samacharsecretary.com

छत्तीसगढ़ में वायरल फीवर ने बढ़ाई चिंता, बुखार और बदन दर्द के मरीजों की अस्पतालों में भीड़

रायगढ़. जिले में वायरल बुखार ने अपना रूप बदल लिया है और इसके साथ ही शहर से लेकर गांव तक हर घर में लोग इसकी चपेट में हैं. जिला अस्पताल की ओपीडी में हर रोज करीब 100 से अधिक मरीज बुखार, बदन दर्द और कमजोरी की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं. मरीजों की संख्या हर रोज बढ़ती जा रही है. जिस कारण वार्डों में बिस्तर कम पड़ रहे हैं. डॉक्टरों के मुताबिक इस बार वायरस का व्यवहार पहले जैसा नहीं रहा. सामान्य वायरल बुखार जो पहले चार से पांच दिन में अपने आप उतर जाता था, अब दस दिन बीतने के बाद भी मरीजों का पीछा नहीं छोड़ रहा. बुखार बार-बार लौट आता है, शरीर में दर्द लंबे समय तक बना रहता है और मरीज हफ्तों तक कमजोरी से जूझते रहते हैं. यही वजह है कि अस्पताल में भर्ती मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है. इस वायरल के साथ सबसे डरवाना पहलू यह सामने आ रहा है कि कई मरीजों का प्लेटलेट काउंट तेजी से गिर रहा है. सामान्य बुखार में प्लेटलेट पर इतना असर नहीं देखा जाता, लेकिन इस बार मरीजों की रिपोर्ट में यह गिरावट डेंगू जैसे लक्षणों की याद दिला रही है. इससे परिजनों के साथ-साथ अस्पताल प्रशासन की चिंता भी बढ़ गई है, क्योंकि प्लेटलेट कम होने पर मरीज की जान को खतरा बना रहता है. रोजाना बढ़ती मरीजों की संख्या ने जिला अस्पताल के संसाधनों पर सीधा दबाव डाला है. वार्डों में जगह की कमी, जांच के लिए लंबा इंतजार और स्टाफ पर बढ़ते बोझ के कारण कई परिवार निजी क्लीनिकों और झोलाछाप डॉक्टरों की शरण में जाने को मजबूर हो रहे हैं, क्योंकि सरकारी अस्पताल में भीड़ के चलते इलाज में देरी हो रही है. शहर के कई मोहल्लों की स्थिति यह है कि एक ही परिवार में दो-तीन सदस्य एक साथ बुखार की चपेट में हैं. बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर ज्यादा गंभीर देखा जा रहा है, जिससे अभिभावकों में डर का माहौल बना हुआ है. बाजारों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर भी बीमारी की चर्चा आम हो गई है. चिकित्सकों के अनुसार वायरस के म्यूटेट होने के कारण इसकी प्रकृति बदल गई है, जिसके चलते पुराने इलाज के तरीके और दवाइयां उतनी असरदार साबित नहीं हो पा रहीं. यही कारण है कि मरीजों को ठीक होने में सामान्य से कहीं ज्यादा वक्त लग रहा है और कई मामलों में जटिलताएं भी सामने आ रही हैं. जिला अस्पताल रायगढ़ के सिविल सर्जन दिनेश पटेल ने बताया कि वायरल फीवर अपना सायकल पूरा करता है. बुखार के कारण शरीर की इम्युनिटी कमजोर पड़ जाती है, जिससे तबीयत में सुधार होने में सामान्य से ज्यादा समय लग रहा है. वायरस की प्रकृति में बदलाव के कारण भी मरीजों को ठीक होने में लंबा वक्त लग रहा है. लोगों को सलाह है कि बुखार लगातार बना रहे या कमजोरी ज्यादा महसूस हो तो जांच कराने में देर न करें.

बिजली संकट पर इंजीनियरों ने CM भगवंत मान को भेजा SOS, राज्य में उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर

पटियाला  पीएसईबी इंजीनियर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को पत्र लिखा है। एसोसिएशन ने राज्य में थर्मल और सोलर बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने की मांग की है। महासचिव इंजीनियर अजयपाल सिंह अटवाल ने कहा कि पंजाब का बिजली क्षेत्र वित्तीय संकट और बिजली की कमी का सामना कर रहा है। बिजली की बढ़ती कमी से उद्योग, खेती और घरेलू खपतकर्ता प्रभावित हो रहे हैं। तत्काल कदम न उठाने पर आने वाले वर्षों में हालात गंभीर होंगे। पंजाब की अपनी बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ती मांग से बहुत कम है। इससे पावरकाॅम को ऊर्जा विनिमय से महंगी बिजली खरीदनी पड़ रही है। राजपुरा और तलवंडी साबो के निजी थर्मल प्लांट कोयला भंडार बनाए रखने में विफल रहे हैं। इन प्लांटों में कोयले की भारी कमी है। यह सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के नियमों का सीधा उल्लंघन है। निवेश में देरी से महंगी बिजली खरीद पर निर्भरता बढ़ेगी। इंजीनियरों के अनुसार पंजाब सरकार की ओर से सब्सिडी की राशि का भुगतान लंबित है। इसके अलावा कई सरकारी विभागों पर बिजली बिलों का भुगतान नहीं करने के कारण भी पावरकॉम पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है। एसोसिएशन ने दावा किया है कि एआरआर में खर्चों का अनुमान कम रखे जाने के कारण टैरिफ में अनुचित कटौती हुई है। इससे पावरकॉम के राजस्व पर असर पड़ रहा है। इंजीनियरों के मुताबिक मौजूदा वित्त वर्ष में पावरकॉम को करीब 7,800 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे का सामना करना पड़ सकता है। संकट के प्रमुख कारण एसोसिएशन के अनुसार, पंजाब को गैर-सौर और रात की उच्चतम मांग पूरी करने के लिए थर्मल उत्पादन क्षमता तुरंत बढ़ानी होगी। ऐसा न करने पर राज्य हर गर्मी में गंभीर बिजली की कमी के चक्र में फंसा रहेगा। पंजाब बिजली की मांग पूरी करने के लिए राज्य के बाहर से खरीदी गई बिजली और निजी उत्पादकों पर तेजी से निर्भर हो रहा है। इस आर्थिक बोझ के कारण तत्काल नीति समीक्षा की आवश्यकता है। क्षमता बढ़ाने में लगातार देरी से बिजली मांग और इन-स्टेट उत्पादन क्षमता का अंतर बढ़ रहा है। वित्तीय चुनौतियां और भविष्य की मांग पावरकाॅम की वित्तीय स्थिति लगातार कमजोर हो रही है। इसका मुख्य कारण पंजाब सरकार का बकाया सब्सिडी का भुगतान न करना है। मौजूदा वित्तीय साल में पावरकाॅम को करीब 7,800 करोड़ रुपये के राजस्व की कमी का सामना करना पड़ सकता है। एसोसिएशन के सुझावों पर ध्यान नहीं दिया गया जबकि औद्योगिक विस्तार, खेती, घरेलू खपत और डेटा सेंटर जैसे उच्च-भार वाले क्षेत्रों से भविष्य में बिजली की जरूरत काफी बढ़ेगी। राज्य-क्षेत्र बिजली उत्पादन परियोजनाओं में निवेश से पंजाब के युवाओं को रोजगार का बड़ा मौका मिलेगा। गर्मियों में बढ़ जाती है मांग पत्र के अनुसार गर्मियों में बिजली की मांग बढ़ने के साथ ही पीक डिमांड के समय पंजाब का अपना बिजली उत्पादन अपेक्षाकृत कम हो जाता है। ऐसे में मांग पूरी करने के लिए बिजली एक्सचेंज से महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ती है। इससे पावरकॉम पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है। एसोसिएशन ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे जलविद्युत उत्पादन वाले राज्य भी अब बिजली बैंकिंग के बजाय खुले बाजार में बिजली बेचने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे पंजाब के लिए सस्ती बिजली की उपलब्धता और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। निजी बिजली संयंत्रों पर निर्भरता पर सवाल इंजीनियरों ने निजी थर्मल प्लांटों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इससे पंजाब का बड़ा पूंजी निवेश निजी क्षेत्र की ओर जा रहा है। एसोसिएशन ने सरकार से दीर्घकालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सरकारी क्षेत्र में नए बिजली उत्पादन प्रोजेक्ट शुरू करने और प्रदेश की अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए तत्काल नीति बनाने की मांग की है।    

राहुल गांधी खुद चुनेंगे कांग्रेस की फ्यूचर टीम, 120 युवा नेता शॉर्टलिस्ट; संगठन में बड़े बदलाव के संकेत

नई दिल्ली लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस संगठन को नए सिरे से गढ़ने और युवाओं को फ्रंटफुट पर लाने की कवायद शुरू कर दी है. कांग्रेस को बुजुर्ग और 'ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स' करने वाले नेताओं के चंगुल से निकालकर अब एक युवा, आक्रामक और जमीन पर लड़ने वाले संगठन में तब्दील करने की योजना पर काम शुरू हो चुका है।  कांग्रेस में राष्ट्रीय संगठन के पदों पर नियुक्ति के लिए अब राजनीतिक वरिष्ठता के बजाय काम के रिकॉर्ड और जमीनी सक्रियता को मुख्य कसौटी माना जा रहा है. संगठन को अधिक समावेशी और गतिशील बनाने के लिए पार्टी नेतृत्व ने नए राष्ट्रीय सचिवों को शामिल करने हेतु इंटरव्यू की प्रक्रिया शुरू की है।  राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के साथ कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव पद के लिए नेताओं के इंटरव्यू ले रहे हैं. देश के अलग-अलग राज्यों से चुनिंदा नेताओं को दिल्ली बुलाया गया है, ताकि संगठन में एक नई, पेशेवर और वैचारिक रूप से मजबूत युवा लीडरशिप तैयार की जा सके।  राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ले रहे इंटरव्यू राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने सोमवार को कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव पद के लिए 30 नेताओं का इंटरव्यू लिया. रायबरेली के दो दिवसीय दौरे से राहुल गांधी के लौटने के बाद फिर से इंटरव्यू की प्रक्रिया शुरू होगी. यह कदम केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि पार्टी में नई ऊर्जा और मजबूत युवा लीडरशिप खड़ी करने का एक सुनियोजित प्रयास है।  कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव के लिए 10-10 के समूह में नेताओं का इंटरव्यू लिया जा रहा है. राहुल गांधी नेताओं से उनके पुराने कामकाज से लेकर प्रोफाइल तक के बारे में सवाल पूछ रहे हैं. जिन नेताओं का इंटरव्यू लिया जा रहा है, उनके कामकाज का पूरा रिपोर्ट कार्ड पहले से ही राहुल गांधी के पास मौजूद है।  राहुल गांधी बना रहे अपनी नई टीम कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों में राष्ट्रीय सचिवों की नियुक्ति की कवायद शुरू कर दी है, जिसके लिए राहुल गांधी पार्टी में अपनी नई टीम तैयार कर रहे हैं. इसीलिए फाइनल इंटरव्यू राहुल गांधी खुद ले रहे हैं. राष्ट्रीय सचिव पद के लिए शॉर्टलिस्ट किए गए नेताओं के कामकाज की रिपोर्ट के साथ राहुल गांधी उनसे मिल रहे हैं।  राहुल गांधी का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि निर्णय केवल सिफारिशों या सिफारिशी पत्रों के आधार पर न हों, बल्कि जमीनी हकीकत, काम करने की क्षमता और दूरदृष्टि के बल पर युवाओं को जगह मिले. कांग्रेस अपने मौजूदा 60 प्रतिशत से ज़्यादा सचिवों को बदलने की तैयारी में है और संगठन में नए चेहरों को मौका देने की योजना बना रही है।  कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव पद के लिए 120 नेताओं का इंटरव्यू लिया जाएगा, जिसके बाद पार्टी उनकी नियुक्ति करेगी. इस पद के लिए उन नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है, जिन्होंने पहले कांग्रेस के 'संगठन सृजन' कार्यक्रम के तहत ऑब्जर्वर के तौर पर काम किया है।  नई लीडरशिप खड़ी करने का प्लान राहुल गांधी ने जब 2004 में राजनीति में कदम रखा था, तब से कांग्रेस पार्टी का कायाकल्प और 'जनरेशन चेंज' उनका सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट रहा है. उन्होंने कांग्रेस के भीतर युवाओं को आगे लाने और पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे में बड़े बदलाव करने के लिए कई प्रयास किए हैं. कांग्रेस ने यूथ कांग्रेस और NSUI में भी नियुक्तियां करने के लिए इंटरव्यू-आधारित प्रक्रिया अपनाई थी. इसके जरिए प्रतिभा-आधारित चयन प्रक्रिया को बढ़ावा दिया गया, ताकि बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले युवा भी नेतृत्व में आ सकें।  राहुल गांधी का यह सियासी प्रयोग पहले पुराने दिग्गजों (ओल्ड गार्ड) के कड़े विरोध और अंदरूनी खींचतान के चलते परवान नहीं चढ़ सका था. हालांकि, पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के भीतर जो कदम उठाए जा रहे हैं और बदलाव दिख रहे हैं, उनसे स्थिति बदल रही है. कांग्रेस ने वरिष्ठ नेताओं की जगह नए चेहरों की ताजपोशी कर सियासी संदेश दिया है. संगठन में बदलाव शुरू हो चुके हैं और अब नए चेहरे नजर आने लगे हैं।  प्रदेश संगठन से लेकर जिला संगठन तक में युवा चेहरों की नियुक्तियां हो रही हैं. इससे साफ जाहिर होता है कि राहुल गांधी का दो दशक पुराना सपना अब हकीकत में बदलने लगा है. इसी कड़ी में राष्ट्रीय सचिवों की नियुक्ति का खाका खींचा जा रहा है. इसके जरिए उन कार्यकर्ताओं और युवा नेताओं को तरजीह दी जा रही है जो लंबे समय से जमीन पर काम कर रहे हैं, ताकि मेहनत करने वाले युवाओं का भरोसा राजनीति में बना रहे।  कांग्रेस का प्लान देश के हर कोने और समाज के हर वर्ग से आने वाले युवाओं को मौका देकर एक समावेशी टीम बनाने का है. राहुल गांधी का यह प्रयोग इस बात का प्रतीक है कि भविष्य की राजनीति को वही दिशा दे सकते हैं जिनके पास नया दृष्टिकोण, ऊर्जा और जनसेवा का जज्बा हो. राष्ट्रीय सचिवों के इस चयन अभियान से न केवल संगठन में नई जान फूंकने की कोशिश की जा रही है, बल्कि यह देश के हर उस युवा के लिए भी एक उम्मीद का संदेश है जो राजनीति को बदलाव का जरिया मानता है। 

दिल्ली वोटर लिस्ट पर बड़ा सवाल, हजारों नाम ड्राफ्ट रोल से गायब; ASDD सूची में भी गड़बड़ी

नई दिल्ली राजधानी दिल्ली में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में कई गड़बड़ियां सामने आ रही है। कुछ निजी समूह की ओर से किए गए री-वेरिफिकेशन में चौकाने वाले मामले सामने आए है। मंगोलपुरी में रहने वाले कामता प्रसाद ने वोटर लिस्ट में नाम कांता प्रसाद होने के चलते उसे बदलने के लिए आवेदन किया था। लेकिन, उसका निपटारा नहीं हो सका। जब ड्राफ्ट रोल जारी हुआ तो उन्हें मृतक की सूची में डाल दिया गया। अब वह समझ नहीं पा रहे हैं कि आगे क्या करें। 'जन सरोकार', 'एमकेएसएस' और 'वोटर अधिकार मंच' के बैनर तले वॉलंटियर्स ने वाई-ब्लॉक के 8 पोलिंग बूथों पर करीब 10 हजार वोटरों का घर-घर जाकर सर्वे किया। हाल में दिल्ली में चल रहे SIR में मिल रहीं गड़बड़ियां कुछ निजी समूह की ओर से किए गए री-वेरिफिकेशन में चौकाने वाले मामले सामने आए मंगोलपुरी में रहने वाले कामता प्रसाद के आवेदन को मृतक की सूची में डाल दिया गया। घर पर रह रहे लोगों को सरकारी कागज में शिफ्टेड दिखा दिया गया आयोजित एक सार्वजनिक सुनवाई के दौरान इस पीपुल्स ऑडिट की रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें खुलासा हुआ कि सैकड़ों ऐसे लोग जो अपने घरों पर रह रहे हैं, उन्हें सरकारी कागजों में शिफ्टेड दिखा दिया गया। कुछ को डेथ की सूची में भी डाला गया है। ऑडिट आंकड़ों के मुताबिक वाई ब्लॉक के लगभग 9,600 रजिस्टर्ड वोटरों में से सिर्फ 5,800 लोगों के नाम ही ड्राफ्ट SIR रोल में मिल सका। वहीं करीब 2,800 लोगों को एब्सेंट, शिफ्टेड, डेड या डुप्लीकेट (ASDD) की लिस्ट में डाल दिया गया, जबकि 1,800 से ज्यादा वोटर ऐसे निकले जिनका नाम न तो ड्राफ्ट रोल में था और न ही ASDD लिस्ट में, हालांकि उन्होंने 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में वोट डाला था। सुप्रीम कोर्ट में पीड़ितों ने अपनी आपबीती सुनाई जन सुनवाई के दौरान पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस मदन लोकुर, बेजवाड़ा विल्सन, एनी राजा और जनरल अनिल वर्मा समेत कई जानी-मानी हस्तियों की जूरी के सामने पीड़ितों ने अपनी आपबीती सुनाई। हाउस नंबर 2267 के निवासी कांता प्रसाद ने बताया कि वह पूरी तरह स्वस्थ है और पिछली बार वोट भी दिया था, लेकिन नाम सुधरवाने की अर्जी देने के बावजूद उन्हें वोटर लिस्ट में डेथ में दर्ज कर दिया गया। आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2025 में दिल्ली में 1.56 करोड़ वोटर थे, जो SIR शुरू होने तक घटकर 1.45 करोड़ रह गए, यानी सीधे 11 लाख से ज्यादा वोटरों के नाम कट गए। बीएलओ ने दूसरे फॉर्म तक नहीं दिए वोटर अधिकार मंच की एक अधिकारी ने बताया कि पूरी प्रक्रिया के दौरान बीएलओ पर सबकुछ निर्भर था। बीएलओ ने जिनके फॉर्म गुम हो गए, उन्हें दूसरे फॉर्म तक मुहैया नहीं कराए। अगर ड्राफ्ट रोल से पहले वॉर्ड कमेटियों या ग्राम सभाओं की मदद ली जाती, तो कई लोगों के बारे में सटीक जानकारी मिलती।

छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की पहल तेज, सरकार ने उठाया सकारात्मक कदम

छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए सकारात्मक पहल राज्यपाल रमेन डेका से छत्तीसगढ़ी भाषाविदों ने की भेंट रायपुर राज्यपाल रमेन डेका से आज लोक भवन में छत्तीसगढ़ी भाषाविदों ने भेंट कर छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने तथा इसके संरक्षण, संवर्धन एवं विकास के संबंध में  चर्चा की। छत्तीसगढ़ी प्रदेश की राजभाषा एवं प्रमुख संपर्क भाषा           भाषाविदों ने राज्यपाल को छत्तीसगढ़ी भाषा की प्राचीनता, समृद्ध साहित्यिक परंपरा, व्याकरण, शब्दकोश एवं मानकीकरण की प्रक्रिया के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ी प्रदेश की राजभाषा एवं प्रमुख संपर्क भाषा है और लगभग डेढ़ करोड़ लोग इसका प्रयोग करते हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास और इसे आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में सकारात्मक पहल           राज्यपाल डेका ने स्वयं पहल करते हुए इस विषय  पर सार्थक चर्चा की। छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास और इसे आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में सकारात्मक पहल करते हुए कहा कि इसके लिए एक समिति का गठन किया जाएगा। समिति द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा के इतिहास, साहित्य, व्याकरण, शब्दकोश एवं अन्य संदर्भ सामग्री का व्यवस्थित संकलन किया जाएगा। इसके लिए विषय के विद्वानों एवं विशेषज्ञों से आवश्यक जानकारी और सुझाव भी लिए जाएंगे। राज्यपाल ने इस संदर्भ में असमिया और बोडो भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने का उदाहरण भी दिया। छत्तीसगढ़ी में 15 वीं शताब्दी से साहित्य सृजन की समृद्ध परंपरा         भाषाविदों ने बताया कि छत्तीसगढ़ी में 15 वीं शताब्दी से साहित्य सृजन की समृद्ध परंपरा रही है। कविता, खंडकाव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना एवं पत्रकारिता सहित विभिन्न विधाओं में प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। छत्तीसगढ़ी का व्याकरण वर्ष 1890 में तथा पहला शब्दकोश वर्ष 1939 में तैयार हुआ। वर्ष 1924 में पहला छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘हीरू के कहिनी’ प्रकाशित हुआ। पंडित सुंदरलाल शर्मा द्वारा जेल से हस्तलिखित छत्तीसगढ़ी पत्रिका ‘दुलरवा’ का प्रकाशन भी किया गया था। उन्होंने बताया कि प्रदेश के  विश्वविद्यालयों में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर छत्तीसगढ़ी का अध्ययन कराया जा रहा है तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत कक्षा पहली से आठवीं तक के पाठ्यक्रम में भी छत्तीसगढ़ी को शामिल करने की प्रक्रिया जारी है।          इस अवसर पर भाषाविद् डॉ. चित्ररंजन कर, डॉ. सुधीर शर्मा, छत्तीसगढ़ी साहित्यकार शीलकांत पाठक एवं श्रीमती अर्चना पाठक उपस्थित थीं।

छत पर पानी की टंकी किस दिशा में रखें? वास्तु के अनुसार जानें सही और गलत दिशा

 छत पर पानी की टंकी रखना घर की जरूरत है, लेकिन इसे कहीं भी रख देना सही नहीं माना जाता. वास्तु शास्त्र में ओवरहेड वाटर टैंक की दिशा और जगह को लेकर कुछ खास नियम बताए गए हैं. मान्यता है कि सही दिशा में रखी गई टंकी से घर में सकारात्मकता और संतुलन बना रहता है, जबकि गलत दिशा में रखी टंकी घर में परेशानी और नकारात्मक ऊर्जा बढ़ा सकती है. अगर आप भी घर की छत पर पानी की टंकी रखने जा रहे हैं या पहले से लगी टंकी की दिशा बदलने के बारे में सोच रहे हैं, ज्योतिषाचार्य संजीत कुमार मिश्रा से जान लें कि वास्तु के अनुसार इसे किस दिशा में रखना सही माना जाता है. पानी की टंकी की दिशा छत पर पानी की टंकी की सही दिशा दक्षिण-पश्चिम दिशा: वास्तु में दक्षिण-पश्चिम दिशा को भारी और स्थिर माना जाता है. पानी से भरी टंकी भी काफी भारी होती है, इसलिए इसे इस दिशा में रखने की सलाह दी जाती है. वास्तु के अनुसार, इससे घर का संतुलन और स्थिरता बनी रहती है. पश्चिम दिशा: पश्चिम दिशा को भी ओवरहेड पानी की टंकी के लिए अच्छा विकल्प माना जाता है. पश्चिम दिशा को जल के देवता वरुण की दिशा माना जाता है. इसलिए दक्षिण-पश्चिम दिशा उपलब्ध न होने पर पश्चिम में टंकी रखने की सलाह दी जाती है. किस दिशा में पानी की टंकी नहीं रखनी चाहिए? उत्तर-पूर्व दिशा: वास्तु में ईशान कोण को शुभ और जल तत्व से जुड़ा माना जाता है. जमीन के नीचे पानी का स्रोत इस दिशा में रखना अच्छा माना जाता है. लेकिन छत पर पानी की भारी टंकी रखने से बचने की सलाह दी जाती है. दक्षिण-पूर्व दिशा: आग्नेय कोण को अग्नि तत्व की दिशा माना जाता है, जबकि पानी को जल तत्व से जोड़ा जाता है. वास्तु मान्यता के अनुसार, इस दिशा में पानी की टंकी रखने से जल और अग्नि तत्व का संतुलन बिगड़ सकता है. इसलिए पानी की टंकी इस दिशा में रखने से बचना चाहिए.

योगी के चेहरे पर चुनावी मैदान में उतरेगी BJP, इसी हफ्ते यूपी में शुरू होगा नेताओं का दौरा

पटना भारतीय जनता पार्टी ने यूपी विधानसभा चुनाव के लिए प्रदेश का सियासी माहौल गर्माने की तैयारी कर ली है। पार्टी इसी हफ्ते इसकी शुरुआत करने जा रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष राजधानी लखनऊ आएंगे। बीएल संतोष के साथ यूपी प्रभारी तावड़े भी दोबारा आएंगे। नितिन पश्चिमी यूपी से अपने दौरों की शुरुआत करेंगे। वहीं बीएल संतोष राजधानी लखनऊ में संगठनात्मक तैयारियों को परखेंगे। पार्टी सूत्रों का कहना है कि इसी माह केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का भी यूपी दौरा प्रस्तावित है। यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने सियासी बिसात बिछा दी है। पार्टी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर यह चुनाव लड़ने जा रही है। योगी भी बीते काफी समय से पूरी तरह चुनावी मोड में हैं। उन्होंने प्रदेश के मंडलों के साथ ही जिलों के भी ताबड़तोड़ दौरे किए हैं। उधर, संगठन की बात करें तो प्रदेश और क्षेत्रीय टीमों की घोषणा के बाद अब जल्द मोर्चों के गठन की तैयारी है। इसके साथ ही पार्टी बूथ और शक्ति केंद्र स्तर पर भी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की मुहिम चला रही है। बीएल संतोष तैयारियों का लेंगे जायजा प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े व सह प्रभारी जगदीश भाई पटेल का दो दिनी दौरा रविवार को ही खत्म हुआ। हालांकि यह दौरा परिचयात्मक होने तक ही सीमित रहा। इस दौरे में प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक भी नहीं हुई। अब 10 और 11 सितंबर को राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष का लखनऊ दौरा प्रस्तावित है। वे यहां संगठन के मोर्चे पर तैयारियों का जायजा लेंगे। खासतौर से मीडिया और सोशल मीडिया को लेकर बात करेंगे क्योंकि इधर, विपक्षी दलों की सक्रियता भी सोशल मीडिया पर काफी अधिक है। बीएल संतोष का दौरा पहले सात व आठ सितंबर को प्रस्तावित था किंतु अंतिम समय पर वह निरस्त हो गया था। नितिन पश्चिम क्षेत्र से करेंगे शुरुआत उधर, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन भी प्रदेश के सभी छह संगठनात्मक क्षेत्रों का दौरा करेंगे। वे वहां सियासी आबोहवा का आकलन करने के साथ ही कार्यकर्ताओं में जोश भी भरेंगे। उनके इन दौरों की शुरुआत पश्चिम उत्तर प्रदेश से होने जा रही है। उनका दौरा इसी सप्ताह मेरठ से शुरू होने की चर्चा है। इसके अलावा गृहमंत्री अमित शाह भी अब यूपी का रुख करेंगे। उनका दौरा इसी माह प्रस्तावित है। अमित शाह वर्ष 2013 से लगातार यूपी में सक्रिय रहे हैं। यहां के प्रभारी भी रह चुके हैं। केंद्रीय नेतृत्व के दौरों को लेकर पार्टी के प्रदेश नेतृत्व ने तैयारी शुरू कर दी है।

BSNL ने हरियाणा में मचाई धूम, नए यूजर्स जोड़ने में Jio-Airtel को छोड़ा पीछे

सरकारी टेलीकॉम कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) कम कीमत में लोगों को कई तरह की सर्विस देती है. इसकी मदद से आम लोग कम कीमत में अच्छी कनेक्टिविटी का फायदा उठा सकते हैं. टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) की लेटेस्ट सब्सक्रिप्शन रिपोर्ट सामने आई है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 के महीने में BSNL ने हरियाणा में दूसरे प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियों को पीछे छोड़ दिया है. इस दौरान BSNL के साथ सबसे ज्यादा नए यूजर्स जुड़े हैं. आइए जानते हैं पूरी डिटेल. जानिए हरियाणा में BSNL के यूजर्स कैसे बढ़े BSNL के यूजर्स जून 2026 में 46,49,224 थे. जुलाई 2026 के आखिर तक इनकी संख्या बढ़कर 47,17,784 हो गई.इस तरह जुलाई के महीने में BSNL के साथ कुल 68,560 नए मोबाइल सब्सक्राइबर्स जुड़े. नए यूजर्स जुड़ने के मामले में BSNL हरियाणा में सबसे आगे रहा. Jio क्यों रहा पीछे? देशभर में जिओ के सबसे ज्यादा मोबाइल यूजर्स हैं, लेकिन हरियाणा में जुलाई के दौरान कंपनी नए यूजर्स जोड़ने के मामले में BSNL से पीछे रही. रिपोर्ट के मुताबिक, जिओ के मोबाइल सब्सक्राइबर्स 82,70,811 से बढ़कर 83,08,319 हो गए. यानी जुलाई 2026 में Jio के साथ सिर्फ 37,508 नए यूजर्स जुड़े. जानिए Airtel ने कितने नए यूजर्स जोड़े Airtel के सब्सक्राइबर्स की संख्या भी हरियाणा में बढ़ी है. कंपनी के यूजर्स 79,38,962 से बढ़कर 79,64,101 हो गए. इस तरह जुलाई 2026 में एयरटेल के साथ 25,139 नए यूजर्स जुड़े. हालांकि, नए यूजर्स जोड़ने के मामले में Airtel भी BSNL से काफी पीछे रहा. यह सवाल सबसे ज्यादा दिलचस्प है कि आखिर BSNL के साथ इतनी तेजी से लोग क्यों जुड़ रहे हैं? इसकी एक बड़ी वजह कम कीमत वाले रिचार्ज प्लान माने जा सकते हैं. प्राइवेट कंपनियों के महंगे होते प्लान के बीच BSNL कई यूजर्स को किफायती विकल्प देता है. इसके अलावा कंपनी लगातार 4G नेटवर्क का विस्तार कर रही है और कई इलाकों में अपनी कनेक्टिविटी बेहतर कर रही है. ग्रामीण और छोटे शहरों में भी BSNL की मजबूत मौजूदगी है. यही वजह है कि जो लोग कम कीमत में मोबाइल सेवा चाहते हैं, उनके लिए BSNL फिर से एक आकर्षक विकल्प बन रहा है.

रेडियोलॉजी कोर्स में फर्जीवाड़ा पड़ा भारी, MGM को छात्र के ₹39.94 लाख लौटाने का आदेश

रांची झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने कहा है कि कोई मेडिकल कॉलेज किसी छात्र से ऐसे पीजी कोर्स का बांड नहीं भरवा सकता, जिसकी मान्यता ही नहीं है। अदालत ने कहा कि जब दाखिला ही गलत और भ्रामक आधार पर दिया गया हो, तो उससे जुड़ा बांड भी कानूनन प्रभावी नहीं रह जाता। अदालत ने महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज (एमजीएम), जमशेदपुर को चिकित्सक से बांड और स्टाइपेंड के रूप में जमा 39,94,645 रुपये लौटाने का आदेश दिया है। साथ ही मानसिक परेशानी और करियर के महत्वपूर्ण दो वर्ष खराब होने के एवज में प्रार्थी छात्र को सात लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। एमजीएम ने बिना मान्यता तथा आवश्यक उपकरण के नामांकन ले लिया था। मामला वर्ष 2019-21 सत्र में डिप्लोमा इन मेडिकल रेडियो डायग्नोसिस (डीएमआरडी-रेडियोलाजी) में दाखिले से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज , इलाहाबाद से एमबीबीएस किया था। उसने वर्ष 2019 में नीट-पीजी की परीक्षा पास की। काउंसिलिंग के बाद उसे एमजीएम मेडिकल कॉलेज , जमशेदपुर में डीएमआरडी-रेडियोलाजी की सीट मिली। उसने यह सीट स्वीकार कर ली और पहले से मिली सीट छोड़कर एमजीएम में दाखिला ले लिया। दाखिले के समय कॉलेज ने उससे एक बांड भरवाया था। इसके तहत पढ़ाई बीच में छोड़ने पर 30 लाख रुपये देने के साथ स्टाइपेंड की राशि लौटाने की शर्त थी। कॉलेज ने उसके मूल प्रमाणपत्र भी अपने पास रख लिया था। न कोर्स मान्य था, न रेडियोलाजी में पर्याप्त व्यवस्था याचिकाकर्ता के अनुसार, कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उसे पता चला कि रेडियोलाजी विभाग में पर्याप्त शिक्षक और मार्गदर्शन की व्यवस्था नहीं है। बाद में उसे यह भी जानकारी मिली कि जिस डीएमआरडी-रेडियोलाजी पाठ्यक्रम में उसका दाखिला हुआ है, उसे तत्कालीन मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया (एमसीआइ) की मान्यता प्राप्त नहीं है। इसके बाद उसने आइएनआइ-सीईटी परीक्षा दी और चयन होने पर एमजीएम कॉलेज से अपने मूल प्रमाणपत्र वापस मांगे, लेकिन कॉलेज ने दस्तावेज नहीं लौटाए। इस कारण वह चयन के बाद भी वहां दाखिला नहीं ले सका। बाद में उसने नीट-पीजी 2021 में फिर परीक्षा दी और आल इंडिया रैंक 270 हासिल कर संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज, लखनऊ में दाखिला लिया। MRI तक नहीं था, सीटी स्कैन भी खराब अदालत ने मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था पर भी कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि यह हैरानी की बात है कि रेडियोलाजी में पीजी डिप्लोमा कोर्स चलाने वाले कॉलेज के पास MRI मशीन तक नहीं थी। वहीं, उपलब्ध सीटी स्कैन मशीन भी काम नहीं कर रही थी। कोर्ट ने कहा कि पीजी कोर्स के लिए जरूरी उपकरणों और सुविधाओं की उपलब्धता के बारे में महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना दाखिला लेने वाले छात्रों के साथ धोखे के समान है। एमसीआइ की भूमिका पर भी उठाए सवाल हाई कोर्ट ने तत्कालीन मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में एमसीआइ ने कॉलेज के खिलाफ उचित कार्रवाई क्यों नहीं की। कोर्ट ने टिप्पणी की कि नियामक संस्था ने भविष्य के चिकित्सकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से आंखें मूंद लीं और जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की। अदालत ने काउंसिलिंग कराने वाली संस्था को भी जिम्मेदार माना। कोर्ट ने सवाल किया कि जब पाठ्यक्रम मान्यता प्राप्त नहीं था तो काउंसिलिंग में उस कॉलेज और पाठ्यक्रम की अनुशंसा कैसे की गई?

जैन साधु क्यों उखाड़ते हैं सिर के बाल? जानें केशलोचन की कठिन साधना का रहस्य

 आज से जैन धर्म का पर्युषण पर्व शुरू हो चुका है. इस महापर्व के दौरान जैन धर्म के लोग पूरी तरह से कठिन तप पर ध्यान केंद्रित करते हैं. वहीं, जैन धर्म में साधु जीवन को त्याग, तपस्या और संयम का मार्ग माना जाता है. इस राह पर चलने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाता है. जैन साधु-साध्वियों की जीवनशैली से जुड़ी कई बातें आम लोगों को हैरान कर देती हैं. उन्हीं में से एक है केशलोचन, जिसमें साधु अपने सिर और चेहरे के बाल खुद हाथों से उखाड़ते हैं. यह सुनने में जितना कठिन लगता है, वास्तव में यह साधना का बेहद अहम हिस्सा माना जाता है. आखिर साधु ऐसा क्यों करते हैं और इसमें कैंची या ब्लेड का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? आइए जानते हैं. क्या होता है केशलोचन? केशलोचन का सीधा अर्थ है बालों को उखाड़ना. जैन परंपरा में जब कोई व्यक्ति सांसारिक जीवन छोड़कर साधु या साध्वी के रूप में दीक्षा लेता है, तब इस प्रक्रिया का विशेष महत्व होता है. साधु अपने सिर और चेहरे के बालों को हाथों से हटाते हैं. यह सिर्फ बाल हटाने की प्रक्रिया नहीं मानी जाती, बल्कि इसे मोह और भौतिक आकर्षण से दूरी बनाने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. बालों को कैंची या ब्लेड से क्यों नहीं काटते? केशलोचन की सबसे खास बात यही है कि इसमें बाल काटने के लिए कैंची, ब्लेड या किसी दूसरे औजार का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. जैन मान्यताओं के अनुसार, इसके पीछे अहिंसा और त्याग से जुड़ी सोच है. एक मान्यता यह भी है कि किसी औजार के इस्तेमाल से त्वचा पर मौजूद सूक्ष्म यानी छोटे जीवों को नुकसान पहुंच सकता है. इसके अलावा बालों को शरीर की सुंदरता से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए उन्हें खुद से हटाना अपने रूप और शरीर के प्रति मोह को कम करने का एक तरीका माना जाता है. इतनी पीड़ा सहकर क्यों करते हैं यह साधना? केशलोचन आसान प्रक्रिया नहीं है. बालों को जड़ से निकालने की वजह से दर्द होना स्वाभाविक है. लेकिन जैन साधु इसे सहन करते हुए अपनी साधना पूरी करते हैं. जैन परंपरा में इसे धैर्य और सहनशीलता की परीक्षा के रूप में भी देखा जाता है. इसका उद्देश्य यह समझना है कि साधु सुख-दुख, आराम और असुविधा जैसी शारीरिक स्थितियों से ऊपर उठकर अपने मन को संयमित रख सके. दीक्षा के समय इसका क्या महत्व है? जब कोई व्यक्ति जैन साधु बनने का फैसला करता है, तो वह अपने पुराने सांसारिक जीवन से दूरी बनाने का संकल्प लेता है. दीक्षा के दौरान होने वाला केशलोचन इसी बदलाव का एक प्रतीक माना जाता है. इसमें व्यक्ति अपने रूप, शरीर और सुविधाओं के प्रति लगाव छोड़ने का संदेश देता है. यानी बाहरी सुंदरता से ज्यादा महत्व आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना को दिया जाता है. कैसे किया जाता है केशलोचन? केशलोचन के दौरान साधु या साध्वी धार्मिक वातावरण में बैठकर अपने बालों को हाथों से उखाड़ते हैं. कुछ परंपराओं में वरिष्ठ साधु भी इसमें सहायता करते हैं. इस दौरान मंत्र और धार्मिक वचनों का पाठ किया जाता है. प्रक्रिया पूरी होने के बाद साधु आगे की साधना और संयम के मार्ग पर बढ़ते हैं. साल में कितनी बार होता है केशलोचन? जैन परंपरा में केशलोचन साल में एक या दो बार किए जाने की परंपरा बताई गई है. बाहर से देखने पर केशलोचन एक कठिन और दर्दनाक प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन जैन साधना में इसका अर्थ इससे कहीं ज्यादा गहरा है. यह व्यक्ति को याद दिलाता है कि साधु जीवन का उद्देश्य आराम और सुंदरता नहीं, बल्कि त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मअनुशासन है. यही वजह है कि केशलोचन को जैन साधु-साध्वियों की तपस्या और वैराग्य से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपराओं में गिना जाता है.