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हरिवंश को फिर मिला राज्यसभा उपसभापति का कार्यकाल, इस बार राष्ट्रपति ने किया मनोनयन

 नई दिल्ली राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का बतौर सदस्य कार्यकाल आज यानी 10 अप्रैल को समाप्त हो रहा है. रिक्त हो रही सीट के लिए निर्वाचन की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है. हरिवंश की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने इस बार उनको राज्यसभा नहीं भेजा था. हरिवंश की उच्च सदन से विदाई तय मानी जा रही थी, लेकिन ऐन मौके पर उनको एक और कार्यकाल का तोहफा मिल गया है।  हरिवंश को राष्ट्रपति ने अपने कोटे से राज्यसभा सांसद मनोनीत कर दिया है. इस संबंध में गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया है. राष्ट्रपति कोटे से मनोनयन के बाद अब यह तय हो गया है कि अगले छह साल तक उच्च सदन में हरिवंश की आवाज अभी गूंजती रहेगी. हरिवंश का राज्यसभा सदस्य के रूप में यह तीसरा कार्यकाल होगा।  गृह मंत्रालय की ओर से जारी गजट नोटिफिकेशन में कहा गया है कि राष्ट्रपति एक नामित सदस्य की सेवानिवृत्ति के कारण हुई रिक्ति को भरने के लिए राज्यसभा में हरिवंश को नामित करती हैं. गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत कर सकती हैं।  साहित्य, कला, विज्ञान और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले प्रतिष्ठित व्यक्तियों को मनोनीत किए जाने का प्रावधान संविधान में है. मनोनीत सदस्यों का कार्यकाल भी निर्वाचित सदस्यों की ही तरह छह साल का होता है. बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले हरिवंश पेशे से पत्रकार रहे हैं।  उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के जयप्रकाश नगर निवासी हरिवंश अप्रैल, 2014 में पहली बार राज्यसभा सांसद निर्वाचित हुए थे. तब उनको जेडीयू ने ही उच्च सदन में भेजा था. जेडीयू ने हरिवंश को लगातार दो बार राज्यसभा भेजा, लेकिन पार्टी ने तीसरा कार्यकाल नहीं दिया था. इसके बाद उच्च सदन में उनकी संसदीय पारी खत्म मानी जा रही थी, लेकिन ऐन वक्त पर सरकार ने राष्ट्रपति के कोटे से उनको मनोनीत करा दिया।  हरिवंश साल 2018 में 9 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति निर्वाचित हुए थे. 14 सितंबर 2020 को उन्हें लगातार दूसरी बार उच्च सदन का उपसभापति चुना गया था. अब उनको उच्च सदन में तीसरा कार्यकाल भी मिल गया है, ऐसे में क्या उनको लगातार तीसरी बार उपसभापति भी चुना जाएगा? अब नजरें इस पर हैं। 

रूस की 40% सस्ती LNG से भारत में ऊर्जा लागत और महंगाई कम हो सकती है

नई दिल्ली Russian Gas: रूस द्वारा 40% सस्ती LNG से भारत में एनर्जी कॉस्ट और महंगाई कम हो सकती है। हालांकि, इसके साथ अंतरराष्ट्रीय दबाव और कूटनीतिक जोखिम भी जुड़े हुए हैं। आइए जरा विस्तार से रशियन गैस (Russian Gas) के फायदे और नुकसान को समझते हैं।  दुनिया में इस वक्त एनर्जी की समस्या अपने चरम पर है। इसके बीच रूस (Russia) से एक बड़ी खुशखबरी आ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, रूस ने एशियाई देशों को सस्ती गैस (Russian Gas) का बड़ा ऑफर दिया है, जिसने बाजार में नई हलचल पैदा कर दी है। रूस अपनी प्रतिबंधित एलएनजी (Liquefied Natural Gas- LNG) सप्लाई को करीब 40% तक की भारी छूट पर बेचने की कोशिश कर रहा है, खासकर भारत और दक्षिण एशिया जैसे देशों को, जहां ऊर्जा की भारी मांग और खपत है। यह ऑफर ऐसे समय आया है, जब स्टेट ऑफ हार्मुज (Strait of Hormuz) में तनाव और कतर (Qatar) के एलएनजी प्लांट पर हमलों के कारण वैश्विक गैस सप्लाई का करीब 20% प्रभावित हुआ है, जिससे कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस इस मौके का फायदा उठाते हुए अपनी गैस को सस्ते दाम पर बेचकर नए खरीदार तलाश रहा है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ बिचौलियों के जरिए यह भी दावा किया जा रहा है कि कागजी तौर पर इन शिपमेंट्स को ओमान या नाइजीरिया जैसे देशों से आया दिखाया जा सकता है, ताकि प्रतिबंधों से बचा जा सके। हालांकि, इस तरह के ऑफर में कानूनी और कूटनीतिक जोखिम भी जुड़े हुए हैं। भारत और बांग्लादेश जैसे देशों पर इस संकट का सीधा असर पड़ा है। भारत (India) को अपनी एनर्जी जरूरतों को पूरा करने के लिए महंगे स्पॉट मार्केट से गैस खरीदनी पड़ रही है, जबकि बांग्लादेश को तो अपनी उर्वरक (fertilizer) सेक्टर में गैस सप्लाई तक कम करनी पड़ी है। ऐसे में रूस का सस्ता ऑफर इन देशों के लिए आकर्षक जरूर है, लेकिन वे अमेरिकी प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव को देखते हुए सतर्क रुख अपना रहे हैं। रूस के लिए यह रणनीति अपने निर्यात को बढ़ाने और नए बाजार बनाने का एक तरीका है, खासकर तब जब पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण उसके रेगुलर बॉयर कम हो गए हैं। फिलहाल चीन (China) ही एक बड़ा देश है, जो इस तरह की प्रतिबंधित गैस खरीद रहा है, जबकि बाकी देश अभी दूरी बनाए हुए हैं। अगर भारत (India) रूस से यह सस्ती LNG गैस खरीदता है, तो इसका असर कई स्तरों पर देखने को मिल सकता है। इस फैसले से कुछ फायदे भी होंगे और कुछ जोखिम भी हो सकता है। फायदे की बात करें तो इसका सबसे बड़ा फायदा सीधे तौर पर आम जनता और इंडस्ट्री को मिल सकता है। गैस 40% तक सस्ती हो सकती है और देश की ऊर्जा लागत घट सकती है, जिससे बिजली उत्पादन, उर्वरक (fertilizer) और सीएनजी/पीएनजी की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इससे महंगाई को काबू करने में भी मदद मिलेगी और सरकार के सब्सिडी खर्च में राहत मिल सकती है। खासकर गैस आधारित उद्योगों और बिजली कंपनियों के लिए यह बड़ी राहत साबित हो सकती है। हालांकि, इसके साथ बड़ा जोखिम भी जुड़ा है। रूस की यह गैस अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आती है, इसलिए अगर भारत इस तरह की खरीद करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव या संभावित प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इससे भारत के पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका के साथ संबंध प्रभावित हो सकते हैं।  

तेल संकट का समाधान: मोदी सरकार ने अरुणाचल को बनाया भारत का नया ‘ऑयल फील्ड

नई दिल्ली ईरान जंग की वजह से दुन‍िया में तेल गैस का गंभीर संकट है. अभी तो सीजफायर हो गया है, लेकिन कब यह इलाका फ‍िर आग की चपेट में आ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. इसल‍िए मोदी सरकार ने अभी से ऐसी तैयारी शुरू कर दी है क‍ि तेल गैस का संकट ही नहीं रहेगा. सरकार ने अरुणाचल प्रदेश में दो बड़े हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देकर साफ कर दिया है कि भारत अब तेल के लिए खाड़ी देशों का मोहताज नहीं रहेगा. जान‍िए कैसे ये प्रोजेक्ट्स चीन की नाक के नीचे नॉर्थ-ईस्ट की किस्मत बदल देंगे।  जिस वक्त पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सीजफायर के बाद ईरान होर्मुज का ताला खोलता है या नहीं, या तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाती हैं या नहीं, ठीक उसी वक्त मोदी कैबिनेट ने एक बहुत बड़ा फैसला ल‍िया है. सरकार ने देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के ल‍िए मिशन मोड पर काम शुरू कर द‍िया है. बुधवार को केंद्रीय कैब‍िनेट ने अरुणाचल प्रदेश में जिन दो प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली दी, वे भारत को खाड़ी देशों के तेल पर निर्भरता कम करने और ग्रीन एनर्जी की तरफ बढ़ने में मदद करेंगे।  40,000 करोड़ का एनर्जी गिफ्ट     1200 मेगावाट का कालाई-II प्रोजेक्ट: अरुणाचल प्रदेश के अंजा जिले में बनने वाला यह प्रोजेक्ट लोहित बेसिन में पहला बड़ा हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट है.इस पर 14,105.83 करोड़ का खर्च आएगा. जब यह बनकर तैयार हो जाएगा तो इससे हर साल 4852.95 मिलियन यूनिट ब‍िजली का प्रोडक्‍शन होगा. यह THDC इंडिया लिमिटेड और अरुणाचल प्रदेश सरकार का जॉइंट वेंचर होगा, जिसे भारत सरकार की तरफ से फाइनेंशियल सपोर्ट मिलेगा. यह प्रोजेक्ट न केवल अरुणाचल में बिजली की सप्लाई सुधारेगा, बल्कि पीक डिमांड को मैनेज करने और नेशनल ग्रिड को बैलेंस करने में बहुत बड़ा योगदान देगा।     1720 मेगावाट का कमला प्रोजेक्ट: यह अरुणाचल प्रदेश का दूसरा बड़ा तोहफा है. इस प्रोजेक्ट की ताकत कालाई-II से भी ज्यादा है, जिससे पूरा क्षेत्र रोशनी से नहा उठेगा. जब ये दोनों प्रोजेक्ट्स अपनी पूरी क्षमता पर काम करेंगे, तो अरुणाचल प्रदेश भारत के लिए ‘बिजली का पावरहाउस’ बन जाएगा।  अरुणाचल बनेगा पावरहाउस और रोज़गार का हब मोदी सरकार का यह फैसला सिर्फ बिजली बनाने के लिए नहीं है, बल्कि यह नॉर्थ-ईस्ट के लोगों की साख और सम्मान से भी जुड़ा है. इन प्रोजेक्ट्स को बनाने और चलाने में हजारों लोगों की जरूरत होगी. बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार मिलेगा. इन प्रोजेक्ट्स तक पहुंचने के लिए अरुणाचल में लगभग 29 किलोमीटर की नई सड़कें और पुल बनाए जाएंगे. इससे पूरा इलाका मेनस्ट्रीम से जुड़ जाएगा. इन प्रोजेक्ट्स के शुरू होने से अरुणाचल प्रदेश को 12% बिजली बिल्कुल मुफ्त मिलेगी. इसके अलावा, एक अतिरिक्त 1% बिजली लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड के लिए रिजर्व होगी, जिससे स्थानीय स्कूलों, अस्पतालों और सड़कों का विकास होगा।  चीन की नाक के नीचे विकास का ‘डंका’ इस प्रोजेक्‍ट के पीछे एक बहुत बड़ी जियो-पॉलिटिकल ड‍िप्‍लोमेसी भी छिपी है. जिस इलाके में ये प्रोजेक्ट्स बन रहे हैं, उस पर चीन अक्सर अपनी नजरें गड़ाता रहता है. ऐसे संवेदनशील इलाके में ₹40,000 करोड़ का निवेश करना और हाइड्रो पावर के जरिए पानी पर अपना कंट्रोल मजबूत करना चीन के लिए एक बड़ा संदेश है. मोदी सरकार ने यह साफ कर दिया है कि नॉर्थ-ईस्ट भारत का अभिन्न हिस्सा है और यहां विकास की गति अब रुकने वाली नहीं है. यह एक्ट ईस्ट पॉलिसी का एक जबरदस्त उदाहरण है। 

EPFO 3.0 में होंगे ये अहम बदलाव: फटाफट विड्रॉल, UPI और पेंशन सुविधाएं

 नई दिल्‍ली अक्‍सर ईपीएफओ सर्विसेज को लेकर कर्मचारियों की शिकायत देखी गई है कि उन्‍हें क्‍लेम करने में देरी होती है, ज्‍यादा पेपरवर्क और कंपनी के ऊपर ज्‍यादा निर्भरता रहती है. इन्‍हीं सभी परेशानियों को दूर करने के लिए सरकार EPFO 3.0 लेकर आ रही है, जो जल्‍द ही लॉन्‍च हो सकता है, जिसके बाद PF का एक्‍सेस पूरी तरह से आसान हो जाएगा।  आपका क्‍लेम फटाफट सेटल होगा, पेपरवर्क बहुत कम हो जाएगा और नियोक्‍ता पर निर्भरता भी घट जाएगी. आप आसानी से ATM और UPI की मदद से पैसे की निकासी कर सकते हैं. EPFO 3.0 खासतौर पर कर्मचारी भविष्‍य निधि संगठन के सिस्‍टम का एक डिजिटल अपडेट है, जो मैन्‍युअल काम को कम करने और लाखों कस्‍टमर्स के लिए सर्विस डिस्‍ट्रीब्‍यूशन में सुधार करने के लिए डिजाइन किया गया है. आने वाले महीनों में इसको पूरी तरह से चालू किया जा सकता है, जिसमें से कई सुविधाएं पहले ही शुरू की जा चुकी हैं और अन्‍य पर काम चल रहा है।  फटाफट होगा क्‍लेम सेटलमेंट  सबसे बड़े बदलावों में से एक दावा क्‍लेम सेटलमेंट को लेकर है. ईपीएफओ ने दावों के ऑटो सेटलमेंट का विस्तार किया है और इसकी सीमा बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दी है. विड्रॉल रिक्‍वेस्‍ट का एक बड़ा हिस्‍सा अब ऑटोमैटिक रूप से अप्रूव किया जा रहा है, जिससे समय की बचत हो रही है और मैन्‍युअल अप्रूवल की आवश्‍यकता कम हो रही है।  इस बदलाव से नियोक्‍ताओं पर निर्भरता भी कम हो रही है. पहले नौकरी बदलने पर PF अकाउंट में पैसा ट्रांसफर के लिए अक्‍सर कंपनी के अपूवल की आवश्‍यकता होती थी, जिससे देरी होती थी. नए सिस्‍टम के तहत KYC अनुपालन वाले अकाउंट्स के लिए ऐसे कई ट्रांसफर ऑटोमैटिक तरीके से किए जा रहे हैं, जिससे कर्मचारियों को अपने फंड को आसानी से ट्रांसफर करने की सुविधा मिल रही है।  UPI से विड्रॉल नए डेवलपमेंट के तहत एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण सुविधा डिजिटल पेमेंट सिस्‍ट के माध्‍यम से पीएफ निकालने की क्षमता है. ईपीएफओ यूपीआई के माध्‍यम से विड्रॉल को सक्षम करने पर काम कर रहा है, जिससे मौजूदा प्रॉसेस की तुलना में पैसा सीधे बैंक अकाउंट में बहुत तेजी से जमा को सकेगी।  इसके साथ ही क्‍लेम फाइल करने, ट्रैक करने और निकासी जैसी सेवाओं को सुव्‍यवस्थित करने के लिए एक नया मोबाइल ऐप पेश किए जाने की उम्‍मीद है, जिससे फिजिकल पेपरवर्क या ऑफिस जाने की आवश्‍यकता और भी कम हो जाएगी।  यूनिफाइड पेंशन सिस्‍टम  ईपीएफओ 3.0 के तहत पेंशन सिस्‍टम को भी यूनिफाइड किया जा रहा है. लाभार्थियों के लिए पेंशन का तेजी से और ज्‍यादा समान वितरण सुनिश्चित करने के उद्देश्‍य से यूनिफाइड पेंशन पेमेंट सिस्टम पहले ही सभी कार्यालयों में लागू की जा चुकी है. पीएफ बचत तक पहुंच में देरी, तकनीकी गड़बड़ियों और प्रशासनिक अड़चनों को लेकर सालों से मिल रही शिकायतों के बाद सुधार की मांग उठाई गई है।  ऑटोमैटिक और डिजिटल वेरिफिकेशन की ओर बढ़ते हुए, सरकार इस सिस्‍टम को पारंपरिक नौकरशाही के बजाय बैंकिंग प्लेटफॉर्म की तरह कार्य करने का प्रयास कर रही है. हालांकि, अभी सभी सुविधाएं पूरी तरह से चालू नहीं हुई हैं. UPI बेस्‍ड विड्रॉल जैसी सर्विस और नए डिजिटल इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के कुछ हिस्से अभी भी शुरू किए जा रहे हैं, और सिस्टम अभी भी बदलाव के दौर में है।  सैलरी कर्मचारियों के लिए, इन बदलावों का मतलब इमरजेंसी के दौरान पैसे तक तुरंत पहुंच, नौकरी बदलते समय खातों में पैसा ट्रांसफर की सुगमता और नियोक्ताओं या मध्यस्थों पर कम निर्भरता हो सकती है. साथ ही आसान पहुंच से पीएफ के यूज के तरीके में भी बदलाव आ सकता है, क्‍योंकि यह चिंता बनी हुई है कि बार-बार विड्रॉल से लॉन्गटर्म रिटायरमेंट सेविंग प्रभावित हो सकती है। 

भारत का ‘त्रिदेव’ है S-400 और THAAD का मुकाबला, 10,000 KMPH की रफ्तार से अटैक, पलक झपकते ही नष्ट

नई दिल्ली ईरान जंग ने पूरी दुनिया को एक बार फिर से हथियारों की रेस में धकेल दिया है. यूरोप से लेकर चीन, भारत समेत तमाम देश अपनी क्षमताओं के अनुसार डिफेंस सिस्‍टम को अपग्रेड करने में जुटा है. मॉडर्न वॉरफेयर में फाइटर जेट, मिसाइल और ड्रोन की भूमिका बेहद अहम हो चुकी है. ईरान की कम लागत वाली शाहेद ड्रोन ने अमेरिका और इजरायल को गहरे जख्‍म दिए हैं. वहीं, अमेरिका-इजरायल की घातक मिसाइलों ने ईरान को तबाही की दहलीज पर ला खड़ा किया है. इसमें एक बात सबसे अहम है – अमेरिका, इजरायल और ईरान एक-दूसरे की जमीन पर गए बिना ही तबाही लाई है. विध्‍वंस की ऐसी लकीर खींच दी गई है, जिससे पूरी दुनिया में डर और भय का आलम है. यही वजह है कि अब यूरोप के साथ ही जापान जैसे देश भी अपनी सुरक्षा को लेकर फ‍िक्रमंद हो गए हैं. नई टेक्‍नोलॉजी की मदद से कट‍िंग एज वेपन सिस्‍टम डेवलप करने में अरबों डॉलर का इन्‍वेस्‍टमेंट करने की योजना बनाई जा रही है. भारत भी इस रेस में पीछे नहीं रहना चाहता है. नेशनल एयर डिफेंस सिस्‍टम प्रोजेक्‍ट मिशन सुदर्शन चक्र पर काम शुरू हो चुका है. इसके साथ ही एक और डिफेंस प्रोजेक्‍ट पर काम चल रहा है. इसके पूरा होने पर एक ऐसा सिस्‍टम डेवलप होगा, जिसके प्रहार के सामने S-400, THAAD, HQ-9B और आयरन डोम जैसे अत्‍याधुनिक वायु रक्षा प्रणाली भी पस्‍त हो जाएंगे. इस हाइपरसोनिक सिस्‍टम में 3 मिसाइलें होंगी, जिससे हवा, पानी और आसमान अभेद्य क‍िला बन जाएगा. भारत के इस ‘त्रिदेव’ के सामने चीन-पाकिस्‍तान जैसे देशों की हालत खराब होनी तय है । जानकारी के अनुसार, भारत की हाइपरसोनिक तकनीक को लेकर महत्वाकांक्षा अब केवल भविष्य की योजना नहीं रही, बल्कि तेजी से वर्तमान सैन्य क्षमता में बदलती दिखाई दे रही है. देश एक बहुस्तरीय (मल्टीलेयर) हाइपरसोनिक स्ट्राइक नेटवर्क विकसित कर रहा है, जो परमाणु प्रतिरोध (Nuclear Detterent), समुद्री प्रभुत्व और अत्यधिक सटीक हमलों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है. ‘डिफेंस डॉट इन’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस रणनीतिक बदलाव के केंद्र में तीन अत्याधुनिक और आपस में जुड़े वेपन सिस्टम हैं – ध्वनि हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (Dhvani HGV), लॉन्ग-रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (LR-AShM) और एक्सटेंडेड ट्रैजेक्टरी लॉन्ग ड्यूरेशन हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल (ET-LDHCM). ये तीनों मिलकर भारत की सैन्य ताकत को नई ऊंचाई देने की दिशा में काम कर रहे हैं । ध्‍वनि हाइपरसोनिक ग्‍लाइड व्‍हीकल ध्वनि हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल भारत के लिए एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है. यह लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम है और परमाणु पेलोड ले जाने की क्षमता रखता है. इसकी रफ्तार मैक-5 से कहीं अधिक बताई जा रही है और इसकी रेंज करीब 10,000 किलोमीटर तक हो सकती है. खास बात यह है कि यह ऊपरी वायुमंडल (upper atmosphere) में अनियमित रास्तों पर ग्लाइड करता है, जिससे इसे ट्रैक और इंटरसेप्ट करना बेहद मुश्किल हो जाता है. वर्ष 2026 के दौरान इसके ट्रायल में हीट-रेजिस्टेंट मैटेरियल, टार्गेटिंग सॉफ्टवेयर और अंतिम चरण की नेविगेशन सिस्‍टम की विश्वसनीयता पर फोकस किया जा रहा है । लॉन्ग-रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल दूसरी ओर, LR-AShM भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए तैयार की जा रही है. लगभग 1,500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली यह मिसाइल चलती मोबाइल नेवी वॉरशिप के साथ-साथ जमीन पर मौजूद लक्ष्यों को भी निशाना बना सकती है. इसका मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में विरोधियों की गतिविधियों को सीमित करना है. इस मिसाइल की खासियत यह है कि इसमें पूरी तरह स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक्स और सेंसर का उपयोग किया गया है, जिससे विदेशी निर्भरता समाप्त होती है. इसके भूमि, समुद्र और हवा से लॉन्च किए जाने वाले संस्करण विकसित किए जा रहे हैं, जो इसे एक व्यावहारिक युद्धक हथियार बनाते हैं। एक्सटेंडेड ट्रैजेक्टरी लॉन्ग ड्यूरेशन हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल ET-LDHCM इस हाइपरसोनिक ट्राएंगल का तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो क्रूज मिसाइल और ग्लाइड व्हीकल के बीच की कड़ी का काम करता है. वर्ष 2025 में इसके महत्वपूर्ण परीक्षण किए गए थे. यह मिसाइल मैक-8 (तकरीबन 10 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार) से अधिक की गति से उड़ान भर सकती है और 1,500 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर सकती है. इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी लचीलापन (वर्सेटिलिटी) है. यह उड़ान के दौरान अपना रास्ता बदल सकती है और इसे हवाई जहाज, नौसैनिक जहाज या जमीन से लॉन्च किया जा सकता है. यह उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों को भेदने में सक्षम मानी जा रही है। हाइपरसोनिक मिसाइल क्या होती है? हाइपरसोनिक मिसाइल ऐसी उन्नत हथियार प्रणाली है, जो ध्वनि की गति (मैक 1) से कम से कम पांच गुना यानी मैक 5 या उससे अधिक रफ्तार से उड़ती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी अत्यधिक गति, सटीकता और रास्ता बदलने की क्षमता है, जिससे इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है। यह पारंपरिक बैलिस्टिक या क्रूज मिसाइलों से कैसे अलग है? बैलिस्टिक मिसाइलें तय प्रक्षेपवक्र (trajectory) में ऊपर जाकर गिरती हैं, जबकि क्रूज मिसाइलें कम ऊंचाई पर उड़ती हैं लेकिन उनकी गति अपेक्षाकृत कम होती है. हाइपरसोनिक मिसाइल इन दोनों का संयोजन मानी जाती है—यह बहुत तेज होती है और उड़ान के दौरान दिशा बदल सकती है, जिससे दुश्मन की एयर डिफेंस प्रणाली इसे ट्रैक करना मुश्किल पाती है। हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी के प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं? मुख्य रूप से दो प्रकार होते हैं – हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV), जिसे रॉकेट से ऊंचाई पर ले जाकर छोड़ा जाता है, जहां से यह ग्लाइड करते हुए लक्ष्य तक पहुंचता है. दूसरा, हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल (HCM) जो स्क्रैमजेट इंजन से संचालित होती है और पूरे रास्ते हाइपरसोनिक स्‍पीड बनाए रखती है। दुनिया में किन देशों के पास यह तकनीक है? इस क्षेत्र में अमेरिका, रूस और चीन सबसे आगे माने जाते हैं. रूस ने ‘किंजल’ और ‘अवांगार्ड’ जैसे सिस्टम तैनात किए हैं, जबकि चीन ने भी कई सफल परीक्षण किए हैं. अमेरिका भी इस टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम कर रहा है। भारत की स्थिति क्या है? भारत भी हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी में तेजी से प्रगति कर रहा है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) का सफल परीक्षण किया है. इसके अलावा, लंबी दूरी की हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों पर भी काम जारी … Read more

भारत की अर्थव्यवस्था पर विश्वास: FY27 के लिए GDP ग्रोथ अनुमान बढ़कर 6.6%, मॉर्गन स्टेनली से विश्व बैंक तक

नई दिल्ली विश्व बैंक ने भारत की आर्थिक ताकत पर भरोसा जताया है। उसने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत का विकास अनुमान 6.3 फीसदी से बढ़ाकर 6.6 फीसदी कर दिया है। यह संशोधन ऐसे समय हुआ, जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता का माहौल है। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाओं में भारत सबसे मजबूत स्थान पर है। जहां पूरे क्षेत्र की विकास दर धीमी पड़ रही है, वहीं भारत इस क्षेत्र के लिए स्थिरता और वृद्धि का प्रमुख इंजन बना हुआ है।  रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया की कुल विकास दर 2025 में 7 फीसदी से घटकर 2026 में 6.3 फीसदी रहने का अनुमान है। इस गिरावट के पीछे मुख्य कारण पश्चिम एशिया संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता है, जिसने आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डाला है। यदि वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो इससे महंगाई में वृद्धि हो सकती है और केंद्रीय बैंकों को सख्त नीतियां अपनानी पड़ सकती हैं। हालांकि, वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता चिंता का विषय बनी हुई है। खासकर मध्य-पूर्व में चल रहे तनाव और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। इससे आम लोगों की खर्च करने की क्षमता प्रभावित होने की आशंका है। इसके अलावा, कच्चे माल की लागत बढ़ने और वैश्विक मांग कमजोर रहने के कारण निवेश की गति भी धीमी पड़ सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजारों में धीमी आर्थिक वृद्धि का असर भारत के निर्यात पर पड़ सकता है। हालांकि, इन बाजारों तक बेहतर पहुंच के बावजूद कुल निर्यात प्रदर्शन पर दबाव रह सकता है। अन्य संस्थानों के अनुमानों से तुलना करें तो भारतीय रिजर्व बैंक ने FY27 के लिए 6.9 प्रतिशत, OECD ने 6.1 प्रतिशत और मूडीज ने 6 प्रतिशत ग्रोथ का अनुमान लगाया है। इस लिहाज से विश्व बैंक का अनुमान संतुलित माना जा रहा है। घरेलू मांग है भारत की ताकत विश्व बैंक के मुताबिक, भारत वैश्विक चुनौतियों के बावजूद मजबूत स्थिति में है। 2025-26 में देश की विकास दर 7.6 फीसदी रहने का अनुमान है, जो इस वित्त वर्ष में घटकर 6.6 फीसदी हो सकती है। मजबूत घरेलू मांग भारत की अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने में अहम भूमिका निभा रही है।  मॉर्गन स्टेनली का अनुमान वैश्विक संगठन मॉर्गन स्टेनली ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी में वृद्धि के अनुमान को प्रतिशत 0.30 अंक घटाकर 6.2 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले संगठन ने 6.5 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान लगाया था। मॉर्गन स्टेनली का अनुमान है कि 2026-27 में कच्चे तेल की औसत कीमत 95 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहेगी तथा गैस की उपलब्धता एक अतिरिक्त बाधा होगी। मॉर्गन स्टेनली की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि ईंधन की बढ़ती कीमत और औद्योगिक आपूर्ति में कमी से उत्पादन के संसाधनों की लागत बढ़ रही हैं और चुनिंदा वस्तुओं के उत्पादन में कटौती करनी पड़ रही है। रुपये की कमजोरी के बीच आयातित महंगाई बढ़ रही है। इसके अलावा, रेटिंग एजेंसी इक्रा ने अनुमान लगाया है कि ऊर्जा की ऊंची कीमतों के प्रतिकूल प्रभाव के कारण वित्त वर्ष 2026- 27 में भारत की वृद्धि धीमी होकर 6.5 प्रतिशत रह सकती है। मूडीज रेटिंग्स ने क्या कहा? बीते दिनों मूडीज रेटिंग्स ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान को 6.8 प्रतिशत से घटाकर छह प्रतिशत कर दिया है। रेटिंग एजेंसी ने कहा है कि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण भारत की वृद्धि की रफ्तार घटेगी और इससे महंगाई का जोखिम भी बढ़ेगा।

पेट्रोल-डीजल की जगह इस फ्यूल पर आ रहे हैं लोग, अब देश में हर चौथी कार इस पर दौड़ रही है

 नई दिल्ली कार बाजार में गेम बदल चुका है. पहले पूछते थे “कितना देती है”, अब पूछते हैं “कितना बचाती है”. और इस सवाल का सीधा जवाब बनकर सामने आई है CNG. पेट्रोल अभी भी टॉप पर है, लेकिन CNG ने नीचे से तेज चढ़ाई की है. हालत ये है कि देश में बिकने वाली हर चौथी कार अब CNG पर दौड़ रही है. महंगे होते पेट्रोल-डीजल ने कार खरीदारी का गणित बदल दिया है. अब कार खरीदना सिर्फ शौक नहीं, पूरा हिसाब-किताब है. और इस हिसाब में CNG सबसे फिट बैठती नज़र आ रही है, कम से बीते फाइनेंशियल ईयर (FY2026) के बिक्री के आंकड़े तो यही कह रहे हैं।  फेडरेशन ऑफ़ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशंस (FADA) के अनुसार देश भर में वित्तीय वर्ष-26 में रिकॉर्डतोड़ वाहनों की बिक्री हुई है. पूरे साल का आंकड़ा 3 करोड़ यूनिट के करीब पहुंच गया है. इस दौरान देश भर में कुल 2,96,71,064 यूनिट वाहन बिके हैं. जिसमें 47,05,056 पैसेंजर व्हीकल शामिल हैं. इन पैसेंजर व्हीकल्स में तकरीबन 10.34 लाख CNG कारें थीं. यानी अब देश में बिकने वाली हर चार में से एक कार CNG पर चलती है. तीन साल पहले CNG की हिस्सेदारी जहां 12-13 प्रतिशत थी, वहीं अब यह करीब 22 प्रतिशत तक पहुंच गई है।  CNG का मार्केट शेयर फाइनेंशियल ईयर में भारत के पैसेंजर व्हीकल मार्केट में CNG की हिस्सेदारी बढ़कर 21.98 प्रतिशत हो गई, जो पिछले साल 19.60 प्रतिशत थी. वहीं डीजल की हिस्सेदारी 18.08 प्रतिशत रही और इलेक्ट्रिक वाहनों का कॉन्ट्रिब्यूशन बढ़कर 4.25 प्रतिशत तक पहुंच गया है. पेट्रोल अब भी सबसे आगे है, लेकिन इसकी हिस्सेदारी घटकर 47.48 प्रतिशत रह गई है, जो पहले 50.82 फीसदी हुआ करती थी।  क्या है सीएनजी के रफ्तार की वजह… CNG की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे सबसे बड़ा कारण इसका लो रनिंग कॉस्ट और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत है. प्रति किलोमीटर CNG का खर्च पेट्रोल से लगभग 40-50 प्रतिशत तक कम होता है. हालांकि CNG वेरिएंट की कीमत पेट्रोल कार से करीब 80 हजार से 1 लाख रुपये ज्यादा होती है, लेकिन जो लोग साल में 15,000 से 20,000 किलोमीटर तक गाड़ी चलाते हैं, वो नई कार खरीदने में खर्च किए एक्स्ट्रा पैसे 18 महीनों के भीतर निकाल लेते हैं।  पिछले कुछ सालों में सीएनजी सीएनजी पंपों की संख्या देश भर में तेजी से बढ़ी है. महानगरों से लेकर छोटे शहर और कस्बों में भी अब CNG आसानी से उपलब्ध है. देश भर में सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क 600 से ज्यादा शहरों तक फैल चुका है, जो तीन साल पहले करीब 300 शहरों तक ही सीमित था. इससे लोगों के लिए CNG भरवाना आसान हो गया है और इसका इस्तेमाल बढ़ा है।  पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का असर भी साफ दिख रहा है. FADA के अनुसार 36.5 प्रतिशत डीलर्स का कहना है कि बढ़ते फ्यूल प्राइस ग्राहकों के फैसले को प्रभावित कर रहे हैं. वहीं 56.9 प्रतिशत डीलर्स ने बताया कि CNG और EV में लोगों की रुचि तेजी से बढ़ रही है. कार कंपनियों ने भी इस ट्रेंड को समझते हुए अपने CNG पोर्टफोलियो को बढ़ाया है।  CNG में है कई ऑप्शन देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी अपनी ज्यादातर कारों में फैक्ट्री-फिटेड CNG ऑप्शन दे रही है. दूसरी ओर हुंडई की कारों में भी सीएनजी ऑप्शन मिलता है, जिसमें ऑरा, आई और एक्स्टर जैसे मॉडल शामिल हैं. इसके अलावा अब तक सीएनजी से दूर रहने वाला टाटा मोटर्स ने सीएनजी सेगमेंट में कम्पटीशन को और बढ़ा दिया है. कंपनी ने हाल ही में दुनिया की पहली CNG ऑटोमेटिक कार (टिएगो और टिगोर) को भी लॉन्च किया है. इसके अलावा बेस्ट सेलिंग मॉडल नेक्सन, पंच, कर्व भी सीएनजी किट के साथ आ रहे हैं।  सीएनजी की बढ़ती डिमांड को देखते हुए कुछ वाहन निर्माता जो सीधे कंपनी फिटेड मॉडल नहीं पेश कर रहे हैं, वो भी डीलरशिप लेवल पर सीएनजी रेट्रो-फिटमेंट उपलब्ध करा रहे हैं. निसान, होंडा और रेनॉ इसमें प्रमुख है. अब तक हैचबैक और सेडान तक सीमित रहने वाला सीएनजी व्हीकल पोर्टफोलियो एसयूवी तक पहुंच गया है. इस समय बाजार में मारुति ग्रैंड विटारा, टोयोटा हाईराइडर, टाटा नेक्सन, हुंडई एक्सटर और यहां तक की मारुति ब्रेजा भी सीएनजी के साथ आ रही है।  टाटा मोटर्स ने इस वित्तीय वर्ष में 1.72 लाख यूनिट से ज्यादा सीएनजी कारों की बिक्री की है. जो सालाना आधार पर 24% की बढ़त है. अब CNG कारें 5 लाख रुपये से लेकर 15 लाख रुपये तक की कीमत में उपलब्ध हैं. इससे खरीदारों के पास ज्यादा विकल्प आ गए हैं और CNG अब सिर्फ एंट्री लेवल नहीं, बल्कि प्रीमियम सेगमेंट तक पहुंच चुका है।  अब टू-व्हीलर में भी CNG  सीएनजी की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं, कारों के अलावा अब टू-व्हीलर भी सीएनजी गैस पर दौड़ने लगे हैं. हाल ही में बजाज ऑटो दुनिया की पहली सीएनजी बाइक Bajaj Freedom 125 लॉन्च की थी. जिसकी शुरुआती कीमत 95,000 रुपये (एक्स-शोरूम) है. इसमें सीएनजी और पेट्रोल दोनों का ऑप्शन मिलता है. इस बाइक में 2 किग्रा का सीएनजी टैंक और 2 लीटर का पेट्रोल टैंक दिया गया है।  कंपनी का दावा है कि, ये बाइक फुल टैंक (पेट्रोल+सीएनजी) में 330 किमी तक की ड्र्राइविंग रेंज देता है. माइलेज की बात करें तो ये बाइक 1 किग्रा सीएनजी में 102 किमी और एक लीटर पेट्रोल में 67 किमी का माइलेज देती है. दूसरी ओर टीवीएस ने भी बीते भारत मोबिलिटी ग्लोबल एक्सपो में Jupiter CNG से पर्दा उठाया था. फिलहाल कंपनी इस स्कूटर पर काम कर रही है और बहुत जल्द ही इसे भी बाजार में उतारा जाएगा।   

चंद्रमा से लौटते वक्त 192 करोड़ का टॉयलेट हुआ जाम, 4 यात्री फंसे अजीब समस्या में

 नई दिल्ली चंद्रमा के चारों ओर सफल यात्रा के बाद ओरियन स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी की ओर लौट रहा है. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन $23 मिलियन (करीब 192 करोड़ रुपये) का टॉयलेट अचानक खराब हो गया. यूरिन को स्पेस में फेंकने वाली व्यवस्था बंद हो गई है. NASA का मानना है कि यूरिन सिस्टम में एक केमिकल रिएक्शन की वजह से यह समस्या हुई है. पॉटी निकालने वाली अलग व्यवस्था ठीक काम कर रही है।  एस्ट्रोनॉट क्रिस्टीना कोच ने कहा कि यूनिवर्सल वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम से जलती हुई हीटर जैसी बदबू आ रही है. फ्लाइट डायरेक्टर रिक हेनफ्लिंग ने बताया कि टॉयलेट अब भी काम कर रहा है, लेकिन समस्या वेस्टवॉटर टैंक को खाली करने में है. वेंट यानी निकासी कम हो गया है. इसलिए क्रू को बैकअप का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। अभी चारों एस्ट्रोनॉट्स व्यक्तिगत दोबारा इस्तेमाल होने वाले कंटेनर यानी कॉलेप्सिबल कंटिंजेंसी यूरिन डिस्पोजल डिवाइसेस का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह समस्या लिफ्टऑफ के कुछ घंटों बाद ही शुरू हो गई थी. क्रिस्टीना कोच ने सिस्टम के कंट्रोल्स एडजस्ट किए. मिशन कंट्रोल की मदद से रीस्टार्ट किया।  पहले लगा कि समस्या सुलझ गई है. कोच ने कहा कि मैं खुद को स्पेस प्लंबर कहने पर गर्व महसूस कर रही हूं. उन्होंने टॉयलेट को स्पेसक्राफ्ट का सबसे जरूरी उपकरण बताया।  समस्या अभी भी बनी हुई है समस्या पूरी तरह से खत्म नहीं हुई. एस्ट्रोनॉट्स अब भी यूरिन को स्पेस में फेंक नहीं पा रहे हैं. यह मुद्दा ह्यूस्टन के जॉनसन स्पेस सेंटर में हर प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुख्य विषय बन गया है. यह वही केंद्र है जहां 1970 में अपोलो 13 के दौरान एस्ट्रोनॉट जैक स्विगर्ट ने कहा था कि ह्यूस्टन, हमारी समस्या है. उस समय ऑक्सीजन टैंक फटने से मिशन रद्द हो गया था, लेकिन तीनों एस्ट्रोनॉट्स सुरक्षित वापस लौट आए थे।  NASA की नई थ्योरी: बर्फ नहीं, केमिकल रिएक्शन   पहले NASA को लगा कि फिल्टर में बर्फ जमने से समस्या हुई है. इसलिए स्पेसक्राफ्ट को सूरज की तरफ घुमाया गया और हीटर चालू किए गए. लेकिन रिक हेनफ्लिंग ने बताया कि समस्या बर्फ की नहीं है. अब नई थ्योरी यह है कि यूरिन को बैक्टीरिया और माइक्रोऑर्गेनिज्म से बचाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल के रिएक्शन से कुछ कचरा बन रहा है, जो फिल्टर में फंस गया है।  ओरियन का टॉयलेट ISS जैसा, लेकिन पहली बार डीप स्पेस में ओरियन स्पेसक्राफ्ट में लगा टॉयलेट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) वाले टॉयलेट जैसा है. लेकिन यह पहली बार किसी क्रूड डीप स्पेस मिशन में इस्तेमाल हो रहा है. अपोलो मिशन के एस्ट्रोनॉट्स के पास टॉयलेट नहीं था, वे विशेष बैग इस्तेमाल करते थे. ओरियन 5 मीटर चौड़ा और 3 मीटर ऊंचा है।  टॉयलेट फ्लोर के नीचे है – यही एकमात्र जगह है जहां एस्ट्रोनॉट्स अकेले रह सकते हैं. अंदर बहुत शोर होता है, इसलिए कान की सुरक्षा जरूरी है. माइक्रोग्रैविटी में काम करने के लिए सक्शन सिस्टम लगा है. मल को डिस्पोजेबल बैग में रखकर दबाया जाता है. पृथ्वी पर वापस लाया जाएगा।  NASA की एसोसिएट एडमिनिस्ट्रेटर लोरी ग्लेज ने कहा कि जैसे ही स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी पर उतरेगा, हम अंदर जाकर समस्या की जड़ तक पहुंचेंगे. ओरियन शुक्रवार को प्रशांत महासागर में स्प्लैशडाउन करेगा. यह छोटी-सी समस्या स्पेस मिशन की जटिलता दिखाती है. $23 मिलियन का टॉयलेट भी पूरी तरह परफेक्ट नहीं है।   

LPG की किल्लत दूर, ‘ग्रीन आशा’ टैंकर लेकर मुंबई पहुंची 15,400 टन रसोई गैस

 मुंबई नवी मुंबई के समुद्री तट से एक राहत भरी और बड़ी खबर सामने आई है. मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में चल रहे युद्ध और तनाव के बीच रसोई गैस यानी एलपीजी (LPG) लेकर एक भारतीय जहाज सुरक्षित भारत पहुंच गया है. जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (Jawaharlal Nehru Port Authority) ने गुरुवार, 9 अप्रैल 2026 को बताया कि 15,400 टन एलपीजी लेकर आ रहा एक बड़ा जहाज नवी मुंबई के पोर्ट पर सफलतापूर्वक पहुंच चुका है. यह खबर इसलिए खास है, क्योंकि इस जहाज ने इस वक्त दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री रास्ते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को पार किया है, जहां इस समय ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच छिड़ी जंग की वजह से भारी तनाव बना हुआ है।  जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी ने जानकारी दी है कि ग्रीन आशा (Green Asha) नाम का यह भारतीय जहाज सुरक्षित तरीके से अपनी मंजिल पर पहुंच गया है. इस जहाज को जवाहरलाल नेहरू पोर्ट के उस विशेष हिस्से (बर्थ) पर खड़ा किया गया है, जिसका संचालन भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (Bharat Petroleum Corporation Limited) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (Indian Oil Corporation) मिलकर करते हैं. पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद से यह इस तरह का पहला जहाज है, जो इतने खतरनाक माहौल के बावजूद वहां से निकलकर सीधे इस पोर्ट पर पहुंचा है. अधिकारियों का कहना है कि यह भारत के लिए एक बड़ी जीत जैसा है क्योंकि युद्ध के कारण इस रास्ते से गुजरना बहुत मुश्किल हो गया था । सुरक्षित हैं कर्मचारी और जरूरी सामान इस पूरे मिशन की सबसे अच्छी बात यह रही कि जहाज पर मौजूद चालक दल (क्रू) के सभी सदस्य पूरी तरह सुरक्षित हैं. जहाज में लदी 15,400 टन एलपीजी और खुद जहाज को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा है. पोर्ट अथॉरिटी ने अपने बयान में कहा है कि ग्रीन आशा का सुरक्षित आना यह दिखाता है कि मुश्किल अंतरराष्ट्रीय हालातों और लड़ाई के बावजूद भारत अपनी समुद्री ताकत के दम पर देश के लिए जरूरी चीजों की सप्लाई जारी रखने में सक्षम है. यह जहाज भारत में रसोई गैस की कमी न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण था  क्यों खास है यह पोर्ट और समुद्री रास्ता नवा शेवा पोर्ट (Nhava Sheva Port) के नाम से मशहूर यह बंदरगाह भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में बहुत बड़ा रोल निभाता है. यहां से पूरे देश में गैस और तेल की सप्लाई की जाती है।  स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वह समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अपनी तेल और गैस की जरूरतें पूरी करता है, लेकिन ईरान और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष ने इस रास्ते को जोखिम भरा बना दिया है. ऐसे में भारतीय तिरंगे वाले जहाज का वहां से सुरक्षित निकल आना यह भरोसा दिलाता है कि भविष्य में भी भारत अपनी ऊर्जा सप्लाई को इसी तरह बरकरार रखेगा। 

नासिक में IT कंपनी का शर्मनाक कांड: HR हेड पर आरोप, 6 गिरफ्तार, 4 साल से चल रहा था रेप और धर्मांतरण का खेल

नासिक  महाराष्ट्र के नासिक में एक बड़ी आईटी कंपनी में महिलाओं के साथ छेड़छाड़, रेप और जबरन धर्मांतरण का गंभीर मामला सामने आया है. नासिक पुलिस ने इस मामले में छह टीम लीडर को गिरफ्तार कर लिया है. सभी छह आरोपी अलग-अलग आरोपों में गिरफ्तार किए गए हैं. इनमें से एक टीम लीडर पर रेप का आरोप है, जबकि बाकी पर महिला सहकर्मियों से छेड़छाड़ और दफ्तर में धार्मिक भावनाओं से जुड़ी अपमानजनक बातें करने के आरोप लगे है।  रिपोर्ट के मुताबिक संदिग्ध आरोपी तैसिफ अत्तार, दानिश, शाहरुख शेख और रजा मेमन पर एक हिंदू युवक को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करने की शिकायत दर्ज करवाई गई है. कंपनी में हिंदू युवक को दोपहर के समय नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किए जाने का भी आरोप है. इसके अलावा, शिकायत में यह भी उल्लेख कि युवक को जबरन बीफ खिलाया गया. उसी युवक के धर्म परिवर्तन के बाद की तस्वीरें सामने आईं।  चार सालों से चल रहा था गंदा खेल पुलिस के अनुसार ये घटनाएं पिछले चार सालों के दौरान अलग-अलग समय पर हुईं. पीड़ित महिलाओं ने कंपनी के एचआर हेड को पॉश यानी प्रीवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरासमेंट के नियमों के तहत लिखित शिकायत की थी. लेकिन एचआर हेड ने कोई कार्रवाई नहीं की. बल्कि एक पीड़िता के अनुसार जब उसने सेक्सुअल हैरासमेंट की जानकारी दी तो एचआर हेड ने कहा कि यह सब एमएनसी में नॉर्मल है, शांत रहो।  पीड़ितों की शिकायत पर पुलिस ने एचआर हेड के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया है. मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने एसआईटी का गठन किया है. पुलिस को शक है कि इस मामले में कई और पीड़ित महिलाएं भी हो सकती हैं, जो अभी सामने नहीं आई हैं. जांच टीम सभी एंगल से मामले की जांच कर रही है और अन्य संभावित पीड़ितों से संपर्क करने की कोशिश कर रही है. अभी तक पुलिस ने इस पूरे प्रकरण में कुल नौ एफआईआर दर्ज की हैं, जिनमें से आठ महिलाओं की शिकायतों पर आधारित हैं. इनमें यौन अपराधों और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से संबंधित धाराएं शामिल हैं।  कंपनी में करीब 300 कर्मचारी काम करते हैं और गिरफ्तार किए गए ज्यादातर आरोपी टीम लीडर के पद पर थे. पुलिस का कहना है कि आरोपी लंबे समय से अपनी पोजिशन का दुरुपयोग कर महिलाओं को परेशान कर रहे थे. नासिक पुलिस अब सभी आरोपियों से पूछताछ कर रही है और मामले की गहराई तक जांच जारी है. अगर अन्य पीड़ित सामने आती हैं तो एफआईआर की संख्या और बढ़ सकती है।