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ममता बनर्जी की करीबी सुष्मिता देव ने छोड़ा TMC का साथ, इस्तीफे से बंगाल की राजनीति में चर्चा तेज

कोलकत्ता  ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी को बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद झटका पर झटका लग रहा है. कुछ दिन पहले वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने सांसदी छोड़ दी थी और अब सुष्मिता देव ने भी राज्यसभा सीट से इस्तीफा दे दिया है. बता दें कि राज्य चुनाव में हार के बाद टीएमसी के 80 में से 58 विधायक भी विरोधी गुट बना चुके हैं।  तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को एक और बड़ा झटका लगा है. पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी की करीबी मानी जाने वाली राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. सुष्मिता देव का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब टीएमसी पहले से ही अंदरूनी असंतोष और नेताओं के पार्टी छोड़ने की घटनाओं का सामना कर रही है. उनके इस्तीफे को पार्टी के लिए एक और राजनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि, इस्तीफे के पीछे की वजहों को लेकर अभी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. सुष्मिता देव लंबे समय से टीएमसी का प्रमुख चेहरा रही हैं और पार्टी की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं।  गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने कल ही सोनिया गांधी से मुलाकात की है. ममता पार्टी में टूट रोकने के लिए हरसंभव कोशिश में जुटी हुई हैं लेकिन एक-एक करके उनके साथी साथ छोड़ रहे हैं. कुछ दिन पहले ही लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने टीएमसी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने दावा किया था कि उनके पास टीएमसी के 28 सांसदों में से 20 का समर्थन हासिल है. गौरतलब है कि दलबदल कानून से बचने के लिए विरोधी गुट को 19 सांसदों की जरूरत है।  गौरतलब है कि सुष्मिता देव एक वक्त पूर्व सीएम ममता बनर्जी की बेहद खास हुआ करती थीं. लेकिन अब सुष्मिता देब ने अपने पद से ही इस्तीफा दे दिया है. राज्यसभा के चेयरमैन सीपी राधाकृष्ण को लिखे पत्र में सुष्मिता देव ने कहा है कि मैं राज्यसभा की सदस्य पद से इस्तीफा देता हूं. आपसे इसे तुरंत स्वीकार करने का आग्रह करती हूं।  मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक सुष्मिता देव ने बुधवार को राज्यसभा सचिवालय पहुंचकर अपना इस्तीफा सौंपा। उनका यह कदम ऐसे समय पर आया है, जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी के भीतर असंतोष और नेताओं के पार्टी छोड़ने की घटनाएं लगातार चर्चा में हैं। सुष्मिता देव टीएमसी के उन नेताओं में शामिल रही हैं जिन्हें पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत चेहरा माना जाता था। वह कांग्रेस छोड़कर वर्ष 2021 में टीएमसी में शामिल हुई थीं और तब से संगठन में सक्रिय भूमिका निभा रही थीं। हालांकि, उनके इस्तीफे के पीछे के कारणों को लेकर फिलहाल कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे टीएमसी के लिए एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। टीएमसी की चुनौतियों क्या कहा था हाल ही में बातचीत में देव ने टीएमसी के मौजूदा हालात पर चर्चा की थी। उन्होंने लिखा था, 'अच्छी खबर यह है कि ऐसा ही हमने दूसरे राज्यों में भी देखा है। इसकी वजह साफ है कि हमारे विधायकों और कैडर पर बहुत दबाव है…। जमीन पर यह पता चला है कि पुलिस और प्रशासन की तरफ से जबरदस्त दबाव है कि टीएमसी को छोड़ दें या परिणामों के लिए तैयार रहें। यह सच्चाई है। मुझे लगता है कि अगर हिंदी में कहें तो दूध का दूध और पानी का पानी होगा। मुझे लगता है कि यह हमें और मजबूत बनाएगा और आने वाले सालों के लिए तैयार करेगा।' उन्होंने कहा था, '…ममता दी की ताकत उनकी जनता है, ममता दी की ताकत ईमानदारी है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन क्या कह रहा है, हमारे बारे में क्या नारे लगाए जा रहे हैं। ममता दी में हालात बदलने की क्षमता है। यह चुनौती है और इससे निपटने में हम सक्षम हैं और यह कुछ समय की ही बात है।' सुखेंदु शेखर रे ने लगाए थे गंभीर आरोप रे ने इस्तीफा देने के बाद एक पत्र में लिखा था कि पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने 15 वर्ष से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ हिंसा , शिक्षा, स्वास्थ्य , उद्योग, रोजगार और कानून व्यवस्था सहित सभी क्षेत्रों में बुरी तरह नाकाम रहने पर सत्ता से बाहर कर दिया है। उन्होंने कहा था, 'मैं लोगों के इस ऐतिहासिक फैसले को विनम्रता से स्वीकार करता हूं तथा तृणमूल कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता एवं राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देता हूं।'

मीनाक्षी नटराजन का पर्चा रद्द, राज्यसभा की तीनों सीटों पर BJP उम्मीदवारों की निर्विरोध जीत लगभग तय

भोपाल मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस (Congress) की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है, कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन (Meenakshi Natarajan) का नामांकन पत्र मंगलवार को जांच के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर ने रद्द कर दिया. इसके साथ ही प्रदेश की तीनों राज्यसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने का रास्ता साफ हो गया है. मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने के बाद भाजपा के तीसरे उम्मीदवार महेश केवट की जीत लगभग तय मानी जा रही है. भाजपा के अन्य दो उम्मीदवार राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और प्रदेश सचिव रजनीश अग्रवाल भी बिना मुकाबले राज्यसभा पहुंचेंगे।  राज्यसभा चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर और विधानसभा के प्रमुख सचिव अरविंद शर्मा ने नटराजन का नामांकन इस आधार पर निरस्त किया कि उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में हैदराबाद की एक अदालत से जुड़े मामले की जानकारी नहीं दी. मामला 2025 का बताया जा रहा है, जिसमें हैदराबाद के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने एक पूर्व पार्षद की निजी शिकायत पर मीनाक्षी नटराजन को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 के तहत नोटिस जारी किया था. नटराजन वर्तमान में तेलंगाना की कांग्रेस प्रभारी भी हैं।  साढ़े चार घंटे की सुनवाई के बाद फैसला भाजपा उम्मीदवार महेश केवट ने इसी आधार पर आपत्ति दर्ज कराई थी. केवट ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस प्रत्याशी ने अदालत से जारी नोटिस की जानकारी अपने हलफनामे में नहीं दी, इसलिए उनका नामांकन रद्द किया जाना चाहिए. करीब साढ़े चार घंटे की सुनवाई और इंतजार के बाद रिटर्निंग ऑफिसर ने भाजपा की आपत्ति स्वीकार करते हुए नटराजन का नामांकन खारिज कर दिया।  कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया कांग्रेस ने इस फैसले को असंवैधानिक, अवैध और लोकतंत्र पर हमला बताया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा, 'भारतीय जनता पार्टी महिला सम्मान और महिला आरक्षण की बात तो करती है, लेकिन मध्य प्रदेश में जो घटनाक्रम सामने आया है, उसने भाजपा की वास्तविक सोच को देश और दुनिया के सामने उजागर कर दिया है. महिलाओं के अधिकारों और सम्मान के नाम पर केवल राजनीतिक दिखावा किया जा रहा है।  उन्होंने रिटर्निंग ऑफिसर और निर्वाचन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. पटवारी ने कहा कि निर्वाचन अधिकारी को निष्पक्षता और कानून के दायरे में काम करना चाहिए था, लेकिन जिस तरह की भूमिका सामने आई है, उससे उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं. उन्होंने कहा, 'आज मध्य प्रदेश में हुई घटना पूरे देश के लिए एक काला अध्याय है. इसके विरोध में कल मध्य प्रदेश कांग्रेस का हर नेता और हर कार्यकर्ता चुनाव आयोग और भाजपा द्वारा किए गए इस लोकतंत्र की हत्या के खिलाफ भूख हड़ताल करेगा।  नेता प्रतिपक्ष का भाजपा पर आरोप नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि भाजपा को शुरू से मालूम था कि कांग्रेस के पास राज्यसभा चुनाव में 62 विधायकों का समर्थन है. इसके बावजूद कांग्रेस विधायकों के टूटने की अफवाहें फैलाई गईं और चुनावी माहौल को प्रभावित करने की कोशिश की गई. सिंघार ने कहा, 'जब यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस विधायक एकजुट हैं, तब नामांकन प्रक्रिया को लेकर आपत्तियों और अन्य प्रक्रियाओं का सहारा लिया गया।  मीनाक्षी नटराजन ने भी फैसले को लोकतंत्र और संविधान से जुड़ा गंभीर विषय बताया. उन्होंने कहा, 'जब सदन में पर्याप्त संख्या नहीं होने के बावजूद भाजपा ने तीसरा उम्मीदवार उतारा, तभी से हमें समझ में आने लगा था कि वे लोकतंत्र और संविधान का गला घोंटने की राजनीति कर रहे हैं. जो बात पहले वोट चोरी तक सीमित थी, वह अब सीट चोरी तक पहुंच गई है।  मीनाक्षी नटराजन ने क्या कहा? नटराजन ने कहा कि जब भाजपा को यह महसूस हुआ कि कांग्रेस विधायक एकजुट हैं और सदन विभाजित नहीं है, तब एक कानूनी नोटिस का सहारा लिया गया. उन्होंने कहा, 'हमारे दोनों अधिवक्ताओं ने अपने तर्क प्रस्तुत किए, लेकिन उन्हें सुना नहीं गया और फैसला सुना दिया गया. इससे उनकी मंशा पूरी तरह स्पष्ट हो गई है. यह केवल एक उम्मीदवार के नामांकन का मामला नहीं है, बल्कि देश में लोकतंत्र और संविधान से जुड़ा एक गंभीर विषय है।  कांग्रेस के वरिष्ठ अधिवक्ता अजय गुप्ता ने कहा कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त करने का आदेश कानून और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत है. उनके अनुसार, हैदराबाद न्यायालय द्वारा जारी नोटिस BNSS की धारा 223 के अंतर्गत था, जो केवल सुनवाई का अवसर प्रदान करने की प्रक्रिया है. उन्होंने कहा कि इस मामले में न तो किसी अपराध का संज्ञान लिया गया था, न कोई समन जारी हुआ था और न ही नटराजन को किसी आपराधिक प्रकरण में आरोपी घोषित किया गया था।  कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी पार्टी? गुप्ता ने कहा, 'धारा 223 स्पष्ट रूप से कहती है कि किसी भी प्रकरण में न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान लेने से पहले संबंधित पक्ष को नोटिस जारी कर उसका पक्ष सुना जाएगा. ऐसे में इसे आपराधिक प्रकरण मानना ही विधि सम्मत नहीं है.' उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस की ओर से विस्तृत लिखित जवाब, न्यायिक निर्णयों और कानूनी प्रावधानों का हवाला दिया गया था, लेकिन उन तर्कों पर विचार किए बिना आदेश पारित कर दिया गया।  गुप्ता ने कहा, 'आदेश में हमारे प्रमुख कानूनी तर्कों का उल्लेख तक नहीं है. इसलिए हमारा मानना है कि यह एक नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर है, जो तथ्यों और कानून के समुचित परीक्षण के बिना पारित किया गया है. हम इस आदेश को कानूनी रूप से चुनौती देंगे और न्यायपालिका के समक्ष सभी तथ्य रखेंगे हमें विश्वास है कि कानून और न्याय की जीत होगी।  नामांकन प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जेपी धनोपिया ने नामांकन प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि नामांकन के साथ सभी आवश्यक दस्तावेज जमा किए गए थे. दस विधायकों के हस्ताक्षर, शपथ पत्र, रसीद और अन्य सभी जरूरी दस्तावेज पूरी तरह प्रस्तुत किए गए थे. अधिकारियों द्वारा दी गई चेकलिस्ट में भी स्पष्ट रूप से दर्ज था कि सभी दस्तावेज सही हैं और कोई कमी नहीं है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि मंगलवार की कार्यवाही के दौरान जब कांग्रेस नेता दोपहर करीब दो बजे पहुंचे, तब वहां सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रोहित आर्य मौजूद थे।  धनोपिया ने कहा, 'हमने यह प्रश्न उठाया कि वे किस हैसियत से … Read more

एक मंच पर साथ, मैदान में आमने-सामने! कांग्रेस और ममता के रिश्तों पर उठे सवाल

 नई दिल्ली INDIA ब्लॉक की बैठक से एक तस्वीर आई है, जिसमें ममता बनर्जी और सोनिया गांधी गले मिल रही हैं. ममता बनर्जी का चेहरा सामने होने के कारण भाव का पता चल रहा है, लेकिन सोनिया गांधी के मन में क्या चल रहा है, कैमरे के सामने नहीं होने के कारण नहीं मालूम।  मीटिंग में ममता बनर्जी को सोनिया गांधी की ठीक बगल में सीट दी गई थी. सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ बैठी हैं. मल्लिकार्जुन खड़गे के पास राहुल गांधी और अखिलेश यादव को सीट मिली थी. ममता बनर्जी के लिए मुस्कुराने का मौका सिर्फ उस हाल के अंदर था, जहां मीटिंग हो रही थी. बाहर तो जैसे बर्बादी की सुनामी आई हुई थी. पश्चिम बंगाल में राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे के बीच दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के सांसद बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव से मिलने पहुंचे थे – और गौर करने वाली बात यह थी कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे।  ममता बनर्जी के चेहरे पर थोड़े सुकून के जो भाव थे, उसकी वजह कांग्रेस से मिल रहा सपोर्ट समझा जा सकता है. मुश्किल यह है कि ममता बनर्जी को कांग्रेस से सपोर्ट सिर्फ दिल्ली में ही मिल रहा है, पश्चिम बंगाल में नहीं. ऐसा क्यों? दिल्ली में दोस्ती, कोलकाता में दुश्मनी 2024 के आम चुनाव से पहले राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर निकले थे. पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी के दाखिल होने से ठीक पहले ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के अकेले दम पर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी. मतलब, कांग्रेस के साथ कोई चुनावी गठबंधन नहीं. लेकिन, इंडिया ब्लॉक छोड़ने जैसी कोई बात नहीं कही गई थी. नीतीश कुमार की तरह. तब राहुल गांधी के बिहार पहुंचने से पहले नीतीश कुमार महागठबंधन छोड़कर एनडीए में शामिल हो गए थे. चुनावों के दौरान ममता बनर्जी का व्यवहार भी नीतीश कुमार जैसा ही था. ममता बनर्जी का स्टैंड अघोषित था।  ममता बनर्जी ने अपने जानी सियासी दुश्मन कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी के खिलाफ गुजरात से लाकर पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान को मैदान में उतार दिया. अधीर रंजन चौधरी चुनाव हार गए, और कांग्रेस ने एक सीट गंवा दी. कांग्रेस ने बंगाल में एक सीट भले खो दी, लेकिन बाकी राज्यों में 2014 और 2019 के मुकाबले बेहतरीन प्रदर्शन किया. हां, अधीर रंजन चौधरी चुनाव जीत गए होते तो कांग्रेस का शतक पूरा हो गया होता. चुनावी गठबंधन की उम्मीद न होने के बावजूद कांग्रेस नेता ममता बनर्जी के मामले में हमलावर होने से परहेज करते देखे गए. ममता बनर्जी के व्यवहार में तो कोई तब्दीली नहीं आई, लेकिन राहुल गांधी को पूरा संयम बरतते देखा गया।  तृणमूल कांग्रेस ने भी 2019 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हुए बीजेपी को पांच साल बाद कम ही सीटों पर समेट दिया. कांग्रेस की हार के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता भी बन गए. लेकिन, स्पीकर के चुनाव में कांग्रेस के विपक्ष की तरफ से अपना उम्मीदवार उतार देने पर ममता बनर्जी खफा हो गई।  तब ममता बनर्जी की नाराजगी दूर करने के लिए राहुल गांधी ने खुद फोन किया, और फिर वो मान भी गईं. बाद के दिनों में ममता बनर्जी अपनी जरूरत के हिसाब से इंडिया ब्लॉक से कभी बाहर तो कभी भीतर होने का एहसास दिलाती रहीं. और, पश्चिम बंगाल चुनाव आते आते कांग्रेस के लिए नो-एंट्री की फिर से घोषणा कर दी. लेकिन, उस स्थिति में भी ममता बनर्जी चाहती थीं कि कांग्रेस मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की पहल करे. हां, महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल के खिलाफ ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ डटकर खड़ी रहीं, और बीजेपी की केंद्र सरकार का बिल गिर गया।  ममता बनर्जी को भी अब ये तो समझ में आ गया है कि फिलहाल कांग्रेस के साथ मिलकर चलने में ही भलाई है, वरना पश्चिम बंगाल में तो जो हो रहा है, देश देख ही रहा है. कांग्रेस के साथ जो होना था, वह तो 2014 में ही हो गया था. जो कुछ बचा था, वह 2019 में हो गया. राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए. अगर वायनाड से चुनाव नहीं लड़े होते तो लोकसभा से दूर ही रहना पड़ा होता. कुछ दिनों के लिए तो संसद की सदस्यता भी गंवानी पड़ी थी।  दिल्ली में तो नहीं, लेकिन पश्चिम बंगाल चुनाव कैंपेन के दौरान राहुल गांधी ने कुछ दिन के लिए अपनी सदस्यता चले जाने के साथ साथ अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों का जोर देकर जिक्र किया, और पूछा – क्या ममता बनर्जी के साथ ये सब होता है? इंडिया ब्लॉक की मीटिंग से पहले दिल्ली पहुंचते ही ममता बनर्जी ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की. ममता बनर्जी हमेशा ही अरविंद केजरीवाल को विपक्षी खेमे में साथ रखने की पक्षधर रही हैं. विपक्ष की बैठकों में भी ममता बनर्जी को अरविंद केजरीवाल की पैरवी करते देखा गया है. लेकिन, राहुल गांधी का व्यवहार ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल से एक जैसा ही देखने को मिला है. 2025 का दिल्ली विधानसभा चुनाव और हालिया पश्चिम बंगाल चुनाव मिसाल हैं – राहुल गांधी ममता बनर्जी के खिलाफ उन्हीं मुद्दों के साथ हमलावर दिखे, जिन मुद्दों के साथ दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ थे।  बंगाल में कांग्रेस बनाम तृणमूल कांग्रेस जैसे दिल्ली चुनाव में राहुल गांधी ने अरविंद केजरीवाल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और शीशमहल के बहाने हमला बोला था, पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ही उनके निशाने पर देखी गईं. पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी पर भ्रष्टाचार और बीजेपी की मददगार होने का भी इल्जाम लगाया था।  2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तो राहुल गांधी ने अधीर रंजन चौधरी को भेजा ही खास मकसद से था. तब अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में कांग्रेस और विपक्ष के नेता हुआ करते थे. लेकिन, चुनाव से पहले उनको पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था. और, इस बार के चुनाव में भी बंगाल यूनिट को खुली छूट दी गई थी. अधीर रंजन को तो पश्चिम बंगाल अध्यक्ष पद से पहले ही हटा दिया … Read more

विपक्षी एकता को मिली नई धार! INDIA ब्लॉक की बैठक में तय हुए 5 अहम एजेंडे

 नई दिल्ली लोकसभा चुनाव के दो साल बाद विपक्षी एकजुटता को नई धार देने के मकसद से इंडिया ब्लॉक की 7वीं बैठक दिल्ली में हुई. कांग्रेस की अगुवाई में करीब ढाई घंटे चली बैठक में 25 दलों के नेताओं ने चुनावी पारदर्शिता, शिक्षा व्यवस्था, महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक मुद्दों पर साझा रणनीति बनाने पर सहमति जताई. बैठक में नीट और सीबीएसई से जुड़े विवादों को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की गई. इंडिया ब्लॉक ने नियमित अंतराल पर बैठकें करने का फैसला लिया।  इंडिया ब्लॉक की इस बैठक में कांग्रेस की ओर से सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी, एनसीपी-एसपी की सांसद सुप्रिया सुले समेत 25 दलों के 34 नेता और निर्दलीय राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल शामिल हुए. दोपहर 12 शुरू हुई बैठक करीब ढाई घंटे से ज्यादा चली. इंडिया ब्लॉक में शामिल प्रमुख दलों के नेता दोपहर 3 बजे जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए।  प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे ने बताया कि इंडिया ब्लॉक की बैठक में 25 दलों के नेता शामिल हुए और 5 प्रमुख मुद्दों पर सहमति बनी. उन्होंने कहा कि बैठक में नीट-यूजी परीक्षा पेपर लीक और सीबीएसई रिवैल्यूएशन में अनियमितताओं के मुद्दे पर भी चर्चा हुई. कांग्रेस अध्यक्ष ने इन दोनों मुद्दों पर सरकार को घेरते हुए कहा कि ये देश के युवाओं के साथ धोखा है. उन्होंने इंडिया ब्लॉक की ओर से केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की।  इंडिया ब्लॉक की बैठक में इन 5 मुद्दों पर सहमति बनी     एसआईआर, मतदाता सूची में कथित हस्तक्षेप और चुनावों की निष्पक्षता के मुद्दे पर भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने पर सहमति बनी है. यह पत्र उन्हें जल्द से जल्द सौंपा जाएगा।      लाखों छात्रों को प्रभावित करने वाले गंभीर मामलों को देखते हुए सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री को तत्काल इस्तीफा देना चाहिए. उनके कार्यकाल में नीट और सीबीएसई परीक्षाओं से जुड़े मामलों में लाखों युवाओं के साथ अन्याय हुआ है, जिसके कारण आज बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।      हम देश की गंभीर आर्थिक स्थिति, बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, अत्याचारों और किसानों से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाते रहेंगे. जनहित से जुड़े इन विषयों पर केंद्र सरकार को सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए, जिसमें हम अपने सभी मुद्दे और सुझाव रखेंगे।      इंडिया ब्लॉक के सभी दल हर दो महीने में बैठक करेंगे. हमारी अगली बैठक 8 अगस्त को हैदराबाद में आयोजित होगी।      संसद के मानसून सत्र के दौरान विपक्षी दलों के बीच समन्वय जारी रहेगा. इसके लिए नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय में प्रतिदिन सुबह एक समन्वय बैठक आयोजित की जाएगी।  खड़गे ने बताया कि संसद के आगामी मानसून सत्र के दौरान भी विपक्षी गठबंधन नियमित बैठकें करेगा. मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, 'बैठक में एसआईआर, वोट की लूट और चुनाव में धांधली के संबंध में भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजने पर सहमति बनी है. यह पत्र जल्द ही भारत के मुख्य न्यायाधीश को सौंप दिया जाएगा. दूसरा बिंदु यह है कि शिक्षा मंत्री के तत्काल इस्तीफे की मांग पर सर्वसम्मति से सहमति बनी है. क्योंकि उनकी देखरेख में नीट और सीबीएसई परीक्षाओं में शामिल हुए लाखों युवाओं के साथ विश्वासघात हुआ है। 

ममता बनर्जी को बड़ा झटका? 20 बागी सांसदों का ओम बिरला को पत्र, NDA में एंट्री की चर्चाएं तेज

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल के बाद नई दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस में बड़ी टूट होने का प्रोसेस शुरू हो गया है. तृणमूल कांग्रेस के 20 असंतुष्ट सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र भेजा है और उन्होंने अलग गुट बनाने का प्रस्ताव दिया है. बताया जा रहा है कि इस गुट का नेतृत्व सांसद काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि यह बगावत ऐसे समय में आया है जब तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी नई दिल्ली में ही मौजूद हैं. उनके साथ पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी भी हैं. इन सांसदों के पास दो विकल्प हैं. या तो ये टीएमसी से अलग होकर बीजेपी में शामिल हो जाएं या फिर विधानसभा की तरह अलग गुट बनाकर अलग हों।  तृणमूल कांग्रेस में बड़ी हलचल की खबर आ रही है. रिपोर्ट के अनुसार अब दिल्ली में भी टीएमसी में बड़ी टूट की आशंका है. टीएमसी  तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद अलग गुट बनाएंगे. ये 20 सांसद तृणमूल कांग्रेस से जल्द अलग होंगे. इस बाबत आज दिल्ली में अहम गतिविधियां हुईं. ये सांसद जल्द ही लोकसभा स्पीकर को अपने फैसले की जानकारी देंगे. लेकिन स्पीकर अभी दिल्ली में मौजूद नहीं हैं, लोकसभा स्पीकर अभी चंडीगढ़ में हैं।  लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं. पार्टी में टूट के लिए कम से कम दो तिहाई सांसदों की जरूरत है. ये संख्या 19 होती है. इस बीच टीएमसी के बागी गुट ने 20 सांसदों के अपने साथ होने का दावा किया है।  इन बागी सांसदों का कहना है कि लोकसभा में वे अपने नेता के रूप में अभिषेक बनर्जी को नहीं बल्कि काकोली घोष को चाहते हैं।  बताया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र भेजने से पहले दिल्ली के मोतीलाल नेहरू मार्ग पर स्थित केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के सरकारी आवास पर सोमवार को एक बेहद गोपनीय बैठक की, जिसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी मौजूद रहे।  बागी सांसद शाम 6.30 बजे टीएमसी एमपी शताब्दी राय के घर एक और मीटिंग करेंगे।   इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के 14 बागी सांसदों ने दिल्ली में पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की है. ये मुलाकात बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव के घर पर हुई है. पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी आज ही दिल्ली पहुंचे हैं. सूत्रों के अनुसार इस मीटिंग में टीएमसी के लोकसभा के 14 सांसद मौजूद थे. इस मुलाकात में बीजेपी नेता और पूर्व त्रिपुरा सीएम बिप्लब देब भी शामिल थे।  सूत्रों का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस के 5 बागी सांसद सोमवार सुबह से केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर मौजूद थे. इन पांच सांसदों के नाम बर्दमान पूर्व से सांसद शर्मिला सरकार, हावड़ा के सांसद प्रसून बनर्जी, कूचबिहार सांसद जगदीश बसुनिया, झारग्राम सांसद कालिपद सोरेन और बांकुरा सांसद अरूप चक्रवर्ती हैं. दोपहर 12.00 बजे के बाद बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी उनके घर गए. इस बीच सूत्रों ने बताया कि लोकसभा के कुल 14 टीएमसी सांसदों ने शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की. दोपहर 2 बजे के बाद शुभेंदु अधिकारी भूपेन्द्र यादव के घर से निकले।  इधर इस घटनाक्रम से पहले TMC से इस्तीफा देने वाले सुखेंदु शेखर से मिलने के लिए पार्टी के 5 सांसद पहुंचे. ये मुलाकात दिल्ली में हुई. सुखेंदु शेखर से मिलने आए सांसदों में बर्दमान पूर्व से सांसद शर्मिला सरकार, हावड़ा के सांसद प्रसून बनर्जी, कूचबिहार सांसद जगदीश बसुनिया, झारग्राम सांसद कालिपद सोरेन और बांकुरा सासंद अरूप चक्रवर्ती शामिल थे।  रिपोर्ट के अनुसार TMC के बागी सांसद लोकसभा में अभिषेक बनर्जी के बजाय काकोली घोष को पार्टी का नेता चाहते हैं।  बता दें कि राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर ने आज (सोमवार) ही राज्यसभा और पार्टी से इस्तीफा दिया है. इस बीच उनसे टीएमसी के पांच सांसद मिलने पहुंचे थे. इससे टीएमसी की राजनीति को लेकर कई अटकलें लगाई जा रही हैं।  बता दें कि TMC सांसदों में पहले ही विभाजन हो चुका है. तृणमूल कांग्रेस के विधायकों पर ममता बनर्जी की पकड़ ढीली पड़ने के बाद अब पार्टी के संसदीय खेमे को भी एक और झटका लगा है।  ममता के सबसे विश्वस्त लेफ्टिनेंट फिरहाद हकीम ऋतब्रत से मिले इस बीच कोलकाता से खबर है कि ममता बनर्जी के सबसे विश्वस्त लेफ्टिनेंट और कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम ने बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी से मुलाकात की है. ये मुलाकात विधानसभा में भी हुई है. फिरहाद हकीम ने इस मुलाकात को शिष्टाचार भेंट बताया है. फिरहाद हकीम ने कुछ दिन पहले ही कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा दिया है।    आज सुखेंदु बोले, कल दूसरे ही बोलेंगे-ऋतब्रत वहीं राज्यसभा में एक दशक से ज़्यादा समय तक पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले सबसे पुराने सदस्य सुखेंदु शेखर रॉय ने सांसद और पार्टी, दोनों पदों से इस्तीफ़ा दे दिया है. और पार्टी के 5 सांसदों से मुलाकात की है।  वहीं बंगाल में ममता के खिलाफ बगावत करने वाले बागी विधायक और नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने कहा है कि उन्होंने कई विधायकों से मुलाकात की है।  नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने सुखेंदु के इस्तीफे और टीएमसी के राजनीतिक घटनाक्रम पर कहा कि, "यह सिर्फ़ सुखेंदु की बात नहीं है. असल में मैंने उनसे व्यक्तिगत रूप से बात नहीं की है. लेकिन उन्होंने जो कुछ भी कहा, मैं उससे ज़्यादातर सहमत हूं, खासकर संसद के उच्च सदन के कामकाज को लेकर. उनकी बातें बिल्कुल सही थीं. संसद कोई क्विज़ शो की जगह नहीं है. सुखेंदु जो बता रहे हैं, उसका अनुभव मैंने खुद किया है. उनके जैसे कद के सांसद को पिछली कतार में धकेल दिया जाना निराशाजनक था, आज सुखेंदु आवाज़ उठा रहे हैं; कल दूसरे भी ऐसा ही करेंगे।  ये हो सकते हैं बागी सांसद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सौंपे गए पत्र में जगदीश चंद्र बसुनिया, अरुप चक्रवर्ती, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार और खलीलुर रहमान जैसे नेताओं के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं. वहीं काकोली घोष दस्तीदार, पार्थ भौमिक, अभिनेता-राजनेता देव और जून माल्या को लेकर भी असंतोष की अटकलें लगाई जा रही हैं।  तृणमूल सांसद सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी से इस्तीफा दिया, राज्यसभा सदस्य पद छोड़ा तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका देते हुए वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी की … Read more

क्रॉस वोटिंग की अटकलों के बीच राज्यसभा चुनाव दिलचस्प, क्या बीजेपी का दांव बदलेगा पूरा गणित?

भोपाल  मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों पर हो रहे चुनाव के लिए शह-मात का खेल शुरू हो गया है. विधायकों की संख्या के लिहाज से दो बीजेपी और एक सीट कांग्रेस के लिए कन्फर्म मानी जा रही थी, लेकिन बीजेपी ने तीसरे उम्मीदवार के तौर पर महेश केवट को उतारकर राहुल गांधी की करीबी मिनाक्षी नटरजान की सियासी टेंशन बढ़ा दी है?  राज्यसभा सीटों के लिए बीजेपी ने तरुण चुग और रजनीश अग्रवाल के बाद महेश केवट को प्रत्याशी बनाया है तो कांग्रेस ने पूर्व सांसद मिनाक्षी नटराजन पर दांव खेला है. इस तरह तीन सीटों के लिए चार उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं।  मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव के लिए बीजेपी और कांग्रेस के उम्मीदवारों के नाम का ऐलान के बाद निर्विरोध चुनाव की संभावना खत्म हो गई है और वोटिंग के जरिए ही फैसला होगा.  ऐसे में अब असल पेंच विधायकों की क्रॉस वोटिंग को लेकर फंसता दिख रहा है ।  कौन हैं महेश केवट, जिन्हें बीजेपी ने एमपी से राज्यसभा उम्मीदवार बनाया मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा ने तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को उतारा है. महेश केवट मध्य प्रदेश में मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष हैं.  महेश केवट को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने मछुआरा वर्ग को संदेश दिया है. महेश केवट 1984 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े है.  वो ओरछा शाखा में मुख्य शिक्षक रह चुके हैं. छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के ब्लॉक संयोजक के रूप में कार्य किया।  महेश केवट 1995 से भाजपा की सक्रिय राजनीति में हैं और विभिन्न संगठनात्मक पदों पर काम कर चुके हैं. 2000 में पार्षद निर्वाचित हुए तथा नगर परिषद ओरछा के उपाध्यक्ष भी रहे. भाजपा के जिला मंत्री, जिला उपाध्यक्ष और प्रदेश कार्यसमिति सदस्य के रूप में संगठन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. इसके अलावा हरियाणा विधानसभा चुनाव, शहडोल लोकसभा उपचुनाव, चित्रकूट, मुंगावली और पृथ्वीपुर उपचुनावों में संगठन की ओर से अहम जिम्मेदारियां संभालीं।  भाजपा से तरुण चुग और रजनीश अग्रवाल भी कर चुके नामांकन मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव होना है. भाजपा ने दो सीटों के लिए पहले ही तरुण चुग और रजनीश अग्रवाल के नाम की घोषणा कर दी थी. इन दोनों ने नामांकन भी दाखिल कर दिया है. तीसरे सीट के लिए अब महेश केवट को उतार कर भाजपा ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी है. अब कांग्रेस विधायकों के क्रॉस वोटिंग का खतरा मंडराने लगा है।  कांग्रेस के पास 62 वोट, एकजुट रखना चुनौती मालूम हो कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास 62 वोट हैं. एक सीट जीतने के लिए 58 वोट चाहिए. उधर बीजेपी को तीसरी सीट जीतने के लिए केवल आठ अतिरिक्त वोट चाहिए. इसी कारण कांग्रेस में हड़कंप मच गया है. कांग्रेस ने मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है. मीनाक्षी की जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस को अपने वोटों को एकजुट रखना होगा. लेकिन इससे पहले कांग्रेस विधायकों में टूट हो चुकी है. लिहाज़ा एमपी में राज्य सभा चुनाव काँटे का हो गया है।  कर्नाटक से भाजपा ने एम नागराज को बनाया उम्मीदवार भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति ने कर्नाटक में होने वाले राज्यसभा के ‌द्विवार्षिक चुनाव 2026 के लिए डॉ. एम नागराज को उम्मीदवार बनाया है. आरएसएस से जुड़े नागराज अभी पार्टी का बिल्डिंग कमेटी संभाल रहे हैं. इसका काम राज्य भर में हर जिले में पार्टी कार्यालय बनाना है।  साथ ही कर्नाटक के विधान परिषद् द्विवार्षिक चुनाव 2026 के लिए बीजेपी ने लिंगराज पाटील और रघु कौटिल्य को उम्मीदवार बनाया है।  राज्यसभा चुनाव का नंबर गेम क्या है?  मध्य प्रदेश में विधानसभा के कुल 230 सदस्यों की संख्या है, लेकिन फिलहाल 228 सदस्य हैं. इनमें बीजेपी के 164 विधायक हैं और कांग्रेस के पास 64 विधायक हैं. राज्यसभा चुनाव की एक राज्यसभा सीट पर जीत दर्ज करने के लिए किसी भी उम्मीदवार को कम से कम 58 विधायकों (प्रथम वरीयता के वोट) के समर्थन चाहिए।  विधायकों के आधार पर बीजेपी की दो सीटें कन्फर्म है और कांग्रेस एक सीट जीत सकती है, लेकिन बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार के उतरने के बाद मामला उलझ गया है. बीजेपी 164 विधायकों की आधार पर दो राज्यसभा सीट जीतने के लिए 116 विधायकों के वोट चाहिए।  बीजेपी दो सीटें जीतने के बाद 48 अतिरिक्त वोट चाहिए जबकि कांग्रेस 64 विधायकों के दम पर एक सीट जीत सकती है, उसके बाद भी उसके बाद 6 विधायकों का अतरिक्त वोट हो रहा है, लेकिन मामला बीजेपी के तीसरे प्रत्याशी के उतरने से है।  तीसरी राज्यसभा सीट के लिए मुकाबला विधायकों की संख्या के आधार पर बीजेपी 2 राज्यसभा सीटें सेफ करने के बाद 48 विधायक बचेंगे, जिसके तीसरी राज्यसभा की सीट जीतने के लिए उसे अतिरिक्त 10 वोटों की जरूरत होगी. वहीं कांग्रेस के पास एक राज्यसभा सीट जीत के लिए जरूरी संख्या बल है, लेकिन बीजेपी के द्वारा तीसरे उम्मीदवार की घोषणा ने उसकी चिंताएं बढ़ा दी हैं और मिनाक्षी नटराजन की जीत की राह मुश्किल कर दी है।  बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार महेश केवट को मैदान में उतारने के फैसले ने कांग्रेस की धड़कने बढ़ा दी है. बीजेपी का यह कदम बताता है कि पार्टी या तो अपनी पार्टी से बाहर के विधायकों का समर्थन हासिल करने को लेकर आश्वस्त है या उसे लगता है कि क्रॉस-वोटिंग अंतिम नतीजे को बदल सकती है।  राज्यसभा के लिए क्रॉस वोटिंग का खतरा मध्य प्रदेश का राज्यसभा चुनाव, जिसे एक सामान्य चुनाव माना जा रहा था, एक ऐसे मुकाबले में बदल दिया है, जिस पर सबकी नज़रें टिकी हैं, अब सबकी नजरें वोटिंग के दिन से होने वाली क्रॉस-वोटिंग, वोटिंग से दूर रहने और आखिरी समय की सियासी चालों पर होंगी।  बीजेपी के लिए, तीसरा उम्मीदवार उतारना अपर हाउस में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की एक महत्वाकांक्षी कोशिश है. कांग्रेस के लिए यह अपनी पार्टी को एकजुट रखने और उस सीट को बचाने की क्षमता का इम्तिहान है, जो मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से उसकी पहुंच में दिख रही है।  कांग्रेस की बढ़ी सियासी टेंशन कांग्रेस के पास वैसे तो 64 विधायक हैं, लेकिन विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा को चुनाव हलफनामे के मामले में अदालत से दोषी ठहराए जाने के … Read more

पंजाब से दो नेताओं को मिल सकती है मंत्रिमंडल में जगह

नई दिल्ली  मोदी कैबिनेट का विस्तार इस महीने के आखिरी में या फिर अगले महीने हो सकता है। केंद्र सरकार के तीसरे कार्यकाल का यह पहला मंत्रिमंडल विस्तार होने जा रहा है। इसमें उन राज्यों पर भी फोकस हो सकता है, जिसमें आने वाले सालों में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों में अगले साल ही चुनाव हैं और यूपी में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पार्टी मजबूत स्थिति में है, जबकि पंजाब में अकेले दम पर जीतने की तैयारी कर रही है। इसी वजह से केंद्रीय रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को राज्यसभा टिकट नहीं दिया गया और उन्हें संभवत: विधानसभा चुनाव लड़वाया जा सकता है। इसके अलावा भी कई दिग्गज पंजाब के नेताओं को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी है। वहीं, चर्चाएं हैं कि कैबिनेट विस्तार में पंजाब से दो बड़े नेताओं को जगह मिल सकती है। एक हैं भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और दूसरे अभी हाल ही में आम आदमी पार्टी से आए लोकप्रिय राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा। सूत्रों के अनुसार, इन दोनों नेताओं को पंजाब कोटे से मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया जा सकता है। अमृतसर से आते हैं तरुण चुघ, इस बार MP से जाएंगे राज्यसभा तरुण चुघ की गिनती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद नेताओं में होती है। वह पंजाब के अमृतसर जिले से आते हैं और एचआर में एमबीए की डिग्री हासिल की है। वह लंबे समय से आरएसएस से जुड़े रहे हैं और इस समय पार्टी के महासचिव हैं। वहीं, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, लद्दाख में भाजपा के इनचार्ज हैं। उन्होंने राज्य BJP सचिव और राज्य भाजपा ट्रेनिंग सेल के इंचार्ज के तौर पर काम किया। 1997 में भाजपा युवा विंग पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष और युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के तौर पर भी काम कर चुके हैं। सूत्रों की मानें तो मोदी सरकार में तरुण चुघ को कोई अहम मंत्रालय दिया जा सकता है। युवाओं के मुद्दे उठाने वाले राघव चड्ढा पर भी अटकलें पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट और बड़ी संख्या में युवाओं में लोकप्रिय राघव चड्ढा का भी नाम उन नेताओं में शामिल हैं, जिनके मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना है। राघव एक समय आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के करीबी हुआ करते थे, लेकिन पिछले दिनों उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली। उनको मिलाकर सात आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों ने भाजपा का दामन थामा। इसमें हरभजन सिंह, संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल समेत तमाम अन्य सांसदों के नाम हैं। राघव लंबे समय से युवाओं पर केंद्रित मुद्दों को सदन में उठाते रहे हैं, जिसकी वजह से सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुए और इंस्टाग्राम पर उनकी रील्स को लाखों युवाओं ने देखा।  हालांकि, जब आप छोड़ी तो फॉलोवर्स भी कम हुए। हालांकि, अब अगले साल पंजाब विधानसभा चुनाव को देखते हुए और चर्चित चेहरा राघव चड्ढा को अहम मंत्रालय भी मिल सकता है। केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा अध्यक्ष बनाया गया है तो ऐसे में उनकी भी मंत्रिमंडल से छुट्टी होना तय है। कयास लगाए जा रहे हैं कि उनकी जगह पर राघव को बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। राघव पढ़े-लिखे और पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और इस मंत्रालय के लिए तमाम योग्य सांसदों में से एक हैं।  

इंडिया गठबंधन बैठक से पहले ममता की दिल्ली में सियासी सक्रियता तेज

पश्चिम बंगाल बंगाल का चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी का किला ध्वस्त हो चुका है। ममता ने न सिर्फ सत्ता गंवाई, बल्कि उनकी पार्टी, टीएमसी में भगदड़ मची हुई है। घर को बिखरता देख अब दीदी को इंडिया गठबंधन की याद सताने लगी हैं। वह दिल्ली में होने वाली इंडिया गठबंधन की बैठक में हिस्सा लेने पहुंच रही हैं। बता दें कि एक वक्त था जब ममता ने इंडिया गठबंधन को दरकिनार किया था। लेकिन बदलते हालात में अपनी साख बचाने के लिए ममता बनर्जी अब फिर से इंडिया गठबंधन का सहारा लेती नजर आ सकती हैं। जानकारों के मुताबिक इस बैठक के जरिए ममता बनर्जी न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती हैं, बल्कि अपनी पार्टी के अंदर भी अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहती हैं अभिषेक पहले ही पहुंच चुके गौरतलब है कि विपक्ष की बैठक 8 जून को नई दिल्ली में होने वाली है। इस बैठक में टीएमसी चीफ ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के पहुंचने का अनुमान है। ममता बनर्जी के रविवार को दिल्ली पहुंचने और मंगलवार तक यहां रुकने का अनुमान है। वहीं, अभिषेक बनर्जी पहले ही राजधानी में पहुंच चुके हैं। ममता की दिल्ली यात्रा ऐसे वक्त में हो रही है, जब वह अपनी पार्टी के लिए रिकवरी का रास्ता तैयार कर रही हैं। बता दें कि बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ने 15 साल पुरानी सत्ता गंवा दी है। भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को शिकस्त देकर बंगाल में पहली बार सत्ता हासिल की है। सोनिया से कर सकती हैं मुलाकात बताया जाता है कि ममता बनर्जी अपनी पार्टी के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पकड़ को मजबूत बनाना चाहती हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से यह बात कही है। इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि दिल्ली यात्रा के दौरान ममता सोनिया गांधी से मुलाकात के मौके भी तलाशेंगी। हालांकि गांधी परिवार की तरफ से इसको लेकर पुष्टि नहीं की गई है। असल में पिछले कुछ वक्त में टीएमसी और कांग्रेस के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा दरार तो इंडिया गठबंधन के नेतृत्व के फैसले को लेकर आई थी। पुराने बयान भारी न पड़ जाएं बंगाल के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहाकि जब ममता जीत रही थीं तो वह जो भी मन में आता था कांग्रेस के लिए बोल देती थीं। उन्होंने राहुल गांधी की भी आलोचना की और कांग्रेस नेतृत्व से इंडिया गठबंधन का नेतृत्व छीनने की भी कोशिश की। अब उनका खराब समय आया है तो कांग्रेस उनका साथ तो नहीं छोड़ेगी, लेकिन हम करीबी दोस्तों की तरह भी नहीं रहेंगे। गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर बदलाव किए हैं। इस बदलाव में अभिषेक बनर्जी तो पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बने हुए हैं। लेकिन दो अन्य संयुक्त राष्ट्रीय महासचिव के रूप में राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोना सेन को भी जोड़ा गया है। माना जा रहा है कि यह कदम डिसीजन मेकिंग का दायरा बढ़ाने और अभिषेक बनर्जी को लेकर बढ़ती आलोचना को देखते हुए उठाया गया है। आठ जून को है बैठक बता दें कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक आठ जून को होगी। इसमें नीट परीक्षा से जुड़े विवाद, शिक्षा व्यवस्था, महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि, चुनाव से जुड़े मुद्दों तथा संसद के मानसून सत्र के लिए साझा रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है। कांग्रेस की पहल पर हो रही इस बैठक को विपक्षी दलों के बीच समन्वय मजबूत करने की कोशिश बताया जा रहा है। बैठक सोमवार आठ जून को यहां कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में होगी। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) ने बैठक में शामिल नहीं होने की घोषणा की है। आम आदमी पार्टी पहले ही इंडिया गठबंधन से दूरी बना चुकी है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल बैठक के एजेंडे और इसकी तैयारियों को लेकर विभिन्न विपक्षी नेताओं से लगातार संपर्क में है। विपक्षी दल जनता से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने और संसद से लेकर सड़क तक संयुक्त संघर्ष की रणनीति पर सहमति बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

कांग्रेस पर CPI(M) का हमला, विपक्षी गठबंधन में बढ़ा तनाव

नई दिल्ली इंडिया ब्लॉक की सोमवार (8 जून) को प्रस्तावित बैठक से ठीक पहले मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं. द्रमुक (DMK) द्वारा कांग्रेस की मौजूदगी के कारण इस बैठक से दूर रहने की घोषणा के बाद अब CPI (M) ने भी कांग्रेस की कार्यशैली पर भारी नाराजगी जताई है. CPI(M) ने कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए कहा है कि केरल में उसके नेताओं द्वारा लगाए गए BJP के साथ ‘डील’ के आरोप गठबंधन की मूल भावना के खिलाफ हैं. उधर, सूत्रों का ये भी कहना है कि झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा उम्मीदवार उतारे जाने से बाद से हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा भी नाखुश है. CPI(M) महासचिव एम.ए. बेबी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण मांगा है. साथ ही इस पत्र की कई कॉपियां गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों को भी भेजी हैं. बेबी ने पत्र में राहुल, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के बयानों पर ऐतराज जताया है. उन्होंने कहा कि केरल विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस ने बार-बार ये प्रचार किया कि CPI(M) और BJP के बीच राजनीतिक समझौता है तथा तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच खास डील है. CPI(M) ने इसे विपक्षी गठबंधन की भावना के खिलाफ बताया है. माकपा नेता ने इन आरोपों को पूरी तरह से एक मनगढ़ंत और झूठी कहानी करार दिया है जिसे वो किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं कर सकते. उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व को याद दिलाया कि केरल की धरती पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और बीजेपी के खिलाफ सीधे राजनीतिक लड़ाई लड़ते हुए माकपा ने अपने सैकड़ों समर्पित कार्यकर्ताओं को खोया है. BJP के खिलाफ बना था इंडिया ब्लॉक बेबी ने अपने पत्र में कहा कि INDIA ब्लॉक BJP के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई के लिए बना था और ऐसे वक्त में सहयोगी दलों पर ही संदेह जताना गठबंधन की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन आरोपों पर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई तो 8 जून की गठबंधन बैठक से पहले ही एकता पर सवाल खड़े हो जाएंगे. कांग्रेस के रवैये पर कड़े सवाल उठाने के बावजूद CPI(M) ने विपक्षी एकजुटता और समन्वय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है. एमए बेबी ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी संसद के अंदर मोदी सरकार की तानाशाही, सांप्रदायिक और जनविरोधी नीतियों का मजबूती से विरोध करने के लिए अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर काम करती रहेगी. DMK-AAP ने किया किनारा वहीं, दिल्ली में होने वाली इस रणनीतिक बैठक में ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और राहुल गांधी जैसे शीर्ष नेताओं के शामिल होने की संभावना है. हालांकि, कांग्रेस के साथ मतभेदों के चलते द्रमुक (DMK) के इस बैठक में शामिल होने की उम्मीद न के बराबर हैं. दूसरी ओर आम आदमी पार्टी ने भी इस बैठक से दूरी बना ली हैं, जिससे विपक्षी गठबंधन की एकजुटता पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं. JMM भी नाखुश उधर, झारखंड में आगामी राज्यसभा चुनावों में दो राज्यसभा सीटों में से एक पर कांग्रेस द्वारा अपने उम्मीदवार प्रणव झा की घोषणा करने पर जेएमएम भी कांग्रेस से उतना ही नाराज है. सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ जेएमएम राज्य की दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहती थी, क्योंकि जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन के पास दोनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त संख्या बल है. शुक्रवार को जेएमएम नेतृत्व की बैठक के बाद पार्टी के कई नेताओं ने कहा कि पार्टी दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतार सकती है. हालांकि, शनिवार को जेएमएम ने पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम को एक सीट से अपना अधिकारिक उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा की. झामुमो के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने इसकी घोषणा की. 'TVK वैकल्पिक दोस्त' इसी बीच शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने गठबंधन में किसी भी तरह की फूट या बिखराव के दावों को पूरी तरह खारिज किया है. राउत ने कहा कि भले ही डीएमके ने इस बैठक से दूरी बना ली हो, लेकिन विपक्ष को तमिलनाडु में टीवीके (TVK) के रूप में एक मजबूत वैकल्पिक मित्र मिल गया है.

बहरामपुर सीट विवाद पर हंगामा, गांगुली और पठान ने खारिज किए दावे

नई दिल्ली  पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद टीएमसी चीफ ममता बनर्जी इन दिनों सुर्खियों में हैं। अब बहरामपुर लोकसभा सीट को लेकर हंगामा मचा हुआ है। बवाल ऐसा मचा कि सौरव गांगुली और यूसुफ पठान दोनों को सफाई देनी पड़ी। दरअसल, बंगाल के अखबार में छपी खबर में दावा किया गया कि विधानसभा सीट हारने के बाद अब ममता बनर्जी सांसद बनकर दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होना चाहती हैं। वह बहरामपुर सीट से लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहती हैं। ये वही सीट है जहां से यूसुफ पठान सांसद हैं। खबर पर क्यों मच गया हंगामा? खबर में दावा किया गया कि ममता बनर्जी ने सौरव गांगुली से कहा कि वह यूसुफ पठान से बात करें कि वह इस सीट को छोड़ दें, जिससे कि वहां पर उपचुनाव हों और वह सांसद बनकर दिल्ली पहुंच सकें। इतना ही नहीं यहां तक दावा किया गया कि यूसुफ पठान ने सौरव गांगुली के इस आग्रह को ठुकरा दिया। इसके बाद इस खबर को लेकर हंगामा मच गया। सौरव और यूसुफ को देनी पड़ी सफाई इस हंगामे के बाद दोनों पूर्व क्रिकेटरों को सफाई देनी पड़ी। सौरव गांगुल ने यूसुफ पठान को सीट छोड़ने का मैसेज भेजने की खबर को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि मीडिया में प्रकाशित ये दावे तथ्यों की जांच के बिना और लापरवाही से प्रकाशित किए गए हैं। ममता बनर्जी की ओर से उन्हें कभी कोई संदेश यूसुफ पठान तक पहुंचाने के लिए नहीं कहा गया। गांगुली ने यह भी कहा कि उनका राजनीति से किसी भी स्तर पर कोई संबंध नहीं रहा है। वहीं, यूसुफ पठान ने कहा, "कुछ समय से यह खबर वायरल हो रही है कि ममता बनर्जी ने मुझसे बहरामपुर लोकसभा सीट से सांसद पद से इस्तीफा देने को कहा है, ताकि वह वहां से लोकसभा चुनाव लड़ सकें। ममता बनर्जी ने मुझसे कभी ऐसा नहीं कहा। यहां तक कि हमारी पिछली मुलाकात में भी उन्होंने इसका जिक्र नहीं किया। न ही उन्होंने पार्टी के किसी आधिकारिक नेता के जरिए ऐसा कोई संदेश भेजा है। यह दावा पूरी तरह से झूठा है और मुझे दुख है कि बिना किसी आधिकारिक खबर के भी सोशल मीडिया और सभी मीडिया हाउस में इस पर चर्चा और बहस हो रही है। इसलिए, न तो ममता बनर्जी और न ही पार्टी के किसी नेता ने मुझसे मेरी सांसद सीट से इस्तीफा देने के लिए कहा है।"