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राशन कार्ड धारकों को बड़ा फायदा: सरकार ने स्कीम में किए अहम सुधार, करोड़ों परिवारों को राहत

 नई दिल्‍ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में अहम फैसला हुआ है. कैबिनेट के इस फैसले से राशन लेने वाले 80 करोड़ लोगों पर सीधा असर पड़ेगा.  सरकार ने राशन व्यवस्था (PDS- पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम) को लेकर एक बहुत बड़ा फैसला किया.  इसके लिए 'सार्थक-पीडीएस' (SARTHAK-PDS) योजना शुरू की गई है.  इस पूरी योजना पर करीब 25,530 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। प्रधानमंत्री गरीब कल्‍याण योजना के तहत सरकार हर महीने 80 करोड़ लोगों को राशन दे रही है. अब इस स्‍कीम को सही से चलाने के लिए कैबिनेट ने SARTHAK PDS योजना जारी रखने की मंजूरी दी है और इसके तहत कुछ बड़े सुधार किए हैं, जिसका लाभ गरीब परिवारों को मिलेगा. इन सुधारों से राज्‍यों को सपोर्ट देने से लेकर राशन की चोरी रोकने जैसी चीजें शामिल हैं। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्‍णव ने बताया कि इस योजना का मकसद देश की पब्लिक डिस्‍ट्रीब्‍यूशन सिस्‍टम (PDS) यानी राशन व्यवस्था को ज्यादा मजबूत, आधुनिक और पारदर्शी बनाना है. इसके लिए केंद्र सरकार ने ₹25,530 करोड़ का केंद्रीय आवंटन मंजूर किया है. इस स्‍कीम के तहत तीन खास बदलाव करने की बात कही गई है। योजना के तहत तीन खास बदलाव राज्‍यों की राशन ढुलाई में मदद करना: केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कैबिनेट में बड़ा फैसला लेते हुए कहा गया है कि राज्‍यों की आर्थिक मदद की जाएगी. सरकार राज्‍यों की एजेंसियों को खाद्यान को एक राज्‍य के भीतर गोदामों से दुकानों तक पहुंचाने के लिए आर्थिक सहायता देगी. इससे ट्रांसपोर्ट कॉस्‍ट कम होगी और गरीबों तक राश समय पर पहुंच सकेगा. दूरदराज के इलाकों में इसका सबसे ज्‍यादा लाभ होगा। फेयर प्राइस शॉप: इसका मतलब है कि सरकार राशन की दुकानों को भी सपोर्ट देगी. अश्विनी वैष्‍णव ने कहा कि लंबे समय से इसकी मांग की जा रही थी, जो काफी कम थी और अब राशन डीलरों को डिजिटल उपकरण, बेहतर स्‍टोरेज और संचालन के लिए सहायता मिलेगी. इससे दुकानों की वर्क सिस्‍टम मजबूत होगा और राशन डिस्‍ट्रीब्‍यूशन में गड़बड़ी कम होगी. राशन दुकानदारों को आर्थिक राहत भी मिल सकती है। तीसरा बड़ा बदलाव: कैबिनेट में तीसरा सुधार पब्लिक डिस्‍ट्रीब्‍यूशन सिस्‍टम (PDS) का मॉर्डनाइजेशन है. सरकार राशन की व्‍यवस्‍था को मॉर्डनाइज करने जा रही है और इसे टेक्‍नोलॉजी बेस्‍ड बनाने जा रही है. इसमें ऑटोमेशन, डिजिटल ट्रैकिंग, ऑनलाइन मॉनिटरिंग, स्‍मार्ट डिवाइस और ट्रांसपैरेंसी टूल शामिल है. इससे चोरी, ब्‍लैकमार्केटिंग कम होगी और जरूरतमंदों तक इसका सीधा लाभ मिलेगा। बता दें सरकार का उद्देश्य वन नेशन-वन राशन कार्ड जैसी व्यवस्थाओं को भी ज्यादा प्रभावी बनाना है, ताकि देशभर में राशन वितरण अधिक सीमलेस और ट्रांसपैरेंसी हो सके. इसका करोड़ों लाभार्थियों को लाभ मिलेगा। 

Middle East में नया तनाव, ट्रंप की मांग पर अमेरिका और सऊदी आमने-सामने

वाशिंगटन अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अब एक नई जंग पर्दे के पीछे शुरू होती दिख रही है. इस बार मामला सीधे वॉशिंगटन और उसके सबसे पुराने अरब सहयोगी सऊदी अरब के बीच का है. वजह बनी है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वह नई रणनीति, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ संभावित शांति समझौते को अब्राहम अकॉर्ड्स से जोड़ दिया। 25 मई को ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए एक बड़ा संदेश दिया. उन्होंने कहा कि ईरान के साथ किसी भी शांति समझौते का हिस्सा बनने के लिए मुस्लिम देशों को एक साथ अब्राहम अकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर करने होंगे. ट्रंप ने खास तौर पर सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान का नाम लेते हुए इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने की बात कही। लेकिन ट्रंप की यह अपील खाड़ी देशों, खासकर सऊदी अरब को बिल्कुल पसंद नहीं आई. कुछ ही घंटों बाद रियाद की तरफ से संकेत दिया गया कि सऊदी का पुराना रुख नहीं बदला है. सऊदी अधिकारियों ने साफ कहा कि जब तक फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन के लिए "स्पष्ट रास्ता" तय नहीं होता, तब तक इजरायल के साथ सामान्य संबंध संभव नहीं हैं। कई अरब देशों ने इजरायल संग स्थापित किए रिश्ते इस प्रतिक्रिया ने साफ कर दिया कि गाजा युद्ध के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति पहले जैसी नहीं रही. 2020 में जब अब्राहम अकॉर्ड्स हुए थे, तब कई अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे. बाद के दौर में सऊदी अरब ने भी इजरायल के साथ संबंध स्थापित करने की कोशिश की। हालांकि, इस बीच गाजा से हमास ने इजरायल पर हमला कर दिया और फिर एक बड़ी जंग शुरू हो गई. यही वजह रही कि सऊदी-इजरायल के बीच रिश्ते स्थापित नहीं हो पाए, लेकिन मौजूदा हालात में सऊदी अरब किसी जल्दबाजी में कदम उठाने के मूड में नहीं दिख रहा। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर सऊदी की नाराजगी यह विवाद सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है. इसके पीछे होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ता तनाव भी बड़ा कारण है. मई की शुरुआत में ट्रंप प्रशासन ने "प्रोजेक्ट फ्रीडम" नाम से एक सैन्य मिशन शुरू करने की कोशिश की थी. इसका मकसद होर्मुज स्ट्रेट में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था, क्योंकि ईरान वहां अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है। लेकिन अमेरिकी प्रशासन की सबसे बड़ी गलती यह रही कि उसने इस ऑपरेशन की घोषणा खाड़ी सहयोगियों से पूरी सहमति लिए बिना कर दी. इससे सऊदी नेतृत्व नाराज हो गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी सेना को अपने एयरस्पेस और सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया. प्रिंस सुल्तान एयरबेस से अमेरिकी उड़ानों पर रोक लगा दी गई. इसके बाद अमेरिकी ऑपरेशन को भारी झटका लगा और "प्रोजेक्ट फ्रीडम" सिर्फ 36 घंटे के भीतर ठप पड़ गया। अब सोच-समझकर फैसला लेगा सऊदी अरब! सऊदी अरब अब अमेरिका की हर रणनीति का आंख बंद करके समर्थन नहीं करना चाहता. इसकी सबसे बड़ी वजह ईरान का सीधा खतरा है. तेहरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अगर किसी खाड़ी देश ने अमेरिकी या इजरायली सैन्य कार्रवाई के लिए अपना एयरस्पेस इस्तेमाल करने दिया, तो उसे भी जवाबी हमले का सामना करना पड़ेगा। 2019 में सऊदी अरब के अबकैक और खुरैस तेल प्लांट्स पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमले अब भी रियाद के लिए बड़ी चेतावनी बने हुए हैं. यही कारण है कि सऊदी नेतृत्व किसी सीधे सैन्य टकराव से बचना चाहता है. इसके अलावा सऊदी अरब खुद को इस्लाम की सबसे पवित्र जगहों मक्का और मदीना का संरक्षक मानता है. ऐसे में फिलिस्तीन मुद्दे को नजरअंदाज करके इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करना उसके लिए आसान नहीं है. गाजा युद्ध के बाद अरब देशों की जनता में इजरायल के खिलाफ गुस्सा भी काफी बढ़ा है। उधर ईरान इस पूरी घटना को अपने लिए रणनीतिक मौके की तरह देख रहा है. अमेरिका जहां एक बड़ा एंटी-ईरान गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं ईरान खाड़ी देशों और वॉशिंगटन के बीच बढ़ती दूरी का फायदा उठाने में लगा है. विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की "अब्राहम अकॉर्ड्स फर्स्ट" वाली रणनीति ने उल्टा असर किया है. इससे अमेरिका के सहयोगी देश ही असहज हो गए हैं और वे अब अपने सुरक्षा हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।  

पाकिस्तान में इतिहास पर बवाल: ख्वाजा आसिफ ने माना- हिंदू थे हमारे पूर्वज, किताबों में फैलाया गया झूठ

इस्लामाबाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने पाकिस्तान में पहचान और इतिहास को लेकर नई बहस छेड़ दी है. आसिफ ने खुलकर स्वीकार किया कि पाकिस्तान के बच्चों को "गलत इतिहास" पढ़ाया जा रहा है और देश के लोग अपनी असली जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। एक इंटरव्यू में ख्वाजा आसिफ ने कहा, "हम पाकिस्तानी मुसलमान अपने हिंदू पूर्वजों से नफरत करते हैं. पाकिस्तान के आधे लोग झूठा दावा करते हैं कि उनके पूर्वज सऊदी अरब या ईरान से आए थे." उन्होंने कहा कि यह सोच जानबूझकर तैयार की गई ताकि पाकिस्तान की नई पीढ़ी अपनी सभ्यता की पहचान से कट जाए। ख्वाजा आसिफ ने इतिहास की किताबों पर सवाल उठाते हुए कहा कि पाकिस्तान में हिंदू शासकों को इतिहास से लगभग मिटा दिया गया. उन्होंने कहा, "हमने चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक को इतिहास की किताबों से हटा दिया क्योंकि वे हिंदू थे." उन्होंने आगे कहा, "मेरे पूर्वज हिंदू थे. क्या इससे मैं कम पाकिस्तानी हो जाता हूं?" आसिफ के मुताबिक पाकिस्तान में पढ़ाई जाने वाली किताबें ऐसे लोगों ने लिखीं जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों को एक खास मानसिकता में ढालने की कोशिश की। पाकिस्तानी समाज की सोच बदली गई! ख्वाजा आसिफ ने कहा कि अमेरिका की लड़ाइयों में पाकिस्तान को इस्तेमाल करने के लिए समाज की सोच बदली गई और उसी हिसाब से इतिहास को पेश किया गया. उन्होंने कहा, "हमारे बच्चे तथ्यात्मक इतिहास नहीं पढ़ रहे. आज पाकिस्तान में कई लोगों को यह तक नहीं पता कि चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक कौन थे। ख्वाजा आसिफ का यह बयान ऐसे समय आया है जब वह पहले से ही अमेरिका और इजरायल के मुद्दे पर विवादों में घिरे हुए हैं. हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों से अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने और इजरायल को मान्यता देने की अपील की थी। पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देगा- आसिफ इस पर प्रतिक्रिया देते हुए आसिफ ने कहा था, "मुझे निजी तौर पर नहीं लगता कि हमें ऐसे किसी समझौते में शामिल होना चाहिए जो हमारी बुनियादी सोच से टकराता हो." उन्होंने दोहराया कि पाकिस्तान का पुराना रुख आज भी कायम है और जब तक 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश नहीं बनता, तब तक इस्लामाबाद इजरायल को मान्यता नहीं देगा। पाकिस्तान ने अपने 78 साल के इतिहास में कभी इजरायल को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है. यहां तक कि पाकिस्तानी पासपोर्ट पर भी साफ लिखा होता है कि यह इजरायल की यात्रा के लिए मान्य नहीं है. आसिफ के बयान के बाद अमेरिका में भी प्रतिक्रिया देखने को मिली. अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद लिंडसे ग्राहम ने पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि इजरायल के प्रति पाकिस्तान की सोच लंबे समय से नकारात्मक रही है और ऐसे में अमेरिका-ईरान या इजरायल से जुड़े मामलों में उसकी मध्यस्थता "समस्याओं से भरी" हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण संवैधानिक करार

नई दिल्ली मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण कार्य (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग के पास SIR का अधिकार है. एसआईआर पर दायर यायिकाओं से जुड़े मामले में सर्वोच्च अदालत ने मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) करने के भारत निर्वाचन आयोग के अधिकार को बरकरार रखा है. अदालत ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि ECI ने SIR का प्रयोग करके अपनी वैधानिक शक्तियों के बाहर जाकर कार्य किया है. इसे 'अल्ट्रा वायर्स' भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह कार्य-प्रणाली उस सामान्य प्रक्रिया से भिन्न है जो आमतौर पर अपनाई जाती है।  SIR पर सीजेआई ने क्या कुछ कहा? SIR पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि सभी पक्षों की अलग-अलग दलीलों पर गौर करने के बाद, और घटनाओं के क्रम को देखने के बाद, पार्टियों की ओर से पेश की गई दलीलों और रिकॉर्ड में रखी गई सामग्री को देखने के बाद, हमारा मानना ​​है कि इन मुद्दों का एनालिसिस करने की ज़रूरत है. सीजेआई ने तीन सवालों के जरिए अपनी बात रखीं।  SIR पर सीजेआई के तीन सवाल     क्या भारत के इलेक्शन कमीशन के पास SIR जैसी कार्रवाई करने का अधिकार है?     क्या SIR के तहत जांच किसी जायज़ मकसद पर आधारित है और अगर ऐसा है, तो क्या इलेक्शन कमीशन द्वारा अपनाए गए उपाय, हासिल किए जाने वाले लक्ष्यों के हिसाब से सही हैं?     क्या SIR के तहत जांच करने में इलेक्शन कमीशन द्वारा अपनाया गया तरीका रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट, 1950 के नियमों के खिलाफ़ है या उनका उल्लंघन करता है? मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार है, तो यह भी देखना होगा कि उसकी प्रक्रिया क्या होगी। हालांकि, केवल प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों के आधार पर पूरे एसआईआर को अवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। पीठ ने यह भी कहा कि यह सवाल उठाया गया कि क्या इस समय एसआईआर कराने की कोई वैध आवश्यकता है। अदालत की राय में एसआईआर के दौरान उठाए गए कदम जरूरत के मुताबिक थे। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एसआईआर बिहार में चुनाव प्रक्रिया और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक दायित्व से ध्यान नहीं भटकाता। उन्होंने मतदाताओं पर खुद को साबित करने का बोझ डालने वाली दलील को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने निवास स्थान से कहीं और रहने लगा है, तब भी वह पुरानी एसआईआर प्रक्रिया से बाहर नहीं हो जाता। उसका या उसके परिवार का नाम पुराने रिकॉर्ड में मौजूद होगा। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने दस्तावेजों की विश्वसनीयता के आधार पर उन्हें सूची में शामिल किया है और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह नहीं माना जा सकता कि एसआईआर का उद्देश्य लोगों को मतदाता सूची से बाहर करना था। अगर कोई दस्तावेज सही नहीं पाया जाता है, तो चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम शामिल करने से इनकार कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आयोग नागरिकता तय कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए क्या-क्या टिप्पणी की, उन्हें बिंदुवार जानते हैं- 1. चुनाव आयोग की शक्तियां बरकरार सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे निष्पक्ष और शुद्ध मतदाता सूची तय करने का अधिकार है. अदालत ने यह भी माना कि विशेष परिस्थितियों में अलग प्रक्रिया अपनाना संविधान और कानून के खिलाफ नहीं है. इसलिए SIR पूरी तरह वैध है और इसे प्रोसेस करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है. आयोग इसकी शक्ति रखता है. 2. कोई प्रक्रिया थोड़ी अलग हो तो अवैध नहीं हो जाती है- सुप्रीम कोर्ट बिहार में यह प्रक्रिया शुरू होने के बाद इसे चुनौती दी गई थी. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है और मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है. अदालत ने कहा, 'यह प्रक्रिया कानूनी रूप से मान्य है. 11 दस्तावेजों पर विचार करने और हमारे आदेश के माध्यम से आधार कार्ड को शामिल किए जाने के बाद हम इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते कि चुनाव द्वारा मांगे गए दस्तावेजों का समूह मनमाना है." सुप्रीम कोर्ट की खास टिप्पणी- सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि SIR प्रक्रिया को केवल इसलिए 'अल्ट्रा वायर्स' (अवैध) करार देकर रद्द नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह मतदाता सूचियों के संशोधन की सामान्य प्रोसेस से अलग है. 3. वोटर लिस्ट से नाम हटना, नागरिकता जाना नहीं- सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने SIR की प्रक्रिया को वैध ठहराते हुए कहा कि इस प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट से नाम हटाने का मतलब यह नहीं है कि किसी की नागरिकता खत्म हो गई. यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि याचिकाकर्ताओं और विपक्षी दलों का कहना था कि चुनाव आयोग का SIR अभियान 'पिछले दरवाजे से नागरिकता जांच' जैसा है. 4. नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं- सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता के सवाल को सिर्फ इस सीमित दायरे में देख सकता है कि किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में शामिल किया जाए या हटाया जाए. अदालत ने साफ कहा कि चुनाव आयोग किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं रहा. नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है. 5.  SIR 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' और संबंधित नियमों के विपरीत नहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि SIR कानूनी रूप से मान्य और उचित है इसलिए यह 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' (RP Act) का उल्लंघन भी नहीं करता है. पीठ ने कहा कि अदालत का निष्कर्ष है कि एसआईआर संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की कसौटी पर खरा उतरता है। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इतने विस्तृत कार्य को देखते हुए चुनाव आयोग को नियम और प्रक्रिया तय करने का अधिकार है। चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता। हालांकि, वह संदिग्ध लोगों के मामलों को … Read more

मौसम का बड़ा यू-टर्न! कल से आंधी-तूफान और तेज बारिश की चेतावनी

नई दिल्ली देश के अलग-अलग राज्यों में अगले 24 से 48 घंटों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। लोगों को उमस भरी गर्मी से राहत मिल सकती है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अपने पूर्वानुमान में इसकी जानकारी दी है। आईएमडी ने कहा है कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसके अगले 2-3 दिनों में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के कुछ और हिस्सों में दस्तक देने की संभावना है। इसके लिए परिस्थितियां अनुकूल बनी हुई हैं। मौसम विभाग ने देश के कई राज्यों में 28 मई से आंधी-बारिश की चेतावनी जारी की है। इस दौरान 60-80 किमी/घंटे की रफ्तार से चक्रवाती तूफान भी आ सकता है। आईएमडी के मुताबिक, अगले 24 घंटे के दौरान उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में लू और रात में उमस वाली गर्मी का प्रकोप रहेगा। हालांकि, इसके बाद राहत मिल सकती है। 28 और 29 मई को पूरे उत्तर प्रदेश में धूल भरी आंधी चलने की आशंका है। इस दौरान 60 से 80 किमी/घंटे की रफ्तार से हवा चल सकती है। अलग-अलग हिस्सों में ओलावृष्टि की भी चेतावनी है। इसके बाद तापमान में 6 से 8 डिग्री सेल्सियस की भारी गिरावट दर्ज की जाएगी। बिहार में आंधी-तूफान का अलर्ट 27 से 30 मई के दौरान बिहार में गरज-चमक के साथ हल्की से मध्यम बारिश होगी। 27 और 29 मई को बिहार में कुछ स्थानों पर भारी बारिश होने की संभावना है। सबसे गंभीर चेतावनी 29 मई के लिए है। इस दिन 80 किमी/घंटे की रफ्तार से विनाशकारी आंधी और तूफान आने की आशंका है। दिल्ली, हरियाणा और चंडीगढ़ में भीषण लू की स्थिति बनी रहेगी। 28-29 मई को इन राज्यों में मौसम पूरी तरह पलट जाएगा। दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा में ओलावृष्टि के साथ 60 से 80 किमी/घंटे की रफ्तार से तेज आंधी की संभावना है, जिससे तपती गर्मी से भारी राहत मिलेगी। पहाड़ों की बात करें तो जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में छिटपुट स्थानों पर लू चलेगी। गरज-चमक के साथ अलग-अलग जगहों पर बारिश होगी। 28 और 29 मई को इन तीनों पहाड़ी राज्यों में ओलावृष्टि की संभावना है। इस दौरान हवा की रफ्तार 50 से 70 किमी/घंटे रहने की संभावना है। आईएमडी ने इसके लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। कैसा रहेगा बंगाल का मौसम पश्चिम बंगाल में 27 से 29 मई के दौरान 50 से 70 किमी/घंटे की रफ्तार से आंधी-तूफान की संभावना है। 27 मई को भारी बारिश हो सकती है। वहीं, झारखंड में अगले 7 दिनों तक हल्की से मध्यम बारिश का दौर जारी रहेगा। 27 से 29 मई के बीच यहां 50-70 किमी/घंटे की रफ्तार से तेज अंधड़ चलने की संभावना है। 27 मई को यहां लू का भी असर रहेगा। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का मौसम मध्य प्रदेश में 27 मई को भीषण लू की स्थिति रहेगी। 28 से 30 मई के बीच 40-50 किमी/घंटे की तेज हवाओं के साथ हल्की बारिश शुरू होगी, जिससे तापमान में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस की गिरावट आएगी। छत्तीसगढ़ में 27 और 28 मई को लू चलने के बाद 27 से 30 मई के दौरान राज्य के कई हिस्सों में गरज-चमक और तेज हवाओं के साथ बौछारें पड़ेंगी, जिससे गर्मी से राहत मिलेगी।

दो दिन में दूसरी बार पाकिस्तान की लताड़, भारत ने UN में खोली आतंक की पोल

नई दिल्ली भारत ने 2 दिन में दूसरी बार पाकिस्तान को लताड़ लगाई है। वैश्विक मंचों पर भारत को उकसाने वाली बयानबाजियों से बाज न आने वाले पाकिस्तान को भारत ने इस बार आंतकवाद के मुद्दे पर आड़े हाथों लिया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में 'यूएन चार्टर के सिद्धांतों को बनाए रखने' पर आयोजित एक खुली बहस के दौरान भारत के स्थायी राजदूत पार्वथनेनी हरीश ने पाकिस्तान को एक्सपोज किया। राजदूत हरीश ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि पाकिस्तान को भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने की भारी कीमत चुकानी होगी। राजदूत हरीश ने पाकिस्तान के असली चेहरे को UNSC में बेनकाब किया। उन्होंने अपने बयान में कहा, “पाकिस्तान को यह स्वीकार करना होगा कि सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के गंभीर परिणाम होते हैं। अस्तित्व में आने के बाद से ही पाकिस्तान लगातार आतंकवाद, उग्रवाद, हिंसक कट्टरपंथ और भारत-विरोधी बयानबाजी कर रहा है। पाकिस्तान दुष्ट ताकतों को पालने और उनका इस्तेमाल करने में जुटा हुआ है।” क्या बोला भारत? भारतीय राजदूत पाकिस्तान की सेना की कुख्यात डॉक्ट्रिन 'ब्लीडिंग इंडिया बाय अ थाउजेंड कट्स' यानी भारत को लहूलुहान करने जैसी नीति को भी संयुक्त राष्ट्र के सामने लेकर आए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ कई युद्ध शुरू कर, बेवजह आक्रामकता दिखाकर और आतंकवाद फैलाकर संप्रभुता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन किया है। ऐसे में पाकिस्तान का UN चार्टर के प्रति प्रतिबद्धता जताना पूरी तरह खोखला और पाखंड है। राजदूत हरीश ने याद दिलाया कि स्वतंत्र भारत ने शुरुआत से ही पाकिस्तान के सीमा पार आक्रमण को झेला है। पाकिस्तान ने भारतीय क्षेत्रों पर अवैध कब्जा करने की कोशिश की। भारत ने यह भी बता दिया कि उसके पास इस आतंकवाद के खिलाफ अपनी रक्षा करने का पूरा अधिकार है। जम्मू कश्मीर के जिक्र पर भी भारत ने सुनाया गौरतलब है कि भारत ने जम्मू कश्मीर के मुद्दे का जिक्र करने को लेकर मंगलवार को भी पाक और चीन को सुनाया था। दरअसल पाकिस्तान और चीन के बीच बीजिंग में हुई एक बैठक के बाद एक साझा बयान जारी किया था। इसमें कश्मीर का जिक्र कर कहा गया था कि इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के मुताबिक सुलझाया जाना चाहिए। इसके बाद भारत ने सख्त हिदायत देते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है और इस पर किसी भी तीसरे देश को टिप्पणी करने का कोई हक नहीं है। नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय (MEA) के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक बयान में कहा, “हम चीन और पाकिस्तान के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर के अनुचित बयान को सिरे से खारिज करते हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं, थे और हमेशा रहेंगे। किसी भी अन्य देश के पास इस पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है।” वहीं भारत ने CPEC प्रोजेक्ट को लेकर भी अपनी आपत्ति दोहराई। भारत ने कहा कि इस कॉरिडोर का कुछ हिस्सा भारत की संप्रभु धरती (PoK) से होकर गुजरता है और भारत अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर चोट करने वाले और पाकिस्तान के अवैध कब्जे को वैध बनाने वाले किसी भी देश के ऐसे कदम का कड़ा विरोध करता है।

ईरान से आई राहत भरी खबर, होर्मुज तनाव के बीच सफल रही भारत की रणनीति

नई दिल्ली ईरान में होर्मुज संकट के बीच एक ऐसी खबर आई है, जो भारत को खुश करने वाली है. दरअसल ईरान में हिरासत में रखे गए 10 भारतीय नाविकों को आखिरकार रिहा कर दिया गया है. ये भारत सरकार की ओर से लगातार हो रही कूटनीतिक कोशिशों के बाद मिली सफलता है. एक लंबी वार्ता और प्रक्रिया के बाद इन नाविकों की सुरक्षित रिहाई संभव हो सकी है. भारतीय शिपिंग प्राधिकरण के मुताबिक ये नाविक एमवी हार्बर फीनिक्स नाम के तेल टैंकर पर तैनात थे।  आपको बता दें कि ये मामला जुलाई, 2025 का है, जिसमें ईरान के जास्क पोर्ट के पास इस जहाज को रोके जाने के बाद नाविकों को हिरासत में ले लिया गया था. डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग ने बयान जारी कर कहा कि नाविकों को अब सुरक्षित रूप से रिहा कर दिया गया है और उन्हें वापस भारत लाने की तैयारी की जा रही है. इस मामले कोई भी सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया गया है और बेहद शांति से भारत सरकार ने नाविकों की वापसी सुनिश्चित की है।  भारत-ईरान के अच्छे संबंधों का सबूत  भारत और ईरान के बीच लंबे समय से मजबूत कूटनीतिक और ऊर्जा संबंध रहे हैं. हालांकि भारत अमेरिका और इजरायल के साथ भी करीबी रिश्ते बनाए रखता है, इसलिए ऐसे मामलों में नई दिल्ली काफी संतुलित और सावधानी भरी नीति अपनाती है. ईरानी सुरक्षा बल अक्सर खाड़ी क्षेत्र में उन जहाजों को पकड़ने का दावा करते हैं, जिन पर अवैध रूप से ईंधन ले जाने का शक होता है. हालांकि भारतीय नाविकों की गिरफ्तारी की सटीक वजह या जहाज से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है. शिप ट्रैकिंग वेबसाइट्स के मुताबिक एमवी हार्बर फीनिक्स पलाऊ झंडे वाला एक ऑयल टैंकर है. भारतीय सरकार ने इस पूरे मामले में सार्वजनिक बयानबाजी से बचते हुए शांत कूटनीति की रणनीति अपनाई. माना जा रहा है कि इसी वजह से बातचीत के जरिए नाविकों की रिहाई का रास्ता निकल पाया।  होर्मुज पर बना हुआ है संकट  भारत दुनिया के सबसे बड़े मर्चेंट नेवी कार्यबल वाले देशों में शामिल है. खाड़ी क्षेत्र के समुद्री रास्तों पर हजारों भारतीय नाविक काम करते हैं. वहीं 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर कड़ी निगरानी और प्रतिबंध बढ़ा दिए हैं. दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी इसी रास्ते से होकर गुजरता है. भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार है, अपनी लगभग आधी कच्चे तेल की जरूरत होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए पूरी करता है. हालांकि इस बीच भारत के कई टैंकर होर्मुज से गुजरे हैं. पिछले एक हफ्ते में भारत के लिए एलएनजी ला रहे दो जहाजों ने भी इस रास्ते को क्रॉस किया है, जिसके बाद गैस संकट का दबाव थोड़ा कम जरूर होगा। 

सुरक्षाबलों का बड़ा सर्च ऑपरेशन जारी, राजौरी में आतंकियों पर कसता शिकंजा

राजौरी  जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले में आतंकियों के खिलाफ सुरक्षाबलों का बड़ा ऑपरेशन लगातार पांचवें दिन भी जारी है. डोरीमल और गम्भीर मोगला के घने जंगलों में सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और CRPF की संयुक्त टीमें आतंकियों की तलाश में लगातार सर्च ऑपरेशन चला रही हैं. सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि इलाके में लश्कर-ए-तैयबा के दो बड़े कमांडर छिपे हो सकते हैं, जिन्हें पकड़ने या मार गिराने के लिए सुरक्षाबलों ने घेराबंदी और कड़ी कर दी है।  सूत्रों के मुताबिक आतंकियों के खिलाफ मल्टी ग्रिड ऑपरेशन चलाया जा रहा है. ऑपरेशन में पैरा स्पेशल फोर्स के जवानों की अतिरिक्त तैनाती की गई है. साथ ही ड्रोन, हाईटेक सर्विलांस सिस्टम और आधुनिक निगरानी उपकरणों की मदद से जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों की लगातार निगरानी की जा रही है ताकि आतंकियों को भागने का मौका न मिले. दरअसल शनिवार को यहां उस समय मुठभेड़ शुरू हो गई थी, जब जंगल में छिपे आतंकियों ने सुरक्षाबलों पर अचानक फायरिंग कर दी. इसके बाद सेना और पुलिस ने जवाबी कार्रवाई शुरू की और पूरे इलाके को घेर लिया गया. खुफिया एजेंसियों को पहले ही इन जंगलों में 2 से 3 आतंकियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी, जिसके आधार पर आतंकवाद विरोधी अभियान शुरू किया गया।  नागरोटा स्थित सेना की व्हाइट नाइट कोर ने भी ऑपरेशन की पुष्टि करते हुए इसे ‘ऑपरेशन शेरुवाली’ नाम दिया है. माना जा रहा है कि आतंकी अभी भी जंगल के भीतर किसी दुर्गम इलाके में छिपे हुए हैं।  राजौरी की पीर पंजाल रेंज का यह इलाका आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है. यहां घने जंगल, ऊंची पहाड़ियां और सीमित रास्ते सुरक्षाबलों के लिए मुश्किलें बढ़ाते हैं. यही वजह है कि ऑपरेशन बेहद सावधानी और रणनीति के साथ चलाया जा रहा है. सुरक्षा एजेंसियों ने आसपास के इलाकों में भी चौकसी बढ़ा दी है. जगह-जगह नाके लगाए गए हैं और वाहनों व पैदल आवाजाही पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है. पूरे इलाके को सुरक्षा घेरे में लेकर तलाशी अभियान तेज कर दिया गया है ।  स्थानीय लोग भी सुरक्षा एजेंसियों के साथ सहयोग कर रहे हैं. फिलहाल इस ऑपरेशन में किसी जवान या नागरिक के हताहत होने की सूचना नहीं है, लेकिन सुरक्षाबल आतंकियों को किसी भी हाल में बच निकलने का मौका नहीं देना चाहते। 

अल-अक्सा को लेकर नई साजिश के आरोप, जानिए क्या है अमेरिका-इजरायल का पूरा मामला

 यरुशलम फिलिस्तीन के यरुशलम स्थित अल-अक्सा मस्जिद को लेकर एक नई राजनीतिक और धार्मिक लड़ाई छिड़ती दिखाई दे रही है. दावा किया जा रहा है कि अमेरिका और इजरायल मिलकर एक ऐसे नए प्लान पर काम कर रहे हैं, जिसके तहत अल-अक्सा मस्जिद पर जॉर्डन की दशकों पुरानी संरक्षक यानी कस्टोडियन की भूमिका को खत्म किया जा सकता है।  रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर और इजरायल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी आगे बढ़ा रहे हैं. हालांकि कुशनर फिलहाल अमेरिकी प्रशासन में किसी आधिकारिक पद पर नहीं हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि वह पर्दे के पीछे सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।  इस कथित प्रस्ताव के तहत जॉर्डन समर्थित इस्लामिक वक्फ की शक्तियां खत्म कर दी जाएंगी और उसकी जगह इजरायल सरकार की निगरानी में एक नया निकाय बनाया जाएगा. मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट के मुताबिक, यह नया सिस्टम अल-अक्सा मस्जिद को "मल्टी-फेथ सेंटर" यानी बहुधार्मिक स्थल घोषित कर सकता है।  रिपोर्ट्स में दावा है कि इसके बाद बड़े समूहों में यहूदियों को मस्जिद परिसर में प्रवेश और प्रार्थना करने की औपचारिक अनुमति दी जा सकती है. इतना ही नहीं, इजरायल को इमामों, धार्मिक उपदेशकों और मस्जिद प्रशासन से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति में भी बड़ा अधिकार मिल सकता है. यहां तक कि शुक्रवार के खुत्बों यानी धार्मिक भाषणों की सामग्री पर भी इजरायली दखल की बात कही जा रही है।  मीडिया ईस्ट आई ने सूत्रों के हवाले से बताया कि अमेरिका ने अल-अक्सा के भविष्य को लेकर एक ड्राफ्ट पेपर भी तैयार किया है. इसमें कथित तौर पर मस्जिद परिसर को उसकी मौजूदा मुस्लिम पहचान से अलग कर एक बड़े पर्यटन और धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित करने का विजन रखा गया है, जहां तीनों अब्राहमिक धर्मों – इस्लाम, ईसाई और यहूदी की मौजूदगी दिखाई जाए।  इस पूरे विवाद के बीच जॉर्डन की चिंता सबसे ज्यादा बढ़ी हुई है. जॉर्डन का हाशमाइट शाही परिवार 1924 से यरुशलम के मुस्लिम और ईसाई धार्मिक स्थलों का संरक्षक माना जाता है. 1994 की जॉर्डन-इजरायल शांति संधि में भी इस भूमिका को मान्यता दी गई थी।  फिलहाल अल-अक्सा मस्जिद एक पुराने "स्टेटस क्वो" समझौते के तहत संचालित होती है. 1967 की जंग के बाद तय व्यवस्था के मुताबिक मस्जिद के अंदरूनी मामलों को इस्लामिक वक्फ संभालता है, जबकि बाहरी सुरक्षा इजरायल के हाथ में रहती है. गैर-मुस्लिमों को सीमित समय के लिए परिसर में आने की इजाजत है, लेकिन वहां प्रार्थना करने की अनुमति नहीं है।  लेकिन बीते कुछ वर्षों में इजरायली पुलिस की कार्रवाई, दक्षिणपंथी यहूदी समूहों की बढ़ती मौजूदगी और यहूदी प्रार्थना अधिकारों की मांग ने माहौल को लगातार तनावपूर्ण बनाया है. फिलिस्तीनी और जॉर्डन के अधिकारी आरोप लगाते रहे हैं कि इजरायल धीरे-धीरे मौजूदा व्यवस्था को बदलने की कोशिश कर रहा है।  रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बहरीन, मिस्र, मोरक्को और यूएई को इस अमेरिकी प्रस्ताव की जानकारी दी गई है. हालांकि सऊदी अरब ने कथित तौर पर इस योजना पर आपत्ति जताई है. खाड़ी देशों के सूत्रों का कहना है कि सऊदी अरब मानता है कि अगर अल-अक्सा की मौजूदा संरक्षक व्यवस्था से छेड़छाड़ हुई तो पूरा पश्चिम एशिया भड़क सकता है।  जॉर्डन सरकार ने साफ कहा है कि यरुशलम और उसके धार्मिक स्थलों को लेकर उसका रुख नहीं बदला है. उसने दोहराया कि हाशमाइट संरक्षकता अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संधियों से मान्यता प्राप्त है और इसे खत्म करने की किसी भी कोशिश का विरोध किया जाएगा।  इस बीच फिलिस्तीनी पक्ष ने भी इस कथित प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि अल-अक्सा सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि मुस्लिम दुनिया की पहचान और क्षेत्रीय स्थिरता का अहम स्तंभ है।  अब सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ कूटनीतिक दबाव की रणनीति है या फिर असल में अल-अक्सा मस्जिद की मौजूदा स्थिति बदलने की बड़ी तैयारी चल रही है. क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो इसका असर सिर्फ यरुशलम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मुस्लिम जगत और पश्चिम एशिया की राजनीति में भूचाल ला सकता है। 

Pinarayi Vijayan के करीबी घेरे पर ED की रेड, 10 लोकेशन पर जांच तेज

तिरुवनन्तपुरम  केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ ईडी की टीम ने बड़ी कार्रवाई की है। ईडी की टीम ने बुधवार सुबह सुबह चीन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड (CMRL) मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पिनाराई विजयन के आवास पर तलाशी अभियान चलाया। बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई चल रही जांच के तहत की गई। इसमें कथित वित्तीय अनियमितताओं और धनशोधन के आरोपों की पड़ताल की जा रही है। बता दें कि केरल में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत लगभग 10 जगहों पर तलाशी ली गई। Pइनमें राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम में विजयन का किराए का आवास भी शामिल था। जानें क्या है मामला बता दें कि केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पी. विजयन से जुड़ी कोचीन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड (सीएमआरएल) वित्तीय लेनदेन मामले में केरल हाई कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय की जांच को जारी रखने की अनुमति दे दी है। न्यायमूर्ति टीआर रवि ने कोचिन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड और उसके चार वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दायर उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें ईडी की जांच और ईसीआईआर को चुनौती दी गई थी। हालांकि यह मामला सीधे तौर पर पी. विजयन से जुड़ा नहीं है, लेकिन तब यह बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया था। जब आरोप लगे कि सीएमआरएल ने एक्सलोगिक सोलूशन्स को संदिग्ध भुगतान किए थे। यह कंपनी उनकी बेटी वीणा थाइकांडियिल की बताई जाती है। लगे थे ये आरोप आरोपों के अनुसार, सीएमआरएल ने बिना किसी वास्तविक सेवा के वीणा के कंपनी को हर महीने भुगतान किया था, जिसके बाद केरल में राजनीतिक विवाद तेज हो गया था। विपक्ष ने बार-बार विजयन और उनके परिवार पर सवाल उठाए थे। सीएमआरएल और उसके अधिकारियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर ईडी की कार्रवाई को रद्द करने की मांग की थी। उनका कहना था कि इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता, इसलिए ईडी को जांच का अधिकार नहीं है। कोर्ट के फैसले के बाद जांच को आगे बढ़ाने का रास्ता मिला याचिकाकर्ताओं में सीएमआरएल के प्रबंध निदेशक एस.एन. ससीधरन कर्था, सीएफओ के.एस. सुरेश कुमार, सीनियर मैनेजर एन.सी. चंद्रशेखरन और सीनियर अधिकारी अनु रैचल कुरुविला शामिल थे। इससे पहले सुनवाई के दौरान कुछ अधिकारियों ने ईडी पर पूछताछ के दौरान अवैध हिरासत का आरोप लगाया था। इसके बाद जून 2024 में हाई कोर्ट ने ईडी को पूछताछ की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। विजिलेंस अदालतों और हाई कोर्ट द्वारा पहले भी इस मामले में विजिलेंस जांच की मांग खारिज की जा चुकी थी। अब मंगलवार के फैसले के बाद ईडी को इस हाई-प्रोफाइल मनी लॉन्ड्रिंग जांच को आगे बढ़ाने का रास्ता मिल गया है।