहले के आदेश के खिलाफ एक क्यूरेटिव याचिका दायर की थी. उस बच्ची के साथ रेप हुआ था. महिलाओं के अपने शरीर पर अधिकार की लड़ाई में एक अहम मोड़ साबित हो सकने वाले इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांग की कि वह व्यक्तिगत पसंद का सम्मान करे।  ‘अनचाही प्रेग्नेंसी थोपी नहीं जा सकती’ सीजेआई यानी चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि किसी नाबालिग को रेप से हुई प्रेग्नेंसी जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके पहले से सहे जा रहे दुख को और बढ़ा देगा और उसके मन पर ज़िंदगी भर के लिए गहरे ज़ख्म छोड़ सकता है. सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने कहा, ‘यह 15 साल की बच्ची की अनचाही प्रेग्नेंसी है… किसी भी इंसान पर अनचाही प्रेग्नेंसी थोपी नहीं जा सकती. जरा सोचिए, वह अभी बच्ची है. उसे अभी पढ़ाई करनी चाहिए. लेकिन हम उसे मां बनाना चाहते हैं. जरा सोचिए, इस पूरी घटना में उस बच्ची ने कितना दर्द झेला होगा और कितनी बेइज्जती सही होगी।  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर प्रेग्नेंसी खत्म करने से मां को कोई परमानेंट डिसेबिलिटी नहीं होती है, तो इस पर विचार किया जा सकता है. सीजेआई की बेंच ने फिर दोहराया कि आखिरी फैसला पीड़िता और उसके माता-पिता का ही होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS को निर्देश दिया कि वह परिवार की काउंसलिंग करे, ताकि वे सोच-समझकर कोई फैसला ले सकें।  कोर्ट ने कानूनी सुधार की जरूरत बताई सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि क्या मौजूदा कानूनों में बदलाव किया जाना चाहिए ताकि रेप पीड़िता के मामलों में प्रेग्नेंसी खत्म करने की मौजूदा 20 हफ्ते की समय सीमा को बढ़ाया जा सके।  ‘कानून को समय के साथ बदलना चाहिए’ अधिक लचीले कानूनी ढांचे की जरूरत पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कोई सख्त समय सीमा नहीं होनी चाहिए. कोर्ट ने कहा, ‘जब रेप की वजह से प्रेग्नेंसी होती है, तो कोई समय सीमा नहीं होनी चाहिए. कानून को लचीला होना चाहिए और बदलते समय के साथ तालमेल बिठाना चाहिए।  AIIMS ने मेडिकल चिंताएं जताईं AIIMS की तरफ से पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि इस स्टेज पर प्रेग्नेंसी खत्म करना शायद मेडिकल तौर पर मुमकिन न हो. उन्होंने बताया कि प्रेग्नेंसी 30 हफ़्ते तक पहुंच चुकी है और भ्रूण पूरी तरह से विकसित हो चुका है. उन्होंने यह भी कहा कि नाबालिग मां को गंभीर शारीरिक विकृतियों और लंबे समय तक चलने वाली स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा हो सकता है. उन्होंने गोद लेने (Adoption) के विकल्प का भी सुझाव दिया।  सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा इस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि अंतिम फैसला पीड़ित और उसके माता-पिता का ही होगा, जिसमें मेडिकल विशेषज्ञ उनकी मदद करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल के अपने एक पिछले आदेश का भी जिक्र किया, जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने 30 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी को खत्म करने की इजाज़त दी थी।  चलिए जानते हैं सुप्रीम कोर्ट में इस पर क्या हुआ, किसने क्या कहा?     सीजेआई यानी चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने आज यानी गुरुवार सुबह एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को फटकार लगाते हुए कहा, ‘रेप के बाद उस बच्ची (पीड़िता) ने जो तकलीफ झेली है, उसकी भरपाई कोई भी चीज नहीं कर सकती।      उन्होंने सरकार की वकील से कहा, ‘नागरिकों का सम्मान करें, मैडम. आपके पास (कोर्ट के प्रेग्नेंसी खत्म करने के आदेश को) चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है… केवल पीड़िता या उसका परिवार ही इसे चुनौती दे सकता है।      जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा, ‘हम व्यक्तिगत पसंद का सम्मान करते हैं, और आपको भी करना चाहिए…’     सुप्रीम कोर्ट ने यह फटकार तब लगाई जब सरकारी वकील भाटी ने दलील दी कि इस स्टेज पर प्रेग्नेंसी खत्म करना मुमकिन नहीं है. उन्होंने कहा कि बच्ची के पास अब केवल एक ही विकल्प बचा है. बच्चे को जन्म देना और उसे गोद देने के लिए सौंप देना।      इससे पहले भाटी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था, बहुत दुख के साथ हमें यह क्यूरेटिव याचिका पेश करनी पड़ रही है. यह AIIMS की रिपोर्ट पर आधारित है. प्रेग्नेंसी खत्म करना मुमकिन नहीं है. पैदा होने वाला बच्चा गंभीर शारीरिक विकृतियों के साथ जीवित होगा… और नाबालिग माँ को ज़िंदगी भर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।