samacharsecretary.com

केंद्रीय कर्मचारियों के लिए खुशखबरी? 64% हो सकता है DA, नवरात्रि-दुर्गा पूजा से पहले बढ़ेगी सैलरी!

नई दिल्ली त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही 1 करोड़ से ज्यादा केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की नजरें महंगाई भत्ते (Dearness Allowance)पर टिक गई हैं. देश के करीब 50 लाख कर्मचारियों और 65 लाख से अधिक पेंशनर्श जुलाई 2026 से लागू होने वाले इस भत्ते में बढ़तरी(DA Hike july 2026) का बेसब्री से इंतजार कर रहे है. इस साल 11 अक्टूबर से नवरात्रि और 20 अक्टूबर को दशहरा है. ऐसे में हर कोई जानना चाहता है कि क्या सरकार दुर्गा पूजा या नवरात्रि के आसपास इस तोहफे का ऐलान करेगी।  आइए आपको बताते हैं कि ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI) के अनुमानित आंकड़े और सरकार के पिछले पैटर्न के हिसाब से कब सरकारी कर्मचारियों के डीए पर गुड न्यूज मिल सकती है और इस बार कितनी बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है… कब तक हो सकती है महंगाई भत्ते की घोषणा? आमतौर पर सरकार जुलाई से लागू होने वाले डीए की घोषणा सितंबर या अक्टूबर में करती है. अगर नवरात्रि पर ऐलान नहीं होता है, तो सरकार दिवाली तक पर कर्मचारियों को ये तोहफा दे सकती है. अच्छी बात यह है कि महंगाई भत्ते की घोषणा जब भी होगी, भत्ते की दरें 1 जुलाई 2026 से ही लागू मानी जाएंगी. इसका मतलब है कि कर्मचारियों को पिछले महीनों का बकाया एरियर भी साथ में मिलेगा।  कितना बढ़ सकता है आपका DA? फिलहाल कर्मचारियों को बेसिक सैलरी का 60% डीए मिल रहा है. ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI-IW) के जुलाई आंकड़ों के मुताबिक इंडेक्स 153.2 पर पहुंच गया है. इस आधार पर अनुमानित डीए 64% बैठता है. यानी इस बार डीए में सीधा 4% का इजाफा होने की पूरी उम्मीद है. जब तक 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें पूरी तरह लागू नहीं होतीं, तब तक यह बढ़ोतरी 7वें वेतन आयोग के तहत ही दी जाएगी।  कितनी बढ़ेगी इन-हैंड सैलरी? हालांकि आपको ये समझना होगा कि 4% डीए बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि आपकी कुल टेक-होम सैलरी 4% बढ़ जाएगी. डीए का कैलकुलेशन आपकी बेसिक सैलरी पर होता है…. यहां समझिए डीए बढ़ने से अलग-अलग लेवल के कर्मचारियों की बेसिक सैलरी बढ़कर कितनी हो जाएगी.. डीए का कैलकुलेशन आपकी बेसिक सैलरी पर होता है. 4% डीए बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि आपकी कुल टेक-होम सैलरी 4% बढ़ जाएगी सिर्फ सैलरी नहीं पेंशन भी बढ़ेगा महंगाई भत्ता सिर्फ इन-हैंड सैलरी ही नहीं बढ़ाता, बल्कि इसका असर पीएफ (PF), ग्रेच्युटी और पेंशनर्श की मासिक पेंशन पर भी पड़ता है. जैसे ही सरकार कैबिनेट बैठक में इसे मंजूरी देगी, त्योहारी सीजन में कर्मचारियों के बैंक खातों में बढ़ी हुई सैलरी और एरियर की रकम जमा हो जाएगी. फिलहाल आपको त्योहारों से पहसे सरकार की तरफ से आने वाले एक बड़े फैसले के लिए इंतजार करना होगा।   

PF से पैसे निकालने वालों के लिए जरूरी खबर, इमरजेंसी में कितना मिलेगा फंड? समझें नए नियम

नई दिल्ली कर्मचारी भविष्‍य निधि संगठन ने अपने करोड़ों स्‍टेकहोल्‍डर्स के लिए PF अकाउंट में आंशिक विड्रॉल के नियमों को बेहद आसान और ट्रांसपैरेंट बना दिया है. नए नियम के तहत अब बीमारी,बच्‍चों की पढ़ाई, शादी और घर खरीदने या बनवाने जैसे कामों के लिए पैसा निकालने का नियम बदल चुका है।  पीएफ निकासी के तीन कैटेगरी ईपीएफओ की नई गाइडलाइन के अनुसार, अब एडवांस क्‍लेम को तीन कैटेगरी में बांट दिया गया है, जिसमें आवश्यक जरूरतें, आवास जरूरतें और विशेष परिस्थितियां शामिल हैं. अब आइए जानते हैं कि नए नियम में क्‍या-क्‍या बदल चुका है और आप पीएफ अकाउंट से एक बार में कितना पैसा निकाल सकते हैं।          बीमारी के लिए कितनी बार PF का पैसा निकाल सकते हैं  अगर मेडिकल इमरजेंसी या इलाज के लिए पीएफ से एडवांस निकालना चाहते हैं तो आप जितनी बार चाहें, उतनी बार PF से पैसा निकाल सकते हैं।        बच्‍चों के पढ़ाई के लिए कितनी बार पीएफ निकाल सकते हैं  उच्‍च शिक्षा या पढ़ाई के खर्च के लिए पूरी सर्विस के दौरान ज्‍यादा से ज्‍यादा 10 बार ही PF से एडवांस लिया जा सकता है।         शादी के लिए कितना निकाल सकते हैं पीएफ  अगर आप अपनी शादी, बच्‍चों की शादी या भाई-बहन की शादी कराना चाहते हैं और उसके लिए पीएफ का पैसा निकालना चाहते हैं तो आप पूरी सर्विस के दौरान 5 बार पीएफ का पैसा निकाल सकते हैं।         घर के लिए कितना पीएफ निकाल सकते हैं  घर/प्लॉट खरीदना, मकान बनवाना, होम लोन की किस्त चुकाना या घर की मरम्मत/रिनोवेशन के लिए आप पीएफ से 5 बार एडवांस पैसा निकाल सकते हैं. वहीं इमरजेंसी के लिए आप सर्विस के दौरान सिर्फ 2 बाद पीएफ से एडवांस निकाल सकते हैं।  कितना निकाल सकते हैं पीएफ एडवांस?  EPFO के नए सर्कुलर के अनुसार, पात्र सदस्य संबंधित कैटेगरी की शर्तों के तहत अपने कुल EPF बैलेंस का 75% तक एडवांस के रूप में निकाल सकते हैं. हालांकि, इसके लिए सदस्‍य का 12 महीने तक ईपीएफ का मेंबर होना जरूरी है। 

भारत-रूस की डिफेंस पार्टनरशिप को मिलेगी नई धार? S-400, ब्रह्मोस-एनजी और Su-57E पर मंथन संभव

 नई दिल्ली रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर पहुंचे हैं. वे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय मुलाकात भी करेंगे. इस मुलाकात में रक्षा सहयोग सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बनने जा रहा है. भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे सैन्य संबंधों में नई ऊंचाई छूने की संभावनाएं हैं।  S-400 मिसाइल सिस्टम, ब्रह्मोस-एनजी मिसाइल अपग्रेड, Su-30एमकेआई फाइटर जेट का अपग्रेड और पांचवीं पीढ़ी का Su-57E लड़ाकू विमान- ये चार प्रमुख मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं. आइए समझते हैं कि इन हथियारों पर क्या डील हो सकती है और भारत के लिए इनका क्या महत्व है।  S-400 मिसाइल सिस्टम: बची हुई डिलीवरी और अतिरिक्त बैटरियों की बात भारत ने 2018 में रूस से पांच S-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने का 5.43 अरब डॉलर का समझौता किया था. इनमें से चार सिस्टम पहले ही आ चुके हैं और तैनात हैं. पांचवां सिस्टम नवंबर 2026 तक आने की उम्मीद है. पुतिन-मोदी मुलाकात में इस अंतिम खेप की समयबद्ध डिलीवरी और रखरखाव पर चर्चा होगी. रूस ने भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सुविधा लगाने का भी प्रस्ताव रखा है।  इसके अलावा भारत अतिरिक्त पांच S-400 मिसाइल सिस्टम स्क्वाड्रन खरीदने पर भी विचार कर रहा है. रूस ने इसके लिए करीब 50 हजार करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया है. ये अतिरिक्त सिस्टम पश्चिमी और पूर्वी दोनों मोर्चों पर भारत की एयर डिफेंस क्षमता को दोगुना कर सकते हैं।  S-400 मिसाइल सिस्टम लंबी दूरी तक विमान, मिसाइल और ड्रोन को मार गिराने में सक्षम है. ऑपरेशन सिंदूर में इसकी प्रभावशीलता साबित हो चुकी है. इसलिए अतिरिक्त खरीद भारत की बहुस्तरीय रक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगी।  ब्रह्मोस-एनजी: हल्की और ज्यादा घातक मिसाइल का अपग्रेड ब्रह्मोस भारत-रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है और दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है. अब दोनों देश इसकी नेक्स्ट जनरेशन यानी ब्रह्मोस-एनजी पर काम कर रहे हैं. यह मौजूदा ब्रह्मोस से काफी हल्की है- लगभग 1.3 टन वजन की।  इसकी रेंज 400 किलोमीटर से ज्यादा है. स्पीड 4322 km/hr तक है. छोटी साइज की वजह से तेजस और मिग-29 जैसे विमानों पर कई मिसाइलें लगाई जा सकती हैं. पुतिन के दौरे में ब्रह्मोस-एनजी के विकास, संयुक्त उत्पादन और अपग्रेड पर चर्चा होने की पूरी संभावना है।  रूस ने साफ कहा है कि अब मिसाइल को और बेहतर और ज्यादा बनाने का समय आ गया है. भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एयर, लैंड और सी-बेस्ड प्लेटफॉर्म पर स्ट्राइक क्षमता बढ़ेगी. निर्यात बाजार में भी ब्रह्मोस-एनजी की अच्छी मांग हो सकती है।  Su-30MKI अपग्रेड: सुपर सुखोई बनने की राह भारतीय वायुसेना के पास करीब 260 Su-30MKI लड़ाकू विमान हैं. ये वायुसेना की रीढ़ माने जाते हैं. अब इन्हें सुपर सुखोई कॉन्फिगरेशन में अपग्रेड करने की बड़ी योजना पर चर्चा चल रही है. इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 11 अरब डॉलर से ज्यादा है. अपग्रेड में नए रडार, बेहतर एवियोनिक्स, आधुनिक हथियार सिस्टम और लंबी रेंज की मिसाइलें शामिल होंगी।  यह अपग्रेड चरणबद्ध तरीके से होगा. इससे पुराने विमानों की उम्र बढ़ेगी और वे अगले कई साल तक आधुनिक खतरों से निपटने में सक्षम रहेंगे. भारत अपनी स्वदेशी क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है, इसलिए इस अपग्रेड में भारतीय कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ाने की कोशिश होगी. पुतिन-मोदी मुलाकात में इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर सहमति बन सकती है।  Su-57E: पांचवीं पीढ़ी के विमान का टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सु-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है. भारत लंबे समय से अपनी पांचवीं पीढ़ी के विमान एंडवास्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट पर काम कर रहा है, लेकिन वह अभी कई साल दूर है. इस बीच चीन और पाकिस्तान की बढ़ती स्टील्थ क्षमता को देखते हुए भारत के पास अंतरिम समाधान की जरूरत है।  रूस ने भारत को Su-57E (एक्सपोर्ट वर्जन) बेचने के साथ-साथ भारत में संयुक्त उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण का प्रस्ताव दिया है. यहां तक कि पूर्ण तकनीक एक्सेस की बात भी कही गई है।  सीमित संख्या में विमान खरीदकर और बाद में लोकल प्रोडक्शन शुरू करके भारत अपना स्टील्थ गैप भर सकता है. रडार, इंजन और वेपन इंटीग्रेशन जैसी संवेदनशील तकनीकों पर बातचीत चल रही है. यह डील अगर हुई तो भारत-रूस रक्षा संबंधों में नया अध्याय खुलेगा।  भारत के लिए क्या मायने रखती हैं ये डीलें? इन सभी सौदों का उद्देश्य भारत की सैन्य क्षमता को आधुनिक खतरों के अनुरूप बनाना है. S-400 मिसाइल सिस्टम एयर डिफेंस को मजबूत करेगा, ब्रह्मोस-एनजी स्ट्राइक पावर बढ़ाएगा, Su-30MKI अपग्रेड मौजूदा बेड़े को लंबे समय तक उपयोगी बनाएगा. Su-57E भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा।  साथ ही भारत मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है, इसलिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और संयुक्त उत्पादन वाले प्रस्ताव ज्यादा आकर्षक हैं. रूस भी अपने रक्षा निर्यात को बढ़ाना चाहता है और भारत जैसे विश्वसनीय साझेदार के साथ गहरी साझेदारी चाहता है. ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान यह मुलाकात सिर्फ द्विपक्षीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है।  हालांकि फाइनल डील तुरंत नहीं हो सकती, लेकिन दिशा तय हो जाएगी. आने वाले महीनों में इन प्रोजेक्ट्स पर प्रगति देखने को मिलेगी. भारत की सुरक्षा जरूरतों और रणनीतिक स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए ये चर्चाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। 

भारत का न्यूक्लियर शील्ड हुआ मजबूत, 30 नए परमाणु हथियार जोड़ने का दावा; FAS ने बताया पूरा आंकड़ा

 नई दिल्ली अमेरिका की फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स यानी FAS ने हाल ही में भारत के परमाणु हथियारों को लेकर अपना ताजा अनुमान जारी किया है. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास करीब 190 असेंबल किए गए परमाणु हथियार हैं. इनमें से 160 से ज्यादा हथियार ऐसे डिलीवरी सिस्टम से जुड़े हैं जो अभी एक्टिव हैं।  FAS जैसे संगठनों के अनुमान अक्सर वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बनते हैं क्योंकि परमाणु शक्ति वाले देश अपने भंडार की सटीक संख्या सार्वजनिक रूप से नहीं बताते. भारत भी इसी परंपरा का पालन करता है. आधिकारिक तौर पर अपनी संख्या की पुष्टि नहीं करता।  रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत ने जितने लॉन्चर अभी तैयार रखे हैं, उससे ज्यादा हथियार बना लिए हैं. कुल भंडार करीब 190 हथियारों का है जबकि लॉन्चरों से जुड़े हथियार करीब 160 हैं. बाकी अतिरिक्त हथियार उन मिसाइलों के लिए बनाए गए हैं जो अभी उत्पादन या विकास के चरण में हैं।  इनमें अग्नि-प्राइम और लंबी दूरी वाली के-4 जैसी मिसाइलें शामिल हैं. विशेषज्ञों के अनुसार यह कोई अव्यवस्था का संकेत नहीं बल्कि परमाणु रणनीति का सामान्य तरीका है. हथियारों का उत्पादन अक्सर डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आने से पहले ही आगे चलता रहता है ताकि जब नए सिस्टम तैयार हों तो हथियार तुरंत उपलब्ध रहें।  अतिरिक्त हथियारों का रणनीतिक मतलब FAS के अनुमान के अनुसार अतिरिक्त हथियार भविष्य की मिसाइलों के लिए रखे गए हैं. जब नए डिलीवरी सिस्टम सर्विस में आते हैं तो उनके लिए पहले से तैयार हथियार उपलब्ध रहने से प्रतिरोधक क्षमता तेजी से मजबूत होती है. यह प्रथा कई परमाणु शक्ति वाले देशों में देखी जाती है।  युद्ध के समय या तनाव की स्थिति में लॉन्चर और हथियार का मेल बैठाना आसान हो जाता है. भारत की परमाणु नीति में विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता पर जोर दिया जाता है. अतिरिक्त हथियार इस क्षमता को समय के साथ बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर विस्तार करने में मदद करते हैं।    ये अनुमान बाहरी संगठन के हैं. भारत सरकार आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं करती. इसलिए वास्तविक संख्या इससे कम या ज्यादा हो सकती है. फिर भी FAS जैसी संस्थाओं के आकलन अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि वे खुले स्रोतों, सैटेलाइट चित्रों और अन्य सार्वजनिक जानकारियों पर आधारित होते हैं।  नो-फर्स्ट-यूज नीति और परीक्षण रोक कायम रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह भी उजागर होती है कि भंडार बढ़ने के बावजूद भारत अपनी नो-फर्स्ट-यूज यानी पहले इस्तेमाल न करने की नीति पर कायम है. भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल तभी करेगा जब उस पर परमाणु हमला हो।  यह नीति भारत की परमाणु रणनीति का मूल आधार रही है. इसके अलावा भारत ने स्वयं घोषित परमाणु परीक्षण रोक भी जारी रखी हुई है. 1998 के परीक्षणों के बाद से भारत ने कोई नया परीक्षण नहीं किया है और इस रोक को बनाए रखा है।   भंडार के धीरे-धीरे बढ़ने के बावजूद इन दो नीतियों का जारी रहना भारत के संयमित और जिम्मेदार रुख को दर्शाता है. कई देशों में भंडार बढ़ने के साथ आक्रामक नीतियां भी बदलती देखी गई हैं, लेकिन भारत ने अपनी घोषित स्थिति में बदलाव नहीं किया है. यह वैश्विक परमाणु व्यवस्था में भारत की छवि को स्थिर रखने में मदद करता है।  परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का विकास भारत की परमाणु शक्ति का विकास कई दशकों से चल रहा है. शुरूआती चरण में सीमित क्षमता से लेकर अब ज्यादा एडवांस डिलीवरी सिस्टम तक का सफर तय किया गया है. लैंड बेस्ड मिसाइलें, समुद्र आधारित क्षमता और हवाई प्लेटफॉर्म तीनों पर काम चलता रहा है।  अतिरिक्त हथियारों का निर्माण इसी व्यापक विकास का हिस्सा माना जा सकता है. जब नए सिस्टम जैसे अग्नि-प्राइम या समुद्र आधारित के-4 जैसी मिसाइलें सेवा में आती हैं तो उनके लिए हथियार पहले से तैयार रखना तार्किक कदम है।  यह विकास क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को भी प्रभावित करता है. दक्षिण एशिया में परमाणु शक्ति का संतुलन लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है. भारत अपनी क्षमता को मजबूत करते हुए भी आधिकारिक तौर पर न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता की बात करता रहा है. यानी जरूरत से ज्यादा हथियार जमा करने की बजाय विश्वसनीय और पर्याप्त क्षमता बनाए रखना. FAS के आंकड़े इसी दिशा में धीमी लेकिन निरंतर प्रगति का संकेत देते हैं।  कुछ विश्लेषक अतिरिक्त हथियारों को भविष्य की तैयारियों से जोड़ते हैं. जब उत्पादन लाइन चल रही हो तो हथियारों को पहले तैयार कर लेना व्यावहारिक होता है. लॉन्चर तैयार होने में समय लगता है जबकि हथियार उत्पादन अपेक्षाकृत तेजी से हो सकता है. यह अंतर सामान्य माना जाता है और इसे अव्यवस्थित विस्तार की बजाय योजनाबद्ध तैयारी के रूप में देखा जाता है।  आने वाले वर्षों में भारत की परमाणु क्षमता का स्वरूप नए डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आने के साथ और स्पष्ट होगा. अग्नि-प्राइम जैसी मिसाइलें मोबाइल और आधुनिक मानी जाती हैं जबकि के-4 समुद्र आधारित क्षमता को मजबूत करने वाली है. अतिरिक्त हथियार इन सिस्टम के लिए उपलब्ध रहने से समग्र प्रतिरोधक ताकत बढ़ेगी। 

हमलों के बाद भी नहीं टूटी ईरान की मिसाइल ताकत! भूमिगत फैक्ट्रियों में फिर बनने लगी बैलिस्टिक मिसाइलें

तेहरान  अमेरिका और मिडिल ईस्ट के खुफिया अधिकारियों के अनुसार ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन दोबारा शुरू कर दिया है. ये मिसाइलें युद्ध से पहले जमा किए गए यंत्रों को जोड़कर बनाई जा रही हैं. ये सारा काम अंडरग्राउंड फैसिलिटी में हो रहा है।  यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और इजरायल ने हालिया सैन्य अभियान के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमताओं को बड़ा नुकसान पहुंचाने का दावा किया था. अब वही क्षमता धीरे-धीरे वापस आती दिख रही है।  युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान के मिसाइल लॉन्चपैड और औद्योगिक यूनिट्स पर भारी हमले हुए थे. इन हमलों का मकसद ईरान की मिसाइल निर्माण क्षमता को नष्ट करना था. लेकिन खुफिया जानकारी बताती है कि ईरान ने पहले से ही कई जरूरी पार्ट्स जमा कर रखे थे। अब इन्हीं स्टॉक किए गए पार्ट्स को भूमिगत जगहों पर ले जाकर मिसाइलें असेंबल की जा रही हैं. अंडरग्राउंड फैसिलिटी का इस्तेमाल इसलिए हो रहा है ताकि हवाई हमलों से बचा जा सके. काम बिना रुकावट चलता रहे।  ईरान दो तरह की बैलिस्टिक मिसाइलें बना रहा है. पहली लिक्विड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें लॉन्च से ठीक पहले ईंधन भरना पड़ता है. दूसरी सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें पहले से तैयार करके रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत दागा जा सकता है. सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें ज्यादा खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि इन्हें लंबे समय तक छिपाकर रखना आसान होता है. प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो जाता है।  अमेरिका और इजरायल के दावों पर सवाल अमेरिका और इजरायल ने युद्ध के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमता को कमजोर करने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया था. उन्होंने दावा किया था कि कई उत्पादन स्थल नष्ट हो गए हैं और ईरान की मिसाइल स्टॉक में काफी कमी आई है. लेकिन अब खुफिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि उत्पादन फिर शुरू हो गया है. इससे उन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।  अगर ईरान अंडरग्राउंड फैसिलिटी में आसानी से मिसाइलें बना सकता है तो भविष्य में भी हवाई हमलों से पूरी क्षमता खत्म करना मुश्किल होगा. यह स्थिति क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौती पैदा कर रही है. मिडिल ईस्ट में तनाव पहले से ही ऊंचा है. ईरान की मिसाइल क्षमता बढ़ने से उसके पड़ोसी देशों और इजरायल के लिए खतरा बढ़ सकता है।  सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें खासकर चिंता का विषय हैं क्योंकि इन्हें जल्दी तैनात किया जा सकता है. लिक्विड वाली मिसाइलों को ईंधन भरने में समय लगता है, इसलिए उनका पता लगाना और रोकना थोड़ा आसान होता है. लेकिन दोनों तरह की मिसाइलों का उत्पादन जारी रहना अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए परेशानी का सबब है।  अंडरग्राउंड प्रोडक्शन की रणनीति   ईरान लंबे समय से अपनी संवेदनशील सैन्य सुविधाओं को भूमिगत रखने की रणनीति अपनाता रहा है. पहाड़ी इलाकों और गहरे सुरंगों में फैक्ट्रियां बनाकर वह हवाई हमलों से बचाव करता है. युद्ध के बाद भी यही रणनीति काम आ रही है. स्टॉक किए गए पार्ट्स का इस्तेमाल करके वह नए उत्पादन प्लांट्स पर निर्भरता कम कर रहा है. इससे उत्पादन की रफ्तार तो धीमी हो सकती है, लेकिन रुक नहीं रही।  विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में किसी देश की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट करना कितना मुश्किल है. एक बार स्टॉक जमा हो जाए और भूमिगत नेटवर्क मजबूत हो तो हमलों के बाद भी रिकवरी संभव हो जाती है।  अमेरिका और इजरायल के लिए अब नई चुनौती यह है कि वे कैसे इन भूमिगत स्थलों का पता लगाएं और उन्हें निशाना बनाएं. साथ ही राजनयिक दबाव और प्रतिबंधों के जरिए भी ईरान पर अंकुश लगाने की कोशिश जारी रह सकती है।  ईरान की मिसाइल क्षमता लौटने से पूरे मिडिल ईस्ट का सुरक्षा संतुलन प्रभावित हो सकता है. खाड़ी देश, इजरायल और अमेरिका सभी इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं. अगर उत्पादन की रफ्तार बढ़ी तो ईरान अपनी स्थिति मजबूत महसूस कर सकता है।  वहीं विरोधी पक्ष को अपनी रक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी पड़ सकती है. यह मुद्दा सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनयिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बनेगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह तय करना होगा कि ईरान की मिसाइल गतिविधियों पर कैसे नजर रखी जाए और आगे की कार्रवाई क्या हो।  कुल मिलाकर यह खबर साफ संकेत देती है कि युद्ध के बावजूद ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खोने को तैयार नहीं है. अंडरग्राउंड फैसिलिटी और पहले से जमा पार्ट्स के सहारे वह धीरे-धीरे उत्पादन फिर शुरू कर चुका है. आने वाले समय में इस पर और खुफिया जानकारी सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह घटनाक्रम अमेरिका-इजरायल गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।   

केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ा अपडेट! 8वें वेतन आयोग में DA को बेसिक पे में मिलाने की उठी मांग

नई दिल्ली आठवां वेतन आयोग अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपने के लिए एक्शन मोड में है। 18 महीने की डेडलाइन तक रिपोर्ट तैयार करने के लिए वेतन आयोग, कर्मचारी संगठनों के साथ लगातार बैठक कर रहा है। इसी कड़ी में चेन्नई और पुडुचेरी में हितधारकों के साथ चर्चा की गई। इन बैठकों में केंद्रीय कर्मचारियों की कई मांगें सामने आई हैं। इनमें महंगाई भत्ते (DA) को बेसिक पे में मर्ज करने की मांग भी प्रमुख है। क्या है डिमांड? केंद्र सरकार के प्रमुख कर्मचारी संगठनों ने सिफारिश की है कि जब डीए 25% से अधिक हो जाए, तो इसे मूल वेतन में मिला दिया जाना चाहिए। ये डिमांड नेशनल काउंसिल – जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM), ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन (AIDEF) और ऑल इंडिया न्यू पेंशन स्कीम एम्प्लॉइज फेडरेशन (AINPSEF) ने की है। AINPSEF का तर्क है कि DA को बेसिक पे में मर्ज करने से कर्मचारियों की सैलरी में अपेक्षाकृत तेज वृद्धि हो सकती है। AINPSEF का कहना है कि DA को बेसिक पे में मिलाने से सैलरी तेजी से बढ़ेगी और कर्मचारियों को अच्छी सैलरी बढ़ोतरी के लिए 10 साल तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। AINPSEF का कहना है कि इस विलय से मुख्य रूप से निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों को फायदा होगा, जिनकी सैलरी कम होती है और जो बड़े शहरों में रहते हैं जहां खर्च ज्यादा होते हैं। वहीं, भारतीय रेल पर्यवेक्षक संघ और प्रगतिशील शिक्षक न्याय मंच ने डीए के 50 फीसदी होने पर उसे बेसिक पे में मर्ज करने का सुझाव दिया है। Level-1 कर्मचारी की सैलरी का उदाहरण NC-JCM ने 8वें वेतन आयोग को सौंपे अपने मेमोरेंडम में कहा है कि जब डीए 25% की सीमा पार कर जाए तो इसे बेसिक पे में मिला दिया जाना चाहिए। मान लीजिए कि लेवल 1 के किसी कर्मचारी की बेसिक पे 18,000 रुपये है। अगर 8वें वेतन आयोग का फिटमेंट फैक्टर 2.1 है, तो 1 जनवरी 2026 को उनकी संशोधित सैलरी 37,800 रुपये हो सकती है। अगर कर्मचारी को हर साल औसतन 4% DA बढ़ोतरी मिलती है और सालाना इंक्रीमेंट की दर 3% से बढ़कर 7% हो जाती है तो 1 जनवरी 2033 को उनकी अनुमानित ग्रॉस सैलरी (बेसिक पे + DA) लगभग 77,694 रुपये होगी। यह 37,800 रुपये की संशोधित बेसिक पे से 106% अधिक है। यहां ध्यान रखना जरूरी है कि डीए को बेसिक पे में मर्ज करना अभी सरकार का मंजूर नियम नहीं है। इसी तरह 2.1 फिटमेंट फैक्टर, 7% इंक्रीमेंट और 4% औसत सालाना DA बढ़ोतरी भी केवल उदाहरण के लिए इस्तेमाल किए गए अनुमान हैं। 

नवरात्रि में बुलाया जा सकता है संसद का विशेष सत्र, महिला आरक्षण बिल पर बढ़ी हलचल

 नई दिल्ली सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाने का विकल्प फिलहाल खुला रखा है. संसद के मॉनसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया था. ऐसे में अटकलें लगाई जा रही थीं कि सरकार विशेष सत्र बुला सकती है लेकिन अब तक सरकार की तरफ से विशेष सत्र को लेकर कोई भी आधिकारिक बयान नहीं आया है।  सूत्रों की मानें तो सरकार BRICS समिट के बाद विशेष सत्र को लेकर फैसला कर सकती है. BRICS के बाद सरकार यह तय करेगी कि महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाया जाए या नहीं. अगर सरकार तय करती है कि विशेष सत्र नहीं बुलाना है तो मॉनसून सत्र का सत्रावसान कर दिया जाएगा लेकिन अगर सरकार विशेष सत्र बुलाने का फैसला करती है तो नवरात्रि के दौरान सत्र बुलाया जा सकता है।  जयराम रमेश ने उठाए सवाल कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने X पर पोस्ट करते हुए इस पर सवाल भी उठाए हैं. उनका कहना है कि मॉनसून सत्र को खत्म हुए 29 दिन हो चुके हैं लेकिन सत्रावसान नहीं किया गया।  उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि यह सरकार अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रही है. उन्होंने इसे बेवकूफी बताते हुए कहा है कि सरकार सोच रही है कि इससे विपक्ष घबरा जाएगा लेकिन असल में ऐसा बिल्कुल नहीं है।   संसद के मॉनसून सत्र में दोनों सदनों के कामकाज हंगामे के चलते भेंट चढ़ गया. संसद में अगर रोज़ाना छह घंटे की संसदीय कार्यवाही मानी जाए, तो 15 दिनों में 90 घंटे का काम होना चाहिए था. हालांकि, लोकसभा में इस सत्र में केवल 15 घंटे 36 मिनट ही काम हो सका है जबकि राज्यसभा में 15 दिनों में 24 घंटे 21 मिनट काम हुआ, जिसमें हर बिल को पास करने में औसतन लगभग एक घंटा लगा. इसके बाद से ही विशेष सत्र बुलाए जाने को लेकर अटकलें लगाई जा रही थी। 

PM मोदी का पुतिन को खास गिफ्ट, तिरुक्कुरल का रूसी अनुवाद भेंट कर दिखाई तमिल संस्कृति की झलक

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत दौरे पर आए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की है। इस दौरान पीएम मोदी ने राष्ट्रपति पुतिन को तमिल कवि और दार्शनिक तिरुवल्लूर की क्लासिक किताब 'तिरुक्कुरल' का रूसी अनुवाद भेंट किया है। तमिलनाडु के शुरुआती संगम साहित्य में अहम स्थान रखने वाली तिरुक्कुरल की रचना करीब 2000 साल पहले हुई थी। यह नैतिक साहित्य पाठकों को जीवन, मृत्यु और जिंदगी के अनेक पहलुओं के बारे में सीख देती है।'सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल' तमिल द्वारा प्रकाशित इस किताब में तमिल कवि और दार्शनिक तिरुवल्लूर के छंदों का मूल तमिल टेक्स्ट और रूसी अनुवाद शामिल है। बता दें, इस किताब का अनुवाद दुनिया की तमाम भाषाओं में हो चुका है। इस दौरान पीएम मोदी ने पुतिन को तमिल संत तिरुवल्लुवर की पुस्तक तिरुक्कुरल का रूसी अनुवाद भेंट किया. पीएम मोदी ने पुतिन को ये पुस्तक भेंट करते हुए इसके बारे में जानकारी दीं और कहा कि हमारे सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाने में इस पुस्तक की भूमिका रहेगी।  पीएम मोदी ने पुतिन को ये पुस्तक भेंट करते हुए कहा कि संत तिरुवल्लुवर ने इस किताब में मानव जीव की अनेक विशेषताओं को बतलाया है. इसी किताब का रूसी भाषा में ट्रांसलेशन हुआ है. मुझे विश्वास है कि ये किताब जन संपर्क बढ़ाने और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में काम करेगी।  तिरुक्कुरल (Thirukkural) तमिल साहित्य की सबसे महान और विश्व प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है. इसे 'तमिल वेद' भी कहा जाता है. इस पुस्तक का रूसी समेत कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. इस किताब को 2000 साल पहले लिखा गया है।  तिरुक्कुरल दुनिया भर में मशहूर कवि तिरुवल्लुवर द्वारा लिखे गए गहरे अर्थ के दोहों वाला एक क्लासिक तमिल साहित्य है।  तिरुक्कुरल का दुनिया भर की कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है. तिरुक्कुरल तमिल भाषा का एक प्राचीन नैतिक साहित्य है जो पाठकों को जीवन, मृत्यु और इनके बीच की हर चीज़ के बारे में सीख देता है।  2,000 साल से भी पहले कवि-दार्शनिक तिरुवल्लुवर द्वारा लिखे गए 133 अध्यायों में मौजूद 1,330 दोहे रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए सबसे बेहतरीन गाइड में से एक माने जाते हैं. तमिल लोग तिरुवल्लुवर को एक प्राचीन संत, कवि और दार्शनिक के तौर पर बहुत सम्मान देते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने कई भाषणों में उनका ज़िक्र किया है।  तिरुक्कुरल तमिल संस्कृति की पहचान है. तमिलनाडु में इसे स्कूलों में पढ़ाया जाता है और हर घर में सम्मानित स्थान है. महात्मा गांधी, लियो टॉल्स्टॉय जैसे महान व्यक्तित्वों ने इसकी प्रशंसा की है. कन्याकुमारी में तिरुवल्लुवर की विशाल मूर्ति भी इसी सम्मान का प्रतीक है।  

गणेश उत्सव में शराबबंदी पर HC की सख्त टिप्पणी, बोले- शराबियों की सेहत भी जरूरी!

 पुणे महाराष्ट्र में गणेश उत्सव की धूम रहती है। 10 दिनों तक चलने वाले इस पूजा के दौरान पुणे के जिला प्रशासन ने शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया। जब यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा तो जज ने जिला प्रशासन के इस फैसले की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने सख्त लहजे में पूछा कि सिर्फ एक जिले को ही क्यों चुना गया, जबकि मुंबई सहित महाराष्ट्र के किसी भी जिले में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रशासन को यह आदेश वापस ले लेना चाहिए वरना कोर्ट को दखल देना पड़ेगा। आपको बता दें कि जिला प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ होटल मालिकों और शराब की दुकान के मालिकों के संगठनों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमसी त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की बेंच ने कहा कि जिन्हें शराब बेचने का लाइसेंस प्राप्त है उन्हें 10 दिनों तक अपना कारोबार करने से रोकने के लिए कहना पूरी तरह से मनमाना है। सिर्फ एक जिले में क्यों बैन इन याचिकाओं में पुणे कलेक्टर के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें 14 सितंबर से शुरू होने वाले गणेश उत्सव के दौरान 10 दिनों तक शराब की बिक्री पर रोक लगाई गई थी। बेंच ने कहा, "सिर्फ पुणे को चुनने के पीछे क्या तर्क है? हम ऐसी प्रथा की निंदा करते हैं। यह पुणे के लोगों के लिए एक कलंक है। आप क्या दिखाना चाह रहे हैं कि सिर्फ पुणे के लोग ही शराब पीने के बाद बुरा व्यवहार करते हैं? आप पूरे राज्य में से सिर्फ एक जिला चुन रहे हैं।" अस्पताल में भर जाएंगे शराबी कोर्ट ने पुणे कलेक्टर की ओर से पेश वकील से कहा कि वे कोर्ट को बताएं कि क्या यह आदेश वापस लिया जाएगा, वरना कोर्ट उचित आदेश पारित करेगा। हल्के-फुल्के अंदाज में कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी पाबंदी से शराब की लत वाले लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। चीफ जस्टिस त्रिपाठी ने मजाकिया लहजे में कहा, "अगर उन्हें 10 दिनों तक शराब नहीं मिली तो वे अस्पतालों में भर जाएंगे।"

रेल कर्मचारियों के लिए मल्टीस्टोरी आवास का प्लान, 2BHK-3BHK फ्लैट के साथ लिफ्ट-पार्किंग और पावर बैकअप

नई दिल्ली रेलवे में काम करनेवाले लाखों कर्मचारियों के लिए अच्‍छी खबर है. खासकर उन रेलकर्मियों के लिए, जो रेलवे के बेहद पुराने मकानों में रह रहे हैं. जिन रेलवे कॉलोनी में मकान 50 साल पुराने हो गए हैं या असुरक्षित घोषित किए जा चुके हैं, उन कॉलोनी का कायाकल्‍प होने वाला है। दरअसल, रेलवे बोर्ड की योजना, 50 साल से ज्‍यादा पुराने और असुरक्षित रेलवे क्‍वार्टर्स को हटाकर आधुनिक बहुमंजिला इमारतें तैयार करने की है. जमीन का बेहतर इस्‍तेमाल करते हुए G-4 यानी 4 मंजिली या उससे ज्‍यादा ऊंची इमारतें बनाई जाएंगी और इन भवनों में रेलकर्मियों को रहने के लिए पहले की तुलना में ज्यादा बड़े कमरों वाले फ्लैट मिलेंगे।  दरअसल, इस संबंध में रेलवे बोर्ड का निर्देश पत्र फिर से चर्चा में है, जिसमें पुराने जर्जर मकानों को चरणबद्ध तरीके से ध्‍वस्‍त करने और उनकी जगह बहुमंजिला बिल्डिंग बनवाने के संबंध में सभी जोनल रेलवे, मैन्‍युफैक्‍चरिंग यूनिट्स और केंद्रीय संगठनों को निर्देश दिए गए थे। रेलवे बोर्ड के सूत्र ने बताया कि पूर्व में ही सभी जोन को ऐसा एक पत्र जारी किया गया था. इस पत्र में असुरक्षित रेलवे कॉलोनियों की प्राथमिकता सूची तैयार कर वर्क-प्‍लान भेजने को कहा गया है. कुछ जगहों पर काम प्रगति में होने की भी खबरें हैं।  बड़े फ्लैट, लिफ्ट, पार्किंग, पावर बैकअप भी रेलवे बोर्ड का प्‍लान जमीन पर उतारा गया तो रेलकर्मियों को पुराने ढर्रे वाली कॉलोनी के जर्जर मकानों में नहीं, बल्कि 4-5 या ज्‍यादा मंजिल वाली बिल्डिंग में बड़े कमरों वाले फ्लैट मिलेंगे. जिन रेलकर्मियों को ऊंची बिल्डिंग में फ्लैट मिलेंगे, उन्‍हें बिल्डिंग में लिफ्ट की भी सुविधा मिलेगी। . संभव हो तो बिजली के लिए छतों पर सोलर एनर्जी प्‍लांट भी इंस्‍टॉल किए जाएंगे, ताकि पावर-कट होने पर भी बिजली मिलती रहे. यही नहीं, फ्लैट में आधुनिक रसोई की फिटिंग और वाहनों के लिए अलग पार्किंग की व्‍यवस्‍था देने का भी प्‍लान है।       ऊंची बिल्डिंग्‍स बनने पर टाइप-2 और टाइप-3 रेलवे क्वार्टरों का कवर्ड एरिया बढ़ जाएगा।      कम जगह होने के बावजूद ज्‍यादा से ज्‍यादा रेलकर्मियों को सुरक्षित आवास मुहैया कराया जा सकेगा।      रेलकर्मियों को 2BHK और 3BHK वाले आवास के स्‍टैंडर्ड  के मुताबिक डेवलप किया जाएगा।      कर्मचारियों को पुराने और छोटे कमरों की बजाय पहले से ज्‍यादा जगह वाले आधुनिक आवास मिलेंगे।      कोई बिल्डिंग अगर तीन से ज्‍यादा मंजिल वाली हुई तो उनमें लिफ्ट की व्यवस्था रहेगी ही रहेगी।       छत पर सोलर एनर्जी सिस्‍टम, मॉड्युलर किचन फिटिंग और बिल्डिंग के नीचे अलग पार्किंग की व्यवस्था रहेगी।   रेलवे बोर्ड के निर्देशों के अनुसार इन रेलकर्मियों के लिए आवासीय बिल्डिंग के पुनर्निर्माण प्रोजेक्‍ट के लिए पैसे वर्क्स प्रोग्राम के प्लान हेड-51 यानी कर्मचारी सुविधाओं के तहत उपलब्ध कराई जाएगी. बताया ये भी जा रहा है कि जहां भी संभावना बनेगी, इन परियोजनाओं को स्टेशन पुनर्विकास और अमृत भारत योजना से भी जोड़ा जा सकेगा।