samacharsecretary.com

शेयर बाजार में खुशी की लहर, US-ईरान सीजफायर के बाद सेंसेक्स 2700 अंक बढ़ा

मुंबई  शेयर बाजार पर अमेरिका-ईरान में हुए दो हफ्ते के सीजफायर (US-Iran Ceasefire) का सीधा असर पड़ा है. खुलने के साथी ही बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 2700 अंक से ज्यादा चढ़ गया, तो वहीं एनएसई निफ्टी ने भी ओपनिंग के साथ ही 800 अंकों की तगड़ी छलांग लगा दी. ग्लोबल मार्केट में बंपर तेजी के बीच शेयर बाजार के लिए पॉजिटिव सिग्नल पहले से ही मिल रहे थे।  शेयर मार्केट में बुधवार को कारोबार की शुरुआत होने पर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स (BSE Sensex) अपने पिछले बंद 74,616.58 की तुलना में खुलने के साथ ही 77,290 के लेवल पर पहुंच गया और फिर कुछ सेकंड में ही ये अपनी रफ्तार को तेज करते हुए 77,392 के लेवल पर कारोबार करता हुआ नजर आने लगा।   बात नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी इंडेक्स (NSE Nifty) की करें, तो अपने पिछले बंद 23,123.65 की तुलना में तेज उछाल के साथ ये 50 शेयरों वाला इंडेक्स 23,855 पर ओपन हुआ और फिर सेंसेक्स के कदम से कदम मिलाकर चलते हुए एक झटके में 800 अंक की तेजी के साथ 23,938 के लेवल पर जा पहुंचा।  युद्ध पर ब्रेक, तो हर ओर हरियाली युद्ध की टेंशन पर ब्रेक लगने के साथ ही शेयर बाजार में लौटी तूफानी तेजी के चलते सभी कैटेगरी में बुधवार को हरियाली देखने को मिली. BSE लार्जकैप में शामिल 30 में से 29 शेयरों बंपर उछाल के साथ कारोबार कर रहे थे. IndiGo Share (10%), LT Share (8%), Bajaj Finance Share (7%), Adani Ports Share (7%), Bajaja Finserv Share (6.60%), M&M Share (5.90%). Eternal Share (5.30%). Titan Share (5.20%), Maruti Share (5.10%) की तेजी लेकर कारोबार कर रहे थे।  इसके अलावा HDFC Bank Share (4.80%). SBI Share (4%), ICICI Bank Share (4%), Kotak Bank Share (3.30%) और Reliance Share भी करीब 3 फीसदी की छलांग लगाता नजर आया।  शेयर बाजार में तेजी के ये बड़े कारण शेयर बाजार में तेजी के पीछे के बड़े कारणों की बात करें, तो अमेरिका और ईरान में जारी युद्ध की टेंशन (US-Iran War Tension End) कम होने और दोनों देशों के बीच सीजफायर पर सहमति बनने के बाद बाजारों के सेंटीमेंट में सुधार आया है. इसके अलावा तेल संकट गहराने से बढ़ी टेंशन को क्रूड ऑयल की कीमतों में अचानक आई गिरावट (Crude Oil Price Crash) ने कम किया है, जो इस तेजी के पीछे बड़ी वजह है।     

ट्रंप ने झुककर किया ईरान से समझौता, दो हफ़्ते का सीजफायर हुआ लागू

वाशिगटन / तेहरान  मिडिल-ईस्ट में पिछले एक महीने से ज्यादा वक्त से चल रही जंग अब थम सकती है.  अमेरिका और इजरायल के ईरान पर संयुक्त हमलों से शुरू हुई महाजंग में अब सीजफायर का ऐलान हो गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को जो डेडलाइन दी थी, उसके खत्म होने से ठीक पहले ही ट्रंप ने दो हफ्तों के लिए जंग रोकने की घोषणा कर दी।  धमकियों से अचानक पीछे हटते हुए, डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई रोक देंगे, जो कूटनीति के लिए एक संभावित मौके का संकेत है. सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने कहा, "मैं दो हफ़्तों की के लिए ईरान पर बमबारी और हमले को रोकने पर सहमत हूं." उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ बातचीत के बाद लिया गया, जिन्होंने उनसे नियोजित हमलों को टालने का आग्रह किया था।  ईरान ने पाकिस्तान के दो हफ़्तों के युद्धविराम प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है. इस युद्धविराम को देश के नए सुप्रीम लीडर ने मंज़ूरी दे दी है. ईरान ने कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत को जंग के खत्म होने का संकेत नहीं माना जाना चाहिए. 10-सूत्रीय प्रस्ताव में सभी प्राथमिक और माध्यमिक प्रतिबंधों को हटाने, पूरी तरह मुआवज़ा देने और ईरान की सभी ज़ब्त संपत्तियों को जारी करने की मांग की गई है।  वहीं, ईरान ने जंग रोकने के लिए 10-Points का प्रस्ताव भेजा है. ईरानी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान ने कहा कि वह युद्ध की समाप्ति को तभी स्वीकार करेगा. ईरान की मांगों को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिका के साथ शुक्रवार, 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में बातचीत होगी।  सीजफायर के बावजूद जारी तनाव हालांकि कागजों पर सीजफायर हो गया है, लेकिन जमीन पर हालात अब भी पूरी तरह शांत नहीं हैं। खाड़ी देशों और इजरायल में मिसाइल हमलों के अलर्ट जारी रहे। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत और बहरीन जैसे देशों में एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय रहे। इससे साफ है कि क्षेत्र में खतरा अभी टला नहीं है और स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। इजरायल और ईरान के बीच भी हमले पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। दोनों तरफ से जवाबी कार्रवाई जारी रहने की खबरें सामने आई हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि सीजफायर को पूरी तरह लागू होने में समय लग सकता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना सबसे बड़ा मुद्दा इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज रहा है। दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और गैस की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। ईरान ने इस जलमार्ग पर नियंत्रण कड़ा कर दिया था, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा। इसी दबाव के चलते अमेरिका और उसके सहयोगियों ने सीजफायर की दिशा में कदम बढ़ाया। सीजफायर के तहत दो हफ्तों के लिए इस स्ट्रेट को खोलने पर सहमति बनी है। हालांकि यह पूरी तरह खुला रहेगा या सीमित नियंत्रण में, इस पर अभी स्पष्टता नहीं है। आर्थिक असर और अंतरराष्ट्रीय दबाव सीजफायर की घोषणा के बाद वैश्विक बाजारों में सकारात्मक असर देखा गया। अमेरिका के तेल की कीमतों में 17 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई, जबकि जापान और दक्षिण कोरिया के शेयर बाजारों में तेजी रही।   आइए जानते हैं अब तक के बड़े अपडेट क्या हैं-   1- ट्रंप ने ईरान की ओर से पेश किए गए 10 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को व्यावहारिक बताया. उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान के पावर प्लांट, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचों को निशाना बनाने से परहेज करेगा. मिडिल ईस्ट में शांति स्थापित करने के लिए वाशिंगटन और तेहरान के बीच 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में मीटिंग होगी।  2- कूटनीतिक प्रयासों में तेजी आने के बावजूद जमीनी स्तर पर अनिश्चितता और हिंसा जारी रही. ईरान ने सीजफायर समझौते को स्वीकार कर लिया है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में हमलों की आशंका बनी रही. व्हाइट हाउस की ओर से सीजफायर पर सहमति जताए जाने के बावजूद, इज़रायली सेना ने ईरान पर हमले जारी रखे।  3- ट्रंप ने ऐलान करते हुए कहा, 'मैं आज रात ईरान पर भेजे जा रहे विनाशकारी बल को रोक रहा हूं और अगर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित रूप से खोलने पर सहमत होता है तो मैं दो सप्ताह की अवधि के लिए ईरान पर बमबारी और हमले को निलंबित करने पर सहमत हूं।  4- ईरान ने कहा, 'अगर उस पर हमले रोक दिए जाते हैं तो हमारी शक्तिशाली सशस्त्र सेनाएं अपने रक्षात्मक अभियान बंद कर देंगी.' ईरान ने यह भी कहा कि वह अमेरिका के 15 सूत्रीय प्रस्ताव पर आधारित वार्ता के अनुरोध पर विचार कर रहा है. साथ ही वाशिंगटन द्वारा ईरान की 10 सूत्रीय योजना को वार्ता के ढांचे के रूप में स्वीकार करने पर भी विचार कर रहा है।  5- तेहरान ने आगे कहा कि दो सप्ताह की अवधि के लिए, ईरान के सशस्त्र बलों के समन्वय और तकनीकी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित आवागमन संभव होगा।  6- ईरान ने इसे तेहरान की जीत बताया और उसकी सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने कहा कि ट्रंप ने शत्रुता समाप्त करने के लिए ईरान की शर्तें मान ली हैं. हालांकि, व्हाइट हाउस ने जवाब दिया कि वास्तविकता यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी सेना ने ईरान को होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए मजबूर किया था।  7- व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि इज़राइल ईरान के खिलाफ बमबारी अभियान को रोकने पर सहमत हो गया है. हालांकि, इजरायली सैन्य अधिकारियों ने कहा कि देश अभी भी हमले कर रहा है. तेल अवीव की ओर से औपचारिक बयान का इंतजार है।  8- ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर का ऐलान हो चुका है, इसके बावजूद सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत सहित खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल अलर्ट जारी किए गए।  9- खबरों के मुताबिक, ईरान की दीर्घकालिक शांति योजना में ओमान के साथ समन्वय में होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स लगाना शामिल है. तेहरान का कहना है कि इस राजस्व का उपयोग पुनर्निर्माण के लिए किया जाएगा. इसके अलावा युद्ध समाप्त करने के लिए ईरान की शर्तों में क्षेत्र से अमेरिकी लड़ाकू … Read more

नई रेल लाइन से प्रदेश में बढ़ेगी 32 एक्स्ट्रा ट्रेनों की संचालन क्षमता

उज्जैन  उज्जैन में 2028 में होने वाले सिंहस्थ को देखते हुए रेलवे भी तैयारी कर रहा है। रेलवे इंदौर से उज्जैन के बीच कई सुविधाएं देगा, जिससे सिंहस्थ में ज्यादा से ज्यादा ट्रेनें चलाई जा सकेंगी। नई लाइनों के साथ रेलवे बायपास लाइन भी बनाएगा, जिससे ट्रेनें इंजन बदले बिना मुड़ सकेंगी। इंदौर-उज्जैन के बीच ऑटोमेटिक सिग्नल भी लगेंगे, जिससे ट्रेन यात्रा सुरक्षित हो सकेगी। रेलवे रतलाम मंडल के प्रमुख स्टेशनों इंदौर, डॉ. अंबेडकर नगर (महू), लक्ष्मीबाई नगर और उज्जैन पर कोचिंग एवं टर्मिनल विकास कार्य चल रहे हैं। ये स्टेशन मालवा क्षेत्र के प्रमुख यात्री, धार्मिक और पर्यटन केंद्र है। इंदौर और उज्जैन के आसपास के स्टेशनों को भी संवारा जाएगा। इंदौर-उज्जैन क्षेत्र में 7 नई पिट लाइनें और 16 नई स्टेबलिंग लाइनों की सुविधाएं जुटाई जाएंगी, जिससे प्रतिदिन 21 प्राइमरी मेंटेनेंस और 11 प्लेटफॉर्म रिटर्न ट्रेनों सहित 32 अतिरिक्त ट्रेनों की संचालन क्षमता विकसित होगी। इंदौर स्टेशन: नया बन रहा स्टेशन वर्तमान में इंदौर स्टेशन से प्रतिदिन लगभग 57 जोड़ी ट्रेनें संचालित होती है, जिसमें 41 जोड़ी ओरिजिनेट/टर्मिनेट होती है। यहां 6 प्लेटफॉर्म और 5 पिट लाइनें उपलब्ध 6 है। स्टेशन का पुनर्विकास प्रगति पर है, जो यात्री सुविधा, अतिरिक्त ट्रेनों की दृष्टि से भी उपयोगी साबित होंगे। लक्ष्मीबाई नगर: 7 स्टेबलिंग लाइनें बनेंगी लक्ष्मीबाई नगर रेलवे स्टेशन में वर्तमान में 4 स्टेबलिंग लाइन, 3 प्लेटफॉर्म तथा 1 शंटिंग नेक उपलब्ध हैं। यहां दो अतिरिक्त प्लेटफार्म निर्माण का कार्य प्रगति पर हैं। यहां एक कोचिंग मेंटेनेंस डिपो बनाया जा रहा है, जिसकी अनुमानित लागत 259 करोड़ रुपए है। 5 नई पिट लाइनें, 7 स्टेबलिंग लाइनें और सिक कोच लाइनें निर्मित होंगी। इससे प्रतिदिन 15 प्राइमरी मेंटेनेंस ट्रेनों की देखरेख संभव होगी। यह सैटेलाइट टर्मिनल के रूप में विकसित होगा। इसके साथ ही लक्ष्मी बाई नगर रेलवे स्टेशन का पुनर्विकास कार्य भी किया जा रहा, जिसके अंतर्गत अत्याधुनिक यात्री सुविधाओं के साथ नया स्टेशन भवन, नए प्लेटफार्म, कवर शेड, फुट ओवर ब्रिज, लिफ्ट/एस्केलेटर आदि लगाने के कार्य किया जाना है। जल्द ही नई लाइनें भी डाली जाएंगी उज्जैन सिंहस्थ का यात्री दबाव इंदौर पर भी रहेगा। स्टेशन निर्माण के साथ नई लाइनें डाली जाएंगी ताकि नई ट्रेनें भी चलाई जा सके। इस कार्य से आने वाले समय में यात्रियों और नई ट्रेनों के संचालन में काफी फायदा मिल सकेगा। – शंकर लालवानी, सांसद डॉ. अंबेडकर नगर (महू): 2 नई पिट लाइन बनेगी वर्तमान में यहां 4 प्लेटफार्म एवं 3 पिट लाइन उपलब्ध हैं, किंतु प्लेटफार्म की लंबाई, ओएचई एवं प्लेटफार्म कनेक्टिविटी का कार्य प्रगति पर है। इसके बाद यह स्टेशन अधिक गाड़ियों के संचालन के लिए सक्षम हो जाएगा। वर्तमान में इस स्टेशन से 15 जोड़ी नियमित एवं 2 जोड़ी स्पेशल ट्रेनों का संचालन किया जा रहा है। इस स्टेशन को समेकित कोचिंग डिपो के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसके पहले चरण में 2 नई पिट लाइनों का कार्य जो लगभग 94 करोड़ की लागत से किया जाएगा। इससे 6 ट्रेनों की मेंटेनेंस क्षमता बढ़ेगी। उज्जैन जंक्शन: 9 स्टेबलिंग लाइन बनेगी उज्जैन धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र है, वहां आगामी सिंहस्थ 2028 को देखते हुए 9 नई स्टेबलिंग/होल्डिंग लाइनों की योजना बनाई गई है। इससे लगभग 11 प्लेटफॉर्म रिटर्न ट्रेनों को खड़ा करने और टर्मिनेट करने की क्षमता विकसित होगी।

10 अप्रैल से टोल प्लाजा पर कैश नहीं चलेगा, UPI पेमेंट पर 1.25 गुना अधिक चार्ज

नई दिल्ली देश के टोल प्लाजा पर होने वाले पेमेंट सिस्टम में नए बदलाव होने जा रहे हैं। दरअसल, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने बताया कि 10 अप्रैल से नेशनल हाईवे पर यात्रियों के लिए टोल प्लाजा पर कैश पेमेंट बंद कर दिया जाएगा। एक गजट नोटिफिकेशन में मंत्रालय ने कहा है कि जिन मामलों में कोई गाड़ी बिना वैलिड FASTag के किसी फीस प्लाजा में घुसती है, तो यूजर फिर भी यूनफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) के जरिए पेमेंट कर सकते हैं, लेकिन उन्हें लागू टोल फीस से 1.25 गुना ज्यादा चार्ज देना होगा। यानी जिस टोल पर 100 रुपए लगते हैं, वहां UPI करने पर 125 रुपए देने होंगे। NHAI के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि इस कदम का मकसद टोल गेट पर लगने वाली लंबी कतारों को कम करना और यात्रियों के लिए हाईवे पर सफर को ज्यादा आसान बनाना है। अधिकारी ने कहा कि 10 अप्रैल से टोल बूथ पर कैश पेमेंट स्वीकार नहीं किया जाएगा। टोल कलेक्शन का मुख्य तरीका FASTag ही रहेगा, जबकि UPI उन गाड़ियों के लिए पेमेंट का दूसरा ऑप्शन होगा, जो बिना वैलिड FASTag के आती हैं। या फिर किसी अन्य वजह से FASTag से पेमेंट नहीं होता। MoRTH के नोटिफिकेशन के मुताबिक, "अगर किसी गाड़ी का यूजर बिना FASTag या बिना किसी वैलिड और काम कर रहे FASTag के (जैसा भी मामला हो) किसी फीस प्लाजा से गुजरता है और UPI के जरिए फीस देने का विकल्प चुनता है, तो उसे नियम 4 के उप-नियम (2) के प्रावधानों के मुताबिक, उस कैटेगरी की गाड़ी पर लागू यूजर फीस का 1.25 गुना पेमेंट करना होगा। यदि गाड़ी का मालिक या ड्राइवर इस नियम के तहत बताए गए तरीके से फीस देने का ऑप्शन नहीं चुनता है, तो ऐसी गाड़ी के साथ नियम 14 के मुताबिक कार्रवाई की जाएगी।" FASTag एनुअल पास भी महंगा हुआ नेशनल हाईवे के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने FASTag एनुअल पास को भी महंगा कर दिया है। फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए इस पास की कीमत बढ़ाकर 3,075 रुपए कर दी गई है। यह बदलाव 1 अप्रैल, 2026 से लागू हो चुका है। पहले इस पास की कीमत 3,000 रुपए थी। इस पास को 6 महीने के अंदर 50 लाख से ज्यादा यूजर्स ने एक्टिव कराया था। इस दौरान 26.55 करोड़ से ज्यादा ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड किए गए हैं। NHAI ने बताया था कि नेशनल हाईवे (NH) नेटवर्क पर होने वाले कुल कार ट्रांजैक्शन में से लगभग 28% अब FASTag एनुअल पास के जरिए किए जा रहे हैं, जो नेशनल हाईवे यूजर्स के बीच FASTag एनुअल पास की बढ़ती पसंद को दिखाता है। FASTag एनुअल पास क्या है? सबसे पहले समझते हैं कि FASTag एनुअल पास क्या है? तो ये सालाना टोल पास एक तरह की प्रीपेड टोल स्कीम है, जिसे खास तौर से कार, जीप और वैन जैसे नॉन-कमर्शियल प्राइवेट व्हीकल के लिए तैयार किया गया है। नए पास की घोषणा करते समय नितिन गडकरी ने कहा था कि इसका उद्देश्य 60 किलोमीटर के दायरे में स्थित टोल प्लाजा से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही चिंताओं को दूर करना और सिंगल, अफॉर्जेबल लेनदेन के माध्यम से टोल भुगतान को सरल बनाना है। टोल प्लाजा पर वेटिंग टाइम को कम करके, भीड़भाड़ को कम करके और विवादों को कम करके, वार्षिक पास का उद्देश्य लाखों प्राइवेट व्हीकल ओनर्स के लिए एक फास्ट और आसान यात्रा का अनुभव देना है। खास बात ये है कि इसके लिए लोगों को नया टैग खरीदने के की जरूरत नहीं है, बल्कि ये आपके मौजूदा FASTag से जुड़ जाएगा। इसकी कंडीशन ये है कि आपका मौदूजा FASTag एक्टिव होना चाहिए और आपके व्हीकल रजिस्ट्रेशन नंबर से जुड़ा हो। यह योजना केवल NHAI और सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर लागू होगा। इसके लिए बार-बार ऑनलाइन रिचार्ज करने की आवश्यकता नहीं है, जिससे यह डेली पैसेंजर्स के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। यह पास नॉन-ट्रांसफरेबल है। इसे सिर्फ रजिस्टर्ड व्हीक के साथ ही इस्तेमला कर पाएंगे। FASTag एनुअल पास कहां काम करेगा? FASTag एनुअल पास केवल NHAI द्वारा ऑपरेटेड राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) और राष्ट्रीय एक्सप्रेसवे (NE) पर स्थित टोल प्लाजा पर ही काम करता है। जैसे, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, मुंबई-नासिक, मुंबई-सूरत और मुंबई-रत्नागिरी मार्ग आदि। राज्य राजमार्गों या नगरपालिका टोल सड़कों पर आपका FASTag सामान्य रूप से काम करेगा और टोल सामान्य रूप से वसूला जाएगा। जैसे, मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे, मुंबई-नागपुर एक्सप्रेसवे (समृद्धि महामार्ग), अटल सेतु, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, बेंगलुरु-मैसूर एक्सप्रेसवे और अहमदाबाद-वडोदरा एक्सप्रेसवे। ये सभी राज्य प्राधिकरणों द्वारा संचालित होते हैं। ऐसे एक्टिवेट करें फास्टैग एनुअल पास FASTag एनुअल पास एक्टिवेट करने को लेकर इंडियन हाईवे मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड (IHMCL) की तरफ एक नोटिफिकेशस जारी किया गया है। IHMCL ने नोटिफिकेशन में इस एनुअल पास से जुड़े सभी सवालों के जवाब दिए गए हैं। साथ ही, फास्टैग के एनुअल पास को एक्टिवेट करने का तरीका भी बताया है। IHMCL के मुताबिक, FASTag एनुअल पास को सिर्फ Rajmargyatra (राज मार्ग यात्रा) मोबाइल ऐप और NHAI पोर्टल पर जाकर ही एक्टिवेट किया जा सकेगा। इस पास को एक्टिवेट करने के लिए कार चालक को पहले अपने व्हीकल और उसके ऊपर लगे FASTag की एलिजिबिलिटी को वेरिफाई करना होगा। एक बार वेरिफिकेशन्स कंप्लीट होने के बाद 3,075 रुपए का पमेंट करना होगा। यूजर द्वारा किया गया 3,075 रुपए की पेमेंट कंफर्मेशन होने के बाद 2 घंटे के अंदर FASTag एनुअल पास एक्टिवेट हो जाएगा। यह एक्टिवेशन आपके मौजूदा फास्टैग पर ही होगा। FASTag एनुअल पास के लिए आपको न्यू फास्टैग खरीदने की जरूरत नहीं है। फास्टैग एनुअल पास पर पेमेंट करने से अगले 1 साल तक या फिर 200 टोल पार करने तक की वैलिडिटी मिलेगी।  

40 लाख आवारा पशुओं को मिलेगा 12 अंकों का कोड, मध्य प्रदेश में केसरिया टैग से होगी पहचान

भोपाल मध्य प्रदेश की सड़कों और खेतों में घूम रहे करीब 40 लाख आवारा पशुओं की पहचान अब दूर से ही हो सकेगी। केंद्र सरकार ने राज्य के उस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है, जिसके तहत आवारा मवेशियों के कान पर 12 अंकों वाला केसरिया या लाल रंग का पहचान टैग लगाया जाएगा। अब तक सभी पशुओं को पीले रंग के टैग लगाए जाते थे, जिससे पालतू और लावारिस पशुओं के बीच फर्क करना मुश्किल होता था। पहचान का नया डिजिटल फॉर्मूला अपर मुख्य सचिव (पशुपालन) उमाकांत उमराव के मुताबिक, अधिकारियों को फील्ड में मवेशियों के प्रबंधन में काफी दिक्कतें आ रही थीं। नए रंगों के कोड से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाले दस्ते बिना स्कैन किए यह समझ पाएंगे कि कौन सा पशु आवारा है और कौन सा किसी डेयरी या घर का है। यह पूरी कवायद भारत पशुधन परियोजना का हिस्सा है, जिसमें हर मवेशी का अपना एक डिजिटल डेटाबेस होगा। हादसों और मुआवजे का गणित राज्य विधानसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि आवारा मवेशी अब जानलेवा साबित हो रहे हैं। पिछले दो साल में पशुओं की वजह से हुए 237 सड़क हादसों में 94 लोगों की मौत हो चुकी है। यानी हर तीसरे दिन सड़क पर एक व्यक्ति अपनी जान गंवा रहा है। किसानों की दोहरी मार एक तरफ सड़कों पर हादसे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ खरीफ सीजन में किसान पूरी रात खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल आवारा पशुओं द्वारा फसल बर्बादी पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने सदन में बताया कि विभाग के पास नुकसान का सटीक आंकड़ा फिलहाल मौजूद नहीं है। मौजूदा व्यवस्था में पीले टैग की वजह से पालतू और आवारा पशुओं के बीच अंतर करना कठिन था। हमने रंगों में बदलाव का प्रस्ताव दिया था जिसे केंद्र ने स्वीकार कर लिया है। अब केसरिया या लाल टैग से प्रबंधन तेज़ और सटीक होगा। अभी लगाए जाते हैं पीले टैग पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव उमाकांत उमराव ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में सभी मवेशियों को पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं, जिससे यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा पशु किसी किसान का है और कौन सा आवारा है. उमराव ने कहा, "अभी सभी मवेशियों पर पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कौन सा पशु पालतू है और कौन आवारा. इसलिए राज्य सरकार ने आवारा मवेशियों के लिए केसरिया या लाल जैसे अलग रंग के टैग का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था।  इस योजना के तहत गोशालाओं में रहने वाले या सड़कों पर घूमने वाले हर आवारा या परित्यक्त पशु को भारत पशुधन परियोजना के तहत 12 अंकों का एक विशिष्ट पहचान टैग दिया जाएगा. यह परियोजना राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश के पशुधन का डिजिटल डाटाबेस तैयार करना है।  स्कैन से तुरंत पता चलेगा पशु के बारे में अधिकारियों के अनुसार, रंग-कोड वाले टैग से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाली टीमों को बिना स्कैन किए ही तुरंत यह पता चल सकेगा कि पशु आवारा है या पालतू. इससे मवेशियों के प्रबंधन की प्रक्रिया और तेज और प्रभावी होने की उम्मीद है।  कानून क्या कहता है? मध्य प्रदेश में मवेशियों को लावारिस छोड़ना गौ-वध प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत अपराध है। इसके अलावा नगर निगम कानून के तहत मालिक पर पहली बार 200 रुपये और तीसरी बार पकड़े जाने पर 1,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना के तहत एनजीओ के माध्यम से लाखों पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है, लेकिन सड़कों पर संख्या अब भी चुनौती बनी हुई है। किसान लगातार कर रहे हैं शिकायत दूसरी ओर कई जिलों के किसान लगातार शिकायत कर रहे हैं कि आवारा मवेशी उनकी खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, खासकर खरीफ के मौसम में. कई किसानों को रात-रात भर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है।  फसलों को हो रहे नुकसान के बावजूद सरकार ने यह स्वीकार किया है कि फिलहाल किसानों को ऐसी क्षति के लिए कोई मुआवजा देने की व्यवस्था नहीं है. शीतकालीन सत्र के दौरान पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने विधानसभा में बताया था कि विभाग आवारा मवेशियों से होने वाले फसल नुकसान का अलग से कोई आंकड़ा नहीं रखता और इसके लिए वित्तीय सहायता देने का कोई प्रस्ताव भी विचाराधीन नहीं है।  पिछले साल पकड़े गए इतने आवारा पशु समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2025 में ही प्रदेश में 78,153 आवारा मवेशियों को पकड़ा गया. अपने पशु वापस लेने वाले मालिकों से कुल 25.58 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया।  मवेशियों को छोड़ देना गोहत्या प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत दंडनीय अपराध है. वहीं, नगर निगम अधिनियम 1956 में संशोधन के बाद ऐसे मामलों में पहली बार 200 रुपये, दूसरी बार 500 रुपये और तीसरी बार 1000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. साथ ही पशु को हिरासत में रखने के दौरान मालिक को प्रतिदिन 150 रुपये चारे के खर्च के रूप में भी देना होता है।  राज्य की गोशाला में बढ़ रहा दवाब इधर, राज्य की गोशाला व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है. मुख्यमंत्री गौसेवा योजना के तहत एनजीओ और स्थानीय निकायों के साथ मिलकर प्रदेश की पंजीकृत गोशालाओं में फिलहाल करीब 4.5 लाख मवेशी रखे गए हैं. इनके रखरखाव के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2025-26 के बजट में 296.20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।  क्या ह रहे अधिकारी अधिकारियों का कहना है कि इस समस्या की जड़ मवेशियों की कम उत्पादकता भी है. पशुधन गणना के अनुसार प्रदेश में लगभग 70 प्रतिशत गायें कम दूध देने वाली नॉन-डिस्क्रिप्ट नस्ल की हैं, जिनमें से कई आधा लीटर से भी कम दूध देती हैं. जब ऐसे पशु दूध देना बंद कर देते हैं तो कई बार उन्हें छोड़ दिया जाता है और वे सड़कों या खेतों में भटकते हुए दिखाई देते हैं।  इसी समस्या को कम करने के लिए राज्य सरकार क्षीरधारा ग्राम योजना के तहत नस्ल सुधार कार्यक्रम चला रही है. इसके … Read more

धार भोजशाला केस: हिंदू पक्ष ने पेश किए मंदिर होने के सबूत, हवन कुंड और मूर्तियों का किया जिक्र

 धार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में धार की विवादित भोजशाला को लेकर नियमित सुनवाई शुरू हुई. जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच के सामने हिंदू पक्ष ने कड़ा तर्क दिया कि यह स्मारक कभी मस्जिद था ही नहीं, बल्कि यह राजा भोज द्वारा निर्मित वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है।  'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी, ''ASI की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट साफ बताती है कि वर्तमान ढांचा मंदिर के अवशेषों और स्तंभों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया है।  परिसर में आज भी संस्कृत श्लोकों वाले शिलालेख, हवन कुंड, मंडप और हिंदू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां मौजूद हैं. यह ढांचा 1034 ईस्वी में परमार राजा भोज ने बनाया था. आक्रमणकारियों ने प्रतीकों को मिटाने के बावजूद मूल चरित्र आज भी जीवंत है।  ASI के नियमों के अनुसार, किसी भी संरक्षित स्मारक का मूल धार्मिक स्वरूप बदला नहीं जा सकता, इसलिए यहां सिर्फ हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।  मुस्लिम पक्ष का विरोध और आपत्तियां तकरीबन 2 घंटे तक चली सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे एक वकील ने अनुरोध किया कि हिंदू समुदाय की याचिका के समर्थन में पेश किए गए सभी दस्तावेजों की प्रतियां उन्हें भी उपलब्ध कराई जाएं। हाई कोर्ट ने इस अनुरोध को मंजूर करते हुए मौखिक रूप से कहा कि दलीलें पूरी होने के बाद, इस मामले से जुड़े सभी पक्ष अपनी आपत्तियां पेश कर सकते हैं, जिन पर कोर्ट विचार करेगा. डिवीजन बेंच ने कहा कि वह मंगलवार को भी इस मामले की सुनवाई जारी रखेगी।  क्या कहती है ASI की रिपोर्ट? बता दें कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद ASI ने दो साल पहले विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था और एक रिपोर्ट पेश की थी. 2000 से ज्यादा पन्नों की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मस्जिद से पहले, धार के परमार राजाओं के शासनकाल का एक विशाल ढांचा वहां मौजूद था और मौजूदा विवादित ढांचा मंदिर के ही हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया था।  यह ध्यान देने लायक बात है कि परमार राजाओं ने 9वीं सदी से लेकर 400 सालों तक मध्य-पश्चिमी भारत के मालवा के आस-पास के एक बड़े इलाके पर राज किया था।  मुस्लिम पक्ष का विरोध और आपत्तियां मुस्लिम पक्ष ने ASI के सर्वेक्षण पर सवाल उठाए हैं और हिंदू पक्ष के इस दावे को खारिज कर दिया है कि भोजशाला परिसर असल में एक मंदिर था।  इसके अलावा, मुस्लिम पक्ष का आरोप है कि ASI ने उनकी पिछली आपत्तियों को नजरअंदाज किया और सर्वेक्षण में विवादित परिसर के अंदर 'चोर दरवाजजे से रखी गई चीजों' को भी शामिल कर लिया।  ASI के 7 अप्रैल 2003 के आदेश के मुताबिक, हिंदुओं को हर मंगलवार को इस परिसर में पूजा करने की इजाजत है, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति है। 

ग्वालियर-आगरा का सफर होगा महज 50 मिनट में, केंद्रीय मंत्री ने हाईस्पीड कॉरिडोर से आर्थिक विकास का दिया भरोसा

ग्वालियर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर-आगरा एक्सप्रेस-वे निर्माण कार्य का निरीक्षण करते हुए बड़ा दावा किया कि इस हाईस्पीड कॉरिडोर के बनते ही ग्वालियर से आगरा की दूरी महज 45 से 50 मिनट में सिमट जाएगी। करीब 5500 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा यह 6 लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास को नई गति देगा। निरीक्षण के दौरान जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट और ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर भी मौजूद रहे। यातायात तेज और सुरक्षित सिंधिया ने कहा कि देश में तेजी से विकसित हो रहा आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर आर्थिक प्रगति की मजबूत आधारशिला बन रहा है। उन्होंने कहा, ग्वालियर-आगरा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे (MP News Gwalior Agra high Speed Corridor) वर्तमान मार्ग से करीब 32 किलोमीटर छोटा होगा और कुल दूरी लगभग 88 किलोमीटर रह जाएगी। मौजूदा 2 लेन सडक़ को अपग्रेड कर 6 लेन हाईस्पीड कॉरिडोर बनाया जा रहा है, जहां न्यूनतम गति 100 किमी प्रति घंटा निर्धारित की गई है। कॉरिडोर में सीमित एंट्री-एग्जिट के साथ कुल 4 इंटरचेंज बनाए जाएंगे, जिससे यातायात तेज और सुरक्षित रहेगा। सिंधिया ने कहा कि अब दो-लेन सड़क को अपग्रेड करके छह-लेन हाई-स्पीड कॉरिडोर बनाया जाएगा, जिसमें न्यूनतम गति 100 किमी/घंटा होगी. आगरा से ग्वालियर का सफर अभी 2.5-3 घंटे में पूरा होता है, लेकिन एक्सप्रेस-वे बनने के बाद सिर्फ 45-50 मिनट में पूरा होगा. केंद्रीय मंत्री ने बताया कि लगभग तीन साल में ये एक्सप्रेस-वे जनता के लिए खोल दिया जाएगा।  आधुनिक सुविधाओं वाला होगा नया एक्सप्रेस-वे सिंधिया ने कहा कि नया एक्सप्रेस-वे पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं वाला बन रहा है. इसमें सिर्फ चार मुख्य एंट्री-एक्जिट पॉइंट होंगे, जिससे ट्रैफिक में कोई दिक्कत नहीं आएगी. हाई-स्पीड कॉरिडोर बिना रुकावट चलेगा. लोग तेज और आराम से सफर कर सकेंगे. केंद्रीय मंत्री ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में चंबल नदी पर नया छह-लेन का पुल बनाया जाएगा. यह पुल सबसे आधुनिक तकनीक से बनेगा और डिजाइन में दुनिया के बेहतरीन पुलों जैसा होगा।  उन्होंने कहा कि इसके साथ ही शिवपुरी को जोड़ने के लिए लगभग 28 किलोमीटर लंबा पश्चिमी बाईपास भी डेवलप किया जा रहा है, जिसकी लागत लगभग 1,400 करोड़ रुपये है. इससे दिल्ली, ग्वालियर, शिवपुरी और गुना के बीच यात्रा आसान और तेज होगी।  600 करोड़ रुपये की लागत से नया आधुनिक रेलवे स्टेशन बनेगा केंद्रीय मंत्री ने बताया कि ग्वालियर-आगरा एक्सप्रेस-वे और पश्चिमी बाईपास मिलाकर लगभग 7,000 करोड़ की परियोजनाएं क्षेत्र को मिली हैं. इसके अलावा ग्वालियर में 600 करोड़ रुपये की लागत से नया आधुनिक रेलवे स्टेशन भी बन रहा है. उन्होंने कहा कि इन प्रोजेक्ट्स से पूरे ग्वालियर-चंबल इलाके का कायाकल्प होगा और यहां निवेश, रोजगार और व्यापार के नए मौके लोगों को मिलेंगे।  आधुनिक तकनीक से तैयार होगा 6 लेन का विश्वस्तरीय ब्रिज उन्होंने कहा, परियोजना के तहत चंबल नदी पर आधुनिक तकनीक से 6 लेन का विश्वस्तरीय ब्रिज बनाया जाएगा। साथ ही शिवपुरी को जोडऩे के लिए लगभग 28 किलोमीटर लंबा पश्चिमी बायपास विकसित किया जा रहा है, जिसकी लागत करीब 1400 करोड़ रुपए है। इससे दिल्ली, ग्वालियर, शिवपुरी और गुना के बीच आवागमन और अधिक सुगम होगा। 7000 करोड़ के प्रोजेक्ट से बदलेगी तस्वीर सिंधिया ने कहा, हाईस्पीड कॉरिडोर (MP News Gwalior Agra high Speed Corridor) और पश्चिमी बायपास को मिलाकर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र को करीब 7000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट मिले हैं। इसके अलावा ग्वालियर में 600 करोड़ रुपए की लागत से आधुनिक रेलवे स्टेशन का निर्माण भी जारी है। इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने पर क्षेत्र में निवेश, व्यापार और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।  

अलादीन का चिराग मिला भारत को! 50 अरब का प्रोजेक्ट 90 करोड़ में, 700 साल तक होगा चकाचक

बेंगलुरु  ईरान जंग की वजह से पूरी दुनिया में बेचैनी है. कच्चे तेल के दाम बढ़ने से हर तरफ महंगाई बढ़ रही है. अमेरिका से लेकर नेपाल तक हर मुल्क की जनता परेशान है. भारत भी इस जंग के असर से अछूता नहीं है. लेकिन, इस भारत के हाथ अलादीन का चिराग लग गया है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा की है. अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस अलादीन के चिराग के दम पर भविष्य में भारत एक जगमगाता सितारा बन जाएगा. भारत को अरब देशों या रूस से तेल पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।  दरअसल, हम बात कर रहे हैं फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर की. कल्पक्कम में सोमवार को भारत ने इस टेक्नोलॉजी को हासिल करने की आधिकारिक घोषणा कर दी. फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर एक बेहद जटिल टेक्नोलॉजी है. पश्चिमी देश इस तकनीक को हासिल करने में नाकाम रहे हैं. इस तकनीक वाले न्यूक्लियर रिएक्टर में यूरेनियम की जगह थोरियम का इस्तेमाल किया जाता है. और दुनिया के थोरियम भंडार का 25 फीसदी हिस्सा भारत में है. यानी इस तकनीक की बदौलत परमाणु बिजली के क्षेत्र में भारत की यूरेनियम पर निर्भरता खत्म हो जाएगी. भारत में यूरेनियम भंडार बहुत नगण्य है. इसके लिए भारत को रूस और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर रहना पड़ता है।  फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर और भारत का सफर भारत ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर की कल्पना 70 साल पहले की थी. जानेमाने वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने इस दिशा में काम शुरू किया था. तब से भारत इस तकनीक को हासिल करने में लगा था. दरअसल, दुनिया के सबसे अमीर छह देशों ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर्स तकनीक हासिल करने पर 50 बिलियन डॉलर (लगभग 4.25 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुके हैं. लेकिन, असफलता के कारण एक-एक करके सभी ने प्रोजेक्ट छोड़ दिए. इस तकनीक को विकसित करने के लिए अमेरिका ने 15 बिलियन, जापान ने 12 बिलियन, ब्रिटेन ने 8 बिलियन, जर्मनी ने 6 बिलियन डॉलर खर्च कर दिए. फ्रांस और इटली भी भाग खड़े हुए. सबने कहा कि यह तकनीक हासिल करना बहुत मुश्किल और बहुत महंगा है।  लेकिन, भारत ने सिर्फ 90 करोड़ डॉलर (लगभग 7,700 करोड़ रुपये) में अपना पहला कमर्शियली वायबल प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित कर लिया. ऐसा करने वाला भारत, रूस और चीन के बाद तीसरा देश है. वर्ष 2004 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ प्रोजेक्ट था. शुरुआती बजट 42 करोड़ डॉलर का था. अब 22 साल बाद दर्जनों बार डेडलाइन खत्म होने और लागत दोगुनी होने के बाद भारत के हाथ सफलता लगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे सिविल न्यूक्लियर के सफर में एक अहम कदम बताया है।  भारत क्यों नहीं छोड़ा ये प्रोजेक्ट? कारण बहुत सीधा है. भारत के पास दुनिया के यूरेनियम रिजर्व का सिर्फ 1-2 फीसदी भंडार है. ऐसे में 1.4 अरब लोगों वाले देश के लिए पारंपरिक न्यूक्लियर फ्यूल पर निर्भर रहना खुदकुशी करने जैसा है. दूसरी तरफ भारत के पास दुनिया के थोरियम रिजर्व का 25 फीसदी हिस्सा है. पृथ्वी पर किसी भी एक देश के पास इतना बड़ा भंडार नहीं है. परमाणु ऊर्जा विभाग के अनुसार, भारत में करीब एक करोड़ टन मोनाजाइट है, जिसमें 9,63,000 टन थोरियम ऑक्साइड भरा हुआ है. समस्या यह है कि थोरियम को यूरेनियम की तरह सीधे नहीं जलाया जा सकता. 1950 के दशक में डॉ. होमी भाभा ने इसी समस्या का हल निकाला. उन्होंने तीन चरणों वाला न्यूक्लियर प्रोग्राम बनाया।      पहला चरण: नेचुरल यूरेनियम को हेवी वाटर रिएक्टर्स में जलाओ, बाईप्रोडक्ट में प्लूटोनियम इकट्ठा करो।      दूसरा चरण: उस प्लूटोनियम को फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में डालो. यहां रिएक्टर न सिर्फ ज्यादा प्लूटोनियम पैदा करेगा, बल्कि थोरियम को फिसाइल यूरेनियम-233 में बदल देगा।      तीसरा चरण: थोरियम को बड़े पैमाने पर जलाओ।  कल्पक्कम का फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर भारत को स्टेज-2 में ले आया है. भाभा के कागज पर बने प्लान के 70 साल बाद यह उपलब्धि हासिल हुई है।  थोरियम का गणित वर्तमान ऊर्जा खपत की दर से भारत के थोरियम रिजर्व देश को 700 साल से ज्यादा बिजली दे सकते हैं. जबकि ज्यादातर न्यूक्लियर देश यूरेनियम पर खेल रहे हैं, जिनके पास सिर्फ 80-100 साल का ईंधन बचा है. भारत पूरी तरह अलग गेम खेल रहा है. पश्चिमी देश इसलिए भागे क्योंकि यूरेनियम सस्ता मिलता रहा और सोडियम कूलेंट बहुत खतरनाक है. यह हवा के संपर्क में आते ही आग पकड़ लेता है और पानी के संपर्क में आते ही विस्फोट कर देता है. रूस के BN-600 में 1980-1997 के बीच 27 सोडियम लीक और 14 आग की घटनाएं घटीं. फिर भी रूस ने इसे नहीं छोड़ा. भारत ने सब देखा और आगे बढ़ता रहा. जब आपके पास यूरेनियम सिर्फ एक फीसदी हो और थोरियम 25 फीसदी तब इंजीनियरिंग की मुश्किलों का बहाना नहीं बना सकते है. यही बात भारत पर लागू होती है. इस प्रयोग में भारत को 700 साल की ऊर्जा सुरक्षा दिख रही है।  चीन कहां है? चीन भी थोरियम पर काम कर रहा है. उसने गोबी डेजर्ट में दो मेगावाट थोरियम मॉल्टन सॉल्ट रिएक्टर (TMSR-LF1) लगाया है. उसने 2023 में यह सफलता हासिल की. 2024 में थोरियम फ्यूल लोड किया और 2025 में थोरियम से यूरेनियम-233 ब्रिडिंग की सफलता हासिल की. चीन का लक्ष्य 2035 तक 100 मेगावाट डेमो रिएक्टर और 2040 तक कमर्शियल थोरियम रिएक्टर बनाने की है. लेकिन चीन अभी प्रयोगात्मक स्तर पर है, जबकि भारत ने 500 मेगावाट प्रोटोटाइप को विकसित कर लिया है. अगर चीन की तकनीक आगे बढ़ी तो भारत को फायदा होगा क्योंकि थोरियम की तकनीक में हम पहले से मजबूत हैं. लेकिन फिलहाल भारत ने स्टेज-2 में कदम रखकर दुनिया को दिखा दिया कि हम थोरियम के असली गेम प्लेयर हैं।  आगे क्या?  

अभियान” जनभागीदारी से आकार ले रहीं संरचनायें पेश कर रही हैं जल संरक्षण की नई मिसाल

भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर संचालित “जल गंगा संवर्धन अभियान” ग्वालियर–चंबल संभाग में जन-आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। इस अभियान के तहत जहां एक ओर वर्षों पुरानी जल संरचनाओं को पुनर्जीवित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर नई जल संरचनाओं का निर्माण कर जल संरक्षण की दिशा में ठोस कार्य किए जा रहे हैं। जनभागीदारी, श्रमदान और जागरूकता के माध्यम से यह अभियान जल संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन संवर्धन का भी माध्यम बन रहा है। ग्वालियर में ऐतिहासिक बावड़ियां बनीं जल संरक्षण का केंद्र ग्वालियर शहर में स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत तीन ऐतिहासिक बावड़ियों का पुनर्जीवन किया गया है। इन बावड़ियों में प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख लीटर पानी सहेजने की क्षमता विकसित की गई है। सुरक्षा के लिए लोहे के जाल लगाए गए हैं तथा आरओ प्लांट की व्यवस्था भी की गई है, जिससे नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो सकेगा। ग्वालियर दुर्ग स्थित प्राचीन सूरज कुण्ड को स्वच्छ एवं आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है। साथ ही जलालपुर कुण्ड और केआरजी कॉलेज की बावड़ी की साफ-सफाई भी कराई जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अभियान ने गति पकड़ी है। जिले में कुल 2300 जल संरचनाओं के निर्माण का लक्ष्य है, जिनसे लगभग 31.50 लाख घन मीटर जल संरक्षित होगा। अब तक 71 खेत तालाब और 249 कुओं के रिचार्ज कार्य पूर्ण हो चुके हैं। शिवपुरी में 587 ग्राम पंचायतों में जनसहभागिता से कार्य शिवपुरी जिले की सभी ग्राम पंचायतों में तालाबों की सफाई, गहरीकरण, गाद निकासी और पेयजल व्यवस्था जैसे कार्य जनसहयोग से किए जा रहे हैं। विभिन्न ग्राम पंचायतों में अभियान की शुरुआत के साथ ही ग्रामीण स्तर पर जल संरक्षण के प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ी है। गुना में खेत तालाब और रिचार्ज कार्यों में उल्लेखनीय प्रगति गुना जिले में 1547 खेत तालाबों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है, जिनमें से 547 पूर्ण हो चुके हैं। डगवेल रिचार्ज के 2206 कार्यों में से 1889 कार्य पूरे किए जा चुके हैं। इसके अलावा 1007 नई जल संरचनाएं बनाई जा रही हैं, जिनमें से 193 पूर्ण हो चुकी हैं। जिले में 57 सार्वजनिक प्याऊ भी शुरू की गई हैं। अशोकनगर में श्रमदान से दिया जल संरक्षण का संदेश अशोकनगर जिले में प्राचीन बावड़ियों, तालाबों और धार्मिक स्थलों पर श्रमदान कर जल संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है। तुलसी सरोवर सहित कई जल स्रोतों का सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। गांव-गांव में कलश यात्रा, पूजन और श्रमदान के माध्यम से जनजागरण किया जा रहा है। दतिया में सीवरेज प्रबंधन से तालाब संरक्षण दतिया जिले में सीतासागर तालाब में गंदे पानी के प्रवाह को रोकने के लिए नालों को सीवर पंपिंग स्टेशन से जोड़ा गया है। अब यह पानी एसटीपी प्लांट में शोधन के बाद पुनः उपयोग में लाया जा रहा है। आंगनबाड़ियों में रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग मॉडल भी विकसित किए गए हैं। मुरैना और भिण्ड में लक्ष्य आधारित कार्यों की तेज प्रगति मुरैना जिले में 1000 खेत तालाब निर्माण का लक्ष्य है, जिनमें से 200 पूर्ण हो चुके हैं। साथ ही 2382 अन्य जल संरचनाओं में से 250 कार्य पूरे किए जा चुके हैं। भिण्ड जिले में गौरी सरोवर सहित कई ऐतिहासिक जल स्रोतों की सफाई, गाद हटाने और संरक्षण का कार्य जनभागीदारी से किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब गहरीकरण और जल संरक्षण के प्रयास तेज हुए हैं। श्योपुर में भी गांव-गांव जल संरचनाओं का निर्माण श्योपुर जिले में भी जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत जल संरचनाओं का तेजी से निर्माण हो रहा है, जिसमें जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिल रही है। जल चौपाल और प्याऊ से बढ़ी जनभागीदारी अभियान के तहत जल चौपाल आयोजित कर लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा रहा है। साथ ही गर्मी के मौसम में राहगीरों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए जगह-जगह सार्वजनिक प्याऊ स्थापित किये गये हैं। जल संरक्षण से जुड़ रहा जन-जन, बन रहा सतत विकास का आधार “जल गंगा संवर्धन अभियान” केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक बन चुका है। जल स्रोतों के संरक्षण, पुनर्जीवन और विकास के इन प्रयासों से न केवल जल संकट का समाधान संभव होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सतत जल उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी। 

5 किलो LPG सिलेंडरों का कोटा दोगुना, मजदूरों और गरीबों को मिलेगा राहत

नई दिल्ली देशभर में एलपीजी गैस सिलेंडर की किल्लत के बीच सरकार ने प्रवासी मजदूरों को बड़ी राहत दी है। सरकार ने अपना गांव छोड़कर शहरों में जाकर कमाई करने वाले मजदूरों के लिए 5 किलो वाले एलपीजी सिलिंडर का कोटा डबल कर दिया है। सरकार ने कहा है कि रोजाना सप्लाई किए जाने वाले 5 किलो के सिलेंडरों की संख्या अब दोगुनी कर दी जाएगी। 2-3 मार्च 2026 को मजदूरों के लिए जितने सिलेंडर एक दिन में सप्लाई करने का लक्ष्य रखा गया था, अब उससे दोगुना सिलेंडर भेजे जाएंगे। बिना कनेक्शन मिलता है छोटू सिलेंडर बता दें कि इन सिलिंडरों को एफटीएल गैस सिलिंडर भी कहा जाता है। सराकर अब दोगुनी संख्या में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन सिलिंडरों की सप्लाई करेगी। आम तौर पर यह सिलिंडर प्रवासी मजदूरों या फिर छात्रों के लिए ही बना है। दरअसल परमानेंट अड्रेस ना होने की वजह से लोगों को स्थायी गैस कनेक्शन मिलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कोई भी एक पहचान पत्र दिखाकर छोटू सिलेंडर लिया जा सकता है। मजदूरों को बड़ी राहत एक दिन पहले ही कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने मोदी सरकार को घेरते हुए कहा था कि सबसे बड़ा वार मजदूरों और गरीबों पर ही किया जाता है। कोविड की तरह एक बार फिर मजदूरो को गांव की ओर चलने का वक्त आ गया है। हालांकि सरकार ने यह फैसला लेकर मजदूर क्लास को बड़ी राहत दी है। यह नया कोटा पहले से तय 20 फीसदी के कोटे के अतिरिक्त होगा। ब्लैक मार्केटिंग रोकने का प्रयास एलपीजी संकट की खबरें आते ही सिलेंडरो की ब्लैक मार्केटिंग शुरू हो गई थी। ऐसे में सरकार ने एक समय सीमा तय कर दी कि एक कनेक्शन पर उतने दिन से पहले बुकिंग नहीं हो पाएगी। इसका उद्देश्य ब्लैक मार्केटिंग और भीड़ दोनों को नियंत्रित करना था। छोटू सिलेंडर का कोट बढ़ाने का भी उद्देश्य यही है। अब राज्य सरकारों और ऑइल मार्केटिंग कंपनियों को यह सुनिश्चित करना है कि जरूतमंद लोगों तक पर्याप्त सिलेंडर पहुंच जाएं। इंडक्शन चूल्हों को लेकर भी दी गई ढील विद्युत मंत्रालय ने इस साल 01 जुलाई से इंडक्शन चूल्हों के लिए स्टार रेटिंग की व्यवस्था अनिवार्य करने के लिए पिछले साल दिसंबर में अधिसूचना जारी की थी। सोमवार को जारी नयी अधिसूचना में इस तारीख को 01 जनवरी 2027 कर दिया गया है। अधिसूचना में कहा गया है कि ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के परामर्श से स्टार रेटिंग की अनिवार्यता को टालने का फैसला किया गया है और सरकार इस बात से संतुष्ट है कि इसे छह महीने के लिए टाला जा सकता है।