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आधार कार्ड में होगा बड़ा बदलाव, नया डिजाइन और नाम, पता, DOB नहीं दिखेंगे?

 नई दिल्ली आधार कार्ड में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा, जिसका दावा मीडिया रिपोर्ट्स में किया गया है. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) की तरफ से जारी होने वाले फिजिकल/प्रिंटेड आधार कार्ड पर सभी डिटेल्स प्रिंट होती हैं।   रिपोर्ट में बताया है कि सेफ्टी के मद्देनजर आधार कार्ड में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. ये बदलाव आधार कार्ड के मिसयूज को रोकेगे और साइबर ठगों से आधार कार्ड को बचाएगा।  रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले दिनों में फिजिकल आधार कार्ड की कॉपी पर फोटो और एक क्विक रिस्पोंस कोड (क्यूआर कोड) होगा. क्यूआर कोड से डिटेल्स पाने के लिए उसको स्कैन करना होगा. इस दौरान यूजर्स तय कर पाएंगे कि वह कौन सी डिटेल्स छिपाना चाहते हैं और किस डिटेल्स को रिवील करना चाहते हैं।  आधार कार्ड पर प्रिंट होती हैं ये डिटेल्स  UIDAI की तरफ से जारी आधार कार्ड पर नाम, फोटो, डेट ऑफ बर्थ, जेंडर, घर का पता और पिता का नाम तक होता है. ऐसे में अगर किसी ठग तक आधार कार्ड की फोटो कॉपी तक पहुंच जाती है, जिसके बाद वह आसानी से एक अनजान शख्स की कई डिटेल्स को जान लेता है।  ये बदलाव आने वाले दिनों में लागू होगा. रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. इसको लेकर और भी डिटेल्स आने वाले दिनों में शेयर की जाएंगी. हालांकि UIDAI की तरफ से अभी इसको लेकर कोई ऑफिशियल जानकारी शेयर नहीं की है।  UIDAI जारी कर चुका है न्यू आधार ऐप  कुछ सप्ताह पहले ही आधार ऐप का फुल वर्जन जारी कर चुका है. आधार ऐप की मदद से कुछ डिटेल्स को हाइड करके उसको PDF या इमेज फॉर्मेट में शेयर कर सकते हैं. न्यू आधारो ऐप एंड्रॉयड और आईओएस पर मौजूद है।  आधार कार्ड क्या होता है?  भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण असल में 12 नंबर का यूनिक डिजिट जनरेट करती है. हर एक आधार कार्ड होल्डर के लिए अलग संख्या होती है. ये नंबर भारतीय नागरिकों को उनकी बायोमेट्रिक, नाम, पता और डेट ऑफ बर्थ के आधार पर दिया जाता है। 

हॉर्मुज बंद, फिर भी UAE और सऊदी से भारत में आयी भारी मात्रा में तेल, जानिए चौंकाने वाले आंकड़े

 नई दिल्‍ली अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का रास्‍ता पूरी तरह से ब्‍लॉक है. अमेरिका का दावा है कि इस रास्‍ते से कोई तेल की जहाज नहीं गुजर रही है, क्‍योंकि उसकी सेना ने पूरी तरह से नाकाबंदी कर दी है. इतना ही नहीं अमेरिका ने वहां से गुजरने वाले जहाजों को देखते ही उड़ाने का भी आदेश दिया है।  यह वह रास्‍ता है, जहां से भारत और चीन जैसे देश मिडिल ईस्‍ट से भारी मात्रा में तेल का आयात करते हैं. इस बीच, एक ऐसा आंकड़ा सामने आया है, जो आपको भी हैरान कर देगा. दरअसल, मार्च की तुलान में भारत के तेल आयात का डाटा जारी हुआ है, जिसके मुत‍ाबिक भारत ने होर्मुज बंद रहने के बाद भी मिडिल ईस्‍ट के देशों से खूब तेल का आयात किया है. हालांकि, रूसी तेल खरीद में छूट मिलने के बाद भी कमी देखी गई है।  रूसी तेल का आयात गिरा  कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात अप्रैल में मार्च की रिकॉर्ड खरीद की तुलना में 21 प्रतिशत गिर गया. अप्रैल में हरदिन 1.56 मिलियन बैरल (एमबीडी) तेल का आयात यूक्रेन में हड़ताल के बाद एक प्रमुख रूसी टर्मिनल पर लोडिंग में आई बाधाओं से प्रभावित हुआ. यह मार्च की तुलना में भारी गिरावट है , जब भारत का आयात 1.98 मिलियन बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्‍तर पर था।  भारत के किस कंपनी ने कितना तेल मंगाया?  इंडियन ऑयल ने हर दिन 677,000 बैरल तेल खरीदा और नंबर वन पर है. इसकी खरीद मार्च की तुलना में 14 फीसदी ज्‍यादा है. रिलायंस इंडस्ट्रीज 235,000 बैरल प्रतिदिन तेल खरीदकर दूसरे स्थान पर है. भारत पेट्रोलियम ने प्रतिदिन 176,000 बैरल तेल आयात किया, जो मार्च से 38 प्रतिशत कम है।  नाकाबंदी के बाद भी बढ़ी तेल खरीद  ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण मार्ग होर्मुज की नाकाबंदी के बावजूद, अप्रैल में पश्चिम एशियाई देशों से भारत में तेल की आपूर्ति में सुधार देखने को मिला है. सऊदी अरब से हरदिन 704,000 बैरल तेल का आयात हुआ, जो मार्च की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से आयात में 191 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह बढ़कर हरदिन 591,000 बैरल पहुंच गया।  नाकाबंदी के बाद भी कैसे भारत आया तेल?  तेल को सऊदी अरब की यानबू और यूएई की फुजैराह पाइपलाइनों के माध्यम से भेजा गया था, जो होमुज को बाईपास करती हैं और वैश्विक ऊर्जा आयात के लिए महत्वपूर्ण मार्गों के तौर पर उभर रही है. वेस्‍ट एशिया में चल रहे जंग के बीच, भारत ने वेनेजुएला, ईरान, ब्राजील और नाइजीरिया से भी तेल का आयात बढ़ाया है।  ईरान से इतना हुआ तेल का आयात  सात साल के अंतराल के बाद, भारत ने अप्रैल में ईरान से तेल की खरीद फिर से शुरू की और प्रतिदिन 137,000 बैरल तेल का आयात किया, जब अमेरिका ने प्रतिबंधों में 30 दिनों की छूट की घोषणा की. भारत ईरान से कच्चे तेल का एक प्रमुख खरीदार रहा है. 2018 में अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों को कड़ा करने के बाद, मई 2019 से आयात बंद हो गया, और इसकी जगह पश्चिम एशियाई, अमेरिकी और अन्य ग्रेड के माल ने ले ली. करीब एक साल के अंतराल के बाद, इस महीने वेनेजुएला से तेल का आयात 298,000 बैरल प्रति दिन रहा।  इन सभी आयातों के बीच, कुल आयात में कमी देखने को मिली है. ईरान युद्ध के बाद होर्मुज की नाकाबंदी के चलते, भारत का कच्चे तेल का आयात अप्रैल में घटकर 4.3 मिलियन बैरल हर दिन हो गया, जो पिछले महीने के 4.4 मिलियन बैरल से कम है, यह जानकारी केप्लर के आंकड़ों से मिलती है। 

ड्रैगन की नई चाल! J-35AE फाइटर पाकिस्तान को बेचने की तैयारी, भारत के लिए खतरे की घंटी

नई दिल्ली   चीन ने अपने नए स्टेल्थ फाइटर जेट J-35AE का वीडियो जारी किया है. यह 2 मई को स्टेट ब्रॉडकास्टर CCTV पर दिखाया गया. J-35AE चीन के एडवांस्ड ट्विन-इंजन स्टेल्थ फाइटर का एक्सपोर्ट वर्जन है. इसमें ब्लेंडेड-विंग डिजाइन है, जो इसे दुश्मन के रडार से छिपाने में मदद करता है. यह मल्टीरोल फाइटर है, यानी हवा में लड़ाई, जमीन पर हमला और अन्य कई काम कर सकता है. चीन इसे 2026 की बड़ी उपलब्धि बता रहा है. J-35AE दो इंजन वाला स्टेल्थ फाइटर है. इसका डिजाइन बहुत आधुनिक है. ब्लेंडेड-विंग बॉडी की वजह से यह रडार पर कम दिखता है. यह हवाई जहाज दुश्मन क्षेत्र में घुसकर हमला कर सकता है. वापस सुरक्षित लौट सकता है. चीन का दावा है कि यह अपनी क्लास में बेहतरीन परफॉर्मेंस देगा. यह जेट न सिर्फ हवा में दूसरे विमानों से लड़ सकता है बल्कि जमीन के टारगेट को भी सटीक हमले से नष्ट कर सकता है.   पाकिस्तान को बिक्री की खबर क्यों गरमाई? वीडियो जारी होने के बाद खबरें तेज हो गई हैं कि चीन पाकिस्तान को 30 से 40 J-35AE जेट बेच सकता है. डिलीवरी मिड-2026 में शुरू हो सकती है. पाकिस्तान पहले ही चीन से J-10C फाइटर खरीद चुका है. उसके पायलट ट्रेनिंग भी कर रहे हैं. दोनों देशों के बीच डिफेंस पार्टनरशिप मजबूत है. अगर यह डील हुई तो पाकिस्तान की एयर फोर्स बहुत मजबूत हो जाएगी. J-35AE जैसा स्टेल्थ फाइटर भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.   कई एक्सपर्ट सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं. @RupprechtDeino जैसे एनालिस्ट कहते हैं कि अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. सिर्फ वीडियो और अफवाहों के आधार पर पूरी डील मान लेना सही नहीं है. चीन हथियारों का बड़ा निर्यातक बन रहा है, लेकिन हर खबर को तुरंत सच नहीं मानना चाहिए. इसी बीच इंडोनेशिया को J-10C बेचने की एक खबर को जल्दी ही गलत साबित कर दिया गया था.   चीन के हथियार निर्यात में बढ़ोतरी चीन अब दुनिया में हथियार बेचने में तेजी दिखा रहा है. J-35AE का एक्सपोर्ट वर्जन जारी करना इसी रणनीति का हिस्सा लगता है. इससे चीन न सिर्फ पैसे कमा रहा है बल्कि अपने सहयोगी देशों की सैन्य ताकत भी बढ़ा रहा है. पाकिस्तान के साथ यह डील अगर हुई तो दक्षिण एशिया में हथियारों की दौड़ और तेज हो सकती है.   भारत के लिए क्या मतलब? अगर पाकिस्तान को J-35AE मिल गए तो भारत की वायुसेना को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. स्टेल्थ टेक्नोलॉजी वाले जेट रडार से बचकर अचानक हमला कर सकते हैं. भारत को भी अपनी स्टेल्थ और एडवांस्ड फाइटर क्षमता बढ़ाने पर और ध्यान देना होगा. J-35AE का वीडियो चीन की बढ़ती हवाई ताकत और एक्सपोर्ट महत्वाकांक्षा को दिखाता है. पाकिस्तान को संभावित बिक्री की खबरें अभी अनौपचारिक हैं, लेकिन अगर सच्ची हुईं तो क्षेत्रीय सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ेगा. फिलहाल सभी को आधिकारिक घोषणा का इंतजार है.

2 पुरुषों से गर्भवती हुई महिला, जुड़वां बच्चे पैदा, डॉक्टर भी हैरान

कोलंबिया आज के समय में कई ऐसे कपल्स हैं जिनके जुड़वां बच्चे हैं. आमतौर पर जुड़वां बच्चों का पिता एक ही होता है लेकिन हाल ही में आए एक मामले ने मेडिकल साइंस को भी हैरत में डाल दिया है.  दरअसल, कोलंबिया एक मां ने 2 बच्चं को जन्म दिया था जो जुड़वां थे. लेकिन जब उसने डीएनए टेस्ट कराया तो सामने आया कि दोनों के पिता अलग-अलग हैं. दुनिया भर में अभी तक ऐसे सिर्फ 20 मामले ही सामने आए हैं।  डॉक्टर्स के मुताबिक इसे  'हेटेरोपैटर्नल सुपरफेकंडेशन' की स्थिति कहते हैं जो काफी दुर्लभ है जिसमें एक महिला की कोख से जन्मे 2 बच्चों के पिता के डीएनए अलग-अलग होते हैं. आखिर ये पूरा मामला क्या है, एक ही समय पर एक महिला 2 अलग-अलग पुरुषों से कैसे प्रेगनेंट हो सकती है, इस बारे में जान लीजिए।  क्या है 'सुपरफेकंडेशन' का पूरा मामला? मेडिकल साइंस की भाषा में इस स्थिति को हेटेरोपैटर्नल सुपरफेकंडेशन कहा जाता है. आमतौर पर एक महिला के ओव्यूलेशन पीरियड के दौरान एक ही एग्स रिलीज होता है लेकिन कभी-कभी शरीर 2 अंडे रिलीज कर देता है. अगर महिला बेहद कम समय के गैप में 2 अलग-अलग पुरुषों के साथ रिलेशन बना लेती है तो दोनों अंडे अलग-अलग स्पर्म से फर्टिलाइज हो सकते हैं. कोलंबिया की नेशनल यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने दावा किया है कि यह मामला 100 प्रतिशत सही है।  डॉक्टरों और रिसर्च का क्या कहना है? एक्सपर्ट का मानना है कि यह स्थिति जितनी हैरान करने वाली है, उतनी ही दुर्लभ भी है. जेनेटिक्स एक्सपर्ट्स और डॉक्टरों के अनुसार, स्पर्म महिला के शरीर में कई दिनों तक जीवित रह सकते हैं. कोलंबिया के नेशनल यूनिवर्सिटी में 'लेबोरेटरी ऑफ पॉपुलेशन जेनेटिक्स एंड आइडेंटिफिकेशन' के रिसचर्स ने बताया कि पिता को बच्चों के पितृत्व पर संदेह था जिसके बाद डीएनए जांच कराई गई. रिपोर्ट में पाया गया कि बच्चों के 'Y' क्रोमोसोम अलग-अलग पिताओं से मैच कर रहे थे जिसने इस दुर्लभ मेडिकल कंडीशन को पक्का कर दिया। 

गैस सिलेंडर की कीमत में वृद्धि का खतरा, सरकारी सब्सिडी पर असर की संभावना, रिपोर्ट ने किया चिंता का इज़ाफा

नई दिल्ली  पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का असर अब सीधे भारत के आम लोगों और कंपनियों की जेब पर दिखने लगा है। रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, अगर मौजूदा हालात ऐसे ही बने रहते हैं, तो वित्त वर्ष 2027 तक एलपीजी (LPG) पर होने वाला अंडर-रिकवरी यानी घाटा करीब ₹80,000 करोड़ तक पहुंच सकता है। अंडर-रिकवरी का मतलब होता है कि तेल कंपनियां गैस सिलेंडर को जिस कीमत पर बेच रही हैं, वह उसकी वास्तविक लागत से कम है और यह अंतर उन्हें खुद वहन करना पड़ता है। इसका सीधा असर तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की कमाई और मुनाफे पर पड़ रहा है। दरअसल, कच्चे तेल की कीमतें वैश्विक स्तर पर काफी ऊंची बनी हुई हैं, जबकि भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखा गया है। इससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ गया है। अनुमान है कि अगर कच्चा तेल 120-125 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो पेट्रोल पर करीब ₹14 प्रति लीटर और डीजल पर ₹18 प्रति लीटर तक का नुकसान हो सकता है। इसके अलावा पश्चिम एशिया से एलपीजी की सप्लाई में आई बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं। हालांकि, भारत ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से एलपीजी आयात बढ़ाकर सप्लाई को कुछ हद तक संतुलित किया है, लेकिन फिर भी कंपनियों का घाटा कम नहीं हो पा रहा है। इसका असर केवल गैस सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि खाद (फर्टिलाइजर), केमिकल और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन जैसे कई सेक्टर भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। खासकर उर्वरक उद्योग में अमोनिया और सल्फर जैसे कच्चे माल की कीमतें बढ़ने से उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है। इसी वजह से सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ने की संभावना है। ICRA का अनुमान है कि FY2027 में फर्टिलाइजर सब्सिडी ₹2.05 लाख करोड़ से ₹2.25 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है, जो मौजूदा बजट से काफी ज्यादा है। वहीं, केमिकल और पॉलिमर सेक्टर में भी लागत बढ़ने से कंपनियों के मार्जिन पर दबाव रहेगा, हालांकि कुछ स्पेशलिटी केमिकल कंपनियां अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकती हैं। बढ़ती ऊर्जा कीमतें और सप्लाई में अनिश्चितता आने वाले समय में कई सेक्टर्स की कमाई पर असर डाल सकती हैं। हालांकि, सरकार और कंपनियां स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो इसका असर आम उपभोक्ता तक भी पहुंच सकता है।

भारत के लिए बड़ा मौका: UAE के फैसले से रुपये में मिलेगा तेल, डॉलर की जरूरत नहीं

नई दिल्ली  संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा UAE के OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) से बाहर निकलने की खबर को वैश्विक तेल बाजार में एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इसे UAE का ‘मास्टरस्ट्रोक’ कहा जा रहा है, क्योंकि इससे वह अपनी तेल उत्पादन नीति पर अधिक स्वतंत्रता पा सकता है। लेकिन, इस फैसले का सबसे दिलचस्प असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर पड़ सकता है। आइए जरा विस्तार से समझते हैं कि इसका भारत को कितना लाभ मिलेगा? अब तक OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) के सदस्य देशों को उत्पादन कोटा और कीमतों को लेकर संगठन के नियमों का पालन करना पड़ता था। UAE के बाहर आने के बाद वह अपनी शर्तों पर उत्पादन बढ़ा सकता है और नए व्यापारिक समझौते कर सकता है। यही वह प्वाइंट है, जहां भारत के लिए एक बड़ा अवसर बनता दिख रहा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर डॉलर आधारित भुगतान का भारी दबाव रहता है। अगर UAE भारत के साथ रुपये में तेल व्यापार करने के लिए सहमत होता है, तो यह भारत के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं होगा। इससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) मजबूत होगा और डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है। रुपये में तेल खरीदने का मतलब है कि भारत को हर बार डॉलर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे रुपया स्थिर रह सकता है। साथ ही यह कदम भारत और UAE के बीच व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करेगा। दोनों देशों के बीच पहले से ही मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं और यह पहल उन्हें नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है। हालांकि, इस बदलाव के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। वैश्विक तेल बाजार बेहद संवेदनशील होता है और OPEC से बाहर निकलने के बाद UAE को कीमतों और मांग के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा रुपये में व्यापार को बड़े स्तर पर लागू करना भी आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए वित्तीय ढांचे और भरोसेमंद सिस्टम की जरूरत होती है। फिर भी अगर यह रणनीति सफल होती है, तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए भी एक नया मॉडल बन सकती है। कुल मिलाकर UAE का यह कदम आने वाले समय में तेल की राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों को नई दिशा दे सकता है, जिसमें भारत एक बड़ा लाभार्थी बनकर उभर सकता है।

चीन की इकोनॉमी पर सवाल: डिग्रीधारी कचरा उठा रहे, डॉक्टर दे रहे खाना… दुनिया क्यों है डरी?

बीजिंग  चीन का आर्थिक सपना अब एक बुरे सपने में ढलता नजर आ रहा है. वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) ने पहले ही 'व्हाइट कॉलर' नौकरियों के खतरे की चेतावनी दी थी, उसकी पुष्टि अब खुद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े फैसले ने कर दी है. एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार चीन सरकार ने हाल ही में 20 करोड़ 'गिग वर्कर्स' के लिए नए लेबर नियम जारी किए हैं, जिससे साफ है कि वहां पारंपरिक नौकरियां अब इतिहास बन रही हैं।  'डू-एनीथ‍िंग' इकोनॉमी: पढ़ाई डिग्री की, काम कचरा उठाने का! चीन के सबसे बड़े प्लेटफॉर्म 'Xianyu' पर एक हैरान करने वाला ट्रेंड दिख रहा है. इसे 'डू-एनीथिंग' (कुछ भी करो) इकोनॉमी कहा जा रहा है. यहां युवा अपनी डिग्रियों को किनारे रखकर ऐसे काम कर रहे हैं जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।  मसलन देर रात तक लोगों से बातें करना ताकि उनके 'धोखेबाज' पार्टनर को पकड़ा जा सके. इसके अलावा दूसरों के कुत्ते टहलाना और घर का कचरा बाहर फेंकना. बच्चों को स्कूल से लाना और लोगों की 'स्टडी हैबिट्स' पर निगरानी रखना।  जब डॉक्टर बने डिलीवरी बॉय…  यह संकट अब केवल युवाओं तक सीमित नहीं है. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) और सोशल मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के सम्मानित डॉक्टर और प्रोफेशनल्स की आय में 30 से 40 प्रतिशत की भारी कटौती हुई है।  होम लोन (Mortgage) की किस्त चुकाने और परिवार पालने के लिए अब डॉक्टर्स अपनी शिफ्ट के बाद खाना डिलीवरी करने को मजबूर हैं. जो 'व्हाइट कॉलर' नौकरियां कभी चीन की आर्थिक ताकत थीं, अब वहां बोनस में देरी और सैलरी कट एक सामान्य बात हो गई है।  क्यों मजबूर हुई चीन सरकार? चीन की शहरी वर्कफोर्स का करीब 40 प्रतिशत (20 करोड़ से ज्यादा लोग) अब फूड डिलीवरी और राइड-हेलिंग जैसे अस्थायी कामों में लगा है. चीन की टॉप लीडरशिप को डर है कि अगर इन लोगों को सुरक्षा नहीं दी गई, तो देश में बड़ा सामाजिक विद्रोह हो सकता है।  क्या भारत के लिए है चेतावनी? विशेषज्ञ मान रहे हैं कि चीन का यह हाल वैश्विक 'व्हाइट कॉलर' नौकरियों के अंत की शुरुआत हो सकता है. भारत जैसे देशों के लिए यह सबक है कि स्किल्स को समय रहते न बदला गया, तो डिग्री सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगी। 

नंदीग्राम के बाद भवानीपुर में भी झटका, शुभेंदु अधिकारी की बड़ी जीत

 पश्चिम बंगाल   पश्चिम बंगाल और असम समेत पांच राज्यों में नतीजों की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। बंगाल में बीजेपी 200 से ज्यादा सीटें जीतती दिख रही है। असम में भी BJP की आंधी आई है और पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल रहा है। तमिलनाडु में इस बार खेल ही बदल गया। एक्टर विजय की टीवीके बहुमत के करीब पहुंच गई है। इधर केरल में कांग्रेस गठबंधन ने जीत का दावा कर दिया है। पुडुचेरी में फिर से एनडीए की सरकार रिपीट होती नजर आ रही है। भाजपा के शानदार प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई दिल्ली में पार्टी मुख्यालय में पार्टी समर्थकों को संबोधित कर रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा, 'पिछले साल 14 नवंबर को जब बिहार चुनाव के नतीजे आए थे, तब मैंने यहीं इसी जगह से आप सबको कहा था गंगा जी बिहार से आगे बहते हुए गंगासागर तक जाती हैं। आज बंगाल की जीत के साथ गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक कमल ही कमल खिला हुआ है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और अब पश्चिम बंगाल। आज मां गंगा के ईर्द-गिर्द बसे इन राज्यों में भाजपा, NDA सरकार है।' पश्चिम बंगाल में संवेदनशील माहौल देखते हुए मतगणना केंद्रों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। बंगाल में एक तरफ जश्न मनाया जा रहा है तो दूसरी तरफ, आसनसोल, बैरकपोर और बाकुरा में टीएमसी और बीजेपी कार्यकर्ताओं में झड़प के मामले सामने आ रहे हैं। बंगाल में संभावित चुनावी हिंसा को देखते हुए ही केंद्रीय बलों को तैनात किया गया है। इस बार तमिलनाडु, केरल और पुडुच्चेरी में भी जमकर मतदान हुआ था। असम, केरल, पुडुचेरी और तमिलनाडु के चुनाव परिणाम असम में लगातार तीसरी बार बीजेपी हैट्रिक लगा रही है। राज्य की 126 विधानसभा सीट से 722 उम्मीदवारों के चुनावी भाग्य को समेटे हुए इईवीएम, 35 जिलों के 40 मतगणना केंद्रों पर खोली गईं। राज्य में मतदान 9 अप्रैल को हुआ था, जिसमें 85.96 प्रतिशत मतदान हुआ था। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ DMK एक बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में चुनाव लड़ रही थी, जहां उसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी AIADMK के अलावा, अभिनेता और नेता विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) और सीमान की एनटीके जैसी नई पार्टियां भी मैदान में थीं। डीएमके राज्य में लगातार दूसरी बार सत्ता में आने की उम्मीद कर रही थी लेकिन टीवीके ने उसे झटका दे दिया है। केरल यूडीएफ और पुडुचेरी में एनडीए अच्छी बढ़त बनाए हुए है।

केरल में सत्ता बदलाव के संकेत, पिनराई विजयन पर जनमत-संग्रह जैसा बना चुनाव

केरलम केरलम विधानसभा चुनावों के नतीजों की तस्वीर तो ऐसे बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा कर रही है, जैसे मौसम विभाग हर बारिश में भारी तूफान की चेतावनी दे देता है और फिर बूंदाबांदी भी ठीक से नहीं होती. यहां इस बार का चुनाव ऐसा रहा मानो किसी ने “विकास बनाम मूड स्विंग” का लाइव टेस्ट रख दिया हो. एक तरफ सरकार थी, जो लगातार बता रही थी कि सड़कें बन गईं, योजनाएं चल रही हैं और सब कुछ बढ़िया है. दूसरी तरफ जनता थी जो कह रही थी, “ठीक है, पर अब थोड़ा बदलाव भी देख लेते हैं.” पूरा चुनाव धीरे-धीरे उम्मीदवारों और सीटों की लड़ाई से ज्यादा मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के “फैक्टर” का एग्जाम बन गया. हर सीट पर उनका नाम ऐसा गूंजा कि कई उम्मीदवारों की अपनी पहचान भी “ब्रांड विजयन” के नीचे दब सी गई. नतीजा ये कि कहीं वोट विकास के लिए पड़े, कहीं नाराज़गी के लिए, और कई जगह तो बस “अब बस भी करो” वाले मूड में. एलडीएफ को भरोसा था कि जनता खुश है, लेकिन मतदाताओं ने अपने अंदाज़ में बता दिया कि खुशी और वोट हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते. सत्ता-विरोधी लहर ऐसी चली कि योजनाओं की लिस्ट और भाषणों की लंबाई भी उसे रोक नहीं पाई. कुल मिलाकर, ये चुनाव कम और एक तरह का राजनीतिक रियलिटी टेस्ट ज्यादा लग रहा था जहां जनता ने शांत तरीके से बता दिया कि “काम हुआ होगा, लेकिन अब किरदार बदलना चाहिए.” विजयन फैक्टर के खिलाफ वोट सीपीआई(एम) को सबसे बड़ा झटका मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के “फैक्टर” से लगा माना जा रहा है. वो ही एलडीएफ के प्रचार का मुख्य चेहरा थे, जिससे चुनाव एक तरह से उनके नेतृत्व पर जनमत-संग्रह बन गया.140 में से सभी सीटों पर एलडीएफ ने विजयन को केंद्र में रखा, जिससे उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि पीछे रह गई. कई जगह मजबूत और साफ-सुथरी छवि वाले उम्मीदवार भी विजयन के नाम से बने नकारात्मक माहौल का शिकार हुए. मतदाताओं ने उम्मीदवार की बजाय मुख्यमंत्री के प्रति समर्थन या विरोध के आधार पर वोट किया. सत्ता-विरोधी लहर नतीजे यह संकेत देते हैं कि मतदाताओं ने एलडीएफ के इस दावे को खारिज कर दिया कि सरकार के खिलाफ कोई खास नाराजगी नहीं है. दिसंबर के स्थानीय निकाय चुनावों में मिले झटकों के बावजूद पार्टी यह मानती रही कि जनता के बीच व्यापक असंतोष नहीं है. हालांकि, वेलफेयर योजनाओं, मेगा प्रोजेक्ट्स और वित्तीय सहायता कार्यक्रमों के बावजूद मतदाताओं में एक तरह की थकान और बदलाव की इच्छा स्पष्ट रूप से दिखाई दी. केरलम में ऐतिहासिक रूप से सत्ता परिवर्तन की प्रवृत्ति रही है, और 2021 का चुनाव इसका एक अपवाद माना जाता है. अब एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद, इस बार बदलाव की भावना पहले से कहीं अधिक मजबूत होती दिख रही है. अल्पसंख्यक वोटों का झुकाव मुस्लिम वोटों का कांग्रेस की ओर एकजुट होना निर्णायक माना जा रहा है. 2014 के बाद से लोकसभा चुनावों में यह प्रवृत्ति लगातार दिखी है कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस को अधिक मजबूत विकल्प मानते हैं. इस बार भी यह रुझान जारी रहा. यह धारणा भी असर डालती दिखी कि सीपीआई(एम) और बीजेपी के बीच कहीं न कहीं समझ है. वहीं हिंदू वोटों को साधने की कोशिश में पार्टी ने कुछ अल्पसंख्यक वर्गों को दूर कर दिया. मुस्लिम वोटों का कांग्रेस की ओर एकजुट होना इस बार भी एक अहम और निर्णायक फैक्टर माना जा रहा है. 2014 के बाद से लोकसभा चुनावों में यह रुझान लगातार दिखता रहा है कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस को अपेक्षाकृत मजबूत और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देखते हैं, और इस बार भी यह प्रवृत्ति जारी रही. वहीं राजनीतिक गलियारों में यह धारणा भी चर्चा में रही कि सीपीआई(एम) और बीजेपी के बीच कहीं न कहीं परोक्ष समझ या नरमी का माहौल है, जिसने भी वोटिंग पैटर्न को प्रभावित किया. दूसरी ओर, हिंदू वोटों को साधने की कोशिश में पार्टी की रणनीति कुछ जगह उलटी पड़ती दिखी, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय के एक हिस्से में दूरी और असहजता बढ़ी. लेफ्ट में असंतोष एलडीएफ के पारंपरिक गढ़ों, खासकर उत्तर केरल में हार और वोट शेयर में गिरावट से स्पष्ट है कि उसके कोर वोट बैंक में असंतोष बढ़ा है. पार्टी ने विकास और संगठन पर जोर दिया, लेकिन मतदाताओं में यह भावना बनी कि विचारधारा की जगह सत्ता बनाए रखना प्राथमिकता बन गया. इससे वामपंथी समर्थकों में नाराजगी बढ़ी. विकास की कहानी का असर नहीं सीपीआई(एम) ने सड़क, बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया, लेकिन यह वोटों में तब्दील नहीं हो सका. महंगाई, बेरोजगारी, किसान संकट और कई क्षेत्रों में जंगली जानवरों के हमलों जैसे मुद्दों ने सरकार के खिलाफ माहौल बनाया. ईसाई समुदाय का यूडीएफ की ओर रुझान मध्य केरल में ईसाई मतदाताओं का बड़ा हिस्सा, जो 2021 में कुछ हद तक अलग हुआ था, इस बार फिर कांग्रेस की ओर लौटता दिखा. बीजेपी का ईसाई समुदाय तक पहुंच बनाने का प्रयास सफल नहीं हो पाया. फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) से जुड़ी बहस ने भी कुछ ईसाई मतदाताओं में बीजेपी को लेकर झिझक पैदा की. सबरीमला और अन्य मुद्दे सबरीमला मंदिर से जुड़े कथित सोना चोरी मामले ने भी एलडीएफ के खिलाफ माहौल बनाने में भूमिका निभाई. हालांकि बीजेपी ने इस मुद्दे को अपेक्षाकृत सीमित रूप से ही उठाया. दूसरी ओर, कांग्रेस ने वायनाड राहत राशि के दुरुपयोग का मुद्दा सामने रखा, लेकिन उसका असर भी सीमित ही दिखाई दिया. इससे कई क्षेत्रों में हिंदू मतदाताओं ने वोट विभाजन के बजाय अधिकतर सीपीआई(एम) के खिलाफ मतदान को प्राथमिकता दी, जिसका सीधा लाभ यूडीएफ को मिलता दिखा.

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: जानिए क्या है यह विवादित योजना, जिसपर मचा है बवाल

नई दिल्ली हिंद महासागर में भू-राजनीतिक हलचलें तेज हैं और इसी बीच भारत सरकार का 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' चर्चा के केंद्र में है। लगभग 72,000 करोड़ रुपये (करीब 9 अरब डॉलर) की लागत वाला यह मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट केवल एक विकास योजना नहीं है, बल्कि यह हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की सैन्य और रणनीतिक ताकत को कई गुना बढ़ाने वाला एक मास्टरस्ट्रोक है। आइए ऐतिहासिक तथ्यों, शिपिंग आंकड़ों और रणनीतिक नजरिए से समझते हैं कि यह प्रोजेक्ट क्या है और इससे चीन की नींद क्यों उड़ी हुई है। क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट? नीति आयोग (NITI Aayog) द्वारा तैयार किए गए इस विजन डॉक्यूमेंट के तहत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी द्वीप, 'ग्रेट निकोबार' को एक बड़े आर्थिक और सामरिक हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस मेगा प्रोजेक्ट के मुख्य रूप से चार बड़े घटक हैं:     इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गैलाथिया बे में एक विशाल बंदरगाह, जो दुनिया के सबसे बड़े मालवाहक जहाजों को संभालने में सक्षम होगा।     ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट: एक नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जो नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करेगा।     गैस और सौर आधारित पावर प्लांट: द्वीप की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक आधुनिक और स्वच्छ ऊर्जा संयंत्र।     ग्रीनफील्ड टाउनशिप: व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक आधुनिक शहर का निर्माण। रणनीतिक अहमियत: सेनाएं कैसे होंगी मजबूत? अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को भारत का 'अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर' (कभी न डूबने वाला विमानवाहक पोत) कहा जाता है। स्ट्रेट ऑफ मलक्का पर पकड़: ग्रेट निकोबार द्वीप 'स्ट्रेट ऑफ मलक्का' के पश्चिमी मुहाने से बमुश्किल 90 समुद्री मील दूर है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग चोकप्वाइंट्स में से एक है। नौसेना की गहरी पैठ: नया डीप-ड्राफ्ट पोर्ट भारतीय नौसेना को अपने सबसे बड़े युद्धपोतों और पनडुब्बियों को यहां लंबे समय तक तैनात करने की सुविधा देगा। वायुसेना की पहुंच: नए एयरपोर्ट के निर्माण से भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान (जैसे सुखोई-30 MKI) और समुद्री टोही विमान (P-8I Poseidon) इस क्षेत्र में अपनी गश्त बढ़ा सकेंगे, जिससे पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया और हिंद महासागर पर भारत की सीधी नजर रहेगी। क्विक रिस्पॉन्स: अंडमान और निकोबार कमांड (ANC) भारत की एकमात्र त्रि-सेवा कमांड है। इस इंफ्रास्ट्रक्चर से तीनों सेनाओं का समन्वय और प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो जाएगा। चीन पर कैसे कसा जाएगा शिकंजा? (मलक्का डिलेमा) चीन की आक्रामकता का सबसे बड़ा जवाब ग्रेट निकोबार की इसी भौगोलिक स्थिति में छिपा है। चीन की 'दुखती रग': चीन का लगभग 70 से 80% कच्चे तेल का आयात और उसका अरबों डॉलर का निर्यात इसी स्ट्रेट ऑफ मलक्का से होकर गुजरता है। इसे चीन का 'मलक्का डिलेमा' कहा जाता है। चोकपॉइंट कंट्रोल: युद्ध या तनाव की स्थिति (जैसे लद्दाख या अरुणाचल प्रदेश में चीनी घुसपैठ) में, भारतीय नौसेना ग्रेट निकोबार बेस का इस्तेमाल करके स्ट्रेट ऑफ मलक्का को ब्लॉक कर सकती है। इससे चीन की ऊर्जा सप्लाई और अर्थव्यवस्था ठप पड़ सकती है। स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का जवाब: चीन म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव में बंदरगाह बनाकर भारत को घेरने की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति पर काम कर रहा है। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट इस चीनी घेराबंदी को तोड़ने के लिए भारत की 'फॉरवर्ड डिफेंस लाइन' का काम करेगा। ग्लोबल शिपिंग के ताजा आंकड़े और भारत का आर्थिक लाभ सामरिक फायदों के अलावा, यह प्रोजेक्ट भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक गेमचेंजर भी है। शिपिंग ट्रैफिक: स्ट्रेट ऑफ मलक्का से हर साल लगभग 90,000 से 1,00,000 वाणिज्यिक जहाज गुजरते हैं। यह वैश्विक व्यापार का लगभग 30% और दुनिया भर के समुद्री तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा है। विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता घटेगी: वर्तमान में, भारत का लगभग 75% 'ट्रांसशिपमेंट कार्गो' कोलंबो, सिंगापुर और पोर्ट क्लैंग (मलेशिया) जैसे विदेशी बंदरगाहों पर उतरता है और वहां से छोटे जहाजों में भारत आता है। इससे भारत को हर साल करोड़ों डॉलर का नुकसान होता है। राजस्व और रोजगार: गैलाथिया बे का नया बंदरगाह भारत को वैश्विक शिपिंग रूट के ठीक बीचों-बीच स्थापित कर देगा। इससे दुनिया भर के बड़े जहाज सीधे भारत आएंगे, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और रोजगार के हजारों नए अवसर पैदा होंगे। कुछ ऐतिहासिक तथ्य भी देख लीजिए प्राचीन और मध्यकालीन महत्व: चोल साम्राज्य के दौरान (विशेषकर राजेंद्र चोल के समय 11वीं सदी में), इन द्वीपों का इस्तेमास दक्षिण-पूर्व एशिया (श्रीविजय साम्राज्य) में नौसैनिक अभियानों के लिए एक रणनीतिक बेस के रूप में किया जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध: 1942 में इन द्वीपों पर जापानी सेना ने कब्जा कर लिया था। बाद में इसे प्रतीकात्मक रूप से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 'आजाद हिंद सरकार' को सौंप दिया गया था, जिन्होंने 30 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर में पहली बार तिरंगा फहराया था। पोस्ट-इंडिपेंडेंस: आजादी के बाद लंबे समय तक इन द्वीपों को मुख्य रूप से आदिवासी संरक्षण और पर्यावरण के नजरिए से अलग-थलग रखा गया। लेकिन 21वीं सदी में बदलते वैश्विक समीकरणों और चीन के उदय ने भारत को अपनी 'लुक ईस्ट' (अब 'एक्ट ईस्ट') पॉलिसी के तहत इस क्षेत्र का सैन्यीकरण और विकास करने पर मजबूर कर दिया। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केवल ईंट और पत्थर का निर्माण नहीं है; यह 21वीं सदी में हिंद महासागर में अपनी चौधराहट कायम रखने का भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक दांव है। पर्यावरण और स्थानीय जनजातियों (जैसे शोम्पेन और निकोबारी) के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए, यदि यह प्रोजेक्ट समय पर पूरा होता है, तो यह भारत को न केवल आर्थिक महाशक्ति बनाएगा, बल्कि चीन के खिलाफ एक अजेय सुरक्षा कवच भी प्रदान करेगा।   सरकारी दावों और आलोचनाओं के बीच सच्चाई क्या है, यह समझना जरूरी है. इन्हीं पहलुओं को स्पष्ट करने के लिए यहां 11 अहम सवालों के जरिए इस पूरी परियोजना की पड़ताल की गई है. 1. ग्रेट निकोबार परियोजना क्या है? ग्रेट निकोबार परियोजना भारत की एक महत्वाकांक्षी रणनीतिक और आर्थिक पहल है, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में देश की मौजूदगी को सशक्त करना है. इस परियोजना के तहत अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, पावर प्लांट और आधुनिक टाउनशिप विकसित किए जाने की योजना है. यह सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत को ग्लोबल समुद्री व्यापार और … Read more