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होर्मुज में ईरानी गोलीबारी के दौरान कैप्टन आशीष ने खुद जहाज में डटे रहकर बाकी को भारत भेजा

मुंबई  होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव बरकरार है। ईरान ने एक बार फिर जल मार्ग को बंद कर दिया और दो भारतीय जहाजों पर फायरिंग भी की। होर्मुज में भारत समेत कई देशों के जहाज फंसे हुए हैं। इन्हीं जहाजों में एक की कमान कैप्टन आशीष के कंधों पर है। 45 दिन से होर्मुज में फंसे होने के बावजूद उन्होंने मिसाल पेश की। जहाज में फंसे लोगों की जब वतन लौटने की बारी आई, तो उन्होंने कर्तव्य चुनते हुए खुद को जहाज पर डटे रखा और जहाज में 12 क्रू मेंबर को भारत रवाना किया। जब समुद्र की लहरें उग्र हों और अनिश्चितता का अंधेरा गहराने लगे, तब नेतृत्व की असली परीक्षा होती है। ऐसी ही कठिन परिस्थिति में उत्तराखंड के रुड़की निवासी कैप्टन आशीष शर्मा ने अपने निर्णयों से साबित किया कि समंदर की लहरों से बड़ी चुनौती होती है जिम्मेदारी और डर से बड़ा होता कर्तव्य। आशीष ने साहस, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय संवेदनाओं की प्रेरक मिसाल पेश की है। जहाज में कैप्टन आशीष के साथ अभी 12 क्रू मेंबर और फंसे हॉर्मुज जलडमरूमध्य में 45 दिनों से फंसे पोतों में एक भारतीय जहाज के कैप्टन हैं रुड़की के आशीष शर्मा। दरअसल, तनाव कुछ कम होने के बाद ईरान ने वाणिज्यिक जहाजों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोल दिया है। घर वापसी का रास्ता साफ होने पर कैप्टन आशीष के पास विकल्प था कि पहले वे खुद लौट आएं, लेकिन उन्होंने कर्तव्य को सबसे ऊपर रखते हुए खुद से पहले अपने क्रू मेंबरों की सुरक्षा को चुना। जहाज पर मौजूद 24 क्रू मेंबरों में से 12 को उन्होंने सुरक्षित वतन रवाना कर दिया, जबकि स्वयं जहाज पर डटे रहने का निर्णय लिया। ‘अंतिम साथी के घर पहुंचने तक पोस्ट नहीं छोड़ूंगा’ ‘हिन्दुस्तान’ से विशेष बातचीत में आशीष ने कहा,‘जहाज पर मौजूद हर सदस्य की सुरक्षा कैप्टन की पहली जिम्मेदारी होती है। जब तक मेरा अंतिम साथी सुरक्षित घर नहीं पहुंच जाता, मैं अपनी पोस्ट नहीं छोड़ सकता।’ उन्होंने बताया कि शेष क्रू मेंबरों की वापसी को कंपनी प्रयासरत है। सभी को भेजने के बाद वह भारत लौटेंगे। उन्होंने बताया कि जहाज को निकलने में अभी लगभग डेढ़ महीना तक लग सकता है। इस बीच आशीष ने वीडियो संदेश भेज अपने और क्रू मेंबरों के सुरक्षित होने की जानकारी दी। जिन 12 क्रू मेंबरों को भारत भेजा गया, उन्होंने रवाना होते समय अपने कैप्टन के प्रति आभार जताया। गौरतलब है कि ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से बंद किए जाने के बीच भारतीय ध्वज वाला एक तेल टैंकर इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को सफलतापूर्वक पार कर गया, जबकि कम से कम चार अन्य जहाज वापस लौट गए। जहाजों के निगरानी आंकड़ों के अनुसार, 'देश गरिमा' नामक तेल टैंकर ने शनिवार को जलडमरूमध्य पार किया। भारतीय नौवाहन निगम लिमिटेड (एससीआई) का यह टैंकर मार्च की शुरुआत से इस मार्ग को पार करने वाला भारतीय ध्वज वाला 10वां जहाज है।

तेहरान का बयान, होर्मुज में भारतीय जहाज पर फायरिंग को लेकर 10 ताज़ा अपडेट्स

नई दिल्ली ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के कारण होर्मुज स्ट्रेट से एक बार फिर जहाजों का आवाजाही बंद हो गई है. होर्मुज के रास्ते कच्चा तेल ले जा रहे भारतीय ध्वज वाले दो जहाजों पर फायरिंग की घटना ने हालात को और गंभीर बना दिया है. समुद्री सुरक्षा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, यह घटना तब हुई जब ये जहाज इस संकरे जलमार्ग से गुजर रहे थे, जो पहले से ही क्षेत्रीय संघर्ष के चलते संवेदनशील बना हुआ है. इस घटना के बाद भारत ने तुरंत कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान के राजदूत को तलब किया और अपने नागरिकों और समुद्री व्यापार की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता जताई।  इस बीच एक ऑडियो क्लिप भी सामने आई है, जिसमें एक भारतीय जहाज के क्रू मेंबर समुद्री अधिकारियों पर नाराजगी जताते हुए कहते सुनाई दे रहे हैं, ‘आपने मुझे रास्ता दिया और अब फायरिंग कर रहे हैं, मुझे वापस मुड़ने दीजिए.’ इस बीच ईरान की ओर से शांति का संदेश भी आया है, लेकिन जमीनी हालात और समुद्री गतिविधियां लगातार बढ़ते तनाव की ओर इशारा कर रही हैं।  होर्मुज के हालात पर 10 लेटेस्ट अपडेट्स…     होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो भारतीय जहाजों के पास अचानक फायरिंग शुरू हो गई. बताया गया कि ये गोलियां आसपास हो रही ‘स्मॉल आर्म्स फायरिंग’ का हिस्सा थीं, जो जहाजों तक पहुंच गईं. हालांकि किसी भी क्रू मेंबर को चोट नहीं आई.     सरकार से जुड़े सूत्रों ने स्पष्ट किया कि दोनों जहाजों को हल्का नुकसान हुआ है. इन जहाजों की ब्रिज विंडो पर गोली लगने की बात सामने आई है, लेकिन कोई बड़ा तकनीकी नुकसान या जानमाल की हानि नहीं हुई।      एक टैंकर के कप्तान ने दावा किया कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े दो गनबोट्स जहाज के पास आए और फायरिंग शुरू कर दी. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।      इस घटना के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने ईरान के राजदूत मोहम्मद फताअली को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया. विदेश मंत्रालय के अनुसार, विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ईरानी राजदूत को इस ‘गोलीबारी की घटना’ पर भारत की ‘गहरी चिंता’ से अवगत कराया.उन्होंने भारतीय जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।      विदेश मंत्रालय ने याद दिलाया कि पहले भी ईरान ने भारत जाने वाले जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने में सहयोग किया है. अब भारत चाहता है कि वही प्रक्रिया जल्द बहाल की जाए।      भारतीय सूत्रों के मुताबिक, जहाजों को जानबूझकर निशाना नहीं बनाया गया, बल्कि वे ‘भटकी हुई गोलियों’ की चपेट में आए. इसके बावजूद घटना ने सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।      उधर यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) ने ओमान तट से करीब 20 नॉटिकल मील दूर सुरक्षा घटना की पुष्टि की है, जिससे क्षेत्र में खतरे का स्तर और बढ़ गया है।      कई जहाजों ने दावा किया कि उन्हें VHF रेडियो पर ईरानी नौसेना की ओर से संदेश मिला कि होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से बंद कर दिया गया है. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन इससे जहाजों में दहशत फैल गई।      होर्मुज में गोलीबारी की इस घटना पर भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने कहा, ‘ईरान और भारत के बीच रिश्ते बहुत मज़बूत हैं और जिस घटना का आपने ज़िक्र किया है, उसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।  हमें उम्मीद है कि सब ठीक हो जाएगा और यह मामला सुलझ जाएगा.’ इसके साथ ही उन्होंने कहा, ‘…हम यह युद्ध नहीं चाहते. हम शांति चाहते हैं, और हमें उम्मीद है कि दूसरा पक्ष भी शांति का पालन करेगा, ताकि हम एक शांतिपूर्ण क्षेत्र बना सकें।      इसी बीच ईरानी नेता मोहम्मद बाकेर क़ालिबाफ़ और सईद खतिबजादेह के बयानों ने हालात को और जटिल बना दिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका को लेकर सख्त रुख अपनाया है और परमाणु मुद्दे पर किसी भी दबाव को मानने से इनकार किया है. इससे क्षेत्र में टकराव की आशंका और बढ़ गई है।  होर्मुज जलडमरूमध्य में हुई यह घटना सिर्फ एक फायरिंग नहीं, बल्कि वैश्विक समुद्री सुरक्षा के लिए बड़ा संकेत है. भारत जैसे देश, जिनका बड़ा व्यापार इस मार्ग से गुजरता है, अब अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं. बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में हालात शांत होते हैं या यह संकट और गहराता है।   

भारत को मिला एलपीजी संकट से निपटने का तरीका, किस्मत ने पलभर में बदल दी तस्वीर

नई दिल्‍ली  अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध ने भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों को गैस के संकट में धकेल दिया है. लेकिन, किस्‍मत भारत पर मेहरबान हुई और अचानक ग्‍लोबल मार्केट में प्राकृतिक गैस की कीमतें नीचे आ गईं. इसका फायदा उठाते हुए भारत ने ग्‍लोबल स्‍पॉट मार्केट से गैस की खरीदारी तेज कर दी है. इससे पश्चिम एशिया संकट के बाद बढ़ी गैस आयात की दिक्‍कतों से निपटने में मदद मिलेगी।  गैस मार्केट से जुड़े ट्रेडर्स का कहना है कि देश की सरकारी कंपनियां भारत पेट्रोलियम कॉर्प, गेल इंडिया लिमिटेड और गुजरात स्‍टेट पेट्रोलियम कॉर्प ने अप्रैल से जून की डिलीवरी के लिए 16 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट यानी बीटीयू पर खरीदा है. ये सप्‍लाई 15 अप्रैल को बंद हुए ट्रेड में खरीदी गई है. ट्रेडर्स का कहना है कि यह एक बड़ा बदलाव है, क्‍योंकि इससे पहले कीमतें ज्‍यादा होने की वजह से भारतीय खरीदारों ने स्‍पॉट मार्केट से खरीदारी कम कर दी थी और कई ट्रेंडर रद्द कर दिए थे।  क्‍यों आई है ऐसी नौबत ईरान-अमेरिका युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्‍य लगभग बंद हो गया है और कतर में हमले से दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी प्‍लांट भी बंद हो गया. इस कारण भारत सहित दुनिया को सप्‍लाई होने वाले 20 फीसदी गैस के हिस्‍से पर दिक्‍कतें आ गईं. यही वजह रही कि भारत को भी पिछले साल की समान अवधि की तुलना में एलएनजी डिलीवरी करीब 14 फीसदी कम रही और सप्‍लाई के मुकाबले आयात का औसत गड़बड़ हो गया।  कीमत गिरी तो बढ़ गई खरीदारी भारत ने गैस खरीद ऐसे समय में बढ़ाई है, जब ग्‍लोबल स्‍पॉट मार्केट में प्राकृतिक गैस की कीमतें गिरकर एक महीने से भी ज्‍यादा के निचले स्‍तर पर चली गई हैं. युद्ध शुरू होने के बाद एक समय ऐसा भी आया था जब नेचुरल गैस के दाम ग्‍लोबल मार्केट में दोगुने से भी ज्‍यादा हो गए थे. तब इसकी कीमत 25 डॉलर प्रति बीटीयू के आसपास थी. यही वजह रही कि भारतीय खरीदारों ने अपने ट्रेडिंग बंद कर दी थी. अब कीमतें 50 फीसदी तक नीचे आ गई हैं, जिससे खरीदारी एक बार फिर बढ़ने लगी है।  गैस के लिए आयात पर निर्भर भारत सरकार ने कुछ साल पहले एक अभियान शुरू किया था कि देश को गैस आधारित अर्थव्‍यवस्‍था बनाना है, ताकि प्रदूषण पर लगाम कसी जा सके. फिलहाल अपनी जरूरत का करीब 60 फीसदी गैस चाहे वह प्राकृतिक गैस या हो फिर एलपीजी आज आयात करनी पड़ती है. साल 2024 में भारत का प्राकृतिक गैस का आयात करीब 35 हजार क्‍यूबिक मीटर के आसपास पहुंच गया था. पिछले साल का आंकड़ा तो और भी अधिक था, लेकिन इस साल की शुरुआत से ही ईरान संकट की वजह से आयात में कमी दिख रही है. भारत सबसे ज्‍यादा गैस का आयात कतर, यूएई और अमेरिका जेसे देशों से करता है। 

क्यूबा में अमेरिकी ड्रोन की गतिविधि: 6 घंटे तक समुद्री तट पर चक्कर लगाता रहा सबसे महंगा ड्रोन, क्या होगा ‘ऑपरेशन मादुरो’?

  नई दिल्ली अमेरिकी नौसेना का एक एडवांस्ड सर्विलांस ड्रोन MQ-4C ट्राइटन छह घंटे तक क्यूबा के पूरे दक्षिणी तट पर चक्कर लगाता रहा. यह ड्रोन जैक्सनविले से उड़ा था. इसने क्यूबा के दक्षिणी तट की पूरी लंबाई को स्कैन किया, सैंटियागो डी क्यूबा के पास 2 घंटे तक घूमता रहा. फिर हवाना के आसपास 2 घंटे चक्कर लगाने के बाद वापस लौट गया।  फ्लाइट ट्रैकर्स का कहना है कि उन्होंने पहले कभी इस ड्रोन को क्यूबा के इतने करीब नहीं देखा था. आमतौर पर यह ड्रोन युद्ध वाले इलाकों जैसे ब्लैक सी, पर्सियन गल्फ और भूमध्य सागर में दिखता है. इस उड़ान का समय और रूट दोनों ही बहुत अहम हैं।  MQ-4C ट्राइटन अमेरिकी नौसेना का सबसे एडवांस्ड अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAV) है. एक ड्रोन की कीमत करीब 2000 करोड़ रुपये है. यह बहुत ऊंचाई पर उड़ सकता है. लंबे समय तक हवा में रह सकता है. बड़े क्षेत्र की निगरानी कर सकता है. यह ड्रोन रडार, कैमरा और इलेक्ट्रॉनिक सेंसर्स से लैस है जो जमीन और समुद्र पर हर गतिविधि को ट्रैक कर सकता है. इस बार यह ड्रोन क्यूबा के पूरे दक्षिणी तट को करीब से स्कैन करते हुए हवाना तक पहुंचा. इतनी करीबी निगरानी पहले कभी नहीं देखी गई।  ट्रंप का बयान और पेंटागन की तैयारियां इस ड्रोन के उड़ान का समय बहुत संदिग्ध है. हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि उन्हें क्यूबा को किसी न किसी रूप में लेने का सम्मान मिलेगा. पेंटागन चुपचाप क्यूबा में संभावित ऑपरेशन की प्लानिंग तेज कर रहा है. इसी बीच अमेरिका ने क्यूबा की तेल आपूर्ति को भी रोक दिया है, जिससे क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है. दस साल बाद पहली बार एक अमेरिकी डेलिगेशन हवाना पहुंचा है. ये सब घटनाएं एक साथ हो रही हैं, जिससे क्यूबा में चिंता बढ़ गई है।  सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह वही MQ-4C ट्राइटन ड्रोन है जो पिछले बार जैक्सनविले से उड़ान भरकर वेनेजुएला के पास 10 घंटे की रेकी मिशन पर गया था. उस उड़ान के ठीक तीन महीने बाद अमेरिका ने काराकास पर छापा मारा और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया।  अब ठीक उसी तरह का ड्रोन क्यूबा के आसपास 6 घंटे तक निगरानी कर रहा है. कई विशेषज्ञ इसे वेनेजुएला पैटर्न कह रहे हैं. क्यूबा को इस बात पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।  क्यूबा पर अमेरिका क्यों नजर गड़ा रहा है? क्यूबा लंबे समय से अमेरिका के लिए एक पुराना मुद्दा रहा है. ट्रंप प्रशासन क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार को कमजोर करना चाहता है. तेल आपूर्ति रोकना, ड्रोन से निगरानी बढ़ाना और डेलिगेशन भेजना – ये सभी कदम क्यूबा पर दबाव बनाने के लिए लग रहे हैं।  अमेरिका क्यूबा को लोकतंत्र की ओर लाना चाहता है, लेकिन क्यूबा इसे अपना आंतरिक मामला मानता है. अगर अमेरिका कोई सैन्य कार्रवाई करता है तो यह पूरे लैटिन अमेरिका में बड़ा तनाव पैदा कर सकता है. फिलहाल स्थिति बहुत संवेदनशील है. अमेरिकी ड्रोन की उड़ान साफ संकेत दे रही है कि पेंटागन क्यूबा पर नजर रखे हुए है।  ट्रंप का बयान और वेनेजुएला वाली पुरानी घटना को देखते हुए क्यूबा सरकार को सतर्क रहना होगा. क्यूबा के नेता अभी चुप हैं, लेकिन अंदरूनी स्तर पर तैयारी जरूर चल रही होगी. दुनिया इस बात पर नजर रखे हुए है कि क्या ट्रंप प्रशासन क्यूबा के खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाता है या फिर बातचीत के जरिए मामला सुलझता है.

सुक्खू सरकार का बड़ा यू-टर्न, हिमाचल में सीएम और विधायकों का वेतन रहेगा पहले जैसा

शिमला हिमाचल सरकार की ओर से मुख्यमंत्री, मंत्री, विधानसभा स्पीकर और विधायकों के वेतन में कटौती करने का फैसला लागू हो गया है. सुक्खू सरकार ने वेतन कटौती के फैसले को लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी है. बजट भाषण में आर्थिक संकट को देखते हुए सीएम ने वेतन कटौती का फैसला लिया था. सीएम के मासिक वेतन में 50 प्रतिशत, मंत्रियों के 30 और विधायकों के वेतन में 20 फीसदी की कटौती का ऐलान किया गया था।  किसका कितना कटने वाला प्रदेश की गंभीर आर्थिक स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री के वेतन का 50 प्रतिशत, मंत्रियों के वेतन का 30 प्रतिशत और विधायकों के वेतन का 30 प्रतिशत अस्थाई रूप से रोकने का फैसला किया गया था. आगामी 6 महीनों के लिए पूरा वेतन देने पर रोक लगाई गई है. मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा था कि पिछली सरकारों के समय वेतन और पेंशन से जुड़ी देनदारियां बढ़कर करीब 13,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गई थीं।  ग्रेड-1 और ग्रेड-2 के अधिकारियों के वेतन कटौती का फैसला लिया था वापस अभी कुछ दिन पहले ही सुक्खू सरकार ने ग्रेड-1 और ग्रेड-2 के अधिकारियों के वेतन कटौती के फैसले पर आंशिक तौर पर यू-टर्न लिया था. किन्नौर के रिकॉन्गपिओ में हिमाचल दिवस पर सीएम सुक्खू ने बड़ा ऐलान किया था और घोषणा की थी कि प्रदेश में क्लास-1 और क्लास 2 अफसरों की सैलरी में अब कटौती नहीं की जाएगी. गौर रहे कि बजट के दौरान सरकार ने छह महीने के लिए सैलरी में कटौती का ऐलान किया था।  छह महीने बाद वापस दरअसल, हिमाचल प्रदेश के बजट सत्र के दौरान 21 मार्च को बजट पेश किया गया था और सीएम सुक्खू ने ऐलान किया था कि प्रदेश में क्लास-व और क्लास-2 समेत अन्य श्रेणी के कर्मचारियों की सैलरी में छह महीने के लिए 20 से 50 फीसदी तक की कटौती की जाएगी. हालांकि, छह महीने के बाद सरकार काटा गया वेतन कर्मचारियों  को लौटा देगी। 

जापान के वैज्ञानिकों का चमत्कार: मामूली लोहा से अरबों रुपये बचाने का तरीका, पेट्रोल-डीजल की समस्या का हल

नई दिल्ली  दुनियाभर में क्लीन एनर्जी की तलाश तेज हो रही है. हाइड्रोजन को भविष्य का सबसे साफ ईंधन माना जाता है. अभी तक हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया काफी महंगी और जटिल रही है. लेकिन जापान के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरीका खोज निकाला है जो यकीन करने में भी मुश्किल लगता है. उन्होंने सिर्फ लोहे के आयन और अल्ट्रावायलेट (UV) रोशनी की मदद से हाइड्रोजन तैयार कर ली है. रिपोर्ट के अनुसार, क्यूशू यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर ताकाहिरो मात्सुमोतो और उनकी टीम एक रिसर्च कर रही थी. उनका मकसद सस्ते तत्वों से कैटलिस्ट यानी उत्प्रेरक तैयार करना था. इसी दौरान एक कंट्रोल एक्सपेरिमेंट में उन्होंने मेथेनॉल, आयरन आयन और सोडियम हाइड्रोक्साइड को मिलाया. जब इस घोल पर अल्ट्रावायलेट लाइट डाली गई, तो जो हुआ उसने सबको हैरान कर दिया. इस मिश्रण से बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन गैस निकलने लगी।  मात्सुमोतो कहते हैं, ‘शुरुआत में तो इस पर यकीन करना ही मुश्किल था.‘ उन्होंने इसे एक सुखद इत्तेफाक बताया जिसने विज्ञान की नई राह खोल दी।  हाइड्रोजन उत्पादन की यह नई तकनीक इतनी खास क्यों है? आजकल ज्यादातर हाइड्रोजन फॉसिल फ्यूल यानी जीवाश्म ईंधन से बनाई जाती है. इससे पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है. हाइड्रोजन को मेथेनॉल जैसे अल्कोहल से भी निकाला जा सकता है, लेकिन इसके लिए बहुत महंगे और दुर्लभ मेटल्स वाले कैटलिस्ट की जरूरत पड़ती है. लोहा पृथ्वी पर सबसे ज्यादा पाया जाने वाला और सस्ता मेटल है. इस नई रिसर्च में लोहे का इस्तेमाल करके उसी रफ्तार से हाइड्रोजन बनाई गई, जितनी महंगे कैटलिस्ट से बनती है. वैज्ञानिकों ने पाया कि इसकी हाइड्रोजन उत्पादन दर 921 मिलीमोल प्रति घंटा प्रति ग्राम कैटलिस्ट रही, जो अब तक के सबसे बेहतरीन सिस्टम के बराबर है।  क्या सिर्फ मेथेनॉल से ही हाइड्रोजन बनाई जा सकती है? इस रिसर्च की सबसे बड़ी खूबी इसकी वर्सेटिलिटी है. वैज्ञानिकों ने टेस्ट किया और पाया कि यह तरीका सिर्फ मेथेनॉल तक सीमित नहीं है. इससे एथेनॉल और प्रोपेनॉल जैसे दूसरे अल्कोहल से भी हाइड्रोजन निकाली जा सकती है. इसके अलावा, बायोमास से जुड़ी चीजों जैसे ग्लूकोज, स्टार्च और सेल्युलोज से भी हाइड्रोजन बनाने में सफलता मिली है. हालांकि, अभी ग्लूकोज जैसी चीजों के साथ इसकी परफॉर्मेंस थोड़ी कम है, लेकिन भविष्य में इसे बेहतर बनाने की पूरी गुंजाइश है. यह तकनीक कचरे से ऊर्जा बनाने की दिशा में भी बड़ा कदम साबित हो सकती है।  क्या इस पूरी प्रक्रिया में कोई बड़ी चुनौती भी है? हर बड़ी खोज के साथ कुछ सवाल भी जुड़े होते हैं. मात्सुमोतो की टीम का कहना है कि वे अभी तक इस पूरी रिएक्शन के सटीक मैकेनिज्म को नहीं समझ पाए हैं. यानी यह प्रक्रिया अंदरूनी तौर पर कैसे काम करती है, इसकी बारीकियां पता लगाना बाकी है. इसके अलावा अन्य पदार्थों के साथ इसकी एफिशिएंसी को बढ़ाना भी एक चुनौती है. फिर भी, यह तकनीक इतनी सरल है कि इसे कोई भी दोहरा सकता है. प्रोफेसर मात्सुमोतो कहते हैं कि वह चाहते हैं कि बच्चे भी इसे ट्राई करें ताकि वे साइंस की तरफ आकर्षित हों।  भविष्य की क्लीन एनर्जी के लिए यह कितना बड़ा बदलाव है? हाइड्रोजन का इस्तेमाल जब ईंधन के तौर पर होता है, तो कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती. यह सिर्फ पानी की भाप छोड़ता है. अगर इस नई और सस्ती विधि को बड़े पैमाने पर लागू किया गया, तो हाइड्रोजन कार और पावर प्लांट्स को चलाना बहुत सस्ता हो जाएगा. लोहे जैसे सस्ते मेटल और रोशनी का इस्तेमाल सस्टेनेबिलिटी की दिशा में मील का पत्थर है. आने वाले समय में ऑप्टिमाइजेशन के जरिए इस तकनीक को और बेहतर बनाया जाएगा. यह खोज हमें फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम करने और ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने में बड़ी मदद दे सकती है। 

अब एथेनॉल से चलेगा चूल्हा, LPG सिलेंडर के महंगे दामों से मिलेगी आज़ादी

नई दिल्‍ली भारत में रसोई गैस (LPG) की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई में आने वाली बाधाएं अक्सर होटल, रेस्टोरेंट और बड़े संस्थानों के लिए सिरदर्द बनी रहती हैं. लेकिन अब इस संकट का एक स्वदेशी और टिकाऊ समाधान निकालने की दिशा में प्रयास तेज हो गए हैं. मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार अब कमर्शियल कुकिंग के लिए एथेनॉल (Ethanol) का इस्तेमाल करने पर गंभीरता से विचार कर रही है।  यदि यह योजना जमीन पर उतरती है तो आने वाले समय में कमर्शियल किचन से एलपीजी सिलेंडरों की निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है. लगभग 1,000 करोड़ लीटर अतिरिक्त एथेनॉल क्षमता को कुकिंग के लिए यूज में लाने की योजना है. आने वाले हफ्तों में इस पर एक विस्तृत व्हाइट पेपर अंतर-मंत्रालयी पैनल के सामने पेश किया जा सकता है।  एलपीजी से सस्‍ता है एथेनॉल एथेनॉल, खासकर हाइड्रस एथेनॉल कमर्शियल एलपीजी के मुकाबले सस्ता पड़ सकता है. इसमें लगभग 95% एथेनॉल और थोड़ा पानी होता है. इस वजह से इसे अतिरिक्त डीहाइड्रेशन प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता और इसकी लागत कम रहती है. कमर्शियल एलपीजी की कीमत लगभग ₹103 प्रति किलोग्राम है, जबकि हाइड्रस एथेनॉल करीब ₹70 प्रति किलोग्राम पड़ता है. हालांकि, एथेनॉल की कैलोरिफिक वैल्यू यानी ऊर्जा क्षमता एलपीजी से कम होती है. इसका मतलब है कि एथेनॉल की ज्यादा मात्रा की जरूरत पड़ती है।  किससे बनता है एथेनॉल? भारत में एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ना, मक्का और टूटे हुए चावल से बनता है. इसका इस्‍तेमाल एक बायोफ्यूल के रूप में किया जाता है. भारत में अब एथेनॉल युक्‍त पेट्रोल की बिक्री होती है. कुकिंग के लिए इस्तेमाल होने वाला एथेनॉल मिश्रण ईंधन वाले एथेनॉल से अलग होता है और सस्ता भी है।  क्‍या है सरकार की योजना? एक सूत्र ने बताया कि सरकार की योजना शुरुआत में व्‍यावसायिक संस्‍थानों जैसे होटल, एयरपोर्ट और रेस्टोरेंट में एथेनॉल का इस्‍तेमाल खाना बनाने में करने की है. अमेरिका ईरान-युद्ध की वजह से एलपीजी आयात बाधित हुआ है और इस वजह से घरेलू बाजार में एलपीजी की उपलब्धता कम हुई है. ऑयल मार्केटिंग कंपनियां घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दे रही हैं, जिससे होटल और रेस्टोरेंट जैसे कमर्शियल संस्थानों को कम एलपीजी की आपूर्ति हो रही है।  कमर्शियल कुकिंग के लिए एथेनॉल (Ethanol) के इस्तेमाल के प्रस्ताव को एक अंतर-मंत्रालयी पैनल के सामने रखा जाएगा. इस पैनल में पेट्रोलियम, सड़क परिवहन, भारी उद्योग और खाद्य मंत्रालय के अधिकारी शा‍मिल हैं. यही पैनल एथेनॉल से जुड़े नीतिगत फैसले लेता है. सूत्रों के अनुसार, उद्योग के प्रतिनिधियों ने ट्रायल शुरू करने और सरकार के साथ मिलकर सुरक्षा व तकनीकी मानक विकसित करने की इच्‍छा जताई है. इसके लिए एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। 

चार धाम यात्रा की शुरुआत, गंगोत्री मंदिर-यमुनोत्री मंदिर-बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलने की तारीख जानें

उत्तराखंड उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ऋषिकेश में चारधाम यात्रा- 2026 के लिए बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने श्रद्धालुओं के लिए स्वास्थ्य शिविरों का निरीक्षण किया और यात्रा को सुगम, सुरक्षित और दिव्य बनाने का संकल्प दोहराया। सरकार इस साल ग्रीन चारधाम, और प्लास्टिक मुक्त केदारनाथ पर विशेष ध्यान दे रही है। इसके तहत स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है। दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर और रोपवे जैसी सुविधाओं से यात्रा अब और भी तेज होगी। यात्रा मार्ग पर बेहतर चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। बसें रवाना सीएम पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को ऋषिकेश में चारधाम यात्रा-2026 के लिए बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने तीर्थयात्रियों के लिए लगाए गए मुफ्त स्वास्थ्य शिविर का जायजा भी लिया। मुख्यमंत्री ने देश के अलग-अलग हिस्सों से आए यात्रियों का स्वागत किया। सीएम ने कहा कि चारधाम यात्रा आस्था और साधना का रास्ता है। इस यात्रा से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा मिलती है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार यात्रा को सुरक्षित और सुगम बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। स्वच्छता और पर्यावरण पर जोर सीएम धामी ने कहा कि राज्य सरकार सुरक्षित चारधाम यात्रा के लिए पूरी तरह तैयार है। सीएम ने कहा कि उत्तराखंड के कण-कण में भगवान रहते हैं। इस पवित्रता को बचाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। सरकार ने इस साल पर्यावरण के अनुकूल यात्रा और प्लास्टिक मुक्त केदारनाथ का लक्ष्य रखा है। रास्तों पर सफाई के लिए खास इंतजाम किए गए हैं। सभी गाड़ियों में कूड़ेदान रखना जरूरी कर दिया गया है। सभी से अपील है कि जैसे हम अपने घर के मंदिर को साफ रखते हैं, वैसे ही देवभूमि को भी स्वच्छ और पवित्र रखना है। कब-कब किन धाम के खुलेंगे कपाट? बता दें कि चारधाम यात्रा के पहले दिन रविवार 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के दिन गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलेंगे। वहीं 22 अप्रैल को केदारनाथ और 23 अप्रैल को बदरीनाथ धाम के खोले जाएंगे। इसके बाद अगले महीने 23 मई को श्री हेमकुंड साहिब के कपाट खुलेंगे। इस बार चारधाम यात्रा में कई बदलाव किए गए हैं। इस बार दर्शन के दौरान भीड़ से बचने के लिए टोकन सिस्टम लागू होगा। गौरीकुंड से केदारनाथ मंदिर तक निगरानी के लिए एक कंट्रोल रूम बनाया गया है ताकि यात्रियों को कोई परेशानी ना हो। स्वास्थ्य पर भी फोकस मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में पुनर्निर्माण के काम तेजी से हो रहे हैं। गंगोत्री, यमुनोत्री और हेमकुंड साहिब में भी सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। गौरीकुंड से केदारनाथ धाम और गोविंदघाट से हेमकुंड साहिब तक के लिए रोपवे परियोजनाओं का काम भी आगे बढ़ रहा है। केदारनाथ में मेडिकल अस्पताल तैयार हो गया है। बद्रीनाथ में 50 बेड का अस्पताल जून तक तैयार हो जाएगा। यात्रा मार्ग पर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं की गई है।

धरती कांपी जापान में: भूकंप के झटकों से हड़कंप, सनाए ताकाइची ने जारी किया अलर्ट संदेश

टोक्यो जापान के नागानो प्रांत में शनिवार को 5.0 तीव्रता का भूकंप आया, जिसका केंद्र 10 किलोमीटर गहराई में था। ओमाची शहर में सबसे तेज झटके महसूस हुए। जापान के उत्तरी नागानो प्रांत में शनिवार को भूकंप के जोरदार झटके महसूस किए गए। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी के मुताबिक, स्थानीय समय के अनुसार दोपहर 1:20 बजे यह भूकंप आया। रिक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता 5.0 मापी गई। प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने इस प्राकृतिक आपदा पर तुरंत संज्ञान लिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा कि भूकंप का केंद्र उत्तरी नागानो में था। ओमाची शहर में सबसे ज्यादा असर देखा गया। प्रधानमंत्री ने स्थिति को संभालने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के संकट प्रबंधन केंद्र में एक विशेष संपर्क कक्ष स्थापित किया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे नुकसान का जल्द से जल्द पता लगाएं और जनता तक सटीक जानकारी पहुंचाएं। प्रधानमंत्री ने प्रभावित इलाकों के लोगों से सतर्क रहने की अपील की है। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले समय में भी इसी तरह की तीव्रता वाले झटके महसूस हो सकते हैं। मौसम विभाग ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल इस भूकंप से सुनामी आने का कोई खतरा नहीं है। भूकंप का केंद्र जमीन के अंदर 10 किलोमीटर की गहराई पर स्थित था।   कई शहरों में भूकंप का असर अलग-अलग रहा। ओमाची शहर में तीव्रता पांच (ऊपरी स्तर) और नागानो शहर में तीव्रता पांच (निचली स्तर) दर्ज हुई। ओगावा गांव में तीव्रता चार और मात्सुमोतो शहर में तीव्रता तीन रही। पहले झटके के लगभग दो घंटे बाद, दोपहर 3:30 बजे ओमाची में एक और भूकंप आया, जिसकी तीव्रता ती थी। सुरक्षा के लिहाज से परमाणु संयंत्रों की भी जांच की गई। टोक्यो इलेक्ट्रिक पावर कंपनी ने बताया कि पड़ोसी निगाटा प्रांत में स्थित काशीवाजाकी-कारीवा न्यूक्लियर पावर प्लांट पूरी तरह सुरक्षित है। वहां किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं मिली है। स्थानीय प्रशासन ने इलाके में ऐसे ही भूकंप आने की चेतावनी दी है और लोगों से सावधान रहने को कहा है।

अमेरिका का बड़ा यूटर्न: भारत को मिलेगा रूस से सस्ता तेल, ट्रंप प्रशासन का नया निर्णय

नई दिल्ली  रूसी तेल पर भारत को सुबह-सुबह खुशखबरी मिली है. पश्चिम एशिया संघर्ष और ईंधन संकट के बीच अमेरिका ने बड़ा यूटर्न लिया है. अमेरिका ने रूसी तेल पर वह ऐलान किया है, जिसका भारत को बंपर फायदा मिलेगा. अमेरिका ने अब उस तेल वाले छूट को रिन्यू करने का फैसला किया है, जिससे भारत को रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिलती है. जी हां, अमेरिका ने घोषणा की है कि वह उन देशों को रूसी तेल खरीदने की अनुमति देने वाली प्रतिबंधों में छूट को आगे बढ़ाएगा, जिसका मकसद ईरान युद्ध के कारण आपूर्ति में आई कमी को दूर करना था. बता दें कि बीते दिनों ही अमेरिका के वित्त मंत्री ने कहा था कि अमेरिका अब रूसी तेल वाली छूट को आगे नहीं बढ़ाएगा।  रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री की अनुमति देने वाली प्रतिबंधों से छूट को बढ़ा दिया है. यह छूट एक महीने के लिए बढ़ाई गई है. यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के कारण बने दबाव को कम किया जा सके. पहले अमेरिका ने रूसी तेल पर मिली छूट को बढ़ाने से इनकार कर दिया था. अमेरिका का यह फैसला केवल उन रूसी तेल को लेकर है, जो समंदर में जहाज पर मौजूद हैं।  अमेरिकी वित्त विभाग का नया फैसला अमेरिकी वित्त विभाग ने शुक्रवार देर रात एक नया लाइसेंस वाला आदेश जारी किया. इसमें देशों को 17 अप्रैल से 16 मई के बीच जहाजों पर लदे रूसी तेल को खरीदने की अनुमति दी गई है. यह कदम पहले जारी 30 दिन की छूट की जगह लेता है, जो 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी. अमेरिका के इस फैसले से भारत को अब फायदा ही फायदा है।  अमेरिका के लिए यह यूटर्न क्यों अमेरिका का फैसला उस फैसले से उलट है, जो इसी हफ्ते की शुरुआत में वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने लिया था. अमेरिकी वित्त मंत्री बेसेंट ने बीते दिनों कहा था कि अमेरिका रूसी तेल वाली इस राहत को आगे बढ़ाएगा. ट्रंप प्रशासन का रूसी तेल वाला यह छूट अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के कारण प्रभावित ऊर्जा बाजारों को स्थिर करने के प्रयासों का हिस्सा है. हालांकि, अमेरिका का यह फैसला केवल रूसी तेल को लेकर है. ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया के तेल इस लाइसेंस वाले आदेश से बाहर हैं।  रूसी तेल पर अभी और छूट मिलेगी? ब्रेट एरिक्सन ने कहा, ‘ईरान-अमेरिका संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को स्थायी नुकसान पहुंचाया है और उन्हें स्थिर करने के लिए उपलब्ध उपाय लगभग खत्म हो चुके हैं.’ उन्होंने यह भी जोड़ा कि आगे और छूट दी जा सकती है. वहीं, बेसेंट ने बताया कि इससे पहले मार्च में जारी एक अलग छूट के तहत लगभग 14 करोड़ बैरल ईरानी तेल वैश्विक बाजारों तक पहुंचा था, जिससे संघर्ष के दौरान आपूर्ति पर बने दबाव को कम करने में मदद मिली थी।  भारत को कितना फायदा? यहां ध्यान देने वाली बात है कि भारत भी प्रतिबंधों में छूट का एक बड़ा लाभार्थी है. यूं कहिए तो बड़ा लाभार्थी. अमेरिकी छूट मिलने के बाद भारत ने बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीदे थे. ट्रंप प्रशासन के इस छूट वाले फैसले की अमेरिकी नेताओं ने आलोचना की थी कि इससे मास्को और तेहरान पर वित्तीय दबाव कम हो रहा है. सरकारी अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ने रूसी तेल पर अमेरिकी छूट लागू होने के बाद रूस से करीब 3 करोड़ बैरल तेल का ऑर्डर दिया था. अब नए फैसले का मतलब है कि भारत अभी आगे भी रूस से सस्ता तेल खरीदता रहेगा।