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New York AI Ban: बच्चों की पढ़ाई में AI पर लगा ब्रेक, सरकारी स्कूलों में 8वीं कक्षा तक इस्तेमाल प्रतिबंधित

न्यूयॉर्क आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) को लेकर हर तरफ चर्चा है, अधिकतर लोग मानने लगे हैं कि अब इसके बिना कुछ भी संभव नहीं है, लेकिन अमेरिका के न्यूयॉर्क सिटी के अधिकारियों ने प्राइमरी स्कूलों में AI के इस्तेमाल पर रोक लगाने का ऐलान कर दिया है।  न्यूयॉर्क सिटी के अधिकारियों ने सार्वजनिक प्राथमिक और मिडिल स्कूलों के लिए बड़ा ऐलान कर दिया है. अब स्टूडेंट आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) के इस्तेमाल पर इस्तेमाल पर एक साल के लिए रोक का ऐलान कर दिया है।  अमेरिका में स्कूलों को लेकर AI के संबंध में लिया गया है, यह अब तक का सबसे बड़ा और सख्त फैसला माना जा रहा है. अब लॉस एंजिल्स समेत कई अन्य शहरों के स्कूलों में AI के नियमों का दोबारा रिव्यू किया जा रहा है।  40 एजुकेशन AI टूल को किया है बैन न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने बुधवार को बताया है कि शहर के स्कूलों की क्लासेस में फिलहाल इस्तेमाल किए जा रहे हैं 40 एजुकेशन AI टूल्स के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है।  स्टूडेंट को टीचर चाहिए और उनसे जुड़ाव चाहिए मेयर ने कहा है कि बच्चों को सीखने और बढ़ने के लिए टीचर चाहिए और उनसे जुड़ाव चाहिए. स्टूडेंट को साथियों के साथ मिलकर कौशल सीखने चाहिए और टीचर्स से नई-नई चीजों को सीखना चाहिए।  बच्चों के लिए एआई टूल्स पर क्यों लगी पाबंदी?     यह पाबंदी प्री-किंडरगार्टन से लेकर आठवीं कक्षा तक के छात्रों पर लागू की गई है। मेयर ममदानी और स्कूल्स चांसलर कामर सैमुअल्स द्वारा जारी इस निर्देश का मुख्य उद्देश्य बच्चों में क्रिटिकल थिंकिंग यानी खुद से सोचने-समझने की क्षमता को बचाना और शिक्षकों व छात्रों के बीच संवाद को बनाए रखना है।     इस नए नियम के तहत शिक्षा अधिकारी 38 से अधिक क्लासरूम प्रोग्राम्स के स्वचालित (ऑटोमेटेड) फीचर्स को पूरी तरह बंद कर देंगे। इसके अलावा चैटजीपीटी और क्लॉड जैसे पब्लिक चैटबॉट सभी स्तर के स्कूलों में पूरी तरह से ब्लॉक रहेंगे। न्यूयॉर्क ने साल 2023 में भी चैटजीपीटी पर बैन लगाया था, लेकिन बाद में इसे हटा लिया गया था। अब प्रशासन ने पिछली नीतियों में बदलाव करते हुए दो-तिहाई छात्रों के लिए सख्त नियम लागू कर दिए हैं। चैटबॉट्स के इस्तेमाल से बच्चों को क्या हैं नुकसान? क्रिटिकल थिंकिंग की कमी: एआई चैटबॉट्स से बच्चों को हर जटिल सवाल का बना-बनाया जवाब सेकंडों में मिल जाता है, इससे वे खुद से तर्क करना, समस्याओं का विश्लेषण करना और दिमागी कसरत करना छोड़ देते हैं। इससे उनकी सोचने समझने की क्षमता प्रभावित होती है। रचनात्मकता और मौलिकता की कमी: निबंध, कविताएं या प्रोजेक्ट खुद तैयार करने के बजाय बच्चे एआई का सहारा लेते हैं। इससे उनकी भाषा शैली, कल्पनाशीलता और खुद को अभिव्यक्त करने की प्राकृतिक कला धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। गलत सूचनाओं का असर: चैटबॉट्स अक्सर गलत या भ्रामक तथ्यों को बहुत ही प्रामाणिक और आत्मविश्वास भरे ढंग से पेश करते हैं। कच्ची उम्र के बच्चे इन जानकारियों को पूरी तरह सच मान लेते हैं, जिससे उनके बुनियादी ज्ञान की नींव ही गलत तथ्यों पर खड़ी हो सकती है। मानवीय और सामाजिक कौशल में गिरावट: कक्षा में दोस्तों के साथ ग्रुप डिस्कशन करने या शिक्षकों से सवाल पूछने की बजाय स्क्रीन देखते रहने के कारण बच्चों के संवाद और सामाजिक कौशल का विकास रुक जाता है। शिक्षक-छात्र संबंधों में दूरी: एक शिक्षक बच्चे की मानसिक स्थिति, उसकी कमजोरी और मजबूती को समझकर व्यक्तिगत मार्गदर्शन देता है। हर समस्या के लिए मशीनों पर निर्भरता इस भावनात्मक जुड़ाव और जरूरी मार्गदर्शन को पूरी तरह खत्म कर देती है। स्क्रीन टाइम लिमिट कम करने पर जोर     इस पाबंदी से हाई स्कूल के छात्रों को थोड़ी राहत दी गई है। उन्हें साल में दो बार एआई साक्षरता की कक्षाएं दी जाएंगी और कड़ी निगरानी में कुछ चुनिंदा एआई प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करने की छूट मिलेगी। दूसरी ओर शिक्षकों को लेसन प्लानिंग और प्रशासनिक कार्यों के लिए एआई टूल्स का उपयोग करने की अनुमति दी गई है।     हालांकि, कॉपियां जांचने (ग्रेडिंग) या छात्रों के किसी भी तरह के औपचारिक मूल्यांकन के लिए एआई का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित रहेगा। प्रशासन ने बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की लिमिट भी तय कर दी है। इसके तहत तीसरी से पांचवीं कक्षा के बच्चों के लिए 30 मिनट और छठी से आठवीं कक्षा के लिए 45 मिनट की अधिकतम सीमा निर्धारित की गई है। हालांकि, दिव्यांग छात्रों और अंग्रेजी भाषा सीखने वाले बच्चों को इन नियमों में विशेष छूट दी जाएगी। टेक कंपनियों के दावों पर मेयर का पलटवार प्रेस ब्रीफिंग के दौरान शहर के अधिकारियों ने टेक इंडस्ट्री की उस सोच को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें एआई को शिक्षा के लिए जरूरी बताया जाता है। मेयर जोहरान ममदानी ने कड़े शब्दों में कहा कि टेक कंपनियां हमें यह विश्वास दिलाना चाहती हैं कि शुरुआती शिक्षा में एआई जरूरी है, लेकिन हम ऐसा बिल्कुल नहीं मानते। उन्होंने तर्क दिया कि स्कूलों का काम बच्चों को सवाल पूछना और चीजों को परखना सिखाना है, इसलिए यह अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे व्यावसायिक सॉफ्टवेयर की आंख मूंदकर अनुमति देने के बजाय उसकी कड़ी निगरानी करें। फैसले पर उठ रहे सवाल     इस बड़े फैसले पर शिक्षा जगत से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। यूनाइटेड फेडरेशन ऑफ टीचर्स के अध्यक्ष माइकल मुलग्रू ने स्क्रीन टाइम लिमिट और विशेष बच्चों को दी गई छूट का स्वागत किया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि स्कूलों पर जिम्मेदारी डालने के बजाय टेक कंपनियों और सप्लायर्स से सीधे तौर पर सुरक्षा मानकों की मांग की जानी चाहिए।     वहीं फेयरप्ले के कार्यकारी निदेशक जॉश गोलिन ने चिंता जताई कि एआई के लंबे समय तक पड़ने वाले दुष्प्रभावों को समझने के लिए एक साल का समय काफी नहीं है। इसके अलावा सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बच्चे स्कूल के बाद घर जाकर अपने मोबाइल या कंप्यूटर पर होमवर्क के लिए एआई का इस्तेमाल कर सकते हैं।     चांसलर कामर सैमुअल्स ने भी माना कि घर पर बच्चों की डिजिटल आदतों पर नजर रखने के लिए स्कूल के साथ-साथ अभिभावकों की भी मदद लेनी होगी। इस पूरी प्रक्रिया और इसके प्रभाव पर नजर रखने … Read more

तबाही के बाद राहत शिविरों में बदहाल जिंदगी, नेपाल की पीड़ित महिलाओं ने बताई दर्दनाक मुश्किलें

काठमांडू  नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने हजारों लोगों की जिंदगी तबाह कर दी है. घर उजड़ गए, सामान बह गया और बड़ी संख्या में लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं. लेकिन बाढ़ से बच निकलने के बाद भी महिलाओं की मुश्किलें खत्म नहीं हुई हैं।  AFP की ग्राउंड रिपोर्ट में नेपाल के राहत शिविरों में रह रही महिलाओं की ऐसी परेशानियां सामने आई हैं, जिन पर आमतौर पर आपदा के दौरान कम बात होती है. महिलाओं के लिए पीरियड्स, साफ पानी, टॉयलेट, कपड़े और प्राइवेसी जैसी रोजमर्रा की जरूरतें भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।  ‘पैड तो मिल रहे हैं, लेकिन अंडरवियर नहीं’ AFP की रिपोर्ट के मुताबिक, राहत शिविर में रह रही कुछ महिलाओं ने बताया कि उन्हें सैनिटरी पैड मिल रहे हैं, लेकिन पहनने के लिए अंडरगारमेंट्स जैसी जरूरी चीजें आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।  बाढ़ में घर और सामान खो चुकी महिलाओं के लिए यह समस्या और बड़ी हो गई है. पीरियड्स के दौरान सिर्फ पैड मिलना ही काफी नहीं होता. साफ पानी, टॉयलेट, कपड़े बदलने की जगह और निजी स्वच्छता के लिए जरूरी सुविधाएं भी चाहिए होती हैं।  400 से ज्यादा लोगों के लिए सिर्फ तीन टॉयलेट AFP की रिपोर्ट में राहत शिविरों में सैनिटेशन की स्थिति भी सामने आई है. एक शिविर में 400 से ज्यादा लोगों के लिए सिर्फ तीन टॉयलेट होने की बात बताई गई है।  महिलाओं के लिए परेशानी इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि उन्हें टॉयलेट के साथ-साथ नहाने और कपड़े बदलने के लिए भी पर्याप्त प्राइवेसी चाहिए. लेकिन आपदा के बाद बनाए गए अस्थायी शिविरों में ये सुविधाएं अक्सर सीमित होती हैं।  बाढ़ ने छीन ली सिर्फ छत नहीं, निजी जिंदगी भी घर उजड़ने के बाद राहत शिविर में पहुंचना किसी परिवार के लिए राहत की शुरुआत हो सकती है, लेकिन महिलाओं की जिंदगी में कई निजी मुश्किलें वहीं से शुरू होती हैं।  घर में जिन चीजों को लेकर कभी सोचना नहीं पड़ता था, वही चीजें अब जरूरत बन जाती हैं- साफ कपड़े, अंडरगारमेंट्स, सैनिटरी पैड, साफ पानी और ऐसी जगह जहां वे बिना किसी झिझक के अपनी निजी जरूरतें पूरी कर सकें।  AFP की रिपोर्ट इस बात को सामने लाती है कि आपदा राहत सिर्फ खाना, पानी और टेंट उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हो सकती. महिलाओं की गरिमा और स्वच्छता से जुड़ी जरूरतों को भी राहत व्यवस्था का अहम हिस्सा बनाना जरूरी है।  जिंदगी बच गई, लेकिन सामान्य जिंदगी कब लौटेगी? बाढ़ से बच जाना निश्चित तौर पर सबसे बड़ी राहत है. लेकिन जिन लोगों ने अपना घर और सामान खो दिया है, उनके लिए सामान्य जिंदगी में लौटना लंबा सफर है।  राहत शिविरों में रह रही महिलाओं की बातें इसी संघर्ष को सामने लाती हैं. उनके लिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आज खाना मिलेगा या नहीं. सवाल यह भी है कि वे कब फिर से अपने घर जैसी सुरक्षा, प्राइवेसी और सम्मान के साथ जिंदगी जी पाएंगी।  AFP की रिपोर्ट के जरिए सामने आई ये तस्वीर बताती है कि किसी आपदा का असर पानी उतरने के बाद भी लंबे समय तक लोगों की जिंदगी में बना रहता है। 

Pentagon में हड़कंप, ईरान युद्ध की सीक्रेट जानकारी लीक होने पर 50 अधिकारियों का लाई डिटेक्टर टेस्ट

वाशिंगटन ईरान युद्ध से जुड़ी अहम जानकारी मीडिया तक पहुंचने के मामले में अमेरिका ने जांच तेज कर दी है. पेंटागन (संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग ) ने करीब 50 ज्वाइंट स्टाफ सदस्यों का ट्रंप सरकार ने पॉलीग्राफ टेस्ट कराया है. जांच का मकसद यह पता लगाना है कि ईरान युद्ध से जुड़ी गोपनीय जानकारी पत्रकारों तक किसने पहुंचाई।  पहले जानते हैं पॉलीग्राफ टेस्ट क्या है. पॉलीग्राफ टेस्ट (Polygraph Test) को आम भाषा में लाई डिटेक्टर टेस्ट (Lie Detector Test) या झूठ पकड़ने वाली जांच कहा जाता है. इसमें सवालों के जवाब देते समय व्यक्ति की सांस, दिल की धड़कन और शरीर में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड किया जाता है. इन बदलावों से जांचकर्ता यह समझने की कोशिश करते हैं कि जवाब देते समय व्यक्ति के शरीर में किस तरह की प्रतिक्रिया हुई।  हालांकि, किसी व्यक्ति के तनाव में होने का मतलब यह अपने आप साबित नहीं करता कि वह झूठ बोल रहा है. इसलिए पॉलीग्राफ टेस्ट को जांच का एक हिस्सा माना जाता है, अंतिम सबूत नहीं. खैर, अब लौटते हैं अपनी खबर पर।  यह जानकारी अमेरिकी न्यूज एजेंसी द न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, जांच के दायरे में अमेरिकी सेना के ज्वाइंट स्टाफ से जुड़े करीब 50 लोग आए हैं. इनमें सैन्य अधिकारी के साथ कुछ नागरिक कर्मचारी भी शामिल हैं. पिछले महीने उनसे सवाल किए गए कि क्या उन्होंने अमेरिका के कम होते हथियारों के भंडार से जुड़ी जानकारी किसी पत्रकार को दी थी।  ईरान युद्ध में हथियारों की कमी की जानकारी लीक होने का शक मामला सिर्फ सामान्य सैन्य जानकारी के लीक होने का नहीं है. जांच उन खबरों को लेकर हो रही है, जिनमें ईरान के साथ युद्ध के दौरान अमेरिका के कुछ जरूरी हथियारों की कमी की बात सामने आई थी. ऐसे हथियार युद्ध में बेहद अहम होते हैं, इसलिए इनसे जुड़ी जानकारी को संवेदनशील माना जाता है. अब अमेरिकी जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि सैन्य व्यवस्था के भीतर से यह जानकारी बाहर कैसे पहुंची. इसी वजह से ज्वाइंट स्टाफ से जुड़े लोगों से पूछताछ की गई. पॉलीग्राफ टेस्ट भी इसी जांच का हिस्सा है।  पेंटागन ने क्या कहा? इस मामले पर पेंटागन ने जांच से जुड़ी खास जानकारी देने से इनकार किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने कहा कि विभाग आंतरिक कर्मचारियों या जांच से जुड़े मामलों पर टिप्पणी नहीं करता. उनका कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी लीक होने के सभी मामलों को बेहद गंभीरता से लिया जाता है और उनकी जांच की जाती है।  पेंटागन अमेरिका के रक्षा विभाग का मुख्यालय है. यह वर्जीनिया के आर्लिंगटन में स्थित है. फिलहाल जांच का सबसे बड़ा सवाल यही है कि ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका के हथियारों की स्थिति से जुड़ी संवेदनशील जानकारी पत्रकारों तक आखिर कैसे पहुंची।   

लद्दाख में सिंधु नदी पर भारत की बड़ी तैयारी, रॉक डैम से 4 करोड़ लीटर पानी होगा स्टोर

नई दिल्ली भारत का पहला 'रॉक चेक डैम' सिंधु नदी पर लद्दाख में बना रहा है. जिससे किसानों को आसानी से पानी मिलेगा. यह डैम बिना सीमेंट के सिर्फ प्राकृतिक पत्थरों से बनाया गया है. ऐसे में यह कदम न सिर्फ स्थानीय किसानों के लिए संजीवनी है, बल्कि पाकिस्तान की तरफ पानी बहने से पहले अपने जल संसाधनों का भरपूर उपयोग करने की भारत की नई रणनीति को भी स्पष्ट रूप से दर्शाता है. भारत ने एक तरह से पाकिस्तान को भी क्लीयर संदेश दिया है कि सिंधु नदी को लेकर अब पूरी तरह से रणनीति स्पष्ट है कि पानी का उपयोग भारत पूरी तरह से करने के लिए तैयार है।  बिना सीमेंट का है पूरा डैम लद्दाख में बना भारत का पहला रॉक डैम बिना सीमेंट और चूने का बनाया गया है. बल्कि नदी के तल के भारी पत्थरों  को आपस में इंटरलॉक करके इसे खड़ा किया गया है. जिसका सबसे ज्यादा फायदा लद्दाख के किसानों को होगा. सालों से लद्दाख के किसान वसंत ऋतु में बुवाई के दौरान भारी जल संकट से जूझ रहे थे, सिंधु नदी का जलस्तर गहरी घाटियों में काफी नीचे चला जाता था, जिससे पंप से पानी खींचना बेहद मुश्किल था. पानी की इसी किल्लत ने खेती और किसानों की आर्थिक कमर तोड़ दी थी. लेकिन अब इस डैम के बनने से पानी का जलस्तर ऊंच रहेगा. सिंधु नदी का जलस्तर करीब 10 फीट तक चला गया है. डैम में 40 मिलियन यानि 4 करोड़ लीटर पानी जमा होगा. 'इगू फे' सिंचाई नहर के जरिए सूखे गांवों और खेतों की प्यास बुझा रहा है।  पाकिस्तान को कड़ा संदेश  एक तरफ लद्दाख में बना यह डैम किसानों को पानी उपलब्ध करा रहा है. तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के लिए एक सख्त रणनीतिक संदेश है. यह दिखाता है कि भारत अब सिंधु के पानी का इस्तेमाल अपने सीमावर्ती इलाकों के विकास के लिए पूरी तेजी से कर रहा है. बता दें कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को सस्पेंड कर दिया था. भारत ने साफ किया कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को पूरी तरह नहीं रोकता, तब तक यह समझौता बहाल नहीं होगा. अब इस पर भारत का सख्त मिजाज दिख रहा है।  लद्दाख में होगा पानी का इस्तेमाल  भारत ने लद्दाख और जम्मू-कश्मीर में अपने जल अधिकारों का उपयोग तेज कर दिया. उपशी में पहले रॉक चेक डैम का पायलट प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक आगे बढ़ा और सिंधु नदी पर कई अन्य पनबिजली परियोजनाओं को भी गति दी गई . लद्दाख प्रशासन अब जल सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रहा है. केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय को एक नया प्रस्ताव भेजा गया है जिसके तहत।  लद्दाख में ये 4 प्वाइंट अहम      लद्दाख में कुल 36 नए चेक डैम प्रोजेक्ट बनाए जाएंगे.     लेह इलाके में 7 हिमालयन रॉक चेक डैम बनेंगे.     कारगिल इलाके में 29 चेक डैम या वियर छोटी बांधनुमा संरचना का निर्माण होगा.     इन महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की अनुमानित लागत 56 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है. 

धामी सरकार का बड़ा फैसला, ‘हनुमान अंश’ होगी टैक्स-फ्री

देहरादून। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, नदियों और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। यह धरती सदियों से संतों, साधकों और आध्यात्मिक परंपराओं की तपोभूमि रही है। इसी आध्यात्मिक विरासत को बड़े पर्दे पर सामने लाने वाली फिल्म ‘हनुमान अंश’ को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बड़ा निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि आध्यात्मिक गुरु नीम करौली बाबा के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधारित इस फिल्म को उत्तराखंड में टैक्स-फ्री किया जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी स्वयं फिल्म देखने के बाद इसके संदेश से प्रभावित नजर आए। देहरादून के एक सिनेमा हॉल में उन्होंने अपनी पत्नी गीता धामी, कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी, प्रदीप बत्रा और कई विधायकों के साथ फिल्म देखी। इसके बाद उन्होंने फिल्म की विषयवस्तु और नीम करौली बाबा के जीवन-दर्शन की सराहना करते हुए इसे उत्तराखंड की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाला माध्यम बताया। फिल्म से सामने आया बाबा का जीवन-दर्शन मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘हनुमान अंश’ के माध्यम से लोगों को बाबा नीम करौली महाराज की तपस्या, त्याग, सेवा और भगवान हनुमान के प्रति उनकी अटूट आस्था को समझने का अवसर मिलता है। बाबा का जीवन केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं था, बल्कि मानव सेवा और समाज कल्याण को भी उन्होंने अपने जीवन का प्रमुख उद्देश्य बनाया। धामी ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि बाबा नीम करौली महाराज का जीवन आज भी समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—भक्ति केवल पूजा और साधना का नाम नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और मानव कल्याण का मार्ग भी है। यही संदेश ‘हनुमान अंश’ को सामान्य फिल्म से अलग एक आध्यात्मिक अनुभव का रूप देता है। फिल्म के माध्यम से एक ऐसे संत की जीवन-यात्रा को समझने का अवसर मिलता है, जिनकी शिक्षाओं और सेवा भाव ने देश ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोगों को प्रभावित किया। कैंची धाम से जुड़ी आस्था को नई पहचान नीम करौली बाबा का नाम आते ही उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित कैंची धाम की तस्वीर सामने आती है। आज कैंची धाम देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। बाबा के प्रति श्रद्धा रखने वाले लोगों के लिए कैंची धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति और सेवा की भावना से जुड़ा स्थान है। ऐसे में ‘हनुमान अंश’ के जरिए बाबा के जीवन और कैंची धाम से जुड़ी आध्यात्मिक परंपरा को बड़े पर्दे पर प्रस्तुत किया जाना उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी फिल्म के संदर्भ में इसी व्यापक पहचान को रेखांकित किया। उनका मानना है कि ऐसी फिल्में उत्तराखंड की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को देश और दुनिया के सामने रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। टैक्स-फ्री करने के फैसले के पीछे संदेश ‘हनुमान अंश’ को उत्तराखंड में टैक्स-फ्री करने का मुख्यमंत्री का निर्णय केवल एक फिल्म को प्रोत्साहन देने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे उत्तराखंड की आध्यात्मिक विरासत और संत परंपरा को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाने का संदेश भी दिखाई देता है। उत्तराखंड लंबे समय से धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र रहा है। चारधाम यात्रा से लेकर हरिद्वार, ऋषिकेश, देवप्रयाग, नैनीताल और कैंची धाम तक राज्य की धार्मिक एवं आध्यात्मिक पहचान बेहद व्यापक है। ऐसे में जब किसी फिल्म के केंद्र में उत्तराखंड से जुड़ी संत परंपरा और आध्यात्मिक विरासत हो, तो उसका राज्य में प्रोत्साहन पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान—दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण हो सकता है। धामी सरकार पहले से ही उत्तराखंड को धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने पर जोर देती रही है। ‘हनुमान अंश’ को टैक्स-फ्री करने का फैसला इसी व्यापक सोच से जोड़कर देखा जा सकता है। दुखी युवक से संत बनने तक की यात्रा फिल्म की कहानी लक्ष्मी नारायण नाम के एक दुखी युवक के इर्द-गिर्द घूमती है। मां की मृत्यु के बाद उसके मन में जीवन, मृत्यु, ईश्वर और इंसानी दुखों को लेकर अनेक सवाल पैदा होते हैं। इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए वह उत्तर भारत की आध्यात्मिक यात्रा पर निकलता है। यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि उसके भीतर चल रहे आत्मिक संघर्ष की यात्रा भी बन जाती है। यही यात्रा आगे चलकर उसे संत नीम करौली बाबा के रूप में स्थापित करती है। फिल्म बाबा के जीवन में प्रेम, सेवा, करुणा और मानव कल्याण की भावना को प्रमुखता से सामने लाती है। इस तरह फिल्म केवल एक संत की जीवनी बताने का प्रयास नहीं करती, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि मनुष्य के जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है और दुख, मृत्यु तथा ईश्वर जैसे प्रश्नों के बीच सेवा और करुणा का रास्ता किस तरह इंसान को नई दिशा दे सकता है। शुरुआत धीमी, लेकिन दर्शकों ने बदली तस्वीर ‘हनुमान अंश’ की बॉक्स ऑफिस यात्रा भी दिलचस्प रही है। फिल्म 7 अगस्त को भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज हुई। शुरुआती दौर में फिल्म को बहुत तेज प्रतिक्रिया नहीं मिली और पहले दो सप्ताह में इसकी कमाई अपेक्षाकृत कम रही। लेकिन धीरे-धीरे दर्शकों की प्रतिक्रिया बदली। सोशल मीडिया और दर्शकों के बीच चर्चा बढ़ी और वर्ड-ऑफ-माउथ के जरिए फिल्म ने रफ्तार पकड़ ली। दिए गए ट्रेड आंकड़ों के अनुसार फिल्म ने बाद के दिनों में बेहतर प्रदर्शन किया और बॉक्स ऑफिस पर करीब ₹97.77 करोड़ का ग्रॉस तथा ₹82.88 करोड़ का नेट कलेक्शन दर्ज किया। यानी जिस फिल्म की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी रही, उसने दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया के दम पर बाद में मजबूत पकड़ बनाई। सशक्त कलाकारों ने निभाई अहम भूमिका विशाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित और निर्देशित इस फिल्म में शोभिनव सत्य मुख्य भूमिका में हैं। उनके साथ विहान शेडगे, चंदन के आनंद, पूर्णिमा तिवारी, अनिल रस्तोगी, गुलशन पांडे और भगवानदास पटेल जैसे कलाकार भी फिल्म का हिस्सा हैं। फिल्म की कहानी और अभिनय के साथ इसका आध्यात्मिक विषय भी दर्शकों के बीच चर्चा का कारण बना। विशेष रूप से ऐसे समय में जब फिल्मों में आध्यात्मिक और वास्तविक जीवन से जुड़े पात्रों को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ रही है, ‘हनुमान अंश’ ने एक अलग तरह की कहानी को … Read more

भव्य और दिव्य कुंभ की तैयारी तेज, संतों के शिविरों के लिए भूमि आवंटन प्रक्रिया शुरू

देहरादून/हरिद्वार। हरिद्वार की धरती पर जब कुंभ का आयोजन होता है, तो यह केवल एक धार्मिक मेला नहीं रहता, बल्कि आस्था, अध्यात्म, संस्कृति और परंपराओं का विराट संगम बन जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से करोड़ों श्रद्धालु गंगा स्नान और संतों के दर्शन के लिए हरिद्वार पहुंचते हैं। वहीं साधु-संतों, अखाड़ों, आश्रमों और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के शिविरों से मेला क्षेत्र एक अलग ही आध्यात्मिक दुनिया का रूप ले लेता है। इसी भव्य आयोजन को लेकर हरिद्वार कुंभ मेला प्रशासन ने तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया है। इस बार भी मेला क्षेत्र में अलग से ‘कुंभ नगरी’ बसाई जाएगी, जहां साधु-संतों के साथ विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के शिविर आकार लेंगे। उत्तराखंड सरकार और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की प्राथमिकता कुंभ को भव्य, दिव्य, सुव्यवस्थित और श्रद्धालु-केंद्रित बनाने की है। इसी दिशा में मेला प्रशासन ने धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं से शिविर लगाने के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। आवेदन प्रक्रिया 30 अक्टूबर तक चलेगी और इसके बाद जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर भूमि आवंटन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। अब तक 100 से अधिक आवेदन मेला प्रशासन को प्राप्त हो चुके हैं। प्रशासन का लक्ष्य दिसंबर तक भूमि आवंटन की प्रक्रिया पूरी करने का है, ताकि संत-महात्मा और धार्मिक संस्थाएं समय रहते अपने शिविरों के निर्माण और अन्य तैयारियों को शुरू कर सकें। जब हरिद्वार में बसती है एक और दुनिया कुंभ के दौरान हरिद्वार का मेला क्षेत्र अपने सामान्य स्वरूप से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। विशाल पंडाल, साधु-संतों के शिविर, अखाड़ों की पेशवाई, भजन-कीर्तन, प्रवचन, यज्ञ और भंडारे—इन सबके बीच एक ऐसी नगरी आकार लेती है, जिसे श्रद्धालु और संत समाज ‘कुंभ नगरी’ के नाम से जानते हैं। यह नगरी किसी अस्थायी शहर से कम नहीं होती। यहां बिजली, पानी, सड़क, शौचालय और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ श्रद्धालुओं के ठहरने और धार्मिक गतिविधियों के लिए व्यापक व्यवस्थाएं की जाती हैं। कुंभ नगरी में अलग-अलग परंपराओं और संस्थाओं के अनुसार शिविरों की व्यवस्था होती है। महामंडलेश्वर नगर, शंकराचार्य नगर और विभिन्न आश्रमों से जुड़े संतों के शिविर इस धार्मिक नगरी की पहचान बनते हैं। इन शिविरों में दिनभर धार्मिक गतिविधियां चलती रहती हैं। कहीं सत्संग होता है, कहीं प्रवचन, कहीं भजन-कीर्तन की गूंज सुनाई देती है तो कहीं यज्ञ और हवन के आयोजन होते हैं। बड़े-बड़े भंडारों में श्रद्धालुओं को प्रसाद और भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इस तरह कुंभ नगरी केवल संतों के रहने का स्थान नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव का एक बड़ा केंद्र बन जाती है। संतों के शिविरों से बढ़ती है कुंभ की भव्यता कुंभ की पहचान केवल गंगा स्नान या धार्मिक अनुष्ठानों से नहीं होती। अखाड़ों और संतों की उपस्थिति इसे अपना विशिष्ट स्वरूप देती है। साधु-संतों के विशाल शिविर कुंभ की भव्यता को नई पहचान देते हैं। देशभर से आने वाले संत यहां अपने अनुयायियों और श्रद्धालुओं के साथ समय बिताते हैं। अनेक शिविरों में धार्मिक अनुष्ठान, आध्यात्मिक चर्चाएं, प्रवचन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। बड़ा अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी रूपेंद्र प्रकाश महाराज के अनुसार, कुंभ मेले में साधु-संतों की एक अलग नगरी बसती है। इसमें शंकराचार्य, माधवाचार्य जैसे महापुरुषों के नाम पर भी विभिन्न नगर और शिविर बनाए जाते हैं। उनके मुताबिक, मेला क्षेत्र को सेक्टर और जोन में बांटकर अधिकारियों की तैनाती की जाती है तथा प्रशासन की ओर से बिजली, पानी, सड़क और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। देशभर से आने वाले श्रद्धालु इन शिविरों में रहकर धार्मिक गतिविधियों में शामिल होते हैं। यही संत परंपरा और श्रद्धालुओं की भागीदारी कुंभ को केवल एक आयोजन नहीं रहने देती, बल्कि इसे जीवंत आध्यात्मिक परंपरा में बदल देती है। 30 अक्टूबर तक आवेदन, दिसंबर तक जमीन देने का लक्ष्य कुंभ मेला प्रशासन ने धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लिए शिविर लगाने की प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप देने के लिए आवेदन मांगे हैं। आवेदन 30 अक्टूबर तक लिए जाएंगे। मेला प्रशासन के अनुसार, आवेदन प्राप्त होने के बाद उनकी जांच और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी। इसके बाद निर्धारित स्थानों पर संबंधित संस्थाओं को भूमि आवंटित की जाएगी। प्रशासन की कोशिश है कि दिसंबर तक भूमि आवंटन की प्रक्रिया पूरी हो जाए। इसका सीधा लाभ संतों और धार्मिक संस्थाओं को मिलेगा, क्योंकि उन्हें अपने शिविर तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। समय रहते भूमि मिलने से शिविरों की संरचना, बिजली-पानी की व्यवस्था, श्रद्धालुओं के ठहरने की तैयारी और अन्य व्यवस्थाएं चरणबद्ध तरीके से पूरी की जा सकेंगी। अब तक 100 से अधिक आवेदन प्राप्त होना इस बात का संकेत है कि धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं में कुंभ को लेकर उत्साह और तैयारी शुरू हो चुकी है। महामंडलेश्वर नगर की व्यवस्था अलग अखाड़ों और महामंडलेश्वरों के शिविरों के लिए भूमि आवंटन की व्यवस्था सामान्य धार्मिक संस्थाओं से अलग रखी गई है। कई अखाड़े अपनी निर्धारित भूमि पर ही अपने शिविर लगाते हैं। उदाहरण के तौर पर बैरागी कैंप में बैरागी अखाड़ों के लिए भूमि की व्यवस्था की जाती है। वहीं अखाड़ों से जुड़े महामंडलेश्वरों को भूमि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी अलग तरीके से संचालित होती है। अखाड़े अपने स्तर से महामंडलेश्वरों को भूमि उपलब्ध कराते हैं। इससे संत परंपरा और अखाड़ों की आंतरिक व्यवस्था के अनुरूप शिविरों का स्वरूप तय होता है। कुंभ के दौरान अखाड़ों की उपस्थिति विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। साधु-संतों की पेशवाई और धार्मिक आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु इनके दर्शन के लिए पहुंचते हैं। साधु-संत और प्रशासन साथ-साथ कुंभ जैसे विशाल आयोजन को सफल बनाने के लिए प्रशासन और संत समाज के बीच बेहतर समन्वय बेहद जरूरी होता है। लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही, संतों के शिविर, अखाड़ों की व्यवस्थाएं, धार्मिक आयोजन और सुरक्षा व्यवस्था—इन सभी को एक साथ संचालित करना बड़ी चुनौती होती है। नया अखाड़ा के महामंडलेश्वर करौली शंकर महाराज का कहना है कि कुंभ में साधु-संत और प्रशासन एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। उनके अनुसार, इस बार हरिद्वार कुंभ की भव्य और दिव्य तैयारियां की जा रही हैं। संत समाज की भी यही इच्छा है कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु हरिद्वार से एक सुखद और आध्यात्मिक अनुभव लेकर लौटें। इसके लिए संत और धार्मिक संस्थाएं भी प्रशासन के साथ मिलकर व्यवस्थाओं में सहयोग करने के लिए तैयार हैं। … Read more

Zee के संस्थापक सुभाष चंद्रा पर CBI ने दर्ज किया केस, LIC Housing Finance से जुड़ा ₹1,322 करोड़ का मामला

नई दिल्ली  एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की मुश्किलें एक बार फिर से बढ़ गई हैं। सीबीआई ने सुभाष चंद्रा और अन्य लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, CBI ने इस मामले में सुभाष चंद्रा के अलावा पंकज सुरोलिया, अमीश पांड्या और राजीव ढोलकिया को आरोपी बताते हुए केस दर्ज किया है। LICHFL ने लगाया ये आरोप उनके ऊपर 2018 से 2026 के बीच LIC हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड के साथ 1,322 करोड़ रुपये से ज्यादा की धोखाधड़ी के आरोप हैं। LICHFL का दावा है कि 2018 में क्रेडिट फैसलिटीज लेते वक्त सुभाष चंद्रा की नेटवर्थ 59113 करोड़ रुपये की नेटवर्थ का सर्टिफिकेट दिया था, लेकिन उन्होंने 2024 में अपनी नेटवर्थ महज 31.79 करोड़ रुपये बताई थी। मीडिया कारोबारी सुभाष चंद्रा को लोन माफी से जुड़े विवाद के बाद एक और बड़ा झटका लगा है। दरअसल, जांच एजेंसी CBI ने एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा और अन्य लोगों के खिलाफ फ्रॉड का मामला दर्ज किया है। आरोप है कि उन्होंने 2018 से 2026 के बीच LIC हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (LICHFL) के साथ ₹1322 करोड़ की धोखाधड़ी की। LICHFL का दावा है कि 2018 में क्रेडिट फैसलिटीज लेते समय सुभाष चंद्रा ने ₹59113 करोड़ का नेटवर्थ सर्टिफिकेट पेश किया था लेकिन 2024 में उन्होंने अपनी नेटवर्थ सिर्फ ₹31.79 करोड़ बताई। NCALT ने दिया है झटका एस्सेल समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा के खिलाफ यह मामला ऐसे समय में दर्ज हुआ है जब राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCALT) ने व्यक्तिगत दिवाला मामले में एनसीएलटी के आदेश पर रोक लगा दी है। NCALT ने सुभाष चंद्रा को अपनी संपत्तियां बेचने या हस्तांतरित करने से रोक दिया। साथ ही उन्हें समूह की कंपनियों के कर्ज के लिए दी गई व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े करीब 22,006 करोड़ रुपये के दावों का लगभग 6.5 करोड़ रुपये में निपटान करने की अनुमति देने वाले आदेश पर भी रोक लगा दी थी। NCALT के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने कहा कि री-पेमेंट योजना पर स्पष्ट बहुमत नहीं बना और इसलिए आदेश को प्रभावी नहीं किया जा सकता। क्या है विवाद? विवाद एक ऐसी री-पेमेंट योजना को लेकर है, जिसके तहत सुभाष चंद्रा को अपने समूह की कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के लिए दी गई व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े दावों का महज 6.5 करोड़ रुपये में सैटल करने की अनुमति दी गई थी। यह उनकी कंपनियों द्वारा चूक किए गए 22,006 करोड़ रुपये के मुकाबले 99.9 प्रतिशत की कटौती है। दस बैंकों और कर्जदाताओं ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस का विरोध हालांकि, एचडीएफसी बैंक, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस और केनरा बैंक समेत असहमत कर्जदाताओं ने इसका विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे होने वाली वसूली बहुत कम होगी। असहमत कर्जदाताओं के पास 20 प्रतिशत से कम मताधिकार था। वहीं, सुभाष चंद्रा ने कहा है कि व्यापक रूप से बताई जा रही 22,006 करोड़ रुपये की राशि वह रकम नहीं है, जो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उधार ली थी। इसमें एस्सेल समूह की कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के लिए उनके द्वारा दी गई गारंटी से जुड़े दावे शामिल हैं। उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े दावों की राशि करीब 3,990 करोड़ रुपये बताई है और कहा है कि बड़ी राशि मूल रूप से कर्ज लेने वाली कंपनियों के खिलाफ दावों से संबंधित है। कितने करोड़ रुपये का था लोन? शिकायत के मुताबिक, LICHFL ने दो अलग-अलग लोन सुविधाओं के तहत कुल 980 करोड़ रुपये का मूल लोन मंजूर किया था। ब्याज और दूसरे शुल्क जुड़ने के बाद ये रकम बढ़कर करीब 1,322 करोड़ रुपये हो गई।  संपत्ति जांच की मांग हालांकि, असहमत कर्जदाताओं ने चंद्रा की घोषित कुल संपत्ति की और जांच की मांग की है। उनका कहना है कि गारंटी देने के लिए उनकी संपत्ति का विवरण एक प्रमुख आधार था। कर्जदाताओं के अनुसार, प्रमाणित आंकड़ों में 2018 में उनकी कुल संपत्ति करीब 40,600 करोड़ रुपये और 2017 में 45,900 करोड़ रुपये थी जबकि 2024 तक यह राशि काफी घट गई थी। कौन हैं सुभाष चंद्रा? सुभाष चंद्रा कभी भारत के प्रमुख कारोबारी चेहरों में शामिल थे। उन्होंने टेलीविजन, पैकेजिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और डायरेक्ट-टू-होम टेलीविजन सहित अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार खड़ा किया। वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थन से राज्यसभा सदस्य भी निर्वाचित हुए थे।

ईरान के खर्ग द्वीप के पास टैंकर पर हमला, अमेरिकी मिसाइल हमले से मची हलचल

तेहरान  अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर चरम की ओर जा रहा है। इसी बीच ईरानी मीडिया ने खर्ग द्वीप पर बड़े हमले का दावा किया है। जानकारी के मुताबिक खर्ग द्वीप के पास जोरदार धमाके सुने गए हैं। ये धमाके वहीं हुए हैं जहां तेल का मुख्य हब है। एसएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक खर्ग द्वीप के पास ही ईरान के टैंकर को निशाना बनाया गया है। अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि अमेरिका ने ईरान के टैंकर को ही निशाना बनाया है या फिर खर्ग द्वीप पर भी तबाही मचाई है। बीते दिनों अमेरिका ने एआई वीडियो जारी करते हुए दावा किया था कि खर्ग द्वीप को तबाह करके टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया है। हालांकि ईरान ने अमेरिका के इस दावे को खारिज कर दिया था। अमेरिका बोला- यह युद्ध नहीं है अमेरिका एक तरफ युद्ध की आग भड़काता ही जा रहा है और दूसरी तरफ दावा कर रहा है कि यह युद्ध नहीं है। वेंस से अमेरिका के राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय 'व्हाइट हाउस' में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान पूछा गया कि क्या तीन नवंबर को होने वाले संसदीय चुनाव से पहले युद्ध समाप्त हो सकता है जिसके जवाब में उन्होंने कहा, ''मैं इसे युद्ध नहीं कहूंगा। फिलहाल सक्रिय गोलीबारी नहीं हो रही है।'' ट्रंप इसे बता रहे मामूली बात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संघर्ष को ''मामूली बात'' करार दिया और देश के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस के इस बयान से सहमति जताई कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को ''युद्ध'' नहीं कहा जा सकता। ट्रंप ने 'ओवल ऑफिस' (अमेरिका के राष्ट्रपति का आधिकारिक कार्यालय) में संवाददाताओं से बातचीत के दौरान वेंस की एक दिन पहले की टिप्पणियों के बारे में सवाल किए जाने पर कहा कि ईरान पर अमेरिकी हमले अब ''रुक-रुककर'' हो रहे हैं। उन्होंने इस संघर्ष की गंभीरता को कम दिखाने की कोशिश की जबकि इस युद्ध पर अमेरिकी करदाताओं के 37.5 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक खर्च हो चुके हैं और अमेरिका के 18 सैन्यकर्मियों की मौत हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए एक अहम रास्ता बना हुआ है। क्षेत्रीय तनाव के बीच इससे होकर होने वाली जहाजों की आवाजाही में काफी कमी आई है। हाल के दिनों में यहाँ से गुज़रने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम हो गई है। बड़े तेल टैंकर और गैस कैरियर लगभग इस रास्ते का इस्तेमाल करना बंद कर चुके हैं। तनाव बढ़ने से पहले, दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल और तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की खेप इसी जलडमरूमध्य से होकर गुज़रती थी।

असीम मुनीर को मिली सबसे बड़ी सैन्य शक्ति, पाकिस्तान में सेना, नौसेना और वायुसेना की कमान एक हाथ में

इस्लामाबाद पाकिस्तान की संसद ने देश के सैन्य कमान ढांचे में बड़ा बदलाव करते हुए पहली बार एक ही अधिकारी को सेना, नौसेना और वायुसेना- तीनों की कमान सौंपने का कानूनी अधिकार दिया है। नेशनल असेंबली ने अगस्त के अंत में पाकिस्तान के रक्षा बल अधिनियम, 2026 को मंजूरी दी थी। इसके तहत चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDF) का नया पद बनाया गया है। फील्ड मार्शल असीम मुनीर पाकिस्तान के पहले चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज बने हैं। वह इस पद के साथ-साथ सेना प्रमुख की जिम्मेदारी भी संभालते रहेंगे। यह बदलाव 1976 के बाद पाकिस्तान के सैन्य कमान ढांचे में सबसे बड़ा पुनर्गठन माना जा रहा है। इससे पहले किसी एक अधिकारी को तीनों सेनाओं पर इस तरह का औपचारिक कानूनी अधिकार नहीं मिला था। क्या बदला है पाकिस्तान की सैन्य कमान व्यवस्था में? अब तक तीनों सेनाओं के बीच तालमेल के लिए जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी के चेयरमैन का पद था। यह पद 1976 में बनाया गया था, लेकिन इसके पास नौसेना या वायुसेना को सीधे कमांड करने का कानूनी अधिकार नहीं था। नए CDF पद में यह स्थिति बदल गई है। इसके तहत:     CDF को तीनों सेनाओं पर ऑपरेशनल कमान हासिल होगी।     वह सीधे संघीय सरकार को रिपोर्ट करेगा।     उसे ऐसे फैसलों को लागू कराने का अधिकार होगा, जिन्हें पुरानी व्यवस्था में लागू कराने की शक्ति नहीं थी।     असीम मुनीर सेना प्रमुख के पद पर रहते हुए CDF की जिम्मेदारी भी संभालेंगे। रावलपिंडी स्थित एक सेवानिवृत्त थ्री-स्टार जनरल ने अल जजीरा से कहा कि नए कानून ने प्रधानमंत्री से लेकर जमीन पर तैनात सैन्य इकाइयों तक कमान की एक स्पष्ट और लिखित श्रृंखला तैयार कर दी है। सेवानिवृत्त जनरल नईम खालिद लोधी के मुताबिक, CDF अब एक वास्तविक कमांडर है, जबकि पुराना पद मुख्य रूप से समन्वय तक सीमित था। क्या इससे सेना और ताकतवर हो गई? नए कानून को लेकर विश्लेषकों की राय एक जैसी नहीं है। कानून के मुताबिक, परमाणु बलों की कमान का पद अब सेना से ही आएगा। विश्लेषक माजिद निजामी के अनुसार, इससे औपचारिक रूप से वह संभावना खत्म हो गई है कि यह जिम्मेदारी पहले की तरह नौसेना या वायुसेना के किसी अधिकारी के पास भी जा सकती थी। रावलपिंडी के एक सेवानिवृत्त थ्री-स्टार जनरल ने नई व्यवस्था को स्पष्ट रूप से सेना-केंद्रित बताया। वहीं, रणनीतिक योजना से जुड़े रहे एक पूर्व अधिकारी ने आशंका जताई कि नौसेना और वायुसेना में करियर से जुड़े फैसले अब सेना के नेतृत्व वाली कमान व्यवस्था के जरिए होंगे। हालांकि, सेवानिवृत्त जनरल नईम खालिद लोधी ने इस बदलाव को अलग नजरिए से देखा। उनके अनुसार, CDF के पास अब फैसलों को लागू कराने की वास्तविक शक्ति है, जो पुराने समन्वयकारी पद के पास नहीं थी। क्या नागरिक सरकार की निगरानी कमजोर होगी? नए कानून के बाद नागरिक निगरानी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वकील और पूर्व अधिकारी कर्नल इनाम रहीम के मुताबिक, अब CDF सिर्फ एक पत्र के जरिए अधिकारियों को बर्खास्त कर सकता है। इसके लिए पहले जिस कैबिनेट सारांश की जरूरत होती थी, वह अब जरूरी नहीं है। कराची के वकील अब्दुल मोइज जाफरी ने तर्क दिया कि कानून ने औपचारिक रूप से बराबर माने जाने वाले एक सर्विस चीफ को दूसरे के अधीन कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान में इस सवाल की स्वतंत्र रूप से जांच करने के लिए पर्याप्त स्वतंत्र अदालत नहीं है। हालांकि, हर कोई इस कानून को जरूरत से ज्यादा ताकत देने वाला नहीं मानता। सुप्रीम कोर्ट के वकील हाफिज अहसान अहमद खोखर ने इसकी तुलना ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के समान कानूनों से की। हालांकि इन देशों में संबंधित पद तीनों सेनाओं के बीच बदलता रहता है, जबकि पाकिस्तान में यह पद सेना प्रमुख के पास ही रहेगा। पाकिस्तान सरकार ने बताए बदलाव के तीन मकसद पाकिस्तान के मुताबिक, सैन्य कमान में यह पुनर्गठन तीन प्रमुख उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया गया है। पहला- जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और ड्रोन अभियानों के बीच बेहतर तालमेल। दूसरा, पुरानी व्यवस्था को खत्म करना, जिसमें तीनों सेनाएं बड़े स्तर पर अलग-अलग तरीके से काम करती थीं। तीसरा- संकट के समय तेजी से फैसले लेना, क्योंकि अब एक अधिकारी तीनों सेनाओं को एक साथ निर्देश दे सकेगा।

त्योहारी सीजन में महंगाई का झटका, चीनी और सरसों तेल के दाम कब होंगे कम?

नईदिल्ली  चीनी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों में गिरावट जरूर देखने को मिली है। लेकिन अब भी दाम 60 रुपये प्रति किलोग्राम के ऊपर बना हुआ है। वहीं, सरसों का तेल अब भी 200 रुपये के पार ही बिक रहा है। चीनी और तेल ने मिलकर त्योहारों के इस सीजन को थोड़ा फीका बना दिया है। अब लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि कब तक दाम में गिरावट देखने को मिलेगी? चीनी के दाम में गिरावट (Chini Ka rate) बीते हफ्ते चीनी का रेट 65.08 रुपये प्रति किलोग्राम था। जोकि अब घटकर 62.57 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर आ गया है। यानी रिटेल मार्केट में कीमतों में 3.85 प्रति किलोग्राम की गिरावट देखने को मिली है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार चीनी का रेट कल शुक्रवार को 59 रुपये प्रति किलोग्राम था। जोकि पिछले साल की तुलना में 14 रुपये अधिक है। बीते इस साल 4 सितंबर को 1 किलो चीनी के लिए लोगों को 45 रुपये खर्च करने पड़ रहे थे। ड्यूटी फ्री चीनी इम्पोर्ट की मिली परमिशन सरकार ने विदेशों से चीनी आयात करने के लिए खरीदारों को बड़ी छूट देते हुए इसे ड्यूटी फ्री कर दिया है। हालांकि, इसकी सीमा एक मिलियन टन की है। लेकिन उम्मीद की जा रही है कि इससे होलसेल के साथ-साथ रिटेल के दाम भी घटेंगे। इसके अलावा कालाबाजारी रोकने के लिए भी सरकार काफी सख्ती दिखा रही है। सरसों के तेल का दोहरा शतक (Mustard Oil Price today) पिछले एक महीने से सरसों के तेल का दाम भी सातवें आसमान पर है। कीमतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पिछले साल इसका दाम 187 रुपये प्रति किलोग्राम था। जोकि इस समय 201 रुपये के आस-पास बना हुआ है। बीते एक महीने से सरसों के तेल की कीमतों में कोई खास बदलाव नहीं देखने को मिला। कब गिरेगा चीनी और तेल का दाम चीनी की कीमतों में फिलहाल कोई खास गिरावट की उम्मीद कम ही है। इस इंडस्ट्री पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट के अनुसार चीनी का रेट नई फसल के आने के बाद यानी अक्टूबर के बाद ही गिरने की संभावना है। वहीं, सरसों की कीमतों में आने वाले कुछ हफ्तों में आपको कटौती देखने को मिल सकती है। राजस्थान की फसल मार्केट में एंट्री करते ही दाम नीचे आ सकता है।