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बिना ड्राइवर दौड़ेंगी कारें! क्या भारत में जल्द आएगी सेल्फ-ड्राइविंग टेक्नोलॉजी, जानिए पूरा प्लान

नई दिल्ली कई बार कुछ फैसले इतने टेक्निकल और जटिल होते हैं कि उनकी अहमियत तुरंत समझ में नहीं आती. लेकिन कुछ साल बाद वही फैसले आपकी डेली-लाइफ, रूटीन और पूरी इंडस्ट्री की दिशा बदल देते हैं. ऑटोमोटिव रडार और कनेक्टेड कार टेक्नोलॉजी के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म करने का सरकार फैसला भी ऐसा ही एक कदम माना जा रहा है. पहली नजर में यह सिर्फ नियमों में बदलाव जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में यह भारत को सेफ, स्मार्ट और फ्यूचर की सेल्फ-ड्राइविंग मोबिलिटी की ओर ले जाने वाला बड़ा दरवाजा खोल सकता है।  रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने 77GHz से 81GHz फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करने वाले ऑटोमोटिव रडार सिस्टम के लाइसेंस की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है. इसके अलावा 5.9GHz बैंड पर चलने वाले सिस्टम के लिए भी लाइसेंस की जरूरत खत्म कर दी गई है. यही फ्रीक्वेंसी वाहन और सड़क किनारे लगे इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच कम्युनिकेशन के लिए इस्तेमाल होती है. यह फैसला भारत को अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित ऑटोमोबाइल बाजारों के बराबर खड़ा करता है, जहां ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल के लिए पहले से कहीं ज्यादा आसान नियम बनाए गए हैं।  भारत में जब भी नई ऑटोमोबाइल तकनीक आती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कीमत नहीं होती, बल्कि नियमों और मंजूरियों की जटिल प्रक्रिया भी होती है. किसी नई तकनीक को बाजार में लाने के लिए कंपनियों को ज्यादा समय और पैसे खर्च करने पड़ते हैं. इसका सीधा असर ग्राहकों की जेब पर पड़ता है।  अब जब रडार बेस्ड सिस्टम के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं रहेगी, तो वाहन निर्माता कंपनियां दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर और तकनीक को भारत में भी आसानी से ला सकेंगी. उन्हें भारत के लिए अलग एडिशन तैयार करने की जरूरत कम पड़ेगी. इससे लागत घट सकती है और नई तकनीकियों का इस्तेमाल आसान और तेज हो जाएगा।  ADAS अब लग्जरी फीचर नहीं रहेगा कुछ साल पहले तक ADAS यानी एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम केवल महंगी लग्जरी कारों में देखने को मिलता था. लेकिन अब धीरे-धीरे यह तकनीक मुख्यधारा की कारों तक पहुंच रही है. अब कम दाम या यूं कहें कि मिड-साइज एसयूवी और अन्य कारों में भी यह फीचर दिया जाने लगा है. कम्पटीशन के इस दौर में तकरीबन हर वाहन निर्माता की कोशिश है कि, वो अपनी काम में अपने प्रतिद्वंदी के मुकाबले ज्यादा फीचर दे सके. इसके लिए ग्राहक ज्यादा पैसे खर्च करने को भी तैयार हैं।  ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग, अडैप्टिव क्रूज कंट्रोल और ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग जैसे फीचर्स रडार सेंसर की मदद से काम करते हैं. ये सिस्टम सिर्फ सुविधा नहीं देते, बल्कि कई बार गंभीर दुर्घटनाओं को रोकने में भी मदद करते हैं. भारत में अब तक ADAS तकनीक का इस्तेमाल सिमित रहा है. इसकी एक वजह लागत और दूसरी वजह नियम और प्रोसेस हैं. ऐसे में लाइसेंस की बाध्यता हटना इस तकनीक को ज्यादा तेजी से फैलाने में मदद कर सकता है।  सेल्फ-ड्राइविंग कारों की बुनियाद आज दुनिया के कई देश सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों पर तेजी से काम कर रहे हैं. भारत अभी उस लेवल से काफी दूर है, लेकिन किसी भी तकनीक की शुरुआत इंफ्रा से ही होती है. रडार सेंसर और व्हीकल कम्युनिकेशन सिस्टम भविष्य में आने वाली ऑटोनॉमस यानी सेल्फ-ड्राइविंग कारों के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक हैं. इसलिए यह फैसला सिर्फ आज की कारों के लिए नहीं, बल्कि अगले दशक की मोबिलिटी को ध्यान में रखकर लिया गया कदम भी माना जा रहा है।  इस फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू 5.9GHz बैंड से जुड़ा है. यह V2X यानी व्हीकल-टू-एवरीथिंग सिस्टम को सपोर्ट करता है. सरल भाषा में समझें तो भविष्य में गाड़ियां सिर्फ सड़क पर नहीं चलेंगी, बल्कि एक-दूसरे से बातचीत भी करेंगी. कोई वाहन अचानक ब्रेक लगाए, किसी ब्लाइंड मोड़ के पीछे खतरा हो या कोई एम्बुलेंस तेजी से आ रही हो, तो ऐसी जानकारी पहले ही दूसरी गाड़ियों तक पहुंच सकती है। ऐसी तकनीकियां इंसानी आंखों की तरह काम करेंगी. जो सड़क पर अचानक से रिएक्ट करने की समय को कम करने में मदद करेंगी. यही कारण है कि दुनिया भर में इन्हें रोड सेफ्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।  इन कंपनियों को फायदा अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि नई तकनीक का फायदा केवल विदेशी कंपनियों को मिलता है. लेकिन इस मामले में तस्वीर कुछ अलग है. जहां मर्सिडीज बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी कंपनियां ग्लोबल टेक्नोलॉजी को आसानी से भारत ला सकेंगी. वहीं मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी भारतीय कंपनियों के लिए भी यह मौका होगा कि वे तेजी से ADAS बेस्ड फीचर्स को अपनी गाड़ियों में शामिल करें।  हालांकि ये भारतीय कंपनियां पहले से ही अपने कुछ प्रीमियम मॉडलों में ये फीचर दे रही हैं. लेकिन आने वाले समय में जब ये तकनीकी और किफायती होगी तो इसका इस्तेमाल सस्ती कारों में भी देखने को मिल सकता है. इसके अलावा Bosch, Continental और Qualcomm जैसी तकनीकी कंपनियों को भी नए अवसर मिल सकते हैं, क्योंकि आधुनिक वाहनों में इनकी टेक्नोलॉजी की मांग बढ़ेगी।  इस फैसले की सबसे मजबूत वजह रोड सेफ्टी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में भारत में लगभग पांच लाख सड़क दुर्घटनाएं हुईं और 1.77 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई. ये आंकड़े बताते हैं कि सड़क सुरक्षा केवल ट्रैफिक नियमों या बेहतर सड़कों का मुद्दा नहीं है. आधुनिक तकनीक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. ADAS और V2X जैसे सिस्टम उन परिस्थितियों में एक्स्ट्रा सेफ्टी दे सकते हैं जहां ड्राइवर की नजर या रिएक्ट करने की क्षमता कम हो जाती है।  अभी शुरुआत है, मंजिल नहीं यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सरकार ने इस टेक्नोलॉजी को अनिवार्य नहीं बनाया है. केवल लाइसेंस की बाध्यता हटाई गई है. यानी यह फैसला रास्ता साफ करता है, लेकिन यह पक्का नहीं करता कि हर नई कार में तुरंत ये तकनीकी दिखाई देने लगेंगी. फिर भी यह एक ऐसा कदम है जो इंडस्ट्री को सही दिशा देने में मददगार साबित होगा. जब नियम आसान होते हैं, लागत कम होती है और तकनीक तेजी से पहुंचती है, तो अंततः फायदा ग्राहक को ही मिलता है।   

ट्रंप-ईरान डील से नाराज इजरायल, समझौते को ठुकराया; क्या मध्य पूर्व में फिर भड़केगी जंग?

यरुशलम/वाशिंगटन मिडिल-ईस्ट में शांति स्थापित करने के अमेरिकी प्रयासों को एक बड़ा झटका लगा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ परमाणु सामग्री और क्षेत्रीय तनाव को कम करने के लिए किए गए समझौतों के दावों के बावजूद, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है. इस अनिश्चितता की सबसे बड़ी वजह यह है कि इजरायल इस अमेरिकी डील से पूरी तरह असहमत नजर आ रहा है।  इजरायल ने ईरान और उसके समर्थित गुटों (जैसे हिज्बुल्लाह और अन्य मिलिशिया) के खिलाफ अपने सैन्य अभियानों और हवाई हमलों को थामने के बजाय और तेज कर दिया है. बेंजामिन नेतन्याहू सरकार का रुख यह साफ करता है कि वह वॉशिंगटन की कूटनीतिक कोशिशों के भरोसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को छोड़ने के मूड में बिल्कुल नहीं है, जिससे इस क्षेत्र में एक बार फिर बड़े पैमाने पर युद्ध भड़कने की आशंका पैदा हो गई है।  ट्रंप की डील कितनी टिकाऊ?  डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में ईरान को भारी वित्तीय प्रतिबंधों से राहत देने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खुलवाने के बदले उसके समृद्ध यूरेनियम को जब्त या नष्ट करने का एक कथित खाका तैयार किया है. लेकिन इस कूटनीतिक जीत के दावों के बीच सबसे बड़ा रोड़ा इजरायल ही बनकर उभरा है।  इजरायल का मानना है कि ईरान के साथ किया जाने वाला कोई भी समझौता तब तक टिकाऊ या भरोसेमंद नहीं हो सकता, जब तक कि तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से नेस्तनाबूद न कर दिया जाए और क्षेत्र में उसके प्रॉक्सी नेटवर्क को पूरी तरह खत्म न किया जाए।  इजरायल को डर है कि इस डील की आड़ में ईरान को दोबारा आर्थिक रूप से मजबूत होने और अपने गुप्त ठिकानों पर परमाणु हथियार विकसित करने का मौका मिल जाएगा. यही कारण है कि अमेरिकी आपत्तियों के बावजूद इजरायल लगातार ईरान के रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना रहा है।  थमे नहीं हैं इजरायली हमले  अमेरिकी राष्ट्रपति की घोषणाओं को दरकिनार करते हुए इजरायली वायुसेना और खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान के भीतर और उसके पड़ोसी देशों (जैसे सीरिया और लेबनान) में स्थित ईरानी ठिकानों पर हमले जारी रखे हैं. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि जब बात इजरायल के अस्तित्व और सुरक्षा की होगी, तो वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे नहीं झुकेंगे।  इजरायल की रणनीति यह है कि इससे पहले कि ट्रंप की डील पूरी तरह से जमीन पर लागू हो और ईरान को कोई सुरक्षा कवच मिले, उसके सैन्य बुनियादी ढांचे को इतना कमजोर कर दिया जाए कि वह पलटवार करने की स्थिति में ही न रहे. इजरायल के ये निरंतर हमले सीधे तौर पर अमेरिकी मध्यस्थता वाली शांति प्रक्रिया की संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं।  मध्य पूर्व में बढ़ सकता है बारूदी संकट कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका इजरायल की चिंताओं को शामिल किए बिना ईरान के साथ एकतरफा समझौता आगे बढ़ाता है, तो इसके परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं. इजरायल के हमलों के जवाब में यदि ईरान ने पलटवार किया या अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल किया, तो यह समझौता लागू होने से पहले ही टूट जाएगा।  इसके अतिरिक्त, यदि ईरान को लगा कि अमेरिकी डील के बावजूद इजरायली हमले नहीं रुक रहे हैं, तो वह खुद भी इस समझौते से पीछे हट सकता है. अपनी बंद पड़ी परमाणु गतिविधियों को और तेज कर सकता है. ऐसे में ट्रंप की यह 'ऐतिहासिक शांति डील' सिर्फ कागजों तक सीमित रह सकती है. पूरे क्षेत्र को एक ऐसे युद्ध में धकेल सकती है जिसे संभालना अमेरिका के लिए भी मुमकिन नहीं होगा। 

मॉनसून की रफ्तार पर ब्रेक! भारत के बड़े हिस्से में सूखे जैसे हालात, सैटेलाइट इमेज ने बढ़ाई टेंशन

 नई दिल्ली जून का महीना आधा बीत चुका है, लेकिन भारत की जीवनरेखा कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को लेकर एक बेहद हैरान और डराने वाली तस्वीर सामने आई है. सैटेलाइट इमेज और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के हालिया आंकड़ों से पता चला है कि देश के बड़े हिस्से में मॉनसून अचानक बेहद कमजोर हो गया है. अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों में मॉनसून का बादलों वाला पारंपरिक रूप पूरी तरह गायब नजर आ रहा है।  हालात इतने गंभीर हैं कि जून के शुरुआती दो हफ्तों में ही देश भर में बारिश का आंकड़ा सामान्य से काफी नीचे गिर गया है, जिससे खरीफ फसलों की बुआई और पानी की उपलब्धता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र में नमी की कोई कमी नहीं है, लेकिन हवा के एक अजीब बर्ताव ने मॉनसून की रफ्तार को पूरी तरह ब्रेक लगा दिया है।  सैटेलाइट तस्वीरों में गायब दिखे बादल  मौसम विभाग (IMD) द्वारा 4 जून से 15 जून के बीच जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में देश भर में केवल 19.2 मिमी बारिश दर्ज की गई है, जबकि सामान्य तौर पर इस दौरान 53.7 मिमी बारिश होनी चाहिए थी. इसका सीधा मतलब यह है कि देश इस समय 64% के भारी घाटे का सामना कर रहा है।  आईएमडी के रेनफॉल डिपार्चर मैप में मध्य, दक्षिणी और पूर्वी भारत के विशाल हिस्से पीले और लाल रंगों में रंगे हुए हैं, जो सूखे जैसे गंभीर हालात को दर्शाते हैं. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात 15 जून को भारत के INSAT-3DS सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें हैं. आमतौर पर इस मौसम में भारत का जो नक्शा बादलों की घनी सफेद चादर से ढका रहता था, वह इस बार प्रायद्वीपीय और मध्य भारत में बिल्कुल साफ और सूखा दिखाई दे रहा है।  आखिर साल 2026 में क्यों हांफ रहा है भारतीय मॉनसून? मौसम वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मॉनसून ने कुछ ही दिन पहले कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सही समय पर दस्तक दे दी थी, तो अचानक यह गायब कैसे हो गया? विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या समुद्र के तापमान या पानी की कमी के कारण नहीं है, बल्कि यह धरती से कई किलोमीटर ऊपर वायुमंडल में चल रही हवाओं की आपसी जंग का नतीजा है।  इस समय आसमान की ऊपरी सतह पर बहने वाली 'वेस्टरली जेट स्ट्रीम' (पश्चिमी हवाओं का प्रवाह) अपनी सामान्य जगह से बहुत ज्यादा दक्षिण की ओर खिसक आई है. यह असामान्य बदलाव मॉनसून के सबसे मुख्य इंजन यानी 'ईस्टरली जेट' (पूर्वी हवाओं) के रास्ते में रुकावट बन गया है।  हवाओं की ऊपरी जंग ने रोका बादलों का बनना सामान्य परिस्थितियों में, ऊपरी वायुमंडल में बहने वाली ईस्टरली जेट स्ट्रीम भारत के ऊपर हवा को ऊपर की ओर खींचती है, जिससे घने बादल बनते हैं और पूरे उपमहाद्वीप में झमाझम बारिश होती है. लेकिन इस बार शक्तिशाली पश्चिमी हवाएं इस पूरी प्रक्रिया को दबा रही हैं. नतीजा यह हो रहा है कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में भरपूर नमी और पानी वाले बादल मौजूद होने के बावजूद, वे भारत की मुख्य भूमि पर बरस नहीं पा रहे हैं।  हवा का यह ऊपरी दबाव बादलों को बनने और टिकने ही नहीं दे रहा है. यही वजह है कि मॉनसून कागजों और नक्शों पर तो आगे बढ़ गया है, लेकिन जमीन पर बूंद-बूंद बारिश के लिए लोग तरस रहे हैं. मौसम वैज्ञानिक इसे मॉनसून का पूरी तरह खत्म होना नहीं, बल्कि ऊपरी वायुमंडलीय गतिकी के कारण आया एक बड़ा 'मॉनसून पॉज' (मॉनसून का ठहरना) मान रहे हैं।  क्या आने वाले दिनों में सुधरेंगे हालात? इस भीषण गर्मी और सूखे के बीच राहत की एकमात्र बात यह है कि मौसम के पूर्वानुमान मॉडल संकेत दे रहे हैं कि यह संकट स्थाई नहीं है. मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सप्ताह के अंत तक पश्चिमी जेट स्ट्रीम का यह अजीबोगरीब पैटर्न धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगेगा. जैसे ही यह पश्चिमी बाधा हटेगी, मॉनसून फिर एक्टिव होगा।  उम्मीद जताई जा रही है कि जून के आखिरी हफ्तों में हवाओं का रुख बदलेगा और मध्य तथा दक्षिण भारत के उन हिस्सों में व्यापक बारिश का दौर फिर से शुरू होगा, जो आमतौर पर इस सीजन की पहचान होते हैं. तब तक पूरे देश को मॉनसून की इस दूसरी पारी का इंतजार करना होगा। 

दुनिया में आर्थिक चुनौतियां, लेकिन भारत की घरेलू मांग बनी मजबूती की बड़ी वजह: सीतारमण

नयी दिल्ली वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि इस समय वैश्विक स्तर पर व्यापार और आपूर्ति को लेकर कई प्रकार की अनिश्चतताएं भारतीय अर्थव्यस्था के लिए चुनौती पेश कर रही हैं, हालांकि घरेलू मांग से अर्थव्यवस्था को समर्थन मिल रहा है। श्रीमती सीतारमण ने यहां "माइंडमाइन सम्मेलन 2026" के एक संवाद सत्र के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियों के बारे में पूछे जाने पर कहा कि वर्तमान में वैश्विक व्यापार में काफी अनिश्चितताएं हैं। हमारा निर्यात मजबूत है लेकिन अचानक आयात शुल्क बढ़ा दिया जाता है। हम जिन तीन वस्तुओं का सबसे अधिक आयात करते हैं उनकी कीमत और आपूर्ति दोनों में काफी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। इसके लिए विदेशी मुद्रा का भंडार मजबूत होना चाहिये।   उन्होंने कहा कि इन सबके बीच भारत के लिए राहत की बात हमारा घरेलू बाजार है, जो काफी बड़ा है। घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है। हालांकि विनिर्माताओं के समक्ष आयातित कच्चे माल की ऊंची कीमत की चुनौती भी है। घरेलू स्तर पर मानसून की चुनौती को लेकर उन्होंने कहा कि इस बार अल-नीनो प्रभाव के कारण कम बारिश होने का अनुमान है। देश के पास अनाज का काफी बफर भंडार है, इसलिए खाद्यान्न की कमी जैसी स्थिति तो नहीं होगी, लेकिन किसानों की आमदनी पर कम मानसून का असर जरूर होगा।   उर्वरकों की कमी के बारे में उन्होंने कहा कि आगामी खरीफ सत्र के लिए उर्वरकों की कोई कमी नहीं है। रबी सत्र को लेकर चिंता थी लेकिन अब चीन से उर्वरक आने से वह चिंता भी दूर हो गयी है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली और उससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव के बारे में वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने रिजर्व बैंक के साथ मिलकर विदेशी मुद्रा जुटाने के उपाय किये हैं। बॉन्ड बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कदम उठाये गये हैं। साथ ही बैंकों और सार्वजनिक कंपनियों को विदेशों से पूंजी जुटाने की अनुमति दी गयी है और इसके लिए जोखिम को कम करने की रणनीति की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक उठायेगा। इससे बैंक विदेशों से पूंजी जुटाने के लिए प्रोत्साहित होंगे।

PAF में हादसों की श्रृंखला जारी, महीनेभर में पांचवां विमान दुर्घटनाग्रस्त; सड़क पर मचा हड़कंप

 खैबर पख्तूनख्वा  पाकिस्तान की सेना को एक बार फिर बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है. खैबर पख्तूनख्वा के मरदान जिले में रविवार को एक सैन्य प्रशिक्षण विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया. हादसा कटलंग रोड के पास जाबर नहर क्षेत्र में हुआ, जहां विमान गिरते ही आग का बड़ा गुबार उठता दिखाई दिया. यह हादसा एक CCTV फुटेज में रिकॉर्ड हो गया. विमान के क्रैश होने के बाद धुआं और आग की लपटें देखी गईं. फुटेज में देखा जा सकता है कि रोड पर लगातार गाड़ियां गुजर रही हैं. जब दो मोटरसाइकिल सवार गुजर रहे थे, तभी यह जेट सीधे आकर रोड के बीच में गिरा और देखते ही रोड के बीच में आग की एक सीधी रेखा बन गई. विमान में सवार दोनों पायलटों की मौत हो गई. राहत एवं बचाव दल और सुरक्षा एजेंसियां तुरंत घटनास्थल पर पहुंचीं. पाकिस्तानी अधिकारियों ने दुर्घटना के कारणों की जांच शुरू कर दी है. इस हादसे के बाद मौके पर लोग जमा हो गए. बाइकसवार लोगों का हाल पता नहीं है. लेकिन बाद में दोनों गाड़ियां सड़क पर ही पड़ी दिखाई दी हैं।  एक महीने में पांचवां सैन्य विमान हादसा यह हादसा ऐसे समय हुआ है जब पाकिस्तान के सैन्य विमानों की सुरक्षा पर पहले से सवाल उठ रहे हैं. पिछले एक महीने के भीतर यह पांचवीं बड़ी दुर्घटना मानी जा रही है. सबसे बड़ा झटका 10 जून को लगा था, जब पाकिस्तान आर्मी एविएशन का Mi-17 हेलिकॉप्टर POK में टेकऑफ के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. उस हादसे में 22 सैन्यकर्मियों की मौत हुई थी. पाकिस्तानी सेना ने बाद में सभी के मारे जाने की पुष्टि की थी।  उससे पहले 20 मई को मियांवाली के पास पाकिस्तान एयर फोर्स का FT-7PG ट्रेनर विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था. एक दिन पहले 19 मई को कामरा के पास JF-17 थंडर लड़ाकू विमान भी ट्रेनिंग मिशन के दौरान क्रैश हो गया था. दोनों मामलों में पायलटों ने इजेक्ट कर जान बचा ली थी।  आबादी को बचाने की कोशिश में हादसा स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार मरदान में दुर्घटनाग्रस्त हुआ विमान Super Mushshak (MFI-17) ट्रेनर एयरक्राफ्ट था. बताया जा रहा है कि पायलटों ने विमान को घनी आबादी वाले इलाके से दूर ले जाने की कोशिश की ताकि जमीन पर बड़े पैमाने पर नुकसान न हो. हालांकि इस कोशिश में दोनों पायलट अपनी जान नहीं बचा सके।  लगातार हादसों से बढ़े सवाल जनवरी से जून 2026 के बीच पाकिस्तान को कम से कम पांच बड़े हवाई हादसे सामने आ चुके हैं. इनमें लड़ाकू विमान, ट्रेनर एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर शामिल हैं. ज्यादातर मामलों में शुरुआती वजह तकनीकी खराबी बताई गई है, लेकिन लगातार हो रही दुर्घटनाओं ने पाकिस्तान के एयरक्राफ्ट्स के रखरखा की कमी को दिखाया है. POK में Mi-17 हेलिकॉप्टर हादसे के कुछ ही दिन बाद हुआ यह नया क्रैश पाकिस्तान के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है। 

महंगाई के मोर्चे पर नई तस्वीर, मई में थोक मुद्रास्फीति 9.68% रही; 2022-23 आधार वर्ष लागू

नई दिल्ली  भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत 'उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग' (DPIIT) ने थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आंकड़े जारी कर दिए हैं। मई 2026 के लिए थोक महंगाई पिछले महीने की तुलना में बढ़कर 9.68% हो गई है। यह आंकड़े नई सीरीज के तहत जारी किए गए हैं। इस नई सीरीज में, आधार वर्ष को 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया है। मई 2026 में थोक महंगाई की स्थिति आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, मई 2026 में सालाना थोक महंगाई दर 9.68% दर्ज की गई, जबकि अप्रैल 2026 में यह 8.26% थी। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण ईंधन, बिजली और मिनरल ऑयल की कीमतों में तेजी है। ईंधन सबसे बड़ा झटका थोक महंगाई में सबसे ज्यादा उछाल ईंधन और बिजली क्षेत्र में आई. मई 2026 में फ्यूल एंड पावर की महंगाई 30.33 प्रतिशत रही जो अप्रैल में 24.89 प्रतिशत थी. मिनरल ऑयल यानी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें 49.82 प्रतिशत उछलीं. कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की महंगाई 61.51 प्रतिशत रही. पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण वैश्विक तेल बाजार में उथलपुथल इसकी मुख्य वजह मानी जा रही है।  प्राथमिक वस्तुएं और मैन्युफैक्चरिंग प्राइमरी आर्टिकल्स यानी खेती और खनन से जुड़ी चीजों की महंगाई मई में 4.99 प्रतिशत रही, जो अप्रैल में 3.78 प्रतिशत थी. नॉन-फूड आर्टिकल्स 9.49 प्रतिशत महंगे हुए. मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई 7.48 प्रतिशत रही, जो अप्रैल के 6.68 प्रतिशत से अधिक है. केमिकल्स, बेसिक मेटल्स और टेक्सटाइल में उल्लेखनीय तेजी देखी गई।  खाने-पीने की चीजें WPI फूड इंडेक्स की महंगाई मई 2026 में 4.49 प्रतिशत रही, जो अप्रैल में 3.11 प्रतिशत थी. खाद्य तेल, अंडे-मांस-मछली और खाद्य उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी इसकी वजह रही. हालांकि दालें, आलू और प्याज की कीमतें साल भर पहले के मुकाबले अभी भी कम हैं।  नई WPI सीरीज आज से लागू सरकार ने आज से WPI का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया है. नई सीरीज में वस्तुओं की संख्या 697 से बढ़ाकर 957 की गई है. साथ ही आज से Output Producer Price Index और Service Producer Price Index भी जारी किए गए हैं. सेवा क्षेत्र में बैंकिंग, बीमा, टेलीकॉम, रेलवे और एयर पैसेंजर सेवाएं शामिल की गई हैं. अगली WPI रिपोर्ट जून 2026 के लिए 14 जुलाई को आएगी।  रोजाना जरूरत के सामान, फ्यूल और पावर के दाम बढ़े     रोजाना की जरूरत वाले सामानों (प्राइमरी आर्टिकल्स) की महंगाई 3.78% से बढ़कर 4.99% हो गई।     खाने-पीने की चीजों (फूड इंडेक्स) की महंगाई 3.11% से बढ़कर 4.49% पर पहुंच गई है।     फ्यूल और पावर की थोक महंगाई दर 24.89% से बढ़कर 30.33% हो गई है।     मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की थोक महंगाई दर 6.68% से बढ़कर 7.48% रही। होलसेल महंगाई के 4 हिस्से प्राइमरी आर्टिकल, जिसका वेटेज 22.62% है। फ्यूल एंड पावर का वेटेज 13.15% और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट का वेटेज सबसे ज्यादा 64.23% है। प्राइमरी आर्टिकल के भी चार हिस्से हैं।     फूड आर्टिकल्स जैसे अनाज, गेहूं, सब्जियां     नॉन फूड आर्टिकल में ऑयल सीड आते हैं     मिनरल्स     क्रूड पेट्रोलियम मई में रिटेल महंगाई 3.93% रही मई में रिटेल महंगाई बढ़कर 3.93% पर पहुंच गई, जो अप्रैल में 3.48% थी। पिछले 5 महीनों में यह पहली बार है जब खुदरा महंगाई रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के टारगेट 4% के बेहद करीब पहुंच गई है। होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का आम आदमी पर असर थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर प्रोडक्टिव सेक्टर पर इसका बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो प्रोड्यूसर इसका बोझ कंज्यूमर्स पर डाल देते हैं। सरकार केवल टैक्स के जरिए WPI को कंट्रोल कर सकती है। जैसे कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कटौती की थी। हालांकि, सरकार टैक्स कटौती एक सीमा में ही कम कर सकती है। WPI में ज्यादा वेटेज मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर जैसे फैक्ट्री से जुड़े सामानों का होता है। महंगाई कैसे मापी जाती है? भारत में दो तरह की महंगाई होती है। एक रिटेल यानी खुदरा और दूसरी थोक महंगाई होती है। रिटेल महंगाई दर आम ग्राहकों की तरफ से दी जाने वाली कीमतों पर आधारित होती है। इसको कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) भी कहते हैं। वहीं, होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का अर्थ उन कीमतों से होता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है। महंगाई मापने के लिए अलग-अलग आइटम्स को शामिल किया जाता है। जैसे थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 63.75%, प्राइमरी आर्टिकल जैसे फूड 22.62% और फ्यूल एंड पावर 13.15% होती है। वहीं, रिटेल महंगाई में फूड और प्रोडक्ट की भागीदारी 45.86%, हाउसिंग की 10.07% और फ्यूल सहित अन्य आइटम्स की भी भागीदारी होती है।  

PM मोदी और स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री की संयुक्त प्रेस वार्ता, रक्षा, व्यापार और तकनीक पर बने अहम समझौते

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्लोवाकिया के ब्रातिस्लावा में स्लोवाक रिपब्लिक के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको के साथ जॉइंट प्रेस मीट को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने भारत स्लोवाकिया के रिश्ते को रेखांकित किया. दोनों देशों के प्रधानमंत्री ने रक्षा सहयोग के लिए लेटर ऑफ इंटेट साइन किया है।  पीएम ने अपने संबोधन में कहा, "मैं स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री को गर्मजोशी से स्वागत के लिए धन्यवाद देता हूं. वह एक अनुभवी नेता और भारत के सच्चे दोस्त हैं. भारत-स्लोवाकिया की दोस्ती को ऊंचाइयों तक ले जाने में उनका अहम रोल रहा है. मुझे खुशी है कि उनसे मिलकर मुझे हमारे दोनों देशों के रिश्तों में एक ऐतिहासिक पल देखने का मौका मिला।  रक्षा सहयोग के लिए साइन की डील पीएम ने कहा, "मेरी यह यात्रा किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की स्लोवाकिया की पहली यात्रा है. मुझे खुशी है कि इस ऐतिहासिक अवसर पर हमने अपने संबंधों को व्यापक भागीदारी का दर्जा देने का फैसला किया है।  पीएम मोदी ने कहा, "रक्षा सहयोग हमारे गहरे आपसी विश्वास और रणनीतिक अभिसरण का प्रमाण है. मुझे खुशी है कि इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में आज हमने लेटर ऑफ इंटेंट साइन किया. इससे संयुक्त विकास, संयुक्त उत्पादन और रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग को नई गति मिलेगी।     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्लोवाकिया के ब्रातिस्लावा में स्लोवाक रिपब्लिक के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको के साथ जॉइंट प्रेस मीट को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने भारत स्लोवाकिया के रिश्ते को रेखांकित किया. दोनों देशों के प्रधानमंत्री ने रक्षा सहयोग के लिए लेटर ऑफ इंटेट साइन किया है।  पीएम ने अपने संबोधन में कहा, "मैं स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री को गर्मजोशी से स्वागत के लिए धन्यवाद देता हूं. वह एक अनुभवी नेता और भारत के सच्चे दोस्त हैं. भारत-स्लोवाकिया की दोस्ती को ऊंचाइयों तक ले जाने में उनका अहम रोल रहा है. मुझे खुशी है कि उनसे मिलकर मुझे हमारे दोनों देशों के रिश्तों में एक ऐतिहासिक पल देखने का मौका मिला।  रक्षा सहयोग के लिए साइन की डील पीएम ने कहा, "मेरी यह यात्रा किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की स्लोवाकिया की पहली यात्रा है. मुझे खुशी है कि इस ऐतिहासिक अवसर पर हमने अपने संबंधों को व्यापक भागीदारी का दर्जा देने का फैसला किया है."  पीएम मोदी ने कहा, "रक्षा सहयोग हमारे गहरे आपसी विश्वास और रणनीतिक अभिसरण का प्रमाण है. मुझे खुशी है कि इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में आज हमने लेटर ऑफ इंटेंट साइन किया. इससे संयुक्त विकास, संयुक्त उत्पादन और रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग को नई गति मिलेगी।  दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक और लोगों से लोगों के बीच संबंध हमारे संबंधों को मजबूत आधार प्रदान करते हैं. भारत के प्राचीन उपनिषदों का “स्लोवाक” भाषा में अनुवाद किया जाना हमारी सांस्कृतिक निकटता का उत्कृष्ट उदाहरण है. स्लोवाकिया में रह रहे भारतीय मूल के लोग यहां की अर्थव्यवस्था और समाज में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।  भारत स्लोवाकिया स्पेस मिशन को किया याद पीएम मोदी बोले, "2017 में स्लोवाकिया की पहली सैटेलाइट भारत द्वारा लांच की गई थी. आज भारत में स्पेस सेक्टर अभूतपूर्व गति से नई ऊंचाइयां छू रहा है. मैं स्लोवाकिया की कंपनियों को इस विकास-यात्रा में शामिल होने के लिए आमंत्रित करता हूं। 

जहांगीर खान का नया वीडियो चर्चा में, कभी कान पकड़ते तो कभी हाथ जोड़कर दिखे नेता

 कोलकाता पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) नेता जहांगीर खान एक बार फिर सुर्खियों में हैं. पुलिस की मौजूदगी में उनकी परेड का वीडियो वायरल है. सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहे वीडियो में जहांगीर खान नंगे पैर दिखाई दे रहे हैं. उनकी कमर में रस्सी बंधी है और चलते-चलते वह कभी हाथ जोड़ते नजर आते हैं तो कभी कान पकड़ते हुए दिखाई देते हैं।  एक के बाद एक वायरल हो रहे वीडियो जहांगीर खान से जुड़े वीडियो पिछले कुछ दिनों से लगातार चर्चा में हैं. इससे पहले भी उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. उस वीडियो में भी वह हाथ जोड़कर लोगों के बीच चलते दिखाई दे रहे थे. अब सामने आए नए वीडियो ने फिर से नई बहस शुरू कर दी है. वीडियो में दिख रहा है कि जहांगीर खान के आसपास पुलिसकर्मी मौजूद हैं. वह नंगे पैर सड़क पर चल रहे हैं और कई बार हाथ जोड़कर लोगों की ओर देखते हैं. कुछ सेकेंड के वीडियो में वह कान पकड़ते हुए भी नजर आते हैं. यही वजह है कि वीडियो तेजी से शेयर किया जा रहा है और लोग इसे लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं।  फलता विधानसभा सीट पश्चिम बंगाल उपचुनाव के दौरान सबसे चर्चित सीटों में शामिल हो गई थी. यहां से टीएमसी ने जहांगीर खान को उम्मीदवार बनाया था. चुनाव प्रचार के दौरान लगातार आरोप लग रहे थे कि कुछ इलाकों में मतदाताओं पर दबाव बनाने और उन्हें प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है. स्थानीय स्तर पर मिली शिकायतों के बाद चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारी और सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हुईं. इसी क्रम में यूपी के आईपीएस अजय पाल शर्मा की टीम भी क्षेत्र में लगातार निगरानी कर रही थी. चुनावी माहौल उस समय और गर्म हो गया जब अजय पाल शर्मा अपनी टीम के साथ जहांगीर खान के करिबियों के घर पहुंचे. वहां उन्होंने परिवार के सदस्यों को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि मतदान के दौरान किसी मतदाता को डराने-धमकाने या मतदान प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।  उन्होंने यह भी कहा था कि यदि ऐसी कोई शिकायत सामने आती है तो कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी. इस घटना का वीडियो तेजी से वायरल हो गया. अजय पाल शर्मा की चेतावनी के बाद जहांगीर खान ने एक चुनावी सभा में ऐसा बयान दिया, जिसने पूरे मामले को चर्चा में ला दिया था. उन्होंने कहा, अगर वह सिंघम हैं, तो मैं पुष्पा हूं. फिल्मी अंदाज में दिया गया यह बयान देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। 

छात्रा के सुझाव पर बड़ा बदलाव! IRCTC की नई वेबसाइट से टिकट बुकिंग होगी और तेज व आसान

मुंबई  IRCTC वेबसाइट पर ट्रेन टिकट बुकिंग आसान होने वाली है. रेलवे के डिजिटल प्लेटफॉर्म में जल्द ही बड़ा बदलाव होगा. लॉगिन और तकनीकी खामियां दूर होंगी, जिसका फायदा करोड़ों रेल यात्रियों को मिलेगा. केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने घोषणा की है कि 15 जुलाई तक आईआरसीटीसी वेबसाइट का पूरी तरह से कायाकल्प कर दिया जाएगा. पीक ऑवर्स और सुबह के समय तत्काल टिकट बुकिंग भी आसान होगी. इससे सर्वर पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ेगा. और यह सब कुछ आसान हुआ है, जयपुर की लाभिषा मीणा के सुझावों की वजह से. छात्रा ने खुद ही रेल मंत्री के सामने टिकट बुकिंग में आने वाली परेशानियों को रखा था. इसके बाद रेलवे ने वेबसाइट में बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है।  यूजर फ्रेंडली होगी रेलवे की वेबसाइट रेलवे मंत्रालय के अनुसार, 15 जुलाई को लॉन्च होने वाली इस नई वेबसाइट का मुख्य उद्देश्य टिकट बुकिंग की पूरी प्रक्रिया को पहले से कहीं अधिक तेज, सरल और भरोसेमंद बनाना है. सबसे बड़ा बदलाव यूजर इंटरफ़ेस में किया जा रहा है, जिसे बेहद यूजर-फ्रेंडली बनाया जाएगा. इसके अलावा, वेबसाइट की कुल प्रतिक्रिया क्षमता को कई गुना बढ़ाया जा रहा है।  इस बदलाव की कहानी हाल ही में जयपुर से शुरू हुई. जयपुर स्थित मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MNIT Jaipur) में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और छात्रों के बीच सीधा संवाद कार्यक्रम हुआ. तभी इंजीनियरिंग छात्रा लाभिषा मीणा ने आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर टिकट बुकिंग की परेशानियों के बारे में बताया. छात्रा ने बताया कि वेबसाइट की धीमी गति और बार-बार आने वाले जटिल कैप्चा के कारण आम यात्रियों को कितनी भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है. विशेष रूप से पीक ऑवर्स और तत्काल बुकिंग के दौरान वेबसाइट का सर्वर ठप हो जाता है, जिससे आम नागरिक टिकट बुक करने से वंचित रह जाते हैं।  नई वेबसाइट के लिए छात्रा से मांगे थे सुझाव शिकायत को सुनने के बाद रेल मंत्री ने तुरंत निर्देश दिए कि 30 दिनों के भीतर ही IRCTC के डिजिटल प्लेटफॉर्म को बेहतर बनाया जाए. रेल मंत्री के इस त्वरित संज्ञान और कड़े निर्देशों के बाद रेलवे प्रशासन तुरंत हरकत में आ गया. नतीजा यह हुआ कि अगले ही दिन रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी समेत वरिष्ठ अधिकारियों ने छात्रा लाभिषा मीणा के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की. उच्च स्तरीय बैठक में अधिकारियों ने न केवल छात्रा की चिंताओं को गहराई से समझा, बल्कि प्रस्तावित नई वेबसाइट के प्रोटोटाइप को साझाकर उस पर छात्रा से सुझाव भी मांगे।  PNR स्टेटस से रिफंड तक यात्रियों को मिलेगा फायदा  प्रशासन की प्रतिक्रिया का स्वागत करते हुए छात्रा लाभिषा मीणा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर लिखा कि मेरी शिकायत पर अगले ही दिन अधिकारियों ने संपर्क कर नई वेबसाइट के प्रोटोटाइप पर सुझाव मांगे. मैं इसके लिए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और रेलवे बोर्ड का आभार जताती हूं. यह देखकर अच्छा लगा कि नागरिकों की प्रतिक्रिया को इतनी गंभीरता से लिया जा रहा है. नए डिजिटल प्लेटफॉर्म में जटिल कैप्चा के जाल को आसान या समाप्त किया जाएगा, जिससे यात्रियों का बहुमूल्य समय बचेगा. साथ ही, पीएनआर स्टेटस जांचने, रिफंड की स्थिति देखने और अन्य यात्री सेवाओं तक पहुंच को बेहद सुगम और त्वरित बनाया जा रहा है। 

होर्मुज से आगे की कहानी: US-Iran समझौते से भारत को मिल सकते हैं दो बड़े आर्थिक फायदे

 नई दिल्ली  अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो गया है और स्विट्जरलैंड में इस डील पर साइन होंगे। इसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने और व्यापार फिर से शुरू करने का एलान भी शामिल है। होर्मुज से शिपिंग फिर से शुरू होने या सामान्य होने से भारत को बड़ी राहत मिलेगी। भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के आयातकों में से एक है। ऐसे में तेल की सप्लाई को लेकर चिंता कम होने, माल ढुलाई का खर्च घटने और महंगाई का दबाव कम होने से उसे फायदा होगा। क्यों अहम है होर्मुज स्ट्रेट? ईरान और ओमान के बीच के इस संकरे जलमार्ग से दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले तेल का लगभग पांचवां हिस्सा सप्लाई होता है और खाड़ी के प्रमुख उत्पादक देशों जैसे सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर के लिए निर्यात का मुख्य रास्ता है। ये सभी देश भारत को ऊर्जा की सप्लाई करने वाले अहम देश हैं। फरवरी के आखिर में अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध की वजह से इस स्ट्रेट से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई में रुकावट आई। इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों और एनालिस्ट्स का कहना है कि दोबारा खुलने और तनाव कम होने से ग्लोबल एनर्जी मार्केट में स्थिरता आने और भारत जैसे एनर्जी इम्पोर्ट करने वाले देशों के लिए हालात बेहतर होने की संभावना है। तेल की कीमतों में आई गिरावट अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के एलान के बाद तेल की कीमतों में गिरावट आई। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान के साथ युद्धविराम समझौता कर लिया है और होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की टोल-फ्री आवाजाही हो सकेगी। डोनल्ड ट्रंप ने पोस्ट किया, "मैं इसके जरिए होर्मुज स्ट्रेट को बिना किसी रोक-टोक के खोलने की पूरी मंजूरी देता हूं और साथ ही अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी को तुरंत हटाने का भी आदेश देता हूं। दुनिया भर के जहाजों अपने इंजन चालू करो। तेल का प्रवाह शुरू होने दो!" युद्धविराम की खबर से तेल की कीमतों में गिरावट आई। तेल के लिए ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत 4 प्रतिशत गिरकर लगभग 84 डॉलर प्रति बैरल हो गई। युद्ध की वजह से आई रुकावटों के बाद ग्लोबल ऑयल की कीमतें फरवरी में 70-72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। भारत को सबसे बड़ा फायदा तेल में भारत अपनी जरूरत का करीब 80-85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. इसमें खाड़ी क्षेत्र की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समझौता लागू होता है और ईरानी तेल फिर से बाजार में आता है तो ब्रेंट क्रूड की कीमतों में बड़ी गिरावट आ सकती है. इसका सीधा असर दुनिया के बाकी देशों के साथ-साथ भारत पर पड़ेगा. पहले समझें की भारत को क्या फायदा होगा।      पेट्रोल और डीजल के दामों पर दबाव कम होगा.     महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.     भारत का तेल आयात बिल घटेगा.     देशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा और रुपये को भी मजबूती मिलेगी. भारत के लिए सबसे अच्छी खबर क्या है? रिपोर्ट के मुताबिक ड्राफ्ट में ईरान के तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी छूट मिलेगी. साथ ही 25 अरब डॉलर की फ्रीज ईरानी संपत्तियां जारी करने पर भी सहमति बनी है. भारत पहले ईरान से बड़ी मात्रा में सस्ता तेल खरीदता था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद यह व्यापार लगभग बंद हो गया था. खास बात ये है कि ईरान से तेल का व्यापार डॉलर में न होकर रुपये में होता था. अब अगर प्रतिबंध धीरे-धीरे हटते हैं तो भारत फिर से ईरानी क्रूड खरीद सकता है. इससे भारत को सस्ता तेल मिल सकता है।  चाबहार पोर्ट को मिलेगी नई जान इस डील का दूसरा बड़ा असर भारत के रणनीतिक चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट पर पड़ सकता है. ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत ने भारी निवेश किया है. यह प्रोजेक्ट भारत को पाकिस्तान को बायपास करके अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच देती है. अमेरिका और ईरान के रिश्तों में नरमी आने से चाबहार पर अमेरिकी दबाव कम हो सकता है. इससे भारत को पोर्ट के विस्तार, नए निवेश और व्यापार बढ़ाने में आसानी होगी. इसके साथ ही इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) में भी तेजी आने की उम्मीद है।  समझौते में क्या-क्या हुआ?     रॉयटर्स के मुताबिक अंतिम ड्राफ्ट में कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं.     ईरान तुरंत होर्मुज जलडमरूमध्य खोलेगा.     अमेरिका 30 दिनों के भीतर नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा.     अमेरिका नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा.     ईरान को तेल बेचने की अनुमति मिलेगी.     25 अरब डॉलर की फ्रीज संपत्तियां जारी की जाएंगी.     ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा.     यूरेनियम एनरिचमेंट और परमाणु कार्यक्रम पर अगले 60 दिनों तक विस्तृत बातचीत होगी.   मई के मध्य तक सरकार ने रिटेल कीमतों में नहीं किया था बदलाव इससे पेट्रोल और डीजल बनाने की लागत बढ़ गई, लेकिन सरकार ने मई के मध्य तक रिटेल कीमतों में बदलाव नहीं किया। सरकार ने 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की, ताकि पश्चिम बंगाल समेत पांच अहम राज्यों में चुनाव के दौरान रिटेल कीमतों में बढ़ोतरी से बचा जा सके। विधानसभा चुनावों के बाद बढ़े तेल के दाम विधानसभा चुनावों के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में प्रति लीटर लगभग 7.50 रुपये की बढ़ोतरी की गई, जबकि सीएनजी के दाम 6 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ाए गए। एलपीजी की कीमतों में भी दो किस्तों में 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर पर 89 रुपये की बढ़ोतरी की गई। कीमतें बढ़ने के बावजूद, सरकारी तेल कंपनियों को रोजाना लगभग 650 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है क्योंकि रिटेल कीमतें लागत से कम हैं। इंडस्ट्री के सूत्रों और एनालिस्ट्स का कहना है कि तेल की कीमतों में नरमी और स्ट्रेट के फिर से खुलने के साथ, ये धीरे-धीरे कम हो जाएंगी।