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महिलाओं के लिए गृह आधार योजना, हर महीने 1500 रुपये की सहायता, पात्रता की पूरी जानकारी

नई दिल्ली केंद्र सरकार देश के अलग अलग वर्गों के लिए कई योजनाएं चलाती है. जिनका मकसद आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक मजबूती देना है. इन योजनाओं का फायदा किसानों, मजदूरों, बुजुर्गों और महिलाओं तक पहुंचता है. खास तौर पर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर अब ज्यादा फोकस किया जा रहा है. इसी दिशा में कुछ राज्य सरकारें भी अपनी स्तर पर पहल कर रही हैं.  सरकार की गृह आधार योजना ऐसी ही एक पहल है. जिसका मकसद घर की महिलाओं को नियमित आर्थिक सहयोग देना है. अब सरकार ने साफ कर दिया है कि पात्र महिलाओं को हर महीने की 10 तारीख को 1500 रुपये सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर किए जाएंगे. जानें किन महिलाओं को मिलता है इस स्कीम में लाभ. हर महीने 10 तारीख को मिलेंगे पैसे सरकार की ओर से महिलाओं के लिए गृह आधार योजना चलाई जा रही है. इस योजना के तहत गोवा की बड़ी संख्या में महिलाएं हर महीने 1500 रुपये की आर्थिक  सहायता हासिल कर रही हैं. साल 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर की ओर से यह योजना शुरू की गई थी. पहले कुछ मामलों में भुगतान में देरी की शिकायतें सामने आई थीं. इसके बाद महिला और बाल विकास विभाग ने विशेष कैंप आयोजित कर समस्याएं सुनीं और दस्तावेजों की जांच की.  मुख्यमंत्री  ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि किसी भी पात्र महिला का पेमेंट पेंडिंग न रहे. इसलिए सरकार ने अब तय किया गया है कि हर महीने की 10 तारीख को राशि सीधे खाते में भेजी जाएगी. यह रकम दवा, बच्चों की पढ़ाई और घर के रोजमर्रा खर्च में काफी सहारा देती है.किन महिलाओं को मिलता है लाभ? योजना में इन महिलाओं को मिलता है लाभ इस योजना का फायदा वही महिलाएं उठा सकती हैं जो तय पात्रता शर्तों को पूरा करती हों. सबसे पहली शर्त उम्र से जुड़ी है. आवेदन करने वाली महिला की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए और वह विवाहित हो. इसके साथ ही उसका गोवा में स्थायी रूप से रहना जरूरी है. नियम के मुताबिक महिला पिछले 15 वर्षों से गोवा में रह रही होनी चाहिए. इसके लिए आर्थिक मानदंड भी तय किए गए है. महिला और उसके पति की मिलाकर इनकम 300000 रुपये से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. सरकार का मकसद उन परिवारों तक सीधी मदद पहुंचाना है. जिन्हें वास्तव में आर्थिक सहारे की जरूरत है. पात्रता पूरी होने पर ही योजना का लाभ दिया जाता है.

1 अप्रैल से लॉन्च होगा E20 पेट्रोल, सरकार का कदम ईंधन में स्वच्छ विकल्प की ओर

 नई दिल्ली केंद्र सरकार ने पेट्रोल को लेकर एक अहम फैसला लिया है, जिसका सीधा असर आम लोगों और ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ेगा. केंद्र सरकार ने तेल बेचने वाली कंपनियों को साफ निर्देश दिया है कि 1 अप्रैल 2026 से देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एथेनॉल ब्लेंडेड (E20)  पेट्रोल बेचा जाए. इस पेट्रोल में अधिकतम 20 प्रतिशत इथेनॉल होगा और इसका न्यूनतम रिसर्च ऑक्टेन नंबर यानी RON 95 होना जरूरी होगा.  यह आदेश केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से जारी किया गया है. 17 फरवरी को जारी नोटिफिकेशन में मंत्रालय ने कहा है कि तेल कंपनियां वही पेट्रोल सप्लाई करें जो E20 मानकों पर खरा उतरता हो. यह पेट्रोल ब्यूरो ऑफ इंडिया स्टैंडर्ड (BIS) के तय मानकों के अनुसार होना चाहिए और पूरे देश में एक समान क्वॉलिटी के साथ उपलब्ध कराया जाना होगा. हालांकि कुछ खास हालात में सीमित समय के लिए कुछ इलाकों को छूट दी जा सकती है. क्या है E20 फ्यूल E20 फ्यूल एक ऐसा पेट्रोल मिश्रण है जिसमें 20 फीसदी एथेनॉल और 80 फीसदी पारंपरिक पेट्रोल होता है. इथेनॉल एक बायो-फ्यूल है जो मुख्य रूप से गन्ने, मक्का या अन्य फसलों से बनाया जाता है, और इसे फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता घटाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. सरकार का उद्देश्य E20 को बढ़ावा देकर प्रदूषण कम करना और किसानों को फसल से अतिरिक्त आमदनी देना है. भारत ने जून 2022 में ही 10 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य तय समय से पहले हासिल कर लिया था, जिसके बाद सरकार ने 20 प्रतिशत का लक्ष्य 2025-26 तक तय किया. RON 95 क्यों है अहम रिसर्च ऑक्टेन नंबर यानी RON यह बताता है कि पेट्रोल इंजन में नॉकिंग के अगेंस्ट कितना मजबूत है. नॉकिंग से इंजन को नुकसान और पावर लॉस हो सकता है. ज्यादा RON वाला पेट्रोल प्रेशन में भी स्टेबल रहता है. इथेनॉल का ऑक्टेन रेटिंग करीब 108 होता है, इसलिए जब इसे पेट्रोल में मिलाया जाता है तो फ्यूल क्वॉलिटी और गुणवत्ता बेहतर हो जाती है. RON 95 का नियम यह तय करेगा कि इंजन सेफ रहे और बेहतर परफॉर्मेंस दे. तेल मंत्रालय के अनुसार इथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से 2014-15 से अब तक भारत को 1.40 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है. कच्चे तेल के आयात में कमी आई है.  नया नियम लागू होने के बाद यह फायदा और बढ़ने की उम्मीद है. साथ ही प्रदूषण घटेगा और सस्टेनेबल मोबिलिटी की दिशा में भारत एक और मजबूत कदम आगे बढ़ाएगा. वाहनों पर क्या पड़ेगा असर ऑटो इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि 2023 के बाद के बने ज्यादातर वाहन E20 पेट्रोल के लिए तैयार हैं. इन गाड़ियों में किसी बड़े बदलाव की जरूरत नहीं पड़ेगी. हालांकि पुराने वाहनों के कुछ यूजर्स का कहना है कि E20 पेट्रोल से माइलेज में 3 से 7 प्रतिशत तक की कमी आई है. इसके अलावा कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर E20 फ्यूल के इस्तेमाल के बाद वाहनों में समय से पहले पार्ट्स डैमेज होने की भी शिकायत की है. जिससे व्हीकल मेंटनेंस बढ़ा है. पुराने वाहनों के इंजन और फ्यूल सिस्टम इस हाई इथेनॉल ब्लेंडिंग के लिए डिज़ाइन नहीं किए गए है, जिसके कारण कई बार माइलेज घटने और स्टार्टिंग को लेकर  दिक्कतें सामने आती रही हैं. इस बीच कुछ वाहन निर्माताओं ने पुराने वाहनों के लिए E20 कन्वर्जन किट को बाजार में उतारा है. ताकि एथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल से वाहन के इंजन कंपोनेंट को होने वाले संभावित नुकसान को कम किया जा सके. कंपनियों का दावा है कि, ये कन्वर्जन किट न केवल वाहनों के परफॉर्मेंस को बेहतर बनाएगा बल्कि माइलेज को भी कम होने से रोकेगा. रॉयल एनफील्ड ने हाल ही में बुलेट, क्लासिक और थंडरबर्ड जैसी पुरानी BS3 और BS4 मॉडल्स के लिए ये किट लॉन्च किया है. 

PM मोदी का इज़राइल दौरा: Future Tech का जायजा, AI से लेकर हेल्थ तक भारत की नई दिशा

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों इजराइल के दौरे पर हैं. यरुशलम में उन्होंने एक टेक्नोलॉजी प्रदर्शनी का दौरा किया. इस प्रदर्शनी में इजराइल की कई स्टार्टअप और टेक कंपनियों ने अपने नए प्रोडक्ट और रिसर्च दिखाए. यहां AI, हेल्थ-टेक, साइबर सिक्योरिटी, क्वांटम कंप्यूटिंग, एग्री-टेक और वॉटर मैनेजमेंट से जुड़ी टेक्नोलॉजी रखी गई थी. मोदी ने अलग-अलग स्टॉल पर जाकर डेमो देखे और कंपनियों के फाउंडर्स से बातचीत की. इजराइल लंबे समय से टेक और स्टार्टअप के लिए जाना जाता है. साइबर सिक्योरिटी और डिफेंस टेक में इजराइल की कंपनियों की पकड़ मानी जाती है. भारत पहले से इन सेक्टर में इजराइल के साथ काम कर रहा है. ऐसे में इस तरह की प्रदर्शनी में जाना एक संकेत है कि भारत नई टेक्नोलॉजी को समझना और अपनाना चाहता है. खासकर AI और हेल्थ-टेक जैसे सेक्टर भारत के लिए आने वाले सालों में अहम होने वाले हैं. पीएम मोदी ने वहां मौजूद कंपनियों से कहा कि वे भारत में अपने सॉल्यूशन लाने पर विचार करें. भारत में डिजिटल हेल्थ, स्मार्ट एग्रीकल्चर और साइबर सिक्योरिटी की जरूरत तेजी से बढ़ रही है. गांवों में हेल्थ सर्विस पहुंचाने के लिए AI टूल्स और रिमोट मॉनिटरिंग जैसे समाधान काम आ सकते हैं. खेती में डेटा और सेंसर्स के जरिए पानी और खाद का सही इस्तेमाल भी एक बड़ा मुद्दा है. प्रदर्शनी में दिखाए गए कई प्रोडक्ट इन समस्याओं से जुड़े थे. हालांकि इस दौरे के दौरान अब तक AI और साइबर सिक्योरिटी से जुड़ा कोई बड़ा करार या डील सामने नहीं आई है. अभी तक सिर्फ बातचीत और संभावनाओं की बात हुई है. सरकारी बयान में भी किसी MoU या एग्रीमेंट का जिक्र नहीं है. इसका मतलब यह है कि फिलहाल यह एक शुरुआती कदम है. असली टेस्ट तब होगा जब इन कंपनियों के साथ भारत में पायलट प्रोजेक्ट शुरू होंगे या कोई ठोस पार्टनरशिप सामने आएगी. पहले भी कई टेक डेमो दिखाए गए हैं, लेकिन वे जमीन पर उतरने में वक्त लेते हैं या कभी-कभी फाइलों में ही अटक जाते हैं. गौरतलब है कि भारत और इजराइल के रिश्ते बीते कुछ सालों में मजबूत हुए हैं. डिफेंस और टेक्नोलॉजी में दोनों देशों का सहयोग बढ़ा है. सोशल मीडिया पर पीएम मोदी की पोस्ट से यह साफ है कि वे इस दौरे को इनोवेशन और युवाओं से जोड़कर दिखा रहे हैं. उन्होंने इजराइल के युवाओं के काम की तारीफ की और कहा कि इस तरह की टेक्नोलॉजी भविष्य की जरूरतों से जुड़ी है. लेकिन जमीन पर सवाल यह है कि क्या भारत इन टेक्नोलॉजी को अपने सिस्टम में तेजी से अपना पाएगा. भारत में रेगुलेशन, लोकल मैन्युफैक्चरिंग और डेटा पॉलिसी जैसे मुद्दे अक्सर किसी विदेशी टेक को अपनाने में देरी करते हैं. कुल मिलाकर यह दौरा एक संकेत देता है कि भारत टेक्नोलॉजी के मोर्चे पर इजराइल जैसे देशों से सीखना चाहता है. अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे तुरंत कोई बड़ा बदलाव आएगा. फिलहाल यह एक शोकेस विजिट है. असली कहानी तब बनेगी जब इन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल भारत के अस्पतालों, खेतों और डिजिटल सिस्टम में दिखने लगेगा. तभी यह दौरा केवल तस्वीरों और बयानों से आगे बढ़कर असली असर दिखा पाएगा.

Tejas vs F-35: ऑपरेशन सिंदूर में तेजस की शक्ति, PL-15 मिसाइल का क्षण भर में निष्क्रिय होना

नई दिल्ली बीते साल ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान को एक से बढ़कर एक गहरे जख्म दिए थे. लेकिन, 72 घंटे तक चली इस जंग में भारत को भी काफी कुछ सीखने को मिला था. भारत को अपनी कमी को परखने का मौका मिला था. इस जंग में पाकिस्तान ने जिस तरह से भारत के खिलाफ चीनी हथियारों का इस्तेमाल किया, उससे चिंता बढ़नी लाजिमी है. उसने चीनी हथियारों से भारत के सैन्य ठिकानों पर हमले की कोशिश की. हालांकि भारत के बेहद मजबूत सुरक्षा घेरे ने इन तमाम हथियारों को आसमान में ही तबाह कर दिया था. इस जंग से भारत ने बड़ी सीख ली. सबसे बड़ी सीख यह थी कि भविष्य में पाकिस्तान और चीन को अलग-अलग कर नहीं देखा जाना चाहिए. इस वक्त पाकिस्तान चीन का पूरी तरह पिछलग्गू देश बन चुका है. चीन के लिए भी पाकिस्तान एक बड़ा बाजार बनकर उभरा है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारतीय इलाके पर चीनी बीवीआर मिसाइलें पीएल-15 का इस्तेमाल किया था. भारतीय क्षेत्र में इस मिसाइल के मलबे मिले थे. पीएल-15 बेहद आधुनिक बीवीआर मिसाइलें हैं, जिनकी रेंज करीब 250 किमी है. इन मिसाइलों को फाइटर जेट्स से दागा जाता है और ये नजर आने से पहले ही लक्ष्य को भेद देती है. सैन्य एक्सपर्ट मानते हैं कि पाकिस्तान ने चीनी के 4.5 जेन के फाइटर जेट जे-17 से इनको फायर किया होगा. भारत की बीवीआर मिसाइलें खैर, अब इस बात को नहीं विराम देते हैं. दरअसल, आज की कहानी इसी पीएल-15 मिसाइलों से जुड़ी हैं. भारत के पास पीएल-15 के मुकाबले के लिए देसी अस्त्र मार्क-1 मिसाइलें हैं. ये बीवीआर श्रेणी की शानदार मिसाइलें हैं लेकिन, मौजूदा वक्त में इनकी रेंज थोड़ी कम है. अस्त्र मार्क-1 की रेंज करीब 160 किमी है. इसके साथ ही डीआरडीओ इसको एईएसए रडार और डूअल पल्स मोटर टेक्नोलॉजी से लैस कर रहा है. साथ ही भारत अस्त्र मार्क-2 पर भी काम कर रहा है. इसके अलावा अस्त्र मार्क-3 पर भी काम चल रहा है. लेकिन, पीएम-15 के मुकाबले अभी भी ये तकनीकी रूप से थोड़ा पीछे हैं. भारत फ्रांस से खरीदे गए राफेल विमानों में मेटियोर मिसाइलों का इस्तेमाल करता है. ये भी बीवीआर मिसाइलें हैं. इनमें रैमजेट इंजल लगे होते हैं, जिससे ये मिसाइले बेहद हाईस्पीड से वार करती हैं. बावजूद इसके चीन के पीएल-15 और उसके भविष्य के और एडवांस वैरिएंट को तकनीकी रूप से थोड़ी बढ़त हासिल है. ऐसे में भारत अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्त रूस के साथ भी आर-37एम बीवीआर मिसाइलों को लेकर बातचीत कर रहा है. ये मिसाइलें 300 किमी तक मार कर सकती हैं. ये वार-टेस्टेड मिसाइलें हैं और ये हर एक मामले में चीनी पीएल-15 और उसके एडवांस वर्जन पीएल-17 को टक्कर देने में सक्षम हैं. तेजस भारत द्वारा निर्मित एक बेहद हल्का 4.5 जेन फाइटर जेट है. इजरायली स्काई स्टिंग मिसाइलें लेकिन, इतना सब होने के बावजूद भारत किसी एक पर निर्भर नहीं रहना चाहता. भारत के पास अपना देसी बीवीआर अस्त्र सीरीज की मिसाइलें हैं. उसके पास राफेल के लिए मेटियोर मिसाइलें है. रूसी आर-37एम को लेकर बातचीत चल रही है. लेकिन, वह एक और सिस्टम की तलाश में है जो और भी एडवांस हो. यह तलाश इजरायली बीवीआर मिसाइल के साथ पूरी होती है. इजरायल के ये बीवीआर मिसाइलें एआई इनेबल्ड हैं. यह 6th जेन की मिसाइलें हैं. यानी दुनिया में अभी इसके टक्कर की बीवीआर मिसाइलें नहीं हैं. ये बेहद हल्क और लंबी दूरी तक वार करने में सक्षम हैं. भारत इन मिसाइलों को अपने देसी हल्के तेजस फाइटर जेट्स में लगाना चाहता है. इसका नाम स्काई स्टिंग है. इसको इजरायल की सरकारी कंपनी राफेल एडवांस डिफेंस सिस्टम्स (Rafael Advanced Defense Systems) डेवलप कर रही है. अगर यह यह डील हो जाती है तो भारत के हल्के तेजस विमान भी बेहद घातक बन जाएंगे. राफेल एडवांस सिस्टम ने इस स्काई स्टिंग को कुछ इस तरह से डिजाइन किया है जिससे कि वह किसी भी पश्चिमी फाइटर जेट्स के साथ आसानी से लिंक किया जा सके. इसमें अमेरिका की सबसे एडवांस फिफ्थ जेन फाइटर जेट एफ-35 भी शामिल है. हालांकि एफ-35 में इस मिसाइल को इंटीग्रेट करने के लिए जेट की निर्माता कंपनी लॉकहीड मार्टिन से अनुमति लेनी होगी. फिलहाल के लिए इसको भारतीय फाइटर जेट तेजस और सुखोई के साथ इंटीग्रेट करने की बाचतीच चल रही है.

नितिन नवीन की पहली हाजिरी RSS की हाई-लेवल मीटिंग में, भाजपा नेतृत्व में होने वाले बदलाव पर चर्चा

नई दिल्ली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था 'अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा' की महत्वपूर्ण बैठक अगले महीने हरियाणा के समालखा में आयोजित होने जा रही है। इस बैठक में भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन पहली बार शिरकत करेंगे। संघ के शताब्दी वर्ष और आगामी राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए इस तीन दिवसीय समागम को बेहद अहम माना जा रहा है। जनवरी 2026 में भाजपा की कमान संभालने के बाद नितिन नवीन का यह पहला आधिकारिक संघ दौरा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बैठक से पहले भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में कुछ बड़े फेरबदल हो सकते हैं। माना जा रहा है कि समालखा बैठक में भाजपा के प्रतिनिधि मंडल में कई नए चेहरे देखने को मिल सकते हैं। यह बदलाव आगामी चुनावों और संगठन को नई ऊर्जा देने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, समालखा बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु संघ के शताब्दी वर्ष (1925-2025) से संबंधित कार्यक्रमों की समीक्षा करना है। देश भर में चलाए गए विभिन्न अभियानों, गृह-संपर्क और शताब्दी निमित्त आयोजनों से प्राप्त अनुभवों को यहां साझा किया जाएगा। संघ नेतृत्व यह देखेगा कि शताब्दी वर्ष के लक्ष्यों को किस हद तक हासिल किया गया है और आम जनमानस के बीच संघ की पहुंच कितनी बढ़ी है। प्रतिनिधि सभा की इस बैठक में वर्ष 2025-26 के दौरान किए गए कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाएगा। इसके साथ ही, आगामी वर्ष के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्ययोजनाओं पर भी विस्तार से चर्चा होगी। बैठक के दौरान सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रस्ताव पारित होने की उम्मीद है। मंथन में शामिल होंगे दिग्गज इस बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले सहित संघ के सभी शीर्ष पदाधिकारी मौजूद रहेंगे। साथ ही, भाजपा सहित संघ से प्रेरित विभिन्न 32 संगठनों के प्रमुख पदाधिकारी भी इस विचार-मंथन का हिस्सा बनेंगे।

सत्ता की जंग के बीच संतुलन का सवाल: नई नेपाली सरकार भारत-चीन में किसे चुनेगी?

नेपाल नेपाल में बीते साल भ्रष्टाचार विरोधी जेन Z प्रदर्शनों और के पी शर्मा ओली की सरकार गिरने के करीब छह महीने बाद अगले सप्ताह आम चुनाव होने हैं। सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने 5 मार्च को मतदान की घोषणा की थी, जिसके बाद देश में नई सरकार चुनी जाएगी। इस चुनाव पर भारत भी नजरें रख रहा है। भारत में यह सवाल भी उठ रहे हैं कि नेपाल की नई चुनी हुई सरकार भारत और चीन के बीच तालमेल बैठा पाएगी। और अगर इसका जवाब ना है तो नई सरकार चीन और भारत में से किसे ज्यादा तवज्जो देगी? इस सवाल को लेकर जानकारों ने अपने मत रखे हैं। जानकारों का मानना है कि नेपाल में चाहे किसी की भी सरकार बने, वह भारत और चीन के बीच नेपाल की संतुलित नीति को ज्यादा नहीं बदलेगी। इससे पहले नेपाल में मतदान की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी है। चुनाव से पहले एक तरफ जहां युवा उम्मीदवार अर्थव्यवस्था में सुधार और पुरानी राजनीतिक जमात को हटाने का वादा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अनुभवी नेता स्थिरता और सुरक्षा की बात कर रहे हैं। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि चुनाव में किस पार्टी को बहुमत मिल सकता है। जारी रह सकती है गठबंधन की राजनीति नेपाली पत्रकार सुधीर शर्मा के मुताबिक किसी एक पार्टी के लिए पूर्ण बहुमत हासिल करना बहुत मुश्किल होगा, इसलिए गठबंधन की राजनीति जारी रह सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल के भारत और चीन से रिश्ते इस बात पर निर्भर करेंगे कि गठबंधन कैसा होगा और उसमें कौन प्रमुख भूमिका में रहेगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि रिश्तों की बुनियाद नहीं बदलेगी, सिर्फ कुछ तरीके बदल सकते हैं। दोनों देशों से कैसे समीकरण? रणनीतिक मायनों में देखा जाए तो भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। यह नेपाल के कुल आयात में 63 प्रतिशत यानी 8.6 अरब डॉलर की हिस्सेदारी रखता है। वहीं चीन 13 प्रतिशत यानी 1.8 अरब डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर है। इसके अलावा भारत लंबे समय से बहुसंख्यक हिंदू नेपाल को पारंपरिक सहयोगी मानता है और दोनों देशों के बीच खुली सीमा है। नेपाल दोनों देशों से बुनियादी ढांचे के जरिए भी जुड़ा है। कई जलविद्युत परियोजनाओं के जरिए बिजली भारत को जाती है, जबकि चीन तिब्बत के रास्ते बेल्ट एंड रोड पहल के तहत सड़क, रेलवे और हवाईअड्डों में निवेश कर रहा है। संतुलन बनाने की कोशिश रहेगी जारी दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन के मुताबिक नेपाल की नेतृत्व व्यवस्था आमतौर पर भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है, भले ही कभी-कभी किसी एक की ओर झुकाव दिखे। उनका मानना है कि अगर युवा नेता सत्ता में आते हैं, तब भी भारत और चीन के साथ नीति में बड़ा अंतर नहीं आएगा। हालांकि उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपना सकती है और बड़े प्रोजेक्ट्स में अपारदर्शी फंडिंग को चुनौती दे सकती है। उनके अनुसार, युवा नेपालियों को ना तो चीन से खास दुश्मनी है और ना ही वे चाहते हैं कि कोई भी देश अपारदर्शी तरीके से नेपाल की राजनीति को प्रभावित करे।

शिक्षा मंत्री बोले—न्यायपालिका सर्वोपरि, NCERT मामले में जिम्मेदारों पर गिरेगी गाज

नई दिल्ली शिक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि सरकार ज्यूडिशियरी का पूरा सम्मान करती है और उसका इंस्टीट्यूशन का अपमान करने का कोई इरादा नहीं है। यह टिप्पणी उस दिन आई जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज्यूडिशियरी को बदनाम करने के लिए एक सुनियोजित साजिश लगती है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गुरुवार को NCERT के क्लास 8 की किताब में ज्यूडिशियल करप्शन पर एक चैप्टर लाने पर दुख जताया। साथ ही अकाउंटेबिलिटी तय करने और विवादित हिस्से को ड्राफ्ट करने में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ ऐक्शन लेने का भरोसा दिलाया। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ज्यूडिशियरी का पूरा सम्मान करती है और उसका इंस्टीट्यूशन का अपमान करने का कोई इरादा नहीं है। यह टिप्पणी उस दिन आई जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज्यूडिशियरी को बदनाम करने के लिए एक सुनियोजित साजिश लगती है और क्लास 8 की NCERT किताब पर पूरी तरह बैन लगा दिया और आदेश दिया कि सभी कॉपियां, फिजिकल और डिजिटल, जब्त कर ली जाएं।  

बढ़ते तनाव में ईरान का बड़ा कदम, बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च कर दिखाई ताकत, रेंज जानकर चौंकेंगे

वाशिंगटन अमेरिका से बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने एक नई बैलिस्टिक मिसाइल लांच की है। यह सतह से सतह पर मार करने वाली चौथी पीढ़ी की मिसाइल है। इस नई मिसाइल का नाम खैबर है और इसकी रेंज 2000 किमी है। ईरान ने इसे एक बेहद सीक्रेट जगह पर लांच किया है। बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध का खतरा लगातार बना हुआ है। गुरुवार को दोनों देशों के बीच तीसरे दौर की परमाणु वार्ता हो रही है। बता दें कि अमेरिका लगातार ईरान के खिलाफ युद्ध की तैयारी में जुटा हुआ है। वह लगातार ईरान की समुद्री सीमा पर अपना युद्ध बेड़ा मजबूत करने में जुटा है। इस बीच स्विट्जरलैंड के जेनेवा में ओमान की मध्यस्थता के तहत ईरान और अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष परमाणु वार्ता का तीसरा दौर गुरुवार को शुरू हो गया। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य जमावड़े के कारण दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है।  

न्यूक्लियर ब्लैकमेल पर भारत का सख्त रुख, सेना का बड़ा संदेश

नई दिल्ली वेस्टर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार ने गुरुवार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि भारत अब पाकिस्तान के न्यूक्लियर झांसे से नहीं डरेगा और कहा कि भारत का जवाब पिछली बार से ज्यादा सख्त और मजबूत होगा। पठानकोट में एक खास सम्मान समारोह में बोलते हुए, जनरल ने साफ किया कि भारतीय सेना का टैक्टिकल माइंडसेट जवाबी हमलों से बदलकर जमीन पर निर्णायक जीत हासिल करने की तरफ हो गया है। उन्होंने कहा, "ऑपरेशन सिंदूर में, हमने उनके (पाकिस्तान के) सभी टेररिस्ट बेस पर हमला किया… उसके बाद, उन्होंने जवाबी कार्रवाई की, और जवाब में, हमने उनके मिलिट्री बेस और एयर बेस तबाह कर दिए। फिर उन्होंने सीजफायर की मांग की, और सिर्फ हमसे ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों से भी, भारत के साथ सीजफायर की मांग की। वे हमसे नहीं लड़ सकते… जवाब ऑपरेशन सिंदूर में हमने जो किया है, उससे भी ज्यादा मजबूत होगा, लेकिन हमें पूरा यकीन है कि हमें पिछली बार से भी ज्यादा सख्त जवाब देना होगा।" 'खतरा अभी टला नहीं है…' उन्होंने आगे कहा, "यह ऑपरेशनल डेमोंस्ट्रेशन सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर में हमारी जीत का जश्न नहीं है, यह तैयारी का एक प्रदर्शन है। खतरा अभी टला नहीं है, और इस बार दुश्मन को पहले से भी ज्यादा जोरदार झटका लगेगा।" बॉर्डर पार से न्यूक्लियर हमले की बार-बार आने वाली धमकियों पर बात करते हुए, लेफ्टिनेंट जनरल कटियार ने उन्हें कमजोरी से पैदा हुआ धोखा बताया। 'शरीफ हमें सख्त ऐक्शन लेने से रोकना चाहते हैं' जनरल ने मजबूती से कहा, "वह (शहबाज शरीफ) हमें कोई भी सख्त ऐक्शन लेने से रोकना चाहते हैं… यह एक तरह का धोखा है जो वह कर रहे हैं, जिसका हमें जवाब देना होगा। हम उनके न्यूक्लियर धोखे से नहीं डरेंगे।" जनरल ने चेतावनी दी कि जहां भारत शांति चाहता है, वहीं पाकिस्तान में मिलिट्री लीडरशिप अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए लड़ाई-झगड़े में लगी रहती है। उन्होंने आगाह किया कि खतरा अभी टला नहीं है और अगला झटका पहले से ज्यादा मुश्किल होगा।  

यूनुस विवाद ने पकड़ा तूल, बांग्लादेश में राष्ट्रपति और जमात आमने-सामने

ढाका बांग्लादेश में तारिक रहमान के सत्ता में आने के बाद यूनुस प्रशासन पर लगातार निशाना साधा जा रहा है। यूनुस सरकार के मंत्रियों की संपत्ति, स्वयं यूनुस की संपत्ति में हुई बढ्ढोत्तरी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे थे। इसी बीच राष्ट्रपति शहाबुद्दीन की तरफ से उठाए गए सवालों ने यूनुस के लिए मामले को और भी ज्यादा बिगाड़ दिया है। हालांकि, अब यूनुस के समर्थन में जमात-ए-इस्लामी आ गई है। राष्ट्रपति द्वारा यूनुस के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बयान देने के बाद जमात ने राष्ट्रपति शहाबुद्दीन पर तीखा हमला बोला है। फेसबुक पर लिखे एक पोस्ट में जमात प्रमुख और वर्तमान नेता प्रतिपक्ष शफीकुर रहमान ने राष्ट्रपति पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर उनके साथ इतना ही गलत हो रहा था, तो वह बताएं कि आखिर उन्होंने शेख हसीना के सत्ता छोड़ने वाले दिन को लेकर सच्चाई क्यों छिपाई। जमात प्रमुख रहमान ने राष्ट्रपति पर हमला बोलते हुए लिखा, "राष्ट्रपति ने 5 अगस्त 2024 से संबंधित कई बातें दबा दीं। उन्होंने अपने वर्तमान बयान में यह स्वीकार नहीं किया कि गिरी हुई और फरार प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बारे में उन्होंने उस दिन उपस्थित नेताओं से क्या कहा था और बाद में राष्ट्र से क्या कहा। उस दिन उन्होंने वह कुछ नहीं कहा जो अब कह रहे हैं।” दरअसल, रहमान यहां पर हसीना के इस्तीफे को लेकर शहाबुद्दीन पर निशाना साध रहे थे। राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने 5 अगस्त को हसीना के जाने के बाद देश के नाम दिए अपने संबोधन में कहा था कि उन्होंने हसीना का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है, लेकिन दो महीने बाद उन्होंने कहा कि केवल सुना है कि इस्तीफा दिया गया है, लेकिन इसका मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है। यूनुस प्रशासन पर क्या कहा था राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने? तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रपति और आंतरिम सरकार के प्रमुख रह चुके यूनुस के बीच में खींचतान साफतौर पर नजर आई। शहाबुद्दीन ने यूनुस के ऊपर कई बड़े आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि यूनुस के द्वारा बांग्लादेश और अमेरिका के बीच में एक गोपनीय समझौता किया गया था। उन्होंने कहा, "अमेरिका के साथ किए गए ऐसे किसी भी समझौते की जानकारी मुझे दी जानी चाहिए थी, लेकिन यूनुस ने ऐसा नहीं किया।" राष्ट्रपति ने बीएनपी का धन्यवाद करते हुए कहा कि प्रदर्शनों के दौरान वह केवल इसलिए राष्ट्रपति बने रह सके क्योंकि बीएनपी के वरिष्ठ नेताओं और सशस्त्र बलों ने उन्हें अपना समर्थन दिया था। उन्होंने कहा, "बीएनपी के एक वरिष्ठ नेता ने मुझे समर्थन का आश्वासन दिया था। उन्होंने कहा था कि हम संवैधानिक निरंतरता बनाए रखना चाहते हैं। हम किसी भी असंवैधानिक तरीके से राष्ट्रपति को हटाने के पक्ष में नहीं है।" यूनुस पर हमले को लेकर जमात प्रमुख क्यों बोले? बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से जाने के बाद यूनुस प्रशसान ने ही जमात ए इस्लामी और उसके छात्र संगठन छात्र शिविर पर से बैन हटाया था। ऐसा माना जाता रहा है, कि हसीना को सत्ता से उखाड़ फेंकने में इन्हीं दोनों का सबसे बड़ा योगदान है। कई रिपोर्ट्स में ऐसा दावा किया गया कि इन इस्लामिक संगठनों और अंतरिम प्रशासन के बीच पहले से ही एक समझ बन चुकी थी। इसलिए यूनुस प्रशासन ने भी इनका ज्यादा विरोध नहीं किया। अब जबकि यूनुस जा चुके हैं, तो राजनीति की जिम्मेदारी जमात के ऊपर है। यूनुस के ऊपर किसी सवाल का जवाब जमात ही देता नजर आता है।