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राष्ट्रपति मुइज्जु ने साइन किया नया कानून, मालदीव में मीडिया गतिविधियों पर पाबंदी की तैयारी

मालदीव  मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जु ने बृहस्पतिवार को एक विवादास्पद नए मीडिया विधेयक पर हस्ताक्षर कर उसे मंजूरी दी, जिसके तहत उल्लंघन की स्थिति में भारी जुर्माने और मीडिया संस्थानों को अस्थायी या स्थायी रूप से बंद करने का प्रावधान है। इस कानून के तहत उल्लंघन की स्थिति में पत्रकारों पर 1,620 अमेरिकी डॉलर तक और मीडिया कंपनियों पर 6,485 अमेरिकी डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। कानून में जांच पूरी होने तक मीडिया लाइसेंस निलंबित करने, मीडिया लाइसेंस रद्द करने के लिए मुकदमा दायर करने या नए कानून का उल्लंघन करते हुए पाए जाने पर पुलिस को बीच में ही प्रसारण रोकने के लिए भेजने का प्रावधान है। राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा कि मुइज्जु ने ‘मालदीव मीडिया और प्रसारण विनियमन अधिनियम' को मंजूरी दे दी है, जिसे पिछले मंगलवार को संसद में भारी बहुमत से पारित किया गया था। संसद के 93 सदस्यों में 60 सत्तारूढ़ सांसदों ने विधेयक के पक्ष में मतदान किया, जबकि विपक्षी सदस्यों को विरोध प्रदर्शन के बीच सदन से बाहर कर दिया गया। नए कानून के अनुसार, पत्रकारों को देश के संविधान, इस्लाम, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक मूल्यों का सम्मान करना होगा और व्यक्तिगत सम्मान व मानवाधिकारों की रक्षा करनी होगी। इस कानून के तहत अनुपालन सुनिश्चित करने और कथित अपराधों की जांच के लिए सात सदस्यीय समिति नियुक्त की जाएगी।    

पाकिस्तान का अरब नाटो प्लान धड़ाम, भारत ने हासिल की बड़ी कूटनीतिक सफलता

कतर  कतर पर इजरायल के हमले के बाद मुस्लिम दुनिया में गुस्से का माहौल बना। अरब लीग और इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) ने तुरंत आपात बैठकें बुलाईं और इजरायल की निंदा करते हुए कतर के साथ एकजुटता जताई। लेकिन  कार्रवाई के नाम पर केवल बयानबाजी देखने को मिली। अरब देशों की "नाटो" योजना  धड़ाम  बैठक में कुछ देशों ने इज़रायल के खिलाफ सैन्य मोर्चा खोलने और "अरब नाटो" गठित करने का सुझाव दिया।  पाकिस्तान ने इस विचार को जमकर हवा दी, लेकिन कतर और अन्य खाड़ी देशों की अनिच्छा से योजना ठंडे बस्ते में चली गई।अंत में 50 देशों का संयुक्त बयान केवल औपचारिक निंदा  तक सिमट गया। विशेषज्ञों का तंज- कहां गया दम? विशेषज्ञों ने कहा कि 1973 के युद्ध में अरब देशों ने  तेल निर्यात रोककर अमेरिका-इज़रायल पर दबाव बनाया था, जिससे युद्धविराम जल्दी संभव हुआ।आज जबकि ग़ाज़ा में मौतों का आंकड़ा  65,000  से ऊपर जा चुका है और संयुक्त राष्ट्र तक नरसंहार की चेतावनी दे रहा है, मुस्लिम देशों की चुप्पी उनकी  कमजोरी  उजागर करती है। पाकिस्तान की चाल फेल पाकिस्तान ने इस संकट को अवसर बनाने की कोशिश की। पीएम शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री इशाक डार कतर पहुंचे और इजरायल विरोधी माहौल बनाने की कोशिश की। "अरब नाटो" के जरिए पाकिस्तान भारत के खिलाफ एक सुरक्षा कवच  चाहता था। मगर मुस्लिम देशों की बेरुख़ी ने पाकिस्तान की सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। भारत की कूटनीतिक जीत अरब नाटो का न बनना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। अगर यह सैन्य गठबंधन बनता तो भारत अरब देशों के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते और इज़रायल के साथ रक्षा साझेदारी के बीच फँस जाता। पाकिस्तान को भी भारत पर दबाव बनाने का मौका मिल जाता। मगर फिलहाल हालात ऐसे हैं कि भारत बिना कोई कदम उठाए ही मज़बूत स्थिति में है और पाकिस्तान की चाल नाकाम हो गई है।

धर्म के नाम पर घोटाला: चीन के भिक्षु ने किया ऐसा काम, जिसने हिला दी पूरी दुनिया

चीन  चीन ने बौद्ध भिक्षुओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है जिन पर मंदिरों के धन का निजी संपत्ति के लिए दुरुपयोग करने का संदेह है। यह कदम धार्मिक संस्थानों को विनियमित करने और मंदिर अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से उठाया गया है। शाओलिन मठ के प्रमुख मठाधीश शी योंगक्सिन पर धन का दुरुपयोग करने के आरोप लगे थे जिसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, एशियाई देश की मंदिर अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और इस वर्ष के अंत तक इस क्षेत्र के 100 बिलियन युआन तक पहुंचने की उम्मीद है। चीन में मंदिरों का इतिहास चीन में मंदिरों का इतिहास उथल-पुथल भरा रहा है। 1950 के दशक में कई मठों ने अपनी संपत्ति खो दी, और 1960 और 1970 के दशक में कई मंदिरों को नुकसान पहुंचा। 1980 के दशक में आर्थिक सुधारों के साथ, मंदिरों ने पुनः लोकप्रियता हासिल की और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए वे सरकार द्वारा समर्थित पर्यटन पर निर्भर हो गये।  

स्वच्छ शिमला मिशन: जानें नगर निगम की नई व्यवस्था कैसे बदलेगी शहर का चेहरा

शिमला हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत 'पहाड़ों की रानी' शिमला को साफ-सुथरा रखने के लिए नगर निगम एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। अब शिमला आने वाले पर्यटकों और स्थानीय लोगों को अपने वाहनों का कचरा सड़क पर फेंकने के बजाय नगर निगम को देना होगा। यह नई व्यवस्था जल्द ही लागू होने वाली है, जिसका उद्देश्य शिमला के पर्यावरण को बेहतर बनाना है। कैसे काम करेगी यह नई व्यवस्था? इस योजना के तहत, शिमला के प्रवेश द्वार पर ही नगर निगम के कर्मचारी पर्यटक वाहनों से कचरा इकट्ठा करेंगे। यह कचरा विशेष रूप से भरयाल कूड़ा संयंत्र में भेजा जाएगा। इस सेवा के लिए वाहन चालकों से एक न्यूनतम कूड़ा शुल्क भी लिया जाएगा। नगर निगम ने इस शुल्क की राशि पर अभी अंतिम फैसला नहीं लिया है, लेकिन यह सुनिश्चित किया गया है कि यह राशि कम होगी और इसे लागू करने से पहले सदन की मंजूरी ली जाएगी। क्यों उठाया गया यह कदम? शिमला में हर साल लाखों पर्यटक आते हैं, और खासकर गर्मी और सर्दियों के मौसम में पर्यटकों की संख्या बहुत बढ़ जाती है। नगर निगम के अनुसार, भले ही हर घर से कूड़ा उठाया जाता है, फिर भी शहर की सड़कों, हाईवे और पार्किंग में कचरे के ढेर लगे रहते हैं। इसका मुख्य कारण पर्यटक वाहनों से फेंका जाने वाला कचरा है। पर्यटक बसें, टैक्सी और ट्रैवलर जैसी गाड़ियां अक्सर पार्किंग में या सड़क किनारे कचरा फेंक देती हैं, जिससे शिमला की सुंदरता और स्वच्छता पर बुरा असर पड़ता है। टैक्सी चालकों के लिए भी नियम नगर निगम ने टैक्सी चालकों के लिए भी खास नियम बनाए हैं। उन्हें अपनी गाड़ियों में डस्टबीन रखना होगा और उस कचरे को शहर के निर्धारित कूड़ा एकत्रीकरण केंद्रों पर खाली करना होगा। फिलहाल टूटीकंडी पार्किंग के पास एक नया कूड़ा एकत्रीकरण केंद्र बनाने की तैयारी है, जबकि आईएसबीटी टूटीकंडी में भी कचरा इकट्ठा किया जा रहा है। नगर निगम आयुक्त भूपेंद्र अत्री ने बताया कि यह प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है और पर्यटक वाहनों का ब्योरा भी इकट्ठा किया जा रहा है। हाल ही में सरकार ने सभी व्यावसायिक वाहनों में कूड़ेदान लगाना अनिवार्य किया था, लेकिन अभी तक इस कचरे को सही जगह पर डालने की कोई व्यवस्थित व्यवस्था नहीं थी, जिसे नगर निगम अब ठीक करने की कोशिश कर रहा है। इस नई पहल से न केवल शिमला की स्वच्छता बढ़ेगी, बल्कि यह पर्यटकों को भी पर्यावरण के प्रति जागरूक करने में मदद करेगी।  

एयर इंडिया का ड्रामा: 103 यात्रियों के बीच अचानक इमरजेंसी लैंडिंग, यात्रा तनावपूर्ण

विशाखापत्तनम  विशाखापत्तनम से हैदराबाद जा रही एअर इंडिया की एक उड़ान को पक्षी के टकराने के कारण इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी। विमान में 103 यात्री सवार थे। इंजन में खराबी आने के बाद पायलट ने विशाखापत्तनम हवाई अड्डे पर वापस लौटने का फैसला किया। सभी यात्री सुरक्षित हैं और एयरलाइन वैकल्पिक व्यवस्था कर रही है। उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद यह घटना हुई।   विशाखापत्तनम हवाई अड्डे के निदेशक एस राजा रेड्डी ने बताया कि एयर इंडिया एक्सप्रेस के फ्लाइट नंबर IX 2658 के पायलट ने इमरजेंसी लैंडिंग का अनुरोध किया और हैदराबाद की यात्रा रद्द करके विशाखापत्तनम लौट आया। विमान में सवार सभी यात्री सुरक्षित रेड्डी ने पीटीआई-भाषा को बताया कि विशाखापत्तनम से उड़ान भरने के बाद, पायलट ने इंजन में कुछ समस्या की सूचना दी। इसलिए, उसने आपातकालीन लैंडिंग का अनुरोध किया और विशाखापत्तनम लौट आया। विमान सुरक्षित रूप से उतर गया और यात्रियों को उतार लिया गया। उन्होंने यह भी बताया कि एयरलाइन द्वारा वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है।  

जानें किस देश ने सबसे पहले किया था EVM का इस्तेमाल और अब वहां कैसी है स्थिति

नई दिल्ली  भारत में अक्सर चुनावी हार के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर सवाल उठाए जाते हैं। विपक्ष का आरोप होता है कि ईवीएम में हेराफेरी की गई, जिससे उन्हें कम वोट मिले। हालांकि, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करना किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। बहुत से लोग मानते हैं कि भारत EVM का इस्तेमाल करने वाला पहला देश था, लेकिन सच्चाई कुछ और है। दुनिया में सबसे पहले EVM का प्रयोग अमेरिका में हुआ था। अमेरिका में हुई थी शुरुआत यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि दुनिया में सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल अमेरिका में हुआ था। 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में अमेरिका के कुछ राज्यों ने मतदान प्रक्रिया को तेज और सुविधाजनक बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर प्रयोग शुरू किए। इन प्रयोगों ने ही आधुनिक EVM की नींव रखी। अमेरिका में EVM का विकास अमेरिका में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग का पहला प्रयोग 1964 में ऑटोमैटिक वोटिंग मशीन (AVM) के रूप में हुआ। इसके बाद, 1970 के दशक में डायरेक्ट रिकॉर्डिंग इलेक्ट्रॉनिक (DRE) मशीनों का इस्तेमाल शुरू हुआ, जिसमें मतदाता बटन दबाकर या टचस्क्रीन के जरिए अपना वोट दर्ज करते थे। 1980 के दशक तक, अमेरिका के कई राज्यों ने इन मशीनों को अपना लिया था। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य मतदान की गति और सुविधा बढ़ाना था। वर्तमान स्थिति: पारदर्शिता पर जोर आज अमेरिका पूरी तरह से EVM पर निर्भर नहीं है। साल 2000 के राष्ट्रपति चुनाव में फ्लोरिडा के बैलेट विवाद के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम पर सवाल उठने लगे। इसके बाद से सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर लगातार बहस जारी है। परिणामस्वरूप, कई राज्यों ने अब पेपर बैलेट और EVM का हाइब्रिड सिस्टम अपनाया है। इस प्रणाली में वोट इलेक्ट्रॉनिक मशीन से दर्ज होते हैं, लेकिन साथ ही एक पेपर रिकॉर्ड भी तैयार होता है, जिसे पेपर ट्रेल कहा जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर वोटों की दोबारा गिनती की जा सके।   वर्तमान में, अमेरिका में लगभग 70% वोटिंग मशीनें इलेक्ट्रॉनिक और पेपर बैकअप सिस्टम पर आधारित हैं, जबकि कुछ राज्य अब भी केवल पेपर बैलेट का उपयोग करते हैं। चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि जहां EVM ने सुविधा दी है, वहीं साइबर सुरक्षा और हैकिंग के खतरों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। यही कारण है कि अमेरिका में अब EVM और पेपर ट्रेल (जैसे VVPAT सिस्टम) का मिश्रित मॉडल सबसे ज्यादा प्रचलित है। अमेरिका, जिसने सबसे पहले EVM का इस्तेमाल शुरू किया, आज भी इस तकनीक पर पूरी तरह भरोसा नहीं करता है। वहां के चुनावों में सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग के साथ पेपर बैकअप को अनिवार्य बना दिया गया है।  

भारत-अमेरिका ट्रेड वार: क्या ट्रंप नवंबर में 25% टैरिफ कम करेंगे?

रूस  रूस से तेल आयात करने की वजह से भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप घुटने टेकने के लिए मजबूर हो सकते हैं। नवंबर के बाद अमेरिका भारत पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क को हटा सकता है। रेसिप्रोकल टैरिफ के नाम पर पहले अमेरिका ने भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लगाया था, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया था। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने उम्मीद जताई है कि 30 नवंबर के बाद कुछ आयातों पर लगाया गया दंडात्मक शुल्क (25 फीसदी) वापस ले लिया जाएगा। कोलकाता में मर्चेंट्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए, सीईए नागेश्वरन ने कहा, "हम सभी पहले से ही इस पर काम कर रहे हैं, और मैं यहां टैरिफ के बारे में बात करने के लिए कुछ समय लूंगा। हां, 25 फीसदी का मूल पारस्परिक टैरिफ और 25 फीसदी का दंडात्मक टैरिफ, दोनों की उम्मीद नहीं थी। मेरा अब भी मानना ​​है कि भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण दूसरा 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया होगा, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों के हालिया घटनाक्रमों को देखते हुए, मेरा मानना ​​है कि 30 नवंबर के बाद दंडात्मक टैरिफ नहीं लगाया जाएगा।'' भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर भी बातचीत चल रही है। इसका जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास है कि अगले कुछ महीनों में दंडात्मक शुल्क और उम्मीद है कि पारस्परिक शुल्कों पर कोई समाधान निकल आएगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की निर्यात वृद्धि दर, जो वर्तमान में 850 अरब अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष है, एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की राह पर है, जो जीडीपी का 25 फीसदी है, जो एक स्वस्थ और खुली इकॉनमी का संकेत है। ट्रंप ने दर्जनों देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (IEEPA) लागू किया था। यह 1977 का एक कानून है जिसे विदेशी आपात स्थितियों के समय प्रतिबंधों और वित्तीय नियंत्रण के लिए बनाया गया था। भारत पर पहले 25 फीसदी टैरिफ लगाया गया, लेकिन बाद में रूस से तेल खरीदने को लेकर एक्स्ट्रा 25 फीसदी टैरिफ लगा दिया गया। इससे भारत से एक्सपोर्ट होने वाले सामानों पर बुरा असर पड़ा है। हालांकि, भारत ने साफ किया है कि भारत राष्ट्र हित की वजह से रूस से तेल आयात कर रहा है। अमेरिकी सीमा शुल्क नोटिफिकेशन में यह भी बताया गया है कि भारत से आने वाले अधिकांश प्रोडक्ट्स पर उच्च शुल्क के साथ-साथ एंटी-डंपिंग या प्रतिपूरक शुल्क जैसे अन्य लागू शुल्क भी लागू होंगे, लेकिन कुछ वस्तुओं को इससे बाहर रखा गया है। इसमें अमेरिकी टैरिफ अनुसूची में अलग से सूचीबद्ध कुछ उत्पाद शामिल हैं। लोहे और इस्पात से बनी वस्तुओं, जिनमें उनके कुछ अन्य उत्पाद भी शामिल हैं, पर अतिरिक्त शुल्क नहीं लगेगा। यही बात एल्युमीनियम उत्पादों पर भी लागू होती है। सेडान, एसयूवी, क्रॉसओवर, मिनीवैन, कार्गो वैन और हल्के ट्रक जैसे यात्री वाहनों को भी उनके स्पेयर पार्ट्स सहित छूट दी गई है।  

भारत का डर और इजरायल की चिंता: पाक-सऊदी रक्षा गठबंधन की वजहें

रियाद सऊदी तेल का राजा है, लेकिन सुरक्षा के मामले में कमजोर। सालों से ईरान उसका सबसे बड़ा दुश्मन रहा। वहीं पाकिस्तान हर तरह से भारत के सामने बौना नजर आता है। दोनों ही मुस्लिम देश एक दूसरे को ढाल की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।  रियाद के यमामा पैलेस में एक ऐतिहासिक डील देखने को मिली। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने गले मिलकर 'स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट' (एसएमडीए) पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता साफ कहता है: एक देश पर मतलब दोनों पर हमला। लेकिन यह सिर्फ कागजों का खेल नहीं, बल्कि दो देशों की गहरी मजबूरी का नतीजा है। एक तरफ पाकिस्तान, जो परमाणु शक्ति होने के बावजूद भारत के सामने बेबस महसूस करता है। दूसरी तरफ सऊदी अरब है, जो ईरान की पुरानी दुश्मनी से जूझता था, लेकिन अब इजरायल को सबसे बड़ा खतरा मानने लगा है। खाड़ी के देशों के लिए यह समझौता एक नई ढाल कहा जा रहा है, जो अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर सवाल उठाने के बाद आई। आइए, विस्तार से समझते हैं कि यह समझौता क्यों हुआ, कैसे हुआ, और इसके पीछे की सच्ची कहानी क्या है। पाकिस्तान का भारत डर: परमाणु ताकत, लेकिन कन्वेंशनल कमजोरी पाकिस्तान दुनिया का छठा सबसे बड़ा परमाणु हथियार संपन्न देश है। उसके पास करीब 170 परमाणु हथियार हैं, जो किसी भी हमले का जवाब देने के लिए तैयार हैं। लेकिन कन्वेंशनल यानी पारंपरिक जंग में भारत के सामने यह बौना नजर आता है। ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स 2025 के मुताबिक, भारत की मिलिट्री रैंकिंग दुनिया में चौथी है, जबकि पाकिस्तान 12वीं पर खिसक गया है। सैनिकों की तुलना: भारत के पास 14.6 लाख एक्टिव सैनिक हैं, पाकिस्तान के सिर्फ 6.5 लाख। भारत के रिजर्व फोर्स 11.5 लाख हैं, पाकिस्तान के सिर्फ 5 लाख। हथियारों का फर्क: भारत के पास 4,200 से ज्यादा टैंक, 2,200 से ज्यादा लड़ाकू विमान और 290 से ज्यादा नौसैनिक जहाज हैं (जिनमें 2 एयरक्राफ्ट कैरियर शामिल)। पाकिस्तान के पास 2,600 टैंक, 1,400 विमान और महज 121 जहाज। बजट का अंतर: भारत का डिफेंस बजट 2025-26 के लिए 79 बिलियन डॉलर (करीब 6.8 लाख करोड़ रुपये) है, जो पाकिस्तान के 10 बिलियन डॉलर से 8 गुना ज्यादा। यह फर्क सिर्फ आंकड़ों में नहीं, जमीनी हकीकत में भी दिखा। मई में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाया। 7 मई को भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और पंजाब प्रांत सहित कई इलाकों में 9 ठिकानों पर मिसाइल हमले किए। सकड़ों आतंकी मारे गए। चार दिनों तक चली इस जंग में पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन फिर भारत ने अपनी ब्रह्मोस मिसाइल से पाकिस्तान के अनेकों एयरबेस उड़ा दिए। मजबूरन पाकिस्तान को 10 मई को सीजफायर की गुहार लगानी पड़ी। इस संघर्ष ने पाकिस्तान को एहसास दिलाया कि कन्वेंशनल ताकत में भारत से मुकाबला मुश्किल है। परमाणु हथियार आखिरी हथियार हैं, लेकिन परमाणु जंग शुरू होते ही सब कुछ तबाह हो सकता है। इसलिए पाकिस्तान को एक मजबूत दोस्त की जरूरत थी, जो भारत के खिलाफ बैलेंस बनाए। सऊदी अरब, जो पाकिस्तान को आर्थिक और मिलिट्री मदद देता रहा है, परफेक्ट चॉइस था। सऊदी का डर: ईरान से इजरायल तक, खतरा बढ़ा सऊदी अरब तेल का राजा है, लेकिन सुरक्षा के मामले में कमजोर। सालों से ईरान उसका सबसे बड़ा दुश्मन रहा। यहां एक बड़ी ही दिलचस्प बात ये है कि इजरायल और ईरान एक दूसरे के सबसे बड़े दुश्मन हैं। लेकिन दोनों की सऊदी अरब से नहीं बनती। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने 2019 में सऊदी के आरामको प्लांट पर ड्रोन हमला किया था। 2025 में भी इजरायल-ईरान से टेंशन बढ़ी। लेकिन असली टर्निंग पॉइंट आया 9 सितंबर 2025 को। कतर की राजधानी दोहा के लीक्तैफिया इलाके में इजरायली एयरस्ट्राइक हुई। हमला हमास के नेताओं पर था, जो कतर सरकार के रेसिडेंशियल कॉम्प्लेक्स में सीजफायर प्रपोजल पर मीटिंग कर रहे थे। हमले में 5 हमास मेंबर, 1 कतरी सिक्योरिटी ऑफिसर और नागरिक मारे गए। कतर ने इसे 'स्टेट टेररिज्म' कहा। अमेरिका ने कतर को मेजर नॉन-नाटो एली बनाया है और दोहा में उसका अल उदेद एयरबेस है जोकि मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा यूएस बेस। फिर भी, इजरायल ने हमला कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें पहले से खबर नहीं थी। यह हमला खाड़ी देशों के लिए बड़ा झटका था। कतर ने इजरायल को अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ने का दोषी ठहराया। 15 सितंबर को दोहा में अरब-इस्लामिक समिट हुई, जहां सऊदी क्राउन प्रिंस समेत कई लीडर्स ने इजरायल की निंदा की। लेकिन कोई ठोस एक्शन नहीं हुआ। सऊदी को लगा कि अमेरिकी सुरक्षा गारंटी भरोसेमंद नहीं रही। ईरान पुराना खतरा था, लेकिन अब इजरायल ने जगह ले ली। चैथम हाउस के डायरेक्टर सनम वकील कहते हैं, "गल्फ स्टेट्स अब इजरायल को सबसे बड़ा सिक्योरिटी थ्रेट मानते हैं।" इजरायल के हमले ने अरब देशों को भड़का दिया यह समझौता इजरायल के प्रति एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इजरायल को मध्य पूर्व का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश माना जाता है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजरायल पर हमले के बाद से इजरायल ने ईरान, लेबनान, फिलिस्तीनी क्षेत्रों, कतर, सीरिया और यमन में व्यापक सैन्य कार्रवाई की है। इस महीने की शुरुआत में कतर पर इजरायल के हमले ने अरब देशों को भड़का दिया। एक वरिष्ठ सऊदी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया, "यह समझौता किसी विशिष्ट देश या घटना के जवाब में नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे गहरे सहयोग को संस्थागत रूप देने का कदम है।" हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्रीय तनावों के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताओं को दर्शाता है।  

भारत में पहुंची ‘समुद्र की रानी’ from बांग्लादेश, लोग उत्साहित, दुकानदार हैं टेंशन में

कोलकाता  दुर्गा पूजा से पहले बांग्लादेश से हिल्सा मछली, जिसे समुद्र की रानी भी कहा जाता है, की पहली खेप भारत-बांग्लादेश सीमा पर पहुंच चुकी है। आठ ट्रकों में करीब 32 टन मछली भारत आई है। बांग्लादेश ने हाल ही में त्योहारों को ध्यान में रखते हुए 1200 टन हिल्सा मछली के निर्यात को मंजूरी दी थी। यह आपूर्ति 16 सितंबर से 5 अक्टूबर के बीच होगी। प्रत्येक ट्रक में पद्मा नदी की लगभग चार टन मछलियां लदी हैं। मछली आयातक संघ के सचिव सैयद अनवर मकसूद ने बताया कि यह खेप थोक बाजारों में पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि एक किलो 'पद्मा हिल्सा' की कीमत ग्राहकों के लिए लगभग 1800 रुपये होगी। मकसूद ने आगे कहा कि अब लगभग हर दिन बांग्लादेश से मछलियां कोलकाता के बाजारों में आएंगी। खुदरा विक्रेताओं में तनाव इस कीमती खेप ने मछली प्रेमियों और व्यापारियों में उत्साह पैदा किया है, खासकर पद्मा नदी की हिल्सा के अनोखे स्वाद के कारण। हालांकि, ऊंची कीमतों के चलते खुदरा विक्रेता चिंतित हैं। सुबह-सुबह नीलामी के लिए जुटे खुदरा विक्रेताओं ने ऊंची दरों पर चिंता जताई। एक स्थानीय विक्रेता ने कहा कि मछली की गुणवत्ता शानदार है, लेकिन इसकी कीमत इतनी अधिक है कि इससे ज्यादा मुनाफा कमाने की उम्मीद नहीं है। अगर लोग इतनी ऊंची कीमत पर मछली खरीदेंगे, तभी हम कुछ लाभ कमा पाएंगे। खुदरा बाजार में कीमतों के और बढ़ने की संभावना है, और अनुमान है कि कीमत 2000 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक हो सकती है। इन मछलियों का आकार 800 ग्राम से 1 किलोग्राम तक बताया जा रहा है। एक अन्य विक्रेता ने स्थानीय मछलियों से प्रतिस्पर्धा का जिक्र करते हुए कहा कि पहले कुछ लोगों ने गुजरात से हिल्सा मंगवाई थी। दोनों का स्वाद अलग है, और बांग्लादेशी मछली की मांग हमेशा ज्यादा रहती है, लेकिन इस बार कीमत बहुत अधिक है। क्या बोले अधिकारी? अधिकारियों ने बताया कि बांग्लादेश सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि मछली की यह खेप उसकी निर्यात नीति 2024–27 के तहत होनी चाहिए, जिसमें न्यूनतम निर्यात मूल्य 12.5 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम निर्धारित है। इस मंजूरी की वैधता 16 सितंबर से 5 अक्टूबर तक है।  

भगवान विष्णु पर बयान को लेकर CJI गवई ने जताई सफाई, VHP ने की संयम की अपील

नई दिल्ली  खजुराहो के प्रसिद्ध जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की मरम्मत करने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस बीआर गवई ने एक टिप्पणी कर दी थी। इसको लेकर सोशल मीडिया पर जमकर बवाल हो रहा था। यही नहीं विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन ने भी चीफ जस्टिस को नसीहत दी थी कि वाणी पर संयम रखना चाहिए। अब इस मामले में खुद चीफ जस्टिस बीआर गवई का बयान आया है और उन्होंने सफाई दी है। उन्होंने कहा कि मेरे बयान को सोशल मीडिया पर गलत ढंग से पेश किया गया। उन्होंने कहा कि किसी ने मुझे अगले दिन बताया कि मेरी टिप्पणी को सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है। मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूं। चीफ जस्टिस ने यह टिप्पणी किसी मामले की सुनवाई के दौरान की। वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मैं चीफ जस्टिस बीआर गवई को बीते 10 सालों से जानता हूं। वह हर धार्मिक स्थल जाते हैं और सभी का आदर करते हैं। मेहता ने कहा कि यह एक गंभीर मसला है। उन्होंने कहा कि हमने न्यूटन का लॉ पढ़ा है कि हर ऐक्शन का रिएक्शन होता है। लेकिन आज तो हर ऐक्शन पर सोशल मीडिया में गलत रिएक्शन होता है। उन्होंने कहा कि चीफ जस्टिस तो अकसर सभी धर्मों के स्थलों पर जाते हैं। वह सभी का आदर करते हैं। वहीं कपिल सिब्बल भी इस दौरान मौजूद थे। उन्होंने कहा कि ऐसी चीजों का सामना तो हम हर दिन करते हैं। इस तरह किसी को बदनाम नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि नेपाल में भी ऐसी ही चीजें हुई थीं। बता दें कि मूर्ति की मरम्मत की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने याची को झिड़कते हुए कहा था कि आपकी अर्जी जनहित याचिका नहीं है बल्कि प्रचार याचिका है। उन्होंने कहा था कि यदि आप भगवान विष्णु के इतने कट्टर भक्त हैं तो फिर उन्हीं से प्रार्थना कीजिए। उनकी टिप्पणी का यह हिस्सा सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा था और लोग उनकी आलोचना कर रहे थे। क्या कहा था चीफ जस्टिस ने, जिस पर मचा इतना बवाल इसी को लेकर विश्व हिंदू परिषद का भी गुरुवार को बयान आया। संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने चीफ जस्टिस के नाम एक लेटर लिखा था। उन्होंने लिखा था, 'परसों सर्वोच्च न्यायालय में खजुराहो के प्रसिद्ध जावरी मंदिर में स्थित भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की मरम्मत के लिए याचिका की सुनवाई थी। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक टिप्पणी की, मूर्ति की मरम्मत के लिए भगवान से ही प्रार्थना कीजिए। आप कहते हैं कि आप भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं, तो अब उन्हीं से प्रार्थना कीजिए। न्यायालय न्याय का मंदिर है। भारतीय समाज की न्यायालयों में श्रद्धा और विश्वास है। हम सब का कर्तव्य है कि यह विश्वास ना सिर्फ बना रहे वरन् और मजबूत हो।' VHP बोली- जजों को भी रखना होगा वाणी पर संयम इसके आगे नसीहत देते हुए विश्व हिंदू परिषद ने कहा, 'हम सब का यह भी कर्तव्य है कि अपनी वाणी में संयम रखें। विशेष तौर पर न्यायालय के अंदर। यह जिम्मेवारी मुकदमा लड़ने वालों की है, वकीलों की है और उतनी ही न्यायाधीशों की भी है। हमको लगता है कि मुख्य न्यायाधीश की मौखिक टिप्पणी ने हिन्दू धर्म की आस्थाओं का उपहास उड़ाया गया है। अच्छा होगा अगर इस तरह की टिप्पणी करने से बचा जाए।'