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बच्चों के अपहरण की जांच में एकरूपता की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र-राज्यों से जवाब तलब किया

नई दिल्ली बच्चों के गुम होने, अपहरण और उन्हें जबरन ले जाने के मामलों की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में पूरे देश में ऐसी घटनाओं की जांच के लिए एक जैसी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। इसके साथ ही जांच को तय समयसीमा में पूरा करने, विशेष जांच प्रक्रिया अपनाने और मामलों की जल्द सुनवाई के लिए समर्पित अदालतें बनाने की मांग की गई है। याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले में केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा है। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ शिक्षा मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और विधि आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता की मुख्य मांग क्या? यह जनहित याचिका अधिवक्ता और याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दाखिल की है। इसे अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड अश्वनी कुमार दुबे के जरिए सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। याचिका में मांग की गई है कि बच्चों के अपहरण और उन्हें जबरन ले जाने के मामलों की जांच के लिए पूरे देश में एक समान व्यवस्था हो। इसमें खास तौर पर समयबद्ध जांच और विशेष जांच प्रक्रिया की मांग रखी गई है।  ​समर्पित अदालतें बनाने की पैरवी याचिका में केवल जांच तक ही बात सीमित नहीं रखी गई है, बल्कि त्वरित न्याय के लिए समर्पित विशेष अदालतें गठित करने का भी अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब तक बच्चों के खिलाफ होने वाले इन अपराधों के लिए अलग से विशेष अदालतें नहीं होंगी, तब तक पीड़ितों को त्वरित न्याय मिलना कठिन होगा और दोषियों में कानून का डर कायम नहीं हो सकेगा। ​मौजूदा व्यवस्था की खामियों पर उठाये सवाल सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में यह रेखांकित किया गया है कि वर्तमान समय में राज्यों के बीच जांच एजेंसियों के समन्वय और सूचना साझा करने में काफी ढिलाई देखने को मिलती है। कई मामलों में पुलिस की धीमी और असंवेदनशील कार्रवाई के कारण अपहृत बच्चों को सही समय पर सुरक्षित वापस नहीं लाया जा पाता। याचिका में कहा गया है कि अंतरराज्यीय नेटवर्क के जरिए बच्चों का अपहरण कर उन्हें बाल मजदूरी या मानव तस्करी में धकेल दिया जाता है, जिसके लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय तंत्र की सख्त जरूरत है। ​सुप्रीम कोर्ट का रुख और आगे की कार्रवाई सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका में उठाए गए बिंदुओं को गंभीर मानते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है। राज्यों और केंद्र सरकार की ओर से दाखिल होने वाले जवाबों के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर आगे की सुनवाई करेगा और बच्चों की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश तय कर सकता है। याचिका में ये प्रमुख मांगें रखी गई हैं:-     बच्चों के अपहरण और जबरन ले जाने के मामलों की जांच के लिए देशभर में एक समान व्यवस्था हो।     जांच को तय समयसीमा में पूरा करने के लिए समयबद्ध प्रक्रिया लागू की जाए।     ऐसे मामलों की जांच के लिए विशेष और समर्पित जांच प्रक्रिया तैयार की जाए।     मामलों की सुनवाई तेजी से पूरी करने के लिए समर्पित अदालतों की व्यवस्था हो। याचिका में मौजूदा व्यवस्था को लेकर क्या कहा गया? याचिका में लापता, अपहृत और जबरन ले जाए गए बच्चों से जुड़े मामलों को संभालने में व्यवस्था की खामियों का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है, जिससे ऐसे मामलों में जांच एजेंसियां तेजी से और आपसी तालमेल के साथ कार्रवाई कर सकें। याचिका का जोर इस बात पर है कि बच्चों से जुड़े इन मामलों में जांच और कार्रवाई के लिए एक समान और समन्वित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। याचिका में कहा गया है कि बच्चों के गुम होने, अपहरण या उन्हें जबरन ले जाने के मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई तेज और आपस में समन्वित होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग की है। फिलहाल अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। केंद्र, राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों के जवाब के बाद मामले में आगे की कार्रवाई होगी। 

Instagram-Facebook पर नाबालिगों की एंट्री होगी बंद? बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर SC ने केंद्र से पूछा सवाल

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को उस याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें मांग की गई है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. याचिका में सोशल मीडिया के इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षा उपायों की भी मांग की गई है, जिसमें माता-पिता या लीगल गार्जियन की सहमति जरूरी होनी चाहिए.  याचिकामें कहा गया है कि मेटा और दूसरी सोशल मीडिया कंपनियों ने बच्चों के अकाउंट बनाने की आयुसीमा 13 साल तय की है, जो अमेरिकी कानून के मुताबिक है।  याचिका में क्या कहा गया है? NGO जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की फाइल की गई याचिका में कहा गया है कि फेसबुक और स्नैपचैट (इंडिया) जैसे प्लेटफॉर्म यूजर्स को 13 साल की उम्र से अकाउंट बनाने की इजाजत देते हैं, जबकि भारतीय कानून 18 साल से कम उम्र के लोगों को नाबालिग मानता है.  याचिका में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 में बदलाव करने या खास गाइडलाइंस बनाने के निर्देश देने की मांग की गई है. जिससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी डिजिटल प्लेटफॉर्म माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति के बिना 18 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ सोशल मीडिया कॉन्ट्रैक्ट न कर सके, या ये कॉन्टेक्ट माता-पिता या अभिभावक के वेरिफिकेशन/e-KYC के अधीन होनी चाहिए।  बच्चों को सीधे एक्सेस देने पर सवाल याचिका में ये भी मांग की गई है कि ऐसी गाइडलाइंस बनाई जाएं जो ये जरूरी करें कि जहां भी किसी नाबालिग को डिजिटल प्लेटफॉर्म एक्सेस करने या इस्तेमाल करने की इजाजत हो, तो ऐसा एक्सेस कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त तरीके से हो, जिसमें माता-पिता या कानूनी अभिभावक शामिल हों. इसमें भी माता-पिता या अभिभावक का वेरिफिकेशन/e-KYC शामिल हो, जो सर्विस के नेचर और रिस्क के हिसाब से हो।  याचिका में कहा गया है कि बच्चों का डिजिटल प्लेटफॉर्म तक खुद से एक्सेस उन्हें ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, ट्रैफिकिंग, बिहेवियरल प्रोफाइलिंग, पर्सनल डेटा का गलत इस्तेमाल, साइबरबुलिंग और उम्र के हिसाब से गलत कंटेंट जैसे रिस्क के खतरे में डालता है। 

भारत में बढ़ेगा क्षेत्रीय विमान निर्माण, रूस से IL-114-300 पर डील की तैयारी; SJ-100 पर भी बातचीत

 नई दिल्ली रूस अब भारत के साथ सिर्फ पारंपरिक रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहता. वह नागरिक विमानन क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. रूस एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (यूएसी) के सीईओ वादिम बाडेखा ने हाल ही में बताया कि पिछले छह महीनों में भारतीय कंपनियों के साथ बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है।  नई दिल्ली में चल रहे इन्नोप्रोम इंडिया प्रदर्शनी के दौरान कई महत्वपूर्ण समझौते औपचारिक रूप लेने वाले हैं. इस प्रदर्शनी में 120 से ज्यादा रूसी और भारतीय कंपनियां हिस्सा ले रही हैं. यह आयोजन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हो रहा है, जिससे दोनों देशों के औद्योगिक सहयोग को गति मिलने की उम्मीद है।  सबसे ज्यादा चर्चा आईएल-114-300 क्षेत्रीय यात्री विमान को लेकर हो रही है. यह विमान छोटी और मध्यम दूरी की उड़ानों के लिए बनाया गया है. रूसी कंपनियां भारतीय एयरलाइंस और ऑपरेटरों को यह विमान बेचने के लिए सक्रिय हैं।  प्रस्तावित सौदों में पिनेकल एयर के लिए 50 विमान, एयर केरल के लिए 20 विमान और स्लीक एविएशन से जुड़े एमओयू के तहत 35 विमान शामिल हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि रूस पक्ष भारत में कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाले विमानों की बड़ी मांग देख रहा है।  आईएल-114-300: क्षेत्रीय उड़ानों का संभावित गेम चेंजर आईएल-114-300 एक टर्बोप्रॉप क्षेत्रीय यात्री विमान है जिसे रूस यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन ने विकसित किया है. यह विमान मुख्य रूप से छोटे शहरों और क्षेत्रीय मार्गों को जोड़ने के लिए उपयुक्त माना जाता है. भारत जैसे विशाल देश में जहां कई छोटे शहर अभी भी अच्छी हवाई कनेक्टिविटी का इंतजार कर रहे हैं, ऐसे विमान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।  जनवरी में विंग्स इंडिया एविएशन एग्जीबिशन के दौरान हैदराबाद में यूएसी ने भारतीय कंपनी फ्लेमिंगो एयरोस्पेस के साथ छह आईएल-114-300 विमानों की संभावित आपूर्ति के लिए प्रारंभिक समझौता किया था. अब इन्नोप्रोम के दौरान इससे बड़े सौदे होने की संभावना जताई जा रही है।  अगर ये समझौते सफल होते हैं तो यह न सिर्फ रूसी विमानों के लिए भारतीय बाजार का दरवाजा खोलेगा बल्कि भारत की क्षेत्रीय हवाई सेवाओं को भी नई दिशा देगा. भारतीय पक्ष के लिए यह आकर्षक इसलिए भी है क्योंकि कई घरेलू ऑपरेटर छोटे विमानों की तलाश में हैं जो कम यात्री क्षमता वाले मार्गों पर आर्थिक रूप से प्रैक्टिकल हों. बड़े जेट विमान इन मार्गों पर घाटे में चलते हैं, जबकि टर्बोप्रॉप विमान ईंधन की बचत और संचालन लागत कम रखने में मदद कर सकते हैं।  एसजे-100 का स्थानीय उत्पादन: मेक इन इंडिया की दिशा में कदम आईएल-114-300 के अलावा रूस पक्ष एसजे-100 क्षेत्रीय जेट के भारत में स्थानीय उत्पादन पर भी गंभीरता से काम कर रहा है. यूएसी के अनुसार इस विषय पर बातचीत लगभग 80% पूरी हो चुकी है. जल्द ही समझौता होने की उम्मीद है. इससे पहले यूएसी और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने एसजे-100 के संयुक्त लाइसेंस प्राप्त उत्पादन से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।  एसजे-100 एक आधुनिक क्षेत्रीय जेट है जिसे रूस ने विकसित किया है. भारत में इसका उत्पादन शुरू होने से न सिर्फ तकनीक का हस्तांतरण होगा बल्कि स्थानीय निर्माण क्षमता भी बढ़ेगी. भारतीय कंपनियां अगर इस विमान का बड़ा हिस्सा देश में ही बना पाती हैं तो लागत कम होगी, रोजगार बढ़ेगा और भविष्य में निर्यात की संभावनाएं भी खुलेंगी। स्थानीय उत्पादन की बातचीत इतनी आगे बढ़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे दोनों देशों के बीच सिर्फ खरीदार-विक्रेता का रिश्ता नहीं बल्कि साझा विनिर्माण साझेदारी बनेगी. रक्षा क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे सहयोग के बाद नागरिक विमानन में भी ऐसा मॉडल अपनाना दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।  भारत-रूस सहयोग का नया अध्याय भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग दशकों पुराना है. लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, मिसाइल सिस्टम और अन्य प्लेटफॉर्म दोनों देशों के रिश्ते की रीढ़ रहे हैं. अब रूस नागरिक विमानन क्षेत्र में भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है. पश्चिमी देशों पर प्रतिबंधों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों के बीच रूस नए बाजारों की तलाश में है. भारत उसकी नजर में एक बड़ा और स्थिर बाजार है।  इन्नोप्रोम इंडिया प्रदर्शनी इसी रणनीति का हिस्सा लगती है. यहां सिर्फ विमान सौदों की बात नहीं हो रही बल्कि औद्योगिक सहयोग के कई अन्य क्षेत्रों पर भी चर्चा हो रही है. 120 से अधिक कंपनियों की भागीदारी से साफ है कि दोनों देश सिर्फ सरकारी स्तर पर नहीं बल्कि निजी क्षेत्र से भी रिश्ते मजबूत करना चाहते हैं।  क्षेत्रीय कनेक्टिविटी भारत सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है. उड़ान योजना के तहत छोटे शहरों को हवाई सेवा से जोड़ने के प्रयास चल रहे हैं. रूसी क्षेत्रीय विमान अगर प्रतिस्पर्धी कीमत और विश्वसनीय सेवा के साथ आते हैं तो वे इस लक्ष्य को पूरा करने में मददगार साबित हो सकते हैं. साथ ही स्थानीय उत्पादन से भारत की विमानन विनिर्माण क्षमता भी मजबूत होगी।  संभावनाएं और चुनौतियां दोनों मौजूद ये प्रस्ताव आशाजनक जरूर हैं लेकिन कई चुनौतियां भी हैं. सबसे पहले प्रमाणन और नियामक मंजूरी का मुद्दा. किसी भी नए विमान को भारतीय आसमान में उड़ान भरने के लिए सख्त सुरक्षा और प्रमाणन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. दूसरी चुनौती रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता है. लंबे समय तक विमानों को सुचारू रूप से चलाने के लिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम जरूरी होता है।  तीसरी चुनौती कॉम्पीटिशन है. भारतीय बाजार में अन्य देशों के क्षेत्रीय विमान भी मौजूद हैं या आने की कोशिश कर रहे हैं. कीमत, फ्यूल एफिसिएंसी, यात्री सुविधा और आफ्टर सेल्स सपोर्ट जैसे मुद्दे फैसला करने वाले साबित होंगे. चौथी बात फाइनेंशियल सपोर्ट की है. बड़े सौदों के लिए आसान ऋण सुविधा या लीजिंग व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।  इन चुनौतियों के बावजूद रूस पक्ष आशावादी नजर आ रहा है. पिछले छह महीनों में हुई प्रगति और इन्नोप्रोम में संभावित समझौते इस बात का संकेत देते हैं कि दोनों देश व्यावहारिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. अगर आईएल-114-300 के बड़े ऑर्डर और एसजे-100 का स्थानीय उत्पादन दोनों सफल होते हैं तो यह भारत-रूस एयरोस्पेस संबंधों का नया अध्याय साबित हो सकता है।  आगे की राह और रणनीतिक महत्व भारत के लिए यह सहयोग कई मायनों में फायदेमंद हो … Read more

यूरोप की ऊर्जा जरूरतों का नया समाधान! समुद्र में बना आर्टिफिशियल आइलैंड, 3.5 GW विंड पावर का होगा हब

ब्रसेल्स  सौ बात की एक बात कि बिजली पैदा करने को लेकर यूरोप के देश बेल्जियम से एक ऐसी ख़बर आई जिस पर ज़्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया लेकिन सबको ध्यान देने की ज़रूरत है. बिजली पैदा करने के लिए दुनिया में क्या-क्या किया जा रहा है, इस पर सब को नज़र रखने की ज़रूरत है. क्योंकि दुनिया में ताक़त का खेल इसी आधार पर होता जा रहा है कि किसके पास कितनी ऊर्जा बनाने की कपैसिटी है. ईरान युद्ध में सारा खेल ही तेल के व्यापार को कंट्रोल करने का है. AI की जंग जो चल रही है, उसमें दुनिया के डेटा सेंटरों पर कंट्रोल करने के लिए बड़ी भारी मात्रा में बिजली की ज़रूरत पड़ेगी, ये सब देश समझ रहे हैं. ऊधर रूस और यूक्रेन युद्ध में यूरोप ने देख लिया कि उसके हाथ इसलिए बंधे हुए हैं क्योंकि उसको सर्दियों में अपने हीटिंग सिस्टम चलाने के लिए रूस की गैस की ज़रूरत पड़ती है. और यूरोप में अब जिस हिसाब से गर्मी पड़ने लग गई है तो वो ये भी समझ रहे हैं कि अब तो वहां भी AC लगाने पड़ेंगे आगे चल कर।  अभी तक पंखे भी नहीं देखे थे उन्होंने. तो बिजली कहां से आएगी इतनी? कोयले से बना नहीं सकते क्योंकि कोयला जला-जला कर ही तो 100 साल में दुनिया का ये हाल हो गया है कि दुनिया भर में गर्मी बढ़ गई है. यूरोप दूसरों को नसीहत दे रहा है कि कोयला मत जलाओ तो ख़ुद कैसे जला लेगा? तेल और गैस के लिए या तो रूस के सामने झुकना पड़ता है या अरब देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. परमाणु बिजली के लिए यूरेनियम की मारामारी है. सोलर बिजली के लिए ज़मीन भी चाहिए जो यूरोप के कई देशों में उतनी है नहीं और बड़ी बात ये कि सूरज तो वहां निकलता ही कितने दिन है साल में? तो यूरोप के कई देश बनाते हैं बिजली हवा से।  हवा से मतलब विंडमिल से. पवन चक्कियों से. वो देखा है ना आपने बड़ा से पंखा लगा देते हैं ऊंचाई पर और वो हवा से चलता है तो नीचे चक्की चलती है और उससे बिजली बनाते हैं. लेकिन उसके लिए क्या चाहिए? एक तो बहुत सारी पवन चक्कियां एक साथ लगाने के लिए ख़ाली मैदान चाहिएं जहां खुली हवा तेज़ी से चलती हो. इतनी ज़मीन कहां से लाएं एक साथ? और ज़मीन पर पवन चक्कियां लगा दें तो खेती नहीं कर सकते वहां फिर. वो अलग नुक़सान है. क्योंकि अगर पवन चक्कियां वहां लगाएं जहां पर भी थोड़ी-बहुत जगह मिले तो वो तो कर सकते हैं लेकिन फिर ये दूर-दूर लगे पंखों से बिजली बनाकर एक जगह लाने के लिए इतना सारी केबल लगानी पड़ेगी, नहीं तो उसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कैसे करेंगे? और यूरोप के बेल्जियम जैसे देशों के पास तो वैसे भी इतनी सारी खुली ज़मीन नहीं है एक साथ. तो जानते हैं बेल्जियम क्या कर रहा है? बेल्जियम ने लगाया टापू वाला दिमाग बेल्जियम ने देखा कि सबसे ज़्यादा खुली और तेज़ हवा बिना किसी रुकावट के कहां चलती है? दिन हो रात कौन-सी ऐसी जगह है जहां पवन चक्कियों के पंखे फ़र्र-फ़र्र चलते रहेंगे और बिजली बनाते रहेंगे? और ज़मीन भी नहीं छोड़ने पड़ेगी उनके लिए? समुद्र में. जी, बेल्जियम ने सोचा कि अगर समुद्र में पवन चक्कियां लगा दें तो? पानी में ताल बिछाकर बिजली ज़मीन तक ले आएंगे. लेकिन समुद्र में पवन चक्कियां लगाएंगे कहां? तैरते हुए प्लैटफ़ॉर्म पर तो लगा नहीं सकते क्योंकि वो तो हवा से डोल जाएंगे. तो बेल्जियम क्या कर रहा है कि समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है. जी, पूरा नया टापू समुद्र के अंदर. ये अपने आप में दुनिया का एक नया अजूबा बनाया जा रहा है.  वो समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है बिजली पैदा करने के लिए।  कहां बन रहा यह आइलैंड? नॉर्थ सी में, उत्तर सागर में, बेल्जियम अपने तट से क़रीब 45 km दूर एक आर्टिफ़िशियल एनर्जी आइलैंड बना रहा है. प्रिंसेस एलिज़ाबेथ आइलैंड के नाम से. ये दुनिया का पहला ऐसा टापू बन रहा है. और ये टापू बनाया कैसे जा रहा है वो असली समझने वाली बात है. जैसे बच्चों के खिलौने होते हैं ना जिनमें ब्लॉक जोड़-जोड़ कर कोई बिल्डिंग बनाई जाती है या कुछ भी बनाया जाता है? वैसे बना रहा है. सिमेंट के, कॉन्क्रीट के बड़े-बड़े ब्लॉक बना रहा है, बक्से बना रहा है. और इन बक्सों में समंदर में डाल दिया जाएगा और उनको जोड़कर पूरा टापू बना देंगे. द नेदरलैंड्स के फ़्लिसिंगेन बंदरगाह में 23 ऐसे बड़े-बड़े कॉन्क्रीट के डिब्बे बनाए गए हैं. बड़े-बड़े मतलब एक-एक डिब्बा क़रीब 58m लंबा है, 28m चौड़ा है और 23 से 32m ऊंचा है. 58x28x32 समझ रहे हैं आप? मतलब एक 7 मंज़िला बिल्डिंग समझ लीजिए चौड़ी वाली. दो को जोड़ दो एक फ़ुटबॉल के मैदान जितनी जगह से भी ज़्यादा घेर लें, इतने बड़े-बड़े डिब्बे हैं. और हर डिब्बे का वज़न कितना? हर एक का वज़न है क़रीब 22,000 टन।  कैसे बन रहा आइलैंड मतलब समझ लो कोई 15,000 गाड़ियों जितना वज़न एक डिब्बे का. इतना सिमेंट लगा कर बने हैं ये डिब्बे. और ये तो अभी ख़ाली डिब्बों की बात हो रही है. खोखले बनाए गए हैं. 23 ऐसे डिब्बे. और इनको उतार दिया गया है समुद्र में. इन भारी डिब्बों को जहाज़ों से खींचकर समुद्र में ले जाया गया और वहां समुद्र के तल में डुबो दिया गया. और अब इनकी दीवारों के अंदर भरी जाएगी रेत. क़रीब बीस लाख क्यूबिक मीटर रेत भरी जा रही है. और ऐसे बनाया जा रहा है समुद्र के अंदर एक 6 हेक्टेयर का ठोस टापू. 6 हेक्टेयर मतलब लगभग 15 एकड़ का टापू बनेगा. मतलब समझ लो फ़ुटबॉल के 12 मैदानों जितना. उस पर बंदरगाह बनाया जाएगा, हेलीपैड बनाया जाएगा. और एक साथ 250 से ज़्यादा पवन चक्कियां लगाई जाएंगी, उनकी टर्बआइन लगाई जाएंगीं जिससे बिजली बनेगी और तारें बिछाई जाएंगी तट तक. डिब्बे समुद्र में उतार दिये गए हैं. बाक़ी काम में 5 साल लग जाएंगे. 2031 से बिजली मिलना शुरू हो जाएगी बेल्जियम को इससे।  कैसे बिजली पैदा होगी? यानी समुद्र में लगने वाली सैकड़ों पवन … Read more

पैकेज्ड फूड पर हेल्थ वार्निंग में देरी से सुप्रीम कोर्ट नाराज, FSSAI को लगाई फटकार

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड पर चेतावनी लेबल को लेकर एफएसएसएआई से नाराजगी जताई है. कोर्ट ने पूछा है कि पैकेजिंग पर चेतावनी में देरी क्यों हो रही है. अदालत ने इस मामले में और जानकारी मांगी है. साथ ही यह भी पूछा गया कि नमक और सोडियम की मात्रा को लेकर चेतावनी को लेकर क्या फैसला हुआ है।  सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि पहले हुई बैठक में स्टेकहोल्डर्स के साथ एफएसएसएआई ने कुछ बातों पर सहमति जताई थी, लेकिन अब वह अपनी बात से पलट गया है. वकील ने कहा कि आज एफएसएसएआई ने पूरी तरह यू टर्न ले लिया है, जो पहले तय हुआ था उससे अलग रुख अपना लिया है।  इस मामले में सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह ने अदालत में अपनी दलील रखी. उन्होंने बताया कि आईसीएमआर की गाइडलाइंस में दो श्रेणियां तय की गई हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि खाने की चीजों की जांच खास शर्तों के आधार पर होनी चाहिए. यानी टेस्टिंग सौ ग्राम की मात्रा पर और साथ ही हर सर्विंग की मात्रा पर भी होनी चाहिए, ताकि उपभोक्ता को सही जानकारी मिल सके।  जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि अदालत ने भी इस विषय पर अपने स्तर पर अध्ययन किया है. उन्होंने बताया कि आज इस मामले में आदेश पारित किया जाएगा, जो शाम तक या फिर कल तक अपलोड हो जाएगा. जस्टिस पारदीवाला ने वकीलों से कहा कि वे इस आदेश का अध्ययन करें और उसके बाद अदालत में वापस आएं. साथ ही यह भी कहा गया कि एफएसएसएआई और केंद्र सरकार भी इस आदेश को ध्यान से पढ़ें, ताकि आगे की सुनवाई में इस पर सही तरीके से बात हो सके।  यह मामला पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स पर हेल्थ वार्निंग लेबल से जुड़ा है, जिसमें अधिक चीनी, नमक और वसा की मात्रा की जानकारी उपभोक्ताओं तक साफ तरीके से पहुंचाने की मांग की गई है। 

BRICS समिट से पहले भारत-रूस की बड़ी डील, रीजनल एविएशन को मिलेगी नई उड़ान; जानें क्या है प्लान

नई दिल्ली नई दिल्ली में 12 से 13 सितंबर के बीच BRICS का 18वां शिखर सम्मेलन होने जा रहा है लेकिन उससे पहले ही रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच शुक्रवार को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर द्विपक्षीय बातचीत की उम्मीद है। इस बातचीत में यूक्रेन और ईरान में जारी युद्धों पर चर्चा के साथ-साथ द्विपक्षीय आर्थिक और रक्षा संबंधों को मजबूत करने पर विचार किया जाएगा। चर्चा है कि रूस BRICS समिट से पहले आयोजित हो रहे 'इनोप्रोम इंडिया' एग्जीबिशन में रूसी कंपनियां भारत में अपनी एविएशन मौजूदगी बढ़ाने के लिए भारतीय एविएशन कंपनियों के साथ कई विमान खरीद समझौतों को अंतिम रूप देने की तैयारी कर रही हैं। इन प्रस्तावित डील्स में 105 रीजनल पैसेंजर विमान खरीद की डील शामिल है। इस डील से भारत में क्षेत्रीय विमानन उद्योग को पंख लगने के आसार हैं। दरअसल, दोनों देशों के बीच बढ़ते एविएशन सहयोग में रूस के यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन (UAC) का IL-114-300 रीजनल पैसेंजर विमान मुख्य आकर्षण बनकर उभरा है। UAC के CEO वादिम बादेखा ने कहा है कि पिछले छह महीनों में भारतीय पार्टनर्स के साथ बातचीत में काफी प्रगति हुई है और नई दिल्ली में 'इनोप्रोम इंडिया' (Innoprom India) एग्जीबिशन के दौरान कई समझौतों को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है। ये एग्जिबीशन नई दिल्ली में 9 से 11 सितंबर तक आयोजित हो रहे हैं। किन-किन कंपनियों के साथ डील? प्रस्तावित डील्स में पिनेकल एयर (Pinnacle Air) के लिए 50 IL-114-300 विमान, एयर केरल (Air Kerala) के लिए 20 विमान और स्लीक एविएशन (Sleek Aviation) के साथ हुए MoU (समझौता ज्ञापन) के तहत 35 और विमानों की योजना शामिल है। ये घटनाक्रम उस शुरुआती समझौते के बाद हुए हैं, जिस पर UAC ने जनवरी में भारतीय कंपनी फ्लेमिंगो एयरोस्पेस (Flamingo Aerospace) के साथ छह IL-114-300 विमानों की संभावित सप्लाई के लिए हस्ताक्षर किए थे। दोनों पक्षों ने हैदराबाद में 'विंग्स इंडिया' (Wings India) एविएशन एग्जीबिशन के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। भारत में होगा SJ-100 रीजनल जेट का प्रोडक्शन रूस भारत को विमान मैन्युफैक्चरिंग के विस्तार के लिए एक संभावित बेस के तौर पर भी देख रहा है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट में कहा गया है कि UAC के अनुसार, भारत में SJ-100 रीजनल जेट के लोकल प्रोडक्शन पर बातचीत लगभग 80 फीसदी पूरी हो चुकी है और जल्द ही समझौते पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। UAC और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने इस साल की शुरुआत में भारत में SJ-100 के जॉइंट लाइसेंस्ड प्रोडक्शन से संबंधित एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 'इनोप्रोम इंडिया' में 120 से अधिक कंपनियां शामिल बता दें कि एविएशन सेक्टर में यह सहयोग तब तेजी पकड़ रहा है जब रूस पारंपरिक डिफेंस प्लेटफॉर्म्स से आगे बढ़कर भारत के साथ इंडस्ट्रियल सहयोग को गहरा करना चाहता है। प्रस्तावित विमान डील्स भारत-रूस एयरोस्पेस संबंधों के सिविल एविएशन, रीजनल कनेक्टिविटी और विमान मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्रों में संभावित विस्तार का संकेत देती हैं। BRICS समिट से पहले नई दिल्ली में 9 से 11 सितंबर तक आयोजित हो रहे 'इनोप्रोम इंडिया' (Innoprom India) में 120 से अधिक रूसी और भारतीय कंपनियां एक साथ आई हैं।

‘अंतरिक्ष की संभावनाएं असीमित’, पीएम मोदी ने बताया भारत का स्पेस मिशन प्लान

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को पेरिस में चल रही इंटरनेशनल स्पेस समिट को वर्चुअली संबोधित किया. अपने संबोधन की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी ने इस समिट का न्योता देने के लिए फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों का शुक्रिया अदा किया. उन्होंने कहा कि सदियों से अंतरिक्ष हमारी कल्पनाओं को प्रेरित करता आ रहा है और आज ये पृथ्वी पर जिंदगियां बचा रहा है. उन्होंने कहा कि 'अंतरिक्ष की संभावनाएं असीमित हैं. हमारी जिम्मेदारी सामूहिक है.' संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि 'भारत का दृष्टिकोण 'वसुधैव कुटुंबकम' पर आधारित है, यानी 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य'. यह भावना पृथ्वी से आगे भी जानी चाहिए. हम अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर आधारित एक सुरक्षित और टिकाऊ अंतरिक्ष क्षेत्र का समर्थन करते हैं.' उन्होंने कहा, 'वैज्ञानिक डेटा का इस्तेमाल खुलेपन और ईमानदारी के साथ एक साझा लक्ष्य के लिए किया जाना चाहिए. भारत की अंतरिक्ष यात्रा इसी सोच को दर्शाती है.' पीएम ने की इसरो की तारीफ पीएम मोदी ने भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो की भी तारीफ की. उन्होंने कहा कि 'ISRO की टेक्नोलॉजी और पार्टनरशिप न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया के काम आती हैं. इस वैश्विक भरोसे के पीछे भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और टेक्नीशियनों की कई पीढ़ियों की मेहनत और लगन है. दिन-रात काम करके उन्होंने ISRO की साख बनाई है.' भारत के स्पेस मिशन के बारे में बताया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंटरनेशनल स्पेस समिट में भारत के स्पेस मिशन के बारे में भी दुनिया को बताया. उन्होंने कहा, 'चंद्रयान-3 ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने वाला पहला देश बना दिया. आदित्य-L1 सूर्य के रहस्यों का पता लगा रहा है. पिछले साल, एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का दौरा किया.' भारत की स्पेस जर्नी के भविष्य के बारे में बताते हुए पीएम मोदी ने कहा, 'आगे की बात करें तो, हमारा लक्ष्य 2035 तक एक भारतीय स्पेस स्टेशन स्थापित करना और 2040 तक किसी भारतीय को चंद्रमा पर भेजना है.'  

BRICS समिट के लिए भारत पहुंचेंगे शी जिनपिंग, 7 साल बाद होगा चीन के राष्ट्रपति का दौरा

 नई दिल्ली चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग BRICS समिट में शामिल होने के लिए भारत आ सकते हैं. बीजिंग में चीन के विदेश मंत्रालय यानी MFA की ओर से आज उनके भारत दौरे का आधिकारिक ऐलान किए जाने की उम्मीद है. राष्ट्रपति शी का शनिवार दोपहर दिल्ली पहुंच सकते हैं. शाम करीब छह बजे भारत मंडपम में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात हो सकती है।  BRICS समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच भारत मंडपम में द्विपक्षीय बैठक भी हो सकती है. यह बैठक भारत-चीन रिश्तों के लिहाज से अहम मानी जा रही है।  खास बात यह है कि मोदी और शी जिनपिंग की भारतीय जमीन पर करीब 7 साल बाद पहली द्विपक्षीय मुलाकात होगी. यह बैठक गलवान झड़पों के बाद भी दोनों नेताओं की भारत में पहली द्विपक्षीय बैठक होगी।  भारत में 12-13 सितंबर को होगा BRICS समिट भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है. भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसकी थीम "Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability" रखी गई है।  सम्मेलन में सदस्य और पार्टनर देशों के नेता वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ BRICS के बीच राजनीतिक-सुरक्षा, आर्थिक-वित्तीय और लोगों के बीच सहयोग बढ़ाने पर चर्चा करेंगे. 2026 में BRICS की स्थापना के 20 साल भी पूरे हो रहे हैं।  NSG कमांडो समेत 25000 जवान होंगे तैनात; जानें 11 बड़े सुरक्षा इंतजाम  18वें BRICS शिखर सम्मेलन के लिए राजधानी दिल्ली को अभेद्य सुरक्षा घेरे में तब्दील किया जा रहा है। इस सम्मेलन में शिरकत करने 11 सदस्य देशों और 10 साझेदार देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रतिनिधि आ रहे हैं। इनमें दो नाम बेहद अहम माने जा रहे हैं- पहला, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन और दूसरा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग। इनके आने की भी संभावना है। तीन दिवसीय BRICS समिट 11 सितंबर से शुरू होगा। सुरक्षा व्यवस्था का स्तर 2023 में हुए G20 शिखर सम्मेलन के करीब रखा जा रहा है। दिल्ली पुलिस की सुरक्षा यूनिट ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर व्यापक सुरक्षा प्लान तैयार किया है। करीब 25000 जवानों को तैनात किया जाएगा। इसमें 100 से अधिक NSG कमांडो भी शामिल होंगे। एंटी-ड्रोन सिस्टम और लगातार मॉक ड्रिल के जरिए दिल्ली में जमीन से लेकर आसमान तक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जा रही है।आइए जानते हैं BRICS समिट के लिए दिल्ली में किए जा रहे 11 बड़े सुरक्षा इंतजाम…     25000 जवान संभालेंगे सुरक्षा की कमान BRICS समिट के दौरान दिल्ली में करीब 25000 सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की जा रही है। दिल्ली पुलिस के अलावा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के जवान भी सुरक्षा व्यवस्था में शामिल होंगे।     100 से ज्यादा NSG कमांडो तैनात VVIP सुरक्षा को देखते हुए 100 से अधिक NSG कमांडो भी तैनात किए जा रहे हैं। भारत मंडपम समेत संवेदनशील स्थानों पर विशेष सुरक्षा व्यवस्था रहेगी। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा एजेंसियां लगातार खतरे का आकलन करेंगी।     आसमान पर एंटी-ड्रोन सिस्टम से नजर समिट के दौरान ड्रोन और अन्य फ्लाइंग ऑब्जेक्ट्स से हर हवा में मौजूद खतरों पर निगरानी की जाएगी। संभावित खतरे को देखते हुए एंटी-ड्रोन सिस्टम तैनात किए जाएंगे।     भारत मंडपम से होटलों तक हाई-सिक्योरिटी कॉरिडोर समिट का मुख्य आयोजन स्थल भारत मंडपम होगा। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और मेहमानों के ठहरने वाले होटलों से भारत मंडपम तक के पूरे रूट को हाई-सिक्योरिटी कॉरिडोर के तौर पर तैयार किया जा रहा है। करीब 30 DCP रैंक के अधिकारी इसकी निगरानी करेंगे।     10 होटलों पर विशेष सुरक्षा विदेशी मेहमानों और प्रतिनिधिमंडलों से जुड़े 10 होटल सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम होंगे। इन होटलों के आसपास सुरक्षा बढ़ाई जा रही है।     VVIP काफिलों की बार-बार मॉक ड्रिल सुरक्षा व्यवस्था को परखने के लिए दिल्ली पुलिस, दिल्ली ट्रैफिक पुलिस, विदेश मंत्रालय और अन्य एजेंसियां लगातार मॉक ड्रिल कर रही हैं। VVIP मोटरकेड की आवाजाही का 12 प्रमुख स्थानों पर अभ्यास किया जा रहा है, ताकि वास्तविक मूवमेंट के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो।     22 डायवर्जन पॉइंट, 4800 ट्रैफिक पुलिसकर्मी विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधियों के काफिलों की आवाजाही के दौरान ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए 22 डायवर्जन पॉइंट बनाए गए हैं। करीब 4,800 ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की तैयारी है। VVIP मूवमेंट के दौरान आम लोगों को ट्रैफिक संबंधी दिक्कतों से बचाने के लिए रूट डायवर्जन किए जाएंगे।     मोटरकेड की गाड़ियों में GPS VVIP काफिले में शामिल वाहनों को GPS से लैस किया जा रहा है। इससे सुरक्षा एजेंसियां मोटरकेड में शामिल वाहनों की स्थिति को रियल टाइम में मॉनिटर कर सकेंगी। एयरपोर्ट, होटल और भारत मंडपम के बीच होने वाली आवाजाही पर विशेष नजर रहेगी।     एंटी-सैबोटाज और बम निरोधक दस्ते सक्रिय भारत मंडपम, होटल और VVIP रूट पर एंटी-सैबोटाज टीम तथा बम डिटेक्शन एंड डिस्पोजल स्क्वॉड सुरक्षा जांच कर रहे हैं। संवेदनशील स्थानों की जांच और संदिग्ध वस्तुओं या गतिविधियों पर नजर रखने के लिए विशेष टीमें तैनात रहेंगी।     दिल्ली ही नहीं, पड़ोसी राज्यों तक सुरक्षा ग्रिड BRICS की सुरक्षा व्यवस्था को दिल्ली की सीमाओं तक सीमित नहीं रखा गया है। दिल्ली पुलिस हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और चंडीगढ़ की पुलिस एवं सुरक्षा एजेंसियों के साथ काम कर रही है। संदिग्ध लोगों और वाहनों की जांच, सीमा पर निगरानी और खुफिया सूचनाओं को तेजी से साझा करने के लिए साझा सुरक्षा ग्रिड तैयार किया गया है।     खाकी वर्दी में दिखेंगे CAPF जवान BRICS ड्यूटी में लगाए गए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के जवानों के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। BSF, ITBP और CRPF समेत CAPF के जवानों को खाकी वर्दी पहनने की सलाह दी गई है। पुतिन और शी जिनपिंग जैसे हाई-प्रोफाइल नेताओं के संभावित दौरे को देखते हुए दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए जमीन, सड़क और आसमान- तीनों स्तरों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर रही हैं। आखिरी बार अक्टूबर 2019 में शी जिनपिंग आए थे भारत चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पिछली भारत यात्रा 11-12 अक्टूबर 2019 को हुई … Read more

1993 मुंबई ब्लास्ट केस: अबू सलेम की जल्द रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, याचिका हुई खारिज

मुंबई  1993 के मुंबई धमाका मामले में दोषी करार कुख्‍यात गैंगस्‍टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका लगा है. शीर्ष अदालत ने अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई वाली याचिका को खारिज कर दिया है. इसका मतलब यह है कि अबू सलेम जेल से बाहर नहीं आ सकेगा. उसका कानूनी तिकड़म फेल हो गया है. इस मामले में अबू सलेम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है. बता दें कि वॉन्‍टेड गैंगस्‍टर को पुर्तगाल से प्रत्‍यर्पित करा कर भारत लाया गया था। आपको बता दें कि इसी साल अप्रैल में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा रिहाई की याचिका खारिज किए जाने के बाद अबू सलेम ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। उसे 1995 में बिजनेसमैन प्रदीप जैन की हत्या के मामले में 2015 में और 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में 2017 में TADA की स्पेशल कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "साधारण हिसाब से भी देखें तो 11 नवंबर, 2005 को जेल जाने की तारीख से आपके 25 साल पूरे नहीं हुए हैं।" अबू सलेम को मुंबई ब्लास्ट और प्रदीप जैन की हत्या के मामलों में मुकदमे का सामना करने के लिए भारत प्रत्यर्पित किया गया था, जब भारत सरकार ने यह पक्का भरोसा दिया था कि उसे 25 साल से ज्यादा जेल की सजा नहीं दी जाएगी। जब ट्रायल कोर्ट ने दोनों मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई तो सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई, 2022 को पुर्तगाल को दिए गए भारत के पक्के भरोसे के मुताबिक उसकी सजा को घटाकर 25 साल कर दिया। क्या थी अबु सलेम की दलील? अबू सलेम की तरफ से कहा गया था कि सजा में मिलने वाली छूट (remission) को जोड़ने पर उसने 25 साल की सजा पूरी कर ली है, इसलिए उसे रिहा किया जाए। हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि उसकी याचिका समय से पहले दायर की गई है। उसकी 25 साल की अवधि 2030 में पूरी होगी। अबू सलेम ने हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को सही माना है। आपको बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल महीने में भी अबू सलेम की याचिका को खारिज कर दिया था। क्या है पूरा केस? आपको बता दें कि 12 मार्च 1993 को मुंबई में एक के बाद एक 12 बड़े बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 250 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी और करीब 700 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस मामले में अबू सलेम को साल 2005 में पुर्तगाल से प्रत्यर्पित किया गया था। अबु सलेम को कोर्ट ने मुंबई ब्लास्ट में शामिल होने के लिए आजीवन कारावास की सजा दी थी।  क्या था अबू सलेम का तर्क? सुप्रीम कोर्ट में पहले हुई कार्यवाही में केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि उसकी 25 साल की सजा 11 नवंबर, 2005 से शुरू हुई थी और यह नवंबर 2030 में खत्म होगी। वहीं, अबू सलेम ने तर्क दिया है कि सजा की अवधि की गिनती 18 सितंबर 2002 से की जानी चाहिए जब भारत के कहने पर इंटरपोल द्वारा जारी रेड कॉर्नर नोटिस के बाद उसे पुर्तगाल में हिरासत में लिया गया था। केंद्र सरकार का तर्क है कि अबू सलेम को पुर्तगाल में पासपोर्ट से जुड़े एक अपराध के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था और उसकी हिरासत का उस अपराध से कोई लेना-देना नहीं था जिसके लिए उसे प्रत्यर्पित किया गया था। कौन है अबू सलेम? अबू सलेम अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के सिंडिकेट का हिस्सा था। जून 2017 में अबू सलेम को 1993 के मुंबई धमाकों के मामले में दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई। उसे सीरियल बम धमाकों में इस्तेमाल के लिए गुजरात से मुंबई हथियार ले जाने का दोषी पाया गया था। इन धमाकों में 257 लोगों की मौत हुई थी और 700 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।  

अगले 10 साल में AI मिटा सकता है इंसानी सभ्यता? Anthropic रिसर्चर के बयान से बढ़ी चिंता

नई दिल्ली AI को लेकर एक ऐसा दावा सामने आया है, जिसने पूरी टेक इंडस्ट्री में बहस छेड़ दी है. Anthropic के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेफ्टी एक्सपर्ट Evan Hubinger का कहना है कि उन्हें 10% से ज्यादा चांस लगता है कि अगले 10 साल में AI की वजह से इंसानों का सफाया हो सकता है।  इवान हुबिंगर एंथ्रोपिक में एलाइनमेंट साइंस लीड हैं. उन्होंने एक पोस्ट में AI के फ्यूचर को लेकर अपनी चिंता बताई. उनके मुताबिक सबसे बड़ा खतरा उस समय हो सकता है, जब AI इंसानी इंटेलिजेंस से काफी आगे निकल जाए और खुद को लगातार इम्प्रूव करने लगे. आइए जानते हैं डिटेल में।  इसे रिकर्सिव सेल्फ-इम्प्रूवमेंट कहा जाता है. अगर कोई AI खुद को बेहतर बनाने में इंसानों की मदद का मोहताज न रहे और अपने अगले वर्जन को खुद ही ज्यादा पावरफुल बना सके, तो उसकी कैपेबिलिटी बहुत तेजी से बढ़ सकती है। जानिए कैसे सुपरइंटेलिजेंस बन सकता है काल हुबिंगर का कहना है कि एंथ्रोपिक AI को सेफ रखने पर काम कर रही है, लेकिन फ्यूचर सुपरइंटेलिजेंस को पूरी तरह कंट्रोल में रखने का कोई पक्का सॉल्यूशन अभी मौजूद नहीं है।  उनका यह बयान एंथ्रोपिक के रिसर्चर Jacob Coxon के इस्तीफे के बाद सामने आया है. कॉक्सन ने भी AI कंपनियों की तेजी से बढ़ती रेस को लेकर चिंता जताई थी. उनका कहना था कि कंपनियां ज्यादा पावरफुल AI और सेल्फ-इम्प्रूविंग सिस्टम्स की तरफ तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन सेफ्टी के सवाल अभी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं।  हुबिंगर यह नहीं कह रहे कि आज मौजूद ChatGPT या दूसरे AI मॉडल्स अगले 10 साल में इंसानों को खत्म कर देंगे. उनकी चिंता फ्यूचर की सुपरइंटेलिजेंट AI को लेकर है. यानी मामला आज के AI से ज्यादा आने वाले AI का है।  AI कंपनियां लगातार ज्यादा पावरफुल मॉडल्स बनाने की कोशिश कर रही हैं. ऐसे में असली सवाल यही है कि AI को ज्यादा स्मार्ट बनाने की रेस में क्या उसकी सेफ्टी उतनी ही तेजी से आगे बढ़ रही है? इवान हुबिंगर का 10% वाला एस्टीमेट इसी चिंता को सामने लाता है. और यही वजह है कि AI सेफ्टी को लेकर बहस अब सिर्फ बाहर नहीं, बल्कि AI कंपनियों के अंदर भी तेज हो रही है।